भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 51–60
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 51–60
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( ४० ) की संगीत विषयक सुस्वरता एवं ध्वनि की सहज रमणीयता को तो कुन्तक ने अपने ' वक्रोक्ति - जीवित ' नामक ग्रन्थ में दिखलाया भी है । आवन्तिकी प्रवृत्ति - यह प्रवृत्ति अवन्ती, विदिशा, सौराष्ट्र, मालव, सिन्धु, सौवीर, आर्बुद, दशार्ण, त्रिपुर, मृत्तिकावत् प्रदेशों के वासियों की भाषा, वेषभूषा तथा आचार - विचार आदि से सम्बद्ध होती है । अतः जब इन देशों के पात्र नाट्यप्रयोग में प्रस्तुत होते हैं तो उनकी वेषभूषा तथा भाषा तदनुसार रहती है । इसमें सात्वती तथा कैशिकी वृत्तियों का प्रयोग रहता है । अवन्ती प्रदेश की स्त्रियों के वेशविन्यास में कुन्तल या घुंघराले केशों में उनका प्रसाधन रखा जाता है, क्योंकि नाट्यप्रयोग में देशज वेष महत्त्व रखता है । इसमें धर्मशृङ्गार की प्रधानता होती है अतः सात्वती एवं कैशिकी वृत्ति का यहाँ समन्वय रखा जाता है । औदमागधी प्रवृत्ति - यह प्रवृत्ति अङ्ग, कलिङ्ग, वत्स, औढमागध, पौण्ड्र, नेपाल, अन्तर्गिरि, बहिगिरि, मालद, ब्रह्मोत्तर, प्राग्ज्योतिष, पुलिन्द, विदेह, ताम्रलिप्त तथा प्राच्य देशों के निवासी पात्रों में प्रयुक्त की जाती है । तथा पूर्वदिशा के निवासी भी इसी का प्रयोग करते हैं । प्राच्यदेश की सीमा समुद्र तट से चलती हुई दक्षिण तक जाती है तथा इधर उत्तर में मगध देश तक लगती है, अतः इन दोनों छोरों की मध्यवर्ती होने से इसे ओढ़मागधी कहा जाता है । यह आन्ध्र तथा कलिङ्ग दोनों के आचारों आदि की उपजीव्यता धारण करती है तथा दोनों के कारण ही इसके नाम में एकीभाव या मिश्रण विद्यमान है जो इस प्रवृत्ति में भी परिलक्षित होता है । इसमें भारती तथा आरभटी वृत्ति का समन्वय रहता है तथा आडम्बर प्रधान घटाटोप भरे वाक्यों का प्रयोग इसमें प्रचुरता से रखा जाता है । इसके अन्तर्गत जिन - जिन प्रदेशों की परिगणना हुई है उनका उल्लेख किञ्चित् परिवर्तन से पुराणों में मिलता है । पाञ्चालमध्यमाप्रवृत्ति - यह प्रवृत्ति पांचाल, शूरसेन, काश्मीर, हस्तिनापुर वाह्लीक, काकल, मद्र, कुशीनर तथा हिमालय के समीपवर्ती प्रदेश एवं गङ्गानदी के उत्तर की ओर के निवासी जनपदों के पात्रों में प्रयुक्त की जाती है । इस प्रवृत्ति में सात्वती और आरभटी वृत्तियों की प्रचुरता रखी जाती है तथा गीतप्रयोग की अल्पता के कारण कैशिकी वृत्ति का प्रयोग नहीं रहता है । इन प्रवृत्तियों के अनुसार ही भरतमुनि ने पात्रों के रंगमश्व पर प्रवेश की विधि भी दिखलाई है । इसकी दो विधियाँ हैं: आवन्ती तथा दाक्षिणात्या
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( 8? ) प्रवृत्ति के पात्रों का रङ्गमञ्च पर प्रवेश उत्तर दिशा से तथा पाञ्चालमध्यमा एवं ओड्रमागधी प्रवृत्ति के पात्रों का दक्षिण दिशा के द्वार से होता है । जहाँ मश्व पर द्वार न हो वहाँ आवन्ती और दाक्षिणात्या के पात्र दाहिनी बाजू से तथा पाञ्चाल मध्यमा एवं औड्रमागधी के पात्र बाईं बाजू से प्रवेश करते हैं । इस प्रकार नाट्य में किया गया यह विधान प्रवृत्तिभेद को दिखलाता है । प्रवृत्तियों की इन विभिन्नताओं का प्रयोग नाट्य ( अभिनय ) में ही होता है. गीत में नहीं । गीत में इनका समन्वित प्रयोग ही इष्ट होता है । महाराजाधिराज भोज ने भी प्रवृत्तियों का विस्तृत विवरण दिया है तथा एक अतिरिक्त प्रवृत्ति पाञ्चाली या पौरस्त्या की भी परिगणना की है । यह प्रवृत्ति पूर्व देशों का सङ्केत करती है परन्तु पूर्वदेशों का संकेत करने वाली मागधी का भी उल्लेख भोज ने किया है । भोज के प्रवृत्तिविधान में वेषभूषा की विभिन्नता का विवेचन करते हुए बतलाया गया कि लोक में वेषभूषा केवल पात्र की विभिन्नता से ही परिवर्तित नहीं हो जाती परन्तु एक ही पात्र की वेषभूषा अनेक कारणों एवं अवस्थाओं के सन्दर्भ में परिवर्तित भी होती रहती है । इन कारणों तथा अवस्थाओं की परिगणना यद्यपि सम्मव नहीं है परन्तु भोज ने इसे प्रवृत्ति के हेतु दिखलाया है । तदनुसार देश, काल, पात्र, वय, शक्ति, साधन, अभिप्राय, व्याघात, विपरिणाम, निमित्त, बिहार, उपहार, थल, छन्द, आश्रय, जाति, व्यक्ति, तथा विभव आदि के कारण पात्र की मनुष्य की ) वेषभूषा में अन्तर आ जाता है तथा तदनुसार नाट्यप्रयोग में उस लोकाचार का प्रयोग उचित होता है । उसे आहार्य अभिनय के प्रसंग में भरत मुनि ने वेष, वय, अवस्था के अनुसार कथा के परिवर्तन से प्रवृत्ति के विधान का संकेत किया है । भरतमुनि ने प्रवृत्तियों का विभाग मुख्यतः वृत्तियों के आधार पर ही किया था । वृत्ति पात्रों की शारीरिक तथा मानसिक अवस्थाओं से सम्बद्ध होती है जब कि प्रवृत्ति पात्रों की वेषभूषा, व्यवहार आदि से सम्बद्ध होती है । वृत्ति व्यक्ति की अन्तश्चेतना तथा प्रवृत्ति उसकी बाह्य अभिव्यक्ति होती है । इसीलिये नाट्यप्रयोग के चित्तवृत्ति प्रधान होने से उसमें वेषभूषादि का प्रयोग सहायक हो जाता है । इसका मूलतत्त्व यह है कि चित्तवृत्ति से वेषभूषादि का प्रयोग होता है, जो वेष एवं भाषागत भेद तथा देशभेद से स्वभाव भेद को नाट्यायित करने का है । स्वभावभिन्नता के आधार पर ही उद्धत या मृदु वृत्तियों का विनिश्चय भी होता है । इस तथ्य को मुनि ने
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( ४२ ) व्यापक दृष्टि से देखा था तथा उसे नियोजित करने का विधान भी दिखलाया जिसकी अभिनवगुप्तपाद ने भी समर्थन करते हुए स्पष्ट व्याख्या दी । नाट्यप्रयोग के क्रम में देश, काल एवं अवस्था के अनुरूप प्रवृत्ति विधान रहने पर ही रसास्वादन शक्य होता है । कभी प्रवृत्तियों का समन्वय भी नाट्यप्रयोग के सौन्दर्य या अर्थ - युक्ति के आग्रहवश किया जाता है तथा कभी देश, काल आदि के कारण भी । यदि यह होता है तो ही नाटय की समग्र परिकल्पना सम्भव है तथा ऐसे सामञ्जस्य के विपरीत नाटयं प्रयोग अयथार्थ एवं रसानुभूति की हीनता से ग्रसित हो सकता है । अतः प्रवृत्ति के अनुरूप ही पात्रों की नाट्यप्रयोग में योजना का विधान रखा गया, क्योंकि पात्र प्रेक्षकों के हृदय में भाव अङ्कित करने में इसी बाह्यपरिवेशमयी प्रवृत्ति के योग से ही सफल होता है । यहाँ इन्हीं कारणों से प्रवृत्ति का ऐतिहासिक महत्त्व एवं मूल्य भी है । यह सही है कि ये प्रवृत्तियाँ अपने स्वरूप में कदाचित् भरतमुनि के पूर्व भी विद्यमान रहीं होगी जिनको मुनि ने शास्त्र बद्ध कर नाट्यप्रयोग में विनियोजित किया, क्योंकि ऐसा करने से नाट्यप्रयोग समृद्ध एवं भाव सम्पन्न होता है यह निर्विवाद है । लोकधर्मी तथा नाट्यधर्मी — भरतमुनि ने अभिनय के इसी कथ क्रम में नाट्याभिनय के अनुगामि होने से धर्मी का उल्लेख ( अभिनय कथन में बाद में ) किया यद्यपि षष्ठ अध्याय में संग्रह तथा उद्देश्य के कथन के प्रसंग में रस, भाव आदि एकादश ( या त्रयोदश ) तत्त्वों में धर्मों का उल्लेख किया था । अभिनय अर्थात् नाट्यप्रयोग का जो अपना धर्म या स्वभाव है उसके अनुकूल कार्य ' धर्मी ' होता है । धर्म शब्द की व्युत्पत्ति भी ' ध्रियते अनेन ' ' धरति इति वा ' । इस प्रकार धृ धातु से मन् प्रत्यय निष्पन्न ' धर्म ' शब्द है । अतः धर्मी का अर्थ हुआ जिसमें धर्म हो या जो धर्म का अनुगमन करता हो । इसी कारण नाट्य में दो प्रकार के धर्मी निरूपित किये गये - ( १ ) लोकधर्मी तथा ( २ ) नाट्यधर्मी । लोक में प्रचलित कार्य, आचार एवं व्यवहारों का शुद्ध अनुकरणात्मक प्रस्तुतीकरण ' लोकधर्मी ' होगा । जिसमें अपने सहज या प्रकृत भाग में स्वरूप प्रस्तुत होता है तथा इसी कारण उसमें लोकजीवन की सहजवृत्तियों का प्रभाव दिखता है । नाट्यधर्मी में शास्त्रीय उक्तियाँ या साङ्केतिक वाक्य, स्वगत या आकाशभावित आदि तथा रङ्गमञ्च पर प्रयोज्य वस्तु तथा भावों का सङ्केत करने वाली असंख्य विधियाँ तथा निर्देश आते हैं । इसके अतिरिक्त लोकदुष्ट सुख, दुःखादि के आङ्गिक अभिनयादि से प्रस्तुत नाट्य तथा
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( 83 ) अभिनय विधान एवं उनका प्रतिपादक यह नाट्यशास्त्र - ये सभी नाट्यधर्मी कहलाते हैं । लोकधर्मी ( स्वरूप ) - लोकधर्मी का स्वरूप बतलाते हुए मुनि ने ( नाट्यशास्त्र १४।६६-७० में ) कहा कि - ' यदि कोई रूपक लोकस्वभाव के अनुसार भावप्रदर्शित करनेवाला, सादगी और विना बाहरी दिखावट वाला ( अविकृत ) कथावस्तु में प्रजाजन के सामान्य आचार, अवस्था एवं क्रियाओं को प्रदर्शित करने वाला, लीला आदि ललित वर्तन से रहित आङ्गिक चेष्टाओं से सहज भावों को प्रस्तुत करे तथा जिसमें अनेकविध स्त्री एवं पुरुष पात्र हों तो वह ' लोकधर्मी ' नाट्य है । आचार्य अभिनवगुप्त ने भी कवि के द्वारा लोकधर्मी रूढ़ि के अनुसार यथावत् वस्तु मात्र के रचना द्वारा तथा अभिनेता के द्वारा उसे तथैव प्रस्तुत करने को ' लोकधर्मी ' बतलाया क्योंकि इसमें स्वप्रतिभा से निर्मित अनुरञ्जनकारी वैचित्र्य की कल्पित उद्भावनायें नहीं होतीं । आशय यही हैं कि यहाँ लोकानुसारी मानव पात्रों की सहज प्रवृत्तियों को प्रमुखता देकर उपस्थित करने का उद्योग रहता है अतः यह लोकधर्मी प्रयोग कहलाता है । इसके अतिरिक्त मानव की सुख दुःखात्मक भावों में रहने वाली स्थिति का प्रकृतिसम्मत अङ्कन या प्रकृत स्थिति में अभिनय विधान भी ' लोकधर्मी ' ही होगा । नाट्यधर्मी ( स्वरूप ) — इसी क्रम में भरतमुनि ने नाटयधर्मी का भी विशद विवरण दिया तथा उसे लोकधर्मी रूढ़ि की अपेक्षा अधिक वैचित्र्याधायक, कल्पनासम्भरित तथा अनुरञ्जनक्षम बतलाया । तदनुसार यदि किसी रूपकादि में इतिहास, पुराण आदि में प्रसिद्ध इतिवृत्त को कल्पनात्मक परिवर्तन के द्वारा रंगमञ्च पर प्रस्तुत किया जाए तो वह ' नाटयधर्मी ' होता है । इसी प्रकार नाट्यरचना या रूपकादि में वाक्यावलि, क्रियायें, प्राणिवर्ग ( पुरुष तथा स्त्री पात्रादि ) तथा भाव असामान्य रहें, लक्षण से युक्त अङ्गहारों, नृत्त, अभिनयादि को स्वर तथा अलङ्कारादि की योजना से युक्त रखा जाए तथा दिव्य तथा अदिव्य पात्रों के चरित्र कुशलतापूर्वक वहन किये जाए तो यह भी ' नाट्यधर्मी ' ही होगा । इसी प्रकार जहाँ लोकप्रसिद्ध वस्तु के मूर्त रूप में कुशलता से प्रयोग किया जाता हो, जहाँ समीपवर्ती पात्र के कथन न सुने जाते हों तथा अनुक्त कथन को सुनकर उसका प्रत्युत्तर दिया जाय, जहाँ पर्वत, वाहन, विमान तथा ढाल, कवच, शस्त्र तथा ध्वज आदि का मूर्त रूप में प्रयोग होता हो, जहाँ एक अभिनेता
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( ४४ ) एक भूमिका का निर्वाह करने के बाद पुनः दूसरी भूमिका को भी धारण कर उसका भी अपने अभिनय कौशल से निर्वाह करता हो, जो स्त्री एक बार अगम्य ( पूज्य या वृद्ध ) स्त्री की भूमिका ( को अभिनय द्वारा ) प्रस्तुत कर पुनः गम्या ( नायिका या अन्य युवती स्त्री ) की भूमिका ले लेती हो तो यह भी ' नाटयधर्मी ' हो जाता है । इस प्रकार मुनि ने काव्य एवं नाट्य में चमत्कार तथा सौन्दर्य के उद्भावन में लोकधर्मी रूढ़ियों की भांति कुछ आधार ग्रहण करते हुए सिद्धान्ततः ‘ नाट्यधर्मी ' को दिखलाया है । यहाँ इतिहासादि प्रसिद्ध इतिवृत्त में कल्पना के योग से नाट्यधर्मी ' भाव रूढ़िबद्ध हो जाता है । इसी प्रकार लक्षणादि सम्पन्न आङ्गिक अभिनय का अंगहारादि शास्त्रीय अङ्गों के साथ प्रस्तुतीकरण तथा वाचिक अभिनय में अलङ्कारादि की योजना के साथ स्वर, गीत आदि के साथ काव्य का व्यवस्थित रूप में नियमबद्ध उपस्थापन भी ' नाट्यधर्मी ' है । नाटयधर्मी का क्षेत्र व्यापक है जहाँ पात्रों की भूमिका में विपर्यय होना, पात्रों का स्वभाव त्याग तथा परभाव में अभिनय करना, संसार प्रसिद्ध पदार्थों एवं भावों का प्रतीकादि रूपों में प्रदर्शन तथा एक पात्र का एक से अधिक भूमिका में आना, आङ्गिक अभिनय को विविध वाद्यवादनादि के साथ प्रस्तुत करना, कक्ष्याविभाग के अन्तर्गत निद्दिष्ट विधानों का अनुसरण करना तथा चित्राभिनयादि के सङ्केतात्मक विशिष्ट अभिनय को सम्पन्न करना आदि अनेक बातें आती हैं । इस प्रकार स्पष्ट है कि लोक के सहज जीवन या भाव का अनुकरण करने वाला सहज अभिनय ' लोकधर्मी ' तथा शास्त्रीय परम्परा का अनुगमन करने वाला प्रतीकात्मक अभिनय ' नाटयधर्मी ' होता है । प्राचीन नाट्याचार्यों का भी ध्यान नाट्यप्रयोग में स्वभाविकता तथा प्रभावोत्पादकता की समस्या पर गया था जिसके लिये उनने इन दो धर्मियों का विभाग करते हुए अपना प्रयोगगत रास्ता निकाल लिया । इस प्रकार से स्त्री - पुरुषों के सहज प्रस्तुतियाँ भी नाट्यप्रयोग में रहे तथा आवश्यकतानुसार उसमें परिष्कार तथा अभिनयगत दक्षता के शास्त्रीय नियम तथा रूढ़ियों का भी संयोजन रखा जाए । प्राचीन रङ्गकर्म के उपदेष्टा तथा प्रयोक्ता आचार्यों ने इस सत्य को बहुत पहिले ही पहिचान लिया था कि वास्तविक कला की उपलब्धि के लिये नाट्यधर्मी रूढ़ियों का परम्परानुगमन आवश्यक है । यदि अतिवास्तविकतावादी ऐसी स्थिति में अस्वाभाविकता का दोषारोपण करें
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( ४५ ) भी तो भी इस तथ्य से नकारा नहीं जा सकता है कि रूपक की रचनागत स्थितियों के साथ - साथ उसके रङ्गमञ्च पर प्रयोग की सम्भावनाओं का सूक्ष्म परीक्षण करने पर यह स्पष्ट हो जाएगा कि प्रेक्षकवर्ग यदि वास्तविकता का अतिशय कठोरता से आग्रह रखते होगे तो किसी प्रकार भी रंगमञ्च पर कोई भी नाट्यप्रयोग प्रस्तुत होना सम्भव नहीं है । इससे यह भी विचार अल्पचिन्तन से विनिश्चित लगता है कि " भरत-काल में लोकधर्मी तथा नाट्यधर्मी परम्पराएँ स्वतन्त्र रूप में विकसित हो रहीं थीं । धर्मी पद्धति की अनभिज्ञता, रंगमञ्च निर्माण की विस्तृतविधियों से अपरिचय तथा वस्तुगत वैचित्र्य के अभाव में भी ' लोकधर्मी ' तत्व जनपदों की छाया में विकसित हो रहा था । जब कि नगरों में आयोजित नाट्यप्रयोग शास्त्रानुमोदित तथा सुसंस्कृत होते थे तो ग्रामों के आयोजन शुद्ध तथा प्रकृतरूप में । इस प्रकार ग्रामों तथा नगरों में प्रचलित नाट्य की दो धाराओं को भरतमुनि ने लोक तथा नाट्यधर्मी के रूप में परिगणित किया है " । क्योंकि दोनों विधाएँ ही नाट्यप्रयोग को प्रभावित करती है तथा इनकी समान रूप से विकासयात्रा भी रहती है । अतः जनपदीय नाट्यरूपों को किसी भी स्थिति में शास्त्रसम्मत लोकधर्मी का उदाहरण नहीं माना जा सकता है । इसी प्रकार यह भी समझने की बात है कि नाट्यप्रयोग जिसे धारण करता हो वही ' धर्मी ' होता है तो नाट्यप्रयोग एक ओर तो अनुकरण मूलक होगा तथा दूसरी कल्पनामूलक भी । नाटक फिर चाहे संस्कृत का हो या ग्रामीण भाषा का अपने अभिनयन के लिये उन्हें स्वाभाविकता के साथ-साथ प्रतीकात्मकता का आधार लेना ही पड़ेगा । परन्तु स्वाभाविक अभिनय विधान को लोकधर्मी तथा प्रतीकात्मक विधि को ' नाटयधर्मी ' मान कर प्रयोग की समस्या का भरतमुनि ने समाधान निकाला था । अतः देशी नाट्यपद्धति के नाम पर अभिनय व्यापार को प्रयोग में प्रविष्ट कर श्री हबीब तनवीर ने भवभूति के जिस परिनिष्ठित रूपक ' उत्तररामचरित ' नाटक का भोंड़ा प्रदर्शन उज्जयिनी के " कालिदास समारोह " ( वि ० सं ० २०३२ ) में किया था वह किसी भी प्रकार रंगकर्मिता की प्रतिष्ठित लोकपरम्परा का अनुगमन नहीं करता, न ही अभिनय की एक शैली कहकर उसे भारतीय परम्परा से अनुगत वस्तु माना जा सकता है । इनमें स्थित अस्वाभाविकता को लोकवृत्ति का विशेष या अनगढ़ रूप भी नहीं माना जा १. द्रष्ट - भरत और भारतीय नाट्यकला – पृष्ठ ४४८
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( ४६ ) सकता है, क्योंकि वैसा रहने पर होने वाला नाट्यप्रयोग एक अतिहीन या सस्ता मनोरंजन का रूप लेकर उसे अधम श्रेणी की ओर धकेल देगा । इस प्रकार लोकधर्मी तथा नाट्यधर्मी के विवरण से जहाँ उनकी स्थिति तथा स्वरूप पर प्रकाश पड़ता है वहीं उनकी पारस्परिक विभेदकरेखाएँ भी स्पष्टतः परिलक्षित हो जाती हैं । अतएव वाचिक अभिनय में प्रयुक्त संवाद जहाँ लोकधर्मी होंगें वही ' गान ' नाटयधर्मी हो जायगा । इसी प्रकार स्वगत, जनान्तिक, अपवारितक तथा आकाशभाषित जैसी विधियाँ नाट्यधर्मी ही रहेंगी । आहार्यअभिनय के अन्तर्गत अलङ्कारों तथा वस्त्रों का परिधान लोकधर्मी होगा तो गति प्रचार में आने वाली आरोहण तथा अवरोहण आदि की विधियाँ नाटयधर्मी होंगी । सात्विक अभिनय के अन्तर्गत सहजभाव में अश्रुप्रवाह की अवस्था लोकधर्मी तथा भावों के प्रदर्शन की स्थिति में शास्त्रीय विधान के अन्तर्गत प्रस्तुत यही विधि ' नाटयधर्मी हो जायगी । इस प्रकार इन विभेदों की कल्पना से ही स्पष्ट है कि ' लोकधर्मी ' रूढ़ियाँ नाटयधर्मी रूढ़ियों की आधार तथा अनुग्राहक है अतः उनकी नाट्यप्रयोग की सिद्धि में समान उपयोगिता तथा सहकार रहता है तथा किसी एक ही परम्परा से रूपक को मश्च पर प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है ( नहीं इसमें विशुद्धता का कोई आग्रह ही होना चाहिए ) । भरतमुनि के उत्तरभावी नाट्याचार्यो की दृष्टि ऐसी प्रयोगप्रधान नहीं रही तथा इसी कारण धनञ्जय, धनिक आदि ने नाट्यधर्मी तथा लोकधर्मी तथ्यों पर कोई विवरण नहीं दिये । महाराणा कुम्भ, बेमभूपाल आदि के विवरण भी इस तथ्य पर अधिक नवीनता नहीं देते । ' नाट्यशास्त्रसंग्रह ' में अवश्य इस विषय में कुछ विशेष विवरण मिलता है । तदनुसार लोकधर्मी तथा नाटयधर्मी विधाओं की स्थिति को दिखलाते हुए बतलाया गया कि ये ' धर्मी ' दो प्रकार के हैं लोक तथा नाट्य । इनमें ' लोकधर्मी विधा के दो विभाग होंगे— ( १ ) चितवृर्त्यपिका तथा ( २ ) बाह्यवस्त्वनुकारिणी । इसी प्रकार नाट्यधर्मी के भी - ( १ ) कैशिकी शोभिनी तथा ( २ ) अंशोपजीविनो जैसे विभाग होंगे । इनमें लोकधर्मी रूढि के अन्तर्गत जिन दो भेदों को दिखलाया गया उनमें एक के अन्तर्गत मानव के सुखदुःखात्मक स्वभावगत प्रकृत अभिनय का विधान है जहाँ आन्तरचित्तवृत्तियों का प्रस्फुटन होता है । दूसरे में नाटयवस्तुओं का संङ्केत रहता है जो मानव जीवन के चारों ओर स्थित प्राकृतिक सौन्दर्य है । मानव जीवन उसकी आन्तरवृत्तियों तथा नाट्यपरिवेश दोनों ही लोकधर्मी
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( ४७ ) प्रक्रियाओं से प्रयुक्त होता है । नाट्यधर्मी में कैशिकी शोभा की प्रक्रिया के द्वारा अंगों के विलासपूर्ण हस्तव्यापार, गीत नृत्य आदि का प्रयोग होता है । इसके अंशोपजीवनी नामक भेद के द्वारा ही कक्ष्याविभाग, प्रसाद, पर्वत, आदि की विविध मुद्राओं तथा विधानों के द्वारा इच्छानुरूप प्रयोग होता है, क्योंकि रंगमञ्च की सीमा के सीमित रहने से इनका पूर्णरूप में प्रयोग सम्भव नहीं इसी कारण उनका अंशतः प्रयोग ही सम्भव रहता है तथा उसकी सूचना दृश्यरूप में रङ्गमञ्च पर होती है तथा यही अंशोपजीवनी नाट्यधर्मी रूढ़ि या विधा होती है । भरतमुनि नाटयविद्या के सिद्धान्त प्रदर्शक मात्र नहीं थे वे नाट्यप्रयोक्ता भी थे, अतः स्वभावतः वे इन बातों में सन्तुलन रखते थे । उनकी यही वृत्ति धर्मी निरूपण के प्रसंग में देखी जा सकती है । उनके लोकानुभूति तथा लोकाचार से ही नाट्य तथा लोकधर्मी रूढ़ि के विकास को लिया भी था । अतः लोकधर्मी रूढ़ियाँ नाट्यधर्मी के लिये चित्राधारवत् रहेंगी ही, क्योंकि जो शास्त्र, कर्म, शिल्प तथा अन्य क्रियाएँ लोकधर्म में प्रवृत्त हैं, वे ही ' नाघ ' हैं । उनके इस कथन के अतिरिक्त यह भी कहना कि " लोक जीवन के नितान्त प्रकृतरूप में प्रस्तुत होने पर नाट्यप्रयोग में न सौन्दर्य विधान होगा न ही जीवन का प्रभावशाली रूप ही चित्रित हो पाएगा । क्योंकि समस्त अभिनयों की रूपक में योजना नाट्यर्थ को ध्यान में रख कर ही की जाती है तथा नाट्यधर्मिता रूप आंशिक तत्त्व के ( अभिनय के ) बिना सामाजिक के हृदय में राग की प्रतीति नही होगी तथा रस की सिद्धि भी । " ( ना ० शा ० १४/८२ ) अतः उसे प्रयोग की स्थिति के अनुरूप ही धर्मियों की सामञ्जस्यपूर्ण योजना रखना होगा यह स्पष्ट हो जाता है । वाचिक अभिनय - नाटशास्त्र के पञ्चदशअध्याय से आरम्भ होकर उन्नीसवें अध्याय तक ( सामान्यतः ) चलने वाला अभिनय का द्वितीय प्रमुख प्रभेद है ' वाचिक अभिनय ' जिसका नाट्यप्रयोग में संवाद रूप में विधान ( रहता ) है तथा उपयोग किया जाता है । नाट्य का यह प्रमुख आधार भूत तत्त्व है तथा सर्वप्रमुख अभिनय भी । इसी कारण भरतमुनि ने इसे नाट्य का शरीर भी कहा है जिसका कारण है इसका वाणी द्वारा प्रस्तुत होना तथा वाणी ही जब सब का मूल हो तो फिर अन्य अभिनय इसी का आधार लेकर प्रवृत्त होगें हीं । यद्यपि मानवीय अन्तर्भावों की अभिव्यक्ति सात्विक अभिनय से करने का विधान है किन्तु इनकी भी पूर्ति या पूर्णता
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( ४८ ) होती है वाचिक अभिनय से ही । इसलिये वाचिक अभिनय सभी का मूल भूत आधार बन जाने के कारण इसका क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है । इस वाचिक अभिनय के अन्तर्गत शब्दविधान छन्द, लक्षण, अलङ्कार, गुण, दोष, भाषा तथा सम्बोधन विधान जैसे विषय आते हैं जिनका तात्विक एवं उपयोगी विवरण नाट्यशास्त्र में दिया गया है । शब्दविधान - नाट्य के आधारभूत तत्त्व वाचिक अभिनय का प्रस्तुती-करण वाणी से ही होता है — यह बात पूर्व में कही गयी थी । वाणी की उत्पत्ति नाद से होती है । जब शरीर में स्थित वायु क्रमशः हृदय, कण्ठ, शीर्ष से होकर मुख द्वारा ध्वनि रूप में प्रकट हो तो वह ' नाद ' कहलाता है । इस नाद के तीन प्रभेद माने गये हैं— मन्द्र, मध्य तथा तार । हृदय से उत्पन्न होनेवाला नाद ' मन्द्र ', कण्ठ से उत्पन्न होने वाला ' मध्य ' तथा शीर्ष से होने वाला ' तार ' कहलाता है । नाद से उद्भूत वाक्तत्त्व का जब शब्दमय प्रयोग होता है तो यही वाचिक अभिनय हो जाता है, यह स्पष्ट है । इस वाचिक के अन्तर्गत शब्द का विवरण देते हुए नाट्यशास्त्र में ' अ ' से आरम्भ होने वाले ( चौदह ) स्वर, ' क ' से ' ह ' तक के व्यञ्जन तथा इनके उच्चारण स्थान, प्रयत्न, घोष तथा अघोष वर्ण के विवरण के साथ ही शब्द या पद के नाम, आख्यात, उपसर्ग एवं निपात को दिखला कर पदों के साथ संयुक्त होने वाले प्रत्यय, सन्धि, समास, तद्धित, कृदन्त जैसे व्याकरण-शास्त्र के प्रमुख एवं अन्य आवश्यक विषयों का ( बड़े ही ) संक्षेप में तथा सरलता से उपयोगी विवेचन किया गया है । ऐसे शब्दविधान के अनुसार की गयी रचना ही ' पदबन्ध ' है जो ' काव्य ' कहलाती है तथा जिसका अभिनय के द्वारा प्रस्तुतीकरण ' नाट्य ' हो जाता है । यहाँ भरतमुनि ने जिस शब्दशास्त्र का विवरण दिया है वह अपने स्वरूप में अतिप्राचीन परम्परा से मेल खाता है जिसमें अपने पूर्ववर्ती तथा समकालीन वैयाकरणों की अनेक मान्यताओं का विवरण है किन्तु है यह सभी अतिप्राचीन ही । पदबन्ध - वाचिक अभिनय के पाठ्य रूप के मुनि ने सर्व प्रथम दो भेद करते हुए उसका संस्कृत तथा प्राकृत में विभाजन किया तथा शब्द स्वरूप के विवरण के क्रम में पदबन्ध को काव्य का जनक बतलाया । यह पदबन्ध विभक्त्यन्त शब्द से निर्मित होता है । इसके दो विभेद होते हैं- ( १ ) निबद्ध तथा २ चूर्णपद | ' निबद्ध ' ( प्रकार ) में गुरु लघु युक्त अक्षरों या मात्राओं की संख्या नियत रहती है जिससे आगे चल कर पद्य की अवतारणा होती है । ' चूर्णपद ' में अर्थ की अपेक्षा से अक्षर युक्त पदों की
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( ४६ ) योजना रखी जाती है । इसका प्रयोग अनियत स्वरूप वाले संवादों में होता है । इसी के द्वारा ' गद्य ' की अवतारणा होती है । रूपकादि नाटय रचनाओं के संवाद गद्य में प्रायः रहते ही हैं, किन्तु पात्रों के मनोभावों एवं संवेदनाओं के अतिरिक्त उनके स्थान, वातावरण आदि को व्यक्त करने के लिये उनमें ' पद्म ' की भी योजना ( संवादों में ) रखी जाती है जो गति एवं लय की चारुता से सम्पन्न रहती है । इसमें चार पादों के रहने से अन्वर्थ है । इस प्रकार स्पष्ट है कि गद्य तथा पद्य का ' पदबन्ध ' है जो नाट्य का प्रयोजक तत्त्व है । इसी पद्य की ' छन्द ' होती है । पद्य तथा उसके प्रकार - आरम्भ में पद्य या छन्द के गये - ( १ ) जाति तथा वृत्त । इनमें अक्षरों की संख्या पर वाले ' छन्द ' को ' जाति ' तथा अक्षरों की गणना पर आधारित को ' वृत्त ' या वणिक वृत्त कहा जाता । इसका ( जाति इसकी पद्य - संज्ञा सम्मिलित रूप एक अन्य संज्ञा दो प्रभेद किये आधारित पाद पाद वाले छन्द छन्दों की मात्रा गणना के विपरीत ) अक्षरों की संख्या को नियत क्रम तथा त्रिकों या गणों के आधार पर विधान किया गया है । प्रत्येक त्रिक या गण में गुरु, लघु वर्ण नियत रहते हैं तथा प्रत्येक छन्द में गण से युक्त या नियत ' पाद ' रखे जाते । भरतमुनि ने भी ( शास्त्र की परम्परानुसार ) इन गणादि का विवरण दिया है । यथा: -आदि गुरु भगण ( 511 ), सर्वगुरु मगण ( sss ), मध्यगुरु जगण ( 155 ) अन्त गुरु सगण ( 115 ), मध्य लघु रगण ( sis ), अन्त लघु तगण ( sst ), आदि लघु यगण ( Iss ) तथा सर्व लघु नगण ( 111 ) । इनमें गुरु अक्षर का संकेत ' ग ' ( या ऽ तथा ) तथा लघु का संकेत ' ल ' अक्षर ( या । तथा - ) किया गया है । छन्दों में त्रिकों के स्वरों के ह्रस्व, दीर्घ तथा प्लुत रूप के तथा ध्वनि के तार, मन्द्र और मध्य भेद की परिगणना के भेद या दृष्टि से छन्दों के पादों को लेकर सम, विषम तथा अर्धसम वृत्त • के भेद बन जाते हैं । ये तीनों प्रभेद वणिक वृत्त के होते हैं, जिनका स्वरूप विवरण तथा उदाहरणादि नाट्यशास्त्र में दिये गये हैं । इसी प्रकार अक्षरगत मात्राओं की संख्या पर आधारित पादों के भी सम, विषम पाद गत भेद होते हैं । यहाँ लघु अक्षर की एक मात्रा तथा गुरु अक्षर की दो मात्रायें परिगणित की जाती हैं । जाति छन्दों के अन्तर्गत मुनि ने आर्या तथा उसके पाँच प्रभेदों के सोदाहरण स्वरूप के अतिरिक्त अन्य छन्दों का स्वरूप विधान भी दिखलाया है । मात्राओं के भेद से जाति छन्द के ४ ना ० द्वि ० भू ०