भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 311–320
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 311–320
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पञ्चदशोऽध्यायः ( वाचिकाभिनयाद्यध्याय )
यो वागभिनय: ' पूर्व मया प्रोक्तो द्विजोत्तमाः ।
लक्षणन्तस्य वक्ष्यामि स्वरव्यञ्जनसम्भवम् ॥ १ ॥
हे मुनिजन, अभिनयों के निरूपण के प्रसङ्ग में जो पहिले मैंने वाचिक अभिनय बतलाया था अब उसका ( अवसर प्राप्त होने के कारण ) स्वर एवं व्यञ्जनों के द्वारा निर्मित होने वाला लक्षण बतलाता हूँ ॥ १ ॥
नाट्य ( रचना ) में संवादों का महत्व-वाचि यत्नस्तुं कर्तव्यो नाट्यस्यैषा तनुः स्मृता । अङ्गनेपथ्य त्वानि वाक्यार्थं व्यञ्जयन्ति हि ॥ २ ॥
( कवि के द्वारा काव्यादि निर्माण तथा अभिनेता के द्वारा प्रयोग के अवसर पर ) शब्दों पर विशेष उद्योग ( प्रयत्न ) रहना चाहिये, क्योंकि यही सारे नाट्यप्रदर्शन का कलेवर है । क्योंकि अङ्ग, नेपथ्य - रचना तथा सत्वा-भिनय वाक्य के ( शब्द के ) अर्थों की ( ही ) अभिव्यक्ति करते हैं ( आशय यह कि - वाचिक अभिनय के ये सभी सहायक ( मात्र ) है । यदि वाचिक अभिनय शिथिल हो तो अन्य अभिनयों से प्रयोग सुरुचिपूर्ण नहीं बन सकता ) ॥ २ ॥
१. चार प्रकार के अभिनय का ना ० शा ० अध्याय ६ । २३ पर उल्लेख किया जा चुका है । २. यह नियम अभिनेताओं और नाट्यरचनाकार पर समान रूप से लागू है । अभिनवगुप्तपादाचार्य का मत है कि नट के द्वारा अभिनय की और लेखक के द्वारा निर्माण की दशा में शब्दों की रचना पर ध्यान देना चाहिये । ( अभि ० भा ० पृ ० २२० ) आङ्गिक अभिनय के पश्चात् वाचिक अभिनय का स्वरूप निरूपण क्रम प्राप्त है; यह नाट्य का अनुप्राणक तत्व है तथा विषय के उत्तमता से प्रस्तुत करने में अतिशय महत्वशाली भी है इसीलिए वाचिक अभिनय का लक्षण बतलाने के क्रम को चलाने के कारण इसकी पूर्व अध्याय से संगति भी स्थापित होती है । १. प्रोक्तो मयापूर्व- क ० २. यत्नो विधातव्यः क्र ० ३. नाट्यस्येयं क ० । ४. तत्वानि क ० । ५. वागर्थ — क ० ।
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पञ्चदशोऽध्यायः २०१
वायांनी शास्त्राणि वानिष्ठानि तथैव च ।
तस्माद्वाचः परं नास्ति वाग्धिं सर्वस्य कारणम् ॥ ३ ॥
इस जगत में सभी शास्त्र तथा वाङ्मय शब्दात्मक हैं तथा शब्दनिष्ठ ( शब्दाश्रित ) भी । इसलिए वाणी से परे कुछ भी नहीं है और सभी का ( भावों वस्तुओं आदि का ) कारण शब्द ही ' होता है ॥ ३ ॥
वाचिकाभिनय विभाग-नामाख्यातनिपातोपसर्गतद्धितसमासनिर्वर्त्यः ।
सन्धिविभक्तिनियुक्तो विशेयो वाचिकौभिनयः ॥ ४ ॥
यह वाचिकाभिनय नाम ( संज्ञा ), आख्यात ( क्रिया ), निपात, उपसर्ग, तद्धित, समास, सन्धि तथा विभक्ति ( के ज्ञान ) से सम्बद्ध होता है ॥ ४ ॥
पाट्य के ( दो ) भेद-द्विविधं हि स्मृतं पाठयं संस्कृतं प्राकृतं तथा ।
तयोर्विभागं वक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः ॥ ५ ॥
( नाटक में स्थित ) पाठ्य दो प्रकार का है— संस्कृत पाठ्य तथा प्राकृत-पाठ्य । अब मैं क्रमशः उनका विभागपूर्वक स्वरूप बतलाता हूँ ॥ ५ ॥
१. शब्द सभी का कारण होता है यह विचार भर्तृहरि द्वारा भी निरूपित किया गया है । तुलना कीजिये - वाक्यपदीय ब्रह्मकाण्ड की निम्न कारिकाओं से-शब्दस्य परिणामोऽयमित्याम्नायविदो विदुः । छन्दोभ्य एव प्रथममेतद्विश्वं व्यवर्तत ॥ ( ब्र ० का ० १२१ ) न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते । अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन भासते ॥ ( ब्र ० का ० १२४ ) सा सर्व विद्या - शिल्पानां कलानाञ्चोपबन्धनी । तद्वशादभिनिष्पत्तौ सर्वं वस्तु विभाव्यते ॥ ( ब्र ० का ० १२६ ) १. वाङ्मयानि तु — क ० । २. वाग्भिक ० । ३. नामाख्यातनिपातैरुपसर्गं समासतद्धितैर्युक्तः - ख ०; ग ० ४. विभक्तिषु युक्तौ - ख ०, ग ० । ५. वाचिकोऽभिनयः – क ० । अत्र व्याख्यातृपाठस्त्वेवम्-आगमनामाख्यातोपसर्गतद्धित निपातसन्धियुतः । सवचन विभक्त्युपग्रह निर्वत्यों वाचिकाभिनयः ॥ ६ यथा क ० । ७. अङ्गानि वक्ष्याम्यनयोः - क ० ॥
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२०२ नाट्यशास्त्रम्
पाठ्य के विभिन्न आधार ---व्यञ्जनानि स्वरांश्चैव सम्धयोऽथ विभक्तयः ।
नामाख्यातोपसर्गाश्च निपातास्तद्धितास्तथा ॥ ६ ॥
पतैरङ्गैः समासैश्च नानाधातु संमाश्रयम्! विज्ञेयं संस्कृतं पाठयं प्रयोगञ्च निबोधत ॥ ७ ॥
संस्कृत - पाठ्य व्यञ्जन, स्वर, सन्धि, विभक्ति, नाम ( संज्ञा ) आख्यात ( क्रिया ) उपसर्ग, निपात, तद्धित समास तथा नाम धातु के द्वारा निर्मित या आश्रय से युक्त ) होता है । अब मैं इनका सलक्षण प्रयोग बतलाता हूँ ॥ ६-७ ॥
पाठ्यवर्ण - निरूपण-अकाराद्याः स्वरा ज्ञेया औकारान्ताश्चतुर्दश ।
हन्तानि कादीनि व्यञ्जनानि विदुर्बुधाः ॥ ८ ॥
' अ ' कार से प्रारम्भ होकर ' औ ' कार तक पूर्ण हो जाने वाले चौदह स्वैर तथा ' क ' से प्रारम्भ होकर ' ह ' पर समाप्त हो जाने वाले वर्ण व्यञ्जन कहलाते हैं ॥ ८ ॥
अत्र स्वराश्चतुर्दश कादीनि व्यञ्जनानि यथा - अ आ इ ई उ ऊ ऋऋ ल ल ए ऐ ओ औ स्वरा ज्ञेयाः । व्यञ्जनानि यथा - क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भ म य र ल व श ष स हाः इति व्यञ्जनवर्गाः । १. शिक्षा तथा प्रातिशाख्य ग्रन्थों में वर्णों ( स्वरों ) की विभिन्न संस्थाएँ बतलाई गई हैं जिनमें पाणिनि - शिक्षा में इनकी संख्या २२ है । अन्य प्रातिशाख्यों और ऋकतन्त्र व्याकरण में इनकी संख्या क्रमशः १३, १६ तथा २३ प्राप्त होती है । पाणिनिशिक्षा में अनुस्वार, विसर्ग जिह्वामूलीय और उपध्मानीय को भी व्यंजनान्तर्गत माना गया १. स्वरश्चैव – क ० । २ तथा समासा इत्येवं एतैरङ्गविधानैश्च – क ० । ३. गवेक्षितम् - क ० । ४ तद्वक्ष्यामि समासतः - ख ०; ग ० । ५. अकारादि - क ० । ६. ककारादीनि हान्तानि - क ० । ७. अस्मादनन्तरं क ० पुस्तके तु
अष्टौ स्थानानि वर्णानामुरः कण्ठः शिरस्तथा ।
जिह्वामूलच दन्ताश्च नासिकोष्ठौ च तालु च ॥
अकुहविसर्जनीयाः कण्ठघाः, इचुयशास्तालव्याः, ऋटुरण मूर्धन्याः, लुतुलसा
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पञ्चदशोऽध्यायः ( गद्यभाग ) ( ' अ ' से प्रारम्भ होने वाले ) इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ऌ, ए ऐ ओ औ तथा व्यञ्जन समूह है- क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, न ल, व, श, ष, स, ह । व्यञ्जन — तथा उनके उच्चारण स्थान-वर्गे वर्गे समाख्यातौ द्वौ वर्णौ अघोषा इति ये त्वन्ये सघोषाः २०३ स्वर चौदह हैं - अ, आ, क से प्रारम्भ होने वाला , प, फ, ब, भ, म, य, र,
प्रागवस्थितौ ।
परिकीर्तिताः ॥ ९ ॥
प्रत्येक वर्ग के प्रारम्भ के दो ( व्यञ्जन ) वर्ण ( जैसे - क, ख तथा श, ष, स ) अघोष तथा शेष सभी वर्ण सघोष ( घोष ) कहलाते हैं ॥ ९ ॥
एते घोषा घोषाः कण्ठ्यौष्ठया दन्त्यजिह्ननासिक्याः ।
ऊष्माणस्तालव्यो विसर्जनीयाश्च बोद्धव्यः ॥ १० ॥
ये घोष तथा अघोष वर्ण कण्ठ्य, ओष्ठ्य, दन्त्य, जिह्वये, नासिक्य, ऊष्माण, तालव्य तथा विसर्जनीय भेद से आठ स्थानों से उच्चारित होते हैं ।
ग घ ङ जशअ ड ढ ण द ध न ब भ म य र ल वा मता घोषाः ।
कख च छ ट ठ त थ प श ष सा इति वर्गेष्वघोषाः स्युः ॥ ११ ॥
इस व्यञ्जन समूह में ग घ ङ, ज झ ञ, ड ढ ण, द ध न, ब भ म, १. जिल्ह्वच वर्णों का किसी व्याकरण में विवरण नहीं मिलता, सम्भवतः यह मूर्धन्य के स्थान का निर्देश करता है क्योंकि मूर्धन्य वर्णों की ध्वनि में जिह्वा का महत्वपूर्ण योगदान रहता है । दन्त्या; उपूपध्मानीया ओष्ठ्या इत्युपध्मानीयः इति जिह्वामूलीयः, ए ऐ कण्ठ-तालव्यौ, ओ औ कण्ठोष्ठ्यौ, वकारो दन्तोष्ठ्यः, ङ - ञ ण न मा अनुनासिकाः, विसर्जनीयस्यौरस्य इत्येके सर्वमुखस्थानमवर्णमित्यपरे । द्वौ द्वौ वर्णों तू वर्गाद्यौ शषसाश्च श्रयोऽपरे । अघोषा घोषवन्तश्च ततोऽन्ये परिकीर्तिताः ॥ इति क ० पुस्तकेऽधिकम् । १. कण्ठ्योष्ठ ( ढ्य ) दन्त ( न्त्य ) जिह्वानुनासिक्य: - ख ०; ग ० । २. स्तालव्य विसर्जनीयाश्च ख ०; ग ० । ३. तथैव य र ल व हा घोषाः -- ख ०; ग ० । ४. पफ इति वर्गेष्वघोषाः स्युः -- ख ० ग ० ।
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२०४ नाट्यशास्त्रम् तथा य र ल व ' घोष ' तथा क ख, च छ, ट ठ त थ, और प फ ' अघोष ’ वर्ण कहलाते हैं ॥ ११ ॥
क ख ग घ ङाः कण्ठस्थास्तालुस्थानास्तु च छ ज झ ञः ।
ट ठ ड ढ णा मूर्द्धन्याः त थ द ध नाश्चैव दन्तस्थाः ॥ १२ ॥
क, ख, ग, घ, ङ को कण्ठ्य, च, छ, ज, झ को तालव्य, ट, ठ, ड, ढ,
ण को मूर्धन्य तथा त, थ, द, ध, न को दन्त्य व्यञ्जन समझना चाहिये ।
अर्थात् इनका उच्चारण स्थान यही है ॥ १२ ॥
पफबभमास्त्वोष्ठ्याः स्युर्दन्त्या ललसा अंहौ च कण्ठस्थौ ।
तालव्या इचुयशाः स्युः ऋटुरषा सूर्ध्नि स्थिता ज्ञेयाः ॥ १३ ॥
ललन्त्य ओकण्ठोष्ठयौ प ऐकारी च कण्ठ तालव्यौ । प, फ, ब, भ, म को ओष्ठ्य, लु, ल तथा स को दन्त्य, अ, ह को कण्ठ्य, इ, चु ( चवर्ग ) तथा य, श को तालव्य तथा ॠ, र और ष को मूर्धन्य, लल्लू को दन्त्य, ओ, औ को कण्ठ्यौष्ट्य तथा ए, ऐ को तालव्य जानो ॥ १३-१४ ॥ कण्ठयाँ विसर्जनीयो जिह्वामूलोद्भवौ क ख योः ॥ १४ ॥
भवेदुकारस्तथा स्वरो विवृतः ।
स्पृष्टाः काद्या मान्ताः श ष स हकारास्तथा विवृताः ॥ १५ ॥
अन्तःस्था संवृत जाङ ञ ण नमा नासिकोद्भवा ज्ञेयाः ।
ऊष्माणश्च श ष स हा य व र ल वर्णास्तथैव चान्तस्थाः ॥ १६ ॥
जिह्वामूलीयः कः प उपध्मानीय संज्ञया ज्ञेयः ।
कचटतपाः स्वरिताः स्युः खछनथफाः स्युस्तथा कण्ठ्याः १२ ॥ १७ ॥
कण्ठोर स्यान् विद्याद् गर्जर्डेदवान् पाठ्य सम्प्रयोगे तु ।
वेद्यो विसर्जनीयो वर्णः ॥ १८ ॥
१. तालुस्थाना मतास्तु -- ख ०, ग ० । २. गहौ- -क ० । प ३. इयशाः - ख ०; ग ० । ४. ॠ र षाख ० । ५. मूर्धस्थिताः - ख ०; ग ० । ६. ओ औ कण्ठोष्ठस्थानौ – ख ०; ग ० । ७. कण्ठ्यौ विसर्जनीयौ जिह्वामूल्योद्भवौ कखयोः क ० । ८. जिह्वामूलोद्भवः कपयोः - ख ०; ग ० । ९. स्थानं भवेद्रकार: स्वराविद्धः - क ०; ग ० । १०. संवृताः - ख ०; ग ० । ११. ज्ञेयौ -क ० । १२. तथाक्रम्याः क ० । १३. कण्ठोरस्थान् — क ० । १४. घझढधभान् क ० । १५. जिह्वामूलस्थितो — क ० ।
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पञ्चदशोऽध्यायः २०५ विसर्ग का कण्ठ तथा क, ख का जिह्वामूलीय, प, फ तथा उ का ओष्ठ तथा स्वरों का विवृत उच्चारण स्थान है । क से म तक स्पष्ट तथा श, ष, स, हविवृत कहलाते हैं । अन्तस्थ का संवृत ङ, ञ, ण, न, म का नासिका उच्चारण स्थान है । श, ष, स, ह उष्मा, य, र, ल, व अन्तस्थ, क जिह्वामूलीय तथा प उपध्मानीय होता है । क, च, ट, त, प स्वरित, ख, छ, ठ, थ, फ कण्ठ्य, ( कम्य? ) ग, ज, ड, द, ब ( घ, झ, ढ, ध, भ ) कण्ठ तथा उरस्थल से उच्चारित किये जाते हैं । विसर्जनीय जिह्वा के मूल भाग से उच्चरित होने वाला समझना चाहिये ॥ १४-१८ ॥
एते व्यञ्जनवर्गाः समासतः संज्ञया कथिताः ।
शब्दप्रयोगविषये स्वरांस्तु भूयः प्रवक्ष्यामि ॥। १ ९ ॥
इस प्रकार संक्षेप से व्यञ्जनवर्ग का मैंने वर्णन किया । अब मैं शब्द प्रयोग के विषय में ( की दशा में ) स्वरों का कार्य बतलाता हूँ ॥ १ ९ ॥
स्वरः तथा उनका परिमाण-य इमे स्वराश्चतुर्दश निद्दिष्टास्तत्र वै दश समानाः ।
पूर्वो स्वस्तेषां परचं दीर्घो विधातव्यः ॥ २० ॥
मैंने पहिले जो चौदह स्वर बतलाये उनमें १ से १० तक के ( स्वर ) समान कहलाते हैं । इन समान स्वरों में क्रमशः पहिला हृस्व और दूसरा दीर्घ होता है || २० ||
शब्दों के विभेद-भिर्व्यञ्जनवर्गेर्नामाख्यातोपसर्गविनिपातैः ।
तद्धितसन्धिविभक्तिभिरधिष्ठितः शब्द इत्युक्तः ॥ २१ ॥
१. व्यंजनों के उच्चारण स्थान तथा उनकी परम्परा आदि के विशेष विवरण पाणिनि - शिक्षा तथा पातंजल - महाभाष्य आदि में भी देखे जा सकते हैं । १. शब्द विषयप्रयोगे – क ० । २. अस्मात्परं यस्मिन् स्थानेषु समो विज्ञेयो यः सवर्णसंज्ञोऽसौ । इति क ० पुस्तकेऽधिकम् । ३. परस्तु दीर्घो विनिर्देश्य: - क ०; परश्च दीर्घोऽवगन्तव्यः - क ० । ४. इत्थं व्यज्जनयोगैः परैश्च साख्यातनामपद विहितैः । काव्यनिबन्धाश्च स्युर्धातुनिपातोपसर्गेस्तु । —क ० ।
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२०६ नाट्यशास्त्रम् इस प्रकार इन स्वर तथा व्यञ्जनों के योग से तथा आख्यात ( क्रिया, धातु ) नाम ( संज्ञा ), उपसर्ग, निपात, तद्धित, सन्धि तथा विभक्ति से अधिष्ठित शब्द होता है ॥ २१ ॥
पूर्वाचार्यैरुक्तं शब्दानां लक्षणन्तु विस्तरतः ।
पुनरेव संहृतार्थ लक्षणतः सम्प्रवक्ष्यामि ॥ २२ ॥
प्राचीन आचार्यों ने शब्द का विस्तारपूर्वक लक्षण ( निर्दिष्ट ) किया है । मैं उनका संक्षेप में ( सार भूत ) लक्षण प्रसंगवश बतलाऊँगा ॥ २२ ॥
नाम ( संज्ञा ) -स्वाद्याधिकारगुणैरर्थविशेषैर्विभूषितन्यासम् ।
प्रातिपदिकार्थर्लिङ्गैर्युक्तं पञ्चविधमिदं ज्ञेयम् ॥ २३ ॥
संज्ञा ( नाम ) – अपने ' सु ' आदि विभक्त प्रत्ययों तथा उनके द्वारा प्रकट होने वाले विशेष अर्थों से युक्त होती है । इसके पाँच प्रकार होते हैं तथा यह प्रातिपदिकार्थ तथा लिंग से युक्त होती है ॥ २३ ॥
१. नाम या संज्ञा के पाँच प्रकार संक्षिप्तसार के अनुसार इस प्रकार हैं— ( १ ) उणाद्यन्त, ( २ ) कृदन्त, ( ३ ) तद्धितान्त, ( ४ ) समासान्त तथा ( ५ ) उणाद्यन्तं शब्दानुकरण कृदन्तञ्च । तद्धितान्तं तथैव च । शब्दानुकरणं चैव नाम पञ्चविधं स्मृतम् ॥ ( संक्षिप्त सार - विवरणे - गोपीचन्द्रः ) २. प्रादिपदिकार्थ के विषय में विविध मत हैं — पाणिनि ने प्रातिपदिक या १. विस्तरतो लक्षणन्तु शब्दानाम् । सङ्क्षेपादहमेषां लक्षणमर्थञ्च वक्ष्यामि क ० ।
२. अस्मादनन्तरम् -अर्थप्रधानं नाम स्यादाख्यातन्तु क्रियाकृतम् ।
द्योतयन्त्युपसर्गास्तु विशेषं भावसंश्रयम् ॥ २३
नामाख्यातार्थविषयं विशेषं द्योतयन्ति ते ।
पृथक् तत्रोपसर्गेभ्यो निपाता नियमे च्युते ॥ २४
टिप्पण्यामधिकं पद्यद्वयमुपलभ्यते । ३. एतस्य स्थाने च-उद्दिष्टं शब्दानां लक्षणमेतत् समासयोगेन ॥॥। इति क ० पुस्तक प्रकरणवशाद्धि तदहं विस्तरतः सम्प्रवक्ष्यामि ॥ इति क ० पुस्तके लभ्यते । ४. स्वाद्यत्यधिकार - ख ०, ग ० । ५. विभूषितन्यासा - ख ०; ग ० । ६. लिङ्गयुक्तम् - ख ०, ग ० ।
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पञ्चदशोऽध्यायः २०७
तत्प्राहुः सप्तविधं षट्कारकसंयुतं प्रथितसाध्यम् ।
निर्देश सम्प्रदानोपादानप्रभृतिसंज्ञाभिः ॥ २४ ॥
यह नाम सातं श्रेणियों से तथा छः कारको से युक्त होता है । कभी कभी यह सिद्ध वाच्यार्थ ( प्रथित ) तथा कभी - कभी साध्यभूत वाच्यार्थ ( साध्य ) वाला होता है । ( और जब यह ( विभिन्न ) प्रत्ययों से युक्त होता है तो ) निर्देश, सम्प्रदान, अपादान प्रभृति संज्ञा को सूचित करता हैं ॥ २४ ॥
सम्प्रत्यतीतकालक्रियादिसंयोजितं प्रथितसाध्यम् ।
वचनं नागतयुक्तं सुसंदृशसंयोजनविभक्तम् ॥ २५ ॥
जो क्रियाएँ वर्तमान तथा भूतकाल एवं इसके समान समय में होने वाले कार्य को बतलाने वाले अर्थ से सम्बद्ध शब्द बनाती हैं । वह ' प्रथित ' तथा जो कभी - कभी व्यवस्थित रस में निर्मित विभेद सम्पन्न शब्द बनाती हों साध्य कहलाती है । आख्यात -- ( क्रिया )
पञ्चशतधातुयुक्तं पञ्चगुणं पञ्चविधमिदं वापि ।
आख्यातं पाठयकृतं ज्ञेयं नानार्थाश्रयविशेषम् ॥ २६ ॥
नाम के दो प्रकार ( जाति तथा द्रव्य ) माने हैं, कात्यायन के मत में एक प्रकार और जोड़ा गया जिसे ' लिंग ' कहते हैं । व्याघ्रपाद आचार्य के मत से संख्या तथा भाष्यकार पतंजलि के मत से ' कारक ' के संयुक्त करने पर नाम के ये पाँच प्रकार हो जाते हैं । यथा - जाति, द्रव्य, लिङ्ग, संख्या तथा कारक । १. सात श्रेणी का अर्थ सात विभक्तियाँ हैं । प्रथित तथा साध्य शब्दों का आश्रय यह भी है कि सिद्धवाच्यार्थं वाला शब्द जिसका प्रकृति, प्रत्यय आदि से विभाग करते हुए निर्वचन न किया जा सके ' प्रथित ' कहलाता है ( अर्थात् रूढ़ शब्द ) तथा साध्य का आशय है कि प्रकृति प्रत्यय आदि से जिस शब्द का निर्वचन किया जाए तथा अन्तर्निहित अर्थ की अभिव्यक्ति हो सके । इसे हम दूसरे शब्दों में ' यौगिक ' शब्द कह सकते हैं । २. ' निर्देश ' का सम्बन्ध ' कारक ' से ( प्रतीत होता ) है । जैसा कि विवरण है और विभक्त्यन्त प्रत्यय से इसकी पुष्टि भी होती है । १. निर्देशसम्प्रदानोपादान —क ० । २. सम्प्रत्यतीतकालप्रयोजितः क्रियादिसंयोगः प्रथितः ख ०; ग ० । ३. वचनानागत — क ०; साध्ये वचनानां यतियुक्तं - ख ० ग ० । ४. सदृशसंयोजन - ख ०; ग ० । ४. पद्यार्धमेतत् ख ० ग ० पुस्तकयोर्नास्ति । ५. पाठ्यमिदं - क ० । ६ नामाश्रय – क ०; नामार्थसंश्रय विशेषम् - ख ० ।
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२०८ नाट्यशास्त्रम् पाँच सौं ' धातुओं का पच्चीस वर्गों में विभक्त होने वाला क्रिया का समूह ‘ आख्यात ' कहलाता है । ये पाठ्य या संवादों संज्ञाओं के आश्रित अर्थों से संयुक्त की जाती हैं ॥ २६ ॥
उपसर्ग—
प्रातिपदिकार्थयुक्तान् धात्वर्थानुपसृजन्ति ये स्वार्थे ।
उपसर्गा ह्युद्दिशस्तस्मात् संस्कारतस्तस्मिन् ॥ २७ ॥
जो अपने अर्थों के द्वारा प्रातिपादिक अर्थ सम्पन्न धातु के मूल अर्थ को विशिष्टार्थ सम्पन्न बना देते हैं उन्हें संस्कार शास्त्र में ( व्याकरण शास्त्र में ) ( इसी कारण ) ' उपसैर्ग ' कहते हैं ॥ २७ ॥
निपात-प्रातिपदिकार्थयोगाद्धातुच्छन्दो निरुक्तयुक्त्या च ।
यस्मान्निपतन्ति पदे तस्मात् प्रोक्ता निपातास्तु ॥ २८ ॥
क्योंकि प्रादिपदिकार्थ के साथ, धातु, छन्द, निर्वचन तथा युक्ति द्वारा उनके मूलार्थ को फैलाने के लिए संयुक्त होकर आते हैं । ( अतएव पद के समीप आने के कारण ) इन्हें निपात कहते हैं ॥ २८ ॥
१. घातुओं की निश्चित संख्या नहीं बतलाई जा सकती क्योंकि विभिन्न व्याकरण ग्रन्थों में इनकी अलग - अलग संख्या बतलाई गई है । पाणिनि ने अपनी धातुओं को दस गणों में विभक्त किया है । परन्तु धातुओं का पच्चीस भागों में विभाग किसी भी व्याकरण ग्रन्थ में प्राप्त नहीं होता । २. उपसर्ग का भरत प्रोक्त स्वरूप निरुक्त ( १1१-३-४ ) में उद्धृत शाकटायन के विवरण से मिलता है । ( तुलना कीजिए सम्बद्ध दोनों अंशों की । ) उपसर्गों का विविध अर्थद्योतन निम्न श्लोक से स्पष्ट है-कचिद् भिनत्ति धात्वर्थं क्वचित्तमनुवर्तते । विशिनष्टि तमेवार्थं मुपसर्गं गतिस्त्रिधा ॥ ३. पाणिनि के अनुसार अव्यय जो ' च ' आदि वर्ग में पठित है ' निपात ' कहलाते हैं | पतंजलि के मत में विभक्ति तथा स्वरों का समानता रखने वाले अव्यय कारक के कार्य की पूर्ति भी कर देते हैं । द्रष्ट ० पात ० महा ० ३।४।२. ( विभक्तिस्वरप्रतिरूपकाश्च भवन्तीति निपातसंज्ञाः ) १. युक्तं क ० 1 २. नुत्सृजन्ति - ख ०; ग ० । ३. स्वार्थे:: - -ख ० । ४. संस्कारशास्त्रेऽस्मिन् ख ०; ग ० ।
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पञ्चदशोऽध्यायः २० ९
प्रत्यय-प्रत्ययविभागजनिताः प्रकर्षसंयोगसंत्ववचनैश्च ।
यस्मात् पूरयतेऽर्थान् प्रत्यय उक्तस्ततस्तस्मात् ॥ २ ९ ॥
जो प्रकर्ष, संयोग तथा भाव ( सत्व ) के द्वारा शब्दों के आंशिक अर्थों की पूर्ति करते हैं उन्हें इन विचारों ( विश्वासों - प्रत्यय ) को विकसित करने के कारण ' प्रत्यये ' कहा जाता है ॥ २६ ॥
तद्धित-लोप - प्रकृति - प्रत्यय - विभाग संयोग सत्व - वचनेषु ।
तस्तान्पूर्यतेऽर्थीस्तेषु यतस्तद्धितस्तस्मात् ॥ ३० ॥
क्योंकि यह शब्द के अर्थों को - लोप, प्रकृति तथा प्रत्यय के विभाग या संयोग द्वारा विकसित या पूर्ण करता है तथा उनके अन्तःस्थित ( विचारया ) भावाभिप्राय को बतलाता है अतएव ' तद्धिते ' कहलाता है ॥ ३० ॥
विभक्ति-एकस्य बहूनां वा धातोर्लिङ्गस्य वा पदानां वा ।
यस्माद्विभजन्त्यर्थान् विभक्तयः कीर्तितास्तस्मात् ॥ ३१ ॥
एक या अनेक शब्दों के अर्थों का उनकी मूलघातु या लिङ्ग के अनुसार विभाग या विभेद करने के कारण ' विभक्ति ' कहलाती है ॥ ३१ ॥
१. प्रत्यय की भरत ने व्यापक परिभाषा की है । अभिनवगुप्त ने इस लक्षण को ऐन्द्रव्याकरण के अनुसार तथा वहीं से लिया हुआ निरूपित किया है । धातु में अवस्थित अर्थ के बोध में जो सहायक हो उसे सामान्यतः ' प्रत्यय ' कहा जाता है । ( येनार्थः प्रतीयते स प्रत्यय: ) । २. भरतोक्त तद्धित का स्वरूप अन्य व्याकरण ग्रंथों से मेल नहीं खाता । ३. विभक्ति शब्द का निर्वचन या व्युत्पत्ति लभ्य अर्थ लेकर यहाँ भरत ने १. तत्व क ० । २. तांस्तान् पूरयते — क ०! ३. लोक - ख ०; ग ० । ४. तत्ववचनैस्तु — क ० । ५. ते ते पूर्यन्तेऽर्था:: - - क ०; तस्मात् पूरयतेऽर्थान् ख ०; ग ० । ६. अर्थान् हि तो यतः - क ०; ततो यतः - १०, ग ० । ७. लिङ्गस्यापदानां वा — ख ० ग ० । ८. विभजन्त्यर्थं यस्मिन् — क ०, विभजन्त्यर्थं यस्मात् विभक्तयस्तेन ताः प्रोक्ताः - ख ०; ग ०. १४ ना ० शा ० द्वि ०