भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 371–380

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 371–380

पृष्ठ 371

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२६० नाट्यशास्त्रम् TE स्फुटितकलशशुक्तिनिर्गीर्णमुक्ता- ' फलैरूर्मिहस्तैर्नमस्यन्ति वः सागराः । मुदितजलचराकुलाः सम्प्रकीर्णामलाः कीर्तयन्तीव कीर्ति महानिम्नगाः ॥ ] प्रसन्न जनपद से व्याप्त, समृद्ध धान्य की खानि होकर यह पृथ्वी आपकी अर्चना कर रही है, मद मत्त हाथियों की सूंडों से विध्वस्त तालवनों के समूहवाले f वष्य आदि पर्वत भी आपके प्रति आनत हैं, विदीर्ण होने वाली शुक्तियों के कलशों से बाहर निकलते मौक्तिक वाले तरंग हस्तों द्वारा सागर भी आपके प्रति प्रणत है तथा ये महानदियाँ भी अपने सानन्द जल-चरों से व्याप्त हो निर्मलता को विस्तीर्ण करती हुई आपकी शुभ्र कीति का मानों आख्यान गा रही हैं ॥ विषम तथा अर्धसमवृत्त—

एतानि समवृत्तानि मयोक्तानि द्विजोत्तमाः ।

विषमार्द्धसमानान्तु पुनर्वक्ष्यामि लक्षणम् ॥ ११ ९ ॥

हे मुनिजन, मैंने अभी समवृत्त बतलाये है । अब मैं अर्धसमवृत्त तथा विषमवृत्तों के लक्षण बतलाता हूँ ॥ १ ११ ९ ॥

यत्र पादास्तु विषमा नानावृत्तसमुद्भवाः ।

ग्रथिताः पादयोगेन तद्वृत्तं विषमं स्मृतम् ॥ १२० ॥

जिसमें अनेक वृत्तों के असमान पाद हों तथा उनसे एक पूर्ण छन्द का निर्माण किया गया हो तो विषमवृत्त होता है ॥ १२० ॥

द्वौ समौ द्वौ च विषमौ वृत्तेऽर्धविषमे तथा ।

सर्वपादैश्च विषमैर्वृत्तं विषममुच्यते ॥ १२१ ॥

जिस छन्द में दो पाद ( पहले व तीसरे ) सम और दो ( दूसरे व चौथे ) पाद विषम हों तो उसे अर्धविषम ( अर्धसमवृत्त ) वृत्त, तथा दो पादों के १. विमब - क २. कीर्तयिष्यन्ति वर्ण - क ० । ३. उदाहरणमेतत् जनाश्रयां विद्यते । तद् ग्रन्थकारेण रुद्रस्वामिना कुतः उद्घृतमिति निर्णेतुं न शक्यते । अयं दण्डकश्चण्डवृष्टिप्रयोग इति नाम्ना भासते । इति क ० पु ० टिप्पणां रामकृष्ण कविमहाभागः । ४. युग्मजविषमाणाञ्च सम्प्रवक्ष्यामि – क ० । ५. समावेकान्तरी पादो द्वौ द्वावर्द्धसमी स्मृती -क ० ।

पृष्ठ 372

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षोडशोऽध्यायः २६१ असमान ( विषम ) रहने पर विषमवृत्त होता है । इसी प्रकार सभी ( चारों ) पादों के असमान रहने पर भी विषमवृत्त होता है ॥ १२१ ॥

स्वाद्यमथ ' दीर्घाद्यं दीर्घं हस्वमथापि वा ।

युग्मौजविषमैः पादैर्वृत्तमर्धसमं भवेत् ॥ १२२ ॥

यदि किसी वृत्त के सम तथा विषम पादों का ह स्व, आदि दीर्घ या स्व स्वरूप हो तो उसे विषम वृत्त समझें ॥ १२२ ॥

पादे सिद्धे समं सिद्धं विषमं सार्वपादिकम् ।

द्वयोरर्धसमं विद्यादेष छेदस्तु पादतः ॥ १२३ ॥

पादों के अनुसार लक्षण करने में सभी समान पाद रहने पर समवृत्त, दो पादों के समान रहने पर अर्धसमवृत्त तथा सभी पादों के ( या तीन पादों के ) असमान रहने पर विषमवृत्त होता है ॥ १२३ ॥

छेदतस्तु मया प्रोक्तं समवृत्तविकल्पनम् ।

त्रिकै विषमवृत्तानां सम्प्रवक्ष्यामि लक्षणम् ॥ १२४ ॥

मैंने पादों के विभाजन द्वारा वृत्तों का लक्षण बतलाया । अब मैं अर्धसम वृतों के त्रिकों ( गणों ) द्वारा बनने वाले स्वरूप को को ( ( भी ) बतलाता हूँ ॥१२४ ॥

पथ्या-सौ गौ तु प्रथमे पादे स्रौ लगौ चापि द्वितीयके ।

युग्मे s विषमे पादे ज्ञेया पथ्या तु सा त्रिकैः ॥ १२५ ॥

यदि ( अनुष्टुप में ) पहले पाद में सगण, सगण तथा दो गुरु हों, द्वितीय पाद में सगण, रगण लघु तथा गुरू हों तथा यही शेष सम तथा १. ह्रस्वाद्यं नैधनाद्यं वा – क ० । २. द्वयोश्च पादयोरोज एषच्छेदस्तु वृत्तजः – क ०, पादद्वयस्य संसिद्धी सिद्धमर्द्धसमं पुनः - ख ०; ग ० । ३. भेदस्तु — ग ० । ४. छेदास्तु ये मया प्रोक्ताः समवृत्तविकल्पिताः । ख ०; ग ० । ५. अस्मादनन्तरं क — पुस्तके -नैधनेऽन्यतरस्यां वै प्रथमे पाद इष्यते । द्वितीये चरणे च स्यादित्यनुष्टुप् समासतः ॥ इति अधिकम् । ०६. यत्र तथापरे — क ० । ७. एवं युग्मोजयोर्ज्ञेयं पथ्यावृत्ते त्रिकौ यथा । —क ०; एवं युश्मोजकी ज्ञेय -ख ०; ग ० ।

पृष्ठ 373

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२६२ नाट्यशास्त्रम् विषम पाद में रहे तो त्रिकों द्वारा जाना जानो वाला यह वृत्त पथ्या कहलाता है ॥ १२५ ॥

यथा-- प्रिय दैवतमित्रासि, प्रिय सम्बन्धिबान्धवा ।

प्रियदानरता पथ्या दयिते त्वं प्रियासि मे ॥ १२६ ॥

तुम देवता तथा मित्रों का आदर करती हो, सम्बन्धी तथा बान्धवों पर तुम्हारा स्नेह है, तुम सदा प्रेमपूर्वक इष्ट वस्तु को प्रस्तुत करती हो तथा हितबुद्धिवाली हो इसलिए हे प्रिये, मुझे तुम अत्यन्त प्रिय हो ॥ १२६ ॥

सर्वविषमपथ्या-म्रौ गौ तु ' प्रथमे पादे यू सौ लगौ च द्वितीयके ।

पादे भ गौ तृतीये च चतुर्थे तु तसौ लगौ ॥ १२७ ॥

यदि ( अनुष्टुप जाति के वृत्त मे ) प्रथम पाद में म, र, ग, ग; दूसरे पाद में य, स, ल, ग; तीसरे पाद में रगण, भगण, लघु तथा गुरु तथा चौथे पाद में जगण, सगण लघु तथा गुरु हों तो सर्वविषमा पथ्या वृत्त कहलाता है ॥ १२७ ॥

यथा— नैवाचारो न ते मित्रं न सम्बन्धिगुण - प्रिया ।

सर्वथा सर्वविषमा पथ्या न भवसि प्रिये ॥ १२८ ॥

हे प्रिये, तुम्हारा व्यवहार अच्छा नहीं, तुम्हारा कोई मित्र नहीं, और न तुमने अपने सम्बन्धिजन के लिए अच्छे कार्य किये, तुम प्रत्येक बात में बड़ी स्थूल हो । इसी कारण तुम सभी को बड़ी असहमत बन रही हो ॥ १२८ ॥

विपरीत पथ्या-अयुजोर्लक्षणं ' ह्येतद्विपरीतन्तु यत्र च ।

पथ्या हि विपरीता सा विज्ञेया नामतो यथा " ॥ १२ ९ ॥

जिसमें प्रथम तथा तीसरे पाद के उपर्युक्त पथ्या के लक्षण विपरीत हो जाएँ तो उसे विपरीतपथ्या वृत्त जानो ॥ १२ ९ ॥

यथा -कृतेन रमणस्य किं सखि रोषेण तेऽप्यर्थम् ।

विपरीता न पथ्यासि, त्वं जड़े केन मोहिता ॥ १३० ॥

१. खलु भवेत् पूर्व — क ० । २. पथ्या स्तो ग्लौ चतुर्थं के — क ० । ३. एतदुदाहरणं ख — ग ० पुस्तकयो नं विद्यते । ४. युग्मयो — ग ० । ५. बुधैः – ख ०; ग ० । ६. एवं जडे केन मोहिता विपरीता न पथ्यासि - क ० ।

पृष्ठ 374

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षोडशोऽध्यायः २६३ तुमने अपने प्रिय पर रोष दिखला कर क्या कर लिया? ऐसा लगता है कि तुम मूर्ख हो और कुछ लोगों के द्वारा उभाड़ी जाने पर अव्यवस्थित मति ( मोहित ) हो रही हो । अतएव तुम इस समय बड़ी विपरीत या असहमत सी बन रही हो, जो ठीक नहीं है ॥ १३०

( अनुष्टुप् ) चपला-चतुर्थादक्षराद्यत्र त्रिलघु स्यादयुक्ततः ।

अनुष्टुप् - चपला ' सा तु विज्ञेया नामतो यथा ॥ १३१ ॥

यदि अनुष्टुप् वृत्त में चतुर्थ अक्षर से आगे पंचम, षष्ठ तथा सप्तम अक्षर

लघु हो तो उसे अनुष्टुप् - चपल । नाम अभिहित किया जाता है ॥ १३१ ॥

उदा ० - न खल्वस्याः प्रियतमः श्रोतव्यं व्याहृतं सख्या ।

नारदस्य प्रतिकृतिः कथ्यते चपला हीयम् ॥ १३२ ॥

यह उस ( कन्या ) का प्रियतम नहीं, यह बात मैंने अपनी सखी की जोर से बातचीत करने से जान ली । यह चंचला स्त्री सचमुच नारद की दूसरी प्रतिमा है ( जो कलह - प्रिया है ) ॥ १३२ ॥

विपुला-विपुला तु युजि ज्ञेया लघुत्वात् सप्तमस्य तु ।

सर्वत्र सप्तमस्यैव केषाञ्चिद्विपुला यथा ॥ १३३ ॥

यदि अनुष्टुप् वृत्त के दूसरे तथा चौथे पाद में सातवाँ अक्षर लघु हो तो ( अनुष्टुप् ) विपुला वृत्त होता है । कुछ विद्वानों के मत में सभी पादों के सातवें वर्ण के लघु होने पर विपुला होती है ॥ १३३ ॥

यथा - संक्षिप्ता वज्रवन्मध्ये हेमकुम्भ - निभस्तनि ।

विपुलासि प्रिये कट्यां, शरच्चन्द्र - निभानने ॥ १३४ ॥

हे प्रिये! तुम्हारा शरीर दुबला, तुम्हारा कटिभाग वज्र के समान पतला, उरोज सुवर्ण - कलश के समान, नितम्ब गुरु तथा विस्तीर्ण एवं मुख शारदीय चन्द्र के समान सुन्दर है ॥ १३४ ॥

१. बिपुला - ग ० । २. श्रूयते विपुला हीयम् - क ० । ३. विपुलैरनु - क ० । ४. प्रिये श्रोण्यांक ० । -56 EP 10 ५. पूर्णचन्द्रनिभानने — क ० ।

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२६४ नाव्यशास्त्रम्

यथा वा — गङ्गेव मेघोपगमे आप्लावित - वसुन्धरा ।

कूल वृक्षानारुजन्ती स्रवन्ती विपुलाचलात् ' ॥ १३५ ॥

तुम वर्षा के समय विद्यमान रहने वाली गंगा के समान पृथ्वी को लहरों से ठेलने वाली, किनारे के वृक्षों को ढहने वाली तथा ऊँचे पर्वतों से उतरने या गिरने वाली हो ॥ १३५ ॥

एवं विविधयोगास्तु पथ्यापादा भवन्ति हि । युग्मजविषमैः पादैः शेषैरन्यैस्त्रिकैरथ ं ॥ १३६ ॥

इस प्रकार पथ्या के पाद अनेक स्वरूप लिए हुए हैं । जो अपने सम, विषमपादों तथा शेष अन्य त्रिकों से निर्मित होते हैं ॥ १३६ ॥

सगुर्वन्तः सर्वलघुस्त्रिको नित्यं हि नेष्यते ।

प्रथमादक्षराद्यत्र चतुर्थात् प्राग्लघुः स्मृतः ॥ १३७ ॥

इस वृत्त में किसी त्रिक के अन्तिम वर्ण के गुरु वर्ण, ( उदा ० म ० य ० र ० स ० ) या लघु वर्णों में रखना ( न ० ) या रहना ही ( केवल ) प्रथम अक्षर के पश्चात् एवं चौथे अक्षर के होना ( ही ) वांच्छित है ॥ १३७ ॥

पथ्यावक्र- पथ्यापादं समास्थाय त्रीण्यन्ते तु गुरुण्यथ भवन्ति पादे सततं बुधैस्तद्वक्त्रमुच्यते यदि पथ्या के पाद में अन्त के तीन अक्षर गुरु हों वक्त्र ( अनुष्टुप् ) वृत्त जानो ॥ १३८ ॥

यथा - दन्तक्षताधरं सुभ्रु, जागरग्लाननेत्रान्तम् । v ' रति - सम्भोगखिन्नं ते दर्शनीयतमं वक्त्रम् ॥ १ अस्मादनन्तरं क — पुस्तके -इष्ट नहीं है । यहाँ पूर्व एक लघु वर्ण

॥ १३८ ॥

तो उसे ( पथ्या ) १३ ९ ॥ ' आगता मेघसमये भीरु भीरुकुलोद्गते । एकरात्री परगृहं चोरि बन्धन महंसि ॥ ' इति अधिकं समुपलभ्यते प्रक्षिप्तञ्च । २. विपुलयोगास्तु - ख ०; ग ० । ३. स्तथा ख ०; ग ० । ४. गुर्वन्तकः – ख ०, ग ० । ५. स्मृतम् - ग ० । ६. समान्यत्र — क ०; समास्थाप्य - ख ०; ग ० । ७. यत्र तद् - ख ०; ग ० । ८. नेत्रच ख ०, ग ० । ९. प्रातः सम्भोग — ग ० ।

पृष्ठ 376

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२६५ हे सुन्दरि, तुम्हारे अधर दन्तक्षतों से युक्त, जागरण से अलसाई कोने से युक्त आँखें तथा रति ( से थका हुआ तुम्हारा चेहरा और भी सुन्दर हो गया है ॥ १३ ९ ॥

इत्येषा सर्वविषमा नामतोऽनुष्टुवुच्यते ।

तद्विदां मतवैषम्यं त्रिकाक्षरतस्तथा ॥ १४० ॥

अनुष्टुप् जाति के सर्वविषम स्वरूप में ये भेद हो जाते हैं । इसमें आचार्यों का मतैक्य नहीं है कि ये त्रिकों से या अक्षरों से लक्षित किये जाएँ ॥ १४० ॥

वानवासिका

पादे षोडशमात्रास्तु गाथांशक - विकल्पिताः ।

चतुर्भिरंशकैज्ञेया वृत्तज्ञैर्वानवासिका ॥ १४१ ॥

यदि सोलह मात्राओं से बनने वाले पाद का गाथा छन्द ( जो कि चार भागों में विभक्त हो ) त्रिकों ( गणों ) के द्वारा या त्रिकों के भागों द्वारा निरूपण किया जाए तो उसे वानवासिका वृत्त कहते हैं * ॥ १४१ ॥

यथा - असंस्थितपदा सुविहलाङ्गी मदस्खलित चेष्टितैर्मनोज्ञा ।

क्क यास्यसि वरोरु सुरतकाले विषमा किं वानवासिका त्वम् ॥

हे सुन्दरि, तुम्हारी चाल लड़खड़ाती हुई. शरीर आवेगपूर्ण है और मधुपान के कारण तुम्हारी चेष्टाएँ बड़ी ही मधुर हैं । इस प्रणयानन्द के अवसर पर तुम पीछे हटकर कहाँ जा रही हो? क्या तुम विषमभावना वाली ( विरागयुक्त ) वनवासिनी स्त्री तो नहीं? ॥ १४२ ॥

केतुमतीजो गौ च प्रथमे पादे तथा चैव तृतीयके ।

केतुमत्यां गणाः प्रोक्ता भ्रौ न्गौ गश्च सदा बुधैः ॥ १४३ ॥

यदि प्रथम तथा तृतीय पाद में सगण, जगण, सगण तथा गुरु तथा द्वितीय और चतुर्थपाद में भगण, रगण, नगण तथा गुरु हों तो केतुमती वृत्त होता है ॥ १४३ ॥

* पिङ्गलाचार्य ने इसे मात्रासमक माना है जिसका प्रभेद वानवासिका होता है । १. द्विधामतं हि वैषम्यं - ख ०, ग ० । २. यस्या नित्यं भवन्ति हि — क ०; त्रिकांशक विकल्पिता ग ० । ३. सविह्वलाङ्गी — क ० ।

पृष्ठ 377

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२६६ नाट्यशास्त्रम् यथा — स्फुरिताधरं चकितनेत्रं ' रक्तकपोलमम्बुजदलाक्षम् । v किमिदं रूषापहृत - शोभं केतुमतीसमं वद मुखं ते ॥ १४४ ॥

तुम्हारे ओठ फड़क रहे है, कमलदल के समान नेत्र चंचल हो उठे हैं, और कपोल लाल हैं । बतलाओ तो भला, क्रोध के कारण यह मुँह अपने सौन्दर्य को क्यों नष्ट कर रहा है— जो ( आग की लपट ) के समान दिखाई दे रहा है? ॥ १४४ ॥

अपरवक्त्र वक्त्रस्यापरपूर्वस्य चादौ नौ रो लगौ त्रिकाः न जौ जरौ द्वितीये च शेषाग्रं पुनरेव तु यदि प्रथम और तृतीय पाद में नगण, नगण, रगण, लघु द्वितीय तथा चतुर्थ पाद में नगण जगण तथा रगण हों तो वृत्त कहते हैं ॥ १४५ ॥

द्वितीय व चतुर्थ पाद में नगण-लाल होकर कि केतुमती

॥ १४५ ॥

तथा गुरु और उसे अपरवक्त्र

यथा - सुतनु जलपरीतलोचनं * जलदनिरुद्धमिवेन्दुमण्डलम् ।

किमिदमपर- वक्त्रमेव ते ' शशिवदनेऽद्य मुखं पराङ्मुखम् ॥

अरी चन्द्रमुखी, तुम्हारी आँखें आँसुओं से लबालब क्यों भरी है? तुम्हारा मुँह ऐसा लग रहा है जैसे मेघों से ढ़का हुआ चाँद हो और तुम्हारा यह दूसरी ओर मोड़ा हुआ मुँह तो किसी दूसरे जैसा ही दिखने लगा है । यह सब क्या है ॥ १४६ ॥

पुष्पितामा

नौ य तु प्रथमे पादे न्जौ ज्रौ गश्च तथापरे ।

यत्र तत् पुष्पिताग्रा स्याद्यदि शेषन्तु पूर्ववत् ॥ १४७ ॥

यदि प्रथम तथा तृतीय पाद में नगण, नगण, रगण तथा यगण और १. चलित नेत्रं - क ०; कलितनेत्रं - ग ० ।२. शेषं - ख ० । ३. केतुमतिमुखाकृतिमुखं ते — ख ०; ग ० । ४. अपरवक्त्रस्यादी तु म्लौ गिति त्रिकं त्रिकम् । नजी जरी द्वितीये तु चतुर्थे पुनरेव तु ॥ क ० । ५. परतलोचने - ख ०; ग ० । ६. मम तु तथापि मनोहरं मुखम् — ख ०; ग ० । -७. नजी जो गस्तथा परे - ख ० ग ० । ८. पादे तु पुष्पिताग्राया यथैतावपरौ तथा - ख ० ० THIS

पृष्ठ 378

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षोडशाऽध्यायः २६७-दूसरे तथा चौथे पाद में नगण, जगण, जगण, रगण तथा गुरु हों तो पुष्पितामा वृत्त होता है ॥ १४७ ॥

यथा - पवनरय ' विधूतचारुशाखं प्रमुदितकोकिलकण्ठनादरम्यम् मधुकर परिगीयमान- शब्दं वरतनु पश्य वनं सुपुष्पिताग्रम् ॥ १४८ ॥

सुन्दरि, पुष्पों से अलंकृत इस वन को ( सिरे तक ) देख जाओ । इसमें पवन के वेग से टहनियाँ हिल रही हैं, कोकिल आनन्द में आलाप कर रहे हैं और भरे चारों ओर गूँज रहे हैं ॥ १४८ ॥

उद्गता

जौ स्लो चादौ यथा न्सौ ज्गौ भ्रौ उलौ गश्च तथा पुनः ।

रजौ स्जौ गश्च त्रिका ह्येते उद्गतायाः प्रकीर्तिताः ॥ १४ ९ ॥

जिसके प्रथम पाद में सगण, जगण, सगण तथा लघु हो, द्वितीय पाद में नगण, सगण, जगण तथा गुरु, तृतीय पाद में भगण, जगण, लघु तथा गुरु और चतुर्थ पाद में सगण, जगण, सगण तथा गुरु हो तो उद्गता वृत्त होता है ॥ १४ ९ ॥

यथा - तव रोमराजिरतिभाति, सुतनु मदनस्य मञ्जरी ।

नाभिकमलविवरोत्पतिता, भ्रमरावलीव कुसुमात्समुद्गता ॥

हे सुन्दरि, तुम्हारी यह रोमावाली - जो नाभिकमल के मध्य से ऊपर की ओर उठ रही है, पुष्पों पर से जा उड़ने वाली भौरों की कतार-जो कामदेव की कुसुमंजरी पर बैठी हो — के समान अतिशय शोभित हो रही है ॥ १५० ॥

ललिता

जौ लौ च ततो न्सौ ज्गौ नौ सौ चेति तृतीयके ।

स्जौ स्जौ गश्च चतुर्थे तु ललिताया गणाः स्मृताः ॥ १५१ ॥

१. पवनबल - क ० । २. रवगीयमानवृक्षं - ख ०; ग ० । ३. जो ज्ली गश्च तृतीये स्युः स्जी स्जी गश्च तुरीयके । एते त्रिकाः क्रमप्राप्ता उद्गतायां प्रकीर्तिताः ॥ - ख ०; ग ० । ४. कमले - ख ०; ग ० । ५. कुसुमे समुद्गता - ख ०, ग ० । ६. स्जौ जश्च ललितापादे न्सौ जो गश्च द्वितीयके । नी सो चैव तृतीये तु द्विः स्जो गश्च चतुथंके ॥ख ०; ग ० । 2

पृष्ठ 379

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२६८ नाट्यशास्त्रम् जिसके प्रथमपाद में सगण, जगण, सगण तथा लघुः द्वितीय पाद में नगण, सगण, जगण और गुरु, ( अर्थात् प्रथम दो पाद उद्गता के समान हों ) तृतीय पाद में दो नगण और दो सगण तथा चतुर्थ पाद में सगण, जगण, सगण, जगण और एक गुरु हो तो ललिता नामक वृत्त होता है ॥ १५१ ॥

यथा - ' ललिता कुलभ्रमित ' - चारुवसनकरचारुपल्लवा प्रविकसित कमलकान्तिमुखी प्रतिभासि देवि सुरतश्रमातुरा । हे सुन्दरि, तुम अपने विकसित कमल के समान शोभा वाले मुँह से अतिशय सुशोभित हो रही हो ( और सम्प्रति ) शीघ्र सुकुमारता पूर्वक चलने पर सुन्दर लगने वाले तुम्हारे वस्त्र तथा हाथ भी बड़े अच्छे लग रहे हैं ॥ १५२ ॥

एवमेतानि वृत्तानि समानि विषमाणि च नाटकाद्येषु काव्येषु प्रयोक्तव्यानि सूरिभिः ॥ १५३ ॥

ये सम तथा विषम प्रकार के वृत्त हैं जिनका नाटक तथा काव्य में सुधिजन प्रयोग करें ॥ १५३ ॥

सन्त्यन्यान्यपि वृत्तानि यान्युक्तानीह पिण्डशः ” ।

न च तानि प्रयोज्यानि हतशोभानि तानि हि ॥ १५४ ॥

इसके अतिरिक्त अनेक प्रकार के अन्य मात्रिक वृत्त भी होते हैं, जिन्हें सामूहिक रूप में बतलाया गया पर उनका ( अप्रचलित स्वरूप हो तो ) प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि वे किसी प्रकार रचनासौन्दर्य को नहीं बढ़ाते हैं ॥ १५४ ॥ FTHE

यान्यत्र प्रतिषिद्धानि गीतके तानि योजयेत् ।

' धुवायोगे तु वक्ष्यामि तेषामेव ' विकल्पनम् ॥ १५५ ॥

१. ललितावलि भ्रमरजासु वदनकरचारुपल्लवा । ललितासुतासुतनु वदतेऽद्य लोचने वलिता लतेव २. भ्रमिवाहवसन करपल्लवा हि मे - ख ०; ग ० । ३. कमलकान्तमुखि प्रतिभासि - ख ०, ग ० । ४. नाटकादिषु ग ० । ५. पण्डितः - ख ०; ६. न शोभां जनयन्ति हि - ख ० । ७. यान्यतः परमत्र स्यु - ख ०; ग ० । चलबालपल्लवा 11 - क ० । ग ० । ८. ध्रुवाविधाने व्याख्यास्ये – ख ०; ग ० । ९. तेषाञ्चैव ख ०; ग ० ।

पृष्ठ 380

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षोडशोऽध्यायः - २६ ९ जो मात्रिक वृत्त यहाँ छोड़ दिये गए हैं उनकी गीत में योजना की जाए । इनका विशेष वर्णन ध्रुवाओं के वर्णन के अवसर पर किया जाएगा ॥ १५५ ॥

आर्या वृत्त-वृत्तलक्षणमेवन्तु समासेन मयोदितम् अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि ह्यार्याणामपि लक्षणम् ॥ १५६ ॥

यहाँ मैंने संक्षेप में वृत्तों का लक्षण और स्वरूप बतलाया । अब मैं आर्या के लक्षण बतलाता हूँ ॥ १५६ ॥

पथ्या च विपुला चैव चपला मुखतोऽपरा ।

जघने चपला चैव आर्याः पञ्च प्रकीर्तिताः ॥। १५७ ॥

आर्या के पाँच प्रकार होते हैं - ( १ ) पथ्या, ( २ ) विपुला, ( ३ ) चपला, ( ४ ) मुखचपला तथा ( ५ ) जघनचपला ॥ १५७ ॥

आसान्तु सम्प्रवक्ष्यामि यतिमात्राविकल्पनम् ।

लक्षणं नियमञ्चैव विकल्पगुणसंश्रयम् ॥ १५८ ॥

अब मैं इन आर्याओं के लक्षण एवं उनमें होने वाली यति तथा मात्राएँ, उनके भेद तथा विकल्प के ( गुरु, लघु के विकल्प के ) नियम आदि बतलाता हूँ ॥ १५८ ॥

यतिश्छेदस्तु विज्ञेयश्चतुर्मात्रो गणः स्मृतः ।

द्वितीयान्त्यौ युजौ पादावयुजौ त्वपरौ स्मृतौ ॥ १५ ९ ॥

यति कहते हैं पाद के विभाग ( छेद ) को और ( इन आर्या आदि मात्रिक वृत्तों में ) गण चार मात्रा का होता है । द्वितीय तथा चतुर्थ पाद ( युग् ) या सम तथा प्रथम और तृतीय पाद को असम या अयुग् पाद कहते हैं ॥ १५ ९ ॥

गुरुमध्यविहीनस्तु चतुर्गणसमन्वितः ।

अयुग्गणो विधातव्यो युग्गणस्तु यथेप्सितः ॥ १६० ॥

( आर्या में ) मध्य - गुरु - गण ( अर्थात् जगण ) को छोड़कर शेष सभी १. मेतत्तु - ख ०; ग ० । २. आर्याणा - ख ०; ग ० । ३. आसामचैव प्रवक्ष्यामि - ख ०; ग ० । ४. लक्षणैनियताशैश्च विकल्पान् गणसंश्रितान् - ख ०, ग ० । ५. शेषौ चैवायुजी स्मृती - ख ०; ग ० । ६. युग्गणः पञ्च चैव तु — ख ०; ग ० ।