भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 461–470
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 461–470
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३५० नाट्यशास्त्रम् जो पुरुष या स्त्रीपात्र नौकर हों उन्हें तथा कलाकार ' ( शिल्पी ) या उसकी पत्नी आदि को उनके स्थिति व्यवसाय या पदानुसार सम्बोधित किया जाए ॥ ९ ॥
मान्यो ' भावेति वक्तव्यः किञ्चिदूनस्तु मार्षकः । सामान्य पुरुष को ' माघर तथा उससे कम स्थिति वाले पुरुष को
' मारिष ' शब्द से सम्बोधित किया जाए ।
समान अवस्थावालों के सम्बोधन-' समानोऽथ वयस्येति ह हो हण्डेति चाधमः ॥ १० ॥
समान अवस्था वाले पुरुष एक दूसरे को ' वयस्य " शब्द से तथा अधम पुरुष को ' हंहो ' शब्द से सम्बोधित करें ॥ १० ॥
सूत का रथी पुरुष को सम्बोधन-आयुष्मन्निति वाच्यस्तु रथी ' सूतेन सर्वदा । सूत्र के द्वारा रथ में स्थित पुरुष को ' आयुष्मन् " शब्द से सम्बोधित
किया जाए ।
" तपस्वीति प्रशान्तस्तु साधो इति च शब्द्यते ॥। ११ ॥
तपस्वी और प्रशान्त स्वभाव के व्यक्ति को " ' साधो ' शब्द से सम्बोधित किया जाए ॥ ११ ॥
१. जैसे माल ० वि ० नाट ० में राजा को हरदत्त द्वारा किया गया सम्बोधन माल ० वि ० २।१२।४ ) । व जैसे २. जैसे शकार का ' विट ' को ' भाव शब्द से सम्बोधन करना अवि ० ना ० ( भास ) में सूत्रधार का पारिपार्श्विक को ' मारिष ' सम्बोधन । ३. जैसे ' मुद्रा ' ० रा ० नाटक में सामिद्धार्धक और सुसमिद्धार्थंक के परस्पर सम्बोधन तथा चाणक्य का शिष्य को ' हं हो ब्राह्मण ' सम्बोधित करना । ४. जैसे — शाकु ० में ( अंक २ ) में सूत का दुष्यन्त को सम्बोधन तथा शा ० ( अं ० ५ ) में पुरोहित का दोनों तपस्वी कुमारों को सम्बोधन करना । ५. ' साधु ' शब्द द्वारा सम्बोधित करने का उल्लेख सम्प्रति किन्हीं नाटकों में प्राप्त नहीं होता । १ मार्षो क ० । २. समानो हि - ख; ग ० । ३. होहं वा इति वाधमः — ग ० । ४. सूते तु सर्वथा - क ० । ५. तपस्वी च प्रशान्तश्च साधो इति हि शब्द्यते - ख ० ग ० ।
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एकोनविंशोऽध्यायः ३५१ सेवकों का राजकुमार के प्रति सम्बोधन— स्वामीति युवराजस्तु कुमारो भर्तृदारकः । सेवकों के द्वारा युवराज राजकुमार को ' स्वामी ' शब्द से तथा शेष
राजकुमारों को ‘ भर्तृदारक ' शब्द से सम्बोधित किया जाए ।
सोम्य भद्रमुखेत्येवं हे पूर्वञ्चाधमं वदेत् ॥ १२ ॥
अधम पात्र को हे ( अरे ) शब्द को पूर्व में प्रयुक्त करते हुए " सौम्य २ या ' भद्रमुख ' शब्द से सम्बोधित किया जाए ॥ १२ ॥
यद्यस्य कर्म शिल्पं वा विद्या वा जातिरेव वा ।
स तेन नाम्ना सम्भाष्यो नाटकादौ प्रयोक्तृभिः ॥ १३ ॥
नाटक में जिस व्यक्ति का जो कार्य, हुनर ( शिल्प ) विद्या, जाति, जन्म ( कुल ) या उसकी अवस्था या स्थिति हो तो उसके अनुरूप ही उसे उसी नाम से सम्बोधित किया जाए ॥ १३ ॥
वत्स पुत्रक तातेति नाम्ना गोत्रेण वा पुनः ।
वाच्यः शिष्यः सुतो वापि पित्रा ' वा ' गुरुणापि वा ॥ १४ ॥
१. इस प्रकार ' स्वामी ' शब्द से युवराज को सम्बोधित करने के बजाय नाटकों में प्रायः राजा को सम्बोधन करना प्राप्त होता | जैसे स्वप्न-वासवदत्त में यौगन्धरायण का उदयन को सम्बोधित करना, आदि । इसी प्रकार युवराज या राजकुमार के लिये एक सामान्य शब्द का प्रयोग मिलता है । जैसे प्रतिमा में प्रतिहारी राम को भर्तृदारक शब्द से सम्बोधित करती है, स्वामि शब्द से नहीं । ( दे ० प्र ० ना ० ११२१ ९ ) । हां, इस सन्दर्भ में ' कुमार ' शब्द द्वारा सम्बोधित किया जाना अवश्य मिलता है । जैसे प्रतिमा अं ० ३ में भरत का सम्बोधन तथा इसी प्रकार मुद्रा ० रा ० में मलयकेतु को भी । ' सौम्य ' शब्द का नाटकों में प्रयोग कम मिलता है पर भद्र या भद्रमुख शब्द का प्रयोग यत्र तत्र अवश्य मिलता है । जैसे प्रतिमा और शाकु ० में । २. इस नियम के अधिक उदाहरण नहीं मिलने पर इसका उदाहरण मृच्छ क ० में चारूदत के पुत्र द्वारा चाण्डालों को किया गया सम्बोधन कदाचित् हो सकता है । १. भाष्यो हि — क ० । २. नाटकादिषु योक्तृभिः क ० । ३. नाटके नाव्यकोविदैः — क ० । ४. गुरुणाऽथवा — ग ० ।
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नाट्यशास्त्रम् ३५२ या पुत्र को गुरु के द्वारा वत्स, पुत्र, तात या उसके गोत्र अपने शिष्य या नाम से सम्बोधित किया जाए ॥ १४ ॥
शाक्य निर्ग्रन्था ' भदन्तेति प्रयोक्तृभिः । सम्माया साधुओं को ' भदन्त ' शब्द से सम्बोधित करना बौद्ध तथा जैन
चाहिये । ॥
आमन्त्रणैस्तु पाषण्डा शेषाः स्वसमयाश्रितैः पाशुपत आदि सम्प्रदाय के साधुओं को उनके अपने सम्बोधनों अन्य से सम्बोधित करना चाहिए ॥ १५ ॥
देवेति नृपति वच्यो भृत्यैः प्रकृतिभिस्तथा ।
नित्यं परिजनेन तु ॥
१५ ॥
नियमानुसारी १६ ॥ भट्टेति सार्वभौमस्तु सेवकों के द्वारा ' देव ' शब्द से सम्बोधित राजा को अपने प्रजाजन तथा राजा हो तो सदा इसे ' भट्ट ' या करना चाहिए । परन्तु यदि यही सार्वभौम भर्ता ‘ ' शब्द से सम्बोधित करना चाहिए ॥ १६ ॥
ह्यपत्यप्रत्ययेन वा । राजन्नित्यृषिभिर्वाच्यो वा भवेद्वाच्यो महीपतिः ॥ १७ ॥
वयस्य राजन्निति च भवतीत्यपि ।
विदूषकेण राशी च चेटी ॥ १८ ॥
नाम्ना वयस्येत्यपि वा राज्ञा वाच्यो विदूषकः ( जैसे पुरुवंश के ऋषिगण के द्वारा राजा को उसके कुलागत नाम विदूषक के लिए " पौरव ” शब्द ) द्वारा सम्बोधित करना चाहिए और जाए । को " वयस्य ' तथा ' राजन् ' शब्द से सम्बोधित किया को द्वारा राजा ) के द्वारा महारानी तथा उनकी दासियों तथा इसी ( विदूषक किया जाए तथा राजा भी विदूषक को उसके ' भवती ' शब्द से सम्बोधित करे ॥ १७-१८ ॥ नाम या फिर ‘ वयस्य ' शब्द से सम्बोधित
पतिर्वाच्यः आर्यपुत्रेति यौवने ।
सर्वस्त्रीभिः महाराजेति भूपतिः ॥ १ ९ ॥
" अम्यदा पुनरार्येति १. भद्रं ते क ० । —ग ० । २. शेषां स्वयमुपागतैः — ख ०; शेषास्तु समयाश्रितैः वा क ० । ४. हि - ख ०, ग ० । ३. परिजनेन ५. चेट्या च - ख ०; ग ० । ६. पद्यार्धमेतत् ख ० पुस्तके नास्ति ।
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एकोनविंशोऽध्यायः ३५३ सभी स्त्रियों को यौवन में अपने पति को ' आर्यपुत्र ' शब्द से सम्बोधित करना चाहिए । परन्तु कुछ अवस्थाओं में पति को केवल ' आर्य ' शब्द से भी सम्बोधित किया जा सकता है । यदि पति राजा हो तो उसे महारानी द्वारा ' महाराज ' शब्द से सम्बोधित किया जाए ॥ १ ९ ॥
आर्येति पूर्वजो भ्राता वाच्यः पुत्र इवानुजः ' ।
पुरुषाभाषणं ह्येवं कार्य नाट्ये प्रयोक्तृभिः ॥ २० ॥
बड़े भाई को ' आर्य ' शब्द से तथा छोटे भाई को अपने पुत्र के समान उपयुक्त शब्द द्वारा सम्बोधित करना चाहिए । पुरुष पात्रों के द्वारा नाटकों में सम्बोधन का यही विधान है ॥ २० ॥
पुनः स्त्रीणां प्रवक्ष्यामि यथाभाष्यास्तु नाटके ।
तपस्विन्यो देवताश्च वाच्या भगवतीति च ॥ २१ ॥
अब मैं स्त्रियों के द्वारा स्त्रियों के प्रति नाटक में किये जाने वाले सम्बोधन शब्द बतलाता हूँ । तपसी स्त्रियाँ तथा देवी को भगवती ' ' शब्द से सम्बोधित किया जाए ॥ २१ ॥
गुरुभार्या तु वक्तव्या स्थानीया भवतीति च । पूज्य गुरुजन की पत्नियों या अन्य ज्येष्ठावस्था की स्त्रियों ( स्थानीय )
को ' भवती ' शब्द से संम्बोधित किया जाए ।
नाम्या ' च भद्रेति वाच्या ' वै वृद्धाम्बेति च नाटके ॥ २२ ॥
पहुंच या भेंट के उपयुक्त ग्रामीण स्त्री ( ग्राम्या ) को ' भद्रे ' तथा बूढ़ी स्त्री को ' अम्बा ' ( माता शब्द से भी ) शब्द से सम्बोधित करना चाहिए ॥ २२ ॥
महारानी के प्रति सम्बोधन शब्द-राजपत्नस्तु सम्भाष्याः सर्वाः परिजनेन वै ।
भट्टिनी स्वामिनी ' देवीत्येवं वै नाटके बुधैः ॥ २३ ॥
१. अस्मादनन्तरं — योषिद्भिरथ काम्येति राजपुत्रेति योधनैः । इति पद्यार्धमधिकं क — पुस्तके दृश्यते । २. स्त्रीणाञ्च वक्ष्यामि संभाषां नाटकाश्रयाम् - ग ० । ३. गुरुरार्येति — क ० । ४. गम्याक ० । ५. वक्तव्याख ०, ग ० । ६. वृद्धा वाच्येति नाटके ग ० । ७. राजपुत्र्यस्तु — क ०; राजपत्न्यश्च - ग ० । ८. स्वामिनीत्येवं सर्वदा – क ०; देवी इत्येवं ख ०, ग ० क २३ ना ० शा ० द्वि ०
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३५४ नाट्यशास्त्रम् नाटक में राज पत्नियों को सेवक तथा परिचारिकाओं के द्वारा भट्टिनी, स्वामिनी तथा देवी शब्द से सम्बोधित किया जाए ॥ २३ ॥
देवीति महिषी वाच्या राज्ञा परिजनेन वा ।
भोगिन्यः परिशिष्टास्तु स्वामिन्य इति वा पुनः ॥ २४ ॥
" इनमें पटरानी को ' देवी ' शब्द से परिजन तथा राजा के द्वारा भी सम्बोधित किया जाए । राजा की शेष पत्नियों को परिजन ' भट्टिनी ' या " " स्वामिनी ' शब्द से सम्बोधित करे ॥ २४ ॥
राजकुमारियों के लिये सम्बोधन-कुमार्यश्चैव वक्तव्याः प्रेष्याभिर्भर्तृदारिकाः । अविवाहित राजकुमारियों को ( उनकी ) दासियां ' भर्तृदारिका ' शब्द से
सम्बोधित करें ।
स्वसेति भगिनी वाच्या ' वत्सेति च यवीयसी ॥ २५ ॥
बड़ी बहिन को ' भगिनी ' तथा छोटी बहिन को ' वत्से ' शब्द से सम्बोधित करना चाहिए ॥ २५ ॥
ब्राह्मणी, भिक्षुणी, आदि के सम्बोधन शब्द-ब्राह्मण्यार्येति वक्तव्या लिङ्गस्था व्रतिनी च या । ब्राह्मणी, साधुनी या व्रतधारिणी स्त्री को ' आय ' शब्द से सम्बोधित
करना चाहिए ।
पत्नी के प्रति सम्बोधन शब्द-पत्नी चार्येति सम्भाष्या पितृनाम्ना सुतस्य वा ॥ २६ ॥
अपनी धर्मपत्नी को ' आर्या ' शब्द से या पिता और पुत्र के नाम से सम्बद्ध करते हुए शब्दों से सम्बोधित किया जाए ॥ २६ ॥
स्त्रियों के अपनी सखियों के प्रति सम्बोधन समानाभिस्तथा सख्यः हलेति स्यात् परस्परम् । १. भट्टिन्यः इति शेषास्तु - ख ० ग ० । २. पद्यार्धमेतत् ख ० ग ० पुस्तकयोर्नास्ति । ३. ज्येष्टा वत्सेति चानुजा - ख ०; ग ० । ४. पितुर्नाम्ना - ख ०; ग ० । ५. सा- ख ०; ग ० । ६. सख्यो हला भाष्याः परस्परम् - ख ०; ग ० । आ
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एकोनविंशोऽध्यायः ३५५ स्त्रियों की जो हमजोल या समवयस्का सखियाँ हों उन्हें वे परस्पर ' हला ' शब्द से सम्बोधित करें । स्त्रियों के दासी के प्रति सम्बोधन शब्द-प्रेष्या इति वक्तव्या स्त्रिया ' यत्तूत्तमा भवेत् ॥ २७ ॥
उत्तम स्त्रियों के द्वारा सेविका या दासी को ' हंजे ' शब्द से सम्बोधित करना चाहिए ॥ २७ ॥
वेश्या के प्रति सम्बोधन शब्द-अज्जुकेति च वक्तव्या वेश्या परिजनेन च ।
अन्तेति गणिकामाता वाच्या परिजनेन हि ॥ २८ ॥
वेश्या को उसके परिचारक, सेवक आदि के द्वारा ' अज्जुका ' शब्द से सम्बोधित किया जाए और जब यही वृद्धा हो तो ' अत्ता ' शब्द से सम्बोधित करना चाहिए ॥ २८ ॥
प्रणयावस्था में पत्नी के लिये सम्बोधन शब्द-प्रियेति भार्या शृङ्गारे वाच्या राज्ञेतरेण वा । पुरोधः सार्थवाहानां भार्यास्त्वार्येति सर्वदा ॥ २ ९ ॥ प्रणयावस्था में राजा के अतिरिक्त सभी पुरुष पत्नी को ' प्रिये ' शब्द से सम्बोधित करें परन्तु पुरोहित और सार्थवाह की पत्नी को सदा ' आ ' शब्द से सम्बोधित किया जाए ॥ २ ९ ॥ नाटक में पात्रों के नाम एवं उनकी विधि ---' तल्लिकार्थानि नामानि कार्याणि कविभिः सदा । औत्पत्तिकानि यानि स्युर प्रख्यातानि नाटके ॥ ३० ॥
tear को नाटक में अप्रेख्यात पात्रों के ऐसे नाम जो कल्पित हों तो वे उनके गुण आदि से सम्बद्ध यौगिक रूप में ही रखना चाहिए ॥ ३० ॥
१. स्त्रियो या तुत्तमा - ख ०; ग ० । २. भवेद्वाच्या — खः; भवेद्वेश्या वाच्या परिजनेन तु ग ० । ३. या त्वत्र वृद्धा सा त्वत्ता भाष्या परिजनेन तु — क ० ग ० ४. नाटयजनेन - ख ० ग ० । ५. नार्यस्त्वार्येति ग ० ६. तल्लिप्सार्थानि — क ०; तल्लिङ्गस्थानि - ग ० ।
७. द्विजाः - क ० ख ० ।
८. स्युनं प्रत्याख्याति क; न प्रत्याख्यानि – ख ०; ग ० ॥
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३५६ नाट्यशास्त्रम्
ब्राह्मण तथा क्षत्रिय पात्र के नाम--' ब्रह्मक्षत्रस्य नामानि गोत्रकर्मानुरूपतः ।
काव्ये कार्याणि कविभिः शर्मवर्मकृतानि हि ॥ ३१ ॥
भी ब्राह्मण तथा क्षत्रिय पात्रों के नाम उनके गोत्र तथा कर्म के इनमें जाएँ तथा उनके अन्त में शर्मन् या वर्मन् शब्द को रखा अनुरूप रखे जाए ॥ ३१ ॥
वैश्य तथा शूरों के दत्तप्रायाणि शौर्योदात्तानि वैश्य पात्र के नाम औदार्य आदि गुणों के
नाम-नामानि वणिजां सम्प्रयोजयेत् ।
नामानि तथा शूरेषु ' योजयेत् ॥
‘ दत्त ' शब्द से युक्त और शूरों के नाम सूचक रहने चाहिए ॥ ३२ ॥
रानियों तथा वेश्या के नाम-३२ ॥ उनके शौर्य,
विजयार्थानि नामानि ' राजस्त्रीणाश्च नित्यशः ।
दत्ता ' मित्रा च सेना च वेश्यानामानि योजयेत् ॥ ३३ ॥
राज - पत्नियों के नाम विजय परक अर्थ के सूचक रखने चाहिए तथा वेश्याओं के नाम दत्ता, मित्रा तथा सेना शब्दान्त रखे जाएं ॥ ३३ ॥
दासी ( प्रेष्या ) के नाम -नाना कुसुमनामानः प्रेष्याः कार्यास्तु नाटके ।
नाटक में प्रेष्याओं ( दासियों ) के नाम विविध पुष्पों पर रखे जाएं ।
चेट के नाम-मङ्गलार्थानि नामानि चेटानामपि योजयेत् ॥ ३४ ॥
' वेट ' ( आदि ) के नाम मंगलार्थ को लिए हुए रखे जाएं ॥ ३४ ॥
१. ब्राह्मक्षत्रस्य – ग ० । २. धर्मकर्मा - क ० । ३. शर्मवर्मेति तानि हि — क ० । ४. शर्मवर्मेति तानि हि — क ० । ५. अस्मादनन्तरं - कापालिकास्तु घण्टान्तनामानः समुदाहृताः । इति पद्यार्धमधिकं प्रक्षिप्तञ्च क पुस्तके वर्तते । ६. शूरे प्रयोजयेत् — क ० । ७. राजस्त्रीणाञ्च कारयेत् — ख; राज्ञां स्त्रीणाञ्च कारयेत् — ग ० । ८. दत्तां मिश्राञ्च सेनाञ्च क ० । ९. वेश्या मित्राणि कारयेत् -क ० । १०. कारयेत् — ग ० ।
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एकोनविंशोऽध्यायः ३५७
उत्तम पात्रों के नाम-गम्भीरार्थानि नामानि ' ह्युत्तमानां प्रयोजयेत् ।
यस्मान्नामानुसदृशं कर्म तेषां भविष्यति ॥ ३५ ॥
उत्तम पात्रों के नाम किसी गम्भीर अर्थ के सूचक रखे जाए क्योंकि उनक कार्य उनके नाम के अनुरूप ही नाटकादि में रहते हैं ॥ ३५ ॥
अन्य पात्रों के नाम-जातिचेष्टानुरूपाणि शेषाणामपि योजयेत् ।
नामानि पुरुषाणाञ्च * स्त्रीणाञ्चोक्तानि तत्वतः ॥ ३६ ॥
एवं " नामविधानन्तु कर्तव्यं कविभिः सदा । ( इसके अतिरिक्त ) शेष पात्रों के नाम उनके जन्म, जाति तथा कार्य के अनुसार रखना चाहिए । इस प्रकार स्त्री तथा पुरुषों के नाटक में रहने वाले औचित्यपूर्ण वर्णन कर दिया । नाट्यकार को अपनी रचना में इसी विधान के अनुसार रखने चाहिए ॥ ३६-३७ ॥ एवं भाषाविधानन्तु ज्ञात्वा कर्माण्यशेषतः ॥ ततः पाठ्यं प्रयुञ्जीत पडलङ्कारसंयुतम् । १. यद्यपि नाट्य शास्त्र में सम्बोधन एवं नाम रखने के नामों का मैंने पात्रों के नाम ' ३७ ॥ विविध नियम बतलाए परन्तु इनके अनुसार सम्बोधन वर्तमान नाट्यरचनाओं में उपलब्ध नहीं होते । इससे प्रतीत होता है कि नाट्यशास्त्रीय अध्ययन या प्राचीन शास्त्रीय परिपाटी की शिथिलता ही इसमें मूलभूत कारण हुई । यह भी हो सकता है कि इन नियमों की अधिक अपेक्षा न रहने के कारण ही शायद उपेक्षा की गई हो । १. योजयेदुत्तमेषु च - ख ०; ग ० । २. कस्मान्नामानुक ० । ३. कारयेत् — ख ०; ग ० । ४. पुरुषाणान्तु — ख ०, ग ० । ५. नामाभिधानन्तु — ग ० । ६. कविभिस्त्वथ — ग ० । ७. भाषाविधानानि - क ०; भाषाविधानादि ज्ञात्वा सर्वमशेषतः - ख ०; ग ० । ८. पद्यार्धस्यास्य पाठान्तरं क – ( भ. ) पुस्तके – ' भाषाविधानं विज्ञेयं ततः प्रकृतिसम्भवम् । ' इति । ९. संश्रयम् - क ० । १०. ततः पाठ्यस्य वक्ष्यामि गुणांश्च द्विजसत्तमाः । स्वरै षड्जादिभिर्युक्तं नानारससमन्वितम् । क ० (? )
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३५८ नाट्यशास्त्रम् इस प्रकार विस्तारपूर्वक भाषा विधान आदि को ठीक तरह से जानकर नाट्यकार को छः अलंकारों से युक्त ' पाठ्य ' की योजना करनी चाहिए ॥ ३७-३८ ॥ पाठ्य के गुण एवं स्वरूप-पाठ्यगुणानिदानीं वक्ष्यामः । तद्यथा - सप्तस्वराः, त्रीणि स्थानानि चत्वारो वर्णाः, द्विविधा काकुः, पडलङ्काराः षडङ्गानीति । एषामिदानीं ' लक्षणमभिव्याख्यास्यामः । तत्र सप्तस्वराः नाम षड्ज-भगान्धारमध्यम पञ्चमधैवतनिषादाः । त एते रसेषूपपाद्याः । यथा-` अब मैं ' पाठ्य ' के गुणों का वर्णन करता हूँ । इसमें सात स्वर, तीन स्थान, चार वर्ण, दो प्रकार की काकु, छः अलंकार तथा अब मैं क्रमशः उनके लक्षण बतलाता हूँ! सात स्वर हैं –षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, निषाद | इन स्वरों के विभिन्न रसों के अनुसार उपयुक्त में रखना चाहिए । विभिन्न रसों के अनुकूल सात स्वर-हास्य शृङ्गारयोः कार्यौ स्वरौ मध्यमपञ्चमी षड्जर्षभौ तथा चैव वीररौद्राद्भुतेष्वथ गान्धारश्च निषादश्च कर्तव्यौ करुणे रसे धैवतश्चैव कर्तव्यो बीभत्से सभयानके पांच अंग होते हैं । पंचम, धैवत तथा एवं अनुकूल स्थिति ॥ ३८ ॥
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॥ ३ ९ ॥
। हास्य तथा शृंगार रस में मध्यम तथा पंचम स्वर तथा वीर, रौद्र और अद्भुत रस में षड्ज और ऋषभ स्वर रखना चाहिए । करुणरस में गान्धार तथा निषाद और बीभत्स और भयानक रस में धैवत स्वर रखा जाए ॥ ३८-४० ॥ स्वरों के तीन स्थान तथा उनका उपयोग-श्रीणि स्थानानि — उरः कण्ठ शिरः इति । भवत्यपि च-शारीर्यामथ वीणायां त्रिभ्यः स्थानेभ्य एव च ॥ ४० ॥
१. लक्षणान्यभिधास्यामः क ०, स्तेषामिदानीं लक्षणान्यभिव्याख्यास्यामः ग ० । २. च कर्तव्यो — क ० । ३. निषादश्चैव गान्धारः करुणे संविधीयते । क ० । ४. त्रीणि स्थानान्युरः कण्ठशिरांसीति भवन्त्यपि । - ख ०, ग ० । ५. भवति चात्र श्लोकः - क ० ।
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एकोनविंशोऽध्यायः ३५ ९ ' उरसः शिरसः कण्ठात् स्वरः काकुः प्रवर्तते । स्वरों के तीन स्थान हैं उरस्थल, कण्ठ तथा शीर्ष । जैसे - I मानव ये शरीर में है उसी प्रकार वीणा में स्वर के तीन स्थान नियत होते हैं । वे हैं — छाती, कण्ठ तथा मस्तक ' ॥ ४०-४१ ॥ आभाषणञ्च दूरस्थे शिरला सम्प्रयोजयेत् ॥ ४१ ॥
नातिदूरे च कण्ठेन ह्युरसा चैव पार्श्वतः । बहुत दूरी पर स्थित किसी व्यक्ति को बुलाने में शीर्षस्वर को उच्चारित किया जाए । जो थोड़ी दूरी पर स्थित हो उसे कण्ठ - स्वर से तथा जो समीप हो उसे छाती के स्थान से निस्सृत स्वर से बुलाया जाए ॥ ४१-४२ ॥ " उरसोदाहृतं वाक्यं शिरसा दीपयेद् बुधः ॥ ४२ ॥
“ कण्ठेन शमनं कुर्यात् पाठ्य योगेषु सर्वदा । पाठ्य स्वर के पाठ के समय जब किसी वाक्य को छाती के स्थान से सस्वर प्रारंभ किया जाए तो उसे शीर्ष स्थान तक खींचना चाहिए तथा कण्ठ स्थान पर उतारना चाहिए ॥ ४२-४३ ॥ १. स्वरों की उत्पत्ति नाद से हुई । जीवात्मा जब बोलने की इच्छा करता करता है तो सर्व प्रथम उसे मानसिक प्रेरणा होती है । मन शरीर में स्थित अग्नि को प्रेरित करना है अग्नि पवन को और पवन नाभि स्थान से उठकर क्रमशः हृदय, कंठ और सिर ( शीर्ष ) में गति उत्पन्न करते हुए अन्त में मुख द्वारा ध्वनिरूप में प्रकट होता है । इस नाभि स्थान से उत्पन्न ध्वनि को सूक्ष्म रूप में ' नाद ' कहा जाता है । इस नाद के तीन प्रकार हैं । हृदय से उत्पन्न नाद को मन्द्र, कंठ से उत्पन्न नाद को मध्य तथा शीर्ष में उत्पन्न नाद को तार कहते हैं । यहां इसी आशय से स्वरों के स्थानों का शास्त्रकार द्वारा निर्देश किया गया है । १. उरसा शिरसा - क ० । २. आभाषणं तु दूरस्थं शिरस्थेन स्वरेण हि । कण्ठेन नातिदूरे स्यादुरसा चैव - क ० । ३. नातिदूरे च कण्ठे च ह्युरसा च समीपतः । - ख ०; नातिदूरेऽपि कण्ठेना-प्युरसा चापि पार्श्वतः - ग ० । ४. उरसोदाहरेद्- -क ० । ५. शिरसोद्दीपयेद् ख ० । ६. कण्ठेन शमयेच्चैव – कः । ७. योगे तु नित्यशः- क ० ।