भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 61–70
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 61–70
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( ५० ) गीति तथा उपगीति प्रभेद होते हैं जिनमें गीति के प्राकृत भाषा में उद्गाथा आदि प्रभेद किये गये है । आचार्य अभिनवगुप्तपाद का इस विषय में मत है कि जातिवृत्तों के प्रस्तार भेद से पूर्वापर गण की गणना करने पर अनन्त प्रभेद हो सकते हैं । छन्दः प्रभेद – भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में अक्षरगणना के अनुसार पाद वाले छन्दों के विभेद करते हुए एक अक्षर के पाद वाले वृत्त से लेकर विवरण दिया है जिनके गणादि प्रभेद से विभिन्न वृत्त बनते हैं । इस क्रम में मुनि ने ' उक्ता ' से अतिकृति तक के वृत्तों को दिखला कर मालावृत्त आदि का स्वरूप भी बतलाया जिनके पाद छब्बीस अक्षर से अधिक संख्या के होते हैं । इसके अतिरिक्त इनका अन्य प्रकार से भी वर्गीकरण मुनि ने दिया है । यथाः- दिव्यगण, दिव्येतरगण तथा दिव्यमानुषगण । इनमें दिव्यगण के अन्तर्गत गायत्री, अनुष्टुप् बृहती आदि सात छन्दों के गण एवं प्रस्तार को रखा गया है, दिव्येतरगण के अन्तर्गत अतिजगती, शक्करी, अष्टि, अत्यष्टि आदि को तथा दिव्यमानुषगण में कृति, प्रकृति, आकृति आदि गण एवं प्रस्तार आते हैं । भरतमुनि तथा उनके अभिनवगुप्तपाद ने इस प्रकार प्रस्तार भेद से छन्दों के अनन्तप्रभेद की ओर भी संकेत किया । विभिन्न छन्दों की परिगणना तथा स्वरूप आदि का विवरण नाट्यशास्त्र में सोदाहरण दिया गया है । ( अतः यहाँ प्रत्येक छन्दः की चर्चा नहीं की जा रही है, सभी विवरण सम्बद्ध स्थान पर ही देखना चाहिए । ) नाट्यशास्त्रगत छन्दों के लक्षणादि देखने से एक बात स्पष्ट हो जाती है । कि भरतमुनि के समय तक छन्दःशास्त्र का जो विकास हो चुका था वह उनके स्थितिकाल का भी थोड़ा बहुत संकेत दे सकता है । इस तथ्य की चर्चा के समय हमने नाट्यशास्त्र के प्रथम भाग में संकेत किया है परन्तु इस खण्ड या भाग में इस पक्ष से भी इसके स्थितिकाल की विशेष चर्चा रखी गयी है । इस प्रकार छन्दों के गायत्री से उत्कृति तक के विविध वृत्तों के स्वरूप के अतिरिक्त मात्रिकवृत्तों के स्वरूपादि का विशद विवेचन नाट्यशास्त्र के पञ्चदश तथा षोडशअध्याय में किया गया है । छन्दों की रसानुगतता - यद्यपि भरतमुनि का नाट्यशास्त्र छन्दःशास्त्र या व्याकरणादि शास्त्र का न तो स्वतन्त्र और न ही प्रमुख ग्रन्थ है । इसमें तो शब्द के वाचिक अभिनय से सम्बद्ध सन्दर्भ में जो भी अपेक्षित विषय नाटयार्थ के उद्योतन में उपस्कारक थे उन सभी का अपेक्षित विस्तार से
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( ५१ ) निरूपण किया गया है, जिससे नाट्यशास्त्र का स्वरूप पूर्ण तथा व्यवस्थित हो सके । यह बात इसमें स्थित छन्दःशास्त्र के विवरण से स्पष्ट है तथा इस विवरण का प्रभाव परवर्ती छन्दःशास्त्रीय रचनाओं पर देखा जा सकता है । यहाँ तो रसोद्बोध के लक्ष्य एवं नाट्चार्थ की समृद्धि में आवश्यक होने के कारण छन्दोगत यह सभी विवेचन हुआ है, यह स्पष्ट ही है । इस विवरण से दूसरी बात यह भी दिखलाई देती है कि ये छन्दः काव्यार्थ के द्वारा रसाभिव्यक्ति में सहायक रहते हैं । आचार्य अभिनवगुप्त-पाद के मत में इन वृत्तों से भयानक, हास्य या शान्त आदि रसों में यथाशक्य संवेदना के परिस्पन्दन व्यापार से आस्वाद्यमानता एवं आश्चर्यमयता की सृष्टि द्वारा रस की अनुकूलता का निर्माण होता है; जिससे अर्थात् रसानुकूल छन्दों के प्रयोग से – नाट्यार्थ उद्योतित हो उठता है ' । भरतमुनि के अनुसार भी ' शृङ्गाररस के लिये आर्या आदि मृदुवृत्तों का तथा वीर, अद्भुत जैसे रसों के लिये लघु अक्षराश्रित वृत्तों का प्रयोग उपयुक्त होता है । परिभाषित छन्द - नाटयशास्त्र के छन्दोविवरण तथा पिङ्गल के छन्दः शास्त्र को देखने पर यह स्पष्ट ( दिखने ) लगता है कि पिङ्गलमुनि प्रणीत - ' छन्दः सूत्र ' नाटयशास्त्र का परवर्ती ग्रन्थ है । इसका आपाततः कारण यह है कि इस ग्रन्थ में नाट्यशास्त्र से अधिक संख्या में छन्दों का विवरण मिलता है । नाट्यशास्त्र के प्रथम भाग में हमने यह भी संकेत किया था कि नाट्यशास्त्र वाल्मीकि कृत रामायण तथा व्यास के महाभारत से परवर्ती तथा भास एवं कालिदास का पूर्ववर्ती है । यह तथ्य देखने के लिये यदि वाल्मीकि रामायण को ही सर्वप्रथम लिया जाय तो स्पष्ट प्रतीत हो जायगा । वाल्मीकि रामायण की छन्द की दृष्टि से देखने पर उसमें - ( १ ) अनुष्टुप् ( २ ) इन्द्रवज्जा, ( ३ ) उपेन्द्रवज्रा, ( ४ ) उपजाति, ( ५ ) प्रहर्षिणी, ( ६ ) वसन्ततिलका, ( ७ ) नान्दीमुखी ( मालिनी ), ( ८ ) पुष्पिताग्रा, ( ६ ) वैतालीय तथा ( १० ) औपच्छन्दसकीय ( दोनों मात्रिक ) नामक छन्द प्राप्त हैं । इसी प्रकार महाभारत में इन छन्दों के अतिरिक्त ( १ ) रथोद्धता, हरिणप्लुता ( द्रुतविलम्बित ) ( ३ ) अप्रमेय ( भुजङ्गप्रयात ), ( ४ ) प्रहर्षिणी, १. द्रष्टव्य अभि ० भा ० Vol. II पृष्ठ. ३४५ – “ अतएव भयानके शान्ते हास्ये वा यथायोगं संवेदनस्पन्दतां चर्व्यमाण स्वाद्यताश्चर्यकृतो विभागो वृत्तानां मन्तव्यः । " २. द्रष्ट ० -- ना ० शा ० १६।११३ - १२० ।
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( ५२ ) ( ५ ) शार्दूलविक्रीडित, ( ६ ) आर्या ( ८ ) मात्रा समक ( वैश्वदेवी ) छन्द उल्लेख नाटयशात्र में मिलता है । अब यदि इसी क्रम में हम भास तथा ( जो नाट्यशास्त्र की परवर्ती रचनाएँ हैं नाट्यशास्त्र में वर्णित इक्कीस छन्द तथा वर्णित बीस छन्दों का प्रयोग मिलता है । उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है , ( ७ ) अपरवक्त्रक तथा मिलते हैं । इन सभी छन्दों का अश्वघोष कवि की रचनाओं को ) देखें तो भास के नाटकों में अश्वघोष के द्वारा नाट्यशास्त्र में कि रामायण में विद्यमान छन्दों में तथा महाभारत में प्राप्त छन्दों में ऐसा कोई छन्द नहीं जिसे कि नाट्य-शास्त्र में परिभाषित न किया हो । अतः यह स्पष्ट है कि रामायण तथा महाभारत की अपेक्षा नाट्यशास्त्र की उत्तरभाविता स्पष्ट है । परन्तु यदि इसी प्रकाश में भास एवं अश्वघोष की रचनाओं में प्रयुक्त ऐसे छन्द को देखें ( जो क्रमशः २ तथा ५ होते हैं ) तो यह स्पष्ट होगा कि भास तथा अश्वघोष कवि भरत प्रणीत नाट्यशास्त्र के उत्तर भावी हैं यह स्पष्ट है । इसी क्रम में पतञ्जलि प्रणीत सुप्रसिद्ध ग्रन्थ व्याकरण महाभाष्य में उद्धृत छन्दों को भी परीक्षा हेतु रखा जाए तो स्पष्टतः उसमें इन छन्दों का प्रयोग है: - ( १ ) अनुष्टुप्, ( २ ) विद्युल्लेखा, ( ३ ) दोधक, ( ४ ) इन्द्रवज्रा, ( ५ ) उपेन्द्रवज्रा, ( ६ ) शालिनी, ( ७ ) तोटक, ( ८ ) वंशस्थ ( वंशस्थ विल - पिङ्गल ), ( ६ ) प्रमिताक्षरा, ( १० ) प्रहर्षिणी, ( ११ ) वसन्त-तिलका, ( १२ ) आर्या तथा ( १३ ) वक्त्र । इन सभी छन्दों का नाट्यशास्त्र में स्वरूप प्राप्त होता है । [ पतञ्जलि ने महाभाष्य में जिन ३०० पद्यों को उद्धृत किया है उनसे यह छन्दों का प्रयोग विवरण निकाला गया है ] इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पतञ्जलि मुनि ने जिन स्रोत ग्रन्थों से इन पद्यमय उद्धरणों को चुना था उनमें छन्दों के प्रयोग उसी रूप में हुए हैं जो. नाट्यशास्त्र में वर्णित हैं । अतः स्पष्ट है कि पतञ्जलि के ये उद्धरण जिन स्रोतों से संकलित हुए वे ग्रन्थ ईसा पूर्व २०० वर्ष से पूर्ववर्ती अवश्य थे । अतः नाट्य-शास्त्र सहज रूप में ईसा पूर्व ३०० से बाद में नहीं रखा जा सकता है । इस प्रकार छन्दो- विवरण से भी नाट्यशास्त्र के प्रथमभाग में चर्चित स्थितिकाल में ईसा पूर्व की स्थिति की पुष्टि ही होती है । इसके अतिरिक्त छन्दोगत तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष के लिये नाट्यशास्त्र के प्रयुक्त अनुष्टुप् छन्द के रूपों का परीक्षण भी उपयोगी होगा । इनमें एक तो अन्तर्वर्ती यति के स्थान पर
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( ५३ ) सन्धि का न होना तथा दूसरे एक दूसरे की अनुवर्ती घटना में विच्छेद का अभाव होना पाया जाता है । कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं: -( १ ) पुण्ड्राक्षं पुण्ड्रनासञ्च असितं सितमेव च । ( ना ० शा ० १।३६ ) ( २ ) ततश्च करमावृत्य ऊरुपृष्ठे निपातयेत् । ( ना ० शा ० ४ १६६ ) ( ३ ) आङ्गिको वाचिकश्चैव आहार्यः सात्विकस्तथा । ( ना ० शा ० ६।२३ ) ( ४ ) अंगुल्यो यस्य हस्तस्य अन्योन्यान्तरनिस्सृताः । ( ना ० शा ० ६ । १३२ ) ( ५ ) पर्यायतश्व क्रियते एलकाक्रीडिता तु सा । ( ना ० शा ० ११।२० ) ( ६ ) अत्यायतपदत्वाच्च अङ्गहास्यो भवेत् स तु । ( ना ० शा ० १३ । १४० ) अनुष्टुप् छन्द के ये उपर्युक्त नमूने स्पष्टतः ही वैदिक छन्दों की परम्परा का अनुगमन है तथा रामायण एवं महाभारत में होने वाले आर्षप्रयोगों की तरह भी हैं । इस सन्दर्भ में हम केवल ऋग्वेद से संकलित एक दो उदाहरण प्रस्तुत करना चाहेंगे ( १ ) हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् । ( ऋ ० सं १।३२।२ ) ( २ ) तिस्त्रो द्वावः सवितुर्द्धा उपस्था एका यमस्य भुवने विराषाट् ॥ ( ऋ ० सं ० १।३५।६ । यद्यपि संहितापाठ के दृष्टा ने उपर्युक्त ऋक् १ में आ में सन्धि रखी है जो यति को हटाने के उद्देश्य से है । जब कि ऐसा कहीं कहीं ही करने की छूट रही तथा वह भी तब जब किसी यज्ञादि में वैदिक ऋक् का पाठ किया जाता हो । क्योंकि इसमें एक अक्षर की कमी हो जाती है तथा छन्द भी इससे न्यूनतादोष ग्रस्त हो जाता है । इस प्रकार उपर्युक्त विचार से यह स्पष्ट हो जाता है कि नाट्यशास्त्र के पाठ में भी कुछ पद्यों में यति या सन्धि का छेद होना या न करना इस बात की सूचना दे रहा है कि नाट्य-शास्त्र की रचना अतिप्राचीन काल में तब हुई जब वैदिकच्छन्दों की नियमादि परम्परा का पालन हो रहा था तथा यह स्थिति भी नाट्यशास्त्र के स्थिति-काल को ईसा पूर्व ५०० वर्ष के समय में ही ले जाती है जो हमने प्रथमभाग में निश्चित किया है । प्रक्षिप्त अंश - अब यदि नाटयशास्त्र में आये हुए प्रक्षिप्त अंशों पर विचार करें तो यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि इसके पन्द्रहवें तथा सोलहवें अध्याय में जो पाठान्तर युक्त अंश अधिक रूप में प्राप्त हैं वे सभी अंश निश्चित रूप से बाद में जोड़ दिये गये होंगे । यह जोड़ने की कल्पना भी
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( ५४ ) किन्हीं उत्तरभावी अध्येताओं आदि ने वैदुष्यपूर्ण संशोधन की भावना से स्वबुद्धि से लगा दिये होंगें जो नाट्यशास्त्र के मूलपाठ की सुरक्षा में सब से बड़ी बाधा हो गये । परन्तु इन्हें देखकर दूसरी ओर यह भी विचार आता है कि प्रक्षेपकर्ता ने ऐसे अंशों को जोड़ने के द्वारा केवल अपने गणितशास्त्र के ज्ञान की ही कवायद दर्शायी है जिसमें प्रायः साधारण विचार या दृष्टि ही आ पायी है । उसे इसके लिये और अधिक कारण रखना चाहिए था परन्तु बिना किसी विशेष प्राप्ति के ही उसने ऐसा कार्य कर डाला — यही प्रतीत होता है । यह क्या बात होगी? यदि हम इस प्रश्न को उठाएँ तो यहाँ हमें एक ही विचार आता है । वह इस प्रकार कि प्रक्षेपकर्ता के समय ऐसे छन्द भी प्रचलन में आ गये थे जिनका लक्षण नाट्यशास्त्र के मूल में नहीं मिलता था । तब उसने यहाँ उन छन्दों को भी अपने गणितीय ज्ञान के तथा प्रस्तारादि के साथ यहाँ जोड़ दिया जिसका उद्देश्य यही दिखलाना था कि सभी छन्दों की पूर्णता के साथ उपलब्धि इस एक प्राचीन आकर ग्रन्थ में प्राप्य है । यह प्रवृत्ति एक ही प्राचीन रचना से सभी की गतार्थता दर्शाना है जो प्रायः प्राचीन ग्रन्थों के साथ ऐसे ही उत्तरभावी अज्ञात पण्डितों के द्वारा किया जाता रहा है । इसके विषय में खोजबीन करना कल्पना से परे ही होगा कि यह कार्य नाट्यशास्त्र के बाद कब से आरम्भ हुआ परन्तु ऐसा कार्य झक्कीपन की तुष्टि से अधिक प्रक्षेपकर्ता के लिए कुछ भी महत्व नहीं लाता न ही इससे मूल ग्रन्थ का महत्व बढ़ता ही है । नाट्यशास्त्र में जब यह छन्दोविधान निरूपित हुआ होगा वह नाट्यकला के चरम विकास एवं गौरव का युग था, जिसका परभावी नाट्य, काव्य तथा छन्दः शास्त्र के रचनाकारों पर अक्षुण्ण प्रभाव बना रहा । यद्यपि भरत निरूपित छन्दों के पश्चात् इस शास्त्र का पर्याप्त विकास स्वतन्त्ररूप में हुआ परन्तु इसका काव्य एवं नाट्य के क्षेत्र में जो महत्व धारावाहिक रूप में आता रहा वह अविस्मरणीय है । इसी कारण पुनरुद्धार एवं चतुरस्र पर्यालोचना के वर्तमान युग में भी नव छन्दों की संभावनाएँ गति पर आरूढ़ हैं और आशावाद के महान् संकल्प को संजोकर बढ़ती चली जा रही है । लक्षणादि विधान - नाट्यशास्त्र का " सत्रहवाँ अध्याय " काव्य-लक्षणादि विधानाध्याय कहलाता है । इसमें काव्यरचना के अंग लक्षण, अलङ्कार, दोष तथा गुण का लक्षणादि विधान है । इसमें सर्वप्रथम मुनि ने छत्तीस लक्षणों को काव्य की सहज सुन्दरता के रूप में मान्य कर उनका
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( ५५ ) स्वरूप दिया है । नाट्य एवं काव्य के महत्वपूर्ण अङ्गों के रूप में मुनि ने यहाँ लक्षणों का विवेचन किया है क्योंकि ' लक्षण ' काव्य के सर्वाधिक विधायक तत्त्वों में होते हैं । लक्षणों के कारण ही रसात्मक काव्य की इतर काव्य से भिन्नता संभव होती है । आचार्य अभिनवगुप्तपाद के अनुसार ' लक्षण की लोकप्रचलित अर्थ में भी समानता देखी जा सकती है । जैसे किसी महापुरुष के शरीर में अङ्कित पद्य आदि शुभ चिह्नों से उसके सौभाग्य का सङ्केत मिलता है इसी प्रकार लक्षणों से काव्य का सहज सौन्दर्य । नाट्यशास्त्र के विभिन्न संस्करणों में लक्षण के दो पाठ उपलब्ध होते हैं । इनमें काशी संस्करण में ( तथा घोष के संस्करण में भी ) दीर्घपाठ परस्परा के अनुसार अनुष्टुप् वृत्त से लक्षण निरूपण आरम्भ होता है तो काव्यमाला बम्बई तथा बडोदा संस्करण में उपजाति वृत्त से । इन दोनों में पर्याप्त पार्थक्य है । दोनों पाठों के मिलान करने पर इनमें अठारह लक्षण समान मिलते हैं तथा शेष भिन्न । आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने दोनों पाठों पर व्याख्या की किन्तु अपने उपाध्याय भट्ट तोत की परम्परा में चलने वाले नाट्यशास्त्र के उपजातिवृत्त वाले पाठ को प्राथमिकता दी । इसी पाठ परम्परा का अनुगमन धनञ्जय, कीर्तिधर आदि आचार्यों के द्वारा भी हुआ था । इसके विपरीत सिंहभूपाल तथा विश्वनाथ कविराज ( आदि ) ने दीर्घ-पाठ परम्परा का अनुसरण किया था । वृत्तिकार भी अभिनवगुप्त की तोत परम्परा के पाठों को ही लेता था परन्तु धाराधिप श्री भोजदेव ने दोनों परम्परा के पाठों के अनुसार लक्षणों को लेकर तथा बारह नवीन भेद सङ्कलित कर लक्षणों के चौसठ प्रभेदों का विवरण दिया । ऐसा प्रतीत होता है कि लक्षणों की परम्परा में भिन्न पाठ का प्रवर्तन भरतपुत्र नाट्याचार्य कोहल द्वारा आरम्भ हुआ होगा तथा इसी कारण इस पाठ की परम्परा-धारा चलती रही । जयदेव ने अपने चन्द्रालोक में लक्षणों की संख्या केवल ग्यारह ही मानी तथा दोनों पाठ - भेद परम्पराओं से लक्षणों की पाँच - पाँच संख्या ले ली । शारदातनय तथा विश्वनाथ कविराज ने भी लक्षणों के भिन्न स्वरूपादि माने जिनका उल्लेख आगे यथास्थान किया जा रहा है । नाट्यशास्त्र में वर्णित लक्षण तथा उनका क्रम - नाट्यशास्त्र के पाठों में दीर्घपाठ परम्परा में लक्षणों का जो क्रम है वही इस संस्करण में भी लिया गया है । तदनुसार क्रम इस प्रकार है: ( १ ) भूषण, ( २ ) अक्षर-
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( ५६ ) सङ्घात, ( ३ ) शोभा, ( ४ ) उदाहरण, ( ५ ) हेतु, ( ६ ) संशय, ( ७ ) दृष्टान्त, ( ८ ) प्राप्ति, ( ६ ) ( १३ ) विशेषण, ( १७ ) पदोच्चय, ( २१ ) विपर्यय, ( ( २६ ) गर्हण, ( २७ ( ३१ ) मनोरथ, ( ३५ ) अनुक्तसिद्धि अभिप्राय, ( १० ) निदर्शन, ( ११ ) निरुक्त, ( १२ ) सिद्धि, ( १४ ) गुणातिपात, ( १५ ) अतिशय, ( १६ ) तुल्यतर्क, ( १८ ) दिष्ट, ( १६ ) उपदिष्ट, ( २० ) विचार, २२ ) भ्रंश, ( २३ ) अनुनय, ( २४ ) माला, ( २५ ) दाक्षिण्य, ) अर्थापत्ति, ( २८ ) प्रसिद्धि, ( २ ९ ) पृच्छा, ( ३० ) सारूप्य, ( ३२ ) लेश, ( ३३ ) सङ्क्षेप, ( ३४ ) गुणकीर्तन, तथा ( ३६ ) प्रियवचन ( प्रियोक्ति ) । इसके अतिरिक्त ( आचार्य अभिनवगुप्तपाद के नाट्यशास्त्र के उपाध्याय ) भट्ट तोत के परम्परानुसारी काश्मीरी पाठ के अनुसार लक्षणों का क्रम इस प्रकार है ( १ ) विभूषण, ( २ ) अक्षरसंहति, ( ३ ) शोभा, ( ४ ) अभिमान, ( ५ ) गुणकीर्तन, ( ६ ) प्रोत्साहन, ( ७ ) उदाहरण, ( ८ ) निरुक्त, ( ६ ) गुणानुवाद, ( १० ) अतिशय, ( ११ ) सहेतु, ( १२ ) सारूप्य, ( १३ ) मिथ्याध्यवसाय, ( १४ ) सिद्धि, ( १५ ) पदोच्चय, ( १६ ) आक्रन्द, ( १७ ) मनोरथ, ( १८ ) आख्यान, ( १६ ) याञ्चा, ( २० ) प्रतिषेध, ( २१ ) पृच्छा, ( २२ ) दृष्टान्त, ( २३ ) निर्भासन, ( २४ ) संशय, ( २५ ) आशी:, ( २६ ) प्रियोक्ति, ( २७ ) कपट, ( २८ ) क्षमा, ( २६ ) प्राप्ति, ( ३० ) पश्चात्तपन, ( ३१ ) अर्थानुवृत्ति, ( ३२ ) उपपत्ति, ( ३३ ) युक्ति, ( ३४ ) कार्य, ( ३५ ) अनुनीति तथा ( ३६ ) परिदेवन । इन लक्षणों के नाम तथा स्वरूप में भिन्नता का सूत्रपात नाट्यशास्त्र की भिन्नपाठपरम्परा द्वारा होने के कारण उत्तरभावी आचार्यों ने इन्हें अपने प्राप्तिक्रम के अनुसार ले लिया जिससे लक्षणों के नाम तथा स्वरूप में विभेद बना रहा । इस सारे विवरण को देख कर भोज ने स्वकल्पित १२ लक्षणों को अतिरिक्त रूप में लेकर लक्षणों की संख्या ६४ मानी थी । जिनमें इन १२ लक्षणों के नाम इस प्रकार हैं- ( १ ) स्पृहा, ( २ ) परिवादन, ( ३ ) उद्यम, ( ४ ) छलोक्ति, ( ५ ) काकु, ( ६ ) उन्माद, ( ७ ) परिहास, ( ८ ) विकत्थन, ( ६ ) यदृच्छा योग, ( १० ) वैषम्य, ( ११ ) प्रतिज्ञान तथा ( १२ ) प्रवृत्ति । इसी प्रकार शारदातनय ने भी इन लक्षणों से भिन्न अन्य ग्यारह लक्षणों का उल्लेख किया है । वे इस प्रकार हैं: - ( १ ) नय, ( २ ) अभिज्ञान, ( ३ ) उद्देश, ( ४ ) नीति, ( ५ ) अर्थ - विशेषण, ( ६ ) निवेदन, ( ७ ) परिहार, ( ८ ) आश्रय, ( ६ ) प्रहर्ष, ( ६० ) उक्ति तथा ( ११ ) क्षेत्र ।
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( ५७ ) इस प्रकार इन नामावलियों के पार्थक्य से लक्षणों के अनेक प्रभेद होना इस काव्याङ्ग की व्यापकता का सङ्केत देता है । भरतमुनि ने लक्षणों की छत्तीस संख्या की सूची में उन्हीं लक्षणों को लिया जिनका साहित्य में सामान्यतः अधिक उपयोग हो सके किन्तु उन्हें इसके तथ्य के विषय में भी स्पष्टतः विदित था कि लक्षण के प्रभेदों की सीमा स्थिर नहीं हो सकती है । इतना अवश्य था कि तत्कालीन काव्याङ्गों में इन लक्षणों का महत्व भी था । इसी कारण उत्तरभावी कोहल आदि आचार्यों के द्वारा लक्षणों के अन्य स्वरूप भी उद्भावित किये गये तथा इसी कारण आगे भी भोजराज, शारदातनय जैसे नाट्यविद्या के आचार्यों ने लक्षणों के जो प्रभेद दिखलाये ये सभी लक्षणों की विशिष्टता को तथा महत्व को दिखलाने के लिये प्रर्याप्त आधार रहे हैं । भरतमुनि की परम्परा में लक्षणों के जो जो स्वरूप उद्भावित एवं व्याख्यात हुए उनसे भी उपर्युक्त विचारों की ही पुष्टि होती है । इसी कारण आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने लक्षणों के विषय में अनेक परम्परागत मत मतान्तर दिखलाये तथा परम्परा प्राप्त दोनों पाठों की सोदाहरण व्याख्या भी की । ' लक्षण ' का स्वरूप बतलाते हुए आचार्य भरत ने उन्हें काव्य का शरीर माना तथा कथाशरीर में लक्षणों से ही वैचित्र्य की उद्भावना को मान्यता दी । काव्यगत अपृथक् सौन्दर्य का आधायक लक्षण होता है तथा पृथक् सिद्ध सौन्दर्य का आधायक अलङ्कार कहलाता है । इस प्रकार लक्षण तथा अलंकार दोनों निरपेक्ष तत्त्व है तथा सौन्दर्य के आधायक भी तथा इसी कारण अलङ्कार का द्विविध व्यक्तित्व है । एक ओर वे नाटकीय इतिवृत्त के सन्ध्यङ्ग जैसे अंश के रूप में हैं क्योंकि नाटकादि के इतिवृत्त से इनका सम्बन्ध है, काव्यमात्र से नहीं । दूसरी ओर वे अलङ्कार के अनुगत धर्म भी थे । इस प्रकार काव्यगत अपृथक् सिद्ध सौन्दर्य के आधायक तथा शोभा धायक अंग के रूप में लक्षणों की पर्याप्त प्रतिष्ठा थी, यह स्पष्ट ही है । यदि इसके स्वरूपगततत्त्व पर विचार किया जाए तो उपर्युक्त तथ्य स्पष्ट हो जाएगा । लक्षण का पाठ उपजाति छन्द से आरम्भ होता है वे नाटकीय सन्ध्यङ्गों के सर्वथा अनुरूप थे, यह बात उनके अभिनवभारती व्याख्यान से स्पष्ट है जब कि दूसरा पाठ इस तथ्य का अनुगमन कम ही करता है । इसके अतिरिक्त दूसरा तथ्य यह भी है कि अनेक लक्षण अलङ्कारों के अनुगत है तथा इन्हीं का आगे चल कर परिवर्तन तथा परिष्कार होकर अलङ्कारों के रूप में विकास ( भी ) हुआ था । इस तथ्य पर भी अभिनव-
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( ५८ ) गुप्तपाद ने भट्टतोत का मत उद्धृत करते हुए बतलाया कि- " लक्षणों के सामर्थ्य से ही अलङ्कारों में वैचित्र्य है तथा अलंकारों के वैचित्र्य का मूल लक्षण में ही विद्यमान है । जैसे गुणानुवाद नामक लक्षण से प्रशंसोपमा अलङ्कार का, अतिशय से अतिशयोक्ति का, मनोरथ से अप्रस्तुतप्रशंसा का, मिथ्याध्यवसाय से अपहनुति का, सिद्धि से तुल्योगिता का उद्भावन किया जा सकता है । इसी प्रकार लक्षणों के परस्पर मिश्रण से उद्भूत वैचित्र्य से भी कुछ अलङ्कारों की उद्भावना हो सकती है । जैसे प्रतिषेध तथा मनोरथ के मिश्रण से आक्षेप अलङ्कार की उद्भावना । इसके अतिरिक्त कुछ लक्षण उक्ति वैचित्र्य रूप है जो अलङ्कारों के अनुग्राहक हो सकते हैं । इस प्रकार लक्षणों का द्विविध व्यक्तित्व है, यह स्पष्ट है । उपर्युक्त विवरण से लक्षणों का महत्व तथा उसकी काव्याङ्गों में अतिशय मौलिकता को दिखलाया गया है । आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने तो ' अलङ्कार तथा गुण की अपेक्षा न रखते हुए जिस निसर्ग सौन्दर्य की उत्पत्ति काव्य ( या नाट्य ) में होती है उसका हेतुरूप धर्म लक्षण ही है " " कहा भी । इसका आशय यही है कि लक्षण गुण और अलङ्कारों के बिना भी अपने सहज सौन्दर्य से प्रतिभासित हो सकता है तथा जैसे लक्षण रहित मनुष्य सुन्दर नहीं कहलाता उसी प्रकार लक्षण रहित इतिवृत्त का शरीर भी काव्य ( या नाट्य ) की अपेक्षित गरिमा को प्राप्त नहीं कर सकता । आचार्य अभिनव-गुप्तपाद की उपर्युक्त लक्षण व्याख्या तथा उनके उपाध्याय भट्ट तोत के समीक्षात्मक विवरण से यही तथ्य सामने आता है कि काव्याङ्गों में लक्षण अपना विशेष महत्व रखते थे तथा कथा एवं काव्यशरीर के वे अपृथक् अङ्ग तो थे ही, गुण तथा अलङ्कारों के आधार एवं उद्भावक भी थे । इसी कारण काव्य एवं नाट्य के क्षेत्र में लक्षणों का व्यापक प्रभाव रहा भी । इस प्रकार भरतमुनि के युग से लेकर अनेक शतकों तक लक्षणों का १. उपाध्याय मतं तु - लक्षण - बलादलङ्काराणां वैचित्र्य मा गच्छति । तथाहि गुणानुवादनाम्ना लक्षणेन योगात् प्रशंसोपमा, अतिशयनाम्वाऽति-शयोक्तिः, मनोरथाख्येनाप्रस्तुतप्रशंसा, मिथ्याध्यवसायेनापह्नुतिः, सिद्धया तुल्ययोगितेति । एवमन्यदुत्प्रेक्ष्यम् । लक्षणानाश्च परस्परवैचित्र्यादनन्तो विचित्रभावः । यथा प्रतिषेधमनोरथयोः सम्मेलनादाक्षेप " इति । ( अभि ० भा ० Vol. II पृ ० ३२१ । २. " काव्येऽप्यस्ति यथा कश्चित् स्निग्धः शब्दोऽर्थशब्दयोः । य श्लेषादि गुणव्यक्तिदक्षः स्याल्लक्षणस्थितः ॥ ” इति ( अभि ० भा ० Vol. II पृ ० २६६ )
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( ५६ ) यद्यपि काव्याङ्गों के रूप में महत्व बना रहा किन्तु आगे चलकर काव्यशास्त्र के विकास में अलङ्कारों की परम्परा ने धीरे - धीरे अधिक प्रसार एवं महत्व प्राप्त किया जिससे लक्षणों की आभा धूमिल पड़ती गयी तथा उनका क्षेत्र भी कम पड़ने लग गया । जहाँ एक ओर महाराज भोज ने लक्षणों की संख्या वृद्धि की तथा अन्य आचार्यों ने भी यथाशक्य इसी क्रम में कहीं लक्षणों के नाम तथा कहीं उनके स्वरूप को भिन्न बतला कर लक्षणों के विवेचन विवरण के विवर्जन क्रम को बनाए रखा था तो दूसरी ओर विश्वनाथ कविराज तथा सागरनन्दी आदि आचार्यों ने इन लक्षणों को नाट्य - लक्षण कहकर छत्तीस प्रभेद दिखला कर इन्हीं के साथ साथ ' नाटयालङ्कारों ' को भी प्रतिपादित किया । ये नाट्यालङ्कार या तो भोज आदि से नवीन उद्भावित ' लक्षण ' थे या नाट्यशास्त्र की पाठ भेद परम्परा से प्राप्त ऐसे ' लक्षण ' थे जो छत्तीस लक्षणों में समायोजित नहीं हो पाए थे अतः इनके सोदाहरण विवरण इन ग्रन्थों में लगाये गये । इसके अतिरिक्त धनञ्जय आदि ने इन लक्षणों का अन्तर्भाव अलङ्कार, गुण, सन्धि तथा भाव में हो जाने से काव्याङ्गों में उनके विवरण को देना ही अनावश्यक मान लिया था । ' इसका परिणाम यह हुआ कि नाट्य - लक्षणों या नाट्यालङ्कारों का विवरण देना एक परम्परा - निर्वाह मात्र हो गया तथा कालान्तर में यह लक्षण विवेचन का क्रम मन्दतर होने लगा । काव्यशास्त्र के उत्तरोत्तर विकास के साथ गतिमान् होकर ये लक्षण नहीं चल पाये तथा उनकी ह्रासोन्मुखी स्थिति ने धीरे - धीरे न केवल उनकी महत्वपूर्ण स्थिति ही रहने दी परन्तु उनकी अनुपयोगिता को भी बतलाना आरम्भ कर दिया था जिसका सङ्केत धनञ्जय के इस विवरण से मिलता है । परिणाम स्वरूप लक्षण पद्धति का स्थान साहित्यशास्त्र में ' अलङ्कारों ने ले लिया जो नाट्यशास्त्र के रचनाकाल के समय अतिशय अल्पावस्था में अवस्थित थे । अलङ्कार - नाट्यशास्त्र में लक्षणों के विवरण के पश्चात् अलङ्कारों का विवेचन दिया गया है । इसमें जहाँ लक्षणों की संख्या छत्तीस थी वहाँ अलङ्कारों की संख्या चार ( ही ) है तथा नाट्यशास्त्र के इस भाग पर कोई भिन्न पाठ तथा प्रक्षिप्त अंश भी उपलब्ध नहीं है । इससे स्पष्ट है कि नाट्य-शास्त्र के लेखन के समय से लेकर अनेक शताब्दियों बाद तक अलंकार पद्धति अपनी स्थिति आरम्भक बिन्दुओं से अधिक विस्तीर्ण नहीं बना सकी थी । १. “ लक्षणसन्ध्यङ्गकाव्यानि सालङ्कारेषु तेषु हर्षोत्साहेषु अन्तर्भावान्न-कीर्तिता " । दश ० रू ०४ ।