भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 611–620

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 611–620

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५०० नाट्यशास्त्र भाषा - श्लेष तथा पताका स्थानक आदि में इनके प्रयोग कहे गये हैं । यहाँ अपि शब्द से यह भी कहा गया है कि प्राकृत में प्रयुक्त शब्दों में समास होने पर उन शब्दों में संस्कृत की समानता नहीं होती जैसे कमल, अमल, इन्द्र इत्यादि में । ६-७. अब विभ्रष्ट को– ' ये वर्णः ' इत्यादि से दिखलाते हैं तथा पुनः इसी को आगे - ' एओआर ' इत्यादि कारिका से भी दिखलाते हैं । अपरस्पर निष्पन्नाः एक दूसरे से संश्लिष्ट नहीं होने वाले अर्थात् १७. या असंयोगरूप वर्ण । अब जहाँ वर्ण संयुक्त हैं उनके विषय में असंयोग वाले ( संयुक्तानाम् ) भी । ' इत्यादि १८. संयुक्त वर्णों के क्रमशः उदाहरण देते हैं ' चप्सत्सभ्याः से । ' वच्छों ' में वत्स के त्स को छ हो जाता है । २२-२३. ब्रह्मा शब्द में म प्रथम और ह बाद में आ गया तथा ' ब्र ' का अन्तर्वर्ती रेफ का लोप हो गया । इसी प्रकार रेफ का सर्वत्र लोप हो है वह चाहे ऊपर हो या नीचे - जैसे शक्र तथा अर्क में या कभी दोनों जाता में जैसे ' निर्ह्राद ' शब्द में है । की हो ' २५-२७. संस्कृत एवं प्राकृत भाषा ही वक्तृभेद से चार प्रकार जाती है - इसको दिखलाते हैं- ' भाषा ' इत्यादि से । संस्कृतभाषा ही संस्कृत है । इसमें स्वरभेद आदि समस्त संस्कार प्राप्त होने से यह ' संस्कृत ' कहलाती है । भाषाओं के भेद में इसे बतलाने का आशय यही है कि यह भाषा वह है जिसमें वैदिक शब्दों का बाहुल्य है परन्तु जो आर्यभाषा से विलक्षण है । २८-२६. ' म्लेच्छशद्वोपचारा ' में उपचार पद का अर्थ है व्यवहार । पशुपक्षी आदि के शब्दों को भी नाट्य में किसी प्रयोग के अवसर पर सुनाना संभावित है । एतदर्थ कहते हैं- ' नाट्यधर्मी ' इत्यादि से । ३२. कारणव्यपदेशेन = अर्थात् किसी कारण के बहाने से या अवस्था आदि के वश होकर । ३३. ऐश्वर्येण प्रमत्त पद के द्वारा यहाँ वेदशास्त्रादि के अध्ययन से हीन हो जाने की स्थिति संकेतित की गयी है । ५६–६०. गङ्गासागरमध्य - पद से पूर्व दिशा के देशों के निवासी जन को दिखलाया गया है । विन्ध्यसागरपद से दक्षिण सौराष्ट्र का ग्रहण किया गया है । सुराष्ट्रावन्तिदेशेषु से पश्चिम सौराष्ट्र तथा वेत्रवती ( बेतवा ) नदी से उत्तरवर्ती प्रदेश में स्थित प्रदेश को यहाँ लिया जाता है ।

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For कर एकोनविंश अध्याय ( सम्बोधन तथा काकुस्वरव्यञ्जन ) १. वाक्यविधानं तु — यहाँ ' वाक्यविधानं ' पद से भाषा को लिया जाता है क्योंकि भाषा वाक्य के आश्रित होती है तथा वाक्य का प्रयोग किसी संवाद के ही लिये नाट्य में किया जाता है । इस प्रकार वाक्य तथा भाषा में अन्योन्य - रूपता का आनयन किया जाता है तथा इसी आशय से ' वाक्यग्रहण पद विधान भी हो जाता है । ३. देवानां देवाः अर्थात् जो देवताओं से स्तुत्य हैं या उनके भी आदर-पात्र हैं । तथा - पद से यदि स्त्री हो तो उन्हें ' भगवती ' पद से सम्बोधित करना चाहिए । ४ - ६. नानाश्रुतधराः अर्थात् जो बहुश्रुत हैं । क्षाम्यम् = इस कथन को स्वीकार किया जाए । ७- ८. सचिव मन्त्री, राजा का सहायक एवं परामर्शदाता । सपरि-वारम् = आशय यही है कि हीन पात्र जब राजा को सम्बोधित करें तो अपना नाम लेकर करें तथा उत्तमपात्र सम्बोध्य का भी नाम लेवे । १३. कर्म अर्थात् कार्य जैसे पाकादि का विज्ञाता या व्यवसायी । विद्या = त्रयी आदि वेदविद्या । जाति = गोत्र अथवा देश । १५. शाक्य = बौद्ध भिक्षु । निर्ग्रन्थ = क्षपणक । पाषण्ड = पाशुपत सम्प्रदाय के साधु । स्वसमय = जैसे पाशुपतों के अपने आचारानुसार भासर्वज्ञ इत्यादि पद से किये गये सम्बोधन । १६. यौवन में पति को स्त्रियाँ आर्यपुत्र कह कर सम्भाषण करें परन्तु यौवन से भिन्न दशा में श्वसुर के वंश या उसमें अपत्यप्रत्यय के साथ ही शब्दप्रयोग किया जाए । जैसे हे महाराज । यहाँ यौवनपद का आशय है कि शृङ्गार के उपयुक्त स्थिति में ही । २२. स्थानीया = पूज्य तथा अवस्था में जो थोड़ी भी बड़ी हों, ऐसी पारिवारिक स्त्रियाँ । २६. पत्नी को भार्या शब्द से सम्बोधित करे । इसी कारण नाट्यवेद के महासत्र में दीक्षित सूत्रधार अपनी नटी पत्नी को ' आर्ये ' कह कर बुलाता

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५०२ नाव्यशास्त्र भी है या पिता के नाम से भी ' जैसे ' हे माठरपुत्रि इत्यादि, या पुत्र के नाम से भी जैसे – ' हे सोमशमंजननि इत्यादि । २६. पुरोहित आदि उत्तम पात्र भी राजा की तरह भार्या को ' आर्य ' पद से सम्बोधित करें, परन्तु यौवनावस्था में । ३०. औत्पत्तिकानि = स्वकल्पित अतएव जो अप्रख्यात है । तल्लिङ्गा-र्थानि = प्रकृत अर्थ की सूचना करने वाले । ३१. इसी को निदर्शन के द्वारा स्पष्ट करते हैं— ' ब्रह्मत्रस्य ' इत्यादि से । प्रश्न -- नाम तो संज्ञा मात्र होता है उसे जैसा चाहे रख सकते हैं । उत्तर-नाम के अनुरूप कर्म होना चाहिए अतः नाम रखते समय कर्म का भी ध्यान रखना चाहिए । नाम का अक्षर ग्रहों के अभिचार एवं यन्त्र, मन्त्र एवं तन्त्र के अनुसार अनुष्ठित कर्मादि के द्वारा होता है अतः जब पीड़ित हो जाते हैं तो उनका इन्हीं से शान्तिक या पौष्टिक कर्म द्वारा उपचार भी किया जाता है तथा पुरुष को फल प्राप्ति भी अपने नाम के अनुरूप ही होती है । ३७. नट स्वयं कवि भी होता है तथा कवित्व युक्त भी । इसी अभिप्राय को ध्यान में रख कर भाषाविधान को समझकर पाठ्य के प्रयोग का विधान बतलाया गया है अर्थात् परिज्ञान पूर्वक काव्य का निर्माण हो तथा अवसर आने पर पाठ्य का प्रयोग भी रहे । यदि अन्य कवि हो तो पाठ्य की संज्ञा प्रयोग का मूलभूत तत्त्व हो जाता है । अतः इसका व्यवहार समझ कर करना चाहिए । ( २ ) स्थान, ( वर्ण, ( ४ ) काकु, ( ५ ) इनसे भूषित काव्य ही पाठ्य कहलाता है । पाठ्य स्वर आदि छः अलंकारों के अधीन को बतलाने की बात कही गयी है । गुण अर्थात् काव्य उपकृत होकर पाठ्य होता है । अब गुणों का उद्देशक्रम से व्याख्यान करते तदनुसार ही प्रयोक्ताओं को षडलङ्कार है- ( १ ) स्वर, अलंकार तथा ( ६ ) अङ्ग । होता है अतः पाठ्य के गुणों जो उपकारक है तथा जिनसे हैं — ' तत्र ' इत्यादि से । इनमें प्रथम स्वर है जिसके विषय में जो भी वक्तव्य है वह आगे गेयाधिकार प्रकरण में ( ना ० शा ० अध्याय २८ में ) दिखलाया जाएगा । स्वर ही काकु में भी उपयोगी होता है तथा स्थानादि उसके परिकर होते हैं । यहाँ स्थान शब्द के द्वारा काकुओं के अपने रूप की निष्पत्ति हेतु आश्रय दिखलाया गया है । उदात्त, अनुदात्त, स्वरित तथा कम्पित नाम से शास्त्र में स्वर प्रसिद्ध हैं,

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १ ९ ५०३ इनमें जो अनुरणनमय रक्ति या अनुरंजना की प्रक्रिया है उसे छोड़ देना चाहिए ( क्योंकि वह गीत में रहेगी ) । इसे छोड़ कर शेष जो केवल उच्च, नीच तथा मध्यवर्ती स्थान का स्पर्श होता है वही पाठ्य में उपयोगी है । यदि पाठ्य में स्वरगत रक्ति का प्रधानतः आश्रय लेगें तो फिर यह गानक्रिया होगी पाठ्य नहीं । यहाँ गान क्रिया में उच्च आदि स्थानों का स्पर्श ही प्रधान है इसी बात को प्रकृत में वर्णों का उपादान कर बतलाया गया है । / चित्तवृत्ति के समर्पण द्वारा अभिनय क्रिया की अनुभावरूपता के लाभ के लिये रसों के भेद से काकुविधान रखा जाता है । इसी कारण काकुओं का सर्वत्र अनुगत रूप होता है जिसका स्वर की अतिशयिता में उपयोग ( किया जाता ) है । इसका आगे भी मुनि ने काकुशब्द के द्वारा उच्च दीप्त आदि अलङ्कारों में व्यवहार बतलाया है क्योंकि पूर्णता को प्राप्त अलङ्कार आदि काकुओं के ही उपकारक या सम्पादक होंगे । क्योंकि काकु अर्थों में अभि-नेयता लाता है अतः काकु ही प्रधान होता है । अन्यथा यदि काकु प्रधान नहीं होता तो जिसका अंगों के मध्य पाठ किया गया उस मध्यगत अंग का उपसंहार और अन्य अंगों का निरूपण आदि सभी असमञ्जस हो जाता । इस कारण प्रकृत में पाठ्य में काकु ही प्रधान होता है यही सिद्धान्त मान्य है । अब इन स्वरों के आश्रम को दिखलाते हैं त्रीणि स्थानानि के द्वारा । यहाँ यह ध्यातव्य है कि स्वर किसी स्थान विशेष से ही उद्धृत होते हैं अतः स्वर ग्रहण से ही स्थान भेद प्राप्त हो जाएगा पुनः स्थान का ग्रहण क्यों किया गया? इसका उत्तर यही है कि यहाँ स्थानपद का ग्रहण ६६ प्रकार के स्थान भेदों की निवृत्ति करने के लिये है । ये छाछठ ( ६६ ) प्रकार किस प्रकार? -उत्तर-उरः प्रदेश में २२ – जहाँ श्रुतियाँ तथा स्वर हैं । इसी प्रकार कण्ठ तथा मूर्धा में होकर ये छाछठ ( २२ x ३ - ६६ ) हो जाते हैं । इन स्थानों के स्पर्श होने पर गान ही होता है पाठ्य नहीं । इसीलिये पाठ्यगुणान् पद में पाठ्य को गुण अर्थात् उपकरण वाचक मान कर व्याख्यान किया जाता है । " शारीर्यामथ वीणायाम् " इत्यादि । वीणा दो प्रकार की होती है जिनमें " एक शरीर रूपी वीणा है जिसमें उरः, शिर तथा कण्ट स्थान हैं । यह वीणा बिम्ब स्थानीय होती है । दूसरी वीणा तुम्बी घटिता है । दण्डरूपा वीणा बाह्य बीणा है तथा यह प्रतिबिम्ब स्थानीया है । इस बाह्य बीणा में काकु की सम्पत्ति विद्यमान होती है जो रंजनात्मक स्वर स्वरूप है । शारीरी के साथ वीणा शब्द के कहने का आशय यही है कि यह शरीर के मध्य में विवृत हृदयाकाश

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५०४ नाट्यशास्त्र के परिग्रहण हेतु है । क्योंकि बिना आकाश के शरीर मात्र में स्वर की निष्पत्ति नहीं हो सकती, वह यदि होगी तो उस आकाश में ही होगी । दूसरी जो दण्ड वीणा ( तुम्बी घटिता ) हैं, वह उत्तरोत्तर चिह्नित स्थान से विशिष्ट रहकर बाह्य वीणा कहलाती है तथा इसमें भी स्वरों के निष्पत्ति स्थान होते हैं । शारीरी वीणा में उरः, कण्ठ तथा शिरः ये तीन स्थान ( नियत ) हैं । इसी प्रकार बाह्य वीणा में भी तारों के स्थान बने हैं, वे इसमें सोपान पंक्ति की तरह क्रमिक हैं । अतएव इनसे काकुस्वर लक्षित होता है तथा इसी के आधार पर इसका लक्षण हुआ । काकु जिह्वा के व्यापार से सम्पाद्य होने से यह ' काकु ' कहलाती है । ४१. इस प्रकार इन तीनों स्थानों के रूपों का विभाग कर उनका विषयभेद दिखलाने के लिये बतलाते हैं- ' आभाषणच ' इत्यादि के द्वारा । शिरसा = शिरो निष्पन्न तार से । इसका उपयोग दूरस्थ संभाषण में किया जाता है । कण्ठेन = मध्यनाद से । इसका उपयोग नातिदूर स्थल के सम्भाषण में होता है । उरसा = मन्द्र नाद से । इसका उपयोग समीप के सम्भाषण में किया जाता है । ४२-४३. इस प्रकार इन तीन स्थानों का पृथक् २ उपयोग दिखला कर अब इन्हीं का एक साथ उपयोग भी दिखलाते है — ' उरसोदाहृतम् ' इत्यादि के द्वारा । इसका आशय यही है कि पाठ्य का आरम्भ मन्द्र स्वर से करते हुए उसे तार स्वर तक ले जाकर फिर मन्द्र पर समाप्त कर देना चाहिए । जब न तो दीप्त रूप क्रोधादि भाव से और न मन्द्र शोकादि से हृदय आविष्ट रहे तो वक्तव्य वस्तु के विषय गत उत्साह के विस्फारण ( व्यक्ति ) से स्वर को तार तक ले जाकर उपसंहार के समय मध्य में विश्राम करे, यही सामान्यतः पाठ्य का धर्म या विधान होता है । ४३. स्थान भेद को दिखला कर अब वर्णों के स्वरूप को दिखलाते हैं-' उदात्तश्च ' इत्यादि से । उच्च नीच तथा मध्यम एवं उच्च, नीच रूप अवलम्बन से स्वरों के चार धर्म हो जाते हैं । पाठ विशेष की क्रिया का विस्तार करने वाले वर्ण ' गुण ' होते हैं अथवा स्वार्थ विशेष को विवृत या प्रकटन करने वाले वर्ण ' गुण ' हैं । यहाँ तपोधनाः ( कहने ) सम्बोधन का आशय यह है कि आप सूक्ष्मवेदी है अतः इस विषय के विचार के अधिकारी हैं । अब गद्य भाग द्वारा वर्णों के विषय दिखलाते हैं – ' हास्यशृङ्गारयोः ' इत्यादि से । हास्य तथा शृङ्गाररस में मध्यम तथा पश्चम इत्यादि रूप में जिस

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १ ९ ५०५ क्रम से पाठ है उसी रूप में योजना अभीष्ट नहीं है । अतः हास्य में मध्यमा या पञ्चमी जाति के स्वरों का ग्रहण कर उसी अवसर पर उच्च मध्यम स्थान का स्पर्श कर पाठ किया जाता है । इसी प्रकार शृङ्गार, हास्य तथा वीर इन तीनों में षड़जा तथा आर्षभी के अंश को लेकर उसी में उदात्त एवं कम्पित वर्णो से पाठ किया जाता है । बीभत्स में धैवती के अंश स्वर का आश्रम लेकर स्वरित वर्ण से पाठ किया जाए, भयानक में उसी धैवतीयांश स्वर का आश्रय लेकर कम्पित वर्णों से पाठ होता है । इस प्रकार आगे की जातियों के विनियोग के अनुसारी स्वरों के अनुवाद द्वारा उदात्तादि वर्णों में न कि स्वरों में तात्पर्य लिया जाए क्योंकि उनका अन्तरालाप ग्रहण ही प्रयोजन है । ४४. इस प्रकार काकु की उत्पत्ति का प्रतिपादन कर उसके अर्थ के विषय में व्यापार दिखलाते हुए उद्देश्य क्रम का अनुसरण कर उसके प्रभेद दिखलाते है - ' ' द्वविधा काकु ' इत्यादि के द्वारा । वाक्य जहाँ साकाङ्क्ष है वहाँ साकाङ्क्ष काकु होगी । वक्तृगत आकाङ्क्षा का उस आकाङ्क्षा का निश्चय प्रकरणादि के बल से विषयता का अवगम प्रकरण के बल से होता है । द्वारा कही गयी है । ' अनियुक्तार्थकं वाक्यम् ' में वाक्य के सङ्केत - बल के आधार पर जसा न्यून या ही प्रमाण बल से निर्णय के योग्य वाक्य हो तो विपरीत अर्थवाला हो तो साकाङ्क्ष वाक्य होगा । वाक्य में स्थित काकु का अब आगे अभिधान वाक्य में उपचार रहता है । तथा आकांक्षा की विशिष्ट-यही बात यहाँ कारिका के इसी अंश को बतलाया है । अधिक अर्थ प्रतीत हो वैसा वह निराकांक्ष तथा इसके करते हैं - तत्र साकाङ्क्षम् ' इत्यादि गद्य भाग से । जिसका अर्थ नियुक्त नहीं होता वह अनियुक्तार्थ है जिसे साकाङ्क्ष बतलाया गया है— उसकी मन्द्र स्वर से उपक्रम कर तार स्वर से समाप्ति करते हुए पाठ किया जाता है । यहाँ ( सब ) क्रिया विशेषण कितने आते है - इसे भो बतलाने के लिये कहते हैं कि कण्ठ एवं उरः स्थान में हैं । उदात्तादि वर्ण उच्च, नीच, दीप्त आदि अलंकार जहाँ अपरिसमाप्त दशा में ( अर्धस्पष्ट रूप में ) छोड़ना क्रिया विशेषण है तथा इस क्रियाविशेषण के रूप में पठ्यमान वाक्य में ध्वनिगत धर्मविशेष या विकार विशेष ( ही ) काकु है । यह काकु आकांक्षा के अन्त में या अर्थ की परिसमाप्ति पर अथवा उस अर्थ में नहीं अथवा अर्थ विशेष में रहती है अथवा विशेषार्थ के न होने पर भी होती है । अतः कोई निश्चय नहीं होने से इसके ( काकु के ) अनेक स्थल होते हैं ।

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५०६ नाट्यशास्त्र ४५. जो अलं अर्थात् पर्याप्त रूप में काकु के स्वरूप का सम्पादन करता है वह ' अलङ्कार ' है । तीनों स्थानों में प्रत्येक की ऊर्ध्व, अधः तथा मध्य की कल्पना के द्वारा उदात्त, अनुदात्त, स्वरित तथा कम्पित के निर्वाह के द्वारा इसका स्वरूप निष्पन्न होता है । इनमें आवेश के अभाव के कारण सभी स्थानों में मध्यम भाग में यह विद्यमान होता है किन्तु उर्ध्व तथा अधः भाग में यह आवेश की स्थिति या भाव में होता है । इस प्रकार तीनों स्थानों में प्रत्येक का अवलम्बन करने से छः अलङ्कार बन जाते हैं । गद्यभाग उच्चो नाम इत्यादि । इनमें शिर के अधोभाग में दूरस्थ व्यक्ति के साथ भाषण करने में ' तार ' बतलाया गया है जो स्वर काकु का विषय है । विस्मय के ज्ञान होने पर वही रस काकु तथा दूसरों को भयभीत करने पर वही अभिनय से विभाव काकु हो जाता है । स्वर काकु से ही श्रुति काकु होता है जो भिन्न होता है । यह श्रुति काकु आक्षेप के अवसर पर ऊर्ध्व अर्थात् तारतम होता है जिसका होता स्थान शिर ही है । यहाँ तार शब्द प्रकर्ष का उपलक्षण है । इन आक्षेपादि में अवस्थाओं के अनुसार श्रुति, विभाव एवं रस भेद से तीन रूप में काकुओं का विभाग हो जाता है । जो उर के उर्ध्वभाग में है वह मन्द्र है तथा उसी उर: के नीचे भाग में अत्यन्त मन्द्र नीच काकु है । दीनता की अवस्था में वही काकु दो रूपों को ग्रहण करती है । अपनी चित्त-वृत्ति के अर्पण करने से रस काकु तथा पररूप में उत्पादन करने पर विभाब काकु होती है । यहाँ प्रधानतया दोनों का आदर किया गया है और स्थानों ने इन दोनों का आदर नहीं किया जाता किन्तु जो प्रधान है उसी के अंशका व्यपदेश होता है । स्वाभाविक भाषण वहाँ होता है जहाँ वक्ता आवृत्त कंठ स्वर वाला हो । आवृत्तकण्ठ स्वर का अर्थ है संवृत स्वर से युक्त कंठ वाला व्यक्ति । त्रास के भय से गिर जाने वाला त्रस्त पतित । त्रास के समय काकु दीप्त ही होती है । कण्ठ स्थान में ऊर्ध्व भाग निष्पन्न होती है, इससे स्पष्टतः सिद्ध है कि स्थान भेद ही अलङ्कारता का प्रयोजक है । ५६. अब सभी का संग्रह कर कहते हैं- ' यानि सौम्यार्थ ' इत्यादि से । सौम्य = जो सोम की तरह आह्लादक हो । सुखभाव- -- - यहाँ सुख • के हेतु तथा कार्य दोनों का सुखभावकृत् शब्द से समासभेद से संग्रह किया गया है । ५७. नाना - नाना आश्रयों से उपेत अर्थात् युक्त का अनेक स्थानों में निवेश करते हुए पाठ्य का प्रयोग या विधान रखना चाहिए । काकुओं को पर्याप्त या परिसीमित करने में कारण होता है उनके आश्रयों या स्थानों का भेद ।

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १ ९ ५०७ अङ्गानि इत्यादि के द्वारा काकु की ही प्रधानता है इसका उपसंहार करते हैं- ' अथाङ्गानि ' इत्यादि गद्यभाग से । वाक्य का जो न्यास, त्यजन या अनादरण है वह नाद का ही है । अतः भाव एवं अभाव, उपचय तथा अपचय और आरोह तथा अवरोह इनके कारण नाद छः प्रकार हो जाता है । स्वर के रूप में विहित अन्तराल विशिष्ट श्रुतियों में जो वैस्वर्य है, वह ध्वनिगत विसंवाद से होता है यह ( ऐसे स्थानों पर ) सर्वत्र समझना चाहिए । शृङ्गार में ( जो ) उदात एवं स्वरित को अर्पण एवं विच्छेद आदि अङ्गों को तथा विलम्बित को अलङ्कार कहा गया वह दूरस्थ पुरुष के साथ आभाषण में कर्तव्य है । शिरः स्थान में षड्ज या पश्चम में से किसी एक के स्थायी स्वर के आश्रय के द्वारा अंश स्वर के विभाग से चार चार को मिला कर किया जाता है । यदि ऐसा नहीं मानेंगे तो फिर दूरस्थ के साथ आभाषण आदि सभी कथन पुनरुक्त हो जाएगा । दीपन तथा प्रशमन के विषय में यह विधि है । कि मन्द्र करने के बाद तार नहीं किया जाता है, इसी प्रकार मन्द्रतार से तार तर को और तारतर से मन्द्र को भी नहीं करना चाहिए । समग्रतः काल - तत्त्व की भावना अशक्य है अतः उद्देश्य ग्रन्थ से ही लय और विराम कहे जाते है तथा जिनमें उद्देश्य कुछ भी नहीं होता । विच्छेद से लय को स्वीकार किया गया है । विच्छेद का अर्थ है विराम । यह विराम कितने समय वाला हो इसी प्रश्न से लय भी मान लिया जाएगा । इस प्रकार यह विच्छेद की भी परीक्षा हो गयी । अर्थ की समाप्ति के लिये विराम किया जाता है । अर्थ - अवान्तर वाक्य का अर्थ । केवल छन्द की अपेक्षा से विराम नहीं किया जाता क्योंकि कवि प्रयोग के अधीन ( परतन्त्र ) रहता है और जब कवि ( ही ) परतन्त्र है तो फिर उसे विराम वाले छन्दों में विराम के लिये प्रयत्न करना ( ही ) चाहिए । प्रयोग कवि के आधीन नहीं है इसीलिये कहा भी गया कि विराम अर्थ की अपेक्षा या अधीनता के कारण किये जाते हैं । एक, दो या तीन आदि संख्याओं का यहाँ जो निर्देश किया गया है वह ( इसी ) नियम का उपलक्षण समझना चाहिये । जैसे: - ' किं गच्छ ' इत्यादि पद्य में है । प्रश्न – अवान्तर वाक्य के अर्थ में विराम का विधान है तो फिर एक वाक्यता न रखना ( या मीमांसाशास्त्र के अनुसार वाक्यभेद करना ) दूषण होता है । उत्तर- - कभी - कभी एकवाक्यताभाव दूषण नहीं भूषण भी हो जाता

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५०८ नाट्यशास्त्र: है । इसके उपपादन में यही कहा जा सकता है कि किसी वस्तु की सूचना देने में या अंकुरगत अर्थ ( मूलभूत अर्थ ) को कहने में उपचार में अल्पाक्षर वाले पद की काव्य में ( या पद्य में ) स्थिति रहनी चाहिये । काव्य अनेक विध सूचाभिनय तथा अंकुर के प्रकारों से युक्त होता है यदि यही स्वल्पाक्षर वाले असमस्त पद वाला भी हो तो । क्योंकि अनेक या बहुअक्षर वाले पदों के बीच सूचा तथा अंकुर की उपपत्ति नहीं होती है । ६१. विराम के होने पर ( ही ) अभिनयस्थ पदार्थ को विषयानुरूप प्रयोग में दिखलाया जा सकता है, वह पदार्थ विराम से अवगत होता है तथा कार्य की अवधि या समाप्ति में विराम रखना होता है । तब समापनीय पदार्थ का स्वरूप उसकी विरामावस्था में प्रतीत हो जाता है इसीलिये कहा गया है कि विराम होने पर अभिनय अर्थ को दर्शाता है तथा विराम के अभाव में यही असमञ्जस हो सकता है या यही कि अभिनय के अर्थ का वहन विराम ही करता है । ६२ - ६६. इसी तथ्य को बतलाते हैं— ' यत्र व्यथा ' इत्यादि से भी । इस प्रकार इसी बात को पहिले दृष्टि की प्रमुखता के तात्पर्य से बतलायी थी अब यहाँ दृष्टि समन्वित हस्तों की प्रधानता से बतलाने से पुनरुक्ति नहीं होती है । इसी की व्यापकता को दिखलाई है ' प्रायः वीर, रौद्र आदि में करना चाहिये ' इत्यादि कथनों से । कुञ्चितौ - संकोच युक्त । अलङ्कार यहाँ उच्च, दीप्त इत्यादि होंगे जिन्हें वृत्त के विराम स्थल में रखना चाहिए । जैसे-' यो यः शस्त्रं बिर्भात ( वे ० सं ० ३। ) में है भी । उच्च दीप्त ‘ काकु ' को पद के अन्त में नहीं रखा जाए । वीर तथा रौद्र रस में भी स्रग्धरा प्रभृति लम्बे वृत्तों में अर्ध या आदि में विराम नहीं रखना चाहिए किन्तु पद के अन्त में ही । जैसा कि कहा भी है- ' प्राणवशेन वा ' । अर्थात् आरम्भ में आधे में प्रायः प्राण वायु का संवेग नहीं होता । आशय यही कि पद के अन्त में ही विच्छेद किया जाए । अथवा ' प्राणवशेन में ' प्राणशब्द का अर्थ है रस भावादि । अतः रस एवं भावादि के औचित्य से यहाँ विच्छेद किया जा सकता है तथा यह विच्छेद पाद का आरम्भक या आदि में भी हो सकता है । इससे यह भी दिखलाया गया है कि अनुबन्ध ( आरम्भ ) भी विच्छेद में उपयोगी होता है । ' शेषम् ' इत्यादि । जहाँ चित्तवृत्ति की प्रधानता नहीं हो किन्तु विभावादि की हो तो वहाँ अर्थ के अनुरोध पर विराम रखे जाते हैं । कृष्याक्षर अर्थात् सन्ध्यक्षर । कला के प्रमाण वाला जो काल है तदनुसार

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १ ९ ५० ९ विलम्बित लय से पाठ करना चाहिए । इस प्रकार विच्छेद ही प्रमाण है, यह तथ्य दिखलाया गया । ७०-७१. शेषाणाम् - इत्यादि । यहाँ शेषाणाम् का अर्थ है ह्रस्व अक्षरों का । अर्थयोगेन पद से का आशय है कि जैसे अर्थ की स्फुट प्रतीति हो उसी प्रकार विच्छेद करना चाहिये न कि अतिविलम्बित लय से पाठ करे । इस पर यहाँ प्रश्न होता है कि कला का प्रमाण कितना रहे? तो इसके उत्तर में यही समझना चाहिए कि विलम्बित एक, दो, तीन, चार तथा पाँच कलाओं तक ( का ) रहता है । गुर्वक्षर अर्थात् कृष्याक्षर । ७२. अथवा में वा शब्द से अधिक के लिये भी सहमति या अनुज्ञा देने का संकेत किया गया है । कारणोपेतम् में कारण का अर्थ है चिन्तन आदि से दीर्घकाल तक स्मरण होना । ७३. वृत्तविराम से अर्थविराम प्राथमिकता पाता है यही बात ' ये विरामा: ' इत्यादि से दिखलाते है । तज्ज्ञः में तत् पद का अर्थ है विरामात्मक वृत्तगत पदार्थ । उत्क्रम्यापि का आशय है कि यद्यपि उपक्रम विशेष का था किन्तु उपसंहार सामान्य में है । अतएव इस प्रकार विराम को पढ़ा जाए कि जिससे विवक्षित अर्थ की प्रतीति हो सके । ७४-७५. भिन्नवृत्तम् इत्यादि । वृत्त को तोड़कर नहीं पढ़ना चाहिए । ऐसा विच्छेद न करे कि जिससे प्रकृत में कोई दूसरा वृत्त प्रतीत होने लगे जिससे भ्रान्ति उत्पन्न हो । अपशब्द एवं भिन्नवृत्त दोषों के कहने से पुनरुक्ति नहीं समझना चाहिए क्योंकि वस्तुतः उसके अभाव में भी विच्छेद के वश से उसकी प्रतीति हो जाती है । इसीलिये यह कहा गया कि जहाँ विराम का स्थल नहीं हो वहाँ विश्राम नहीं किया जाता है । विराम की इस प्रकार व्यापकता बतलाकर न्यूना या दीप्ता को दिखलाने के लिए कहा कि – ' दीन स्थिति में काकु को दीप्त न करे ' । इससे यहाँ बतलाया गया कि शोकादि में मग्न चित्तवृत्ति को छोड़कर अन्य प्रसंगों में सर्वत्र काकु का दीपन शोभाधायक होता है । इस प्रकार स्वर, उसके तीन स्थान या आश्रय, उनके उपयोगी उदात्त आदि वर्ण एवं उनके स्वरूप, स्वरूप के पूर्ति कारण अलङ्कार और इतिकर्तव्यता रूप सभी अंगों को यहाँ कहा गया । ( यह ध्यान रहे कि ) स्वरभेद से काकु का भेद होता है । स्वरभेद तब होगा जब काकु की विवक्षा होगी और जब उसी काकु की विवक्षा करेंगे तो रस, भाव आदि धर्मान्तरों की उत्पत्ति या