भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 531–540

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 531–540

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४२० ११ नाट्यशास्त्र अब परिकर सामग्री बतलाते हैं— ' व्यायाम ' इत्यादि से । यहाँ गया था उसकी प्रशिक्षण एवं अभ्यास के उपयुक्त काल है व्यायाम पद का अर्थ अंग विषयक जिसके परिणाम स्वरूप द्रुत, मध्य एवं विलम्बित चच्चत्पुटादि ताल के अंग का ( यहाँ ) पठन किया गया है । ( उसका अनुगमन कर के शारीर चेष्टाओं को युद्धादि प्रसंग में प्रदर्शित करना अभीष्ट है ) । ६०-६१. सन्नगास्त्र = जिसका शरीर थक गया हो तथा विश्रान्ति ग्रहण रहा हो । कूर्परांसशिरः = कूर्पर ( कोहनी ), अंस ( कन्धे ) तथा शिर-कर ये सभी अंगों का प्राण्यङ्ग होने से यहाँ एकवद्भाव हुआ है ६२-६३. चतुरस्रता: -- जिसके लिये सौष्ठव का विधान किया जाता है । यहाँ कटिनाभिचरी पद से आशय है कि कटि और नाभि पर हाथ क्रमशः तथा एक साथ भी स्थित रखे जायें । ६३-६५. खड्ग युद्ध में जिन न्यायों को बतलाया वे ही धनुर्युद्ध में भी होते हैं, अतः धनुर्युद्ध में करण अर्थात् कर्तव्यकर्ष को भी प्रमार्जनम् इत्यादि के द्वारा दिखलाया गया है । आदि में धनुष का शोधन या तैयारी फिर पर बाण का सन्धान या चढ़ाना तथा अन्त में उसका मोक्षण या धनुष । यहाँ प्रसंग व्यायाम का था अतः व्यायाम के उपयोगी सौष्ठव का छोड़ना इसी के प्रसंग से प्राप्त धनुष आदि के कर्म भी बतलाये गये हैं । तथा. प्रयोगभूत आपेक्षिक व्यायाम का अब विवरण दिया जा रहा ६६-६७ ' तैलाभ्यक्तेन क्तेन ' ' इत्या इत्यादि से । आशय यही कि व्यायाम के समय शरीर पर तैल की मालिश करना आवश्यक है । तैलपद से यहाँ तिल का या अन्य तेल भी योग्यतानुसार अर्थ लिया जाता है । यवागू — मर्दन अर्थात् जौ के आटे का उबटन लगाना । ६७-६६. नस्य -- नासिका द्वारा औषधि सेवन । बस्तिनिधि = = आयुर्वेद शास्त्र में दिखलाई गयी एक विधि । इन विधियों को आवश्यकतानुसार देश, काल, प्रकृति, वय, अवस्था तथा पात्र के अनुसार घृत या तैल द्वारा सम्पन्न चाहिए । रसक = रस या तरल पदार्थ । पानक पीने के योग्य की जानी हों । प्राण आहार पर आश्रित है अतः उसकी शक्ति बनाए पदार्थ जो स्निग्ध रखने के लिये अभिनेता का पुष्ट आहार रखा जाए । ६६ - १००. गात्र की अशुद्धि अजीर्ण होने पर हो जाती है अतः वमन, आदि क्रियाओं से शुद्ध शरीर वाले को ही व्यायाम करने का ( में ) विरेचन है । प्रक्लान्त = जो श्रम से थक गया हो । जिस व्यक्ति का व्यायाम अधिकार

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ११ ४२१ से शरीर दृढ़ है वह सुडोल आकार वाला भी होगा ही तथा ऐसे व्यक्ति को जिस कार्य में लगाया जाए उसमें उपयुक्त होने से नाट्य प्रयोग में सफलता प्राप्त होती है । गात्रों में माधुर्य का अर्थ है उनका सुन्दर या सुडोल दिखलाई देना । १०१-१०२. अङ्गक्रिया = अङ्ग -सिद्धि । अङ्गों के अनुसार प्राप्त चारी की परम्परा से निर्मित स्वरूप वाले मण्डलों का विवरण अब दिया जा सकता है, इस तथ्य को चारी के निरूपण के उपरान्त ही बतला कर चालू अध्याय समाप्ति तथा अगले अध्याय में मण्डल के प्रतिपादन की बात को भी दिखलाया गया है । 116 कि IT I क किश की 8१-०१ IN कफि 1 PDF Fro HUF 45-26 THE FIFE 10 SIPERS FRI 1 fre 96 195 15 BIRD TE 35-19 की 4 1 TF 3 - यद TPS - SIP की क ६-४६ 1-३

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858 Le ailes 66 196 द्वादश अध्याय ( मण्डल प्रचार ). १. शस्त्रों के मोक्षण के अभिनयगत सन्दर्भ में ' मण्डलों ' को बतलाया गया है । ' मण्डल ' का सामान्य लक्षण है - चारियों के संयोग या वर्ग से जो बनता है वही ' मण्डल ' ( कहलाता ) है । यहाँ इह पद का आशय यही है कि इस अध्याय के श्रवण करने से ज्ञात पदार्थों के अनुसार ( आगे भी ) इसी प्रकार ( इनके ) स्वरूप समझना चाहिए । २ - ६. आकाशगत दस मण्डल हो है तथा इतने ही भौमिक भी आकाश गत चारियों एवं भौमिकी चारियों की प्रचुरता के कारण उनसे निर्मित मंडलों की भी प्रचुरता हो जाती है । यहाँ यही तथ्य संख्या निर्देश द्वारा दिखलाया गया है । ७- १०. आद्य अर्थात् दाहिने पैर से । ' उद्वाहित ' पद के द्वारा शकटास्या-चारी को प्रदर्शित करने का संकेत है । त्रिकपरिवर्तन के द्वारा भ्रमरीचारी सम्पादित करना चाहिए । बाह्यभ्रमरक को किया जाए । १०- १४. आस्पन्दित का आशय है बायें पैर दिखलाना । इसी को ' आस्कन्दिता ' भी कहते हैं । २१-२२. दण्डक्रम — अर्थात् दण्डपादाचारी । में भ्रमरी का आश्रय लेकर जो दण्डपाद मण्डल यहाँ सम्बन्ध है । २३-२६. निकुट्टकपद से तलसञ्चरपाद का चारी का संकेत किया गया है । ' समावर्त्य त्रिक ' वामचरण से सम्पादित से ' स्पन्दिता चारी ' को क्योंकि त्रिक परिवर्तन बताया गया है उसी से तथा उद्वृत्त से ऊरूद्वृत्ता का आशय है कि बाँ तथा दाहिने दोनों ही बाजू में भ्रमरी से घुमाव लिये जाएँ । २७-२६. क्रमशः दो से छ बार एवं सात बार प्रयुक्त इन चारियों के परिमण्डल में चारों दिशाओं में घुमाव लेकर आन्तरालिक पाद - विक्षेपों के द्वारा गति को प्रस्तुत किया जाए यही इसका आशय है । छः या सात संख्या से यहाँ मण्डलों की अभ्यावृत्ति या दुहराने का कार्य अभीष्ट है । ३४-३७. ललित सञ्चार का यहाँ कार्य रहने से मण्डल का नाम ' ललित ' है । ललित सञ्चार करना अतिक्रान्त नामक बायें पैर का विशेषण है । . आस्फोटन करना अर्थात् पैरों के तल से भूमि को पीटना । ५६-५८ इसे ही युद्ध में ‘ आस्फालन ' कहा जाता है ।

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १२ ४२३ ६६-६७. परं चैव में ' च ' पद का अर्थ ' अपि ' लेना चाहिए । अर्थात् इसके बाद भी मण्डलों का प्रयोग किया जाय । कैसे किया जाए का - उत्तर है समचारी से । अर्थात् पारस्परिक योजना से प्राप्त चारियों का ( औचित्य या अपेक्षा के अनुसार ) यहाँ वहाँ सर्वत्र प्रयोग करना चाहिए । आचार्येति - आचार्य की बुद्धि से प्रयोग किये जाए अपनी ऊहा से नहीं । ६८. खण्डों का भी मण्डलों के साथ रहने से प्राधान्य दिखलाया गया है । ' बाद्येन अनुगतानि ' इससे यह बतलाया गया कि यहाँ चतुर्थ अध्याय में नृत्त के उपयोगी विषयों में प्रतिपादित गति से विपरीत या भिन्न नाटकीय गति में मण्डलों की प्रमुखता रखनी अभीष्ट है । क एकीक IfEE ( FINEST IR TAFE EFP FS -ि क

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858 त्रयोदश अध्याय 27-33 ( गतिप्रचार ) श 5759 17 31 ' पद से जो चारी के संयोग या मिश्रण से मण्डल १. यहाँ ' मण्डलकल्पन आचार्य के द्वारा नहीं बतलाने निर्मित होते हों, उनके स्वरूप की कल्पना लिया जा सकता पर भी स्वयं लक्षणों को देख कर अपनी बुद्धि से समझ में एक प्रश्न फिर भी बना ही रहता कि जब पिछले अध्याय है । यहाँ को तो बतलाया परन्तु आचार्य ने उन चारी के संयोग से निर्मित मण्डलों उत्तर में यही कहा मंडलों की योजना या विधान क्यों नहीं बतलाया । इसके का प्रसंग चित्तवृत्ति रूप नहीं है कि उन्हें रस जा सकता है कि चारीचण्डल । अतः रस एवं भाव के अनुसार एवं भाव की उपयोगिता में बतलाया जाए मुनि वाली गतियों के विनियोग बतलाये गये हैं तथा इसी कारण की जाने से या स्वतन्त्र ) एक अध्याय भी रखा है । ने पृथक् से इस विषय पर ( अलग दिव्य रूप ( और ) यह गति प्रकृति या पात्र के दिव्य, अदिव्य एवं दिव्या देशकाल की अपेक्षा को देख कर रखी जाती है । यह उसकी अवस्था और होती है जिसे आगे बतलाया भी जाएगा । गति प्रत्येक पुरुष की भिन्न - भिन्न उसकी प्रक्रिया दिखलायी गयी । अतः प्रथमतः में नान्दी के उपक्रम के साथ प्रयोग के २- ३. अभिनय के आरम्भ किया गया । में कैसी गति रखी जाए । यही ' तत्रोपवहनं ' से आरम्भ उपक्रम मंच पर प्रविष्ट सूत्रधार तथा उनके सहयोगी, उपवन - विधि के उपरान्त विषयक संवाद हों उनके बाद नट, नटी ( आदि ) के साथ जो अभिनेय ' इस के पूर्व नान्दी हो चुकी रहती है । यहाँ यही तथ्य ' ध्रुवागीति क्योंकि किया गया है । ' ध्रुवागीति ' देश, रस तथा के हो जाने के द्वारा सूचित । पट या यवनिका के पात्र के अनुगत विषयों में उपनिबद्ध रहना चाहिए की जाए । जिसके हटाने के उपरान्त पात्र प्रवेश के समय भी उपोहन क्रिया ( पात्र ) का प्रवेश अंगों के वलन क्रिया के सम्पादन के साथ बीच में नटी शरीर के स्वाभाविक वलन कर्म रखा जाए । यद्यपि स्त्रीपात्र का प्रवेश नहीं साथ ही होता है । अतः उसे शब्द से बतलाने की यद्यपि आवश्यकता के आचार्यों के मत में यहाँ ऐसी गति विहित है फिर भी कोहल आदि समुचित स्थान, दृष्टि एवं या इष्ट है । इस समय शुष्काक्षर गान कर करना चाहिए मुखरागादि से युक्त हो कर पात्र को प्रवेश तत्काल उपयुक्त को शीघ्र ही सम्बद्ध अर्थं या विषय की प्रतीति हो जाए । जिससे सामाजिकों सामाजिक या दर्शक उत्सुक इस समय गीत भी उत्तम रखा जाए जिससे

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १३ ४२५ हो जाए । यहाँ ' यथामार्ग रसोपेतं ' के स्थान पर ' यथामार्गकलोपेतम् ' पाठ भी मिलता है । इसका अर्थ है कि मार्ग अर्थात् चित्र आदि में जो दो, चार, आठ मात्राओं की कलाएँ होती हैं उनसे उपेत अर्थात् युक्त होना चाहिए । ४-५. विकृष्ट, त्र्यत्र एवं चतुरस्र इन तीन स्थानों में व्यस्त्र में वैष्णव स्थान जिसमें एक पक्ष या बाजू समान या बराबर और दूसरा समुन्नत रहता है । प्रसन्न — अर्थात् अपने प्रवेश के समय ही सन्न अर्थात् अचल । स्वस्थ मयूरसदृश सुन्दर सिर जिसमें हो उसी प्रकार ग्रीवा प्रदेश रखना चाहिए । ६-७. यहाँ ' नाभिसंस्थ ' पद से चतुरस्र का संकेत है । अतः नाभिस्थित दक्षिण खटकामुखहस्त और कटिस्थित वाम अर्धचन्द्र हस्त ( का प्रयोग ) अभीष्ट है यह यहाँ दिखलाया गया है । ८-१०. गति के बाद क्रमप्राप्त एवं उचित होने से स्थान ( स्थिति ) को दिखलाने हेतु पादयोरन्तरम् ' इत्यादि से पूर्व अध्याय ११।५२ में दर्शित स्थानक को प्रस्तुत करने के बाद गति का उपक्षेप किया गया है । इसे देश तथा काल को दिखलाने वाले लक्षणों के ( जिन्हें इसी अधाय में कह रहे हैं ) अनुरूप किया जाए । ताल- फैलाई गई अंगुलि और अंगूठे के बीच की लम्बाई या प्रदेश हो वह ताल कहलाता है, जिसे बालिश्त कहते हैं । ( अर्थात् एक ताल = एक बालिश्त । यह ताल अभिनेता के अपने हाथ के प्रमाण से रख लेना चाहिए । यह गति की स्थिति या डग रखने की पृथ्वी पर की दूरी ( देश ) चार, दो तथा एक काल की होती हैं । यहाँ उत्तमादि प्रकृति के अभिनय की अपेक्षा से क्रमशः ऐसी संख्या को लिया गया है । यह विनियोजना उतम प्रकृति के पात्रों की चार ताल, मध्य पात्रों की दो ताल तथा अधम पात्रों की एक ताल के प्रमाण पर की जाती है । इसे शोभाधायक या नाट्यधर्मी प्रकार से मंच पर प्रस्तुत किया जाना चाहिए । उत्तमादि पात्रों में क्रमशः तालों का ह्रास स्वभावतः होता है । १ ९. देश के नियम के पश्चात् इसमें समय का मान भी नियत होता है । इसमें पैर को उठा कर रखने के समय में भी इसी प्रकार उतमप्रकृति के लिये चार कलाएँ तथा इनसे आधी - आधी मध्यम एवं अधमों के लिये नियत हैं । पाँच निमेष की एक मात्रा होती है, इस सामान्य लक्षण से यही सूचित होता है कि सर्वत्र ध्रुवक के प्रमाणानुसार पैर को रखने में चार कलाएँ आवश्यक हैं । कोहलाचार्य ने इस प्रसंग में उतमादि पाकों के लिये द्विपदी आदि का भी विधान बतलाया है जिसे विस्तारभय से यहाँ नहीं दिया जा रहा है । यहाँ

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४२६ नाट्यशास्त्र: शरी मध्यमध्य में स्थान; फिर उनमें भिन्न - भिन्न क्रियाएँ या चेष्टाएँ तथा उनमें भी विश्राम की कल्पना के लिये विराम स्वरूप मात्रा की कल्पना की गयी है । इसी मात्रा की कल्पना के आधार पर चतुष्कला आदि का विधान रहता है तथा यही तथ्य मुनि ने उपर्युक्त विवरण से सूचित भी किया है । १२. यह समय के लय विषयक ( मान का ) नियम दिखलाने के लिये कहा गया है । स्थित = ( अर्थात् ) विलम्बित लय । इसे प्रकृति आदि के विभाग के अनुसार ठीक से विचार कर प्रयुक्त करे । यहाँ आदि पद से देश, काल, अपस्था तथा रस को ध्यान में रखना भी अपेक्षित है । जैसे- धीरता के कारण विलम्बित लय तथा इसके अभाव में कभी मध्य तथा कभी द्रुत लय का होना । क्योंकि यह भी देखा गया है कि उत्तम जाति होने पर भी उसका भाव अन्यथा रहता है अत यह प्रकृतिविभाजन है जात्यादि कृत विभाजन नहीं । १३. लयत्रय का यह प्रयोग सत्व के कारण होता है । सत्व से आशय है चित्तवृत्ति । अतएव संग्राम आदि के अवसर पर उत्तमपात्र की भी द्रुतलय में गति रखी जाती है तथा शोकादि के अवसर पर अधमपात्र की भी विलम्बित लय में गति रहती है । १४. देश, काल आदि के नियम के अनुसार पात्रों के गतिगत विशेषरूप या विचित्रता को दिखला कर अब विशिष्ट विवरण देने के भाव से मुनि उनको बतला रहे हैं जिन्हें पूर्व में सामान्यरूप से कहा था । १५. यहाँ ' तु ' शब्द विशेषता के द्योतक रूप में प्रयुक्त है । अतः मन्थर गति में चार ताल, स्वभावगति में तीन तथा दीप्तगति में पाँच ताल भी रखे जा सकते हैं— ( यही इस " तु " के द्वारा सूचित किया गया है ) । १६-१७. पार्श्वक्रान्तैः इत्यादि से कुञ्चितपाद में पार्श्वक्रान्ताचारी के रचरूप को दिखलाया गया है । ( द्र ० ना ० शा ० ११।३२ ) रंगकोण अर्थात् प्रेक्षागृह के ( रंगस्थल के ) उत्तर - पूर्व कोण में तथा द्वितीय कोण अर्थात् उत्तर - पश्चिम कोण में । तत परं अन्य ( शेष ) दो कोणों में । १८- १६. ' वामवेध ' का अर्थ है पाणि क्षेत्र में एडी पर सूचीपाद का निपात या प्रक्षेप करना । पञ्चपदी गमन स्वाभाविक गति में होता है । गति की सिद्धि होने पर रंगकोणों में जाने के समय ब्रह्म स्थान का उलंघन नहीं किया जाए यह ध्यान देने की बात है । मूल में ' पादानामेक विंशतिम् ' अर्थात् इक्कीस डग की जो बात कही है वह प्रत्येक कोण में पञ्चपदी गमन करने पर ( ४ × ५ = २० ) बीस ही होते हैं इक्कीस नहीं । परन्तु इसे आचार्य की आज्ञा मान कर यहाँ यथाशक्य निर्वाह होगा संगति न बैठने से ।

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १३ ४२७ २०. यहाँ ' भरत ' शब्द भरत से प्राप्त शास्त्र शिक्षा वाले एवं भरत की सन्तति से सम्बद्ध नट की सूचना देता है । परिमित दिशा में पञ्चपदी का नियम है अतः एक ही स्थान पर पादों के दो दो विक्षेप करना चाहिये । विकृष्ट में बार २ पञ्चपदी हो सकती है इस विषय में भिन्न प्रमाणों में दी गई गति की रीति या विवरण ही प्रमाण है । २१. मिश्रगतियों के विषय में विशेष बात कहने की भावना से ' समगति ' का उपसंहार किया गया है - ' यः समै ' इत्यादि से । तथैव - अर्थात् समानता से । २२. मिश्रगति को बतलाते हैं- ' अर्थ ' इत्यादि से । परिवारितः = जो ( उत्तमरूप आदि से ) विवक्षित हों ऐसे पात्रों से युक्त । इस समय उत्तम की चार कलाएँ, मध्यम की दो तथा अधम पात्र की एक कला प्रमाण का पाद पात रहे । २३. यहाँ कला के चतुस्तालादि विभाग को निश्चय करने के लिये विशेष कहा गया है— दैत्य दानव आदि । २४. सभी अर्थात् देवदूत आदि उत्तम पात्र । उद्धत देवपात्र जैसे मातलि प्रभृति । IPTIS २८-२६. राजा भी देवांश से उत्पन्न होने वाला व्यक्ति है क्योंकि शास्त्र में इसे लोकपालों के अंशों से उद्भूत माना गया है । ( द्रष्ट- ' अष्टाभिर्लोकपालानां मात्राभिर्निर्मितो नृपः ) इत्यादि ( मनु ० ) । इसी कारण इनका प्राधान्य होता है । यही तथ्य गीता में भी ' राजविद्या राजगुह्यम् ' इत्यादि से कहा है । अयं = चतुष्कल इत्यादि । स्वच्छन्द गमन = स्वस्थ स्थिति में गति । संभ्रम = आवेग । उत्पात = उन्माद जैसी मानसी दशा । इन दशाओं में निश्चयपूर्वक गति में कोई प्रमाण या मान नहीं होता है । ३०-३३. विशेष स्थिति या अवस्थाओं के बल से नियम में ( भी ) परिवर्तन हो जाता है । तब उतम पात्र की दों कलाऐं, मध्यम की एक तथा अधम की आधी कला गति का प्रमाण हो जाती है । यह श्वासादि की विश्रान्ति के साथ होता है तथा चार प्रकार से होता है और यहीं द्रुत उपयुक्त मानी जाती है । ३४-३५. भय से युक्त होने पर ' ऊरुस्तम्भ ' हो जाता है । इसी प्रकार विस्मय और अवहित्था अर्थात् कृत्रिम धीरता के अवसर पर भी । ऐसे समय गति स्थित या विलम्बित लय वाली की जाए । आदर से विशिष्ट, औत्सुक्य से युक्त शृंगार के विप्रलम्भ नामक प्रकार में भी इसी प्रकार ' गति '

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४२८ नाव्यशास्त्र रहती है । स्वच्छन्दगमन = बिना किसी लक्ष्य के या कार्य के क्रीडा करते हुए चलना । पादपात भी जिस गति में जैसा कलान्तर का परिमाण बतलाया हो वैसा ही रहना चाहिए । यह बात आगे इसी अध्याय में कही भी जा रही है । अभिनय के दौरान स्त्री पात्रों से छः या आठ कलाओं तक के पादपात नहीं करवाये जाने चाहिये क्योंकि देर तक ऐसा करने पर उन्हें थकावट ( खेद ) हो जाएगी । विषम संख्या के किसी विशेष परिमाण में पादों का उत्क्षेप तथा निपात का योग नहीं बनता अतः साम्य या सम संख्या ही आचार्यगण यहाँ उचित समझते हैं । ३६-३६. पूर्व में कलागत आधिक्य दिखलाया गया था । इसके विपरीत कलागत न्यूनता भी होती है - यह तथ्य अगली - ' अस्वस्थकामिते ' इत्यादि से कहा गया है । अस्वस्थ = प्रच्छन्न । कामित = कामुक । बान्धव आदि के अनिष्टश्रवण के बाद उनके समीप शीघ्र जाना अभीष्ट होता है, इसी तरह अद्भुत पदार्थ के दर्शन में भी ( मन में ) उतावलापन रहता है तब कलाओं में न्यूनता रखा जाना उचित हो जाता है । आत्ययिक = अवश्यकर्तव्य कार्य । शत्रु और अपराधी के ढूँढने या पकड़ने में भी इसी प्रकार विकला ( जिसमें कला का चार से आधा परिणाम या कम हो ) की योजना रखी जाती ' विकला ' पाठ में अर्थ है अर्धकला रहित चतुर्थी कला । इसी कारण ' चतुरर्धकल ' कहा भी है ( जो संभ्रम, उत्पात आदि के प्रसंग में कहा था । ) कलाओं के परिमाण का यह विधान या नियम उपयोगी ( होता ) है तथा इसका उत्तम मध्यम तथा अधम पात्रों में प्रयोग भी किया जाता है । अतः नियम की व्याहारिकता भी है तथा महत्त्व भी । ४०-४४. इस प्रकार प्रकृतिभेद से गति का विवरण देकर रस में गति को दिखलाने की भावना से तथा पुरुषार्थ में उपयोगी रसों में श्रृंगाररस के प्रमुख होने से उसी की गति बतलाई जा रही है ' गतिः शृङ्गारिणी ' इत्यादि से । स्वस्थकामित = प्रकट कामुक या प्रेमी । यहाँ ' सूचा ' का पुनः कथन आकर्षक पदार्थ के अतिशय चमत्कारी होने से पर्यालोचन के निरूपणार्थ है अर्थात् शृङ्गार में ' सूचा ' की योजना आवश्यक समझी जाए । ( सूचाभिनय का स्वरूप ना ० शा ० २४।४४ पर है । जिसे टिप्पणी ० पृ ० १३६ पर दिया गया है । ) उस सूचा से भी अन्तरङ्ग प्रकृत में गति निरूपण है इसलिये इसे यहाँ दिखलाया गया । यहाँ पर सौष्ठव से अङ्ग की चतुरस्रता तथा उससे युक्त लय, ( बिलम्बित आदि ) ताल सभी सामान्य रूप में होना चाहिए ।

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १३ ४२ ९ ४५-४८. प्रच्छन्नकामिता छिप कर प्रिया से मिलने या सम्बन्ध रखने वाला । जैसे रत्नावली नाटिका में वत्सराज उदयन । इसके विपरीत सर्वलोक समक्ष कामिता जैसे पौलस्त्य की सीता में कामिता । इस समय किसी के देख लेने की आशंका होने से दीपक को बुझा दिया जाता है । वेलासदृश वस्त्र – समय के अनुरूप वस्त्र या वेषधारी । यहाँ वैसे ही आभूषण भी धारण करना उपलक्षण है । शब्दशङ्की पद से खण्डित कला की मिश्रित गति रखने की बात भी बतलाई गयी है तथा वेपमान- शरीर से कला के चौथाई भाग का काल भी संकेतित किया गया है । ४८-५४. विप्रलम्भशृङ्गार में संभोग शृङ्गार की तरह गति बतलाकर अब रसत्वेन समानरूप वाले रौद्ररस की गति बतलाते हैं - ' रसे रौद्रे ' इत्यादि से । दैत्य, दानव आदि में प्रयुक्त कहने का आशय यही है कि उनमें क्रोध के बिना भी रौद्रता रहती है । यह बात रसाध्याय में पूर्व में कही जा चुकी है क्योंकि इनमें एक ही रस ( रौद्र ) होता है । यहाँ ताल शब्द काल का प्रमाणवाची समझा जाए । ' तालान्तरपातित्व ' से जितने समय उत्क्षेप हो उससे न्यून काल में पालन रहने का भी संकेत है । ' तद्विधा ' - से भीमसेन सदृश व्यक्ति का ग्रहण है तथा युद्धवीर में भी ऐसे व्यक्ति की ऐसी ही गति रखने की बात की सूचना भी । ५५-५७. रौद्ररस की प्राणभूता ' उग्रता ' को बतलाने के अवसर के बीच ही पुरुषार्थ के अनुसार प्राप्त बीभत्सगति का क्रम आगया था । जिसे— ' अ ' इत्यादि से बतलाते हैं । अहृद्या मही स्मशान की भूमि या जहाँ युद्ध होने से कट - कट गिरने वाले नरदेह ( कबन्ध आदि के कारण भूमि स्मशान बन गयी हो । ५७-५६. वीररस की गति - ' अथ वीरे च ' इत्यादि से बतलाते हैं । ' पादविक्षेपका अर्थ है विस्तार से क्षेप या पाद का स्थापन करना । इससे ' स्पन्दिता ' तथा ' अपस्यन्दिता ' चारी का ग्रहण सूचित होता है तथा इसमें गन्तव्य प्रदेश में शीघ्रता से आगे बढ़ कर स्थान प्राप्ति करना अभीष्ट होता है । वीर तथा रौद्र रस में आवेग नामक भाव का स्पर्श रहने से यहाँ कभी धीरे तथा कभी द्रुत प्रचार भी विहित माना गया है । आवेग की दशा में--कला गत प्रमाण वाले काल के अनुगत गतिशील पैरों के द्वारा तीन पादपात किये जाए । एक लघुपात एक दूसरे की ओर दो द्रुतपात तथा फिर एक कला का विश्राम । यह वीर तथा रौद्र दोनों रसों में ' गतिपरिक्रम ' होता है ।