भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 581–590

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 581–590

पृष्ठ 581

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४७० नाट्यशास्त्र रोकता है तथा - ' प्रिये, तुम प्रसन्न हो जाओ ' इत्यादि कहता है परन्तु इतना कर से देवी निकल कर चली जाती है तो ' अरण्यरोदन व्यर्थ होने पर भी जब वहाँ को राजा कहता है कि- ' तुमने है ऐसा समझाने वाले अपने मित्र विदूषक के सिवाय अब के क्रोध को नहीं देखा । अतः देवी को प्रसन्न करने महारानी दिखलाई देता । इसलिये चलो, भीतर चलें और महारानी अन्य कोई उपाय नहीं को प्रसन्न करें । करना ' दाक्षिण्य ' है । यहाँ विदूषक के द्वारा राजा का अनुवर्तन गहण: - दोष को गुण कर लेना ' गर्हण ' है । अन्य ३१. या मात्सर्य से किसी की कुत्सा करना ' गर्हण ' होती या अभिमान धूर्तविट में -प्रणष्टा न व्यक्तिर्भवति वचसा सैव मुदुता न रागो नेत्राब्जे त्यजति न च लज्जा व्यपगता । स्मृतिः प्रत्यायाता परिहृषितमद्यापि च मुखं मदो दोषस्त्यक्त्वा त्वयि परिणतस्तिष्ठति गुणैः ॥ मत से क्रोध है । जैसे— [ मदिरा पान से होने वाले नशे ( मद ) से वचन की सफाई नहीं नष्ट अधिक मृदुता आ गयी है, राग आंखों को नहीं छोड़ रहा है, हुई किन्तु उसमें लौट आयी और आज भी ( अभी भी ) मुख लज्जा भी दूर नहीं हुई, स्मृति भी पर भी अपने दोषों को छोड़ प्रसन्न दीख रहा है । अतः यह मद आप में रहने गुणों में परिणत होकर स्थित है ( ऐसा प्रतीत हो रहा है । ) ] कर प्रकार गुणों के अतिपात में भी ' गर्हण ' होता है । जैसे वत्सराज-इसी चरित्र के द्वितीय अंक में विष्णुत्रात का यह कथन: -नृपाः प्रभुत्वात् प्रतिषेध - वामा जिह्यो विधिस्तद्वशवर्ति कार्यम् । ॐ नापरमस्ति पुंसां विषाददुःखायशसां निदानम् ॥ साचिव्यतो के कारण वाम - स्वभाव से प्रतिषेध करने वाले [ राजा अपनी प्रभुता सभी कार्य इसी के वश में रहते हैं । रहते है, विधि भी कुटिल होता है तथा विषाद, दुःख इसलिये पुरुषों के लिये राजा का मन्त्रित्व करने के अतिरिक्त एवं अयश के निवारण का अन्य कोई निदान ( ही ) नहीं है ३२. अर्थापत्ति: - जैसे धूर्तविट में— आदष्टस्फुरिताधरे भवति यो बक्त्रारविन्दे रसः प्रीतिर्या च हृतांशुके च जघने काञ्चीप्रभोद्योतिते लक्ष्मीर्या च नखक्षताङ्कुरधरे पीने कपोले स्त्रियो रक्तं तेन विरज्यते न हृदयं जात्यन्तरेऽपि ध्रुवम् । ] ॥।

पृष्ठ 582

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १७ 209 [ सुरतकाल में अधर दंशन कर लेने पर अधर फड़कने लगता है ऐसे मुखकमल में जो रस होता है, वस्त्र खींच कर हरण कर लेने पर करधनी की प्रभा से आकर्षक जघन में जो प्रीति होती है, स्त्रियों के नखक्षत के अंकुर को धारण करने वाले पीन पयोधर में जो शोभा होती है तो ऐसी भावना से यदि राग सम्पन्न हृदय हो तो फिर वह जन्मान्तर में भी विरक्त नहीं होता है, यह निश्चित समझिये । ] यहाँ जन्मान्तर में भी रस, प्रीति एवं अनुराग के अनुवर्तन के कथन से जन्मान्तर में भी हृदय में वैराग्य होना सम्भव नहीं है । अतः संसार के बन्धन से छुटकारा असंभव है । ऐसे अर्थ का बोध होने से यहाँ ' अर्थापत्ति ' नामक लक्षण स्पष्ट है । ३३. प्रसिद्धि: — प्रसाधक = प्रकृष्ट साधक, प्रसिद्ध = पूर्व से ही जो सिद्ध है । जैसे गदायुद्ध में पराभूत दुर्योधन से श्री बलदेव ने कहा-बल ० - भीमसेन, इदानीं तव युद्धवञ्चनामुत्थाय स्थास्यति । दुर्यो ० - न चाहं भीमसेनेन वञ्चितः । बल - अथ केन भवानेवंविधः कृतः । दुर्यो ० - श्रूयताम् येनेन्द्रस्य च पारिजातकतरुर्मानेन तुल्यं हृतो दिव्यं वर्षसहस्त्र मर्णवजले सुप्तश्च यो लीलया । दीप्त्या भीमगदां प्रविश्य सहसा निर्व्याजयुद्धप्रियः तेनाहं जगतां प्रियेण हरिणा मृत्योः प्रतिग्राहितः ॥ [ बल- - भीमसेन अब तुम्हे युद्ध में वश्चित कर स्थिर हो गया है । दुर्यो— मुझे भीमसेन ने नहीं ठगा है । बल - तब फिर तुम्हें ऐसा किसने कर डाला; दुर्यो — अच्छा तो सुनिये - जिसने इन्द्र के अभिमान के साथ पारिजात का हरण किया था, जिसने दिव्य सहस्त्रों वर्षोंतक समुद्र के जल में लीला पूर्वका शयन किया, उस संसार के प्रिय एवं निर्व्याज छली श्री कृष्ण ( हरि ) ने अकस्मात् अपनी दीप्ति द्वारा गदा में प्रवेश कर दुर्योधन को मृत्यु के लिये प्रतिगृहीत करवा डाला है ] यहाँ श्रीविष्णु के शयन आदि कार्य ही वाक्यार्थ के साधक है । अन्य आचार्य – यहाँ अलंकार युक्त पदार्थों को वाक्यार्थ के प्रसाधक मानते हैं ।

पृष्ठ 583

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नाट्यशास्त्र ४७२: -- शोक, मोह आदि के कारण पराधीन हो जाने से स्वयं ३४. पृच्छा कर प्रश्न करने की -सी दशा में कथन करना अपने को या दूसरे को सम्बोधित प्रश्न एवं कथन ही ' पृच्छा ' है । अतः जहाँ उत्तर की अपेक्षा न हो वहाँ यह प्रत्यायक है । जैसे रामचरित में हनुमान सीता को देख कर कहते हैं

स्थानेऽवसीदसि रघूद्वह किं विधातः अस्यास्त्वयेक्षितमलक्षणमङ्गकेषु ।

अद्यापि जीवसि दशानन हे हनूमन् केयं तवाभिमुखवतिरिपोः प्रतीक्षा ॥

दुःखी होते हों यह उचित ही है । हे विधाता, तुमने [ हे रघुनाथ, आप या दुर्लक्षण देखे जिन्हें देख इस भगवती सीता के अंगों पर कौन से अलक्षण ललाट पर विधिना का ऐसा लेख लिखा था । अरे दशमुख, तुम इस कर इसके देकर आज भी जी रहे हो । और हे हनुमन्, अपने बेचारी को इतना कष्ट कर रहे हो । ] सामने शत्रु को पाकर भी तुम अब कैसी या किसकी प्रतीक्षा : -- यहाँ कथनादि में आदि पद के द्वारा दर्शन, श्रवण ३५. सारूप्य रूप की विशिष्ट भ्रान्ति से क्षोभ को एवं अनुभवन का उपलक्षण है । यहाँ में लक्ष्मण उत्पन्न कर देने में ही लक्षण का चमत्कार नहीं । जैसे छलितराम द्वारा बाँध कर लाये गये लव ने श्रीराम की यज्ञशाला में स्थित हिरण्यमयी के राजद्वारमागता ' ( अरे माँ सीता को देख कर कहा - ' अथे कथमियमम्बा होकर कैसे ( सहसा ) राजद्वार में आ गयी! ) और सहसा खड़ा आज कर एवं ध्यान से देख कर ' अरे यह तो हिरण्यमयी हैं — ऐसा अनुभव कर प्रणाम फिर दूर हट कर बैठ गया । या वेणीसंहार में दुर्योधन देख कर, समीप जाकर के कथन से भ्रान्त युधिष्ठिर का बध कर के लौटने वाले भीमसेन को चार्वाक दृढ़ता से पकड़ कर यह कहना - ' आशैशवादनुदिनम् ' इत्यादि । द्वारा ३६. मनोरथ: -- जैसे विकटनितम्बा के प्रहसन में विकटनितम्बा

कहती है कि- मनः सुमनोलतासु ।

अन्यासु तावदुपमर्दसहासु भृङ्ग लोलं विनोदय ॥

कलिकामकाले बालां कदर्थयसि किं नवमल्लिकायाः मुग्धामजातरजसं भोरे, रतिकालीन उपमर्द का सहन करनेवाली दूसरी पुष्प लताओं [ अरे इन मुग्धा ( नग्निका ) एवं अनर्तवा कली वाली से अपना मन बहलाओ । तुम नवमालिका को क्यों व्यर्थ ही कदर्थित कर रहे हो । ] विकटनितम्बा ने स्वयं अपने को ही सुमनोलता के बहाने रखकर यह यहाँ कहा है । के द्वितीय अंक में धात्री नायक को ३७. लेश: -जैसे अविमारक कहती है:

पृष्ठ 584

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परिशिष्ट: टिपण्णी, अध्याय १७ ४७३ धात्री अय्य, किं चितीअदि । [ आर्य, किं चिन्त्यते? ] अवि - भवति, शास्त्रं चिन्त्यते । धात्री - किं णाम एवं रमणीअं सत्यं चित्तीअदि । [ किं नामैतत् रमणीयं शास्त्रं चिन्त्यते । ] अवि- भवति, योगशास्त्रं चिन्त्यते । • धात्री - ( सस्मितम् ) पडिग्गहिदं मंगलवअणं । ओअ सत्थं एवं भोदु । [ प्रतिगृहीतं मङ्गलवचनम् । योगशास्त्रमेव भवतु ] अवि को नु खलु वाक्यार्थः । अन्यदप्यभिलाषवशादन्यथा सङ्कल्पयामि । इत्यादि । [ आर्य, क्या विचार कर रहे हो? ] अवि- भवति, मैं शास्त्र की चिन्ता कर रहा हूँ । धात्री - यह सुन्दर शास्त्र किस नाम का है । अवि भवति, ( इस ) योगशास्त्र की चिन्ता की जा रही है । धात्री — मैंने मंगलवचन स्वीकार किया । यह योग का शास्त्र हो जाए । अवि - तब वाक्यार्थ क्या रहेगा । और भी अभिलाष के कारण सोचता हूँ जो अन्यथा संकल्प करना है । इत्यादि ] 4 अन्य आचार्य जन लेश को लेख पढ़ कर इङ्गितज्ञान को समझ लेना इसका लक्षण करते हैं । ३८. क्षोम: - जैसे रत्नावली के तृतीय अंक में सागरिका समझ कर वासवदत्ता का उपलालन करनेवाले उदयन को वासवदत्ता द्वारा अपने घूंघट को हटा कर लज्जित कर देने के बाद राजा का यह कथन -राजा - ( अज्जलि बद्धा ) प्रिये वासवदत्ते, प्रसीद प्रसीद । वास-- ( अश्रु निपातयन्ती ) मा एव्वं भण । अण्णगदाई एदाइ अक्खराणि-[ मैवं भण । अन्यगतान्येतान्यक्षराणि । ] विदू भोदि, महाणुभाआ ख्खु तुमं । रूखमीअदु दाव एक्को अवराहो पिअवअस्सस्स । [ भवति, महानुभावा खलु त्वम् । तत् क्षम्यताम् तावदेकोऽ-पराधो प्रियवयस्यस्य । ] वासणं पढमसंगमे विग्धं करतीए मए जेव्व एदस्स अवरद्धं ण अज्ज-पुत्तस्स । [ ननु प्रयमसङ्गम एव विघ्नं कुर्वत्या मयैवैतस्यापराद्धं नार्यपुत्रस्य ] [ राजा प्रिये, वासवदत्ते, तुम प्रसन्न हो जाओ । वास - ( आसु गिरा कर ) आप ऐसा क्यों कहते हैं । ये अक्षर तो दूसरों के लिये हैं ।

पृष्ठ 585

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४७४ नाट्यशास्त्र - भवति, आप महानुभावा हैं, अतः प्रियवयस्य के एक अपराध विदूषक को क्षमा कर दो । डाल कर तो अपराध मैंने ही वास – अरे, इस प्रथम मिलन में विघ्न किया है आपके इन प्रियमित्र ने नहीं । ] जैसी इसका ' आत्मन्यभूततद्भावभावनम् ' ( अपने में अभूत अन्य आचार्य करते है । इसके अतिरिक्त अन्य इसे ' अन्यगते हेताव भावना रखना, ) लक्षण में कार्य की कल्पना करना ) स्मिन् कार्यकल्पनम् ' ( अन्यगत कारण से भिन्न लक्षण करते हैं । के चतुर्थ अङ्क में शालङ्कायन ३६. गुणकीर्तन: - जैसे वत्सराजचरित कहते हैं- समन्ततः शस्त्रप्रभाभासुरै रस्मद्बोधैः शालङ्कायनः —— नीलनागव्यपदेशेन

परीतेन महति भयस्थाने विगतसम्भमं- शौर्य प्रज्ञातेजो - नीति दाक्षिण्यगर्भम् ।

तेन प्रोक्तं धैर्यं गाम्भीर्य ॥

वाक्यं सामाद्यं सोजितं श्रोत्ररम्यं शास्त्रीकर्तव्यं तद्बुधैः स्वार्थकामैः

भरतरोहकः - एषः सङ्क्षिप्तविस्तरो नाम ।

राजा - ततस्ततः । साहसलाञ्छनः सः ॥

शालङ्कायनः— देव, यस्तस्य युद्धे महति प्रवृत्ते पराक्रमः भीमकर्ण – साम्बाभिमन्युष्व विचिन्त्य एव ॥ प्रद्युम्नरामार्जुन गुणानामव्यभिचारिता । कुतः -राजा -- अहोनु खलु स्वभावसिद्धानां । अविदित इति नैकधा प्रयत्नाद् बहुदिवसं बहुधा परीक्षमाणः गुणैः स्वर्मणिरिव जातिविशेषवान् महार्हः ॥ द्विगुणमभिविराजते सर्प के बहाने से चारों ओर शस्त्रों की प्रभा से [ - शालङ्कायन - काले के स्थान होने पर भी सम्भ्रम दीप्त हमारे योद्धाओं से घिरे हुए उसने भय दाक्षिण्य से त्याग कर — धैर्य, गाम्भीर्य, शौर्य, प्रज्ञा, तेज, नीति तथा को होकर भी कर्णसुखद वाक्य को कहा — बुधजन युक्त सामप्रधान एवं ऊर्जस्वी में करें । अपने प्रयोजन के लिये इसे शास्त्रवचन के रूप ग्रहण भरतरोहक - यह संक्षिप्त है तथा विस्तीर्ण भी । राजा - अच्छा, इसके बाद । पर उसने जो महाराज, तब महान् युद्ध के आरम्भ हो जाने शाल—– साहस ही कहना चाहिए, क्योंकि ऐसे साहस को पराक्रम दिखलाया वह अभिमन्यु के विषय में भी प्रद्युम्न, बलराम, अर्जुन, भीम, कर्ण, साम्ब तथा सोचा नहीं जा सकता था ।

पृष्ठ 586

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १७ ४७५ राजा- अरे, जो गुण सहज होते हैं वे अव्यभिचारी भी होते हैं । क्योंकि-जाना पहिचाना नहीं है ऐसा कह कर या जानकर एक बार नहीं अनेक बार बहुत दिनों तक प्रयत्नपूर्वक परीक्षा लेने पर यह जातिविशेष या बहुमूल्य मणि जैसा अपने गुणों से दूने रूप में शोभित हो रहा है । ] ४०. अनुक्तसिद्धि: - जैसे तापसवत्सराज में यौगन्धरायण ने अस्थि-रचित्त वासवदत्ता से कहा-योग -- कौशाम्बी परिभूय नः कृपणकै विद्वेषिभिः स्वीकृतां जानास्येव तथा प्रमादपरतां पत्युर्नयद्वेषिणः । स्त्रीणाञ्च प्रिय - विप्रयोगविधुरं चेतः सदैवात्र मे वक्तुं नोत्सहते मनः परमतो जानातु देवी स्वयम् ॥ [ हम लोगों को दबा कर इन तुच्छ ( कृपणक ) शत्रुओं ने कौशाम्बी को ले लिया । इस प्रकार नीति से अनुसार चलने में रुचि न लेने वाले अपने स्वामी की प्रमादपरता को आप स्वयं ही जानती हैं तथा स्त्रियों का चित्त सदा ही प्रिय के वियोग में विधुर रहता है । अतएव इस विषय में कुछ भी कहने में मेरा उत्साह नहीं होता । इसके बाद के कर्तव्य को देवी स्वयं समझ लें । ] ४१. प्रियोक्ति: —जैसे तापसवत्सराज में सप्तम अङ्क में भरतरोहक वासवदत्ता को वीणा का शिक्षण देने के लिये अर्पण करने की इच्छा से वत्सराज को देख कर कहता है: --या शेते कौस्तुभस्य द्युतिकिसलयिते शारदव्योमनीले विष्णोर्व रजनिकरकराकारहारोपहारे । साभ्येत्यालिङ्गतु त्वां प्रशिथिलगलितेनोत्तरीयेण लक्ष्मी-हर्षादापीडयन्ती नवकमलरजोरोचनाभ्यां स्तनाभ्याम् ॥ [ जिसमें कौस्तुभमणि की कान्ति किसलय के सदृश है, जो शरदकालीन आकाश जैसा नीलवर्ण है एवं चन्द्र की किरणों से निर्मल हार से विभूषित है, ऐसे उदार श्रीविष्णु के वक्षःस्थल पर जो शयन करती है वही शिथिल एवं गलित उत्तरीय वाली श्री लक्ष्मी स्वयं आकर अपने नूतन कमल के पराग से शोभित उरोजों से आपीडन करने के साथ ही आपका आलिङ्गन करे । ] ४२. दृश्य एवं पाठ्य काव्यों की तरह श्रव्यप्रबन्धों में भी कथाशरीर के संविधान, सम्भाषण और वैदग्ध्यरूप इन ( लक्षण नामक ) कविव्यापार को इसी प्रकार समझना चाहिए ।

पृष्ठ 587

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४७६ नाट्यशास्त्र ४३. शरीर कल्प इसी लक्षण के शब्द तथा अर्थ गत अलङ्कारों का निरूपण करने के लिये उनका नामतः उद्देश्य कथन करते हैं— ' उपमा ' इत्यादि से । काव्य में लक्षण शरीर स्थानीय होता है उसके अर्थभाग में रहने वाले उपमा आदि तीन अलंकार होते हैं । जैसे हार से रमणी विभूषित होती है उसी प्रकार जहाँ पृथक् सिद्ध उपमान से प्रकृत वर्णनीय ( मुखादि ) को सुन्दर किया जाता हो वे ही अलङ्कार हैं । प्रश्न- जिस हारादि अलङ्कार से कामिनी की सुन्दरता वृद्धिंगत होती है वह रमणी से पृथक् सिद्ध है पर रमणी भी उससे पृथक् सिद्ध है । परन्तु ये उपमादि अलङ्कार काव्य से पृथक् सिद्ध नहीं, क्योंकि उनमें शब्द तथा अर्थ-जो काव्य के शरीरभूत हैं — उन्हें ही किसी भङ्गिमा से कहने पर अलङ्कार बन जाता है । उत्तर — यह ठीक है परन्तु ये शब्द और अर्थ कवि की बुद्धि में चञ्च-लता से परिवर्तित होते रहते हैं जिनमें परिवर्तन ही पृथक् है तथा शरीर पृथक् । ( अतः अलङ्कार पृथक् सिद्ध हो ही जाते हैं ) । इस अलङ्कार की स्थिति तीन प्रकार से है । एक स्थिति वह है । जहाँ उपमानोपमेयभाव सम्पूर्ण या स्फुट हो क्योंकि वहाँ ( उपमा में ) वर्णनीय उपमान तथा उपमेय के द्योतक इवादि एवं साधारण धर्म की सन्निधि रहती है । दूसरी स्थिति वह है जहाँ उपमानोपमेयभाव निलीन ( या अभिन्न ) रहता है तथा जिसके कारण उपमानोपमेय एक कर दिये जाते हैं ( या उनमें अभेद हो जाता है ) तब यहाँ रूपक अलंकार का व्यवहार होता है । ऐसे स्थल पर पदार्थ को बतलाने के लिये प्रयुज्मान शब्द इवाद्यर्थ को गर्भित कर लेता सा प्रतीत होता है, यह न्यायसिद्ध ( सिद्धान्त ) है । तीसरी है वह जहाँ कहीं पर तो धर्मियों के एक प्रघट्टक में रहने के सामर्थ्य या बल के कारण उपमा की गति होती है या उपमा का बोध होता है । जैसे—– दीपक अलङ्कार में । यह भिन्न विचित्रताओं का उपलक्षण मात्र है अर्थात् ऐसी अनेक विचित्रताएँ होती हैं । श्री भट्ट तोत का मत है कि लक्षण के बल से अलङ्कारों में विलक्षणता या वैचित्र्य ( का आना ) होता है । जैसे पूर्ववणित लक्षणों में गुणानुवाद नामक लक्षण के योग से प्रशंसोपमालङ्कार होता है, अतिशय के योग से अतिशयोक्ति, मनोरथ के योग से अप्रस्तुतप्रशंसा, मिथ्याध्यवसाय के योग से अपह्नति तथा सिद्धि के योग से तुल्ययोगिता होती है । इसी प्रकार अनेक विलक्षणताओं की उत्प्रेक्षा की जा सकती है । इसके अतिरिक्त पारस्परिक विचित्रताओं से भी इनके अनन्त प्रकार हो जाते हैं । जैसे प्रतिषेध एवं मनोरथ के

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १७ ४७७ मिश्रण से आक्षेप बनता है । यह समग्र अलंकार वर्ग उपमा का ही प्रपञ्च होता है, ऐसा भी विद्वज्जन मानते हैं । ४४. अब उपमा का लक्षण करते हैं — ' यत् किश्चित् ' इत्यादि से । काव्यबन्धेषु —–— काव्यप्रबन्धों में । काव्यलक्षणों के रहने पर यहाँ यह दिखलाया कि ' गौरिव गवयः ' में उपमा नहीं है । यहाँ बन्ध का अर्थ है गुम्फ, भणिति एवं कवि व्यापार । लक्षण अलंकार शून्य होता है किन्तु निरर्थक नहीं ( इस विषय में उदाहरणों से दिखलाया जा चुका है ) परन्तु गुण शून्य काव्य नहीं होता । काव्य में गुणों का अहेयत्व दिखलाने के लिये ही प्रसादादि में गुण शब्द को योजित कर व्यवहार रखा जाता है, क्योंकि उनके बिना काव्यरूपता सम्भव ही नहीं । सुन्दरास्पद तो लक्षण रूप शरीर है ही जिसे पूर्व में कहा जा चुका है । उपमादि के बिना काव्य होता है इसे बतलाने के लिये उपमादि में अलंकार का व्यवहार दिखलाया है । अतः स्पष्ट है कि लोकवत् यहाँ काव्य में अलङ्कारों की पृथक् सिद्धि नहीं हैं । इसके अतिरिक्त दण्डी ने ' काव्य के शोभाधायक धर्म ' को अलङ्कार कहा है भी । ४५-४८. अब उपमा के उदाहरणों को क्रमशः दिखलाते हैं— ' एकस्येति ' इत्यादि से । इसमें उपमा के लक्षण की योजना को ' तुल्यं ते ' इत्यादि से दिखलाते हैं । ४३ - ५१. उपमान एवं उपमेय की संख्या के भेद से उपमा के प्रभेदों को दिखला कर अब तद्गत शरीर के भेदों को ' प्रशंसा चैव ' इत्यादि से दिखलाते हैं । उपमान के प्राशस्त्य से प्रशंसोपमा होती है तथा उपमान की निन्दनीयता से निन्दोपमा । यही आगे भी समझना चाहिए । ५२-५३. इसी प्रकार सदृश के साथ सदृश कल्पित हो तो ' कल्पिता ' । उदाहरण में जंगम पर्वतों की उपमानत्वेन कल्पना की गयी है क्योंकि अन्य से ' सादृश्य नहीं बनता । अन्य आचार्य सदृशी के स्थान पर कल्पितासदृशी पद में अकार का प्रश्लेष मान कर असदृशी पाठ मान कर उसकी व्याख्या करते हैं कि यहाँ सदृश पद उपमेय को भी बतलाता है । ५४. जहाँ सादृश्य का गमक कोई स्फुट पद नहीं हो तथा न ही सर्वात्मना रूपक की तरह वस्तुद्वय का मीलन ही अतः समास से व्यक्त या निर्मित उपमा को किञ्चित्सदृशी कहा गया है तथा उदाहरण है— ' सम्पूर्ण चन्द्रवदना ' इत्यादि । ५५. इसकी अन्य मत से व्याख्या है— इस ग्रन्थ में जिन्हें नहीं बतलाया उन्हें लोक या काव्य से ग्रहण किया जाए ।

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४७८ नाट्यशास्त्र ५६-५७ दीपक: - अब ' नानाधिकरणार्थानाम् ' इत्यादि से ' दीपक ' अलङ्कार बतलाते हैं । नाना जो वाक्यरूप या पदरूप भिन्न - भिन्न शब्द हैं उनके अधिकरण में अर्थात् जिनकी वे साकांक्ष शब्द तथा उनका सम्यक् जो दीपक है अर्थात् आकांक्षापूरक गुण या जात्यादि जहाँ हो वह दीपक है । क्योंकि एक अवान्तर वाक्य के द्वारा असंयुक्त वाक्य भी संयुक्त की तरह कर दिया जाता है अतः देहली में जलाया हुआ दीपक जैसे बाहर और अन्दर प्रकाश करता है वैसा ही दीपक प्रकृति होने से यह ' दीपक ' अलङ्कार है । ५८. रूपक – अब रूपक अलङ्कार को बतलाते हैं ' स्वविकल्पेन ' इत्यादि: से । अपने विकल्प अर्थात् विशिष्ट कल्पना से वदन को चन्द्र रूप में रूपित करना अर्थात् दूसरे को अपने रूप से युक्त करना ही ' रूपक ' है । यह दो प्रकार से होता है । एक वह — जहाँ तुल्य अवयव वाले अवयवियों को अन्य के रूप से तथा दूसरा किञ्चित् सादृश्य से युक्त रूप वाले बनाना । यहाँ युक्त करना दूसरे के रूप के सदृश रूप से युक्त अर्थात् रूपान्तर के द्वारा रूपित कुछ एक होता है तथा ऐसे स्थल पर एकदेशविवर्ति नामक द्रव्यादि रूपक करना हो जाता है यह प्रसिद्ध है । अन्य ' नानाद्रव्यादि ' के अनुसार रूपक का पाठ लेते हैं । तदनुसार यह रूपक शब्द के अनुगत अर्थत्व का आख्यान करता है । इसमें औपम्य का गुण ( गौण ) रूप से अर्थात् अप्रधान रूप से संश्रयण करता है । इसके कारण रूप की जो किसी अन्य के रूप से निश्चय पूर्वक वर्णना है वही ' रूपक ' है । ५६. यहाँ ( पद्माननस्ता: ' में ) " हंसकुलैः " में अरूपित भी नर्मसचिवत्व व्यक्त होता है । इतना अंश ' यदि वा किञ्चिद् ' के अनुसार द्वितीय भेद का उदाहरण है । यहाँ ' अन्योन्यमिव ' पाठ ठीक नहीं है क्योंकि इव घटित -पाठ में उपमा या उत्प्रेक्षा की आशंका होगी अतः ' अन्योन्यमिह ' ऐसा पाठ उपयुक्त है ।: - यहाँ शब्दाभ्यास में शब्द पद से वाक्य, पद, पदैकदेश तथा ६०. वर्ण सभी यमक का ग्रहण होता है । फलतः लाटानुप्रास आदि का भी इसी से ग्रहण समझ लिया जाना चाहिए । ' यम ' उसे कहते हैं जहाँ दो बालक एक साथ ( एक जैसे भी ) उत्पन्न हों अतः तत्प्रकृतिक या उसी स्वभाव के कारण इसे ' यमक ' कहा जाता है । यह वाक्य, पद एवं वर्ण के सदृश साम्तर या निरन्तर ( रूप ) में प्रयुक्त हुआ द्वितीय वाक्य, पद एवं वर्ण शोभा का आधायक जाने से अलङ्कार बन जाता है । पादादि में विकल्प कहने से मध्य एवं अन्त में स्थापन का नियम नहीं है अर्थात् इस विकल्प से लाटानुप्रास

पृष्ठ 590

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १७ ४७ ९ - का भी संग्रह कर लिया गया है । विशेष दर्शन का अर्थ है उद्देश्य एवं लक्षणों -का दर्शन । ६१-६३. अक्षर पद से एक अक्षर तथा अनेक अक्षरों को लिया जाता है । ६५. संहृत: - संहृत है रश्मियों का मण्डल अर्थात् समुदाय या ओघ जिसका । तपनीयमण्डल पद का अर्थ है सौवर्णचक्र । ६७. जनीनाम् = युवतियों के साथ सम्बन्ध रखनेवाली । रामा पद सभी ' स्त्रियों का वाचक है । ' यामं यामं ' यहाँ वीप्सा से सभी प्रहरों का ग्रहण किया गया है । पुष्प खिल रहे हैं और भौंरे उन पर मंडरा रहे हैं जिन्हें देखकर ये हँसती हैं तथा पुष्पों के खिलने पर भी जब भौंरे नहीं आकर मंडराते तो विस्मय करती हैं । ६६. प्रवरक अर्थात् श्रेष्ठ है आनन जिसका ऐसा हाथी । इसी प्रकार केतकी के पुष्प ही पीले दाँत जिसके हैं ऐसे हस्ति से युक्त प्रवर = श्रेष्ठ कानन = अरण्य शोभित हो रहा है । ७१. द्विशृंग = जिसके दो शिखर हों या दो उन्नत दाँतों की विशिष्टता युक्त या दाँतों की विकलता या राहित्य से युक्त जिसके शिखर हैं । ७४. सञ्चिताः = युद्ध में एकत्र हो गये हैं । अनुपुङ्खगैः पुङ्ख तक मग्न होने वाले । चित = व्याप्त । अन्य प्रकार से अर्थ में जैसे निहतास्तलैः को यदि निहतों के अस्त मरण को ला प्रदान करते हैं ऐसा हो तो यह क्लिष्ट - कल्पना है । ८२. यह शरद् ऋतु वारण पुष्पों के विकास का समय है । इसी प्रकार धारण = हाथियों के अनामय अर्थात् स्वस्थ रहने का यही समय है । वारणों = शत्रुओ का यह काल = मृत्यु होता है । रणों = युद्धों का कालक्षेप अर्थात् समय का बिताना या चिन्ता का प्रवर्तक है । ८६. लक्षणों की प्रमुखता को संकेतित करते हुए उपसंहार करते हैं— ' एभिरर्थ ' इत्यादि से । अर्थक्रियायुक्तः = अर्थ की क्रिया में रस चर्वणा में युक्त योग है जिनका ऐसे । यह दोष विवरण कई प्राचीन पुस्तकों के अध्यायान्त में मिलता है फिर भी यही सर्वत्र मिलने के कारण इसकी व्याख्या की गयी । अतः परमपद से वक्तव्यान्तर संकेतित किया गया है । अतः अब दोष का ही आगे विवरण देगें । ८७-८८. गूढ़ार्थ आदि ।– “ पर्याय " इति । पद, वाक्य या अर्थ को पर्याय शब्द से कहना ' गूढ़ार्थ ' दोष है । वास्तव में यदृच्छा शब्द या द्रव्य शब्दों को पर्याय वाचक नहीं बनाया जाता अतः दोष है ।