भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 351–360
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 351–360
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२४० नाट्यशास्त्रम् यथा- न ते काचिदन्या समा दृश्यते स्त्री ' नृलोके विशिष्टा गुणैरद्वितीयैः । त्रिलोक्यां गुणाग्रयान् समाहृत्य सर्वान् जगत्यप्रमेयासि दृष्टा विधात्रा ॥ इस मर्त्य लोक में तुम्हारे जैसी दूसरी स्त्री नहीं दिखाई असामान्य गुणों से तुम अप्रतिम हो अतएव विधाता ने तीनों श्रेष्ठ गुणों को एकत्र कर तुम्हें बनाया है ऐसा दिखाई देता है द्वितीयं पञ्चमश्चैव ह्यष्टमैकादशे तथा पादे यत्र लघूनि स्युः पद्मिनी नाम सा यथा ५७ ॥ देती । अपने भुवनो के सभी ॥ ५७ ॥
।
॥। ५८ ॥
पद्मिनी – यदि बारह अक्षर के पाद में द्वितीय, पंचम, अष्टम तथा एका दशवां वर्ण लघु हो तो पद्मिनी ' वृत्त होता है ॥ ५८ ॥
यथा - देहतोयाशया वक्त्रपझोज्वला नेत्रभृङ्गाकुला दन्तहंसस्मिता " । केशपाशच्छदा चक्रवाकस्तनी पद्मिनी प्रिये भासि मे सर्वदा ॥ ५ ९ ॥ हे प्रिये, तुम मुझे सदा पद्यसर जैसी दिखाई देती हो । क्योंकि तुम्हारा शरीर जलाशय, तुम्हारा मुख कमल, तुम्हारे नेत्र आकुल भंवरे, तुम्हारी सस्मित दन्तपंक्ति हंस, तुम्हारे केश कमल पत्र तथा तुम्हारे उरोज चक्रवाक है ॥ ५ ९ ॥ १. पद्मिनी को पिंगल ने ' स्रग्विणी ' कहा है । तृतीयापि चास्मिन् । ममेयं मतिर्लोक मालोक्य सर्व-१. गुणैर्याद्वितीया ख ०; ग ० । १२. सृष्टा - ख ०, ग ० । ३. अष्टमैकादशं ४. क - पुस्तकस्थमस्यैव लक्षणान्तरमेवम्-रास्त्रिकाः सागराख्या निविष्टा यदा ( यदि ख ० ) स्यात् त्रिके च त्रिके युक्तरूपा यतिः । सन्निविष्टा जगत्या ( जगत्यां - ग ० ) स्ततः सा बुधै पद्मिनी ॥ ५. हंसैः सिता — क ० ६. उदाहरणान्तरमपि क तथा - ख ० । – पुस्तके लभ्यते । तद्यथा-- फुल्लपद्मानना त्वं द्विरेफेक्षणा केशपत्रच्छदा चक्रवाकस्तनी । पीततोयावली बद्धकाञ्चीगुणा पद्मिनीव प्रिये भासि नीरे स्थिता ॥ इति ।
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षोडशोऽध्यायः २४१
आदौ दशमञ्चैव पादे यत्र लघुम्यथ ।
शेषाणि तु गुरुणि स्युर्जागते ' पुटसंशिता ॥ ६० ॥
पुटवृत्ता - यदि बारह अक्षरों के पाद में प्रथम छः तथा दसवां अक्षर लघु तथा शेष गुरु हों तो पुटवृत्त ' नामक वृत्त होता है ॥ ६० ॥
यथा - उपवनसलिलानां बालपद्मे -२ भ्रमरपरभृतानां कण्ठनादैः । ' मदनमदविलासैः कामिनीनां " कथयति पुटवृत्तं पुष्पमासः ॥ ६१ ॥
यह चैत्रसास ( अपने ) कमल कोरकों के जो सरोवररूप वन में हैं — तथा भौरों की गुंजार, कोयल की कूक और मदमत्त कामिनिजन के लीला पूर्ण विलासों के द्वारा युगलभाव ( पुटवृत्तं ) की छवि की कहानी कह रहा है ॥६१ ॥
द्वितीयान्त्ये चतुर्थश्च नवमैकादशे गुरु ।
' विच्छेदोऽतिजगत्यान्तु चतुर्भिः सा प्रभावती ॥ ६२ ॥
प्रभावती – यदि बारह अक्षरों के पाद में दूसरा, चौथा, नवाँ, ग्यारहवां और अन्तिम वर्ण गुरू हो तो प्रभावती नामक वृत्त होता है ॥ ६२ ॥
यथा - कथं विदं कमलविशाललोचने
गृहं घनैः पिहितकरे दिवाकरे ।
' अचिन्त्ययन्त्यभिनव वर्षविद्युत-" स्त्वमागता सुतनु यथा प्रभावती ॥ ६३ ॥
१. पिंगल ने इसे ' पुट ' कहा है । पुट - वृत्ता का ' पुटवृत्त ' भी पाठान्तर मिलता है । ' पुटवृत्त ' का आचार्य अभिनव गुप्त ने अर्थ किया है ' पुटस्य युगलस्य वृत्तम् ' । यहां तदनुसार ही हमने भी अर्थ किया गया है । १. पटुक ० । पुटवृत्तस्य लक्षणान्तरं क. गं. पुस्तकस्थमपि लिख्यते-यदि चरणनिविष्टो नौ तथा म्यौ यतिविधिरपि युक्तयाष्टाभिरिष्टः । भवति च जगतीस्थः सर्वदासी य इह हि पुटवृत्तं नामतस्तु ॥ २. पद्म - क ० । ३. कण्ठनादेक ० । ४. समदगतिविलासेक ० । ५. कथयसि पटुवृत्तं —क ० । ६. पादे तु जगतीसंस्थे यत्र सा तु क ० । ७. अदः कथं क ० । ८. गता — क ० । ९. न मानसे भयमतिवृष्टिसम्भवं पराक्रमैस्त्वमसि – क ० । १०. समागता — क ० । १६ ना ० शा ० द्वि ०
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२४२ नाट्यशास्त्रम् सुन्दरि, तुम कमल के समान विशाल नेत्रों वाली हो, तुम ( इस ) चन्द्रमा के बादलों से ढक जाने पर, अन्धेरी हो जाने वाली इस रात में प्रारंभ होने वाली ( अभिनव ) वर्षा और बिजली की परवाह प्रभावती ( सूर्यपत्नी ) के समान मेरे घर कैसे चली आई?
श्रीयादावष्टमञ्चैव दशमं नैधनद्वयम् ।
' गुरुण्यतिजगत्यां तु त्रिभिश्छेदैः प्रहर्षिणी ॥
प्रहर्षिणी – यदि तेरह अक्षरों के पाद में पहिले दसवां, बारहवां तथा अन्तिमवर्ण गुरू हो तो प्रहर्षिणी वृत्त तीन स्थान पर यति रहती है ॥ ६४ ॥
यथा -- भावस्थैर्मधुरकथैः ’ सुभाषितैस्त्वं साटोपस्खलितविलम्बितैर्गतैश्च शोभाढयैर्हरसि मनांसि कामुकानां * सुव्यक्तं हासिं जगति प्रहर्षिणी च ॥ हे सुन्दरि, तुम प्रेमभाव से पूर्ण तथा मीठे शब्दों किये बिना और ॥ ६३ ॥
६४ ॥ तीन, आंठवां, होता है । इसमें ६५ ॥ वाले सुभाषितों के एवं लड़खडाने वाले मन्द मन्द पदसंचालन के द्वारा कामिजन के चित्त हर लेती हो । इससे यही प्रकट होता है कि इस संसार में तुम परम आल्हादक ( प्रहर्षिणी ) हो ॥ ६५ ॥
षष्ठश्च सप्तमञ्चैव दशमैकादशे लघु ।
त्रयोदशाक्षरे पादे ज्ञेयं मत्तमयूरकम् ॥ ६६ ॥
मत्तमयूर – यदि तेरह अक्षरों के पाद में छठा, सातवां, दसवां तथा ग्यारहवां अक्षर लघु हो तो ' मत्तमयूर ' नामक वृत्त होता है ॥ ६६ ॥
यथा - विद्युन्नद्धाः सेन्द्रधनूरञ्जितदेहा वातोद्धूताः श्वेतबलाकाकृतशोभाः । १. गुरूणि पादे ह्यत्रैव यस्याः सा वै प्रहर्षिणी — क ० । २. मधुरखकैः, मधुरतरैः - क ० । ३. नानाङ्गै – ख ०; ग ० । ४. मानवानां क ० । ५. ह्यति जगती - क ० । ६. प्रहर्षिणीव - ख ०; ग ० । ७. दशे तथा । लघूनि यस्य पादे तु गच्छेन्मत्तमयूरताम्- 1 ८. सेन्द्रधनुद्यतितदेहा - ख ० ० । ९. कृतचिह्नाः —क ० । डी
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षोडशोऽध्यायः २४३ एते मेघा ' गर्जितनादोज्ज्वलचिह्नाः प्रावृट्कालं मत्तमयूरं कथयन्ति ॥ ६७ ॥
ये बादल - जो कडक और चमक के प्रकट चिन्हों से बिजली और इन्द्र धनुष से युक्त होकर, वायु से संचालित और सफेद बगुलों की कतार से शोभित होकर बरसात की सूचना मदमत्तमयूरों को दे रहे हैं ॥ ६७ ॥
आदौ द्वे च चतुर्थश्चाप्यष्टमैकादशे गुरु ।
अन्त्योपान्त्ये च शक्कर्यां वसन्ततिलका यथा ॥ ६८ ॥
वसन्ततिलका – यदि चौदह अक्षरों के पाद में पहिले दो, चौथा, आठवां, ग्यारहवां, तेरहवां, ( उपान्त्य ) तथा अन्तिम ' वसन्ततिलका ' वृत्त होता है ॥ ६८ ॥
यथा— चित्रैर्वसन्तकुसुमैः कृतके हस्ता स्रग्दाममाल्यरचनासुविभूषिताङ्गी " नागावतंसकविभूषित कर्णपाशा साक्षाद्वसन्ततिलकेन विभाति नारी यह सुन्दर वेश धारिणी कामिनी - जिसने अपने अक्षर गुरु हो तो
।
॥ ६ ९ ॥
केशों के जूड़े को विविध वासन्ती पुष्पों से सजा रखा है । जो पुष्पों की मालाओं से अपना शरीर सजाए है । जिसने अपने कानों पर सुरपुंनाग पुष्पों को सजाया है । इस प्रकार जो सुन्दरी वसन्तऋतु के ललाट पर लगाए गए तिलक जैसी ( वसन्ततिलका ) शोभित हो रही है ॥ ६ ९ ॥
पञ्चादौ शक्करीपादे गुरूणि त्रीणि नैधने ।
पञ्चाक्षरादौ च यतिरसम्बाधा तु सा यथा ॥ ७० ॥
असम्बाधा - यदि चौदह अक्षरों के पाद में आदि के पांच तथा अन्तिम १. गर्जितगम्भीरनिनादैः - क ० । २. मत्तमयूराः - ख ०, ग ० । ३. वसन्ततिलकैव सेतवाचार्येणोद्धर्षिणीति, काश्यपेन सिंहोन्नति, गोमानसेन मधुमाधवीति रामकीर्तिना चेतोहितेति कृत्वा लक्षितेति जनाश्रय्यां स्पष्टम् । ४. हृतहस्त — क ० । ५. नागावतंसकविभूषितगण्डपाली नानावतंसक विलम्बितकर्णपूरा; नाना-वतंसक शिरोधृतमुण्डमाला — क ० । ६. चतुर्दशाक्षरे पादे पञ्चादौ त्रीणि नैधने । यस्या गुरूण्यसम्बोधा नाम्ना ज्ञेया तु सा बुधैः ॥क ० ।
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२४४ नाट्यशास्त्रम् गुरू हों तथा पांच अक्षरों पर यति हो तो ' असम्बाधा ' नामक तीन अक्षर वृत्त होता है ॥ ७० ॥
v यथा - मानी लोकशः श्रुतबलकुलशीलाढ्यो यस्मिन् ' सम्मानं न सदृशमनु पश्येद्धि ' । गच्छेत्तं त्यक्त्वा तं ' द्रुतगतिरपरं देश नानार्थैरवनिरियमसम्बाधा ॥ ७१ ॥ कर्णा रखने वाला पुरुष - जो संसार को जानता हो वह आत्मसम्मान, कुलवान तथा चरित्रवान् हो । उसे जहां उचित ( लोकज्ञ ), विद्वान्, बलवान् । वह वहां से तुरन्त दूसरे सम्मान प्राप्त न हो वहां नहीं रहना चाहिए अर्थों से पूर्ण पृथ्वी ( उचित ) प्रदेश के लिए प्रस्थान करे, क्योंकि अनेक उसके लिए कहीं भी बाधा न देगी ॥ ७१ ॥
चत्वार्यादौ गुरुणि स्युर्दशमैकादशे तथा ।
अन्त्योपान्त्ये च शक्कर्याः पादे तु शरभा यथा ॥ ७२ ॥
- यदि चौदह अक्षरों के पाद में आदि के चार, दसवां, ग्यारहवां, शरभा वर्ण गुरू होतो ' शरभा ' नामक वृत्त होता है ॥ ७२ ॥
तेरहवाँ तथा चौदहवां एषा 33 कान्ता व्रजति ललितं वेपमाना यथा- " गुल्मैश्छन्नं वनमभिनवैः सम्प्रविद्धम् । हा हा कष्टं किमिदमिति नो वेद्मि मूढ़ो व्यक्तं कान्ते शरभललिता त्वं करोषि ॥ ७३ ॥
से झूमती हुई ( वेपमाना जा रही है उस यह ललना ललितगति तथा लतागुल्मों से आत्रेष्टित है । हाय, बड़े दुःख वन में जो विशाल पर्वतों और इतना भी न समझ पाया कि प्रिये तुम की बात है कि मैं मूर्ख ही रहा क्रोध में आकर हाथी के बच्चे की चेष्टाएं ( ( हो गई ) हो ॥ ७३ ॥
१. सामान्यं क ० । २ पश्येत - क ० । ३. द्रुतगति – ख ०; ग ० । ४. आदी चतुर्गुरुणि - क ० । शरभललिता ) ५. गुल्मच्छन्नं वनमुरुनगैः सम्प्रवृद्धम् – क ० । ६. आहो कष्टं किमिदमिति संविप्रचेष्टा - क ० । करने पर उतारू कर्तुकामा, क्रोधाच्छर भललितं हर्तुकामा – क ० । ७. क्रोधाच्छरभललितं
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षोडशोऽध्यायः २४५
आदौ षट्दशमञ्चैव लघु ' चैव त्रयोदशम् ।
यत्रातिशाकरे पादे ज्ञेया नान्दीमुखी ' तु सा ॥ ७४ ॥
नान्दीमुखी - यदि पन्द्रह अक्षरों के पाद में पहिले छः, दसवां तथा तेरहवां अक्षर लघु हो तो ' नान्दीमुखी " वृत्त होता है ॥ ७४ ॥
यथा- न खलु तव कदाचित् क्रोधताम्रायताक्षं " कुटिवलित दृष्टपूर्व मयास्यम् । किमिह बहुभिरुक्तैर्या ममेच्छा हृदिस्था त्वमसि मधुरवाक्या देवि नान्दीमुखीव ॥ ७५ ॥
हे देवि, मैंने तुम्हारा । क्रोध में लाल आंखों वाला, टेढ़ी और चढ़ी हुई भौहों वाला मुंह नहीं देखा था । मैं अब और क्या कहूँ बस इतना ही कि तुम वही मेरे हृदय में बसने वाली मधुरभाषिणी नान्दीमुखी ( जिसका मुंह नान्दी – ( दुन्दुभि नगाड़े ) की तरह ( तुरन्त आवाज देने वाली या मंगलकारिणी ) हो ॥ ७५ ॥
आद्यं चतुर्थ षष्ठश्च नैधनञ्च यदा ' गुरु ।
षोडशाक्षरके पादे " गजं विलसितं तु तत् " ॥ ७६ ॥
गजविलसित - यदि सोलह अक्षर के पाद में पहिला, चौथा, छठा तथा अन्तिम अक्षर गुरू हो तो ' गजविलसित " नामक वृत्त होता है ॥ ७६ ॥
१. पिंगलाचार्यने नान्दीमुखी को ' मालिनी ' कहा है । इसी प्रकार अन्य छन्दः शास्त्रियों ने भी । परन्तु प्राकृतभाषा के छन्दो ग्रन्थों में ' नान्दीमुखी ' के रूप में ही इस छन्द का विवरण मिलता है । २. पिंगलाचार्य ने ' गजविलसित ' को ' वृषभगजविलसित ' संज्ञा दी है । १. लघुनि स्युत्रयोदशम् – क ० । २. यत्र पञ्चदशे - क ० । ३. नान्दीमुखा - क ० । ४. वद - क ० । ५. भ्रुकुटिपुटतरङ्ग – क ० । ६. तवास्यम् - क ० । ७. ममैषा – क ० । ८. वेनि नान्दीमुखा त्वम् — क ० । ९. गुरूण्यथ क ० । १०. यत्रेभललितं - क ० । ११. गजविलसितलक्षणं क. पु. त्वेवं पठघते-श्री यदि नाश्च नित्यमिह विरचितचरणाः ( चरणविरचिताः - ग ० ) गश्च तथा च वै भवति निधनमुपगतः । स्यादपि चाष्टिमेव यदि सततमनुगतं तत्खलु वृत्तमप्रवृषभगजविलसितम् ॥ क ० ।
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२४६ नाट्यशास्त्रम् यथा — तोयधरैः सुधीरघनपटुपटहरवैः ' सर्जकदम्बनी पकुटजकुसुमसुरभिः कन्दलसेन्द्रगोपकरचितमवनितलं वृषभगजविलसितकम् ॥ ७७ ॥
वीक्ष्य करोत्यसौ ) तथा इन्द्रकीट ( इन्द्रगोप ) पृथ्वी को भुई - केलिया ( कन्दली के सुमनों से सुवासित युक्त देखते हुए - जो कि सर्ज, कदम्ब, नीप एवं कुटज मृदंग के है और जो घन की गंभीर ध्वनि से पटुता से बजाए गए गम्भीर ( जो ) लगती है, प्रकट होने पर क्रीडा करने वाले हाथी के समान समान ( भी ) चेष्टाएं ( विलास ) करने लगा है ॥ ७७ ॥
यह व्यक्ति वै पञ्च द्वादशं सत्रयोदशम् ।
आद्यात् पराणि च दीर्घाणि ललितप्रवरं हि तत् ॥ ७८ ॥
अन्त्योपान्त्ये अक्षरों के पाद में प्रारम्भ के ( दो से ) पांच, प्रवरललिता - यदि सोलह अक्षर गुरू हो तो बारहवां, तथा तेरहवां, पन्द्रहवां और सोलहवां ‘ प्रवरललित ' वृत्त होता है ॥ ७८ ॥
यथा - नखालीढं गात्रं " दशनखचितञ्चोष्ठगण्ड । शिरः पुष्पोन्मिश्रं प्रविलुलितकेशालकान्तम् गतिः खिन्ना चेयं वदनमपि सम्भ्रान्तनेत्र " ॥ ७ ९ ॥ अहो श्लाघ्यं वृत्तं प्रवरललितं कामचेष्टम् का ) शरीर नखों से विक्षत है, इसके ओठ तथा कपोलों ( इस सुन्दरी है, इसके मस्तक पर पुष्प सजे हुए हैं, केश इतस्ततः पर दन्तक्षत विद्यमान के कारण ) धीमी है, मुंह घबराए नेत्रों वाला बिखरे हुए हैं, गति ( थकान — क ० । २. मत्तगजविलसितकमसी - क ० । १. पटुविशदनिनदितैः द्वे यत्र दौर्षाणि प्रवरं ललितं हि तत् – क ० । ३. अन्त्ये ४. लकित प्रवरलक्षणं. पु. त्वेवम्- इव चेद न्सी तथा गौं यदा मी पादस्थो भवत तथा षड्भिश्चान्यैर्यतिरपि च वर्णैर्यथा स्यात् । तदप्यष्टौ नित्यं समनुगतमेवोक्तमन्यैः प्रयोगज्ञैर्वृत्तं प्रवरललितं नामतस्तु ॥ - क ० ५. दशनविहतं क ० । १६. केशाग्रकान्तं क ० । मन्दायामा — ख.; मन्दा चेयं ग ० । ८. यद् । भ्रान्तनेत्रं - क ० । ७. ९. ग्लान नेत्रम् - क ० कामवेषम् - ग ० । १०. गुरु स्मृतम् — क ० ।
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षोडशोऽध्यायः २४७ लग रहा है । ओह! हो आश्चर्य - प्रेम की यह कैसी महान महिमा है कि जिसने इस प्रशंसनीय प्रकार द्वारा अपना विशिष्ट स्थान बना रखा है ॥७ ९ ॥
आद्यात् पराणि पञ्चाथ द्वादशं सत्रयोदशम् ।
अन्त्यं सप्तदशे पादे शिखरिण्यां गुरूणि ' च ॥ ८० ॥
शिखरिणी– यदि सत्रह अक्षरों के पाद में दूसरा, तीसरा, चौथा, पांचवा, बारहवां, तेरहवां तथा अन्तिम वर्ण गुरू होता है तो शिखरिणी ' ' वृत्त होता है ॥ ८० ॥
यथा - महानद्या भोगं पुलिनमिव ते भाति जघनं तथास्यं नेत्राभ्यां भ्रमरसहितं पङ्कजमिव । " तनुस्पर्शच्छायं सुतनु सुकुमारो न परुषः स्तनाभ्यां तुङ्गाभ्यां शिखरिणि - निभाभासि वनिते ॥८१ ॥
हे सुन्दरि, तुम्हारी जंघाएं महानदी के पुलिन के समान ( दीर्घ, शुभ्र ) है तथा नेत्रों सहित तुम्हारा मुंह भ्रमर युक्त कमल जैसा है, तुम्हारे शरीर का स्पर्श कोमल है, कठोर नहीं और हे प्रिये, तुम अपने उन्नत उरोजों से एक पहाड़ी ( शिखरिणी ) जैसी शोभित हो रही हो ॥ ८१ ॥
यत्र पञ्च लघुम्यादौ त्रयोदशचतुर्दशे ।
षोडशैकादशे चैव तत् स्याद् वृषभचेष्टितम् ॥ ८२ ॥
१. लक्षणमिदं क पु ० त्वेवं पठ्यते- 1515 चतुर्भिस्तस्यैव प्रवरललितस्य त्रिकगणै-यंदा लौ गश्चान्ते भवति चरणेऽत्यष्टिगदिते । यदा षड्भिश्छेदो भवति यतिमार्गे विरचित - ( यदि मार्गे विहित – क ० ) स्तदा वृत्तेष्वेषा खलु शिखरिणी नाम गदिता ॥ २. भोगे - ख ०, ग ० । ३. नेत्राढ्य ' - ख ० । ४. गतिमंन्दा चेयं सुतनु तव चेष्टा सुललिता - क ० । ५. पीनाभ्यां - क ० । ६. ममाभासि क ० । ७. दयिते - ख ०; ग ० । ८. लक्षणमिदं क - पुस्तकस्थमेवं लभ्यते -यदि हि चरणे न्सी म्रौ स्लौ गः क्रमाद्विनिवेशिताः यदि खलु यतिः षड्भिर्वर्णैस्तथा दशभिः पुनः । यदि च विहितं स्यादत्यष्टिप्रयोगसुखाश्रयं वृषभललितं वृत्तं ज्ञेयं तथा हरिणीति वा । fe fe डिली —क ० ।
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२४८ नाट्यशास्त्रम् वृषभचेष्टित — यदि सत्रह अक्षरों के पाद में आदि के पांच, ग्यारहवां, तेरहवां, चौदहवां, तथा सत्रहवां अक्षर लघु हो तो उसे ' वृषभचेष्टित " वृत्त कहते हैं ॥ ८२ ॥
यथा - जलधररवं ' श्रुत्वा श्रुत्वा मदोच्छ्रयदर्पितो विलिखति महीं शृङ्गाक्षेपैर्वृषः प्रतिनर्द्य च । स्वयुवतिवृत्तो गोष्ठाद् गोष्ठं प्रयाति च निर्भयो वृषभललितं चित्रं वृत्तं करोति च शाद्वले ॥ ८३ ॥
( यह ) वृषभ मेघों की गर्जना को सुनकर एवं अहंकार से पूर्ण होकर मदमत्त हो गया है और अपने सींगों से पृथ्वी को खोदकर गर्जन के उत्तर में डकारता है । अपनी सजातीय ( अनुगामिनी ) गौओं के साथ एक गोष्ठ से दूसरे गोष्ठ में निर्भय होकर विचरता है तथा हरे घास पर विभिन्न अचरज भरी क्रीडाओं को कर रहा है ॥ ८३ ॥
चत्वार्यादौ च दशमं गुरु यत्र त्रयोदशम् ।
चतुर्दशं तथान्त्यें ' द्वे चैकादशमथापि च ॥ ८४ ॥
यदा सप्तदशे पादे शेषाणि च लघून्यथ ।
भवन्ति यस्मिन् सा ज्ञेया श्रीधरा नामतो यथा ॥ ८५ ॥
श्रीधरा - यदि सत्रह अक्षर के पाद में आदि के चार, दसवां, ग्यारहवां, तेरहवां, चौदहवां तथा अन्तिमवर्ण गुरु हो तो ' श्रीधरा " नामक वृत्त होता है ॥ ८४-८५ ॥ १. वृषभचेष्टित को पिंगलाचार्य ने ' हरिणी ' माना है । २. ' श्रीधरा ' का ही पिङ्गलादिसम्मत नाम ' मन्दाक्रान्ता ' है । १. जलदनिनदं - ग ० । २. गर्जन्मदोच्चयदपिंतो- ग ० । ३. दर्पाच्छृङ्गैमृगः प्रतिनन्द्य च - क ० । ४. गुरूण्यथ – ख ० । ५. तथा पञ्च एकादश - ख ० । ६. यत्र - क ० । ७. लक्षणमिदं – क ग - पुस्तकस्थमेवम् -मो भ्रौ च स्युश्चरणरचितास्ती गरू च प्रविष्टा - ( गश्च गोन्त्य प्रतिष्ठ - ग ० ) छेदः श्लिष्टो ( इचेष्टो - ग ० ) यदि च दशभिः स्यात्तथान्यै ( - ग ० ) इचतुभिः । अत्यष्टौ च प्रतिनियमिता वर्णतः स्पष्टरूपा सा विज्ञेया द्विजमुनिगणैः श्रीधरा नामतस्तु ॥ - ( क ०; ग ० )
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षोडशोऽध्यायः २४ ९ यथा - स्नानैश्चूर्णैः सुखसुरभिभिर्गन्धवासैश्च धूपैः ' पुष्पैश्चान्यैः शिरसि रचितैर्वस्त्रयोगैश्व तैस्तैः । नाना रत्नैः कनकखचितैरङ्गसम्भोगसंस्थै-वयक्तं कान्ते कमलनिलया श्रीधरेवातिभासि ॥८६ ॥
हे प्रिये, ( कान्ते ) तुम अपने स्नान, चूर्ण, लेपन, आनन्ददायी सुवास के द्वारा ( जो शरीर ( कपोल से आशय है ) पर लगाई गई है ) ( इसी प्रकार तुम्हारे ) केशों में स्थित सुगन्धित पुष्पों तथा विविध धूप गन्धों के द्वारा और अपने शरीर पर धारण किये हुए अनेक रत्नजटित सुवर्णालंकारों के द्वारा तुम सचमुच कमल में निवास करने वाली सुन्दरता की देवी श्री ( लक्ष्मी ) सी लग रहो ॥ ८६ ॥
आद्यं चतुर्थ षष्ठञ्च दशमं नैधनं गुरु ।
" तद्वंश पत्रपतितं दशभिः सप्तभिर्यतिः ॥ ८७ ॥
यदि प्रथम, चतुर्थ, षष्ठ, दशम तथा अन्तिम वर्ण गुरु हो तथा दस और सात अक्षरों पर क्रमशः यति हो तो उसे ' वंशपत्रपतित ' वृत्त समझना चाहिये ॥ ८७ ॥
यथा - एष गजोऽद्विमस्तकतटे कलभपरिवृतः क्रीडति वृक्षगुल्मगहने कुसुमभरनते । मेघरवं निशम्य मुदितः पवनजवसमः सुन्दरि वंशपत्रपतितं पुनरपि कुरुते ॥ ८८ ॥
हे सुन्दरि, यह हाथी कुछ छोटे - छोटे हस्तिशावकों से घिरकर वृक्ष तथा लताओं से घने और पुष्पों के भार से नमने वाले पर्वत के शिखर पर क्रीडा कर रहा है । अब यह मेघ के गर्जन को सुन हर्षविभोर हो यह फिर वायु के वेग से बाँस के वृक्षों के पत्तों को पृथ्वी पर गिराने लगा है ॥ ८८ ॥
द्वितीयमन्त्यं षष्ठं चाप्यष्टमं द्वादशं तथा ।
चतुर्दशं पञ्चदशं पादे सप्तदशाक्षरे ॥। ८ ९ ॥
१. गन्धवाहैः सधूपैः – क.; गन्धसारैश्च धूपैः - ख.; गण्डलेपैः सुधूपैः - ग ० । २. पुष्पैर्माल्यै - ख ० । ३. कनकरचितै - ग ० । ४. श्रीधरेवावभासि — क ०, श्रीधरा त्वं विभासि - ख ० । ५. यत्र सप्तदशे पादे वंशपत्राह्वयं तु तत् — क ० । ६. युवति परिवृतः क ० । ७. पवनजववशात् ग ० ।