भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 661–668
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 661–668
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५५० साहित्यदर्पण । सङ्गीतमकरन्द सङ्गीतरत्नाकर नाट्यशास्त्र विश्वनाथ कविराज चौखम्बा, वाराणसी । । नारद । बडौदा ॥ शादेव अचार मद्रास, खण्ड १-४ अंग्रेजी ग्रन्थ ( समालोचनात्मक ) 1 Ancient Indian Theatre, D. R. Mankad Bharata's Natya and Costume. Dr. G. S. Ghurye 2 3 Bibliography of Sanskrit Drama. Schuler 4 Classical Sanskrit Literature. A. B. Keith 5 Classical Indian Dance in Literature and Arts, Dr. Kapila Aesthetics. Vol. I. ( Indian ), 6 Comparative Dr. K. Vatsyayana C. Pandeya Contribution to the History of the Hindu Drama. 7 Dr. M. M. Ghosh 8 Dictionary of Hindu Architecture. P. K. Acharya 9 Drama in Sanskrit Literature. R. V. Jahagirdar 10 History of Indian Literature. I, III A. M. Winternitz 11 History of Classical Sanskrit Literature. Krishnamachariar 12 History of Sanskrit Classical Literature. Dr. S. K. De and S. N. Dasgupta 13 History of Sanskrit Literature. A. B. Keith 14 History of Sanskrit Poetics. Dr. S. K. De 15 History of Sanskrit Poetics. Dr. P. V. Kane 16 Indian Theatre. C. B. Gupta and Practice of Sanskrit Drama. Late Dr. S. N. Shastri 17 Laws 18 Number of Rasas. Dr. V. Raghavan Specimen of the Hindu Theatre. ( I - II vols... 19 Select H. H. Wilson 20 The Types of Sanskrit Drama. D. R. Mankad 21 Tandava Lakshanam. V. V. Narayan Swami Naidu 22 Abhinava Gupta. ( A Historical & Philosophical Study ) Dr. K. C. Pandey 23 Sanskrit Drama: Its Origin and Decline. Dr. Indushekhar
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शुद्धिपत्र पृष्ठ पङ्कि अशुद्ध ६ ३१ ( स ० र०७-३७, ३८ ) ११ ७ स्निग्धा दृष्टा च ११ ९ दीना, इसा १६ ४ दृष्टिः प्रकीर्तिता ॥६५ ॥
२५ २४ ललितादुत्क्षेपाद २८ २१ प्राकृतमुच्येते ॥१३६ ॥
३० ९ विसर्गो रञ्जने तथा ॥ १४३ ॥
३२ ४ मुद्वाद्याक्षिप्तमेव ३२ २७ १. क्रोधकृतेत - ग ० । ३३ ५ तथा साची भेद ४० १५ पलवा च तथा ४१ १ ( ११ ) उत्तान वञ्चित, ४१ ८ चतुष्पष्ठिकरा ४२ २३ महाजनप्रांशु पुष्कर ० ४८ १० एक थोल घुमाव ४८ २२ मुद्रा द्वारा ( जिन कार्यों का ४ ९ १४ सारी अंगुलिय हथेली ५० १३ द्वयङ्गुष्टक निपीडिता ५३ २७ उससे रात्रि की समाप्ति ५६ २ का इस मुद्रा से ५७ १० पार्श्वागत - विकीर्णाश्च ५८ २४ बालातुरशट्य कैतवार्थेषु ग ० । ५ ९ २६ तो डाटना ( निर्भत्सन ) ६० ४ अप्रभाग पर हो तथा ६४ ३१ ५. अधुना -- ख ० ६५ २४ हस्तमुद्राएँ सामानन्यतः ६६ २२ स्वस्तिकः परिकीर्तित ॥१३४ ॥
७० २४ प्रयोक्तव्यो बिघाटने ॥१५२ ॥
७७ १४ कंपित करते हुए बदलना ।
७ ९ १ ९ ह्मरोमण्डलिनौ स्मृतौ ॥१ ९ ६ ॥
शुद्ध ( स ० र ० ७-३५, ३६ ) स्निग्धा हृष्टा च दीना, क्रुद्धा, हप्ता दृष्टिः प्रकीर्तिता ॥ ६४ ॥
ललितादुत्पात् प्राकृतमुच्यते ॥ १३६ ॥
विसर्गे रञ्जने तथा ॥ १४३ ॥
मुद्दात्क्षिप्तमेव १. क्रोधकृतेन - ग ० । तथा साची आदि जो भेद पल्लवौ च तथा ( ११ ) उत्तानवचित, चतुष्षष्ठिकरा महाजनं प्रांशुपुष्कर • एक गोल घुमाव मुद्रा द्वारा जिन कार्यों को सारी अंगुलियाँ हथेली में ' ङ्गुष्ठकनिपीडिता उससे दिन और रात्रि की समाप्ति आदि का इस मुद्रा से पार्श्वगता विकीर्णाश्च बालातुरशाठय कैतवार्थेषु - ग ० । तो डाँटना ( नर्भर्सन ) अग्रभाग पर एक दूसरे से सटी हुई हो तथा ५. अधुना - ख ०, हस्तमुद्राएँ सामान्यतः स्वस्तिकः परिकीर्तितः ॥ १३४ ॥
प्रयोक्तव्यो विघाटने ॥ १५२ ॥
कम्पित करते हुए बदलना ॥ १८३ ॥
ह्युरोमण्डलिनौ स्मृतौ ॥ १ ९ ६ ॥
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५५२ नाट्यशास्त्र पृष्ठ पङ्गि अशुद्ध ७ ९ २५ उरः पार्श्वमण्डल -८२ २७ पृष्ठगश्वेतिचोदिदः ८४ १५ निर्भुग्नांस समुन्नतम् । ८४ १७ विस्मयदृष्टे च ८६ २६ परिवृत्ते विवतितम् ॥ १६ ॥
८ ९ २७ मपवृत्तश्रियात्मकम् ख ०, ग ० ९ ८ २ पदैर्निरन्तरकृतै ० ९९ १५ उरुवृत्ता-१०० १२ समोत्सारितभरुली १०७ १२ समुत्कर्षे व्यायामकृत ० १०७ २० धनुर्व्रजाणि शस्त्राणि १० ९ २१ शिरः परिगमचापि १० ९ २४ कर्तव्यः शिरःपरि ० १११ ९ कार्यो न चापि १११ २१ नहि सौष्ठवहीनाङ्गाः ११३ ११ कारयेत् श्रीमान् ११४ १ ९ एकादशोऽध्याय समाप्त ११५ १० चाकाशगानिह । शुद्ध उरः पार्श्वार्धमण्डल -पृष्ठगश्चेति चोदितः । निर्भुग्नांसं समुन्नतम् । विस्मयदृष्टे च परिवृत्ते विवर्त्तितम् ॥ १६ ॥
। मपवृत्तक्रियात्मकम् - ख ०, ग ० । पादैर्निरन्तर कृतै ० ऊरूवृत्ता-समोत्सारितमत्तल्ली समुरक व्यायाम कृत धनुर्वज्रादिशस्त्राणि शिरः परिगमचापि कर्तव्यः शिरः परि ० कार्यं न चापि नहि सौष्ठवहीनाङ्गः कारयेद् धीमान् एकादशोऽध्याय समाप्त । चाकाशगानि च । ) स्कन्दिता चारी ( आस्कन्दिता ) ११७ १ स्पन्दिताचारी ( आस्यन्दिता दक्षिणम् ॥ ३१ ॥
१२० ७ दण्डपादच दक्षिणः ॥ ३१ ॥
१२० १० पार्श्वकान्तञ्च दक्षिणः । १२५ ३. कृवा तेनैव १२८ ६ चतुरस्तमुरः १२ ९ २५ यथाप्रकृति नाव्यशौ १३१ २ क्रोणं ततः परम् ॥ १७ ॥
१३१ १७ कार्यो गतागतः १३३ २१ चतुरर्द्धकलं चा १३४ १८ स्वरा च १३६ १८ सूच्चाभिनय के १३८ २० कचिदास ० १४३ ५ जाए ( पर पुरुष १४३ ५ ( आक्षप्त विक्रमा ) १४५ ११ जो इनसे गुण से १६१ १ अवजोक्य दिशः १६६ १ पादस्व पतनं दण्डपादञ्च पार्श्वक्रान्तश्च दक्षिणः । कृत्वा तेनैव चतुरस्रमुरः यथाप्रकृति नाट्यज्ञो कोणं ततः परम् ॥ १७ ॥
कार्यों गतागतैः चतुरर्द्धकलं वा ज्वरार्ते च सूचाभिनय के कचिदासन • जाए पर पुरुष ( आक्षिप्त विक्रमा ) जो इन गुणों से अवलोक्य दिशः पादस्य पतनं
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शुद्धिपत्र ५५३ पृष्ठ पति अशुद्ध १७१ ६ चोपविशेन्नरः ॥ २०२ ॥
१७२ १२ होममज्ञक्रिया ० १७८ ९. ये नेयथ्यगृहद्वारे १८५ २१ परिच्छेदविशेषास्तु १८६ २ पवं कक्ष्याविभागस्तु १ ९ २ ५ तद्वत्तिकानि १ ९ ३ २ ९ आविद्धसंक्षितः - क ० । १ ९ ३ ३० बिशेषाः प्रयोगस्य २०० २६ अतिशय महत्वशाली भी है । २०२ २० विभिन्न संस्थाएँ २०७ ११ व्यवस्थित रस में २०७ २१ आश्रय यह भी है २० ९ २१ प्रतीयते स प्रत्ययः २२३ ९ तन्निवृत २२३ १३ निवृत् या भुरुक् २२६ ६ वृत्ते मालिनी सा नाम्ना २३० १ ९ मधुकारी का २३७ २३ विलगं रहती हो तो हे मित्र, २३८ १६ परुषवाक्य कशाभिहता २४१ २१ हमने भी अर्थ किया गया है २५२ ३ नानाशस्त्रशतानि तोमर-२७२ १३ कभी भी प्राप्त हो सकती है २७४ ३ पिण्डेन दशयेत् २७४ १७ ' छन्दोविरचितिनामक १७५ -२ ( वाचिकाभिमये ) २०५ २८ शेयान्युक्त - ख ०, ग । २७६ २२ आचार्य धनजय आदि २७७ 8 या ज्ञात रूप में १८१ २५ ' विचार ' को के स्थान पर २८२ १४ प्रीतिजननो विरुद्धा २८३ २६ २. वान्यचेष्टाभि - ख ०, ग ० शुद्ध चोपविशेत्तरः ॥ २०१ ॥
होमयज्ञक्रिया नेपथ्यगृहद्वारे परिष्दविशेषास्तु एवं कथयाविभागस्तु तद्वृत्तिकानि आविद्धसंज्ञितः- क ० । विज्ञेयाः प्रयोगस्य अतिशय महत्वशाली माध्यम भी है । विभिन्न संख्याएँ व्यवस्थित रूप में आशय यह भी है प्रतीयते सः प्रत्ययः तचित् निवृत्या भुरुक् वृत्ते मालती सा नाम्ना मधुकरी का विलग रहती तथा परिमितभाषिणी हो तो हे मित्र, परुषवाक्य कशाभिहता । हमने भी अर्थ किया है । नानाशस्त्र शतघ्नि तोमर-। कभी भी ज्ञात हो सकती है । • पिण्डेन दर्शयेत् ' छन्दोविचिति ' नामक ( वाचिकाभिनये ) ज्ञेयान्यनुक्त - ख ०, ग ० । आचार्य धनञ्जय आदि या ज्ञातरूप में ' विचार ' के स्थान पर प्रीतिजननो विरुद्धाभि । वान्यचेष्टाभिख ०, ग ० । २८५ ११ परदोषै विचित्रार्थं परिकीर्त्यन्ते परदोषैर्विचित्रार्थे परिकीर्त्यते । २ ९ २ १७ अनिन्धि ललना गण अनिन्द्य ललना गण ३०४ २ ९ मञ्जरीर्न यिन्तः मञ्जरीर्तयन्तः
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५५४ नाट्यशास्त्र पृष्ठ पङ्गि अशुद्ध ३२५ १३ पिछले अध्याथ में ३४१ २३ स्वर महाराष्ट्री की रचना में ३४२ १ ९ चेटानां राजपुत्राणां ३५५ ४ प्रेष्या इति ३५७ १ ९ बतलाए परन्तु इनके ३५ ९ २, ३ जैसे मानव ये शरीर में हैं । उसी प्रकार ३५ ९ १२ पाठ्य स्वर के पाठ के समय ३६० १५ आशय इन्हीं बातों से ३६० २८ तत्र साकाङ्का नाम ३६१ १५ स्वरों के छः अलङ्कार जो ३६३ ३२ परोक्षयने चैव ३६५ १२ जैसे कार्य अध्यन्तगुप्त बात ३६६ ११ ' करुणरस में ' विलन्त्रित ' ३६६ २७ ० स्वरूपेणापूरयदि- ख ०, ग ० ३७० १२ इसी प्रकार के अन्य अवसरों पर ३७० १४ तेष्वलङ्कार दृष्यते । ३७३ १६ उक्तं काकु विधान्तु ३७५ १६ महामुनि ने ऋषिकों को ३७७ ११ छः प्रकार होते हैं । ३७८ ७ नौ प्रभदो के ३७ ९ १३ संचारी दृष्टियों का विवरण किया है, ३८० १ ९ वेममृपाल ने भरतोक ३८२ ३० अभिव्यक्ति वस्तु एवं ३८७ २५ खङ्ग युद्ध के अवसर पर ३८८ ६ ' आलक्कोस्पींडने चैव ' के अनुसार ३८ ९ ३१ शत्र के अनुसन्धान ३ ९ १ ५ अभिनवदर्पण के शुद्ध पिछले अध्याय में स्तर महाराष्ट्री की रचना में चेटानां राजपुत्राणां प्रेष्या हओति बतलाए गये हैं परन्तु इनके जैसे मानव के थे शरीर में स्थित होते हैं उसी प्रकार पाठ्य - स्वर को पाठ के समय आशय इन्हीं दो काकुओं से तत्र साकाङ्क्षा नाम स्वरों के छः अलङ्कार हैं जो परोक्षायने चैव जैसे कार्य तथा अत्यन्त गुप्त बात करुणरस में ' विलम्बित ' । स्वरूपेणापूरयति - ख ०, ग ० । इसी प्रकार के अन्य हस्तगति के अवसरों पर तेष्वलङ्कार इष्यते । उक्त काकु विधानन्तु महामुनि ने ऋषियों को छः प्रकार के होते हैं । नौं प्रभेदों के संचारी दृष्टियों का विवरण दिया है, वेमभूपाल ने भरतोक अभिव्यक्त वस्तु एवं खड्गयुक्त के अवसर पर " आलक्तकोस्पीडने चैव " पाठ के अनुसार शत्रु के अनुसन्धान अभिनयदर्पण के ३ ९ ४ ५ आकार का है रहने से हस्त आकार का रहने से यह हस्त ताम्रचूड ताम्रचूड ३ ९ ४ १५ अन्य आचार्यों ने अन्य अन्य आचार्यों ने कहा है कि असंयुक्त हस्त भी अन्य असंयुत हस्त भी
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शुद्धिपत्र ५५५ पृष्ठ पक्कि अशुद्ध शुद्ध ४०० १ मकर के कणों की मकर के कर्णौ की ४०० २८ अन्यत्र ( नास ग्रन्थों में ) ' अन्यत्र ( नाव्य ग्रन्थों में ) ४०२ ११ मुक्ति अर्थ के विषय में ० ४०३ २१ अवश्य प्रयोग द्वारा किया जाए । ४०४ १७ करने से ' दत्त ' है । ४०५ ८ सर्पशीर्ष होते हैं तो । ४०८ २७ तथा शब्द से भी रखता है । ४१० १४ जिसका है सभी पक्षाभावी ४१० ७ एक दूसरे से मिलती है । ४११ ९ एक दूसरे से मिलती है । ४१२ ७ से भी मण्डल बनाता है ० ४१२ १५ उपयुक्तता में ध्यान में रखकर ४१ ९ १२ क्रमण के लिये शास्त्र में ४२० ६ सन्नगास्त्र =: जिसका ० ४२२ ८ दस मण्डल हो हैं तथा ४२५ १५ दो तथा एक काल की ० ४२५ २६ उत्तमादि पार्कों के लिये ४३२ ८ ' अधोलोकनेन ' इत्यादि ४३६ ७ किसी उदेश को ० ४४१ १ गहण से भी स्पष्ट है ४४१ १३ नगर, दीप आदि में ४४१ १७ अनुग्रह करने के कारण ४४४ ४ मध्य में परिगमन किया गया ४४६ ३० अध्याय समाप्ति को ( भी ) किया गया है । ४४७ २० संकेतित मिलता है । ४४८ ११. अस्तायम्मुहु ४६६ २५ उत्कष्ठा के समस ४७४ ६ तावस्मिन् कार्य कल्पनम ४८० १५ सौन्दर्य का आविर्भाव होता है । ४८० १५ भोज तथा मम्भट और युक्ति = अर्थ के विषय में ० अवश्य प्रयोग किया जाए । करने से ' उवृत्त ' है । सर्पशीर्ष होते हैं । तथा पताक शब्द से प्रधानता भी रखता है । जिसका सभी पवाभावी एक दूसरे से मिलते हैं । एक दूसरे से मिलते हैं । से भी मण्डल बनता है ० उपयुक्तता को ध्यान में रखकर क्रमण के लिये नाव्यशास्त्र में • सन्नगात्र - जिसका ० दस मण्डल होते हैं तथा दो तथा एक ताल की ० उत्तमादि पात्रों के लिये अथोऽवलोकनेन इत्यादि किसी उद्देश्य को ग्रहण से भी स्पष्ट है नगर, द्वीप आदि में अनुग्रह करने के सामर्थ्य के कारण मध्य में परिगणित किया गया अध्याय समाप्ति को भी सूचित किया गया है । संकेत मिलता है । उत्कण्ठा के समय हेतावन्यस्मिन् कार्य करपनम् सौन्दर्य का आविर्भावक होता है । भोज तथा मम्मट और
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५५६ नाट्यशास्त्र पृष्ठ पङ्कि अशुद्ध ४८१ ४ उदारता जैसे गुणों काव्योन्मुखी ४८१ ५ दस गुणों में कुछ अर्थगुण एवं कुछ उभयात्मक है । ४८३ १० व्यापर से उपसंक्रान्त ४८८ २८ विधाता ने सन्ध्यारूपी ४ ९ ० १० यहाँ अवन्तर अर्थों के ४ ९ ६ ९ चूर - चूर किये जाने भी ४ ९ ६ ११ अपने को रत्न के समान ४ ९ ६ २० क्वाकार्यं शशलक्ष्मण क ४ ९ ८ १५ कथाद्भतं हिमनिधा-४ ९ ८ २ ९ एवं स्वाभाविक कारण जहाँ विद्यमान हो ५०६ ६ उपादान कर बतलाया ४ नाद छः प्रकार हो जाता है । ५०७ ५०८ २५ ' प्राणवशेन में ' ४ अर्थयोगेन पद से का आशय ५० ९ ५० ९ १३ विरामाः इत्यदि से शुद्ध उदारता जैसे गुणों में उनकी काव्योन्मुखी दस गुणों में कुछ शब्दगुण, कुछ अर्थगुण एवं कुछ उभयात्मक है । व्यापार से उपसङ्क्रान्त विधाता के द्वारा सन्ध्यारूपी यहाँ अवान्तर अर्थों के चूर - चूर किये जाने पर भी रश्न के समान का कार्य शशलक्षमणः क कथाद्भुतं हिमनिधा-एवं स्वाभाविक कारण से जहाँ विद्यमान हो उपादान कह कर बतलाया नाद छः प्रकार का हो जाता है । ' प्राणवशेन ' पद में अर्थयोगेन पद का आशय विरामाः ' इत्यादि से
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( काशी संस्कृत ग्रन्थमाला २१५ ) नाट्यशास्त्र ( प्रणेता भरतमुनि ) हिन्दी प्रदीप व्याख्याकार- श्री बाबूलाल शुक्ल साहित्य शास्त्र के आकर ग्रन्थ नाट्यशास्त्र का मूल प्रामाणिक पाठ, पाठान्तर, टिप्पणी परिशिष्ट के साथ प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित यही सर्वाङ्गपूर्ण प्रामाणिक संशोधपूर्ण संस्करण है । नाट्यशास्त्र के विशुद्ध पाठ के साथ व्यवस्थित पाठान्तरों के संस्करण के वर्षों से होने वाले अभाव के कारण संशोधक विद्वानों तथा अध्येतृवर्ग को बड़ी कठिनाई अनुभव हो रही थी तथा नाट्यशास्त्र के गम्भीर एवं दुर्बोध श्राशय के कारण उसकी स्पष्ट व्याख्या की आवश्यकता चली श्रा रही थी । इन्हीं अभावों को पूर्ण धरने की भावना से प्रस्तुत संस्करण विशेष रूप में प्रकाशित किया गया है । इसके प्रदीप नामक हिन्दी व्याख्यान तथा टिप्पणियों में आचार्य अभिनव गुप्तपाद की प्रसिद्ध व्याख्या अभिनव भारती के समग्र महत्वपूर्ण विवेचन को जहाँ एक ओर किया गया है वहीं अन्य अपेक्षित सामयिक एवं उचित तथ्यों को भी समायोजित कर विवेचित किया गया है । प्रस्तावना में विषय से सम्बद्ध सभी तथ्यों का विशद एवं संशोधनपूर्ण विवेचन किया गया है । विश्वविद्यालय के स्नाकोत्तर छात्रों के अतिरिक्त संशोधक एवं अभ्यासक जन को इस ग्रन्थ के रखने पर अन्य नाट्यशास्त्र के किसी संस्करण की श्रावश्यकता नहीं रहेगी । परीक्ष्य छात्रों को ' प्रदीप ' व्याख्या के अनुसार अध्ययन करने पर निश्चित सफलता मिलेगी । प्रथम भाग ( अध्याय १ से ७ अध्याय ) में करणों के दुर्लभ रेखाचित्र तथा प्रेक्षा गृह का रेखाचित्र भी दिया गया है । अनेक विश्व-विद्यालयों द्वारा स्वीकृत पाठ्य प्रन्थ । प्रथम भाग - अध्याय १ से ७ २५-०० उपर्युक्त सभी विशेषताओं के साथ प्रदीप हिन्दी व्याख्यान के साथ अध्याय ८ से १ ९ तक का द्वितीय भाग ४०-०० प्राप्तिस्थान — चौखम्भा ओरियन्टालिया, वाराणसी -२२१००१ शाखा - बंगलो रोड, ६ यू ० बो ० जवाहर नगर, दिल्ली- ११०००७