भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 571–580
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 571–580
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४६० नाट्यशास्त्र काल प्रवाह से ( कारण ) भरत के ग्रन्थ में ही पाठान्तर के रूप में प्रविष्ट या समायोजित कर दिये गये । ऐसे सभी लक्षणों का यथा स्थान विवरणादि यहाँ प्रकाशित किया जा रहा है । ६. भूषण: - जहाँ भरतोक्त उपमा आदि अलंकारों तथा श्लेष आदि गुणों से कथा शरीर की रचना समुल्लसित होती हो वह ' भूषण ' है । यहाँ ' चित्रार्थः ' पद के द्वारा विभावादि रूप सामग्री के प्रत्यायक होने के कारण उसके उद्योतक अर्थ विशेषों के द्वारा या वक्रोक्ति से कथा शरीर का समुल्लास किया जाना सूचित किया गया है । यथा— रत्नावली नाटिका में प्रथमाङ्क में यौगन्धरायण का निम्न वचन-' विश्रान्त विग्रह - कथो रतिमाञ्जनस्य चित्ते वसन् प्रियवसन्तक एव साक्षात् । पर्युत्सुको निजमहोत्सवदर्शनाय वत्सेश्वरः कुसुमचाप इवाभ्युपैति । ( २०१1८ ) [ जिसकी शासन पद्धति में विग्रह की बात नहीं होती, जिन पर प्रजाजन का अनुराग है, जो सब के चित्त में बसते हैं, जिन्हें वसन्तक अति प्रिय है वही यह वत्सराज उदयन साक्षात् अशरीरी मदन होकर साथ में रति को लिये हुए प्रजाजन के चित्त में निवास करने वाले मदन सा महोत्सव को देखने के लिये यहाँ आ रहा है । ] यह भूषण की ही अतिशयिता है जिसमें सामान्य बात से काव्य का पार्थक्य स्पष्टतः दिखलाई देता है । अतः जहाँ गुण एवं अलङ्कारों के द्वारा कथारूप वक्रोक्ति अतिशयित हो जाती या की जाती हो वहाँ ' भूषण ' समझना चाहिए यह स्पष्ट है । ७. अक्षरसङ्घात: - यहाँ विविध श्लेषमयी उक्तियों से या अक्षरों के विपर्यासादि से उक्ति प्रत्युक्ति में विचित्रता आये तो ' अक्षर - संघात ' है । जैसे उभयाभिसारिका में -विट: - भगवति, वैशिकाचलोऽहमभिवादये । परिव्राजिका -- न वैशिकाचलेन प्रयोजनं न च वैशेषिकाच विट: - अस्येतत् कारणम्? परिव्राजिका-- षट्पदार्थ बहिष्कृतैः सह सम्भाषणमस्मद्गुरुभिर्निरुद्धम् । [ विट -- भगवति मैं वैशिकाचल आपका अभिवादन करता हूँ । परिव्राजिका- मुझे न वैशिकाचल से कुछ काम है न वैशेषिकाचल से । विट इसका कारण । परिव्राजिका - छः पदार्थों का बहिष्कार करने वालों से संभाषण न करना हमारे गुरुजी ने बतलाया है । ] इत्यादि ।
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १७ ४६१ अथवा - " अभिज्ञानशाकुन्तल " के सप्तमांक में- ' शकुन्तलावण्यं पश्य ' में ' शकुन्तला ' पद से शकुन्त के लावण्य तथा शकुन्तला को सूचित करना । ८. शोभा: - जहाँ सिद्ध प्रयोजनों से असिद्ध का चमत्कारी अर्थ निर्णय करता या सूचना देता है और वह भी शुभ संघटना, श्लेष, वक्रोक्ति या ध्वनि की महिमा द्वारा तो वह ' शोभा ' होती है । कई लोक - स्वभाव के प्रकटन को ' शोभा ' बतलाते हैं । अन्य जन युवक एवं युवतियों के सहज मनोभावों का प्रकटन ' शोभा ' मानते हैं । यह अर्थ प्रधान वस्तु में परम शोभा प्राप्त करती है । जैसे रत्नावली के प्रथम अंक में यौगन्धरायण -- ' द्वीपादन्यस्मादित्यादि ' ( २० १ । ६ ) के बाद कहता है कि प्रारब्धेऽस्मिन् स्वामिनो वृद्धि at दैवेनेत्थं दत्तहस्तावलम्बे । सिद्धे भ्रान्तिर्नास्ति सत्यं तथापि स्वेच्छाचारी भीत एवास्मि भर्तुः ॥ ( रत्ना ० १ । ७ ) [ स्वामी के अभ्युदयार्थ जो कार्यारम्भ किया गया है उसी में भाग्य के द्वारा इस प्रकार सहारा दे दिया है कि अब उसकी सिद्धि में सन्देह नहीं रहा है, परन्तु फिर भी यह सभी मैंने अपने ही मन से किया इसलिये अपने स्वामी से भयभीत मैं अवश्य हूँ । ] कथाशरीर की संघटना रूप शोभा के आधार पर ही यहाँ मधुरता की प्रसक्ति है । ६. उदाहरण: - जहाँ दूसरों के ( शत्रु आदि जन के ) परम रहस्य पूर्ण या दुर्भेद्य अर्थ को तुल्यार्थक वाक्य से दूसरों के लिये निपुण जन प्रकाशित कर दें तो — ' उदाहरण ' है । जैसे देवीचन्द्रगुप्त नाटक में प्रावेशिकी ध्रुवा से संशयाकुल चित्त वाले चन्द्रगुप्त के प्रवेश सूचक अर्थ को द्योतित करना ।
जैसे-एसोसिअकर - वित्थर पणा सिआसेसवेरितिमिरोहो ।
णि अविव रोणचदो गअणगिहं लंघिऊँ विसई ॥
एषः शीतकर विस्तरणाशिता शेषवैरि तिमिरौघः ।
निजविभववरश्चन्द्रो गगनगृहं लङ्घितुं विशति ॥
[ यह चन्द्र अपने शीतल करों के फैलाव से समग्र शत्रुभूत अन्धकार को नष्ट करते हुए अपने ही आकाश रूप गृह को पार करने की इच्छा के लिये वहाँ प्रवेश कर रहा है । ]
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४६२ १०. हेतु:: - जो वचन फल को सिद्ध करने का सामर्थ्य लिये हो, जिसमें शब्द एवं अर्थ परिमित रहे तथा जो विचित्र शैली में कहे ' हेतु ' । जैसे तापसवत्सराज के षष्ठ अंक में मरण का निश्चय वासवदत्ता को समझाने के लिये यौगन्धरायण का यह कथनः आसृष्टेः प्रतिपार्थिवं युवतयों जाताः मनोवल्लभाः मग्नास्ते व्यसनार्णवे च बहवस्ताभिः सहैवेश्वराः । देव्या यत्तु कृतं तदाविकलतामुत्सृज्य लोकोत्तरं तस्यैषा कृपणोचितेन विधिना कि ग्लानिरुत्पद्यते ॥ जाएँ तो-करने वाली SIER [ जब से इस सृष्टि का आरम्भ हुआ है तभी से प्रत्येक राजा को उसकी युवतियाँ प्रिय होती रही है । ये प्रेयसियाँ घोर शङ्का में निमग्न मनोनुकूल रही और उनके समर्थ एवं ईश्वर पति भी इसी में डूब गये । किन्तु महादेवी ने जो उस समय ( भी ) विकलता को छोड़ कर लोकोत्तर कार्य कर उसके विषय में अब यह दीनता से ग्लानि क्यों उत्पन्न हो रही है । ] डाला यहाँ देवी ने जो किया वह इष्टार्थ साधक है तथा उससे शीघ्र ही आप स्वयं शुभफल का अनुभव करेंगी । " इत्यादि में हेतु है । ११. संशय: - वाक्य के पूर्णतः समाप्त न होने से साध्यविषय के स्वरूप या अवस्था में सन्दिग्धता आना ' संशय ' है । इसका अर्थ एवं काम प्रधान रूपकों में निपुणता के साथ प्रयोग रखा जाता है । जैसे- कुन्दमाला के षष्ठ अंक में रामायण कथा के वाचक लव तथा कुश कहते हैं: -- सीतां निर्जन सम्पाते चण्डश्वापदसङ्कुले । परित्यज्य महारण्ये लक्ष्मणोऽपि न्यवर्तत ॥ ततः प्राणैः परित्यक्ता निराशा जनकात्मजा । ( इति तूष्णीं भवतः ) अप्रियाख्यानभीतेन कविना संहृता कथा ॥ किमितः कल्याणमावेदयति । एवं तावदनुयोक्ष्ये । ( इति पृच्छतः ) [ निर्जन तथा भयंकर हिंसक प्राणियों से व्याप्त महारण्य में सोता का परित्याग कर ( जल्द ) लक्ष्मण जी वापस चले गये तब प्राणों से भी प्रिय एवं प्रियजन के द्वारा छोड़ी गयी निराश सीता ने - ( इतना कहकर चुप हो जाते हैं । ( तब राम और लक्ष्मण कहते हैं कि ) सम्भव है अप्रिय सत्य के कहने से डर कर कवि ने यहीं कथा का उपसंहार कर डाला हो । ]
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १७ ४६३ यहाँ संशय है । संशयालङ्कार का चमत्कार संशय नामक इस लक्षण से भिन्न होता है । १२. दृष्टान्त: - धर्म के अविरोध से सभी जन के मन का आकर्षक ऐसा वचन जो सकारण तथा निदर्शन युक्त हो ' दृष्टान्त ' कहलाता है । जैसे ' धूर्तविट ' में ' स्त्रीषु प्रसङ्गो न कर्तव्यः इस विषम में भाव का क्या मत है? यह पूछे जाने पर विट - भीः उपदेशमात्रं खल्वेतत् । तमहं न पश्यामि यः स्त्रीषु प्रसङ्गं न गच्छेत् । श्रूयन्ते हि महेन्द्रादयोऽप्यहल्यास विकृतिमापन्नाः ' इत्यादि कथन में दृष्टान्त है । १३. प्राप्ति: - इसका उदाहरण कुन्दमाला के तृतीय अङ्क में बालुका पर पद चिन्हों को देखकर लक्ष्मण ने राम के प्रति कहा
विलासभोगेन परिश्रमेण वा स्वभावतो वा निभृतानि मन्थरम् ।
पदानि कस्याश्चिदिमानि सैकते प्रयान्ति तुल्यं कलहंसविभ्रमम् ॥
रामः ( निर्वर्ण्यं सहर्षम् ) किमुच्यते कस्याश्चिदिति । ननु वक्तव्यं सीतायाः पदानीति । पश्य-समानं संस्थानं निभृतललिता सैव रचना pls ] तदेवैतद्रेखा कमल रचितं चारुतिलकम् । यथा चेयं दृष्ट्वा हरति हृदयं शोकविधुरं तथा ह्यस्मिन् देव्या सपदि पदपङ्क्तिविनिहिता ॥ [ -क्रीड़ा करते हुए, परिश्रम से भागते हुए या स्वभावतः मन्थरता से बालुका में धंसे हुए ये किसी के पैर कलहंस के विभ्रम की शृङ्गार मयी चेष्टाओं की समता कर रहे हैं । राजा राम -- ( ध्यान से देखकर प्रसन्न हो ) अरे ये किसी के पैर हैं ऐसा क्यों कहते हो । अरे भैया, ये तो सीता के ही पैर हैं । देखो --पैरों का विन्यास समानरूप वाला है, वही निभृत ( विनीत ) एवं ललित रचना है, यही वह रेखा है जिनसे तिलक एवं कमल बड़े ही सुन्दर रूप में बन गये है | देखने पर यह पदपंक्ति शोक से विधुर विकल हृदय को आकृष्ट कर रही है । जिससे प्रतीत होता है कि यहाँ ( सीता ) देवी ने अपने पैरों को अभी तत्काल ही रखा है । ] यहाँ प्राप्ति है । १४. अभिप्रायः - अभूतपूर्व अर्थात् अद्भुत या असत् अर्थ जो केवल कल्पित है । अन्य आचार्य अभूतपूर्व पद का अर्थ आस्वाद्य पदार्थ में अपूर्वता
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४६४ नाट्यशास्त्र का अभिमान करते हैं परन्तु यह भावविलक्षणता से शून्य होने तौत के मत में अनुपयुक्त है । जैसे तापसवत्सराज के चतुर्थ अंक यनी यौगन्धरायण के उद्योग को देखकर सोच कर चर से कहती
दूरमुदीर्णे रिपो वेवमकिञ्चित् करे च विजिगीषौ ।
भवता तु नयगुणशतैः सोऽयमसूत्रः पटः क्रियते ॥
[ शत्रु अपनी जबरदस्त शक्ति के साथ बड़े जोर से उठ पर आचार्य में साङ्कृत्या-है-खड़ा हुआ है विजिगिषु महाराज इस समय कुछ भी करने की स्थिति में नही है और आप सैकड़ो नीतिरूपी उपायों से बिना सूत्र के ही अपना कपड़ा बुन रहे हैं । ] १५. निदर्शन: - प्रसिद्धानां अर्थात् देवताओं का, परापेक्षा = साध्या-कांक्षा से व्युदासार्थ = हटाने या दूर करने के लिये । जैसे: -- उभयाभि-सारिका में--शान्ति याति शनैर्महोषधिवलादाशीविधानां विषं शक्यो मोचयितुं मदोत्कटकटादात्मा गजेन्द्राद्वने । ग्राहस्यापि मुखान्महार्णवजले मोक्षः कदाचिद् भवेद् वेशस्त्रीवडवामुखानलगतो नैवोत्थितो दृश्यते ॥ [ औषधियों के प्रभाव से सर्पों का विष शान्त हो जाता है, अरण्य में प्राप्त मदोन्मत्त हाथी से अपने आपको छुड़ाया जा सकता है, मदोत्कट ग्राह से भी महासमुद्र में मोक्ष हो सकता है परन्तु वेशस्त्री रूप वडवा की मुखाग्नि में पड़ा हुआ व्यक्ति कभी नहीं निकला और उसे किसी ने भी आज तक उठते हुए नहीं देखा । ] इसी कारण इसका दृष्टान्त से स्वतः भेद हो जाता है । १६. निरुक्तः - पूर्वोक्तार्थ = पूर्व में जो किसी बाह्य अर्थ का सम्बन्धी कोई अर्थ कह दिया गया है उसकी प्रसिद्धि के लिये अनवद्य भाव का वाचक जो शब्द कहा जाए वह निरुक्त है । अतः इससे अन्यथा करने पर अर्थ निरर्थक हो ही जाएगा । जैसे वत्सराजचरित के प्रथम अंक में भरतरोहक राजा से कहता है--भरतरोहकः -- प्रसह्य हरणे केवलं प्रमादिताख्यातिः । राजा -- किमेतत्! भरतरोहकः - सदोषेषु कार्येषु यदल्पदोषं तत् प्रारब्धव्यम् । वसुवर्मा -- स्वामिन्, तत्राप्यहं वाच्यदोषं न पश्यामि । कुतः --नीता बलात् प्रकृति भद्रतरा सुभद्रा यद्वासुभद्रभगिनी कपिकेतनेन । देवस्य तेन समभूद्वचनीयता किं तेजःप्रकाशयशसां यदुदन्तिनां वा ॥
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १७ ४६५ शालं साधु निरुक्तमभिहितं वसुवर्मणा ॥ [ भरतरोहक - बलात् हरण करने में प्रमादी होने की केवल ख्याति मात्र होती है । राजा - यह क्या कहते हो । भरतरोहक - सदोष कार्य के रहने पर भी जिसमें दोष कम रहे ऐसे कार्य का आरम्भ कर दिया जाता है । वसुवर्मा - स्वामिन्, मैं तो इसमें कोई उल्लेखनीय दोष नहीं देख रहा हूँ, क्योंकि स्वभावतः कल्याणमयी श्रीकृष्ण की बहिन सुभद्रा को बलात् अर्जुन ने हरण कर लिया तो क्या इससे अर्जुन की निन्दा हुई या अपने तेज की तरह चमकने वाले हाथियों की निन्दा हो गयी । शालङ्कायन – अच्छा । वसुवर्मा ने तो यह वैदिक पदों का निरुक्त ही कह डाला । ] १७. सिद्धि: - प्रधानानाम् अर्थात् जो स्पृहणीय एवं अतर्कितोपनत या काकतालीय न्याय से प्राप्त हो ऐसे प्रधान प्रयत्नों का कीर्तन ' सिद्धि ' है । जैसे कौमुदीमहोत्सव के चतुर्थ अङ्क में मन्त्रगुप्त का वचन -सङ्गतिश्विरमचिन्तितपूर्वा निर्वृतप्रणयिनीमिथुनानाम् । आधिराज्यमधिरोहति तस्याः षोडशीमपि कलां न मघोनः ॥ [ - जिसका पूर्व में चिन्तन नहीं किया था ऐसा इन ( दोनों ) का या हम दोनों का यह मिलन है । युग्म या मिथुनों की संगति आनन्ददायी होती है. जिसकी सोलहवीं कला को इन्द्र का परमैश्वर्य भी प्राप्त नहीं कर सकता । 1 १८. विशेषण: - जैसे तापसवत्सराज में तृतीय अङ्क में राजा विदूषकः से कहता है कि— राजा - अयि मूढ, वृत्तिर्मूलफलादिभिः क्षितितले शय्या जटा धारणं वासो वल्कलमीदृशं कृतमिदं सामान्यमन्यैरपि । संवेगाभिभवे विगूढमनसा यन्नानुयाता प्रिया तन्मिथ्या परिबोधितेन न कृतं स्नेहानुरूपं मया । [ कन्दमूल फल आदि से वृत्ति या निर्वाह, भूमि पर शयन, जटाओं का धारण तथा वल्कल का वस्त्र रूप में धारण, ऐसा आचरण तो सामान्य जन ने भी किया है. किन्तु संवेगों के दबाने में विमूढ़ मैंने जो प्रिया का अनुनय नहीं किया यह मैंने अपने मिथ्या ज्ञान के कारण स्नेह के अनुरूप नहीं किया । ] ३० ना ० शा ० द्वि ०
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४६६ नाट्यशास्त्र १६. गुणातिपात: - जैसे धूर्तविट में विट का यह कथन-विट : -जात्यन्धां सुरतेषु दीनवदनामन्तर्मुखाभाषिणीं हृष्टस्यापि जनस्य शोकजननीं लज्जापटेनावृताम् । निर्व्याजं स्वयमप्यदृष्टजघनां स्त्रीरूपबद्धां पशुं कर्तव्यं खलु नैव भोः कुलवधूकारां प्रवेष्टुं मनः ॥ के योग्य विनय, लज्जा आदि गुणों की विपरीत अर्थ यहाँ कुलाङ्गनाओं में योजना करने से ' गुणातिपात ' है । २०. अतिशय: - जैसे कुरुराज दुर्योधन के लज्जित होने के प्रति भीष्म की यह उक्ति: -एतत्ते हृदयं स्पृशामि यदि वा साक्षी तवैवात्मजः सम्प्रत्येव तु गोग्रहे यदभवत्तत्तावदाकर्ण्यताम् । एक: पूर्वमुदायुधैः स बहुभिर्दृष्टस्ततोऽनन्तरं पर धृतराष्ट्र वयमाहवप्रणयिनस्तावन्त एवार्जुनाः ॥ इति । यावन्तो: - जैसे वत्सराज चरित के अष्टम अंक में राजा का २१. तुल्यतर्क यह कथन: - । नवार्कभापल्लवितामलोदरे सुगन्धिरेणूत्करकेसरोज्ज्वले भ्रमरः सरोरुहे किमर्कपुष्पे प्रणयं करिष्यति ॥ जिसका रसामृतज्ञो निर्मल उदर सूर्य की किरणों से पल्लवित है तथा जो सुगन्धित [ एवं केशरों से उज्ज्वल है, ऐसे सरोज के रसामृत का मर्मज्ञ रेणुओं के समुदाय भ्रमर क्या अर्क पुष्प में प्रणय रखेगा । ] अंक में राजा सचिव की २२. पदोच्चय: - जैसे वत्सराजचरित के षष्ठ उत्तमता का वर्णन करते हुये कहते हैं । राजा - खङ्गो रक्षान्धकार रविररितिमिरे कार्यभारेषु धुर्यः दीपो मन्त्रान्धकारे सुरगुरुरनये सङ्क्रमो व्यापदोघे । उत्कण्ठायां सभागी गतिरनवसरे चन्दनं शोकतापे हितशिवसुखदो भव्यचिन्तामणिर्मे ॥ सङ्क्षेपान्मानुषाभो अन्धकार में खड्ग की तरह शक्ति रखने वाले, शत्रु रूप [ रक्षा रूप में सूर्य, कार्यभार को वहन करने में धुर्य ( वृष ) हो तिमिर को नष्ट करने के समय आने वाली कठिनाइयों में धरा को धारण करने में समर्थ, मन्त्रणा दीपक की तरह प्रकाशक, अनीति के आने पर बृहस्पति की तरह विपत्तियों दूर करने वाला, उत्कष्ठा के समय साझीदार, अनवसर में गति की तरह को
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १७ ४६७ मागं दर्शक, शोक रूपी ताप को हटाने में चन्दन जैसा शीतल होने से संक्षेप में इतना ही समझना चाहिये कि मनुष्य के रूप में हित एवं मङ्गल को देने -वाला यह अमात्य एक उत्तम चिन्तामणि ही होता है । २३. दिष्ट ( दृष्ट ): III जैसे मालविकाग्निमित्र में नायिका वर्णन-वामं सन्धिस्तिमितवलयं न्यस्य हस्तं नितम्बे कृत्वा श्यामा विटपसदृशं स्रस्तमुक्तं द्वितीयम् । पादाङ्गुष्ठालुलितकुसुमे पातिताक्षं नृत्तादस्याः स्थितमतितरां कान्तमृज्वायताक्षम् ॥ [ इस नायिका का वामहस्त वलय सन्धियों में निश्चल होकर नितम्ब पर स्थापित है तथा दूसरा हाथ श्याम विटप वाली लता के सदृश खुला छोड़ दिया गया है । पैरों के अंगूठे से कुसुम को ठुकराती दृष्टि को फर्श पर टिका कर रखे हुए यह कान्त, ऋजु तथा विस्तीर्ण नेत्र वाला नृत्त इस समय अतिशय सुन्दर हो पड़ा है । ] यह प्रत्यक्ष दृष्ट का उदाहरण है । परोक्ष दृष्ट का उदाहरण जैसे पात-ताडितक में मदनसेना का यह वर्णन -उत्क्षिप्तालकमीक्षणान्तगलितं कोपाचितान्तभ्रुवा दष्टाष्ठमधी रदन्त किरणं प्रोत्कम्पयन्त्या मुखम् । शिञ्जन्नूपुरया विकृष्य विगलद्रक्तांशुकं पाणिना मूर्धन्यस्य सनूपुरः समदया पादोऽर्पितः कान्तया ॥ [ जिसमें कोप के कारण भ्रुकुटियाँ तनी हुई हैं, नेत्रों के समीप लटके हुए अलकों को ऊपर उठाये हुए है, आधा ओठ दाँतों से दबाया हुआ है, स्वच्छ दन्त किरणें अधीर मुख को कम्पित कर रही हैं, नुपूर ध्वनि कर रहे हैं ऐसी मदयुक्त कान्ता ने नीचे खिसकते हुए अपने रक्त वस्त्र को विकर्षण कर ( ऊपर हटाते हुए ) इसके मस्तक पर नूपुर युक्त पैर को रख दिया । ] २४. उपदिष्ट: -जैसे अविमारक के प्रथमांक में— राजा - धर्मः प्रागेव चिन्त्यः सचिवमतिगतिः प्रेक्षितव्या स्वबुद्धया प्रच्छाद्यौ रागदोषो मृडुपुरुषगुणौ कालयोगेन कार्यों । ज्ञेयं लोकानुवृत्तं परचरनयनै मंण्डलं प्रेक्षितव्यं रक्ष्यो यत्नादिहात्मा रणशिरसि पुनः सोऽपि नावेक्षितव्यः ॥ [ सर्व प्रथन धर्म का विचार करे फिर सचिवों की मति की गति को - अपनी बुद्धि से देखे, राग एवं द्वेष को छिपावे तथा समय समय पर पुरुष के
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४६८ नाट्यशास्त्र कठोरता को दिखलाने का कार्य करे, उत्तम चरों के नेत्रों मार्दव एवं तथा मण्डलों को भी । इस प्रकार प्रयत्न से आत्मा की से लोकानुवृत्त समझे की परवाह न करे । रक्षा करे परन्तु युद्धस्थल में आत्मरक्षा का साधक एवं २४. विचार: - प्रवृत्त अर्थ का अनुगामी, परोक्ष अर्थ अनेक उपाय एवं उपाधियों का दर्शक वाक्य ' विचार ' है । यथा मुद्राराक्षस के पञ्चम अंक में राक्षस का यह कथन: -साध्ये निश्चितमन्वयेन घटितं बिभ्रत्सपक्षे स्थिति विपक्षतो भवति यत्तत्साधनं सिद्धये । व्यावृत्तच यत्साध्यं स्वयमेव तुल्यमुभयोः पक्षे विरुद्धश्च यत् वादिन इव स्यात् स्वामिनो निग्रहः ॥ तस्याङ्गीकरणेन से घटित एवं साध्य में निश्चित रहता है, सपक्ष में [ जो साधन अन्वय से जो व्यावृत्त हो तो ऐसा साधन ( ही ) साध्य जिसकी स्थिति है तथा विपक्ष की सिद्धि करने में समर्थ होता है । परन्तु जो स्वयं साध्य में अनुकूल एवं हो तथा पक्ष के विरुद्ध रहे तो उसको स्वीकार करने से प्रतिकूल होने से तुल्य वादी के निग्रह की तरह स्वामी भी निगृहीत हो जाता है । ] २६. विपर्यय: - जैसे रावण के प्रति सचिव की यह उक्ति-सचिव: —— उदर्कसिद्धिमिच्छद्भिः सद्भिर्न खलु दृश्यते । चतुर्थी चन्द्रलेखेव परस्त्रीफालपट्टिका ॥ परिणाम में उत्तम फल की सिद्धि चाहने वाले सज्जन भाद्रपद की [ अन्य स्त्री के भाल पट्ट को नहीं देखते हैं ] चतुर्थी के चन्द्र की तरह वरदन्तिनाम् । रावण: परस्त्रीकुचकुम्भेषु भे निपतन्ति न भीरूणां दृष्टयः शरवृष्टयः ॥ [ भीरुओं की दृष्टि न परस्त्री के कुचों पर पड़ती है और न उत्तम हाथियों पर शरवर्षण ही भीरुओं से हो सकता है । ] की कुम्भस्थल वेणीसंहार के द्वितीय अंक में दुर्योधन कञ्चुकी से २७. भ्रंश: —जैसे कहता है: - । सहभृत्यगणं सबान्धवं सहमित्रं ससुतं सहानुजम् दुर्योधन- स्वबलेन निहन्ति संयुगे न चिरात् पाण्डुसुतः सुयोधनम् ॥ कञ्चुकी – ( कर्णौ पिधाय सभयं ) शान्तं पापम् । प्रतिहतममङ्गलम् । इति । भाई, बन्धु, पुत्र एवं भृत्यों के साथ शीघ्र ही सुयोधन को यह [ दुर्यो– शक्ति या सेना के द्वारा युद्ध में मार देगा । पाण्डुपुत्र अपनी
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १७ ४६ ९ कञ्चुकी – ( कानों को बन्द कर, भय युक्तहोते हुए ) अमंगल शान्त हों, अनर्थ शान्त हों । २८. अनुनय: - जैसे रामाभ्युदय के द्वितीय अङ्क में राम के पराक्रम की स्तुति करने में व्यग्र मारीच को रावण कहता है-रावणः आः प्रतिपक्षपातिन्, क्षुद्र, राक्षसापसद । किं बहुना -तवैव रुधिराम्बुभिः क्षतकठोर कण्ठस्तुतैः रिपुस्तुतिभवो मम प्रशममेतु कोपानलः । सुरद्विपशिरस्थली दलन- दष्टमुक्ताफलः स्वसुः परिभवोचितं पुनरसौ विधास्यत्यसिः ॥ ( इति खङ्गमाकर्षति तदा उभयोर्मध्ये निपत्य प्रहस्तः ) प्रहस्तः — प्रसीदतु प्रसीदतु महाराजः, नेदमनुरूपं स्वामिनः । देव, लोकत्रयक्षयोद्धृत्त - प्रकोपाग्रेसरस्य ते । ईदृशः चन्द्रहासस्य भृत्येष्वनुचितः क्रमः ॥ इति । [ रावण - अरे शत्रुओं के पक्षपाती क्षुद्र राक्षस! अब अधिक क्या कहूँ । तुम्हारे द्वारा की गयी शत्रुओं की स्तुति से उत्पन्न होने वाला मेरा कोपानल अब तुम्हारे ही कण्ठ के कठोर घाव से चूने वाले रुधिरजल से पहिले शान्त होगा और इन्द्र के ऐरावत के शिरस्थ मौक्तिक को खण्डित करने वाली यह मेरी चन्द्रहास नामक तलवार बाद में अपनी बहिन के निराकरण करने के कार्य को बाद में करेगा । ( इतना कह कर तलवार खींच लेता है तभी आकर कहता है । प्रहस्त्र – प्रसन्न होइये महाराज, यह कार्य आपके देव, लोकत्रय के क्षय के लिये उठने वाला तथा क्रोध आपका यह चन्द्रहास नामक खङ्ग भृत्यों पर चलाने के १२६. माला: - जैसे तापसवत्सराज में तिरस्कार को दूर या प्रहस्त दोनों के बीच में लिए उपयुक्त नहीं । हे में अग्रेसर रहने वाला उपयुक्त नहीं है । )
राजा - दृष्टा यूयं निर्जिता विद्विषन्तः प्राप्ता देवी भूत - धात्री च भूयः ।
सम्बन्धोऽभूद्दर्शकेनापि सार्धं कि दुष्प्रापं यन्न लब्धं भवद्भयः ॥
[ आप सभी ने शत्रुओं को पराजित होते हुए देख लिया, देवी को प्राप्त किया तथा पृथ्वी का राज्य पुनः पाया । इसके अतिरिक्त दर्शक से सम्बन्ध हुआ अतः अब शेष दुष्प्राप्य ऐसी वस्तु क्या है जो आप को नहीं मिली हो ] ३०. दाक्षिण्य: -- जैसे रत्नावली के द्वितीय अंक में शिरोवेदना के बहाने चले जाने के लिये उद्यत देवी वासवदता को वत्सराज उदयन जब आंचल पकड़