भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 321–330
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 321–330
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नाट्यशास्त्रम् २१० सन्धि-वर्णपदक्रमसिद्धः पदैर्कयोगाच्च वर्णयोगाच्च सँन्धोयते तु यस्मात्तस्मादुपदिश्यते सन्धिः पृथक्भूत पद, वर्ण या स्वर व्यञ्जन परस्पर शब्द जब मिल जाते हों तो इस सन्धान या जोड़ के समीप आकर ' सन्धि ' कहते हैं ॥ ३२ ॥
विशिस्तु स्वरा यत्र व्यञ्जनं वापि योगतः सन्धीयते पदे यस्मात्तस्मात् सन्धिः प्रकीर्तितः ॥। ३२ ॥ या शब्दों के हो जाने को ॥। ३३ ॥ दो विशिष्ट स्वरों या पदों का क्रम ( यदि ) परस्पर मिल जाता अथवा हो तो उसे भी ' सन्धि ' जानो ॥ ३३ ॥
को बतलाया गया है । इसी प्रकार का आशय कलापव्याकरण में उसके लक्षण ' दुर्गं सिंह ने भी व्यक्त किया है । यथा: - ' अर्थस्य विभजनाद्विभक्तिः का केवल संयोग या सम्मिश्रण मात्र न तो सन्धि है । १. स्वर या व्यंजनों यह उसका प्रयोजन है किन्तु ध्वनिगतप्रभाव तथा सम्भाषणगत न ही होती हैं । इन सन्धियों का पाँच प्रकारों में आवश्यकता के कारण भी सन्धियाँ संज्ञा भी पाँच हैं- यथा - ( १ ) स्वर, विभाजन है और इसी कारण इनकी । २ ) व्यंजन, ( ३ ) प्रकृतिभाव, ( ४ ) अनुस्वार तथा ( ५ ) विसर्गसन्धि ( ( समय के लाघवार्थं ) मिलने का कार्य — जो कि पृथक् दो समीप आकर व्यर्थं ही अधिक समय ले लेता है - यदि ध्वनियों के अलग उच्चारण करने पर वैयाकरणों की ' अर्धमात्रा-किया गया हो तो सन्धि कहलाता है । यह प्राचीन वैयाकरणाः ' उक्ति के साथ ही सन्धि के उस नियम को लाघवेन पुत्रोत्सवं मन्यन्ते में व्यवधान होने से उसके पृथक् भी— जिसके अनुसार अर्धमात्रा का उच्चारण जाए - इस के बजाय सम्मिलित उच्चारण ही ' सन्धि ' करते हुए किया उच्चारण स्वाभाविक वृत्ति तथा योजना को समर्थित करता प्रकार के सिद्धान्त तथा उनकी श्लोकार्थ एकत्र न हों । है । यह सन्धि इसीलिए भी की जाती है कि दो जिससे १. वर्णक्रमसंसिद्धः क ०; वर्णक्रमसम्बद्धः – ख ०; ग ० । २. पदैकयोगोऽन्यवर्णयोगाच्च - ख ०; ग ० । च यस्मात्तस्मात् सन्धिः समुद्दिष्ट - ख ०; ग ० । ३. सन्धीयते ४. पद्यमेतत् ख ० ग ० पुस्तकयोर्नास्ति ।
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पञ्चदशोऽध्यायः २११
समास-लुप्तविभक्तिर्नानामेकार्थं संहरत्समासोऽपि ।
तत्पुरुषादिस्तज्ज्ञैर्निर्दिष्टः षड्विधो विप्राः ॥ ३४ ॥
नामों की विभक्तियों का लोप करते हुए एकार्थक पद को जो संक्षेप करते हुए प्रस्तुत करता हो वह तत्पुरुष आदि छः प्रकारों से युक्त ' समास ' " कहलाता है || ३४ ॥
एभिः शब्दविधानैर्विस्तारव्यञ्जनार्थसंयुक्तैः ।
पदबन्धाः कर्तव्या निर्बंद्धबन्धास्तु चूर्णा वा ॥ ३५ ॥
इस प्रकार शब्दशास्त्र के नियमों को ध्यान में रखते हुए शब्द रचना करना चाहिए जो गद्य ( चूर्ण ) निबद्ध बन्ध या पद्यात्मक हो तथा जो शब्दों के विस्तार और अभिव्यक्ति से पूर्ण या युक्त हो ॥ ३५ ॥
शब्द- द्वैविध्य-विभक्त्यन्तं पदं ज्ञेयं निबद्धं चूर्णमेव च ।
तत्र चूर्णपदस्येह सन्निबोधत लक्षणम् ॥ ३६ ॥
विभक्ति जिस शब्द के अन्त में संयुक्त की जाये उसे ' पद ' जानो । यह दो प्रकार होता है - निबद्ध तथा चूर्णपद । अब मैं चूर्णपद का लक्षण बतलाता हूँ जिसका गद्य लेखन में उपयोग किया जाता है ॥ ३६ ॥
चूर्णपद-अनिबद्धपदं छन्दस्तथा चानियताक्षरम् ।
अर्थापेक्ष्यक्षरस्यूतं ज्ञेयं चूर्णपदं बुधैः ॥ ३७ ॥
१. लुप्तविभक्तिर्नाम्ना एकार्थान् संहरन्ति सङ्क्षेपात् - ख ०; ग ० । २. तत्पुरुषादिकसंज्ञैर्निद्दिष्टः षड्विधः सोऽपि ३. व्यञ्जनात्व - ख ०; ग ० । ४. वृत्तनिबन्धास्तु - ख ०; ग ० । ५. चतुविधं पदं तच्च — क ०; विभज्यैकं पदं ६. निबन्धं - ख ०; ग ० । ७. बहिर्बोधत - ख ०; ग ० । ८. अनिबद्धं पदवृन्दं - ख ०; ग ० । ९. छन्दो यथेष्टगुरुलाघवम् — क ० । - ख ०; ग ० । ज्ञेयं - ख ०; १०. अर्थापेक्षाक्षरपदं – क ०; अर्थापेक्षाक्षरयुतं - ख ०; ग ० ग ० । 3
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२१२ नाव्यशास्त्रम् जिसमें किसी निश्चित प्रकार से पदों की संयोजना न अक्षरों की संख्या नियत न हो तथा जो अपने उद्दिष्टार्थ को लिए अनेक वर्ण या पदों को स्वतन्त्रतापूर्वक ( रचना में ) सके, तो उसे ' चूर्णपद ' शब्द जानो ॥ ३७ ॥
निबद्धपद –
निबद्धाक्षरसंयुक्तं यति च्छेदसमन्वितम् ।
निबद्धन्तु पदं ज्ञेयं प्रमाणनियतात्मकम् ॥ ३८
हो, जिसमें प्रकट करने के समाविष्ट कर ॥ जिसमें पदों तथा अक्षरों का निश्चित क्रम के अनुसार गठन हो, यति ( विच्छेद ) समन्वित हो तथा जिसमें अक्षर संख्या का निश्चित प्रमाण रहे उसे ' निबद्ध ' ( पद्योपयोगी ) शब्द समझना चाहिये ॥ ३८ ॥
छन्द–
एवं नानार्थसंयुक्तैः पादैर्वर्णविभूषितैः ।
चतुर्भिस्तु भवेद्युक्तं छन्दोवृत्ताभिधानवत् ॥ ३ ९ ॥
इस प्रकार शब्दों के गठन द्वारा जो पद्य - रचना की जाती है उसमें चार पाद होते हैं — उसमें अनेक अर्थों का अभिव्यञ्जन रहता है तथा वर्णों के ( गुरु तथा लघु स्वरूपों के ) द्वारा यह निर्मित की जाती है । ऐसी रचना छन्द या वृत्त नाम से अभिहित की जाती है ॥ ३ ९ ॥ छन्द ( वृत्तों ) के विभेद—
षड्विंशतिः स्मृतान्येभिः पादैश्छन्दांसि संख्यया ।
सम्मर्द्धसमञ्चैव तथा विषममेव च ॥ ४० ॥
१. पदच्छेद – ख ०; ग ० । २. प्रमाणनियताक्षरम् —क ० । ३. पदवर्ण – क ०; पदैर्वणं ख ०; ग ० । ४. भवेत्पादै – क ०; भवेद् वृत्तं - ख ०; ग ० । ५. छन्दोवृत्य भिधानवत्, छन्दोवृत्तसमाश्रयम् - क ० । ६. स्मृतानीह – ख ०; ग ० । ७. पादे – ख ०; ग ० । ८. समचार्धसमचैव ख ०; ग ० ।
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पञ्चदशोऽध्यायः २१३ छन्दो ज्ञेयं समासेन त्रिविधं वृत्तमिष्यते । छन्दों के एक से २६ संख्या तक के अक्षरों में होने वाले पादों के कारण २६ भेद हैं । इनके तीन प्रकार और भी है — सम, अर्धसम तथा विषम वृत्त ॥ ४०-४१ ॥ नानावृत्तविनिष्पन्ना शब्दस्यैषा तनुः स्मृता ॥ ४१ ॥
छन्दोद्दीनो न शब्दोऽस्ति न च्छन्दः शब्दवर्जितम् ।
एवं तूभयसंयोगो नाट्यस्योद्योतकः स्मृतः ॥ ४२ ॥
यह छन्द – जो कि विभिन्न अक्षरों द्वारा वर्णिक वृत्त का स्वरूप धारण करता है— शब्दों का ढांचा है । क्योंकि वृत्तहीन कोई शब्द तथा शब्दहीन कोई वृत्त नहीं होता । ये दोनों परस्पर मिल प्रयोग को अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचाते हैं ॥ ४१-४२ ॥ छन्दों के ( वर्ण - संख्या के अनुसार पाद वाले ) विभेद-एकाक्षरं भवेदुक्तमत्युक्तं द्वयक्षरं भवेत् । मध्यं त्र्यक्षरमित्याहुः प्रतिष्ठा चतुरक्षरा ॥
सुप्रतिष्ठा भवेत् पञ्च षड् गायत्री भवेदिहं ।
सप्तक्षरा भवेदुष्णगष्टौ चानुष्टुबिष्य ते ॥
नवाक्षरा तु बृहती पश्चैिव दशाक्षरा ।
एकादशाक्षरा त्रिष्टुब्जगती द्वादशाक्षरा ॥
कर ही नाट्य-४३ ॥
४४ ॥
४५ ॥
१. छन्दोयुक्तं - ख ०; ग ० । २. निबद्धं - ख ० ग ० । ३. नानावृत्तवि निष्पन्नं शब्दमूलं तु तत्स्मृतम् —क ० ४. न शब्दश्छन्दसा होनो क ० । ५. वर्जितः - ख ० ग ० । ६. तस्मात्तूभयसंयुक्ते नाट्यस्योद्योतके स्मृते – ख ०; ७. मध्यमं त्र्यक्षरं प्रोक्तं - क ० । ८. तथैव च - क ० ।
९. उष्णिक् सप्ताक्षरकृता त्वष्टाऽनुष्टुप् प्रकीर्तिता -१०. उच्यते - क ० ।
११. त्रिष्टुबेकादशा ज्ञेया – क ० ॥
फ ग ० । क ० ।
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२१४ नाट्यशास्त्रम्
त्रयोदशातिजगती शक्करी तु चतुर्दश ।
दर्शपञ्चातिशक्वर्या अष्टिः स्यात् षोडशाक्षरा ॥
तथा सप्तदशात्यष्टिः धृतिरष्टादशाक्षरा ।
एकोनविंशातिधृतिः कृतिर्विंशतिरेव च ॥
प्रकृतिश्चैकविंशत्या द्वाविंशत्याकृतिस्तथा । विकृतिः स्यात्त्रयोविंशा चतुर्विंशापि सङ्कृतिः पञ्चविंशत्यभिकृतिः बँडविंशत्यक्ष रोत्कृतिः । ( अक्षर गणना के अनुसार होने वाले छन्दों के भेदों में ४६ ॥ ४७ ॥ ॥ ४८ ॥
) एक अक्षर के पाद वाला वृत्त ' उक्ता ', दो अक्षरों वाला ' अत्युक्ता '. तीन अक्षरों वाला ‘ मध्या ', चार अक्षरों वाला ' प्रतिष्ठा ', पाँच अक्षरों वाला ' सुप्रतिष्ठा ', छः अक्षरों का ' गायत्री ', सात अक्षरों का ' उष्णिक् ', आठ अक्षरों का ' अनुष्टुप ', नौ अक्षरों का ' बृहती ', दस अक्षरों का ' पंक्ति ', ग्यारह अक्षरों का ' त्रिष्टुप ' बारह अक्षरों का ‘ जगती ', तेरह अक्षरों का ' अतिजगती ', चौदह अक्षरों का ‘ शक्करी ', पन्द्रह अक्षरों का ' अतिशंकरी ', सोलह अक्षरों का ' अष्टि ', सत्रह अक्षरों का ‘ अत्यष्टि ', अट्ठारह अक्षरों का ' धृति ', उन्नीस अक्षरों का ' अतिवृति ', बीस अक्षरों का ' कृति ', इक्कीस अक्षरों का ' प्रकृति ', बाईस अक्षरों का ' आकृति ', तेईस अक्षरों का ' विकृति ', चौबीस ' अक्षरों का ‘ संकृति ’, पच्चीस अक्षरों का ' अतिकृति ' तथा छब्बीस अक्षरों का ‘ उत्कृति ' होता है ॥ ४३-४९ ॥ अतोऽधिकाक्षरं छन्दो मालावृत्तमिति स्मृतम् ॥ ४ ९ ॥ १. अतिशक्करी पञ्चदश षोडशाष्टिः प्रकीर्तिता क ० । २. अत्यष्टिः स्यात् सप्तदश — क ० । ३. एकाधिका चातिधृतिः क ० । ४. स्त्वेकविंशत्या क ० । ५. विकृतिश्च त्रयो – ग ० । ६. चतुविशा च ख ०; ग ० । ७. षडूविश चोत्कृतिर्भवेत् — क ० । ८. यत् स्यात् — क ०; यत्तु ख ०; ग ० । ९. तदिष्यते - ख ०; ग ० ।
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पञ्चदशोऽध्यायः २१५
छन्दसान्तु तथा ह्येते भेदाः प्रस्तारयोगतः ।
असंख्येयप्रमाणानि वृत्तान्याहुरतो बुधाः ॥ ५० ॥
गायत्रीप्रभृतित्वेषां प्रमाणं सम्प्रवक्ष्यते ।
प्रयोगजानि सर्वाणि प्रायशो न भवन्ति हि ॥ ५१ ॥
इससे अधिक अक्षरों के पाद वाले छन्द ' मालावृत्त ' कहलाते हैं । छन्दों के प्रस्तार के ( योग ) द्वारा अनेक भेद बनते हैं- जिन्हें बुधजन जाने । परन्तु इनकी संख्या गणना से परे है । गायत्री तथा अन्य कुछ छन्दों की प्रस्तारगत संख्या या प्रमाण को ही यहाँ हम बतला रहे हैं । क्योंकि छन्दों के ये सभी भेद उपयोग में नहीं आते ॥ ४ ९ -५१ ॥
वृत्तानि च चतुःषष्टि गायत्र्यां कीर्तितानि तु ।
शतं विंशतिरष्टौ च वृत्तान्युष्णिग् हाँथोच्यते ॥ ५२ ॥
षट्पञ्चाशच्छते द्वे च वृत्तानामप्यनुष्टुभि ।
शतानि पञ्च वृत्तानां वृहत्यां द्वादशैव तु ॥ ५३ ॥
पङ्कयां सहस्रं वृत्तानां चतुर्विंशतिरेव तु ।
दुभे द्वे सहस्रे च चत्वारिंशत्तथाष्ट च ॥ ५४ ॥
१. भास्कराचार्य ने लीलावती में छन्दों के प्रस्तारजन्य भेदों को बनाने की गणितप्रक्रिया बतलाई है । ( दे ० ली ० व ० ख ० ८४ ) १. भवेदेषां भेदोऽनेकविधः पृथक् — ख ०; ग ० । २. असंख्य परिख ०; ग ० । ३. संविधीयते - ख ०; ग ० । ४. प्रायस्तानि क ० ग ० । ५. वृत्तानां हि चतुष्षष्टिर्गायत्री परिकीर्तिता — ख ०; ६. न्युष्णिगथोच्यते - ख ० । ७. छतं - ख ०; ग ० । ८. प्यनुष्टुभः ख ०; ग ० । ९. बृहत्या क ० । १०. पङ्क्ते: - क ०, ग ० । ११. त्रिष्टुभो द्वि - क ० । ग ० । ४
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२१६ नाट्यशास्त्रम्
सहस्राण्यथ चत्वारि नवतिश्च षडुत्तरा ।
जगत्यां समवर्णानां वृत्तानामिह सर्वशः ॥ ५५ ॥
शतमष्टौ सहस्राणि द्वद्यधिका नवतिः पुनः ।
जगत्या मतिपूर्वायां वृत्तानां सर्वशो भवेत् ॥ ५६ ॥
शतानि त्रीण्यशीतिश्च वृत्तानि चैव चत्वारि द्वात्रिंशत्तु सहस्राणि अष्टौ षष्टिश्व वृत्तानि पञ्चषष्टि सहस्राणि षर्विंशश्चैव वृत्तानि एकत्रिंशत्सहस्राणि तथा शतसहस्रश्च
सहस्राण्यपि षोडश ।
शक्कर्याः परिसंख्यया ॥ ५७ ॥
सप्त चैव शतानि च ।
ह्याश्रयन्त्यतिशक्करीम् ॥ ५८ ॥
सहस्रार्धन्तु संख्यया ।
तथायां गदितानि तु ॥ ५ ९ ॥
वृत्तानाञ्च द्विसप्ततिः ।
छन्दस्यत्यष्टिसंज्ञिते ॥ ६० ॥
धृत्यामपि हि पिण्डेन वृत्तीम्याकल्पितानि तु ।
तज्ज्ञैः शतसहस्त्रे द्वे शतमेकं तथैव च ॥ ६ ९ ॥
द्विषष्टिश्च सहस्राणि चत्वारिंशच्च योगतः ।
चत्वारि चैव वृत्तानि ' समसंख्याश्रयाणि तु ॥ ६२ ॥
अतिधृत्यां सहस्राणि चतुर्विंशतिरेव च ।
तथा शतसहस्राणि पञ्चवृत्तशतद्वयम् ॥ ६३ ॥
अष्टाशीतिश्च वृत्तानि वृत्तज्ञैः कथितानि तु ।
कृतौ शतसहस्राणि दश प्रोक्तानि सङ्ख्यया ॥ ६४ ॥
१. समपादानां — क ०; जगस्यामतिपूर्वायां – ग ० । २. परिमाणतः क ० ग ० । ३. वृत्तानां संश्रयन्त्यतिशक्करीम् - क ० । ४. तथाष्टौ — क ० । ५. स्यादत्यष्टौ परिसंख्यया - क ० । ६. वृत्तमाकलितं मया - ख ०; ग ० । ७. तथा ख ०; ग ० । ८. शतसंख्यानि यानि तु - ख ०; ग ० ।
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पञ्चदशोऽध्यायः चत्वारिंशत्तथाष्टौ च सहस्राणि शतानि च पञ्चषट्सप्ततिश्चैव वृत्तानां परिमाणतः तथा शतसहस्राणां प्रकृतौ विंशतिर्भवेत् सप्त वै गदितान्यत्र नवतिश्चैव सङ्ख्यया सहस्राणि शतश्चैकं द्विपञ्चाशत्तथैव च वृत्तानि परिमाणेन वृत्तशैः गदितानि तु चत्वारिंशत्तथैकञ्च सहस्राणां शतानि तु तथा चेह सहस्राणि नवतिश्चतुरुत्तरा २१७
।
॥ ६५ ॥
।
॥। ६६ ॥
।
॥ ६७ ॥
।
॥ ६८ ॥
शतत्रयं समाख्यातं ह्याकृत्याञ्चतुरुत्तरम् । शेर्यं शतसहस्राणामशीतिस्त्र्यधिका बुधैः अष्टाशीतिसहस्राणि वृत्तानां षट्शतानि च अष्टौ चैव तु वृत्तानि विकृत्यां गदितानि तु तथा शतसहस्राणि सप्तषष्टिश्च सप्ततिः सप्त चैव सहस्राणि षोडश द्वे शते तथा कोटिश्चैवेह वृत्तानि सङ्कृतौ कथितानि वै तथा शतसहस्राणि पञ्चत्रिंशच्च संख्यया तिस्रः कोट्यः सहस्राणि चतुष्पञ्चाशदेव च ॥ ६ ९ ॥
।
॥ ७० ॥
।
॥ ७१ ॥
॥। ७२ ॥
। १. प्रविभागशः क ० । २. शतसहस्राणि - क ० । ३. कलितानि तु । विंशतिर्नवतिश्चैव सप्त चैव हि संख्यया - क ० । ४. प्रविभागेन क ० । ५. बुधैः शतसहस्राणि चत्वारिंशत्ततः परम् । नवतिश्चैव चत्वारि सहस्राणि शतत्रयम् । चत्वारि चैव वृत्तानि कथितान्याकृतौ बुधैः ॥ —क ० । ६. तथा शतसहस्राणामशीतित्रिकसंयुता । अष्टाशीति सहस्राणि षडष्टौ च शतानि च । वृत्तानि विकृतौ छन्दस्युद्दिष्टानीह संख्यया — क ० । ७. कोटिषडधिका नित्यं सप्तसप्ताधिका पुनः । सप्त चैव सहस्राणि वृत्ता-नाञ्च शतद्वयम् । षोडशोत्तरमाख्यातं सकृत्यां परिमाणतः ॥ क ० । ८. कोटित्रयञ्चाभिकृत्यां पञ्चत्रिंशद्भिरन्वितम् । पञ्चाशद्भिः सहस्रैस्तु चतुभिरधिकैस्तथा । चतुष्टयं शतानां च द्वात्रिंशद्भिः समन्वितम् । — क ० ।
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२१८ नाट्यशास्त्रम् शतानि चत्वारि तथा द्वात्रिंशत् प्रविभागतः वृत्तान्यभिकृतौ चैव छन्दोज्ञैः कथितानि वै कोट्यस्तु सहस्राणां शतानि ह्येकसप्ततिः ' अष्टौ चैव सहस्राणि शतान्यष्टौ तथैव च चतुष्षष्टिस्तु वृत्तानि ह्यत्कृतावपि सङ्ख्यया उक्त कृतिजातानि वृत्तसंख्याविचक्षणैः एतेन च विकल्पेन वृत्तान्येतानि निर्दिशेत् सर्वेषां छन्दसामेवं वृत्तानि कथितानि वै तिस्रः कोट्यो दश तथा सहस्राणां शतानि च चत्वारिंशत्तथा द्वे च सहस्राणि दशैव तु सप्तभिः सहितान्येव सप्तचैव शतानि च ( इन भेदों में ) गायत्री छन्द के वृत्तों का प्रमाण ( ॥ ७३ ॥
।
॥ ७४ ॥
॥। ७५ ॥
।
॥ ७६ ॥
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॥ ७७ ॥
।
॥ ७८ ॥
चौसठ ) ६४, उष्णिक् छन्द के वृत्तों का प्रमाण ( एक सौ अट्ठाईस ) १२८, अनुष्टुप् वृत्त की संख्या ( दो सौ छप्पन ) २५६, बृहती की ५१२, पंक्ति की १०२४, त्रिष्टुप की २०४८, जगती की ४० ९ ६, अतिजगती छन्द की ८१ ९ २, शक्करी की १६३८४, अतिशक्करी की ३२७६८, अष्टि की ६५५३६, अत्यष्टि की १३१०७२, धृति की २६२१४४, अतिधृति की ५२४२८८, कृति की १०४८५७६, प्रकृति की २० ९ ७१५२, आकृति की ४१ ९ ४३०४, विकृति की ८३८८६०८, संकृति की १६७७७२१६, अतिकृति की ( अभिकृति की ) ३३५५४४३२ तथा उत्कृति की प्रमाण संख्या ६७१०८८६४ हो जाती है । इस प्रकार क्रम से उत्कृति आदि छन्दों की ( प्रस्तारगत ) संख्या बतलायी १. षट्कोट्यस्तु तथोत्कृत्यां लक्षाणामेकसप्ततिः । चतुःषष्टि शतान्यष्टौ सहस्रा-व्यष्ट एव तु । —क ०; ख ० । २ सर्वेषां छन्दसां पिण्डं कोटयोऽत्र त्रयोदश । शतानि सप्त सप्तैव सहस्राणि दशैव च । तथा शतसहस्राणां द्विचत्वारिशदत्र हि । षड्विंशतश्च वृत्तानामित्थं चानन्तमुच्यते ( चान्यत् समुच्यते — ख ०, ग ० ) – क ० । ३. वृत्तांशं कथितं मया ख ०; ग ० । ४. कोट्यस्त्रयोदश तथा चत्वारिंशद्वयं तथा । ज्ञेयं शतसहस्राणां ततो दश सप्त च । सहस्राणि ततः सप्तशतानि प्रविभागशः । षड्विंशति च वृत्तानि वृत्तसंख्याविचक्षणैः । —क ० ।
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पञ्चदशोऽध्यायः २१ ९ गयी, जिनकी इसी के अनुसार योजना करनी चाहिये । इन सभी छन्दों की सम्पूर्ण प्रमाण - संख्या का योग १३४२१७७२६ होता है ॥ ५२-७८ ॥
छन्दों की विभेदक अन्य पद्धति-षड्विंशतिरिहान्यानि व्याख्यातानि समासतः ।
समानि गणनायुक्तिमाश्रित्य कथितानि वै ॥ ६ ९ ॥
सर्वेषां छन्दसामेवं त्रिकैर्वृत्तं प्रयोजयेत् ।
एकं वा विंशतिं वापि सहस्रं कोटिरेव वा ॥ ८० ॥
ज्ञेया ह्यष्टौ त्रिकास्तत्र संज्ञाभिः स्थानमक्षरम् ।
त्रीण्यक्षराणि विज्ञेयस्त्रिकोंऽशः परिकल्पितः ॥ ८१ ॥
गुरुलध्वक्षरकृतः सर्ववृत्तेषु नित्यशः । अभी मैंने गणना प्रमाण के द्वारा २६ अक्षरों तक के छन्दों के भेदों को बतलाया । इन छन्दों या वृत्तों का त्रिकों ( गणों ) के द्वारा गठन किया जाता है । चाहे ये वर्णवृत्त एक, बीस, सहस्र या करोड़ विभेदों को धारण किये हों किन्तु सामान्यतः इन वृत्त या वृत्तों के स्वरूपगठन में यहाँ गणों का नियमविधान रहता है तथा इसी से सारा काम चलता है । ये गण आठ हैं जो तीन अक्षरों से निर्मित होते हैं । इनका अपने स्वरूपानुसार पृथक् - पृथक् नाम रहता है । गुरु तथा लघु वर्णों के तीन अक्षरों से निर्मित ' गण ' कहलाते हैं तथा इन्हीं से प्रत्येक छन्द का आकार बनता है । इन्हें ' त्रिक ' भी कहते हैं । ७ ९ -८२ ॥ गुरुपूर्वो भकारः स्यान्मकारस्तु गुरुत्रयम् ॥ ८२ ॥
जकारो गुरुमर्थ्यंस्तु सकारोऽन्तगुरुस्तथा ।
लघु मध्यतुं रेफः स्यात्तैकारोऽन्तलघुस्तथा ॥ ८३ ॥
१. एतेषां तु पुनर्ज्ञेयं त्रिकैर्वृत्तप्रवर्तनम् । एकं वा विंशतिर्वापि सहस्रं कोटिरेव च । सर्वेषां छन्दसामेवं वृत्तानां वा द्विजोत्तमाः । ज्ञेयास्त्वष्टौ त्रिकास्तत्र स्वयं-ज्ञाभिः पृथक् - पृथक् ॥ —ख ०; ग ० । २. मकारो गुरुकत्रयम् - क ०; मकारस्तु गुरुत्रिकम् - ख ०; ग ० । १३. गुरुमध्यस्थः - ख ०; ग ० । ४. लघुमध्यस्थितो रेफः – ख ० ग ० । ५. सकारोऽन्तलघुस्तथा — ख ०; ग ० ।