भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 341–350

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 341–350

पृष्ठ 341

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२३० नाट्यशास्त्रम् मधुकरी - यदि नौ अक्षरों के पाद में अन्तिम तीन वर्ण गुरु हों तो मधुकरी ' वृत्त होता है ॥ २२ ॥

यथा - ' कुसुमितमभिपश्यम्ती विविधत रुगणैश्छन्नम् ।

" वनमतिशयगन्धाढ्यं भ्रमति मधुकरी हृष्टा ॥ २३ ॥

यह भ्रमरी विभिन्न वृक्षों से पूर्ण तथा अनेक पुष्पों की सुगन्ध से व्याप्त इस वन को देखकर प्रसन्नता से झूमने लगी है ॥ २३ ॥

दशाक्षरकृते पादे त्रीण्यादौ त्रीणि नैधने " ।

यस्या गुरूणि सा ज्ञेया पङ्गिरुत्पलमालिका ' ॥ २४ ॥

उत्पलमाला - यदि दस अक्षर के पाद में प्रथम तथा अन्तिम तीन वर्ण गुरु हों तो ‘ उत्पलमाला वृत्त होता है ( इसे ' कुवलयमालिका ' जानों-पाठान्तर से अर्थ ) यथा - अस्मिस्ते शिरसि तदा कान्ते ' वैदूर्यस्फटिक - सुवर्णा । शोभा ' स्वां न वद्दति तां बद्धा सुश्लिष्टा " कुवलयमालेयम् ॥ २५ ॥

प्रिये, यह कुवलयों की माला ( जब ) तुम्हारे वैदूर्य, स्फटिक तथा सुवर्ण के अलंकारों सहित शिरस्थ केशों से बंधी थी तब इसकी स्वाभाविक शोभा आच्छादित हो रही थी ॥ २५ ॥

१. मधुकारी का पिंगल छन्द सूत्र में ' भुजगशशिभृता ' नाम मिलता है । का पिंगल छन्दः सूत्र में ' पणव ' नाम मिलता है । २. कुवलयमाला १. कुसुमितमपि पश्यन्ती - क; मपश्यन्ती - ग ० । शुभ विहगगणै— क ० । ३. नवन लिन सुगन्धाढ्यं ख ०, ग ० । २. सुतनु – क ० । ५. नैधनानितु - क ० । ४. ६. मालिनी – ख ०; ग ० । अस्या लक्षणमपरं क - पु ० त्वेवम् ---त्रीण्यादी यदि हि गुरूणि स्युश्चत्वारो यदि लघवो मध्ये । स्याद् विज्ञेया कुवलयमाला ( सा ) ख्या ॥ पङ्क्तावन्तगतमकारः ७. भ्रमरनिभे कान्ते - ख ०, ग ० । ८. नानारत्नरचितभूषाढधे – ख ०; ग ० । ९. शोभामावहति शुभां मूनि - क; ख ० । १०. प्रोत्फुल्ला — ख ०; ग ० ।

पृष्ठ 342

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२३१

द्वितीयश्च चतुर्थश्च षष्टमष्टममेव च ।

ह्रस्वं दशाक्षरे पादे यत्र सा शिखिसारणी ॥ २६ ॥

मयूर ( शिखि ) सारणी – यदि दस अक्षर के पाद में दूसरा, चौथा, छठा तथा आठवां वर्ण लघु हो तो ' मयूरसारिणी " वृत्त होता है ॥ २६ ॥

यथा - नैव तेऽस्ति सङ्गमो मनुष्यै क नपि कामभोगचिह्नमन्यत् । गर्भिणी दृश्यसे ह्यनायें किं मयूरसारिणी त्वमेषभ ॥ २७ ॥

अरी, अनायें, तेरा मनुष्यों से मिलाप नहीं, न तूने कोई और उपभोग चिह्न धारण किया फिर भी तुम गर्भिणी के समान दिखाई दे रही हो और मयूर के समान आचरण कर रही हो ॥ २७ ॥

आद्यं चतुर्थमन्त्यश्च सप्तमं दशमं तथा ।

गुरुणि त्रैष्टुमे पादे यत्र स्युदधकन्तु तत् ॥ २८ ॥

दोधक — यदि ग्यारह अक्षरों के पाद में प्रथम, चतुर्थ, सातवां दसवां तथा अन्तिम वर्ण गुरू हो तो ' दोधक ' वृत्त होता है ॥ २८ ॥

यथा- " प्रस्खलिताम्रपदप्रविचार मत्तविघूर्णित गात्रविलासम् । पश्य विलासिनि कुञ्जरमे दोधकवृत्तमप्रकरोति ॥ २ ९ ॥ १. मयूरसारिणी का पिंगल ने ' मयूरसारा ' नाम दिया है तथा वृत्तरत्नाकर में भी इसका यही नाम मिलता है । १. क ० ग ० पुस्तकस्थं लक्षणं यथा -जौं त्रिकी तु पादगौ तु यस्या गौं च संश्रितौ पङ्क्तियोगसुप्रतिष्ठिताङ्गी ( ताजा - ग ० ) २. गर्भिणी च जायसेक ० । ३. ०४. अस्य क ० ग ० - पुस्तकस्थं लक्षणं तु -- भौ ग ० ) यस्य गणाः स्युस्स्याच्च यतिस्त्रिचतुर्भिरथोक्ता

तथा समस्तौ ।

सा मयूरसारिणीति नाम्ना ॥

त्वमेव स्व ० ग ० । तु भगाविति ( भगौ गिति -( पाठवशाच्च गतिस्खलिता-स्यात् क ० ) । त्रैष्टुभमेव हि तत्खलु नाम्ना दोधक वृत्तमिति प्रवदन्ति ॥ ५. प्रस्खलमानगतिप्रविचारो क ० । ६. विलासः - क ० । ७. कुल्जर एषो - क ० । ८ वृत्तगत प्रकरोति — क ०, ख ० ।

पृष्ठ 343

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२३२ नाट्यशास्त्रम् अरे विलासिनी, जरा इस हाथी को तो देख — जो अपने आगे के पैरों को लड़खड़ाते हुए रखकर तथा शरीर की चेष्टाओं को मद्यप जैसी बनाकर छोटे बछड़े ( गोवत्स ) जैसी चेष्टाएं कर रहा है

आदौ द्वौ पञ्चमञ्चैवाप्यष्टमं नैधनं तथा ।

गुरुण्येकादशे पादे यत्र तमोटकं यथा ॥

मोटक – यदि ग्यारह अक्षर के पाद में पहले दो, अन्तिम वर्ण गुरू हो तो मोटक ' वृत्त होता है ॥ ३० ॥

vw v यथा- - एषोऽम्बुदनिस्वनतुल्यरवः क्षीः ' स्वलमान विलम्बगतिः । श्रुत्वा " घनगर्जितमद्वित ॥ २ ९ ॥ ३० ॥ पंचम, अष्टम तथा वृक्षान् प्रतिमोटयति द्विरदः ॥ ३१ ॥

यह हाथी पर्वत- प्रदेश में मेघों की गर्जना सुन उसी जैसी मस्ती में लड़खड़ाती हुई धीमी चाल चल रहा है और वृक्षों को ( अपनी पैरों की ) ठोकर दे रहा है ॥ ३१ ॥

नवमं सप्तमं षष्ठं तृतीयश्च भवेल्लघु एकादशाक्षरे पादे इन्द्रवज्रेति सा यथा इन्द्रवज्रा – यदि ग्यारह अक्षरों के पाद में तीसरा, नवा अक्षर लघु हो तो ' इन्द्रवज्रा ' वृत्त होता है ॥ ३२ v यथा - त्वं दुर्निरीक्ष्या दुरतिप्रसादा

॥ ३२ ॥

छठा, सातवां तथा ॥ " दुःखैकसाध्या कठिनैकभावा । सर्वास्ववस्थासु च कामतन्त्रे योग्यासि किं वा बहुनेन्द्रवज्रा " ॥ ३३ ॥

१. मोटक का छन्दोमंजरी में ' मोटनक ' नाम मिलता है । लक्षण यही है । १. द्वे आधे - क ० । २. गुरु एकादशाक्षरे —क ० । ३. क्षीणः -क ० । ४. स्खलदङ्ग - ख ० । ५ घननिस्स्वन क ० । ६. प्रतितौयते - क ०, मोटयते - ग ० । ७. लघून्यथ — क ० । ८. स्मृता क ० । ९. दुष्प्रेक्षणीया विगतप्रसादा दुःखेन साध्या कठिनाभिघाता – क ०, चन्द्रं निरीक्ष्या दुरितस्वभावा — ग ० । १०. दुःखेन साध्या कठिनी स्तनौ ते - ख ० । ९ १. वत्रे - क ० ।

पृष्ठ 344

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षोडशोऽध्यायः २३३ तुम देखने में भद्दी, कठिनाई से प्रसन्न होने वाली, कष्ट से अनुकूलता को ग्रहण करने वाली, कठोर भावों से व्याप्त तथा अनुराग की सभी अवस्थाओं तथा भावनाओं से अनजान हो, थोड़े में बस इतना ही कहा जा सकता है कि तुम सभी कामतन्त्र की बातों में अयोग्य और इन्द्र के वज्र जैसी कठोर ( कठिन, जड़ ) हो ॥ ३३ ॥

एभिरेव तु संयुक्ता लघुभिस्त्रैष्टुभी यदा ।

उपेन्द्रवज्रा विज्ञेया लघ्वादाविह ' केवलम् ॥ ३४ ॥

उपेन्द्रवज्रा — ग्यारह अक्षरों के ( त्रिष्टुप् जाति के ) पाद में यदि, प्रथम, तृतीय, षष्ठ, सप्तम तथा नवम अक्षर लघु हो तो उपेन्द्रवज्रा वृत्त जानों ॥ ३४ ॥

यथा - प्रिये श्रिया वर्णविशेषणेन स्मितेन कान्त्या सुकुमारभावात् । अमी गुणा रूपगुणानुरूपा भवन्ति ते किं त्वमुपेन्द्रवज्रा ॥ ३५ ॥

प्रिये, तुम अपनी शारीरिक शोभा, ( वेष के विशिष्ट रंग, स्मित, कान्ति तथा शरीर की सुकुमारता से युक्त हो ) तुम्हारे स्वरूप ( रूप ) तथा गुणों के अनुरूप ही है दूसरा वज्रमय शस्त्र तो नहीं हो? ॥ ३५ ॥

आद्यं तृतीयमन्त्यञ्च सप्तमं नवमं तथा ।

गुरुण्येकादशे पादे यत्र सा तु रथोद्धता ॥

रथोद्धता – यदि ग्यारह अक्षरों के पाद में पहिला, नवां तथा अन्तिम वर्ण गुरू हो तो रथोद्धता वृत्त होता है यथा - किं त्वया सुभट दूरवर्जितं नात्मनो न ' सुहृदां प्रियं कृतम् । १. दावथ - क ०, लघ्वाढ्यमिह - ख ० । तुम्हारे ये गुण क्या तुम इन्द्र का ३६ ॥ तीसरा, सातवां, ॥ ३६ ॥

२. प्रेम्णा श्रिया - क ०; ख ०; श्रिया च वर्णेन विशेषणेन - ग ० । ३. यथा च कान्त्या सुकुमारयुक्त्या क ० । ४. स्मितेन - ख ० । ५. गुर्वेकादशके क ० । ६. सुभग — क ० । ७. वर्जितात्मना — क ० । ८. सुहृदः क ० ।

पृष्ठ 345

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२३४ नाट्यशास्त्रम् यत् पलायनपरायणस्य ते याति धूलिरघुना रथोद्धता ' ॥ ३७ ॥

हे वीर, तुमने पूर्ण रूप से युद्धभूमि को छोड़ दी इस न तो अपना और न ही मित्रों का हित किया । क्योंकि भागने वाले तुम्हारे मार्ग से रथों से उठाई गई धूल रही है ॥ ३७ ॥

आद्यं तृतीयमन्त्यञ्च सप्तमं दशमं गुरु प्रकार तुमने युद्धभूमि से अब भी उठ

यस्यास्तु त्रैष्टुभे पादे विज्ञेया स्वागता हि सा ३८ ॥

स्वागता— यदि ग्यारह अक्षरों के पाद में पहिला, तीसरा, सातवां तथा दसवां अक्षर गुरु हो तो ' स्वागता ' वृत्त होता है ॥ ३८ ॥

यथा - अद्य मे सफलमायतनेत्रे जीवितं मदनसंश्रयभावम् । आगतासि भवनं मम यस्मात् स्वागतं तव वरोरु निषाद ॥ ३ ९ ॥ आज मेरे विशाल नयनों ने उनका विषय प्राप्त किया और इसी प्रकार मेरे जीवन तथा प्रेम ने भी, क्योंकि आप मेरे घर पधारी, हे सुन्दरी, ( वरोरू ) आपका स्वागत है, अब आप विराजिये ॥ ३ ९ ॥

षष्ठञ्च नवमञ्श्चैव लघुनी टु यदि ।

गुरूण्यन्यानि पादे तु सा ज्ञेया शालिनी यथा ॥ ४० ॥

शालिनी – यदि ग्यारह अक्षरों के पाद में छठा तथा नवां अक्षर लघु ( तथा शेष गुरू ) हो तो ' शालिनी ' वृत्त होता है ॥ ४० ॥

१. क. पुस्तके उदाहरणान्तरमपि । तद्यथा-किं त्वया कुमतिसङ्ख्या सदा नाज्ञयेव सुहृदां प्रियं कृतम् । यद् गृहाद्वचनरोषकम्पिता याति तूर्णमबला रथोद्धता ॥ २. तथा क ० । ३. गुरूणि त्रैष्टुभे पादे यत्र सा स्वागता यथा - क ०, ग ० । ४. संश्रितभावम् - क; ग ०; संस्कृतभावम् -- ख ० । ५ सदनं - क ०; ग ० । ६. लघु स्यात् — ग ० । ७. चतुभिराद्यैविच्छेद: -ग ० ।

पृष्ठ 346

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षोडशोऽध्यायः २३५ यथा - दुःशीलं ' वा निर्गुण वापरं वा लोके न ब्रवीषि । तस्माच्छीलं साधुहेतोः सुवृत्तं माधुर्यात् स्यात् सर्वथा शालिनी त्वम् ॥ ४१ ॥

तुम इतनी धैर्यशालिनी हो कि तुमने कभी किसी व्यक्ति को - जो चरित्र-हीन गुणहीन या शत्रु भी क्यों न हो — कुशब्द नहीं कहा । हे साध्वी, इसी कारण तुम्हारा सभ्य ( अर्थ ) व्यवहार चारों ओर मधुरता से सर्वथा शोभित गृहिणी रही हो ॥ ४१ ॥

' तृतीयश्चैव षष्ठञ्च नवमं द्वादशं तथा ।

" गुरुणि जागते पादे यत्र तत्तोटकं भवेत् ॥

तोटक - यदि बारह अक्षरों के पाद में तीसरा, बारहवां अक्षर गुरु हो तो ' तोटक ' वृत्त होता है ॥ ४२ ॥

यथा - किमिदं कपटाश्रय दुर्विष " बहुशाख्यमथोल्वणरूक्ष कथम् । ' स्वजनप्रिय सज्जनभेदकरं ननु तोटकवृत्तमिदं कुरुषे ॥ व्याप्त है तथा तुम ४२ ॥ छठा, नवां तथा FIF ४३ ॥ तुम यह धोखेबाजी से भरे असहनीय, अतिशय कपट, आग और सूखेपन लिये हुए वचनों को - जो सदाचारी आत्मीय व्यक्ति में भेद उत्पन्न १. शीलभ्रष्टे निर्गुणे पापके वा ( या प्रकोपा — ग ० ) – क ०; दुःशीलं स्यादल्पकं वा सुशीलं -ख ० । २. ब्रवीति — ख ३. आर्य शीलं साध्वि हे तेऽनुवृत्तं माधुर्यात् - ग ० । ४. षष्ठं तृतीयं नवमं गुरूण्यन्त्यमथापि वा — ख ०; ग ० ५. यत्र तु द्वादशे पादे तज्ज्ञेयं तोटकं बुधैः – ख ०; ग ० ( क ) पुस्तकस्थल्च तोटकलक्षणं यथा यदि सोऽत्र ( त्रिकसोऽत्र - ग ० ) भवेत्तु समुद्रसमस्त्रिषु चापि सततं जगतीविहितं हि ततो गदितं खल ६. बहुगण्डमि के क ०, ख ०; बहुगर्जमिवोद्रण- ग ० । ७. कृतम्, पथम् क ० ।

८. सुजन ( स्वजन — ग ० ) प्रिय दुर्जनभेदकरं ग ० ।

० ॥

तथा नियमेन यतिः ।

तोटक वृत्तमिदम् ॥

पृष्ठ 347

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२३६ नाट्यशास्त्रम् करते हों, कहते हुए, सचमुच किसी छेदक ( काटने वाले - तोटक ) का

आचरण कर रहे हो । ( इसमें सन्देह नहीं । ) ॥ ४३ ॥

आद्यं तृतीयमन्त्यश्च पञ्चमं षष्ठमेव च ।

तथोपान्त्यं जगत्याश्च गुरु चेत् कुमुदप्रभा ' ॥ ४४ ॥

कुमुदप्रभा — ( कुमुदनिभा ) – यदि बारह अक्षरों के पाद में पहला, तीसरा, पांचवा, छठा, सातवां, नवाँ, ग्यारहवां ( उपान्त्य ) तथा बारहवां अक्षर गुरु रहे तो ' कुमुदप्रभा ( निभा ) वृत्त होता है ॥ ४४ ॥

यथा- - कुमुदनिभा त्वं कामवाणविद्धा 11111 किमसि नतभ्रः शीतवातदग्धा । ' मृदुनलिनीवापाण्डुवक्त्रशोभा कथमपि जाता ह्यग्रतः सखीनाम् ॥। ४५ ॥ हे नतभ्रू सुन्दरी, तुम कुमुद के पुष्प के समान कोमल होकर ( भी ) काम के बाण से कैसे विध गई और तुम आज अपनी सखियों के सामने पाले से जली नलिनी के समान अपने पीले मुंह से युक्त होकर क्यों आ रही हो ॥ ४५ ॥

द्वादशाक्षरके पादे सप्तमं दशमं लघु ।

आदौ पञ्चाक्षरच्छेदश्चन्द्रलेखा तु सा यथा ॥ ४६ ॥

१. क — ग ० पुस्तके कुमुदनिभाया लक्षणान्तरं सोदाहरणं यथा-यदि खलु पादे यौं त्रिकी तथान्त्यो षड्भिरेव वर्णैर्यंदि च यतिः स्यात् । नित्य सन्निविष्टा जगति विधाने कुमुदनिभा सा नामतः प्रसिद्धा ॥

यथा— मन्मथेन विद्धा सललितभावा नृत्तगीतयोगा प्रविकसिताक्षी ।

निन्द्यमद्य किं त्वं विगलितशोभा चन्द्रपादयुक्ता कुमुदवती च ॥

मतान्तरे तु — यदि खलु पादे न्यो त्रिकी तथा यौं यतिरपि वर्णैः षड्भिरेव चेत् स्यात् । जगति विधाने नित्य सन्निविष्टा कुमुदनिभा सा नामतः प्रसिद्धा ॥ इति लक्षणं लक्ष्यञ्च । २. नलिनीव पाण्डु - ग ० । ३. कथमसि - ग ० । ४. यत्रान्यानि च दीर्घाणि - क ० ।

पृष्ठ 348

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२३७ चन्द्रलेखा - यदि बारह अक्षरों के पाद में सातवां तथा दसवां वर्ण लघु ( तथा शेष गुरु हो ) तथा पांच अक्षरों पर यति हो तो ' चन्द्रलेखा ' वृत्त होता है ॥ ४६ ॥

वक्त्रं सौम्यन्ते पद्मपत्रायताक्षं ' कामस्यावासं सुभ्रुवोश्चावभासम् ' । कामस्यापीदं काममाहर्तुकामं कामते कान्त्या त्वं चन्द्रलेखेव भासि ॥ ४७ ॥

प्रिये, तुम्हारा मधुर ( सौम्य ) आनन - जिसमें कमल के पत्रों के समान विशाल नेत्र हैं तथा भौहों की चमक काम की विश्राम स्थली ( जैसी प्रतीत हो रही ) है, वह आज काम की भी प्रणयवृत्ति को हर ले जाने को उद्यत हो रहा है और इसी कारण तुम अपनी देहदीप्ति से चन्द्रलेखा जैसी शोभित हो रही हो ॥ ४७ ॥

तृतीयमन्त्यं नवमं पञ्चमञ्च यदा गुरु ।

द्वादशाक्षरके पादे यत्र सा प्रमिताक्षरा ॥ ४८ ॥

प्रमिताक्षरा - बारह अक्षरों के पाद में यदि तृतीय, पंचम, नवम तथा अन्तिम अक्षर गुरु हो तो प्रमिताक्षरा वृत्त होता है ॥ ४८ ॥

यथा - स्मितभाषिणी ह्यचपला परुषा " निभृतापवादविमुखी सततम् । " अपि कस्यचिद्युवतिरस्ति सुखा प्रमिताक्षरा स हि पुमान् जयति ॥ ४ ९ ॥ यदि किसी की युवती भार्या स्मितपूर्वक भाषण करने वाली हो, अचंचला तथा मृदुहृदया हो, एकान्त में भी कठोर शब्दों या निन्दाव्यजंक शब्दों से विलग रहती हो तो हे मित्र, वही पुरुष भाग्यशाली या विजयी है । उस पुरुष की ही जय हो ॥ ४ ९ ॥ १. ईषत्पाण्ड्वाभं क ० । २. नोच्चप्रहासम् — क ० । ३. का त्वम् -क ० 1 ४. तदा स्यात् ख ०, ग ० । ५. स्मितहासिनी - ख ०; ग ० । ६. वशवर्तिनी मधुरवानिभृता - क ० । ७. यदि - ग ० । ८. जगति - ख ० ।

पृष्ठ 349

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२३८ नाट्यशास्त्रम्

द्वितीयमन्त्यं दशमं चतुर्थ पञ्चमाष्टमे ।

गुरुणि द्वादशे पादे वंशस्था जगती ' तु सा ॥

वंशस्थ – यदि द्वादशाक्षर पाद में दूसरा, चौथा, पांचवां, तथा अन्तिम वर्ण गुरु हो तो ' वंशस्थ ' वृत्त होता है ॥ ५० ॥

यथा- न मे प्रिया त्वं बहुमानवर्जिता कृता प्रिये ते परुषातिभाषणैः तथा च पश्याम्यहमद्य विग्र * " ध्रुवं हि वंशस्थगतिं करिष्यति ॥ ५१ ५० ॥ आठवां, दसवां तुम मुझे ( अब ) अतिशय प्रिय नहीं हो, तुम्हारे कठोर वचनों ने मुझे अप्रसन्न कर दिया । इस प्रकार मैं देखता हूं कि तुम्हारी स्वाभाविक या ( वंशस्थ ) वृत्ति निश्चय ही आज युद्ध को खड़ा कर देगी ॥ ५१ ॥

वंशानुकूल

चतुर्थमन्त्यं दशमं सप्तमञ्च यदा गुरु ।

भवेद्धि ' जागते पादे ' तदा स्याद्धरिणप्लुता ॥ ५२ ॥

हरिणप्लुता – यदि द्वादशाक्षर पाद में चतुर्थ, सप्तम, दशम तथा अन्तिम अक्षर गुरु हो तो हरिणप्लुता ' वृत्त होता है ॥ ५२ ॥

यथा- परुषवाक्थकशाभिहता ' त्वया " भयविलोकनपार्श्वनिरीक्षणैः । १. पिंगल ० तथा वृत्तरत्ना में भरतोक्त हरिणप्लुता को ' द्रुतविलम्बित ' कहा गया है । १. गदिता तु सा — क ० । जगतीलक्षणं क — पुस्तके स्वेर्व पठ्यते-यदि त्रिज्तो भवतस्तु पादत स्तथैव च जाववसानसंस्थिती ( संज्ञिती - ग ० ) । तदा हि वृत्तं जगतीप्रतिष्ठितं वदन्ति वंशस्थ मितीह नामतः ॥ इति । – क ० । ३. प्रियं प्रिया ते परुषाभिभाषिणी - क ० । २. प्रियं यद्बहुमान ५. क्षणेन - क ० । ४. विक्रमं - ग ० । ६. इदं करिष्यति - क ० । ७. यस्यास्तु — क ० । ८. सा ज्ञेया हरिणक ० । ९. कथा - क ० । - क ०; भयविलोकनपाश्र्वनिरीक्षणा — ख ० । १०. भयनिरीक्षणपाश्थंविलोकनैः

पृष्ठ 350

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षोडशोऽध्यायः २३ ९ वरतनुः प्रततप्लुतसर्पणै-' रनुकरोति गतैर्हरिणप्लुतम् ॥ ५३ ॥

वह सुन्दरी ( वरतनु ), कठोरवचनरूपी कशा से पिट कर, भय से दोनों बगलों को देखते हुए तथा सतत चौकड़ी मार चाल से भागने के कारण हरिण की गति का अनुकरण कर रही है ॥ ५३ ॥

सप्तमं नवमं चान्त्यमुपान्त्यश्च यदा गुरु ।

द्वादशाक्षरके पादे कामदन्तेति सा यथा ॥ ५४ ॥

कामदत्ता - यदि बारह अक्षरों के पाद में सातवां, नवां, ग्यारहवां तथा अन्तिम वर्ण गुरु हो तो कामदत्ता वृत्त होता है ॥ ५४ ॥

यथा - करजपदविभूषिता यथा त्वं सुदति दशनविक्षताधरा च । गतिरपि चरणावलग्नमन्दा त्वमसि मृगनिभाक्षि कामदन्ता ॥ ५५ ॥

सुन्दरि, तुम जिस प्रकार इन नखक्षतों से अलकृंत हो तथा तुम्हारा अधर दन्तक्षत से युक्त एवं तुम्हारी लड़खड़ाती और मन्द गति है । इसे देखकर ऐसा लगता है कि हे प्रिये, तुम प्रेम ( काम ) के लिये ही प्रदान की गई हो ॥ ५५ ॥

आद्यं चतुर्थ दशमं सप्तमञ्च यदा " लघु ।

पादे " तु जागते यस्या अप्रमेया तु सा स्मृता ॥ ५६ ॥

अप्रमेया- यदि बारह अक्षरों के पाद में पहिला, चौथा, सातवां, तथा दसवां वर्ण लघु हो तो अप्रमेया ' वृत्त होता है ॥ ५६ ॥

१. अप्रमेया को पिंगल तथा अन्य ग्रन्थों ने ' भुजङ्गप्रयात ' माना है । १. प्रकुरुते प्रगतं हरिणप्लुता - क ० । २. चैव ह्यन्त्योपान्त्ये गुरूण्यथ । यत्र स्युर्जागते पादे –क ० । ३. काममत्तेति - ख ०, ग ० । ४. मताक ० । ५. सुतनु क ० । ६ चरणारविन्दमन्दा — ख ०; सन्नमन्दा - ग ० । ७. तदसिक ० । ८. समाक्षिक ० । ९. काममत्ता - ख ०, ग ० । १०. लघून्यथ - क ० । ११. द्वादशाक्षर के पादे – ख ० । १२. तथाहि सागः ।