भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 521–530
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 521–530
पृष्ठ 521
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
दशम अध्याय ( शारीराभिनय ) १. शारीराभिनय के क्रम में उर: कर्म बतलाये हैं जो पाँच हैं । २- ३. आभुग्नउर: - इसमें वक्षः उन्नत या तान कर निष्क्रान्त, शुद्ध या भुग्न अंस जिसमें रहें ऐसा रखा जाता है । ४-५. इस वक्षःस्थल की योजना अतिशय हर्ष में भाषण करने में भी होती है [ द्र ० ना ० शा ० संग्रह - ४५६ ] ६-७. हिक्का = हिचकी लेना । ११-१५. पार्श्व ( बाज ) के पाँच कर्म तथा उनकी योजना दी गई है । १८. उदर के चौथे प्रभेद का प्रक्षिप्त पाठ के अनुसार ' सम ' नाम है । तथा अन्य मत के अनुसार ' रिक्त - पूर्ण ' भी एक प्रभेद है जिसकी योजना श्वास-योग में की जाती है । २१-२६. कटि - कर्म के पाँचप्रभेद स्वरूप तथा उनकी योजना को मुनि ने दिखलाया है जिसका है सभी पश्चाद् भावी नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों के द्वारा अनुसरण किया गया । २७-३२. कटिकर्म के निरूपण के पश्चाद् मुनि ने ऊरू की पांच स्थितियाँ वर्णित की तथा उनकी योजना भी । ३३- ३६. जंघा के विवरण के बाद मुनि ने जंघा के पांच कर्म, स्वरूप तथा उनकी योजना को बतलाया । ४० - ५४. पादकर्म का विवरण देते हुए मुनि ने इसके पांच प्रभेद बतलाकर उनका स्वरूप तथा योजना भी दिखलाई तथा अन्त में ' सूचीपाद ' का स्वरूप बतला कर उसकी योजना का निरूपण किया । ५५-५७, नाभि, जंघा, उरु के करण रूप में दिखलाये गये कर्मों से भिन्न पादकर्म होते हैं । कटि आदि की गतियाँ मण्डल भेद से निष्पन्न होती है, अतः कटि आदि से पाद पर्यन्त कर्म को ही मिलाकर ' चारी ' कही जाएगी क्योंकि वह समान करण से निष्पन्न होती है । इस प्रकार अङ्ग ' के विभिन्न प्रदेशों का विवरण इस अध्याय में देकर अभिनय के तत्त्वों को प्रस्तुत कर अगले अध्याय में चारी रूप व्यायाम को देने के सूत्रपात के द्वारा अध्याय समाप्ति को भी दिखलाया गया है ।
पृष्ठ 522
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
एकादश अध्याय ( चारीविधान ) १- २. दशम अध्याय की समाप्ति पर ' चारी व्यायाम लक्षण ' पद कहा गया था । यहाँ ' चारी ' शब्द की व्युत्पत्ति पर विचार कर इस शब्द की व्याख्या उचित होगी । चर् धातु से औणादिक इन प्रत्यय से भिन्न ' इ ' को ङीप् कर चारी शब्द निष्पन्न होता है । चारी द्वारा आकाश तथा पृथ्वी पर चलने का अभिनय किया जाता है अतः आकाश एवं भूमि की चारियाँ होती हैं । ' व्यायाम ' शब्द का अर्थ है ' व्यायच्छते ' इति अर्थात् अनुगत होना । इसमें परस्पर एक दूसरे से मिलती हैं । विधान शब्द का अर्थ है योजना । अतः परस्पर योजना से होने वाली चारियाँ व्यायाम शब्द का अर्थ होने से चारी ही व्यायाम है । ये चारियाँ किस से मिलती हैं? इस प्रश्न के उत्तर में यही व्यवस्था है कि पूर्व चारी पर में मिलती है किन्तु पर - चारी पूर्व में नहीं मिलती यह नियम हैं । यहाँ नियत स्थिति अर्थात् विधान या प्रक्रिया के कारण हस्त या पाद में से कोई अङ्ग प्रधान तथा अन्य अप्रधान हो जाता है अतः यहाँ प्रधानभूत अङ्ग के अनुरोध से अन्य अङ्ग प्रवर्तित होते हैं । जैसे जब किसी अभिनय में हस्त प्रधान हो या किन्हीं गतियों के अभिनय में पाद प्रधान हों तो उनके उपयोग में आनेवाली चारी प्रधानता को प्राप्त करती है । ऐसी स्थिति में प्रधान चारी के सम्पन्न होने पर पूर्वाचारी का आश्रयण परा चारी से किया जाता है । इस प्रकार परस्पर नियत रहनेवाली चारियाँ व्यायाम हो जाती हैं । यह व्यायाम संक्षिप्त, मध्यम तथा विस्तीर्ण भेद से तीन प्रकार का माना जाता है । ३. एक का अर्थ है एकाकी जिससे श्रोणीप्रदेश ( कटि के पीछे का भाग ) के प्रचार का भी संकेत समझना चाहिये तथा आदि शब्द से कटि को लिया जाता है । तब श्रोणी का स्पन्दन तथा जंघा का चलन प्रदर्शित किया जाता है । द्विपाद शब्द में पाद शब्द से उसका प्रचार या गति समझना चाहिए । यह करण दो पैरों के प्रचार से होता है तथा संक्षिप्त व्यायाम भी कहलाता है जिसका अभिनयों में प्रयोग किया जाता है । ४. कारिका के ' करणानां ' इस बहुवचन पद से तीन करण ग्राह्य समझन चाहिए क्योंकि तीन में बहुत्व अपेक्षित है । यदि यहाँ चार या पांच कारण
पृष्ठ 523
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४१२ नाट्यशास्त्र रखें तो फिर नियमन नहीं हो पाएगा तथा खण्डों से मण्डलों का सहयोग बन पाएगा । आशय यही है कि चारी में एक पाद का, का प्रविभाग भी नहीं पादवृत्तियों से एक करण में दो पादों का, खण्ड में छः पादों का इस प्रकार अभिनय बनते हैं, जिन्हें मध्यम व्यायाम समझना चाहिए । के बाद बढ़नेवाले ' का आशय है कि केवल तीन या चार तीन या चार खण्डों से ' मण्डल पाँच, ' छः से ही मण्डल बनता हो ऐसा नहीं समझना चाहिए; क्योंकि खण्डों से भी मण्डल बनाता है जिन्हें आगे कहा भी गया है । या सात खण्डों साधे जाते हैं । यथा— शस्त्र का फेंकना, ५. चारी से अनेक कार्य चक्र का प्रक्षेप, कुन्त ( भाले ) का फेंकना, युद्ध में हनन तथा सुदर्शनादि आदि जिनमें चारी का ही उपयोग होता है । प्रतिहनन के अभिनय का परामर्श किया गया है जो नाट्य-६. यहाँ ' यत् ' शब्द से चारियों की विस्तीर्णता का संकेत करता है । जो अभिनय मस्तक तथा हस्त प्रदेश में प्रस्तुत किया जाता है पर इन सभी अङ्गों का जैसे अंगों द्वारा स्वतन्त्ररूप किया जाता है तथा चारी पूर्वापरभाव के साथ चारी के साथ भी प्रयोग से उपयुक्तता में ध्यान में रख कर ( इनके का भी इसी कारण पूर्वापरभाव साथ ) प्रयोग रखा जाता है । दिखलाये गये हैं । ७. इस कारिका में चारी की योजना के प्रदेश अङ्गहारों के अभिनयप्रदर्शन आदि में इनका योग इनमें नृत्त में करण तथा बतलाया रहता है । जिसे कहा जा चुका है तथा आगे भी विषयानुसार में इनकी योजना को न्याय के प्रसंग में आगे कहा जाएगा । युद्ध के विषय का विवरण गतिप्रचार जाएगा तथा गति के विषय में इनके प्रयोगादि में १३ वे अध्याय में आगे दिया जाएगा । इस प्रकार तीन अध्यायों नामक को यहाँ तीन शब्दों ( नृत्ते, युद्धे, गतौ ) के द्वारा सूचित किया प्रतिपाद्य अर्थ गया है । होने से इन्हें ' भौमीचारी ' कहते हैं । ८-१३. भूमि में या उस पर सम्पन्न चारी होगी । ऊपर या आकाश में चलने वालों की आकाशिकी इसी प्रकार प्रकार आकाशिकी चारी के भी सोलह प्रभेद चारियाँ सोलह हैं । इसी होते हैं । ( क्रमशः विवरण आगे से आरम्भ होता है । ) भौमी: -क्योंकि पादादि के समानकरण होने पर चलना १४. समपादाचारी ऊपर या नीचे रहेगा तो ऐसी स्थिति में चारी तो होगा ही, जो आगे या पीछे इसके उत्तर में यही भी और समपादा भी समता के कारण कैसे होगी? में पैरों को समान जा सकता हैं कि जब अभिनेता किसी स्थान विशेष कहा
पृष्ठ 524
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ११ ४१३ रूप में रख कर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जावे तो चलने से चारी होगी और पादों की समानरूपता से यह ' समपादा ' भी कहलाएगी । यहाँ योग्यता अर्थात् स्थान के संश्रय के कारण ऐसा व्यवहार एवं नामकरण हुआ है ऐसा समझना चाहिए । १५. स्थितावर्ता - चारी: - पैर के अगले भाग से संचार करने में भूमि पर पैर को घिसट या घिस कर रखते हुए चलना होता है ऐसी चलने की स्थिति अग्रतल संचर पाद की रखकर अभ्यन्तर मंडल बनावे अर्थात् द्वितीय बाजू की जानु को स्वस्तिक आकार में रखे तथा जब स्वस्तिक रूप में जानु संश्लिष्ट हो जाए तब दूसरी का उत्सारण किया जाए । एक के स्थान को ऊपर खींच कर ले जाये या ऊपर अपनी ओर खीचें । यही उत्सारण है । १६. शकटास्या चारी: - निषण्णाङ्ग अर्थात् शरीर के पूर्वीयाभाग को प्रयत्न से धारण किये हुए । जिस प्रकार शकट असनीय अर्थात् क्षेप्य हो उसी रूप में शरीर को लाना शकटास्या है । १७. अध्यर्धिकाचारी: दाहिने पैर को एडी की ओर पीछे रखा जाए तब उस दाहिने पैर की स्थिति उपसर्पण के समय आधी तिरछी होती है जो आवे ताल से अधिक अन्तर पर रखी जाती है । यह करणों की प्रधानता के कारण है तथा इस प्रक्रिया में वामचरण की स्थिति भी पृष्ठ या पीछे लगी हुई रहती है । १८. चाषगति चारी - वैसे प्रायः सभी चारियों में दाहिने पैर का अपसर्पण होता है । यहाँ एक ताल के परिमाण से दाहिने पैर को आगे फैला कर उसी को दो ताल मात्रा में पीछे रखा जाता है । यहाँ बायें पैर का दाहिने के साथ अपसर्पण होता है । थोड़ा उछालने पर दाहिना पैर बायें से दूर हट कर फिर मिल जाता है । इस प्रकार भययुक्त अपसर्पण एवं श्लिष्टतायुक्त गति रखने से इसका नाम चाप ( नीलकण्ठ पक्षी ) गति हो गया है । १६. विच्यवा चारी: - यहाँ एकवचन में प्रयुक्त पाद शब्द का अर्थ दोनों पैरों के लिये समझना चाहिए । २०. एलकाक्रीड़िता - चारी: - इसमें एक बार उछलकर पुनः एक वार उछाल लेना पड़ता है । जिसमें पाद, जंघा, सक्थि ( जानु का ऊपरी भाग ) तथा गुल्फ ( घुटने ) को साथ - साथ गतिशील बनाना होता है तथा यह पारी पारी से उत्प्लवन होता है । इसमें एलका ( बकरी ) की गति के समान उछाल लेने के कारण इस चारी का ' एलकाक्रीडिता ' नाम भी है ।
पृष्ठ 525
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४१४ नाट्यशास्त्र २१. बद्धा चारी: - यहाँ ऊरुओं का वलन करना ही ' जंघास्वस्तिक ' पद का आशय है । जंघाओं के सम्यक् बन्धन हो जाने के कारण इसका ' बद्धा ' नामकरण किया गया है । २२. ऊरुद्वृत्ताचारी: - इसमें अग्रतलसंचर पाद की एडी जब दूसरे पैर के पृष्ठभाग की ओर उन्मुख हो और जानुओं के झुकने से जंघा आकुचित होकर दूसरी जंघा के सम्मुख वलन से उद्वृत्ता की स्थिति लेले तो ' ऊरूद्धृता ' होती है । क्योंकि इसमें उरुओं के ऊपर विवर्तन या वलनक्रिया रखी जाती है । इसकी लज्जा या ईर्ष्या के भाव प्रकाशन में योजना रखी जाती है । अन्य आचार्यों के मत में एडी को द्वितीय अग्रतलसंचर पाद के बाहर की ओर रख कर इस चारी को प्रस्तुत किया जाता है । २३. अड्डिता चारी: - अड्डधातु अतिक्रमण तथा हिंसा अर्थ में पठित है इसमें इतच् प्रत्यय से अड्डिता शब्द निष्पन्न है । इसमें एक पाद सम स्थित और दूसरा तलसश्वर की स्थिति में आगे और पीछे क्रमशः श्लिष्ट होता है । इसमें पाद अपने स्थान से अतिक्रमण करता है अतः इसे ' अड्डिता ' कहते हैं । २४. उत्स्पन्दिता चारी: - इसमें एक पैर की कनिष्ठिका अंगुली के बाहरी भाग और दूसरे पैर के भीतरी भाग से निवर्तन होता है । वह पैर का अपसारण रेचितपाद को अवधि कर करके रखा जाता है । चारी में शोभावृद्धि के लिये यह अपसारण रखा जाता है । यह क्रिया नदी के प्रत्यावर्तन रूप स्पन्दित के तुल्य रहने से इसका उत्स्पन्दिता नाम है । जिसमें रेचक नृत्त-हस्त रहता है ऐसा अन्य आचार्यों का मत है । २५. जनिता चारी: - इसमें तलसञ्चरपाद से गमन किया जाता है । यह समस्त गतियों की जननी अर्थात् उत्पादिका होती है तथा इसी से गतियों का आरम्भ किया जाता है । यही इसकी व्युत्पत्ति भी है । इसमें मुष्टिका-कार हस्त का वक्षःस्थल पर विन्यास तथा अन्य हस्त का प्रसारण केवल इति-कर्तव्यता को दिखलाने के लिये रखा गया है । २६. स्यन्दिता तथा अपस्यन्दिता चारी: - इन दोनों चारियों का एक साथ विवरण दिया गया है । इसमें समस्थित एवं निषण्ण ऊरू वाले दाहिने पैर को पश्च तालों के अन्तर से फैला दिया जाता है । इस फैलाने रूप धर्म के कारण इसका नाम भी ' स्यन्दिता ' हो गया है । इसी के विपर्यय या विपरीत स्थिति से ' अपस्यन्दिता ' चारी निर्मित हो जाती है । यहाँ प्रश्न होता है ।
पृष्ठ 526
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ११ ४१५ कि स्यन्दिता का ही विपर्यय अपस्यन्दिता क्यों माना जाए, अपस्यन्दिता विपर्यय स्यन्दिता क्यों नहीं है? इसके उत्तर में यही समझना चाहिए कि ' अपस्यन्दिता ' शब्द में लगाया गया ' अप उपसर्ग ' ही इस को विपर्यय में ला बैठाता है । २०. समोत्सारित - मत्तलीचारी: - इसमें परस्पर जंघाओं के बेध से किये जाने वाले स्वस्तिक के बीच या जब एक तलसंचरपाद हो तब दूसरा तलसंचर उसी समय होता है और दोनों ऐसे घूर्णमान या घूमते हुए पादों का जो उपसर्पण है वही इस चारी को बनाता है । इस चारी में एक सम या अविकल रूप में उत्सारित तथा दूसरी मत्तल्ली अर्थात् मद से विकल न होना या रक्षार्थ अन्यत्र पलायन करना - इस प्रकार की दो गतियाँ रहती हैं । इसकी मध्यममद के अभिनय में योजना की जाती है । २८. मत्तल्लीचारी: - इसमें अग्रतलपाद भूमि में लगता या श्लिष्ट रहता है । यहाँ पैर जंघा स्वस्तिक के योग से अर्ध व्यथ ( आधा तिरछा ) होने से तथा पैरों के घूर्णन और अपसर्पण करने के कारण यह ' मत्तल्ली ' चारी होती है । इसकी प्रगाढ़मद में योजना रखी जाती है । २६. इन चारियों का प्रयोग नियुद्ध या बाहुयुद्ध या मल्लयुद्ध में तथा इससे भी अधिक रूप में क्रमशः करण, अङ्गहार और नाट्य के प्रस्तुतीकरण में रखा जाता है । आगे आकाशिकी चारी के क्रमशः लक्षण वर्णित हैं । ३०. अतिकान्ताचारी: - इसमें कुञ्चितपाद ( १०।५३ ) को दूसरे पैर के घुटने के क्षेत्र में रख आगे की ओर फैलाया जावे और चतुस्ताल की दूरी तक ( पैर को ) ऊपर उठाकर भूमि पर गिराते हैं । गन्तव्य के अति-क्रमण करने के कारण इसका ' अतिक्रान्ता ' नामकरण है । ३१. अपक्रान्ताचारी: - इसमें बद्धाचारीको पहिले सम्पादित कर फिर पैर को ऊपर उठाकर बाजू में क्षिप्त या अपक्रमणदशा में करने से इसे ' अपक्रान्ता ' कहा गया है । ३२. पार्श्वक्रान्ताचारी 1: - इसमें कुश्चित पाद को की ओर ले जाकर भूमि पर एडी कों गिराया जाता है । के बल से एडी का उद्घट्टित होना यहाँ सूचित होता है । हैं कि द्वितीय पाद को उसके क्षेत्र तक उत्क्षिप्त रख कर पर पटका जाता है यही ' पार्श्वक्रान्ता ' है । रखते हैं । अपक्रमण अपनी बगल से ऊपर इसलिये कुञ्चितपाद अन्य आचार्य कहते उद्घट्टित कर भूमि ३३. ऊर्ध्वजानुचारी: - यहाँ ' क्रमस्तब्ध ' पद से पाद के उत्क्षेपण के बाद उसे निश्चल करना ही ' स्तब्धता ' होती है ।
पृष्ठ 527
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४१६ नाटयशास्त्र ३४. सूचीचारी: - जानु से ऊपर ऊरू तक जंघा को पूरी फैला कर अग्रभाग से भूमि पर गिरावे । इस प्रकार यह ' सूची ' के आकार की होने से ' सूची ' कहलाती है । ' पृष्ठतः ' पद का भाव है कि ' अंचित'-३५. नूपुरपादिका - चारी: - यहाँ पाद को पीछे की ओर एड़ी को छूते हुए अन्त तक ले जावे । बाजू में उस ' अग्रतल - संचर ' पैर को पृथ्वी पर पटका जाए । ऐसा करने पर नूपुरों की आवाज निकलेगी जिससे शीघ्रता प्रकट होगी तथा नूपुरों की योजना झनझन भी । इसी आधार पर इसका नामकरण भी हुआ है । ३६. दोलपादाचारी: - यहाँ ' उत्क्षिप्य ' पद से आशय है कि कुश्चित-दक्षिणपाद के क्षेत्र तक बगल में ले जाए और फिर वहाँ दोला के पाद को कर बाद में उसे एड़ी की बाजू में पृथ्वी पर पटके । यह आकार में स्पन्दित ' दोलपादा ' का स्वरूपानुसारी नाम है । ३७. आक्षिप्राचारी: - यहाँ ' आक्षिप्त ' पद से आशय है कि कुश्वितपाद को आगे तीन ताल के अन्तर में ऊपर उछाल कर अंचित के अर्धमण्डल आकार में दूसरी बाजू में ले जावे और स्वस्तिक कर पृथ्वी पर पटके । ३८. आविद्वा चारी: - विश्लिष्ट जंघावाले स्वस्तिक बने कुञ्चितपाद जाए और उसी ' आविद्ध ' अर्थात् संश्लिष्ट उसी पाद को बाजू में को फैलाया द्वितीय पाणि ( एडी ) के क्षेत्र में तदनुसार पटके । ३१. उद्वृत्ताचारी: — यह चारी आविद्धा की शेषभूता मानी जाती है । इसमें आवेष्टन अर्थात् दूसरे ऊरु के क्षेत्र की पाष्णि तक उछाल लेकर ' भ्रमरक ' की तरह एक पाद को पृथ्वी पर पटकना होता है; और फिर दूसरे ऊपर उद्वर्तन करना रहने से इसे ' उद्वृत्ता ' ( यथार्थ पाद का इसी प्रकार नामा ) कहते हैं । ४०. विद्युद्भ्रान्ता चारी: - ' पृष्ठतः ' अर्थात् पीछे की ओर ऊरु के मूल घुमावे किन्तु इसका आशय सही यह है कि बाजू के पीछे वलन कर मस्तक में छू ले फिर इसी के अनुसार उस पैर को अगल बगल सभी ओर गोल को चक्कर में घुमा कर फैला दिया जाए । ४१. अलाता चारी: - इसमें पहिले पाद को को पीछे की ओर फैलाकर फिर घुमा कर भीतर लिया जाए, इसके बाद द्वितीय ऊरू पर अभिमुख तल कर उसे रखे तथा इस प्रकार करते हुए अपने पास वाली एड़ी के पास उसे पटके । यह अलातचक्र की आकृति में आने से ' अलाता ' है ।
पृष्ठ 528
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ११ ४१७ ४२. भुजङ्गत्रासिता चारी: - कुश्चितपाद को दूसरे ऊरू के क्षेत्र तक ऊपर उठा कटि के बराबर ले जाकर जानु की ओर लौटा ले तथा नितम्ब के सम्मुख तिकोनी या टेड़ी एड़ी को उसी पर विवर्तित करे । इसके पश्चात् बगल की जानु पर एक पैर को उत्तानतल में स्थापित करे । पैर के समीप सर्प के आने पर भय से इधर उधर भागने वाले की तुलना से निर्मित यह ' चारी ' नामानुरूप अपनी क्रिया के प्रदर्शन के कारण सार्थकनामा है । ४. हरिणप्लुताचारी: अतिक्रान्ता चारी के प्रकरण में कथित कुचितपादको उत्क्षिप्त कर ( उछाल कर ) उसे पृथ्वी पर पटके । फिर दूसरी जँघा के पृष्ठ भाग पर अश्चित पैर रखे । इस प्रकार मृग की प्लुति ( उछाल ) के तुल्य यह चारी रहती है । इसकी विदूषक की गति में योजना रखी जाती है । ४४. दण्डपादाचारी: - ( ' नूपुरपाद ' में कथित अतिपाद को दूसरे पैर की एड़ी पर ले जाकर शीघ्रता से फैलावे । इस प्रकार ऊरू, जानु एवं जंघा की स्तब्धता से पैर के दण्डाकार स्थिति में आने के कारण इसे ' दण्डपादा ' चारी कहा गया । ४५. भ्रमरी - चारी: - अतिक्रान्ता चारी में कथित कुञ्चितपाद को ऊपर कर सांप से डरे हुए की तरह तिरछी ऊरू को विवर्तित करे और फिर द्वितीय पाद तल के घूमाने में त्रिक का भी एक घुमाव ले ले । इस प्रकार समग्र शरीर के घुमाव से नेमि की तरह चक्कर लगाने सदृश स्थिति रखने के कारण इसका नाम ' भ्रमरी ' है । TES ४६. अब इनकी योजना को दिखलाते हैं कि इन चारियों में अङ्गों की क्रिया का अभिनय सुन्दरतापूर्ण होना चाहिए और धनुष, वज्र आदि शस्त्रों के छोड़ने में इनका विनियोग रखना होता है । ४७. इन्हीं चारियों के विनियोग की व्यापक सीमा को दिखलाकर शरीर की शोभा में इनका महत्त्वपूर्ण योगदान बतलाते हैं— ' अग्रगौ ' इत्यादि के द्वारा । इसका आशय यही है कि इनमें कभी गति की प्रधानता रखी जाती है तथा कभी हस्तों के व्यापार रूप अभिनय की और कभी दोनों की भी । इनमें प्रथमपक्ष में हस्तों को पादविक्षेप के अनुसार रहने वाले तथा पादविक्षेप के बाद व्यापृत रखना होता है । द्वितीय में हस्ताभिनय के अनुगत एवं उनके पीछे पैरों की गति रखी जाती है तथा तृतीयपक्ष में दोनों की प्रवृत्ति एवं व्यापार एक ही समय में विनियोग की अपेक्षा से रहेंगे । यहाँ कारिकास्थ योग शब्द भी इसी तथ्य को प्रकट करता है । ४८. उपाङ्ग = भ्रू, नेत्र आदि अवयव । २७ ना ० शा ० द्वि ०
पृष्ठ 529
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४१८ १. नाट्यशास्त्र ४६. पाद क्रिया के समय यदि हस्ताभिनय भी हो तो पाद की गति विश्रान्त हो जाती है अतः ऐसे समय हस्त की क्या दशा हो इस आशंका के उत्तर में कहते हैं कि पादचारी की समाप्ति पर हस्त को कटिप्रदेश में रखा जाता है । ५०. पैरों को पृथ्वी पर रखने पर पादचारी के समान होने पर काय का सन्निवेश बतलाने के लिये स्थानकों को बतलाना क्रम प्राप्त हो जाता 1 ' स्थान ' शब्द भाव, अधिकरण या करण अर्थ में व्युत्पन्न है ( स्थीयन्ते इति स्थानाति, तिष्ठन्त्येषु इति स्थानानि तिष्ठन्त्येभिरिति स्थानानि ) । अतः इसके अनुसार चारी के द्वारा कायसन्निवेश भी होता है अर्थात् चारियाँ प्रथम गतिरूप होती हैं तथा बाद में जब स्थितिरूपा हो जाती तो उन्हें स्थानक या स्थान कहा जाता है । ५१. छः स्थानकों के नाम दिखलाकर सर्व प्रथम वैष्णवस्थान का स्वरूप दिखलाते हैं । ५२-५४. वैष्णवस्थानः - पक्षः स्थित पद से अंगुलियों की बाजू में अभिमुख स्थिति तथा व्यस्र के द्वारा इनका किञ्चित् स्पर्श एवं पैर का तिरछा रहना दिखलाया गया है । यहाँ सौष्ठव तथा अङ्ग पद से यदि सौष्टव अप्रधान हो तो अङ्ग प्रधान ( पुरस्कृत ) तथा अंग के अप्रधान रहने पर सौष्ठव प्रधान ( पुरस्कृत ) रखा जाना सूचित किया है तथा ' स्वभावजः ' पद से आवेश-रहित सौम्य । इस स्थान से पुरुषपात्र के ( सूत्रधार के ) प्रवेश को दिखलाया जाता है । ५५-५८. इस विवरण से प्रस्तुत स्थान की विभिन्न अवसरों तथा कार्यों में योजना बतलाई गई है । ५८- ६१. समपाद - स्थान: पद्य के ' विप्रमङ्गलधारण ' पद से ब्राह्मणों के द्वारा किये जाने वाले मंगलपाठ आशीर्वचन आदि को धारण करने में ( यजमान होकर ) इसी स्थान में स्थित रहा जाता । लिङ्गस्थ पद का अर्थ है शैव आदि संन्यासी तथा ऐसे व्रतधारी जो ऊर्ध्वकाय और फैले हुए । अंग वाले हों । ६१-६५. वैशाखस्थान: - निषष्णोरूम् = जहाँ ऊरू सूची - चारी की अपेक्षा से विश्रान्त है । विशाख = कार्तिकेय स्कन्द । व्याप्य अर्थात् छोटे अङ्गों का युद्धादि में निर्गम और वेग ग्रहण अर्थ है किन्तु इस प्रक्रिया में पाणि की प्रेरणा से पादक्रमण होता है तथा उसका पूरा विन्यास नहीं किया जाता । G
पृष्ठ 530
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ११ ४१ ९ ६५-६७. मण्डलस्थान: - घोड़ों तथा हाथियों के संचालन के समय वैशाखस्थानक का उपयोग होता है उनसे भी स्थूल वाहन गरुड़ पक्षी: आदि है उसके निरूपण में मण्डलस्थान की योजना होती है । रुड गरी ६७-७०. आलीढ़ स्थान: - आलीढ़ कहते हैं जिसमें चारों ओर से से भूमि र का स्पर्श होता हो । सम्फेट का अर्थ है संघर्षपूर्ण दशा । ७०-७२. प्रत्यालीढ़ स्थान: - इस स्थान में उत्तान तथा आकुञ्चित पाद रहता है जो प्रसारण के विपरीत है । स्थानों से शस्त्र विमोक्षण का विधान पूर्व में बतलाया गया है तथा इसी में सहायक होते हैं न्याय । अतः न्यायों के अनुसार वृत्तियों के विभाग में स्थान अंगभूत हो जाते हैं यही यहाँ समझाया है । ७२ - ७६. हन्तव्य के कटि, पाद, वक्षःस्थल एवं शिर स्थानों पर अति-क्रमण के लिये गाटयशास्त्र में चार न्याय बतलाये गये हैं । अङ्गों के औचित्य से न्याय का आश्रय लिया जाता है । न्यायों से प्रवृत्त होकर ही अंगों के स्वरूप स्वाभाविक एवं उत्कृष्ट नियमन दर्शा सकते हैं । क्योंकि उन्हीं से क्रियायें होती भी है अतः इसकी ' न्याय ' आख्या इसी कारण सार्थक है । ७६-८०. भारतन्याय: -- परिवेष्टन करते हुए ले जाना यहाँ ' परिगम ' है । उद्वेष्टित = चारों ओर से उद्वेलित किया हुआ । अतः कलाई में उद्वेष्टन करके शस्त्र का उद्बन्धन किया जाता है । ८१-८२. सात्वतन्याय: - पृष्ठतः = शरीर के पिछले भाग या पीछे से । ८२-८४. वार्षगण्यन्याय: -- इसमें शस्त्र का घुमाना ऊपर ही से मस्तक का एक चक्कर लगाते हुए कराते हैं । ८४-८८. कैशिकन्याय: – इसमें शस्त्र को अन्त में मस्तक पर ले जाया जाता है । समग्र युद्ध का अभिनय सौष्ठवपूर्ण आंगिक व्यापारों के द्वारा सम्पन्न किया जाना चाहिए । युद्ध के प्रसंग में ऐसे युद्ध के समय ) छेदन भेदन भी पात्रों के अङ्ग का हो सकता है । अतः इस विषय में यह बात ध्यान में रखने की है कि रंगमञ्च या अभिनय के स्थल पर भेदन आदि नहीं होना चाहिए । यहाँ ऐसी चेष्टाएँ रखी जाये कि प्रेक्षक गण को केवल युद्ध का भान हो सके । ऐसे विषय या प्रसंग नाटक या प्रकरण में यदि रखे जायें तो युद्ध को केवल संज्ञा ( इङ्गित या चेष्टायों ) के द्वारा दिखलाया जाए । यही यहां उचित माना गया है । यहाँ ' अथवा ' पद के द्वारा व्यवस्थितविकल्प की सूचना दी गयी हैं । -६०. सौष्ठव: -- अङ्गों के प्रसंग में पूर्व में जिस सौष्टव को कहा