भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 381–390

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 381–390

पृष्ठ 381

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २, पृष्ठ 381 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२७० नाट्यशास्त्रम् मात्रा के अयुग गण काव्य रचना में कवि द्वारा रखे जा सकते हैं चार पर युग गण में ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं है ॥ १६० ॥

षष्ठस्य द्विविकल्पस्य नैधने ह्येकसंश्रितः ।

पश्चादर्थे तु षष्ठः स्यादेकमात्रस्तु केवलः ॥ १६१ ॥

षष्ठ गण के दो ( वैकल्पिक ) स्वरूप हैं और आठवाँ गण केवल एक वर्ण होता है । उत्तरार्ध में छटा गण केवल एक मात्रा से ही निर्मित होता है ॥ १६१ ॥

द्विविकल्पस्तु षष्ठो यो गुरुमध्यो भवेत्तु सः ।

तथा " सर्वलघुश्चैव यतिसंज्ञासमाश्रिताः ॥ १६२ ॥

छः गण के दो वैकल्पिक स्वरूपों में एक है ' ज ' जिसमें गुरु मध्य में है और दूसरा इसका रूप चार लघु वर्ण ( मात्रा ) वाला है । ये यति होता से सम्बद्ध या उस पर आश्रित रहते हैं ॥ १६२ ॥

द्वितीयादिलघुर्ज्ञेयः सप्तमे पञ्चमे यतिः ।

' प्रथमादिरथान्त्ये च पञ्चमे वा विधीयते ॥ १६३ ॥

गण आदि लघु हो तथा पंचम - गण के बाद हो तो यति जब है, दूसरा जबकि वह पूर्ण होता हो या षष्ठ गण के प्रथम अक्षर से या पाँचवें होती गण के बाद पूर्ण होता हो ॥ १६३ ॥

[ " गुरुमध्यविहीनस्तु चतुर्गुणसमन्वितः ।

अयुग्गणो विधातव्यः युग्गणस्तु स एव च ॥

प्रक्षिप्तः— मध्य गुरु अर्थात् जगण को छोड़ कर चार गण से युक्त विषम गण वाले तथा शेष उसी प्रकार सम गण वाले पाद रखे जाते हैं । ] १. षष्ठोऽस्य द्विविकल्पः स्यात् - क ०; षष्ठो वै द्विविकल्पस्तु – ख ० । २. संस्थितः - क ०; ख ० । ३. पश्चार्थे यो गणः षष्ठ एकमात्रः स इष्यते ।- क ०; स उच्यते - ख ०; ग ० । ४. षष्ठोऽत्र — ग ० । ५. यथा ख ० । ६. सर्वयतिश्चैव यदि संज्ञां क ० यतिः संज्ञाः समाधितः - ग ० । ७. सद्वितीयाद्विलघुनी सप्तमे सप्तमाद्यदि - क ०, सा द्वितीया द्विलघुका सप्तमे प्रथमे यतिः —ख; साद्वितीयाद् द्विलघुनि सप्तमे प्रथमाद्यति - ग ० । ८. प्रथमादि तथान्ते चकः ग ० । ४ ९. पञ्चमे तु ग ० । -किएक X १०. प्रमाणश्चैव पञ्चमः - ख ० ॥ 3

पृष्ठ 382

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २, पृष्ठ 382 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२७१

पथ्या आर्या - विपुला आर्या-गणेषु त्रिषु पादस्य यस्याः पथ्या तु सा भवेत् ।

अतश्च विपुलान्या तु विज्ञेयाऽयतिलक्षणा ॥ १६४ ॥

जिसमें तीन गण के पश्चात् यति हो ( अर्थात् जिसमें तीन गणों या १२ मात्रा का पाद हो ) उसमें पथ्या आर्या होती है पर विपुला आर्या इससे भिन्न है क्योंकि उसमें किसी प्रकार की ( पाद में ) यति नहीं होती ( अयतिलक्षणा ) है ॥ १६४ ॥

पथ्या यथा-रक्तमृदुपद्यनेत्रा सतदीर्घबहुल - मृदुकेशी ।

कस्य तु पृथुमृदुजघना तनुबाहुंसोदरी पथ्या ॥ १६५ ॥

ऐसी स्त्री किसे इष्ट नहीं जो रक्तवर्ण के कोमल कमल जैसे नेत्रों वाली हो, जिसके काले, लम्बे, कोमल तथा घुँघराले बाल हों और मोटी तथा कोमल जाँघें हों, पतली बाँहें, कंधे तथा उदर हों ॥ १६५ ॥

विपुला यथा-विपुलजघनवदनस्तननयनैस्ताम्राधरोष्ठकरचरणैः ।

आयतनासागण्डैर्ललाटकर्णैः शुभा कन्या ' ॥ १६५ ॥

वह कन्या शुभ लक्षण वाली होती है जिसका नितम्ब, चेहरा, उरो १. प्रथमतृतीयो पादौ द्वादशमात्री भवेत्तु सा पथ्या । विपुलान्या खलु गदिता पूर्वोदितलक्षणोपेता ॥ क ० ख ० पुस्तकेऽत्रैषाधिका साधपचश्लोकी-॥ १३३ ॥ द्वितीयश्च चतुर्थश्च जकारी गुरुमध्यगी ।

यस्याः स्यात् पादयोगे तु विज्ञेया विपुला तु सा ॥ ॥ १३ मुखेऽस्य मुखचपला स्यादन्यत्र जघने तथा । उभयोरधंयोरेतल्लक्षणं दृश्यते यदि । वृत्तः सा तु विज्ञेया सर्वतश्चपला तथा । त्रिशन्मात्रास्तु पूर्वार्द्ध विशति सप्त चापरे । उभयोरधंयोज्ञेयो मात्रापिण्डो विभागशः । अधिकानि यानि त्रिंशद्भयस्तानि द्विगुणितानि तु । अक्षरत्रययुक्तानि ज्ञेयान्यत्र लघूनि तु । एतानि लघुसंज्ञानि निद्दिष्टानि समासतः । PETE I PER 3 सर्वासामेव चार्याणामक्षराणि यथाक्रमम् ॥

पृष्ठ 383

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २, पृष्ठ 383 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२७२ नाट्यशास्त्रम् तथा नयन बड़े हों, हाथ और पैरों के तले लाल हों तथा नाक, कपोल, ललाट तथा कान ऊँचे उठे हुए हों ॥ १६५ ॥

चपला आर्या-द्वितीयश्च चतुर्थश्च गुरुमध्यगतो भवेत् ।

उभयोरर्धयोर्यत्र विज्ञेया चपला यथा ॥ १६६ ॥

चपला में द्वितीय और चतुर्थ गण ( ' ज ' या ) मध्य गुरु के रहते हैं जो दोनों के अर्धभाग में होता है ॥ १६६ ॥

यथा - उद्भटगामिनी परुषभाषिणी कामचिह्नकृतवेषा ।

जानाति मांस- युक्ता सुरा - प्रिया सर्वतश्चपला ॥ १६७ ॥

वह स्त्री जो अपने पति के प्रतिकूल उद्धत आचरण करे और उसे कठोर वचन कहे, जिसके वेष ( वस्त्रादि ) में उपभोग के चिह्न दिखाई दे रहे हों, जिसके शरीर पर अधिक मांस हो, सुरा पीने की आदत हो, वह चंचला स्त्री किसी को कभी भी प्राप्त हो सकती है ॥ १६७ ॥

मुखचपला तथा जघनचपला - आर्या

पूर्वार्धे लक्षणं ह्येतदस्याः ' सा च मुखेन तु ।

पश्चिमा तु चपला यस्याः सा जघनेन तु ॥। १६८ ॥

जब चपला का लक्षण पूर्वार्द्ध में उपलब्ध हो तो मुख चपला तथा उत्तरार्ध में लक्षण दिखे तो जघनचपला होती है ॥ १६८ ॥

मुखचपला यथा-आर्यामुखे तु चपला तथापि चार्या न मे यतः सा तु ।

दक्षा गृहकृत्येषु तथा दुःखे भवति दुःखार्त्ता ॥ १६ ९ ॥

मेरी स्त्री वाचाल है पर उसका व्यवहार बुरा नहीं है । वह गृहकार्य में चतुर है और मेरे दुःखी होने पर वह भी दुःखी हो जाती है ॥ १६ ९ ॥

जघनजपला यथा-वरमृगनयने चपलासि वरोरू शशाङ्कदर्पणनिभास्ये ।

कामस्य सारभूते पूर्वमदचारुजघनेन ॥ १७० ॥

हे सुन्दरि, तुम्हारी चंचल आँखें श्रेष्ठ हरिण के समान हैं और तुम्हारा मुख चाँद या दर्पण के समान ( स्वच्छ या आह्लादक ) है, तुम्हारी सुन्दर १. यस्याः सा चपलामुखे । २. पश्चिमार्धं भवेद्यत्र जघने चपला तु सा - क ० ।

पृष्ठ 384

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २, पृष्ठ 384 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

षोडशोऽध्यायः २७३ जंघाए काम की सार एवं पूर्णतः मादक है परन्तु तुम चपला ( चंचल स्वभाव ) होने से विश्वास के योग्य नहीं हो ॥ १७ ॥

उभयोरर्थयोरे तलक्षणं दृश्यते यदि ।

वृत्तः सा तु विज्ञेया सर्वतश्चपला तु सा ॥ १७२ ॥

यदि पूर्वाद्ध तथा उत्तरार्ध में ' चपला ' का लक्षण समान उपलब्ध हो तो इसे ' सर्वचपला ' आर्या जानों ॥ १७२ ॥

कार्यौ द्वादशमात्रौ च पादावाद्य तृतीयको अष्टादश द्वितीयश्च तथा पञ्चदशोत्तमाः ॥ १७३ ॥

इस वृत्त में प्रथम तथा तृतीय पाद में बारह मात्राएं तथा दूसरे में अठारह और अन्तिम पाद में पन्द्रह मात्राएँ रखनी चाहिए ॥ १७३ ॥

' चतुःपञ्च प्रकाराणां चतुष्कानां विशेषतः ।

प्रस्तारयोगमासाद्य बाहुल्यं सम्प्रदर्शयेत् ॥ १७४ ॥

विषम स्थान या पाद में स्थित रहने वाले चार प्रकार के अर्थात् चार गण रखे जाते हैं । समस्थान या समपाद में पांच प्रकार के गण या पांच गण को रखते हैं । इनमें जो परस्पर संकीर्णता के द्वारा होने वाला वैशिष्ट्य है उसे प्रस्तारगत विस्तार से दिखलाया जाता है ॥ १७४ ॥

पञ्चपञ्चाशदत्या तु त्रिंशदाद्या तथैव च ।

आर्या त्वक्षरपिण्डेन विज्ञेयाऽत्र प्रयोक्तृभिः ॥ १७५ ॥

अन्त्या अर्थात् अन्तिम सर्वलघु के पांच गण में रखा जाए इस प्रकार इनके पचपन प्रभेद प्रस्तारगत विस्तार से होंगे । प्रथमार्ध में आदि के पाद के आद्यगण के तीस प्रस्तारगत प्रभेद होंगे । दूसरे के छब्बीस प्रस्तारगत भेद होंगे । इस प्रकार प्रयोक्तागण आर्या के अक्षर समुदाय को समझें ॥१७५ ॥

त्रिशतस्त्वथ वर्णेभ्यो लघुवर्णत्रयं भवेत् ।

शेषाणि गुरुसंज्ञानि एवं सर्वत्र निर्दिशेत् ॥ १७६ ॥

और इन तीस वर्ण गत प्रस्तार भेदों के प्रकार में द्वितीय और षष्ठ स्थान के साथ अन्तिम स्थान पर स्थित रहने से तीन लघु वर्ण बनते हैं तथा शेष गुरु संज्ञक वर्ण विभेद होते हैं, ऐसा सभी स्थान पर समझना चाहिए ॥ १७६ ॥

१. श्लोकोऽयं अभिनवगुप्तव्याख्यातत्वादत्र निवेशितः २. पञ्चाशदाद्या ख ० । ३. गुरुसंख्यानि - क ० । १८ ना ० शा ० द्वि ०

पृष्ठ 385

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २, पृष्ठ 385 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२७४- नाट्यशास्त्रम् ( सर्वेषामेव चार्याणामक्षराणां यथाक्रमम्

सर्वेषां जातिवृत्तानां पूर्वमुत्तरसंख्यया ।

विकल्पं गणनां कृत्वा संख्यां पिण्डेन दर्शयेत् ॥ १७७ ॥

सभी जातिवृत्तों में विकल्पगत संख्या के पूर्व विभेदों को उत्तर संख्या के साथ गुणा करके उससे जो समुदाय संख्या बने वही उसका प्रस्तार भेद होगा जिसे बोधक संख्या के रूप में दिखलाया जाए ॥। १७७ ॥

" आर्यागीतिरथार्थे च केवलञ्चाष्टभिर्गणैः ।

इतरार्धे तु षष्ठस्तु न लघुर्गण इष्यते ॥ १७८ ॥

आर्या गीति के अधे भाग में आठ गण रखते हैं और आर्यागीति के प्रथमार्ध के समान उत्तरार्ध में भी षष्ठ गण के दो भेद माने जाते हैं जिसमें लघुगण न हों ॥ १७८ ॥

विविधैर्नानाच्छन्दसमुद्भवैः ।

कर्तव्याः षट्त्रिंशल्लक्षणान्विताः ॥ १७ ९ ॥

काव्यबन्धास्तु इति भारतीये नाट्यशास्त्रे छन्दोविचितिर्नान षोडशोऽध्यायः । इन छन्दों के नियमों को जानकर विविध छन्दों नाटक काव्य आदि का कविजन ३६ लक्षणों सहित निर्माण करें ॥ १७ ९ ॥ का ' छन्दोर्विरचिति नामक सोलहवां अध्याय सम्पूर्ण ॥ भरतनाट्यशास्त्र १. पद्यार्धमेतत् क - पुस्तकेऽधिकम् । १२. यानि वृत्तानि - ख ० । ३. विकल्पं गणयित्वा तु संख्या पिण्डेन ४. निर्दिशेत् -I ० । ५. गीतिरथायैव -ग केवलं स्वष्टभि - ख ०; ६. इतरार्धेऽपि षष्ठः स्यात् स विकल्पो स्यात् स विकल्पो भवेद्गुणः - ग ० ७. एवं चतुविधैर्वृत्ते - ख ० । दर्शयेत् —ख ० ग ० । भवेद् मणः -- ख ०; इतरा चापि षष्ठा की ए

पृष्ठ 386

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २, पृष्ठ 386 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

205 STP ( 89 ) PEER ( 9 ) ( १६ ) ( 50 ( C ) F सप्तदशोऽध्यायः ( ६ ) ( वाचिकाभिमये ) काव्यादिलक्षणाध्यायी ( नाट्य - रचना के छत्तीस ) लक्षण--3

भूषणाक्षरसङ्घाती शोभोदाहरणे तथा ।

हेतुसंशयदृष्टान्ताः प्राप्त्यभिप्राय एव च ॥

निदर्शनं निरुक्तञ्च सिद्धिश्चाथ विशेषणम् ।

गुणातिपातातिशयौ तुल्यतर्कः पदोञ्चयः ॥

' दिष्टञ्चैवोपदिष्टच विचारोऽथ विपर्ययः ।

शश्वानुनयो माला दाक्षिण्यं गर्हणन्तथा ॥

अर्थापत्तिः प्रसिद्धिश्च पृच्छा सारूप्यमेव च मनोरथश्च लेशश्च सङ्ग्रोभो गुणकीर्तनम् अज्ञेयाभ्यनुक्तसिद्धिश्च प्रियं वचनमेव च शिल्लक्षणान्येवं काव्यबन्धेषु निर्दिशेत् ( द्रश्य ) काव्य में छत्तीस लक्षण ' समायोजित होते हैं Toppe १ ॥ एक २ ॥ ३ ॥

॥ ४ ॥

॥ ५ ॥

। इनके नाम इस प्रकार हैं- ( १ ) भूषण ( २ ) अक्षर - संघात ( ३ ) शोभा ( ४ ) उदाहरण ( ५ ) हेतु ( ६ ) संशय ( ७ ) द्रष्टान्त ( ८ ) प्राप्ति ( ९ ) अभिप्राय ( १० ) निदर्शन ( ११ ) निरुक्त ( १२ ) सिद्धि ( १३ ) विशेषण ( १४ ) गुणातिपात ( १५ ) गुणातिशय ( १६ ) तुल्यतर्क ( ( १७ ) पदोच्चय ( १८ ) दिष्ट ( १ ९ ) उपदिष्ट ( २० ) विचार ( २१ ) विपर्यय ( २२ ) भ्रंश १. ' लक्षणों ' के विषय में नाट्यशास्त्र की टीकाओं में असमानता परिलक्षित होती है । आचार्य अभिनवगुप्त ने दस विभिन्न मतों का इस सन्दर्भ में उल्लेख किया है । ऐसा प्रतीत होता है कि महापुरुष लक्षण शब्द से लक्षण शब्द इस - सन्दर्भ में तुलना योग्य है । अपने विशिष्ट स्वरूप के कारण यह गुण, रोति, अलंकार आदि सभी से पार्थक्य रखता है । कुछ टीकाकारों ने लक्षणों को नाट्योपयोगी मानते हुए इसका व्यापक प्रसार भी बतलाया है । इसका विवेचन परिशिष्ट में दिया गया है । १. दृष्टञ्चैवोपदिष्टञ्च – ख ०; ग ० । २. क्षोभोऽय - ख ०; ग ० । ३. ज्ञेयान्यक्त – ख ०; ग ० ।

पृष्ठ 387

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २, पृष्ठ 387 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२७६ नाव्यशास्त्रम् ( २३ ) अनुनय ( २४ ) माला ( २५ ) दाक्षिण्य ( २६ ) गर्हण ( २७ ) अर्थापत्ति ( २८ ) प्रसिद्धि ( २ ९ ) पृच्छा ( ३० ) सारूप्य ( ३१ ) मनोरथ ( ३२ ) लेश ( ३३ ) संक्षेप ( संक्षोभ ) ( ३४ ) गुणकीर्तन ( ३५ ) अनुक्त सिद्धि तथा ( ३६ ) प्रियवचन ( प्रियोक्ति ) ॥ १-५ ॥ भूषण '

अलङ्कारैर्गुणैश्चैव बहुभिः समलङ्कृतम् ।

भूषणैरिव ' चित्रार्थैस्तद्भूषणमिति स्मृतम् ॥ ६ ॥

जो काव्य रचना अनेक अलङ्कारों तथा गुणों से अलङ्कारों से सजाए व्यक्ति के शरीर के सदृश सुशोभित हो रही हो उस विभिन्न अर्थों के गुण-सूचक लक्षण को ' भूषण ' जानो ' ॥ ६ ॥

अक्षरसंघात -यत्राल्पैरक्षरैः श्लिष्टेर्विचित्रमुपवर्ण्यते ।

तमप्यक्षरसङ्घातं विद्यालक्षणसंज्ञितम् ॥ ७ ॥

जहां थोड़े श्लिष्ट अक्षरों से विचित्र अर्थ की अभिव्यक्ति हो उसे ' अक्षर-संघात ' नामक लक्षण जानों ॥ ७ ॥

१. इस अध्याय में ( ३६ लक्षणों का निदर्शक ) नाट्यशास्त्र का अंश दो पाठान्तरों में उपलब्ध है । इनमें एक पाठ को प्राचीन टीकाकारों ने लिया और उसी पाठ का विश्वनाथ तथा सिंहभूपाल प्रभृति ने अनुसरण किया । इस पाठ में सभी लक्षणों के अनुष्टुप् श्लोक हैं । हमने भी अपने अनुवाद में इसे ही प्राथमिकता दी है । दूसरा पाठ -जो कि परवर्ती तथा परिष्कृत प्रतीत होता है नाट्यशास्त्र के टीकाकारों द्वारा गृहीत है । विशेषतः आचार्य कीर्तिधर, अभिनवगुप्तपाद तथा आचार्यं धनज्जय आदि के द्वारा । यह सत्रह लक्षणों में उक्त पाठ से अभिन्नता रखता है जिनमें आठ लक्षण तो दोनों पाठों के समान द्वितीय पाठ को समग्र एवं सानुवाद अनुबन्ध में देने का उद्योग किया गया है । ) इस प्रकार दोनों हो पाठान्तरों का अर्थ उपलब्ध करवाने का उद्योग हमने किया है । जिससे इस अध्याय के अध्ययन में बुद्धिभेद उत्पन्न न हो और आवश्यकता के अनुसार दोनों ही पाठों का उपयोग हो सके । २. दूसरे पाठ में इसे ही विभूषण माना गया है । लक्षण अनुबन्धाध्याय दृष्य । ३. अक्षरसंघात का लक्षण दोनों पाठों में गृहीत है । १. विन्यस्तै - ख ० ।

पृष्ठ 388

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २, पृष्ठ 388 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सप्तदशोऽध्यायः २७७

शोभा-सिद्धैरर्थैः समं कृत्वा ह्यसिद्धोऽर्थः प्रयुज्यते ।

यत्र ' श्लिष्टा विचित्रार्था सा शोभेत्यभिधीयते ॥ ८ ॥

यदि नवीन तथा मनोहारि अर्थ की असिद्ध या अज्ञात विषय को सिद्ध या झात रूप में उद्धृत करते हुए श्लेष के द्वारा अभिव्यक्ति हो तो इसे ' शोभा ' नामक लक्षण समझना चाहिए ' ॥ ८ ॥

उदाहरण-यत्र तुल्यार्थयुक्तेन वाक्येनाभिप्रदर्शनात् ।

' साध्यते निपुणैरर्थस्तदुदाहरणं स्मृतम् ॥ ९ ॥

जब समानार्थक वाक्यों द्वारा किसी अर्थ को प्रकट करते हुए निपुणजन अपने प्रयोजन को साधें तो उसे ' उदाहरण ' नामक लक्षण समझना चाहिए ॥ ९ ॥

हेतु-यत्प्रयोजनसामर्थ्याद्वाक्यमिष्टार्थसाधनम् ।

समासोक्तं मनोग्राहि स हेतुरिति संज्ञितः ॥ १० ॥

जब संक्षिप्त और हृदय ग्राही वाक्यावली द्वारा उसके दक्षतापूर्वक प्रयोग किये जाने के कारण इच्छित वस्तु की प्राप्ति हो जाए तो उसे ' हेतु ' नामक लक्षण जानों ॥ १० ॥

संशय—

अपरिज्ञाततत्वार्थे वाक्यं यत्र समाप्यते ।

अनेकत्वाद्विचाराणां स संशय इति स्मृतः ॥ ११ ॥

जब विचारों की अधिकता रहने के कारण बिना ( उसके ) सम्पूर्ण आशय का ज्ञान किये ही वाक्य समाप्त हो जाए तो उसे ' संशय ' समझना चाहिए ॥ ११ ॥

१. शोभा का लक्षण दोनों पाठों में समानता युक्त है । २. तुलना, सा ० दर्पण ६।१७७ । उदाहरण का लक्षण अन्य पाठ में मिलता है । ३. हेतु का लक्षण अन्य पाठ में दूसरा है । इस लक्षण का विस्पष्टरूप कदाचित् अस्पष्ट सा है । अभिनवगुप्त की व्याख्या यहाँ विशद है । ४. संशय का लक्षण दोनों पाठों में समान है । २. श्लक्ष्णविचित्रार्था — ख ०; यत्र श्लिष्टं विचित्रार्थम् — ग ० । १. स्वल्पार्थ - ख ०; ग ० । २. साध्यन्ते निपुणैरर्था - ख ०; ग ० । ३. साधकम् - ख ०; ग ० ।

पृष्ठ 389

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २, पृष्ठ 389 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२७८ नाट्यशास्त्रम्

दृष्टान्त-सर्वलोकमनोग्राही यस्तु ' पक्षार्थसाधकः ।

हेतोर्निदर्शनकृतः स दृष्टान्त इति स्मृतः ॥ १२

हेतु तथा उदाहरण को देते हुए जिसमें किसी विषय मनोरंजक रूप में पक्ष - समर्थन किया जाए तो उस वचनावली समझना चाहिए ॥ १२ ॥

प्राप्ति-दृष्ट्वैवायवान् ' कांश्चिद्भावो यत्रानुमीयते ।

या वस्तु का को ' दृष्टान्त " ' प्राप्तिं तामभिजानीयालक्षणं नाटकाश्रयम् ॥ १३ ॥।

जब कुछ ( सूचनाओं के द्वारा या ) चेष्टाओं को देखकर किसी भाव को ताड़ लिया जाए तो उसे ' प्राप्ति ' नामक ( श्रेष्ठ ) नाटकों में प्राप्त होने वाला लक्षण समझना चाहिए ' ॥ १३ ॥

अभिप्राय-

अभूतपूर्वो यो ' ह्यर्थः सादृश्यात् परिकल्पितः ।

लोकस्य हृदयग्राही सोऽभिप्राय इति स्मृतः ॥ १४ ॥

जो विचार मनोग्राही स्वरूप वाला हो तथा जिसकी किसी ने कभी कल्पना भी न की हो — जब ( दो विषयों की ) समानता के आधार पर उसे प्रस्तुत या निर्माण किया जाए तो उसे ' अभिप्राय ' समझना चाहिए ' ॥ १४ ॥

निदर्शन - ( या विपरीत दृष्टि )

यत्रार्थानां प्रसिद्धानां क्रियते परिकीर्तनम् ।

परापेक्षाव्युदासार्थ तन्निदर्शनमुच्यते ॥ १५ ॥

१. ' दृष्टान्त ' के लक्षण दोनों पाठों में भित्र हैं । इसकी दृष्टान्तालङ्कार से भी तुलना की जा सकती है । २. ' प्राप्ति ' के लक्षण दोनों पाठों में प्रायः समान हैं । ३. ‘ अभिप्राय ' के स्थान पर अन्य प्राठ में ' युक्ति ' प्राप्त होता है । ११. यश्च – क ०; पक्षपक्षार्थ - ख ०, ग ० । २. वावयवं किञ्चिद् - क ० । १३. थत्रोपमीयते — क ० । ४. अप्राचि चैवतां प्राप्तिं जानीयालक्षणं बुधः कः प्राप्तुं तमपि जानीय - ख ० । ५. योऽप्यथो: - ख ०; ग ० । ६. परोपेक्ष — क्र ०; परापक्षाम्युदासार्थं- - ख ० | FREE

पृष्ठ 390

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २, पृष्ठ 390 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सप्तदशोऽध्यायः ०२७ ९ जिसमें पहिले कही गई किसी भूल या विपरीत दृष्टि को दूर करने के लिए ( कुछ ) प्रसिद्ध बातों का समर्थन स्वरूप प्रयोग किया जाए तो उसे ' निदर्शन ' समझना चाहिए ' ॥ १५ ॥

निरुक्त-निरवद्यस्य वाक्यस्य पूर्वोक्तार्थप्रसिद्धये ' । कील ' यदुच्यते तु वचनं निरुक्तं तदुदाहृतम् ॥ १६ ॥

पिछली अदुष्ट ( निरवद्य ) बात को पुष्ट करने के लिए उसके समर्थन में प्रयुक्त की जाने वाली वाक्यावली को ' निरूक्त ' समझना चाहिए ' ॥ १६ ॥

सिद्धि-बहूनान्तु प्रधानानां नाम यत्राभिकीर्त्यते ।

अभिप्रेतार्थसिद्ध्यर्थं सा सिद्धिरभिधीयते ॥ १७ ॥ 5115

जिसमें अपने इष्ट विषय को पूर्ण बतलाने के ( या प्राप्त करने के ) लिए अनेक प्रसिद्ध बड़े व्यक्तियों के नाम लिए जाए तो उसे ' सिद्धि ' समझना चाहिए ' ॥ १७ ॥

विशेषण--सिद्धान् बहून् प्रधानार्थानुक्त्वा यत्र प्रयुज्यते ।

विशेषयुक्तं वचनं विज्ञेयं तद्विशेषणम् ॥ १८ ॥

जब अनेक प्रसिद्ध तथा बड़े विषयों को कहने के बाद उनकी विशेषता तलाते हुए किसी बात को कहा जाए तो उसे ' विशेषण ' समझना चाहिए ॥ १८ ॥

' काला ' १.. ' निदर्शन ' के स्थान पर अन्य पाठ में ' आशी: ' प्राप्त होता है । निदर्शन के लक्षण का आचार्य अभिनवगुप्त ने विवेचन नहीं किया केवल एक उदाहरण मात्र दे दिया है जिससे यह अधिक स्पष्ट नहीं हो पाया । २. ' निरुक्त ' का लक्षण दोनों पाठों में समानता लिये हुए मिलता है । दूसरे पाठ में इसके दो भेद भी निदर्शित किये गये हैं । ३. ' सिद्धि ' के लक्षण में दोनों पाठों में थोड़ी भिन्नता है । ४. ' विशेषण ' के स्थान पर अन्य पाठ में ' क्रम ' मिलता है । लक्षण वहीं दृष्टव्य । १. क्तार्थः प्रसिद्धयतिकः । २. तदप्यागमसम्भूतं निरुक्तमभिनिर्दिशेत् — क ० । ३. बहूनाञ्च प्रयुक्तानां क ० । ४. यत्राभिधीयते — क ०