भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 91–100
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 91–100
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( 50 ) है । जैसा कि हमने प्रथमभाग में कहा था कि श्रीग्रासे को अपने संस्करण के लिये नाट्यशास्त्र के विभिन्न हस्त लेखों के कारण एक नवीन पद्धति निर्मित करनी पड़ी थी । उसकी प्रक्रिया तथा पाठ विनिश्चायक सरणि का अल्पविवरण पुनः यहाँ देना अप्रासङ्गिक नहीं होगा क्योंकि यह नाट्यशास्त्र के परिशीलन में एक प्रमुख ( पक्ष की ) स्थिति रखता है । वे कहते हैं कि-" भारतीय नाट्यशास्त्र के हमारे मूलपाठ का स्वरूप अधिकांशतः सभी ओर से प्राप्य उत्तम या इष्ट को ग्रहण कर लेने की प्रकृति का है, क्योंकि एक पाठ को स्थिर करने में किसी आग्रह या दबाव का अनुभव नहीं होता, जो एक सहज प्राथमिकता के अनुरोध पर किसी हस्तलेख को लेने हेतु रहती है । हमने कभी कभी तो हस्तलेखों की संख्यागत वृद्धि या आधिक्य का अनुगमन किया है तो कभी किसी समग्र तथ्य को ध्यान में रखते हुए रुचि को आधार बना कर पाठों को लिया था । ऐसा करते हुए हम भरतमुनि के मूलपाठ को शुद्ध या संशोधित करने की अमूलक महत्वाकाक्षा से दूर ही रहे हैं, जिसमें अनधिकृत संशोधन भी हो जाते हैं । यहाँ तो केवल ऐसे पाठ भी मूल में ले लिये गये हैं जो किसी उत्तरकालीन संशोधन के कारण किसी एक ही हस्तलेख में थे । इसमें इतनी बात की सतर्कता अवश्य रखी गयी कि ये बिना किसी आधार के नहीं लिये गये हों तथा साथ ही उनके पाठान्तर भी यथास्थान रख दिये गये हैं क्योंकि ऐसी स्थिति में वे आवश्यक थे । ” श्री ग्राँसे के इस विवरण से थोड़ी आंशिक भिन्नता रखने पर भी उनके इस कथन में नाट्यशास्त्र के सम्पादन के ऐसे संकेत विद्यमान हैं जिनके महत्व से इन्कार नहीं किया जा सकता है परन्तु प्रस्तुत सम्पादक इस विषय में थोड़ी विचार भिन्नता भी रखता है । नाटयशास्त्र के अच्छे संशोधित पाठों को प्रकृतसंस्करण में हमारे द्वारा लिया गया है जबकि उनके अन्य पाठ भी हस्त लेखों के कारण विद्यमान थे परन्तु सन्तोषजनक रूप में जो स्वीकार्य नहीं हो सकते थे । अतएव ऐसे पाठों को उपयुक्त विचार के बाद ले लिया गया जो संशोधन की उपयुक्तता लिए हुए थे परन्तु ऐसी स्थिति में शेष पाठान्तरों की भी ( अच्छे रूप में रहने पर या तो ) व्याख्या कर दी गयी है या फिर उन्हें पाठान्तर के रूप में प्रस्तुत कर दिया गया है जिससे आगे चलकर उनके औचित्य पर और भी विचार हो सके । प्रकृत सम्पादक अपने आग्रह १. द्रष्टव्य -ग्रासे संस्करण की प्रस्तावना - पृ ०५, ११-१२ पेरिस संस्करण ।
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( ८१ ) पूर्ण पाठों को थोपने के पक्ष में नहीं है तथा उसने कहीं ऐसी स्वतन्त्रता का उपयोग भी नहीं किया है । नाट्यशास्त्र के पाठान्तरों के अनुशीलनकर्त्ता संशोधक विद्वानों से इस सन्दर्भ में यही निवेदन है कि वे अपनी मीमांसा के समय इस विशिष्ट स्थिति को भी अवश्य ध्यान में रखेंगे जो सम्पादन के समय प्रायः सभी पूर्व सम्पादकों ने अनुभव की थी तथा उसे अपने - अपने संस्करणों में वर्णित भी किया था । यह एक बड़े ही आदर्श की तथा महत्व की भी बात होती यदि हम हस्तलेखों में तथा नाटयशास्त्र के संस्करणों में प्राप्य एवं विद्यमान सभी पाठ-भेदों को पादटिप्पणी में दे देते किन्तु ऐसा करना मुश्किल से व्यावहारिक बन पाता । अतएव यहाँ पाठान्तर देते समय यह बात भी सर्वदा ध्यान में रखी गयी है कि दिये गये पाठ या पाठान्तर किन्ही संशोधित संस्करणों में किस प्रकार रहे हैं । इस प्रकार वर्तमान संशोधित संस्करण में उन संस्करणों के पाठों को आवश्यक संकेत के साथ पाठान्तर टिप्पणी में दिखलाया गया है । परन्तु यहाँ इतना अवश्य हुआ है कि ऐसे पाठान्तरों को प्रायः नहीं लिया गया जो केवल पुनरुक्ति या शाब्दिकभेद मात्र के कारण अधिक महत्व के नहीं थे, परन्तु ऐसे पाठों में भी जो प्राप्त करवाने योग्य थे तो उन्हें बराबर रखा ही गया है । इसके प्रथम अध्याय से चौदह अध्याय तक के पाठों का श्री ग्रासे के संस्करण से भी समीकरण करते हुए उसे ' क ' पाठ के अन्तर्गत ( या अन्य वर्ग के अन्तर्गत ) रखते हुए संकेत बनाये गये हैं तथा बम्बई काव्यमाला संस्करण के सामान्यतः ' ख ' के संकेत के अन्तर्गत पाठों को इस संस्करण में दर्शाया गया है जिसका स्पष्टीकरण आवश्यक था । आभार प्रदर्शन-" नाट्यशास्त्र " के इस द्वितीयभाग के लिये भी प्रथमभाग की तरह ही अनेक सुधीजन, एवं साहित्य - विद्या- निष्णात मनीषियों का सहयोग, प्रोत्साहन तथा प्रेरणा मिली है, जिनका उपकार सदैव मानते हुए उन्हें धन्यवाद देना अपना प्रथम कर्तव्य मानता हूँ । इसी प्रकार नाट्यशास्त्र के पूर्व प्रकाशित संस्करणों के सम्पादकों का भी सामान्यतः अधमर्ण हूँ जिनके संस्करणों के कारण ही प्रस्तुत संस्करण को संवारने में सहायता मिली है । इनमें भी सर्व प्रथम गायकवाड ओरियेन्टल सीरिज, बड़ौदा के अभिनवभारती टीका सहित संस्करण के प्रथितयशस्क सम्पादक म ० म ० रामकृष्ण ' कवि ' का, काव्यमाला - निर्णयसागर प्रेस बम्बई के सम्पादक श्री पाण्डुरंग परब ६ ना ० द्वि ० भू ०
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( ८२ ) तथा द्वितीय संस्करण के सम्पादक श्री पण्डित केदारनाथ साहित्यभूषण का तथा काशी संस्कृत ग्रन्थमाला, काशी के नाट्यशास्त्र के सम्पादक श्री बटुकनाथ शर्मा तथा पण्डित बलदेव उपाध्याय के प्रति भी अपनी कृतज्ञता मानता हूँ जिनके संस्करणों ने प्रस्तुत संस्करण को संवारने में आधार प्रदान किया । इसी प्रकार एशियाटिक सोसायटी कलकत्ता से प्रकाशित नाट्यशास्त्र ( श्री मनोमोहन घोष के अंग्रेजी अनुवाद सहित ) के संस्करण से भी पर्याप्त सहायता मिलने से उसके प्रति भी अपनी हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करता हूँ । इसके अतिरिक्त नाट्यशास्त्रीय वाङ्मय के प्राचीन ग्रन्थकारों के प्रति तथा अभिनव संशोधकों तथा समालोचकों का भी कृतज्ञ हूँ जिनके ग्रन्थों के अनुशीलन ने मुझे प्रस्तुत संस्करण में अनेक अभिनव तथ्यों तथा शास्त्रीयप्रमेयों पर अनेक दृष्टिकोणों से विचार तथा विषय मीमांसा करने में प्रवृत्त करवाया । प्रस्तुत ग्रन्थ के लेखन काल में जिन अनेक ख्यातिप्राप्त विद्वानों, मित्रों तथा लेखकों का हार्दिक एवं व्यावहारिक सहयोग मिला था तथा जिसका प्रथम भाग में उल्लेख किया जा चुका है उन महानुभावों के साथ साथ उसी क्रम में श्री डॉ ० प्रभाकर नारायणजी कवठेकर, कुलपति विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन का विशेष रूप से आभारी हूँ, जिनने इस नाट्यशास्त्र के प्रदीप व्याख्यान को अपनी गुणग्राहिता तथा उदारता से नाट्यशास्त्र की तात्विक मीमांसा को प्रश्रय दिया । इसी प्रकार इन्दौर के शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष डॉ ० देवेन्द्रकुमारजी जैन का भी नाट्यशास्त्र की समीक्षा करने ( ‘ नई दुनिया ' दैनिक में ) के कारण आभारी हूँ । नाट्यशास्त्र के प्रदीप व्याख्यान को प्रोत्साहित कर शीघ्र प्रकाशित करवाने के आग्रह के साथ साथ उसके अनुशीलन को अनुशंसित करने वाले विद्वानों में स्व ० श्री डॉ ० बलदेवप्रसादजी मिश्र ( विधायक तथा सुप्रसिद्ध मानस मर्मज्ञ एवं समीक्षक- राजनांदगाँव ), श्री सुधाकर पाण्डेय - ( प्रधानमन्त्री काशी नागरी प्रचारिणी सभा, काशी ), प्रो ० श्री डॉ ० श्यामसुन्दरलाल दीक्षित अमरावती का भी मैं कृतज्ञ हूँ । इसके अतिरिक्त प्राध्यापक श्री बेङ्कटाचलजी, अध्यक्ष संस्कृत विभाग, विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन, सुहृद्वर डॉ ० रामेश्वर शर्मा, रीडर नागपुर विश्वविद्यालय, नागपुर, प्रो ० गणेशदत्त त्रिपाठी, हिन्दी विभाग, शास ० कला वाणिज्य महा ०, इन्दौर, डॉ ० लक्ष्मण नारायण शुक्ल, प्राध्यापक संस्कृत महाविद्यालय, इन्दौर, प्रो ० हर्षदधोलकिया, संस्कृत महाविद्यालय, इन्दौर, प्रो ० डॉ ० पुरु दाधीच, भातखण्डे संगीत महाविद्यालय,
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( ८३ ) लखनऊ तथा श्री प्रो ० कृष्णशास्त्री कानिटकर, शास ० कला वाणिज्य महा ० इन्दौर आदि का भी हृदय से आभारी हूँ । नाट्यशास्त्र के सभी खण्डों में प्रशस्त सहकार के कारण डॉ ० रुद्रदेवजी त्रिपाठी, लालबहादुर संस्कृत विद्यापीठ, देहली का तथा हिन्दी के परम सुकवि सुहृद्वर डॉ ० शिवमङ्गल सिंह ' सुमन ' ( भूतपूर्व कुलपति विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन ) का भी इस सन्दर्भ में विशेषतः आभारी हूँ । नाट्यशास्त्र के व्याख्यानादि लेखन के समस्त कार्य को मध्यप्रदेश शासन की सेवा में रहकर करने के कारण मैं मध्यप्रदेश शासन के प्रति भी अपना विनम्र आभार प्रदर्शन करता हूँ । साथ ही नाट्यशास्त्र जैसे महाग्रन्थ के लेखन के सुदीर्घ समय में सदा एकनिष्ठ होकर सहयोग देने वाले मेरे अपने परिवार के सभी सदस्य भी धन्यवाद के अधिकारी हैं । इसी प्रसंग में मैं गोलोकवासी श्रेष्ठिप्रवर बाबू जयकृष्णदासजी गुप्त का भी स्मरण आवश्यक मानता हूँ जो ऐसे आकरभूत शास्त्रीय ग्रन्थ के प्रकाशन में सदा रुचि लेते रहे हैं । मैं चौखम्भा संस्कृत संस्थान के संचालक गुप्त बन्धुओं का भी आभारी हूँ जिनने नाट्यशास्त्र के भागों को अपनी गौरवशाली परम्परा के अनुरूप प्रस्तुत करने का अतिशय उद्यम किया । इसी परिवार के श्री पं ० देवनारायण झा जी का भी मुद्रण कार्य में सहयोग के कारण आभार व्यक्त करता हूँ । किंबहुना नाट्याम्नाय - नितान्ततान्तमनसा मा सेतुशीताचला-क्षोणीमण्डलमध्यवर्तिविदुषामा भोगिनी चेतसाम् । जीयादुक्तिविवेकजालनिकरैः संशोधिता निस्तुलैः गम्भीरा मधुरा प्रबोधजननी व्याख्या प्रदीपाभिधा ॥ उज्जयिनी, सुधीजनकृपाकाङ्क्षी विजयादशमी, सं ० २०३५ बाबूलाल शुक्ल, शास्त्री
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अभि ० द ० अभि ० भा ०: अ ० भा ०: का ० प्र ० काव्या ० सू ० 40 द ० रू ० ना ० चं ० ना ० द ० सू ० 40 ना ० शा ० ना ० शा ० सं ०: ना ० ल ० २० को ०: भ ० को ० : र ० गं ० रसा ० सु ० श्र ० प्र ०: सर ० क ०: सा ० द ० : सं ० २० अ ०: अं ० का ० सं ०: चौ ० सं ० द्र ०नि ० सा ० 43 गा ० ओ ० सी ०: श्लो ० सं ० सं ० ग्रन्थ सङ्केत अभिनय - दर्पण अभिनवभारती ( नाट्यशास्त्र अभिनवभारती ( नाट्यशास्त्र काव्यप्रकाश । काव्यालङ्कारसूत्र । दशरूपक । नाटकचन्द्रिका नाट्यदर्पणसूत्र । नाट्यशास्त्र नाट्यशास्त्र संङ्ग्रह । नाटकलक्षण रत्न कोश । भरतकोश । रसगङ्गाधर । रसार्णवसुधाकर । शृङ्गारप्रकाश । सरस्वती - कण्ठाभरण । साहित्यदर्पण | सङ्गीतरत्नाकर । सामान्य सङ्केत अध्याय । अङ्क । काशी संस्करण । चौखम्बा संस्करण । दृष्टव्य निर्णय- सागर संस्करण । गायकवाड ओरियेन्टल सीरिज
श्लोक संख्या ।
संख्या । व्याख्या ) । व्याख्या ) । , बडौदा । 10984011
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विषयानुक्रमणिका अष्टम अध्याय ( उपाङ्गविधान ) ( श्लोक १ - ९ ७६ मुनिजन द्वारा अभिनय विषयक प्रश्न तथा भरतमुनि का उत्तर ( श्लोक १-५ ) अभिनय शब्द व्याख्या ( ६-७ ) अभिनय के प्रकार ( ८-१० ) अङ्गाभिनय उसके प्रभेद तथा अङ्गादि ( ११-१३ ) अभिनय की वस्तु ( १४-१५ ) मस्तकाभिनय - भेद तथा लक्षण ( १६-१८ ) आकम्पित तथा कम्पित - स्वरूप एवं योजना ( १ ९ -२१ ) धुत तथा विधुत - स्वरूप एवं योजना ( २२-२४ ) परिवाहित तथा आधूत - स्वरूप एवं योजना ( २५-२७ ) अवधूत तथा अञ्चित - स्वरूप एवं योजना ( २८-२९ ) निहञ्चित तथा परावृत्त स्वरूप एवं योजना ( ३०-३२ ) उत्क्षिप्त स्वरूप एवं योजना ( ३३ ) अधोगत. 91 39 ( ३४ ) लोलित 39 33 ( ३५-३६ ) दृष्टि - स्वरूप तथा प्रकार ( ३७-४३ ) वीरा - दृष्टि ( ५० ) १३ बीभत्सा - दृष्टि ( ५१ ) १३ ) [ शान्ता दृष्टि ] ( ५१ ) १३ स्थायी दृष्टियाँ ( ५३-१३ ) स्निग्धा दृष्टि ( ५३ ) १४ ३ हृष्टा दृष्टि ( ५४ ) १४ ४ दीना - दृष्टि ( ५५ ) १४ ५ क्रुद्धा दृष्टि ( ५६ ) १४-५ हप्ता दृष्टि ( ५७ ) १४ ६ भयान्विता दृष्टि ( ५८ ) १५ जुगुप्सिता - दृष्टि ( ५ ९ ) १५ ६ विस्मिता दृष्टि ( ६० ) १५ सञ्चारीभाव दृष्टियाँ ( ६२ ) १५ ७ शून्या दृष्टि ( ६२ ) १ मलिना दृष्टि ( ६३ ) १५ ८ श्रान्ता दृष्टि ( ६४ ) १६ लज्जान्विता दृष्टि ( ६५ ) १६ ८ ग्लाना दृष्टि ( ६६ ) १६ शङ्किता दृष्टि ( ६७ ) १६ ८ विषादिनी दृष्टि ( ६८ ) १७ मुकुला दृष्टि ( ६ ९ ) १७ ९ कुचिता दृष्टि ( ७० ) १७ १० अभितप्ता दृष्टि ( ७१ ) १७ १० जिह्मा दृष्टि ( ७२ ) १७ १० ललिता दृष्टि ( ७३ ) १७ ११ वितर्किता दृष्टि ( ७४ ) १८ रसदृष्टि - लक्षण तथा प्रयोग ( ४४-५२ ) अर्धमुकुला दृष्टि ( ७५ ) १८ कान्ता ( दृष्टि ) - स्वरूप ( ४४ ) भयानका दृष्टि ( ४५ ) हास्या दृष्टि ( ४६ ) करुणा दृष्टि ( ४७ ) अद्भुता दृष्टि ( ४८ ) रौद्री -दृष्टि ( ४ ९ ) ११ विभ्रान्ता दृष्टि ( ७६ ) १८ १२ विप्लुता दृष्टि ( ७७ ) १८ १२ | आकेकरा दृष्टि ( ७८ ) १८. १२ | विकोशा दृष्टि ( ७ ९ ) १८ १२ त्रस्ता दृष्टि ( ८० ) १ ९. १२ | मदिरा दृष्टि ( ८१ ) १ ९
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दृष्टियों की रसादि में योजना ( ८२ - ९ ३ ) पुतलियों के भ्रमणादि कार्य ( ९ ४ - ९ ६ ) भ्रमणादि लक्षण ( ९ ७ – ९९ ) अभिनय योजना ( १००-१०३ दर्शन के विविध प्रकार ( १०४ -पुटकर्म - प्रभेद तथा लक्षण ( १० ९ -११२ ) पुटकर्म - अभिनय योजना ( ११३-११६ ) भ्रुकुटीकर्म - प्रभेद तथा लक्षण ( ११७- १२१ ) भ्रुकुटीकर्म - अभिनय योजना १२२-१२७ ) नासाकर्म- प्रभेद तथा लक्षण ( १२८-१३० ) नासाकर्म- अभिनययोजना ( १३१-१३४ ) कपोलकर्म - प्रभेद तथा लक्षण ( १३४ - १३६ ) कपोल कर्म- अभिनययोजना ( १३७-१३९ ) अधरोष्टकर्म - प्रभेद तथा लक्षण ( १३ ९ -१४२ ) अधरोष्ठकर्म - अभिनययोजना ( १४२ - १४४ ) चिबुककर्म - प्रभेद तथा लक्षण ( १४५ - १४८ ) चिककर्म - अभिनय योजना ( १४८-१५१ ) मुखजकर्म - प्रभेद तथा लक्षण ( १५१-१५३ ) मुखजकर्म - अभिनययोजना ( १५३-१५९ ) मुखराग - प्रभेद तथा लक्षण ( १५ ९ -१६० ) ( 55 ) १ ९ -२० २१ २२ ) २२ १०८ ) २३ २४ २४ २५ २६ २७ २८ २८ २ ९ २ ९ ३० ३० ३१ ३२ ३२ ३३ मुखराग- अभिनययोजना ( १६०-१६७ ) ३३ ग्रीवाकर्म प्रभेद, लक्षण तथा योजना ( १६८-१७६ ) ३४ नवम अध्याय ( हस्ताभिनय ) ( श्लोक १-२१४ ) असंयुतहस्त - संख्या तथा नाम ( १-७ ) ३७ संयुक्त हस्त - संख्या तथा नाम ( ८-१० ) ३८ नृत्तहस्त संख्या तथा नाम ( ११-१६ ) ४० असंयुत हस्तमुद्राओं के लक्षण-विवरण ( १७ ) ४१ पताकहस्त लक्षण तथा योजना ( १८-२६ ) ४१ त्रिपताकहस्त लक्षण तथा योजना ( २७-२६ ) ४३ कर्तरीमुखहस्त - लक्षण तथा योजना ( ३८-४१ ) ४४ अर्धचन्द्रहस्त - लक्षण तथा योजना ( ४२-४४ ) ४६ अरालहस्त लक्षण तथा योजना ( ४५-५१ ) ४७ शुकतुण्डहस्त लक्षण तथा योजना ( ५२-५३ ) ४ ९ मुष्टिहस्त - लक्षण तथा योजना ( ५४-५५ ) ४ ९ शिखर हस्त - लक्षण तथा योजना ( ५६-५७ ) ५० कपित्थहस्त - लक्षण तथा योजना ( ५८-५९ ) ५० कटकामुख हस्त - लक्षण तथा योजना ( ६०-६३ ) 60 ५१ सूचीमुखहस्त - लक्षण तथा योजना ( ६४-७७ ) ५१ पद्मकोशहस्त - लक्षण तथा योजना ( ७८-८१ ) ५४
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सर्पशीर्ष हस्त लक्षण तथा योजना ( ८२-८३ ) मृगशीर्षहस्त - लक्षण तथा योजना ( ८४-८५ ) कङ्गुलहस्त - लक्षण तथा योजना ( ८६-८७ ) अलपल्लव हस्त - लक्षण तथा योजना ( ८८-८९ ) चतुरहस्त - लक्षण तथा योजना ( ९ ० - ९ ८ ) भ्रमरहस्त लक्षण तथा योजना ( ९९ -१०१ ) हंसास्य हस्त - लक्षण तथा योजना ( १०२-१०३ ) हंस पक्षहस्त लक्षण तथा योजना ( १०४ - १०७ ) सन्देश हस्त - लक्षण तथा योजना ( १०८-११४ ) मुकुलहस्त - लक्षण तथा योजना ( ११५-११७ ) ऊर्णनाभहस्त - लक्षण तथा योजना ( ११८ - ११ ९ ) ताम्रचूड हस्त लक्षण तथा योजना ( १२०-१२४ ) संयुत हस्तमुद्रायें ( १२५ ) अञ्जलि लक्षण तथा योजना ( १२६-१२८ ) कपोत- लक्षण तथा योजना ( १२ ९ -१३१ ) कर्कट - लक्षण तथा योजना ( १३२-१३३ ) स्वस्तिक - लक्षण तथा योजना ( १३४- १३५ ) कटकावर्धमानक - लक्षण तथा योजना ( १३६-१३७ ) उत्सङ्ग- लक्षण तथा योजना ( १३७–१३८ ) ( 58 ) निषध - लक्षण तथा योजना ५५ ( १३ ९ -१४१ ) दोला - लक्षण तथा योजना ५६ ( १४२-१४३ ) पुष्पपुट - लक्षण तथा योजना ५६ ( १४४-१४५ ) मकर - लक्षण तथा योजना ५७ ( १४६-१४७ ) गजदन्त - लक्षण तथा योजना ५७ ( १४८ - १४ ९ ) अवहित्थ लक्षण तथा योजना ५ ९ ( १५०-१५१ ) वर्धमान लक्षण तथा योजना, ६० ( १५२ - १५४ ) ६८ ६ ९ ६ ९ ६ ९ ७० ७० ७० हस्तमुद्राओं की सामान्यविधि ६० ( १५५-१५८ ) ७१ 60 हस्त की विविध क्रियायें ६१ ( १५ ९ -१६४ ) ७२ हस्तमुद्रा कार्यविधि ( १६५-१६६ ) ७३ ६२ हस्त - प्रचार ( १६७-१७६ ) नृत्तहस्त - लक्षण ( १७७ ) ६३ चतुरस्र लक्षण ( १७८ ) उद्घृत लक्षण ( १७ ९ ) ६३ तलमुख लक्षण ( १८० ) ६४ स्वस्तिक तथा विप्रकीर्ण - लक्षण ( १८१ ) ६५ | अरालकटकामुख लक्षण ( १८२ आविद्धवक्र - लक्षण ( १८३ ) ६५ सूचीमुख लक्षण ( १८४ ) रेचित - लक्षण ( १८५ ) ६६ अर्धरेचित - लक्षण ( १८६ ) उत्तान वञ्चित लक्षण ( १८७ ) ६६ पल्लव तथा नितम्ब ( १८८ ) केशबन्ध - लक्षण ( १८ ९ ) ६७ लता - लक्षण ( १ ९ ० ) करिहस्त - लक्षण ( १ ९ १ ) ६७ पक्षवञ्चितक, ( १ ९ २ ) ७३ ७५ ७५ ७६ ७६ ७६ ) ७७ ७७ ७७ ७७ ७८ ७८ ७८ ७८ ७८ ७८ ७८