भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 471–480
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 471–480
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३६० नाट्यशास्त्रम्,
चार वर्ण तथा उनका व्यवहार-उदात्तश्चानुदात्तश्च स्वरितः कम्पितस्तथा ।
वर्णाश्चत्वार एव स्युः पाठ्ययोगे तपोधनाः ॥। ४३ ॥
पाठ्य पाठ में चार स्वर ( उच्चारण स्थान ) होते हैं । यथा — उदात्त, अनुदात्त, स्वरित तथा कम्पित ॥ ४३ ॥
तत्र हास्यश्टङ्गारयोः स्वरितोदात्तः, ' वीररौद्राद्भुतेषूदात्त कम्पितैः, २ । करुणबीभत्सभयानकेष्वनुदात्तस्वरितकम्पितैरिति हास्य तथा शृङ्गार रस में स्वरित और उदात्त स्वर, वीर, रौद्र तथा अद्भुत रसों में उदात्त तथा कम्पित स्वर, करुण, वात्सल्य और भयानक रस में अनुदात्त, स्वरित और कम्पित स्वर रहने चाहिए । काकु के दो प्रकार ---द्विविधा काकुः - साकाङ्क्षा निराकाङ्क्षा चेति । वाक्यस्य साकाङ्क्ष निराकाङ्क्षत्वात् । काकु के दो प्रकार हैं — एक साकांक्ष तथा दूसरा निराकांक्ष । क्योंकि का आशय इन्हीं दो बातों से सम्बद्ध या इन्हीं पर निर्भर वाक्य रहता है ।
" अनियुक्तार्थकं वाक्यं साकाङ्क्षमिति संज्ञितम् ।
नियुक्तार्थन्तु यद्वाक्यं निराकाङ्क्षं तदुच्यते ॥ ४४ ॥
वह वाक्य जिसमें अपना पूर्ण रूप से अर्थ प्रकट ( निर्णीत ) नहीं होता ' साकांक्ष ' तथा जिसमें अपना अर्थ पूर्ण रूप से प्रकट होता हो ' निराकांक्ष ' कहलाता है ॥ ४४ ॥
तत्र साकाङ्क्ष नाम - - तारादिमन्द्रान्तमनियुक्तार्थमनिर्यातित-वर्णालङ्कारं कण्ठोरःस्थलस्थानगतम् । निराकाङ्क्ष नामनियुक्तार्थ निर्यातितवर्णालङ्कारं ' शिरस्थानगतं मन्द्रादितारान्तमिति । १. स्वरितोदात्तैर्वर्णैः पाठ्यमुपपाद्यं - क ० । २. उदात्तं कम्पितं - क ० । ३. कम्पितैर्वर्णैः पाठ्यमुपाद्यम् - क ० । ४. निराकाङ्क्षति - ख ० । ५. अनियुक्तकमेकं - क ० । ६. तत्र साकाङ्का नाम वाक्यं - क ० । ७. अनिर्युक्तार्थ - क ० । ८. निराकाङ्क्षा नाम निर्युक्तार्थ - क ० । ९. कण्ठोरः स्थान- क ० । १०. तारान्तं पाठ्यमिति क; तारागतमिति - ग ० ।
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एकोनविंशोऽध्यायः ३६१ यदि किसी वाक्य के उच्चारण के समय - जिसका अर्थ पूर्ण रूप से प्रकट न होता हो और जिसमें कंठ और वक्षःस्थल के प्रदेश से स्वर उत्पन्न हो रहा हो, जो तार स्वर से प्रारम्भ होकर मन्द्र स्वर में समाप्त हो जाता हो तथा वर्ण और अलंकारों की पूर्णता जिसमें न रहे तो उसे ' साकांक्ष ' काकु कहते हैं । ' faraia ' उसे कहते हैं जिसमें किसी वाक्य की उच्चारण दशा में जिसका अर्थ पूर्ण रूप से प्रकट होता हो तथा जिसमें तार ( मूर्धन्य ) स्वर से प्रारम्भ होकर मन्द्र स्वर में समाप्ति हो जाती हो और जिसमें वर्ण और अलंकार पूर्ण रूप में विद्यमान हों । ( इन वाक्यों का आश्रय लेने के कारण ' काकु ' भी दो प्रकार की हो जाती है । ) छः अलंकार—
अथ षडलङ्कारा ' नाम-उच्च दीप्तश्च मन्द्रश्च नीचो द्रुतविलम्बितौ ।
पाठ्यस्यैते ह्यलङ्कारा लक्षणञ्च " निबोधत ॥ ४५ ॥
स्वरों के छः अलंकार जो पाठ्य में रहते हैं । वे हैं- ( १ ) उच्च, ( २ ) दीप्त, ( ३ ) मन्द्र, ( ४ ) नीच, ( ५ ) द्रुत तथा ( ६ ) विलम्बित ॥ ४५ ॥
अलंकारों का विनियोग-उच्चो नाम - शिरःस्थानगतस्तारस्वरः, स च दूरस्था ' भाषण-विस्मयोत्तरोत्तरसञ्जल्पदूराह्वानत्रासनाबाधाद्येषु ' । ' उच्च ' स्वर उसे कहते हैं जो मूर्धस्थान से उत्पन्न हो ( मूर्धन्य ) और ' तार ' स्वर उसे जो थोड़ी ऊँची आवाज में बोला जाता हो । इसका उपयोग दूरस्थ व्यक्ति से संभाषण, विस्मय, परस्पर उत्तर - प्रत्युत्तर, दूरस्थ व्यक्ति को पुकारना, त्रास तथा बाधा आदि में किया जाता है । १. पडलङ्काराः - ख ०, ग ० । २. दीप्तोऽथ - क ० । ३ नीचद्रुतविलम्बिता: - क ० । ४. पाठस्यैते - क ० । ५. विनिबोधत - क ० । ६. विस्मयोत्तरसंजल्पन दूराह्वान बाधाद्येषु ७. बाधा कुष्टक लहाभिधानेषु भावेषु - क ०; क ० । त्रासनार्थ वाद्येषु - ख ०; ग ० ।
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३६२ नाट्यशास्त्रम् नाम - शिरःस्थानगतस्तारतरः, ' स चाक्षेपकलहर विवादाम कुष्टाधर्षणक्रोधशौर्यदर्प तीक्ष्णरूक्षाभिधाननिर्भर्त्सनाक्रन्दि-तादिषु । दीप्त स्वर उसे कहते हैं जो मूर्धा स्थान से उत्पन्न हो और तारतर अर्थात् कुछ अधिक ऊंची आवाज से उच्चारित किया जाता हो । इसका संयोजन आक्षेप, युद्ध, कलह, विवाद ( झड़प ), अमर्ष, जोर से खींचना ( आघर्षण ), क्रोध, शौर्य, अहंकार ( दर्प ), तेज या रूखा उत्तर देना, डांटना तथा रोना आदि के प्रसंगो में किया जाता है । मन्द्रो नाम - " उरः स्थानगतो निर्वेदग्लानिचिन्तौत्सुक्य दैन्य-व्याधि क्रीडागादशस्त्रक्षत मूर्च्छामदगुह्यार्थवचनादिषु । मन्द्रस्वर वक्षः स्थल से उत्पन्न होता है । इसकी योजना निर्वेद, ग्लानि, शंका, चिन्ता, औत्सुक्य, दैन्य, ( आवेग ) व्याधि, ( क्रीड़ा ) शस्त्रों के गहरे घाव, मूर्च्छा, मद तथा गूढ़ार्थक शब्दों के कहने आदि में की जाती है । नीचो नाम ' उरास्थानस्थो मन्द्रतरः, स च स्वभावाभाषणव्याधि- " शमश्रमार्त त्रस्त पतितमूर्चिछतादिषु । नीच स्वर वक्षःस्थल से उत्पन्न होने वाला और अत्यन्त मन्द्र ( मन्द्रतर ) स्वर होता है । इसकी योजना स्वाभाविक संभाषण, व्याधि, मार्ग चलने से थके, त्रस्त तथा व्यक्ति के गिरने, मूच्छित होने आदि दशा में की जाती है । १. शिरस्थानातिरस्कारः सच - क ० । २. वाद क ० । ३. दामर्षोत्कुष्टाधर्षंण - ख ०; ग ० । ४. दाक्रन्दनादिषु - क ० । ५. उरसि मद्रस्वरः- क ० । ६. ग्लानि शङ्काचिन्ती - क ० । ७. दैन्यव्याधिगाढ - ख ०; ग ० । ८. मूर्च्छामदादिषु - ख ०; ग ० । ९. तत्रैव मन्द्रतरः- कु ० । १०. भयशान्तत्रस्तपतितमूच्छितादिषु - क ० श्रान्तत्रस्त - ख ०; ग ० । स्वभाषाभाषणव्याधितपथि-
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एकोनविंशोऽध्यायः ३६३ तो ' नाम कण्ठगतः । स च त्वरितः लल्लनमम्मनभयशीतज्वर-नासा यस्तात्ययिककार्यावेदनादिषु । द्रुत स्वर कंठ स्थान से शीत्रतापूर्वक उच्चारित किया जाता है । इसकी योजना स्त्रियों के द्वारा बालकों को सान्त्वना देने या चुप करने तथा प्रिय के प्रस्ताव को अस्वीकृत करने में और भय, शीत, ज्वर, त्रास, आवेग, गुप्त एवं आवश्यक या शीघ्र किये जाने वाले ( आत्ययिक ) कार्य के बतलाने आदि में करनी चाहिए । विलम्बितो नाम कण्ठगतस्थानगतस्तनुमन्द्रः, स च " शृङ्गार-करुण वितर्कितविचारामर्षा सूचिता व्यक्तार्थप्रवादल जाचिन्तातर्जन विस्मयदोषानु कीर्तनदीर्घरोग निपीडनादिषु । विलम्बित स्वर कण्ठ स्थान से उच्चारित होता है तथा थोड़ा मन्द्र स्वरूप वाला होता है । इसका प्रयोग प्रणय ( शृंगार अमर्ष, असूया, अटपटी बात कहने ( अव्यक्तार्थ - प्रवाद तर्जन, आश्चर्य ( विस्मय ), दोष कथन या निन्दा, लम्बी आदि में करना चाहिए । अनुवंश्या श्लोका भवन्ति-उत्तरोत्तर अल्प परुषा क्षेपणेषु " तीक्ष्णरूक्षाभिनयने " आवेगे क्रन्दिते तथा
" परोक्षस्य समाह्राने तर्जने श्रासने तथा ।
दूरस्थाभाषणे चैव तथा निर्भर्सनेषु च ॥
१. ह्रस्वो नाम - ख ० । २. कण्ठगतस्त्वरितलज्जितमन्मथभय - ख ०; कण्ठगत भय - ग ० । ), वितर्क, विचार, ), लज्जा, चिन्ता, बीमारी तथा पीड़ा ॥ ४६ ॥
४७ ॥ स्खलित वेल्लन मदन-३. वातज्वरात्तंत्रस्त।कार्य वेदनादिषु - ख ०; शीतज्वर त्रस्तायस्तागूढकार्यं-वेदनादिषु - ग ० । ४. कण्ठस्थानस्थो - ख ०; कण्ठस्थानगतः मन्द्रः - ग ० । ५. शृङ्गारवितर्क —ख ०; शृङ्गारवितर्कित — ग ० । ६. मर्षाश्वसित — क ० । ७. विस्मित- ख ० । ८. दोषानुकीर्तनेन - ख ० । ९. दीर्घशेष - ग ० । १०. संजल्पे - ख ०, ग ० । ११. क्षेपणे तथा — ख ०१ ग ० । १२. तथाऽऽक्रन्दे च नित्यशः - क ० । १३. परोक्षह्वयने चैव तर्जन त्रासनेषु च - क ० ।
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३६४ नाट्यशास्त्रम्
भावेष्वेतेषु नित्यं हि नानारससमाश्रया ।
दीप्ता द्रुता चैव काकुः कार्या प्रयोक्तृभिः ॥ ४८ ॥
उच्चा इस विषय में ये आनुवंशीय लोक हैं-विभिन्न रस और भावों को उपयुक्त ( योग्य ) बनाने के लिए काकु उच्च, दीप्त तथा द्रुत रखना चाहिए जब कि प्रश्न और उत्तर की स्वर को, कठोर वचनों में आरोप - प्रत्यारोप होते हों, तीखी और झड़ी लग रही हो, विलाप ( क्रन्दन ); अप्रत्यक्ष व्यक्ति को युद्ध के रूखी बात चलने में, आवेग या कष्ट देने में दूर स्थित व्यक्ति लिए ललकारने, किसी को भयभीत करने जा रही को बुलाने में तथा ( किसी को ) धौंस देने की अवस्था दिखलाई हो ॥ ४६-४८ ॥
व्याधिते च ज्वरार्ते च भयार्ते. शीतविप्लुते ।
नियमस्थे वितर्के च गाढ़शस्त्रक्षतेषु च ॥ ४ ९ ॥
" गुह्यार्थवचने चैव चिन्तायां तपसि स्थिते । मन्द्रा नीचा ' च कर्तव्या ' काकुर्नाट्यप्रयोक्तृभिः ॥, नियमन ५० ॥, जब व्याधि दशा, ज्वर, भूख, प्यास, तुच्छ व्यक्ति को देखने वितर्क, शस्त्रों के गहरे घाव हो जाने, गोप्य शब्दों को वहन करने, औत्सुक्य तथा किसी उम्र कथा के बतलाने के अवसर हो तो ऐसे अवसर पर मन्द्र और नीच काकु स्वर को रखना चाहिए ॥ ४ ९ -५० ॥
' लल्ले च मन्मने चैव भयार्ते शीतविप्लुते ।
काकुर्नाट्यप्रयोक्तृभिः ॥ ५१ ॥
मन्द्रा द्रुता च कर्तव्या चाहिए जब कि स्त्रियों के द्वारा मन्द्र और द्रुत काकु स्वर तब रखना, भय तथा बच्चों को बहलाने पुचकारने की, प्रणय प्रस्ताव की अस्वीकृति शीत के द्वारा कष्ट पाने की दशा दिखलायी जा रही हो ॥ ५१ ॥
१. एषु नानारसोपेता नित्यमर्थ प्रदर्शिका - क ०, सर्वेष्वेतेषु --चैव-ख ० ग ० । - क ०, क्षोभे च क्षुत्पिपासिते - घ ० । २. शोके च क्षुत्पिपासिते ३. विषम- क ० । ४. क्षते तथा —क ० । ५. गुढ़ार्थ - क ० । ६. स्थिता - क ०; द्रुता - ख ०, ग ० । ७. काकुः कार्या प्रयो— क ० । ८. मल्ले च मदने चैव - क ० ।
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• एकोनविंशोऽध्यायः ३६५
दृष्टष्टानुसरणे ' तथा ।
इष्टार्थख्यापने चैव चिन्ताध्याने तथैव च ॥ ५२ ॥
उन्मादेऽसूयते चैव उपालम्भे तथैव हि ।
' अव्यक्तार्थप्रवादे च कथायोगे तथैव च ॥ ५३ ॥
उत्तरोत्तर सञ्जल्पे कार्येऽतिशयसंयुते ।
* विकृते व्याधिते क्रोधे दुःखे शोके तथैव च ॥ ५४ ॥
विस्मया हर्षे परिदेविते ।
विलम्बिता च दीप्ता च काकुर्मन्द्रा " च वै भवेत् ॥ ५५ ॥
विलम्बित, दीप्त तथा मन्द्र काकु स्वर तब रखना चाहिए जब कि कोई खोई हुई वस्तु दिखाई पड़े तो उसका पीछा करने, किसी अनचाहे व्यक्ति या बात को सुनने, किसी इष्ट वस्तु को बतलाने या प्रकट करने, चिन्ताग्रस्त होने, उन्माद, असूया, उपालम्भ जैसे कार्य अत्यन्त गुप्त बात कहने, किसी कहानी के कहने, उत्तरोत्तर भाषण करने, अत्यन्त कार्य व्यस्त होने, किसी शरीर के अवयव के क्षत - विक्षत हो जाने या शरीर के किसी भाग में व्याधि उत्पन्न हो जाने और दुःख तथा शोक की दशा उत्पन्न हो, तथा विस्मय, क्रोध, हर्ष या रुदन होता हो ॥ ५२-५५ ॥
यानि सौम्यार्थयुक्तानि सुखभावकृतानि च ।
मन्द्रा विलम्बिता चैव तत्र काकुर्विधीयते ॥ ५६ ॥
मन्द्र और विलम्बित काकु स्वर तब रखे जाएं जब कि शब्दावली किसा हर्षप्रद बात को या सुखकारी वृत्त को बतलाने वाली हो ॥ ५६ ॥
१. नुसारेण - ख ०, ग ० । २. श्रुती - ख ०, ग ० । ३. दृष्टार्थ - क ० । ४. चिन्ताग्रस्ते - ख ०; चिन्तायाने - ग ० । ५. सूयने – ख ० । ६. अव्यक्तार्थप्रदाने च तथा लोके - क ०, ख ० । ७ विक्षते व्याधिते त्वङ्गे – ख ०; ग ० । ८. दुःखशोके - ख ०; ग ० । ९. अमषें विस्मये चैव क ० । १०. हर्षे च - ख ०, ग ० । ११. मन्दा - क ० । १२. अस्मादनन्तरं क — पुस्तके च-लध्वक्षरप्रायकृते क्षरकृते तथा । उच्चा दीप्ता च कर्त्तव्या काकुस्तत्र प्रयोक्तृभिः ॥ इति अधिकं लभ्यते । १३. सुखनादकृतानि वै - क ०; सुस्वभावकृतानि च - ग ० ।
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३६६ नाट्यशास्त्रम्
यानि स्युस्तीक्ष्णरूक्षाणि दीता चोचा ' च तेष्वपि ।
एवं नानाश्रयोपेतं पाठ्यं योज्यं प्रयोक्तृभिः ॥ ५७ ॥
दीप्त तथा उच्च काकु स्वर तब रखे जाए जब कि उच्चारित शब्दों में कुछ तीखापन या खुदरापन ( प्रकट होता ) हों । इस प्रकार नाट्य निर्देशक विविध आश्रयों से युक्त काकु - स्वरों का ' पाठ्य ' में प्रयोग करें विभिन्न रसों में नियत बाकु स्वर-हास्य शृङ्गारकरुणेष्विष्टा काकुर्विलम्बिता वीरौद्राच्च दीप्ता वापि प्रशस्यते भयानके स बोभत्से द्रुता नीचा च कीर्तिता एवं भावरसोपेता काकुः कार्या प्रयोक्तृभिः , शृङ्गार तथा करुण रस में ' विलम्बित ' काकु ॥ ५७ ॥
।
॥ ५८ ॥
॥। ५२ ॥
स्वर और वीर; रौद्र हास्य तथा अद्भुत रसों में ' दीप्त ' काकु स्वर प्रशस्त होता है ॥ ५८ ॥
तथा भयानक और बीभत्सरस में द्रुत और नीच याकु स्वर उत्तम होता है । इस प्रकार भाव तथा रसों के अनुकूल काकु स्वरों की उचित प्रदेशों में योजना की जाए ॥ ५ ९ ॥ उच्चारण के छः अंग-' अथाङ्गानि षट् - विच्छेदोऽर्पणं विसर्गोऽनुबन्धो दीपनं प्रशमन-मिति । तत्र विच्छेदो नाम ' विरामकृतः । अर्पणं नाम लीलायमान-स्वरेण पूरयतेव रङ्गं यत् पठ्यते तदर्पणम् । विसर्गो मधुरवल्गुना । अनुबन्धो नाम " पदान्तरेष्वपि विच्छेदः नाम ' वाक्यन्यासः वर्धमानस्वररुचेति । " 99 अनुच्छ्रसनं वा । दीपनं नाम त्रिस्थानशोभि प्रशमनं नाम तारगतानां स्वराणां प्रशाम्यतामवै स्वर्येणावतारण-मिति " 98 । १. वोच्चा - ख ० । २. चापि - ग ० । ३. काकुर्योज्या - ख ०; ग ० । ४. अथ षडङ्गानि - क ० । ५. इति षडङ्गानि - ख ०; ग ० । ६. विरामः - क ० । ७. लीलावर्णस्वरूपेणापूरयदि- ख ०; ग ० । ८. रसं क ० । ९. वाक्योपन्यासः -- क ० । १०. पदस्य विच्छेदमन्तरेणानुच्छ्वासनं - क ०; पदान्तरेष्व विच्छेद - ग ० । ११. अनुच्छ्वननं वा - ख ०; अनुइच्छ्वासनं वाग ० । १२. स्वराणामेकस्वर्येण - क ०; णावरोहण - ख ०; णावतरणमिति - ग ० ।
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एकोनविंशोऽध्यायः ३६७ अब ( उच्चारण के ) छः अंग बतलाते हैं — ये हैं— ( १ ) विच्छेद, ( २ ) अर्पण, ( ३ ) विसर्ग, ( ४ ) अनुबन्ध, ( ५ ) दीपन तथा ( ६ ) प्रशमन । इनमें विराम के कारण होने वाला ( अंग ) ' विच्छेद ' कहलाता है । ( जिसका आगे विशद विवेचन दिया जा रहा है ) । लीला या सौकुमार्य से पूर्ण स्वरों में प्रेक्षागृह को भरते हुए जिस शब्दावली का पाठ किया जाए उसे ' अर्पण ' कहते हैं । वाक्य का पूर्ण करना ' विसर्ग ' कहलाता है । दो अथवा अधिक पदों ( शब्दों ) के बीच विच्छेद न करना या उनके उच्चारण की दशा में सांस वा न टूटना ' अनुबन्ध ' कहलाता है । जो स्वर तीनों ( उरः, कंठ, मस्तक ) स्थान से उच्चारित होकर क्रमशः बढ़ता जाए तो ' दीपन ' कहलाता है । ऊंचे चढ़ाए हुए स्वरों को धीरे - धीरे नीचे की ओर बिना वैस्वर्य के लाना ' प्रशमन ' कहलाता है । ' एषाञ्च रसगतः प्रयोगः- तत्र हास्यशृङ्गारयोराकाङ्गायामर्पण-विच्छेददीपनप्रशमनयुक्तं पाठयं कार्यम् । दीपनप्रशमनयुक्त करुणे । विच्छेदप्रशमनदीप नानुबन्धबहुलं वीररौद्राद्भुतेषु, " विसर्गविच्छेद-युक्तं बीभत्सभयानकयोरिति । अब उनके विभिन्न रसों में होने वाले प्रयोग बतलाता हूं । हास्य और शृङ्गार रस में पाठ्य को अर्पण, विच्छेद, दीपन और प्रशमन नामक अंगों से ' युक्त रखना चाहिए । करुण रस में दीपन और प्रशमन ( अंगों ) से युक्त रखा जाए । वीर, रौद्र तथा अद्भुत रसों में विच्छेद, प्रशमन, अर्पण, दीपन तथा अनुबन्ध युक्त पाठ्य रहना चाहिए । बीभत्स और भयानक रस में विसर्ग, विच्छेद ( अर्पण ) युक्त पाट्य रखना चाहिए । सर्वेषामप्येषां ' मन्द्रमध्यतारकृतः प्रयोगस्त्रिस्थानगतः । तन्त्र दूरस्थाभाषणे तारं शिरसा, नातिदूरं मध्यं कण्टेन, पार्श्वतो मन्द्र-१. एषां रस- क ० । २. वाक्यं - ग ० । ३. करुणवीराद्भुतेषु समाकाङ्क्षविच्छेद प्रशमनार्पणदीपनानुबन्धबहुलं पाठ्यं प्रयोज्यम् - ख ० ग ० । ४. बीभत्सभयानकयोविच्छेदार्पणयुक्तमिति - ख ० ० ५. चैतेषां - ख ०; ग ० । C ६. मध्यतारव्यवस्थया त्रिस्थानगतः प्रयोगः - ख ०, ग ० । ७. तारशिरसो ग ० ।
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नाटयशास्त्रम् ३६८ पाठ्यमिति । मन्द्रात्तारं न गच्छेत् ताराद्वा मुरसा प्रयोजयेत् मन्द्रमिति । का मन्द्र, मध्य एवं तार स्वरों जनकी ' तीन स्थान इन सभी अंगों से प्रयोग होता है । किसी दूरस्थ पात्र को से उत्पत्ति हुई है— माध्यम से उत्पन्न होता है — प्रयोग करना पुकारने में तार स्वर का— जो मूर्ध स्थान में - कण्ठ स्थान से चाहिए । जो पात्र अधिक दूर पर न हो उसे बुलाने किसी समीप उत्पन्न होने वाले, मध्य स्वर का प्रयोग करना चाहिए । तथा वाले मन्द्र स्वर स्थित पात्र से वार्तालाप करने में वक्षःस्थल से उत्पन्न होने स्वर चाहिए । ( कभी भी ) मन्द्र स्वर से ( एकदम ) तार का प्रयोग करना स्वर पर नहीं पहुँच जाना चाहिए ' या तार स्वर से मन्द्र रसेषूपपाद्याः । तत्र एषाञ्च द्रुतमध्यविलम्बितास्त्रयो लया " हास्य शृङ्गारयोर्मध्यलयः, ' करुणे विलम्बितो, वीररौद्राद्भुतबीभत्स-भयानकेषु द्रुत इति । की लय का भी विभिन्न रसों में उपयोग इन स्वरों की तीन प्रकार रस में मध्यलय, करुण में विलम्बित किया जाता है । हास्य तथा शृङ्गार रस में द्रुत लय का लय तथा वीर, रौद्र, अद्भुत, बीभत्स और भयानक प्रयोग करना चाहिए । विराम और उसका लक्षण- छन्दोवशात् । कस्मात्? अथ विरामः - अर्थसमाप्तो कार्यवशान्न यन्ते द्वित्रिचतुरक्षरा विरामाः । यथा-‘ विराम ' बतलाता हूँ । जिसका ' पाठ्य ' में उपयोग होता है । यह अब की समाप्ति ( या वाक्य के पूर्ण हो जाने ) के कारण या ( विराम ) अर्थ करता है । केवल छन्द के लक्षण पर ही विराम फिर परिस्थिति पर निर्भर में यह पाया जाता है कि एक, दो, नहीं किया जाता है । क्योंकि व्यवहार है — जैसे निम्न पद्य में-तीन या चार अक्षरों पर भी विराम होता किं, गच्छ, मा विश, सुदुर्जन, वारितोऽसि कार्य, त्वया न मम सर्वजनोपभुक्तम् । गच्छेत् - ख ०; मन्द्रात्तारं गच्छत्ताराद्वा मन्द्रमिति - ग ० । १. अत्र मन्द्रात्तारं च क ० । ३. पूपयोज्याः - क ० । २. ४. करुणे च - क ० । ५. बीभत्सकरुणयोविलम्बितः - क ० । ६. कारितोऽसि - क ० । ७. युक्तम् — क ० ।
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एकोनविंशोऽध्यायः ३६ ९ सूचासु चाङ्कुरते च तथोपचारे स्वल्पाक्षराणि हि पदानि भवन्ति काव्ये ॥ ६० ॥
रे दुष्ट, क्या है, दूर हट, आगे मत बढ़, तू रोक दिया गया है । अरे निर्बल पुरुष! तू सभी से उपहास किया जा रहा है । मुझे तुम से कुछ भी काम नहीं । इस प्रकार जिनमें थोड़े अक्षर भी हों पर काव्य में ' सूचा तथा अंकुर ' ( अभिनय ) से युक्त होने और ' विराम ' की सम्बद्धता से ऐसे समय स्वतः उनमें गुणशालिता आ जाती है ॥ ६० ॥
एवं विरामे प्रयत्नोऽनुष्ठेयः । कस्मात्? विरामो हार्थानुदर्शकः । अतएव ' विराम ' के प्रयोग के विषय में ध्यान रखना चाहिए । क्योंकि विराम अर्थों की स्पष्टता में सहायक होते हैं । अत्र श्लोकः-विरामेषु प्रयत्नो हि नित्यं कार्यः प्रयोक्तृभिः “ कस्मादभिनयो ह्यस्मिन्नर्थापेक्षी यतः स्मृतः इस विषय में प्राचीन अनुवंश्य श्लोक भी हैं: -वाचिक अभिनय में ' विरामों ' पर सदा नाट्य निर्देशक चाहिए क्योंकि अभिनय उच्चारित शब्दों के अर्थ पर निर्भर अलंकार तथा विरामों में हस्त संचालन - विधि—
यत्र व्यग्रावुभौ हस्तौ तत्र दृष्टिसमन्वितः ।
वाचिकाभिनयः ' कार्यो विरामैरर्थदर्शकैः ॥
।
॥ ६१ ॥
को ध्यान देना होता है ॥ ६१ ॥
६२ ॥ ( नृत्य के समय ) आंखों को वहीं रखे जहां हाथ अपनी मुद्राओं को प्रदर्शित करते हों तो ऐसी स्थिति में अर्थ को स्पष्ट करने के लिए विरामों के साथ वाचिकाभिनय अवश्य रख देना चाहिए ॥ ६२ ॥
१. सूचा तथा अङ्कुराभिनय के लक्षण नाट्यशास्त्र के अध्याय २४।४३ तथा २४।४४ पर ( भाग ३ में ) अवलोकन करें । १. सूचाङ्कुराभिनयनेषु - क ०; शोकं शुचं कुरु गते च - ख ० २. कार्ये - ख ० । ३. भवत्यपि च - क ० । ४. विरामे तु प्रयत्नस्तु - ग ० । ५. तस्माद ग ० । ६. यतः स्थितः - ख ०, ग ० । ७. समन्वितैः - क ० । ८. वाचिकोऽभिनयः क ० । ९. दर्शिभिः - क ० । २४ ना ० शा ० द्वि ० ।