भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 591–600

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 591–600

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४८० नाट्यशास्त्र ६३. जहाँ दो वर्णों या पदों में नैरन्तर्य है अर्थात् अव्यवधान है, जहाँ विचार या सम्बन्ध है तथा जहाँ अन्य का अन्य में लय होता है । इस प्रकार सन्धान या सन्धि तीन प्रकार से होती है । जहाँ शब्द अयुक्त या युक्तिरहित अथवा पारुष्य का उद्भावक हो जाए तो ' विसन्धि ' दोष हो जाएगा । यह दोष व्याकरणशास्त्र के अनुसार लागू होगा । ये दोष उत्तरोत्तर स्थूल हैं तथा कभी कभी गुण भी हो जाते हैं । ( द्रष्टव्य ना ० शा ० द्वितीय भाग टिप्पणी पृ ० ३०० ) । ६४. अब गुणों के विषय में प्रतिज्ञा करते हैं- ' गुणाः विपर्ययाद् इत्यादि से । इसका आशय है कि दोषों के विघात में ही गुण होते हैं । यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि दोषों के विपर्यय में गुण सामान्यतः होते हैं या विशेष रूप से । इसका उत्तर यही है कि ये विशेष प्रकार से ही होते हैं, सामान्यतः नहीं । भरत के इस विचार का समर्थन उत्तरवर्ती आचार्यों ने भी किया जिसका संकेत मात्र नाट्यशात्र में था । इस मान्यता का विकास विपर्यय या दोषों की अनित्यता में हो गया । दोषाभाव होने पर निर्दुष्टः काव्य सौन्दर्य का आविर्भाव होता है । आगे भोज तथा मम्भट और हेमचन्द्र जैसे आचार्यों ने दोषहान तथा अदोषता शब्दों से इसी तथ्य को अधिक स्पष्टता: प्रदान की क्योंकि दस दोष दस गुणों के विपर्यय मात्र नहीं होते हैं । १०६. काव्यगुणों का लक्षण सहित विवरण भी भरत ने सर्वप्रथम दिया है परन्तु यह सभी पूर्व लक्ष्य लक्षणादि के आधार पर है यह स्पष्ट है । इस दृष्टि से बाल्मीकि रामायण, महाभारत, कौटिल्य का अर्थशास्त्र तथा जैनागम उपजीव्य ग्रन्थ विशेषरूप से उल्लेख योग्य हैं । रामायण में रामकथा के सन्दर्भ में उदार मधुर तथा असन्दिग्ध, अविस्तर, संस्कारक्रमसम्पन्न तथा हृदयहारी गुणों का विशेषण के रूप में उल्लेख था । इसी प्रकार महाभारत में विचित्र-पदत्व श्रुतिसुख, मधुर और अर्थवत् आदि गुणों का उल्लेख है । अर्थशास्त्र में अर्थक्रम, सम्बन्ध, परिपूर्णता, माधुरी, उदारता तथा स्पष्टत्व जैसे गुणों का वर्णन मिलता है । औदार्य तथा माधुर्य गुणों की स्थिति भरत के अनुरूप है । जैनागम के अनुयोगद्वार सूत्र में निर्दोष, सारवत् हेतुमत्, अलंकृत, उपनीत; सोपचार, मित, तथा मधुर — ये आठ गुण दिखलाये । गये हैं अन्य जैनागम रायप्रसेणीयसुत्त में ( राजप्रश्नीय ) में सत्यवचन के पैंतीस अवशेषों में संस्कार-वत्व, उदात्तत्व, उपचारोपेतत्व जैसे शब्दगुण तथा महार्थ, अव्याहत, पौर्वापर्य, असन्दिग्ध, देशकालयुक्त, अतिस्निग्धमधुर, उदार तथा ओजस्वी अर्थ गुण हैं जिनकी भरत के गुणों से भावनामूलक समानता प्राप्त होती है ।

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १७ ४८१ भरत मुनि के निरूपित गुणों के विवरण से स्पष्ट है कि उनकी चिन्तनधारा काव्यएवं नाट्योन्मुखी थी तथा शब्द एवं अर्थगत गुणों की अस्पष्ट रेखा भी इनके लक्षणों में प्राप्त रही । इनमें सौकुमार्थं तथा अर्थव्यक्ति के लक्षण में प्रयोज्य तथा प्रयोग का उल्लेख नाट्योन्मुखी तथा समता, श्लेष एवं उदारता जैसे गुणों काव्योन्मुखी प्रवृत्ति को स्पष्ट निर्दाशत करता है । इनके दस गुणों में कुछ अर्थगुण एवं कुछ उभयात्मक रेखा नहीं दी है परन्तु उसका किया जा सकता है । भरत के उत्तरवर्ती काल स्वीकारते हुए गुण को उसके आनन्दवर्द्धन ने रस को काव्य का सिद्धान्त दिखलाया । वामन के अनुसार गुण जिनके बिना काव्य की शोभा हैं । यद्यपि भरत ने गुणों की कोई विभाजक ऐसा वर्गीकरण लक्षणों को लेकर सरलता से में आचार्य वामन ने रीति को काव्य की आत्मा अंग के रूप में प्रतिपादित किया तथा आचार्य ( नाट्य ) की आत्मा मानकर रसाश्रित गुण शब्दार्थमय काव्यशरीर के अविनाभूत अंग हैं की कल्पना नहीं की जा सकती । अतः काव्य-रचना के लिये गुण सर्वस्व तुल्य ही हैं । आचार्य वामन ने भरतोक्त दस गुणों के स्थान पर शब्द तथा अर्थगत बीस गुणों को निरूपित किया । दस शब्द गुण तथा दस अर्थगुण । भोज ने वामन का ही अनुसरण कर कुछ परिवर्धन कर चौबीस गुणों को दिखलाया । जयदेव ने चन्द्रालोक में वामनप्रवर्तित गुणों का ही अनुसरण किया । गुण सिद्धान्त की अन्य धारा में आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा प्रवर्तित परम्परा अधिक युक्ति सम्मत तथा व्यावहारिक रही । इसका प्रवर्तन आचार्य आनन्द-वर्धन ने किया अवश्य किन्तु संवर्द्धन एवं परिवर्द्धन आचार्य मम्मट एवं विश्वनाथ महापात्र जैसे आचार्यों ने किया था । इसमें रस रूप काव्यात्मा के ओज, प्रसाद तथा माधुर्य नित्य धर्म हैं तथा अलंकार अनित्य धर्म माने गये तथा गुण दस या बीस नहीं तीन ही हैं तथा इन्हीं तीन गुणों में शेष गुणों का अन्तर्भाव होता है । तथा कुछ गुणदोषा भाव रूप हैं । आनन्दवर्द्धन की दृष्टि में आत्मा कीशूरता जैसे नित्य धर्मों की तरह ओज आदि गुण नित्य धर्म हैं तथा अलंकार कटक - केयूरों की तरह अंगों के माध्यम से आत्मरूप रस के उपकारक । इसी विचारसरणि के प्रकाश में मम्मट ने काव्य के लक्षण में अनलंकृत काव्य को भी काव्य मानने का विचार रखा तथा विश्वनाथ भी इसी मत को स्वीकार करते थे । इस प्रकार स्पष्ट है कि आनन्दवर्धन ने भरत के रससिद्धान्त को पुनः नवीन रूप प्रदान किया था । आनन्दवर्धन की मान्यता में तीन गुणों में सभी का ३१ ना ० शा ० द्वि ०

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४८२ नाट्यशास्त्र करने की प्रवृत्ति का आधार कदाचित भामह का गुणनिरूपण रहा था अन्तर्भाव नहीं होता न और संकेत ही मिलता है । परन्तु इतना स्पष्ट जिसके स्रोत का ज्ञान गुण का संकेत गुणों की संख्या है कि भरत के द्वारा किया गया दोषाभावरूप बन गया । बात भी ठीक है । को कम करने के विचार के लिये पर्याप्त आधार एक दोषाभावरूप होते हैं और हैं भी परन्तु तीन गुणों की कल्पना कि गुण के साथ आयी थी जो गुण के विकास क्रम में आज भी विशिष्ट विचार धारा ज्योति स्तम्भ सी दीपित है, यह स्पष्ट है । तनुवाही ( सूक्ष्म वाही ) चित्त का परिस्पन्द नहीं रहे तो १०७. जहाँ जैसे अलंकारों में लघु अक्षर प्रधान ' वृत्त ' वहाँ वीर आदि में उपमा एवं रूपक रहते हैं । दीप्त रसों में रहता है । यह ११८. औदार्य अर्थगुण है जो प्रधानतया है । उसी का गुण भी है अतः दीप्तत्व के प्रकाशक वर्णों में स्थित रहता शब्द गुण है । ये गुण अपने अनुगत ( अनुयायी ) गुणों से अनुस्युत अनुयायी माधुर्य मसृण रसों में स्थित रहते हैं । का अतिक्रमण किये बिना सर्वत्र रहते हैं । इसे ११६. अर्थगुण योग्यता है । प्रमद अर्थात् हर्ष या हर्ष को उत्पन्न ही ' प्रमदाभिधेयान् ' पद से कहा गया शब्दों का हो वे उदार करने वाला सकल गुणों से समन्वित अभिषेय अर्थ जिन एवं मधुर शब्द ही हैं । सुकुमार जो प्रयोग हैं वे ही नटों के द्वारा प्रयुक्त होने योग्य १२१. ललित है- ' मृदुललित ' इत्यादि से मुनि ने । हैं इस तथ्य को दिखलाया

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सप्तदश अध्याय अनुबन्ध १-४. शब्दों का शब्दों के साथ, अर्थों का अर्थों के साथ तथा शब्दों का अर्थों के साथ विचित्र संघटन करवाने वाली अभिधा विशिष्टा उक्ति ही निर्माण धुरा पर आरूढ़ करवाने पर ' लक्षण ' बन जाती है । इसलिये लक्षण ही प्रधान है तथा गुण एवं अलङ्कार उसी के प्रसंग से प्राप्त होते हैं, यह बात लक्षणों के स्वरूप तथा व्याख्यान से स्पष्ट है । अब उद्देश्य कथनार्थ-' विभूषणम् ' इत्यादि ४ पद्म कहते हैं । तदनुसार जो विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारियों के वाचक शब्द हैं तथा जो उनके अर्थ हैं वे स्थायी भाव को रस रूप में परिणत करने रूप प्रयोजनान्तर को प्राप्त करते हैं तथा अभिधा व्यापर से उपसंक्रान्त होने वालेजो उद्यानादि अर्थ हैं वे लक्षण है । इसीलिये उनका काव्य में सम्यक् प्रयोग अभीष्ट है । ५. विभूषण: - इन लक्षणों में प्रथम विभूषण का लक्षण बतलाते है-अलङ्कारै ' इत्यादि से । कंकण जैसे अलंकार को पृथक् कर किस स्थान पर, किस समय, किस दशा में किस पुरुष को धारण करना चाहिए ऐसा विचार कर धारण किये गये अलंकार तथा गुण के द्वारा जो अलंकरण हो वह ' भूषण ' नामक लक्षण होगा । इसके विन्यास में कवि का व्यापार होता है और कवि के द्वारा शब्द और अर्थ का ( भी ) व्यापार ( होता ) है । स्थान में निवेश का उदाहरण है— ' लीनेव प्रतिबिम्बितेव लिखितेवान्त-निखातेव च प्रोत्कीर्णेव च वज्रलेपघटितेव ( माल ० मा ० ) इत्यादि । प्रस्तुत पद्य में विप्रलम्भ की अवस्थाओं को माधुर्य, प्रसाद आदि गुणों से युक्त काव्य में रखा गया है । यह विप्रलम्भ समस्त अलङ्कारवर्ग का अनुग्राहक कवि व्यापार रूप है, और इसी के कारण शब्द एवं अर्थ के व्यापार को स्पर्श करने वाला यह ' विभूषण ' लक्षण रहा है । ६. अक्षरसंहति: - अब अक्षरसंहति को दिखलाते हैं - ' यत्राल्परक्षरे ' इत्यादि से । यहाँ अक्षर शब्द से यदृच्छा शब्दों की प्रमुखता बतलाई गयी है । क्योंकि यदृच्छाशब्दों में स्वरूप को ही प्रवृत्ति निमित्त माना गया है । अतः श्लेष युक्त स्वल्प अक्षरों के द्वारा प्रवृत्तिनिमित्त स्वरूप से उपलक्षित होने के कारण विचित्र अतएव प्रकृत रस के योग्य विभावादि भाव को प्राप्त होने वाले अर्थ का

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४८४ नाट्यशास्त्र वर्णन किया जाता है । वह जिस अर्थ के विषय में श्रोताओं के हृदयों में उपसंक्रांत करने के लिये कविगण का व्यापार होता है वह अक्षरसंघात ही उस व्यापार के करने में कारण ( बनता ) है । अतः अक्षरों का संघात ही इसमें प्रधान है । इनमें यदृच्छा शब्द की प्रधानता का यह उदाहरण है विस्तम्भादुत्तमाङ्गं प्लवगवलपतेः पादमक्षस्य हन्तुः कृत्वोत्सङ्गे सलीलं त्वचि कनकमृगस्याङ्गमाधाय शेषम् । वाणं रक्षःकुलघ्नं प्रगुणितमनुजे नादरात्तीक्ष्णमक्ष्णोः कोणेनोद्वीक्ष्यमाणस्त्वदनुजवदने दत्तकर्णोऽयमास्ते ॥ [ वानर सेनापति सुग्रीव के उत्सङ्ग में विश्वास पूर्वक अपने मस्तक को, अक्षहन्ता हनुमान के उत्सङ्ग में चरण को तथा कनकमृग की त्वचा पर शेष अंगों को स्थापित कर राक्षसों के विनाश करने के लिये अनुज लक्ष्मण के द्वारा प्रगुणित तीक्ष्य बाणों को आँखों के कोने से देखते हुए तथा हे रावण, तुम्हारे विभीषण के मुख की ओर अपने कानों को लगा कर ये ( यहाँ ) बन्धु श्रीरामचन्द्र विद्यमान हैं । ] यहाँ अलङ्कारों की योजना के बिना ही ( शब्द की योजना की प्रमुखता के कारण से ) जो अर्थों की सुन्दरता है वह ' अक्षरसंहति ' है । ७. शोभा: - अब शोभा को कहते है - ' सिद्धेरथै ' इत्यादि से । जैसे — मेदश्छेदकृशोदरं लघु भवत्युत्थानयोग्यं वपुः सत्वानामपि लक्ष्यते विकृतिमच्चित्तं भयक्रोधयोः । उत्कर्षः स च धन्विनां यदिषवः सिद्ध्यन्ति लक्ष्ये चले मिथ्या हि व्यसनं वदन्ति मृगयामीदृग् विनोदः कुत ॥ ( अभि ०२५ ) [ इसमें मेद के कम हो जाने के कारण उदर कृश हो जाता है इसलिये शरीर हलका और उठने योग्य हो जाता है । प्राणियों के भी भय एवं क्रोध की स्थिति में रहने वाले चित्त के भाव दिखलाई पड़ते हैं और फिर यह तो धनुर्धारियों का उत्कर्ष माना जाता है कि उनके निशाने चल लक्ष्य पर भी ठीक बैठ जाएँ । अतः ऐसी लाभदायक मृगया को व्यर्थ ही लोग व्यसन कहते है क्योंकि इतना विनोद अन्यत्र कहाँ प्राप्त हो सकता है । ] यहाँ मृगया रूप अर्थ का अविकल निरूपण किया गया है लिससे यहाँ जो अनुचित या अप्रसिद्ध अर्थ हैं वे ही उचित एवं विचित्र प्रतीत होते हैं । यहाँ अशोभन अर्थ भी इस प्रकार शोभित होने से ' शोभा ' नामक लक्षण है ।

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अनुबन्ध अध्याय १७ ४८५ ७. अभिमान: -- ' धार्यमाणस्तु ' इत्यादि से ' अभिमान ' बतलाते हैं । जैसे: - शीतांशोरमृतच्छटा यदि कराः कस्मान्मनो मे भृशं सम्प्लुष्यन्त्यथ कालकूटपटलीसंवाससन्धुक्षिताः । किं प्राणान् न हन्त्युत प्रियतमा - संजल्प मन्त्राक्षरैः वार्यते किमु यद्विमोह विवशात् सन्तापतन्त्रा स्थितिः ॥ [ यदि चन्द्र की किरणें अमृतमयी है तो फिर ये मेरे मन को अतिशय क्यों सन्तप्त कर रही हैं । यदि कहें कि ये किरणें कालकूट विष के साथ वास करने से विषाक्त हो गयी है तो फिर ये प्राणों का हरण क्यों नहीं करतीं । ये प्राणों को हर लेती पर प्रिया के संभाषण रूप मन्त्राक्षरों से इस विष के प्रभाव को निवारण कर दिया गया है और जब ऐसा हो तो फिर से विष के प्रभाव से जन्य मोह के कारण सन्तापमयी स्थिति क्यों बना रहीं हैं । ] यहाँ एक अर्थ के साथ दूसरे अर्थ की योजना ( घटना ) इस प्रकार रखी गई है जिसमें फल की योजनाओं से धारण किया जाने वाला अर्थ हृदय में अवस्थित नहीं हो पाता है वहीं पर बँध जाता है । इस प्रकार अर्थ अलौकिक होने से विलक्षण एवं उपेय है । अतः यह अभिभान नामक लक्षण है । ६. गुणकीर्तन: - अब गुणकतन का स्वरूप - ' कीर्त्यमाने ' इत्यादि से दिखलाते हैं । जैसे: -पृथुरसि गुणैः मूर्त्या रामो नलो भरतो भवान् महति समरे शत्रुघ्नस्त्वं तथा जनकः स्थितो । इति सुचरितैर्मूर्ति विभ्रच्चिरन्तनभूभृतां कथमसि न मान्धाता देवस्त्रिलोकविजय्यपि ॥ [ हे राजन्, आप गुणों से पृथु या विशाल गुणशाली हैं, मूर्ति या आकार से आप श्रीराम, नल तथा भरत हैं, युद्ध में शत्रुओं के संहर्ता शत्रुघ्न हैं तथा पालन करने में आप जनक हैं । इस प्रकार उत्तम चरित्रों में चिरन्तन राजगण के स्वरूप को धारण करते हुए भी आप त्रिलोकजयी मान्धाता क्यों नहीं ( अर्थात् मुझे पालित करने वाले ) हो रहे हैं । ( अवश्य होंगें ) ] यहाँ गुणों के उल्लेख द्वारा प्रकृत की चारुता से ' गुणकीर्तन ' नामक लक्षण है । यहाँ यद्यपि श्लेष भी अनुग्राहक के रूप में उपस्थित है परन्तु लक्षण अलङ्कारों में भी वैचित्र्याधायक होता है ( अतः प्रमुख यहाँ लक्षण ( ही ) है । ) १०. प्रोत्साहन: – अब ‘ प्रोत्साहन ' को— ' उत्साहजननै ' इत्यादि से

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४८६ नाट्यशास्त्र बतलाते हैं । औपम्य का अर्थात् उपमा का जहाँ संचय अर्थात् यत्नपूर्वक अन्वेषण हो ऐसे । जैसे भट्टेन्दुराज के इस पद्य में-हरवृषभ तवेव तस्य माता जयति जगत्यसमानसू तिरेका । निवसति परमेश्वरोऽपि यस्मिन् सहतनयः सगणः सहावरोधः ॥ [ हे नन्दीश्वर, संसार में एक मात्र असदृश एवं तुम्हारे सदृश जन को प्रसव करनेवाली तुम्हारे जैसी ही माता की जय हो । जिसका अन्वेषण कर परमेश शिव भी अपने पुत्रों एवं गणों को साथ लेकर अपनी सहधर्मिणी के साथ प्रसन्नता से निवास कर रहे है । ] यद्यपि यहाँ अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कार भी है तथापि वैचित्र्य यहाँ लक्षण का ही है । इसे ही अन्यत्र पाठ में प्रियवचन या प्रियोक्ति कहा गया है । ११. उदाहरण: -- अब उदाहरण को — ' यत्रैकस्यापि ' इत्यादि से कहते हैं । जैसे: - वल्मीकात् किमुतोद्धृतो गिरिरयं कस्य स्पृशेदाशयं त्रैलोक्यं तपसा जितं यदि सखे दोष्णा किमेतावता । सर्वं साध्वथवा रुणत्सि विरहक्षामस्य रामस्य चेत् त्वद्दन्ताङ्कितवालि - कक्षरुधिरक्लिन्नाग्रपुङ्ख शरम् ॥ [ यह वल्मीक से उखाड़ा हुआ पर्वत है यह बात किस के मन को स्पर्श करेगी अर्थात् इसे कौन स्वीकार कर सकेगा । परन्तु हे मित्र, तुमने तप के द्वारा भुजाओं में बल प्राप्त कर त्रैलोक्य को जीता तो इससे क्या हो गया । हाँ, ये सभी तभी साधु या ठीक होगी जब तुम विरह से क्षीणगात्र वाले श्रीराम के उस शर को सह सको जिसके पुंख का अग्रभाग तुम्हारे दांतों के घाव से अङ्कित बालि की कोख के रुधिर से आर्द्र हो गया है । ] यहाँ बालि के कक्ष के रावण के द्वारा काटने पर उसकी प्रतीकार करने की असमर्थता को दिखला कर फिर भी घमण्ड रखने की उसी की स्वकीय प्रकृति का ध्वनन होता है । यहाँ तुम्हारे दांतों से इस रूप में उसके धिक्कार का कथन करने से ' उदाहरण ' है । १२. निरुक्त: - निरुक्त दो प्रकार का होता है । एक सिद्धि अर्थात् जिसे लक्षण की स्वीकृति से सिद्ध किया जाए वह तथ्य तथा जो लक्षण से सिद्ध न हो वह अतथ्य । इसका उदाहरण अभिनवगुप्तपाद का यह पद्य: -वीरोत्सवे सङ्गरसीम्नि मूढं यः प्रापयत् सत्यपथं कथञ्चित् । स चार्जुनः सोऽपि च नाम कृष्णः प्रसिद्धिरित्थं वितथैव सर्वा ॥

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अनुबन्ध अध्याय १७ ४८७ [ वीरजन के लिये उत्सव रूप युद्ध स्थल में मूढ़ व्यक्ति को जिसने अपने उद्घोधन से सत्यपथ पर पहुँचा दिया वह पहुँचाने वाला तो कृष्ण ( काला ) और पहुँचने वाला अर्जुन ( शुक्ल ) है ऐसी यह सभी प्रसिद्धि वितथ ( मिथ्या ) ही समझना चाहिए । ] यहाँ कृष्ण तथा अर्जुन के नामों से परस्पर अन्यत्र स्थल में सत्यता तथा अपने विषय में उनमें असत्यता है । यहाँ अर्थश्लेष नहीं हो सकता क्योंकि वह तुल्यसंख्या के पदार्ध में रहता है जब कि यहाँ एक का दूसरे में संकेत किया गया । अर्थात् जो मूढ़ उसे कृष्ण ( या काला ) होना चाहिए किन्तु यहाँ वह अर्जुन है तथा जिसने सत्पथ पर पहुँचाया उसे अर्जुन होना चाहिए किन्तु वह कृष्ण है । इस प्रकार एक ही में दोनों का व्यवहार हो रहा है ( यह तथ्य और अतथ्यभूत ' निरुक्त ' है ) । १३. गुणानुबाद: - गुणों का अनुवाद अर्थात् अनुकथन या परिच्छिन्न वस्तु की आपादित या कल्पित उत्कृष्ट गुण जो गुणों का उत्सेक हो वही ' गुणानुवाद ' । जैसेः— ' पालिता द्यौरिवेन्द्रेण त्वया राजन् वसुन्धरा I ' [ हे राजन्, जैसे इन्द्र ने स्वर्ग का पालन किया था इस पृथ्वी का पालन किया ] यहाँ एक पृथ्वी पर स्थित इन्द्र से तुलना कर उसमें गुणों का उत्सेक सिद्ध किया गया करना । परिमित से उपमा के द्वारा वैसा ही आपने मनुष्य राजा की । अतिशय: - उत्तम अर्थ अर्थात् कहे गये अर्थ से जो विशेष अर्थ है । जैसे भट्टेन्दुराज के इस पद्य में— याचन्त्येव पदान्यलीकपिशुनैरालीजनैः शिक्षिता तावन्त्येव कृतागसो दुततरं व्याहृत्य पत्युः पुरः । प्रारब्धं परतो यथा मनसिजस्येच्छा तथा वर्तितुं प्रेम्णो मौध्यविभूषितस्य सहजः कोऽप्येष कान्तः क्रमः ॥ [ उस मुग्धा को झूठी चुगली लगाने नाली उसकी सखियों ने जितने अक्षर ( या वाक्य ) सिखलाये उतने ही अक्षरों को उसने ( अविवेकवश ) अपने अपराधी पति के सम्मुख वैसे ही कह दिया तथा फिर काम की भावना के अनुरूप रति भी की । यह तो भोलेपन से अधिक सुन्दर बन पड़ने वाले प्रेम का एक विलक्षण एवं सहज सुन्दर ( एवं अतिरिक्त ) प्रक्रम हो गया । ] यहाँ पर प्रेम में ईर्ष्यात्मा अर्थ जो हो सकता है उससे विशेष बात कही गयी है तथा प्रत्येक पद में जो अभिप्राय है वह भी सुन्दरता से देखने योग्य

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४८८ नाट्यशास्त्र रखा गया है अतः यहाँ ' अतिशय ' है, क्योंकि यहाँ अर्थ सम्भाव्यमान है अतः यहाँ अतिशयोक्ति अलङ्कार नहीं है । १४. हेतु: - अब हेतु या सहेतु को बतलाते हैं - ' बहूनाम् ' इत्यादि के द्वारा । अनेक बोलने वालों का अनादर कर किसी एक असाधारण अर्थ के निर्णय का कर्तव्य रूप में अवलम्बन कर सिद्ध प्रमाणभूत उपमान का प्रक्षेप या कथन हो ( अर्थात् मुझे ऐसा प्रतिभात होता है ) – तो उसे ' हेतु ’ ' समझना चाहिए । जैसे भट्टेन्दुराज के इस पद्य में -वारिनिधिप्रवेशमपरे लोकान्तरालोकनं केचित् पावकयोगिनं निजगदुः क्षीणेऽह्नि चन्द्राचिषाम् । मिथ्या चैतदसाक्षिकं प्रियसखि प्रत्यक्षतीव्रातपो पुनरध्वनीन - रमणीचेतोऽधिशेते रविः ॥ [ दिन के क्षीण होने पर कुछ कहते हैं कि चन्द्र की किरणों का जलनिधि में प्रवेश हो जाता है, अन्य कहते हैं कि इसका अग्नि ( में प्रवेश या ) योग होता है किन्तु हे सखि, ये सभी बाते मिथ्या हैं, क्योंकि इनका साक्षी कोई नहीं है । परन्तु प्रत्यक्ष में जो इसका तीव्र आतप अनुभव किया जा रहा है उससे मैं तो यह मानती हूँ कि यह पथिक विरहियों के विरह से जलने वाली विरहिणियों के चित्त में सोया हुआ सूर्य है, चन्द्र नहीं ] । यहाँ असाधारण अर्थ का कथन होने से ' हेतु ' है । १५. सारूप्य: - अनुकरण से उत्पन्न होने से अपदेश जहाँ परोक्ष है तो ' सारूप्य ' । इसका उदाहरण आचार्य अभिनवगुप्त पाद का यह पद्यः-सैन्दूरीकृतसान्द्रकुङ्कुमरसप्रच्छायमालोच्यते यत् प्राच्यां दिशि वक्रिमास्पदमिदं दृग्वन्द्वले ह्यं महः । तत्तेजो जरठांशुतां कलयता भाविप्रवासावधि सन्ध्यामुग्धवधूकपोलफलके कीर्णो नखाग्राङ्कुरः ॥ [ जो पूर्व दिशा में टेढ़ा तथा दोनों नेत्रों से देखने योग्य सिन्दूर से गाढ़े कुङ्कुम रस सदृश यह दिखलाई दे रहा । यह उस तेज की जरठांशुता को प्रवास की भावी अवधि की सूचना देनेवाले विधाता ने सन्ध्यारूपी मुग्धवधू के कपोल पर अङ्कित अभिनव नखाग्राङ्कुर है । ] यहाँ यत् पद से निर्देश्य जो वस्तु है वह परोक्ष है क्योंकि यहाँ तत्त्व का पूर्ण परिज्ञान नहीं है । आलोच्यते से उसकी छाया मात्र अपदेश्य है । यहाँ सैन्दूरीकृत इत्यादि से जिसकी दर्शन क्रिया बतलाई वह प्रमाण सहित वस्तु

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अनुबन्ध अध्याय १७ ४८ ९ है अतः यहाँ ' सारूप्य ' लक्षण है । यहाँ उपमालङ्कार नहीं है क्योंकि उपमेय शब्दोपात्त नहीं है पर पूर्वार्ध से उपमेय को सूचित किया जाना अवश्य मिलता है । १६. मिध्याध्यवसाय: - अब मिथ्याध्वसाय को कहते हैं — अभूतपूर्वैः इत्यादि से । वास्तविकता से रहित अर्थों के द्वारा तत्तुल्य अवस्तुभूत अर्थान्तर का बक्ता के व्यापार या बोलने पर निश्चय होना ' मिथ्याध्यवसाय ' है । जैसा अभिनवगुप्तपाद के इस पद्य में

यो दुर्जनाद्वाञ्छित सिद्धिमीहते स नूनमुत्क्रामति तं सुखैधिनम् ।

जुहृज्ज्वलाग्नो विगतार्थमण्डलं प्रसह्य षष्ठं विषयं प्रसाधयेत् ॥

[ जो दुर्जन से वाञ्छित अर्थ की सिद्धि चाहता है वह अवश्य ही उस बढ़ने वाले सुख का उल्लंघन करता है और जलती अग्नि में हवन करते हुए हठात् ही अर्थ या प्रयोजन रूप षष्ठ विषय को सिद्ध करने का उद्योग करता है । ] यहाँ छठी इन्द्रिय के अभाव में उसके विषय की जैसे कोई स्थिति नहीं उसी प्रकार दुर्जन से किसी अर्थ की सिद्धि नहीं होती । यह काव्यलक्षण है ऐसा कहने का आशय यही है कि काव्य में लोक का विपर्यास थोड़ा या अधिक होता ( ही ) है । इसे अन्य पाठ में ' विपर्यय ' बतलाया गया है । १७. सिद्धि: - अब सिद्धि बतलाते हैं ' बहूनाम् ' इत्यादि से | अनेक प्रसिद्ध पदार्थों में से किसी एक अप्रसिद्ध नाम को कहते हैं । यह उस अप्रसिद्ध की असाधारण सम्पत्ति के लिये कहा जाता है । अतएव उसमें जिसका निवेश कर वैसा कहते है यह सिद्धि का हेतु होने से ' सिद्धि ' कहा गया है ।

जैसे: -भद्रेश्वरः सुरसरित् स भवानहञ्च त्रैलोक्यसारमिह सम्प्रति जीवलोके ।

भद्रेश्वरः सुरवरेषु सरित्सु गङ्गा त्वं पार्थिवेष्वहमतीव सुदुःखितेषु ॥

यहाँ आप और मैं-- इन अप्रसिद्धों का प्रसिद्धों के बीच में उपादान-असाधारण्य को दिखला कर ' सिद्धि ' का विधान करता है । १८. पदोच्चय: - अब पदोच्चय को ' गुणैर्बहुभिः ' से कहते हैं । एक तात्पर्य के विषयीभूत अर्थों के प्रतिपादक शब्दों के वाच्यरूप में स्वीकृत जो धर्म हैं उनका उपलक्षण कर जो वस्तु का प्रशंसन है वह पदोच्चय । क्योंकि अर्थों की उपलब्धि काव्य में स्थित पदों से ही होती है । अतः इन पदों का उच्चय अर्थात् बाहुल्य जहाँ हो वह ' पदोच्चय ' है ।