Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 391–400
आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 391–400
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड ३ -- अविद्या ( ४ ) प्राणात्मविज्ञानापनिप ईश्वरीय विद्याविभूति का निरूपण करते हुए हमने सूर्य में घिबला - प्राण नाम के दो धातु बत-लाए हैं । इन दोनों में घिसा भाग विद्या है, प्राणभाग कम्मे है । सब प्रसत् प्रविद्यास्वरूपपरिचय भेद से दोनों ही दो दो भागों में विभक्त हैं है, संभूति- विनाश प्राणभाग प्रधान है । प्रथमं ज्ञानप्रासक्ति अनश्वयं मे चार विषय है । इन चारों ।विद्या श्रविद्या घिपणाभाग प्रधान धर्म - ज्ञानादि चार विद्या भागों के प्रविद्या बुद्धियों से धम्मं ज्ञानादि चारों विद्या भाग दब जाते हैं । प्रज्ञान अविद्या है । किसी भी विषय के यथार्थ स्वरूप को न जानना ही श्रविद्या है । अभिनिवेश ही प्रथर्म है । " हम ऐसा नहीं करते, यह नहीं मानते, हम तो ऐसा ही करेंगे " इस प्रकार का दुराग्रह ( हमम्मी ) ही प्रथमं का मूल है । ऐसे अभिनिविष्टि ( दुराग्रही ) का मनोरञ्जन सर्वथा असम्भव है । रागद्वेप प्रासक्ति है मन का लक्ष्यभूत विषय के रंग में रज्जित हो जाना, तल्लीन हो जाना ही राग है । यह राग अनुकूल - प्रतिकूल भेद से दो अवस्थाओं में परिणत रहता है । अनुकूलराग राग है, प्रतिकूलराग द्वेष है । एक प्रेमी जिस प्रकार सदा मन पर चढ़ा रहता है, इस से भी कहीं अधिक शत्रु खयाल पर चढ़ा रहता है । दोनों के साथ बन्धन का पूर्ण सम्बन्ध है इन दोनों का मूलप्रभव रजोगुरण है । ये दोनों बासक्ति के मूल हैं । दोनों बन्धन सजातीय हैं, अतएव रागद्वेष की समष्टि को आसक्ति शब्द से ही व्यवहृत किया गया है । बात्मा में सम्पूर्ण विभूतियां स्वभावतः प्रतिष्ठित हैं । तथापि मनुष्य सदा " श्राज मेरे पास अमुक वस्तु नहीं है, श्राज वह नहीं है, आज यह नहीं है " इस तृष्णा में लिप्त रहता है । दूसरे शब्दों में वह सदा अल्पता का अनुभव किया करता है । यही आत्मा का अनश्वर्य है । इस अवस्था में आत्मस्वरूप के विकास का प्रभाव है, अतएव इसे " अस्मिता " ( विकासाभाव ) कहा जाता है । उक्त कथनानुसार रागद्वेष को एक वस्तु मान लेने पर अधर्म्म अज्ञान - आसक्ति श्रनंश्वर्य, ये चार ही विद्याभाग बच जाते हैं | धम्मंबुद्धियोग से अधम्मं का, ज्ञानबुद्धि योग से अज्ञान का, वैराग्यबुद्धियोग से आसक्ति का, एवं ऐश्वयं बुद्धियोग से अनश्वयं का निराकरण किया जा सकता है योगदर्शन ने अज्ञान को अविद्या शब्द से, अनश्वर्य को अस्मिता शब्द से आसक्ति को राग द्व ेष शब्द से, प्रधम्मं को अभिनिवेश शब्द से व्यबहुत करते हुए क्लेशरून चार अविद्या बुद्धियों को पश्च क्लेश माना है - श्रविद्यास्मिता रागद्वेषाभिनिवेशा: पञ्च क्लेशाः ( यो ० द ० २।३ ) अभियाचतुष्टयात्मक यही तीसरा महाभयावह पाप्मा है । ४ - बन्ध ( ३ ) ( ३ ) यह कर्म्म भोक्ता कम्मरमा तीन दुःखों से प्रायः सदा घिरा रहता है काम - क्रोध - लोभ - मोह-मद - मात्सर्य - श्रविद्या- श्रस्मिता - रागद्वेष - श्रभिनिवेश - ज्वर- वातव्याधि श्रादिदुःख बन्धस्वरूपपरिचय हैं । इनमें भी ज्वर - उदरशूल - शिरः मूल पादशूल - ( गृध्रसी ) - पाण्डरोग छर्दी-हिक्का श्वास - उपदंश - कशूल - राजयक्ष्मा - प्रादि रोग प्रधानरूप से स्थूलशरीर पर श्राक्रमण करते हैं । काम क्रोध मोहादि पड्रिपु सूक्ष्मशरीर पर प्रधान रूप से आक्रमण करते हैं एवं विद्यादि क्लेशचतुष्टयी प्रधानतया कारण शरीर पर प्राघात करती है । स्थूल सूक्ष्म कारण शरीरवयी [ ३५७ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् ही आध्यात्मिक प्रपञ्च है । प्रकारान्त से रस - प्रसृक्- मांस - मेद - प्रस्थि - मज्जा - शुक्र, ये सात धातु वाङ्-मय स्थूल शरीर की प्रतिष्ठा हैं । काम - क्रोध - लोभ - मोह - मद- मात्सर्य, ये ६ धातु- प्राणमय सूक्ष्मशरीर की प्रतिष्ठा हैं एवं क्लेश चतुष्टयी के आधार पर प्रतिष्ठित भावना वासना नाम के दो शुक्र मनोमय कारण शरीर की आधार भूमि हैं । " त्रयमेतत् त्रिदण्डवत् " के अनुसार तीनों का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है । यदि एक शरीर व्याकुल रहता है तो शेष दोनों भी म्लान रहते हैं । वासना भावना संस्कार की जागृति से सप्तधातु समष्टिरूप स्थूलशरीर, दोनों क्षुब्ध हो जाते हैं । शरीरापात से मन खिन्न रहता है, मनोवेदना से शरीर से काम क्रोधादि सब धातु निश्चेष्टप्रायः रहते हैं । यदि तीनों के धातु सम हैं, तो स्वस्थता है, विषमता में दुःख है, अशान्ति है, क्षोभ है । इस विपमता का मूल कारण एकमात्र प्रज्ञाप-राध ही है । प्रज्ञापराध मन का कार्य है । अतएव आध्यात्मिक पूर्वोक्त त्रिविध दुःखों का कारण भी यही मन है, एवं बुद्धियोग के प्रभाव से सुख का कारण भी एकमात्र यही मन है, जैसा कि अभियुक्त कहते हैं—
मनो हि द्विविधं प्रोक्तं शुद्धं चाशुद्धमेव च ।
शुद्धं कामसंकल्पं शुद्धं कामविर्वाजतम् ॥ १ ॥
मन एवं मनुष्याणां कारणं बन्ध - मोक्षयोः ।
बन्धाय विषासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम् ॥ २ ॥
( ब्रह्म बिन्दूपनिषत् ) सप्तधातु सम्बन्धी वैपम्य विशेतः स्थूलशरीर की हानि करता है, पड्रिपु सम्बन्धी वैषम्य विशे-पतः सूक्ष्मशरीर को क्षुब्ध करता है एवं संस्कार सम्बन्धी वैपम्य विशेषतः कारण शरीर के क्षोभ का कारण बनता है । तीनों का मूल प्रज्ञापराधमूलक मन ही है । साथ ही में पूर्व कथनानुसार सामान्य रूप से तीनों वैषम्य तीनों पर भी आक्रमण किए बिना नहीं रहते । यही कारण है कि, भारतवर्ष के परम वैज्ञानिक प्राणाचार्यों ने प्रकृति के आधार पर ही औषधि का विधान किया है । विज्ञान की चरम सीमा पर पहुंचने का गर्न करने वाला आधुनिक भिषक्समाज ( एलोपैथिक चिकित्सक - डाक्टर ) आज भी इस प्रकृति विज्ञान से कितने ही अंशों में अपरिचित है, यह कहने में कोई आपत्ति न होगी । उदाहरण के लिए कुछ एक बातें वर्त्तमान चिकित्सा पद्धति में ऐसी मिलती हैं, जो " अ घेरे नगरी झबूझ राजा, टर्क सेर भाजी, टर्क सेर खाजा " वाली किवदन्ती को सर्वात्मना चरितार्थ कर रही हैं । नेत्र रोगों के सम्बन्ध में डाक्टर लोग विशेषतः कॉस्टिक ( Castic ), श्राजिरायल ( Orjiriol ), प्रोटागल ( Protargal ), यलो श्राइन्टमेन्ट ( Yellow Ointment ), इन औषधियों को उपयोग में लाते हैं । इन सब में कॉस्टिक महा उग्रऔषधि है । इसके उपयोग की कथा सुनिए । ६ मास के कोमलाङ्ग शिशु पर भी इसीका प्रयोग, ३० वर्ष का युवा भी इसी का कृपापात्र, ६० वर्ष का वृद्ध भी इसीका उपा-सक बनता है । प्रकृति निरीक्षण की कोई ग्रावश्यकता नहीं । ६ मास के बच्चे, जिनके नेत्रगोलक प्रति-[ ३५८ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्म विज्ञानोपनिषत् शय कोमल हैं, २०-३० – ग्रीन ( Green ) के कास्टिक प्रयोग से छटपटा जाते हैं । एक बार के प्रयोग से इनके नेत्रों की प्राकृतिक ज्योति नष्टप्रायः हो जाती है । भविष्य में मिलने वाले चश्मे की सनद इसी सुकुमार अवस्था में प्राप्त हो जाती है, एवं अपने नेत्रों को सदा के लिए वह इन चिकित्सकों के भरोसे छोड़ देता है । यही अवस्था इन्जेक्शन ( Injection ) की है । इनके अन्धाधुन्ध प्रयोग से स्नायुतन्तुओं ( ज्ञानतन्तुयों ) पर कितना बुरा प्रभाव पड़ता है? यह भी मार्मिकों की दृष्टि से तिरोहित नहीं है । निर्बलता को दूर करने वाला कालॅवर प्रायल ( Carliveroil ) प्रसिद्ध है | चाहे उसे हजम करने की शक्ति किसी में हो, अथवा न हो । यह दिव्य बोतलें सदा ही डिस्पेंसरियों ( Dispensary ) की प्रतिष्ठा बढाती हुई सब का समान रूप से ब्राह्वान करती हैं । प्राज के १०० वर्ष पहले, जबकि ' रुद्रबन्धु ' इन संख्यातीत चिकित्सकों का अभाव था, देश में शान्ति थी, देश पूर्ण स्वस्थ था । परन्तु प्राज उस दशा में भी रोग अधिक संख्या में बढ़ते एवं प्रसाध्य होते जा रहे जा रहे हैं, जबकि सर्वत्र कीटाणुओं के समान चिकित्सक व्याप्त हो रहे हैं । उधर हमारे प्राणाचार्य प्रकृति के अनुसार चिकित्सा करते क्या हैं, पुरायुग में करते थे । आज तो अपने ही बुद्धिदोष से औषधिपरिचय विज्ञान शून्य ये वैद्यप्रवर भी उसी रुद्रकोटि में प्रविष्ट होते हुए डाक्टरों से भी कहीं अधिक भयङ्कर सिद्ध हो रहे हैं । ग्रस्तु पुरानी बात पर ही ध्यान रखिए । तत्तद्वर्णं स्वरूपों को लक्ष्य में रखते हुए आयुर्वेद शास्त्री का यह श्रावश्यक कर्तव्य हो जाता है कि, वह उन्हीं औषधियों का प्रयोग करे, जिनके प्रयोग से सूक्ष्म एवं कारणशरीर पर किसी प्रकार का प्रघात हो आज वर्णतत्त्व पर कोई ध्यान नहीं है । यदि न्यूमोनिया है, तो खूब ब्रान्डी ( Brandy ) पिला-इए, केवल स्थूलशरीर का उपकार अपेक्षित है । कारण- सूक्ष्म भाग भले ही मलिन हो जांय । पूर्व में कहा जा चुका है कि रोग का मूल कारण प्रज्ञान मन से होने वाला प्रज्ञापराध ही है । यही कारण है कि स्थूल शरीर सम्बन्धी ज्वरादि रोगों की प्रधानता न मानते हुए भिषग्वरों ने रागादि रोगों को ही मुख्य माना है । जैसा कि निम्नलिखित सूक्ति से स्पष्ट हो जाता है— रागादिरोगान् सततानुषक्तानशेषकायप्रसृतानशेषान् । श्रौत्सुक्यमोहारतिदान् जघान यो पूर्ववैद्याय नमोऽस्तु तस्मै ॥ ( ० हृ ० १ ) हमारे आचार्यों ने उन्ही औषधियों का विधान किया है, जो स्थूलशरीर को स्वस्थ करती हुई— कारण एवं सूक्ष्मशरीर पर किसी प्रकार का श्राधात नहीं करती हैं । जिस प्रकार स्थूलशरीर की चिकित्सा करने वाले श्रायुर्वेदशास्त्र को इतर दोनों शरीरों की रक्षा का ध्यान रखना पड़ता है एवमेव सूक्ष्मशरीर की चिकित्सा करने वाले धर्म्मशास्त्र एवं कारणशरोररूप आत्मा की चिकित्सा करने वाले उपनिषच्छास्त्र एवं वेदान्तशास्त्र को स्थूलशरीर की रक्षा का पूर्ण ध्यान रखना पड़ता है । देश - काल - पात्र - द्रव्य - श्रद्धादि की पूर्ण परीक्षा करके ही धम्र्माज्ञाम्रों का विधान है एवं इसी परिस्थिति के अनुसार अधिकारी के भेद से व्यवस्थित ही आत्मोपासना विहित है । यह है प्राध्यात्मिक दुःख का सक्षिप्त दिग्दर्शन । इस दुःख का चिकित्सक ब्राह्मण वर्ग है । दूसरा आधिभौतिक दुःख है । वन्य हिंस्रक पशुओं का आक्रमण, अन्य शत्रुओं का आक्रमण, मोटर-साईकल - तांगा - बग्घी - श्रादि से आघात, ये सब प्राधिभौतिक आक्रमण हैं । इन सबका चिकित्सास्थान [ ३५६ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिपत् राजदण्ड एवं तत्सम्बन्धी न्यायालय हैं । भूकम्प - विद्युत्पात - अनावृष्टि - प्रतिवृष्टि - भंझावात ( अांधी ) उल्कापात - घोरशीत - घोरगर्मी - प्रकाल - दुष्काल - जनपदविध्वंसिनी ( महामारी ) आदि सब श्राधिदैविक ग्राक्रमण हैं । श्राध्यात्मिक - बाधिभौतिक आक्रमणों का सम्बन्ध व्यक्ति से है अतः इनका शुभाशुभ फल भी व्यक्ति को ही भोगना पड़ता है । परन्तु इस तीसरे श्राक्रमण का सम्बन्ध राष्ट्र से है । जिस राष्ट्र में राजा एवं प्रजा वर्ग पापकर्म में लिप्त हो जाते हैं, वहां का प्रकृति मण्डल क्षुब्ध हो जाता है । क्षुब्ध प्रकृतिमण्डल ही भूकम्पादि श्राक्रमणों का कारण बनता है । यह राष्ट्र के पाप का फल है अतः इसका आक्रमण किसी व्यक्ति विशेष से सम्बन्ध न रखता हुग्रा समूचे राष्ट्र के साथ सम्बन्ध रखता है । इसकी चिकित्सा प्रकृतिरहस्यवेत्ता कर्म्मठ वेदज्ञ ब्राह्मण हैं । वे ही यज्ञकर्म्म द्वारा प्रकृति के कोप को शान्त करने में समर्थ हैं । इसी दुःखत्रयी का निरूपण करते हुए प्राधानिक कहते हैं— दुखत्रयाभिघाताज्जिज्ञासा तदपघातके हेतौ । दृष्टे सापार्था चेन्नैकात्यन्तोऽभावात् ॥ ( सां ० का ० १ ) इन तीनों दुःखो से कम्मत्मिा का विकास अवरुद्ध हो जाता है, वह स्वस्वरूप से आवृत हो जाता है, अतएव इस दुःखत्रयी को हम बन्धत्रयी शब्द से व्यवहृत करने के लिए तय्यार हैं । “ बन्ध ” नाम से प्रसिद्ध घोरघोरतम दुःखमय पाप्मा का यही संक्षिप्त विवेचन है । ५ - कर्म्मविपाक ( १ ) कर्म्मपरिपाक ही कर्म्मविपाक है । इसके फल जाति - प्रायु - भोग भेद से तीन भागों में विभक्त हैं । संस्कारवश जन्म लेने वाला प्राणी संस्कारवश ही जो कर्म्म करता है, कर्म्मविपाकस्वरूपपरिचय प्रज्ञान मन पर उस कृत कर्म का वासना संस्कार खचित हो जाता है । यही संस्कारपुञ्ज इस प्राणी के उत्तर ( आगामी ) जन्म का कारण बनता है । पार्थिव प्रजा से सम्बन्ध रखने वाले प्रकृत में प्रधानरूप से सूर्य्य - चन्द्रमा - पृथिवी, ये तीन विवर्त हैं । पार्थिव प्राणियों के साथ इन्हीं तीनों का घनिष्ठ सम्बन्ध रहता है । ये ही तीनों क्रमशः श्रायु - जाति - भोग की प्रतिष्ठा बनते हैं । पत्रिंशत्सहस्र ( ३६००० ) वृहतीप्रारणात्मक वृहती छन्द ( विष्वृद्वृत्त Equator ) पर प्रतिष्ठित सूर्य्यं ही आत्मस्वरूपसमर्पक प्रायु के अधिष्ठाता हैं, जैसा कि पूर्व के अवस्था पाप्मा में कहा जा चुका है । चान्द्रसोम ही श्रौषधिरूप में परिणत होकर भोग की प्रतिष्ठा बनती है, एवं त्रिवृत्-पञ्चदश- एकविंश - भूपिण्ड भेद से चतुर्द्धाविभक्त पृथिवी ही क्रमश ब्राह्मण - क्षत्रिय - वैश्य - शूद्र प्रधान योनियों की प्रतिष्ठा बनती है । पृथिवी में जितनी योनियाँ हैं, प्रत्येक में उक्त जाति, किंवा वर्णविभाग समानरूप से व्यवस्थित है - " न्यायोऽयं भैरवंणोक्तः पदार्थेष्वखिलेष्वपि " ( श्रष्टाङ्गसंग्रह ) | प्राणी जैसा कर्म्म करता है, तदनुरूप ही इसे जाति मिलती है, तदनुरूप ही आयु एवं भोग मिलते हैं । यही भाग्य है, भागधेय है, विधि का टल विधान है । जाति - श्रायु- भांग ( विवर्त्त ), तीनों उत्पत्ति के साथ ही सम्बन्ध रखते हैं, जैसा कि अभियुक्त कहते हैं— [ ३६० ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रायुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च ६ - श्राशय भोगहेतुः ( २ ) २ – अन्नं भोक्तात्मनः --३ – प्रपदस्थानं - भोक्तात्मनः ४ - शुभाशुभशरीरे भोक्तात्मन: -७- - अपूणत्त्व [ ३६१ ] प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् -प्रभवः --प्रतिष्ठा -योनिः --प्राशयः पञ्चैतानि तु सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः ॥ १ ॥
इन तीनों का विकास तत्तदनुरूप गुण - कम्मों से ही होता है । बिना जाति के जैसे केवल गुणकर्म्म निरर्थक हैं, गुणकर्म्म में जैसे जाति परिवर्तन का सामर्थ्य नहीं है, एवमेव बिना गुणकर्म्म के जाति का भी विकास असम्भव है । ऐसे वर्ण अवर्णतुल्य बनते हुए वर्णब्र ुव ( निन्द्य वर्ण ) ही कहलाते है । वर्णप्रतिष्ठा के लिए प्रकृति ( जाति ) एवं संस्कार ( गुणकर्म्म ), दोनों का समन्वय अपेक्षित है । इसी उभय विज्ञान को लक्ष्य में रखकर वसिष्ठादि महर्षियों ने चातुर्वर्ण्य का – “ प्रकृतिविशिष्टं चातुर्वण्यं संस्कार-विशेषाच्च ” ( वासिष्ठस्मृति: ) - यह लक्षरण किया है । कर्म्मविपाक किवा विपाक नाम के पाप्मा का यही संक्षिप्त निदर्शन है । उपर्युक्त सम्पूर्ण विभूतियाँ एवं सम्पूर्ण पाप्माओं की श्राश्रयभूमि शुभाशुभ शरीर ही है । इसी आयतन में प्रतिष्ठित होकर भोक्तात्मा कर्म्म भोगने में समर्थ होता है । श्रतएव इस शुभाशुभ शरीर को हम " भोग हेतु " मानने के लिए तैयार हैं । सुन्दर स्वस्थ - शोभन श्राकृतियुक्त शरीर शुभशरीर है । अस्वस्थ नाटा - हीनाङ्ग - अतिरिक्ताङ्ग - भीषण प्राकृतियुक्त शरीर अशुभशरीर है । एक मङ्गलमूर्ति है, तो दूसरे अमङ्गलमूर्ति को देखते ही चित में उद्वेग उत्पन्न हो जाता है । शुभ कर्म से शुभ शरीर मिलता है, अशुभ कर्म्म से अशुभ शरीर प्राप्त होता है । " झालोमध्य प्रानखाग्रेभ्यः " के अनुसार भोक्तात्मा लोम नखाग्रों को छोड़कर सर्वाङ्ग शरीर में व्याप्त है । व्याप्ति स्थान को ही प्राशय कहा जाता है । प्रतएव आत्मव्याप्तिस्थानीय भोगहेतुभूत उक्त दोनों शरीरों को श्राशय नाम के पाप्मा कहा जा सकता है । १ -- एक विश - पञ्चदशस्तोम्यप्राणगभिता त्रिवृता पृथिवी भोक्तात्मन ' सातवाँ पाप्मा अपूर्णता है । उक्त सम्पूर्ण पाप्मात्रों की अपेक्षा यह पाप्मा महाबलिष्ट है । ईश्वर एवं जीव में प्रतिबन्ध लगाने वाला, दूसरे शब्दों में ईश्वरांशभूत जीव को ईश्व-अपूर्णत्वस्वरूपपरिचय रता से च्युत करने वाला यही पाप्मा है । स्त्री- पुम्भाव का स्वरूप समर्पक भी यही पाप्मा है । ईश्वरीय पूर्णता विभूति में पूर्णेन्द्ररूप कश्यप प्रजापति का स्वरूप बतलाया गया है । उन दोनों अण्डकटाहों के सौराग्नि प्रधान दृश्य अण्डकटाह से पुरुष का एवं चान्द्र * इस विषय का विशद विवेचन " वेदेषु धर्म्मभेद " नाम के निबन्ध में देखना चाहिए । "
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् सोम प्रधान श्रदृश्य ग्रण्डकटाह से स्त्री का स्वरूप निर्माण होता है । दूसरे शब्दों में पुरुष - स्त्री में आधा-आधा इन्द्रप्राण ही प्रतिष्ठित रहता है । अतएव जीव सृष्टि को " श्रद्धेन्द्रसृष्टि " कहा जाता है । ' वाजश्च मे प्रसवश्च मे ० ' इत्यादि मन्त्र समष्टिरूप अर्द्धन्द्रसूक्त इसी रहस्य का प्रतिपादन करता है । ( देखिये यजुः सं ० १८ अ ० ) । जीव में श्राधे खगोल के मध्य का वृत्त विष्वद्वृत्त नाम से प्रसिद्ध है । यही विषुवत् प्रारण जीव में मेरूदण्ड ( रीढ़ की हड्डी ) रूप से प्रतिष्ठित होता है । प्राधा विषुववृत्त पुरुष में जाता है, प्राधा अदृश्य विषुव स्त्री में आता है । स्त्री पुरुष के समसंमुख होने से ही पूर्ण विषुववृत्त का स्वरूप संगृहीत होता है । दूसरे शब्दो में यों समझिए कि पुरुष प्राधा हैं, इसके अर्द्धभाग की पूर्ति स्त्री से होती है— ' सोऽयमाकाशः पत्न्या पृथ्र्य्यते " । बिना दाम्पत्यभाव के वह पूर्णपुरुषात्मक यज्ञपुरुष के साथ योग करने में असमर्थ है । इस यज्ञाधिकार प्राप्ति के लिए पूर्णतासम्पादक पत्नी सम्बन्ध नितांत अपेक्षित है । विना पत्नी के यज्ञकर्म्म कथमपि सम्पन्न कहीं हो सकता । अतएव ( यज्ञसिद्धि के लिए ही ) एक पुरुष अपनी प्रथम स्त्री के अभाव में अन्य स्त्री के साथ परिणय कर पकता है । यही कारण था कि, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् को ग्रश्वमेघ यज्ञ की सिद्ध के लिए जगन्माता सीता की सुवर्ण प्रतिमा का सम्बन्ध करना पड़ा । सचमुच बिना पत्नी के पुरुष अधूरा है । " एकाकी न रमते तद्द्द्वितीयमैच्छत् पतिश्च पत्नी च " यद् श्रौत सिद्धांत सर्वसम्मत है । अतएव पत्नी को प्रर्द्धाङ्गिनी माना गया है । हमने कितने ही कल्पनारसिकों के श्रीमुख से यह कहते सुना है कि ' ज्योतिषशास्त्र का सिद्धांत एवं गरिणत भाग तो सच्चा है, किन्तु फलितांश सर्वथा निरर्थक है । फलितांश की निस्सारता बताते हुए उक्त महानुभाव कहते हैं कि - " ज्यौतिष के सिद्धांत के अनुसार श्रमुक ग्रहयोग में जो व्यक्ति उत्पन्न हो, उसे जन्म से ब्राह्मण होना चाहिए, उसके गृह का द्वार पूर्व की ओर होना चाहिए, उसका वर्ण कृष्ण होना चाहिए, इत्यादि । हम देखते हैं कि, उसी योग में भूमण्डल में अनेक स्थानों में अनेक प्राणी उत्पन्न होते है । मान लीजिए, पूर्वोक्त योग में एक मनुष्य योरोप में उत्पन्न होता है । आपके उपर्युक्त फलों में से वहाँ एक का भी समन्वय नहीं होता । ऐसी अवस्था में ज्योतिष का फलिताभाग केवल विडम्बना मात्र रह जाता है । " इस विप्रतिपत्ति के सम्बन्ध में हमें केवल यही निवेदन है कि, जिस हेतु को आगे रखकर फलित पर उक्त प्राक्षेप किया जाता है, वह हेतु ही प्रतिष्ठित है । जिस ग्रहयोग में जो व्यक्ति उत्पन्न होता है, वह ग्रहयोग सम्पूर्ण विश्व में केवल उसी के लिए नियत है । दूसरे शब्दों में एक समय में विश्व में एक ही व्यक्ति उत्पन्न होता है । ईश्वरीय पूर्णेन्द्र विभूति प्रकरण में जिस कर्म का स्वरूप बतलाया गया है, उसकी एक नियत केन्द्र बिन्दु बनती है । रेतोधा पिता जब गर्भाशयगत शोणपितरूपा योनि में मातरिश्वा वायु द्वारा रेत का प्रादान करता है, उसी समय शुक्र में केन्द्र बनता हुआ कुर्म्मरस चारों ओर से आने लगता है । यही कूर्म्मरस गर्भपुष्टि का कारण बनता है । इस स्थिति में इस गर्भ की जैसी ग्रह-संस्था रहती है, खगोल में तदनुरूप ही इसके अशों का लम्बन होता है । भुवनकोश ( भूवृत्त ) में भी ३६० भ्रंश हैं, एवं ग्रहप्रतिष्ठा भूत ज्योतिष्चक्र ( खगोल ) में भी ३६० ही अंश हैं । भूपिण्ड की अपेक्षा कई सहस्र गुणित बृहत्सूर्य्य खगोल के जिस एक छोटे से कोरण में समा रहा है, उस खगोल की महत्ता का अनुमान लगाकर इसके ग्रंशों की व्याप्ति को लक्ष्य में रखिए । इस खगोलीय महावृत्त के ३६० अंशों के साथ भूगोलीय ३६० अंशों का समन्वय होता है । भूपिण्ड पर जो अंश एक अङ्ग ुलमात्र का व्यवधान [ ३६२ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्म विज्ञानोपनिषत् रखे है, खगोल में वही अन्तर उससे कई सहस्रगुणित हो जाता है, यह मान लेने में कोई आपत्ति नहीं की जा सकती कि - " एक काल में एक क्षरण में एक ही माता के गर्भ से उत्पन्न होने वाली यमज सन्तानों की भी ग्रह संस्थाओं में बड़ा अन्तर है । " जब वह संस्था ही व्यक्तिभेद से भिन्न है तो फलसाम्य कैसे संभव है । सुतरां फलित सम्बन्धी पूर्व प्रक्षेप एकान्ततः उच्छिन्न हो जाता है । अस्तु प्रकृत में यही कहना है कि, जीव श्रद्धेन्द्र होने से अपूर्ण है अपूर्णता अल्पता है अल्पता ही दुःख की प्रावास भूमि है अपूर्णता रूप इस सातवें पाप्मा का यही संक्षिप्त विवरण है । ८- ससारः पूर्वोक्त सातों पाप्माओं का एक मात्र फल है - संसार समुद्र में योनियों में गमनागमन । जब तक संसार ( गमनागमन ) स्वरूपपरिचय सम्बन्ध रहता है, तब तक इसे भोक्तात्या का इतस्ततः विविध इसके साथ उपर्युक्त पाप्माओं का संसार चक्र में घूमना पड़ता है । यही आठवां पाप्मा है । इस पाप्मा से छुटकारा पाने के लिए पहले सात पाप्मानों से निस्तार पाना आवश्यक है । बन्धपर्य्याय, मुक्तपर्थ्याय, नाम के दो पर्य्यायों का भी इसी संसाररूप पाप्मा में अन्तर्भाव है । --ये आठों ही पाप्मा प्रज्ञापराधमूलक बनते हुए जीवात्मा की स्वतन्त्र ( अपनी ) कमाई है । ईश्वर में इन पापों का आत्यन्तिक प्रभाव है । इस सम्बन्ध में यह प्रश्न उपस्थित होता है कि " जोव ईश्वर का अंश माना गया है । साथ ही में ईश्वर में उक्त पाप्मानों का प्रभाव है । इसके साथ हो ईश्वर की व्याप कता भी सत्तासिद्ध पदार्थ है । फिर यह पाप्मधर्म जीवसंस्था में कहां से आए? इसी प्रश्न का समाधान करते हुए महर्षि क कहते हैं । यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति । एवं धर्मान् पृथक् पश्यंस्तानेवानु विधावति ॥ ( कठोपनिषत् ४।१४ ) भूतल पर एक बड़ा पर्वत है, पर्धेत पर एक दुर्ग ( किला ) है, दुर्ग पर आकाश से दृष्टि होती है । मेवस्थ बुद्ध जल दुर्ग पर प्राते हो पर्वतकन्दराओं में भाता हुधा खण्ड खण्ड रूप में परिणत होता हुआ, दुर्ग एवं पर्वत की मलिनता से मलिन हो जाता है । यही अवस्था यहां है वे ही ईश्वरीय गुण शरीररूप भूपिण्ड पर प्रतिष्ठित प्रज्ञानरूप दुर्ग में साकर पर्वत स्थानीय किंवा पर्वतावयवस्थानीय जीवसंस्था में ग्राकर प्रज्ञापराधरूप मल - भाग से युक्त होते हुए पाप्मारूप में परिणत हो जाते हैं । ईश्वरवत् जीव भी सर्व विशुद्ध है, ईश्वरीब जो गुण जीव में पाते हैं, वे भी विभूतिरूप ही है परन्तु प्रज्ञापराध की कृपा से ही गुण दोषरूप में परिणत हो जाते हैं । " गुणा गुरणक्षेषु गुणा भवन्ति, ते निर्गुणं प्राप्य भवन्ति दोषाः । " दो स्वतन्त्र पदार्थों में जो गुण, अथवा दोष नहीं देखे जाते, दोनों के समन्वय के वैचिश्य से वहाँ गुण - दोष का उदय हो जाता है । [ 14 ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिपत् इस प्रकार ७ विभूति, ८ पाप्मा, मन - बुद्धि, इन सत्रह सामग्रियों को लेकर ही भोक्तायात्री यात्रा के लिए इस धरातल पर अवतीर्ण होता है । सात विशेष विभूतियों के प्रवान्तर भेद ४० हैं एवं आठ पाप्माओ के अवान्तर भेद ३६ हैं । सभूय ७६ कलाएँ हो जाती हैं । इनके अतिरिक्त २३१ सामान्यविभू-तिलानों का सम्बन्ध यहाँ ईश्वरवत् विद्यमान है । इनके अतिरिक्त ज्ञान - क्रिया- शब्द- श्वास- प्रकाश जल- श्रन्न, ये सात अन्न और हो जाते हैं । इन सातों अन्नों का कर्म्मविपाक नाम के पाप्मा में ही अन्तर्भाव मान लिया जाता है, संभूय जीवसंस्था में ३७ ९ कलानों की सत्ता सिद्ध हो जाती है, जैसा कि आगे की तालिकामों से स्पष्ट हो जाता है । ईश्वर प्रजापति पूर्णेन्द्र होता हुआ पूर्णपद है । अतएव " ग्रह - भ्रम् " इस स्थिति में ग्रह का आकार पद का अन्त भाग बनता हुआ उत्व का भागी बन जाता है- ' प्र - उ - प्रम् ' यह स्थिति होजाती है । गुण - पूर्वरूप से " ओोम् ” शब्द निष्पन्न हो जाता है । ईश्वर की उपनिषत् यही श्रोङ्कार है - " तस्योपनिष-दोमिति । " उधर जीवप्रजापति श्रद्धेन्द्र रहता हुम्रा पूर्णपद कोटि से बहिष्कृत रहता हुआ अपद है । जीब सम्वन्धी ‘ ग्रह, –श्रम् ” इस स्थिति का ग्रह का हकार अपद जीव का अन्त भाग बनता हुआ अपदान्त है । अतएव यह उत्व भाव से वञ्चित रहता हुआ " ओम् " न बन कर ' महम् ' ही रह जाता है । " तस्योपनि-मिति " इस श्री सिद्धान्त के अनुसार जीबात्मा की उपनिषत् " अहङ्कार " ही है । जब तक अहङ्कार है, तभी तक जीव है । जिस दिन इसका ग्रहङ्कार नष्ट होजाता है, उस दिन पूर्णपदभाव को प्राप्त होता हुआ यह पूर्णेश्वर में विलीन हो जाता है— यथोदकं शुद्ध शुद्धमासिक्तं तागेव भवति । एवं विजानत आत्मा भवति गौतम ॥ ( कठ ० ४।१५ ) यह है जीवेश्वर - प्रपञ्च का संक्षिप्त दिग्दर्शन । हमें प्राशा ही नही, प्रत्युत दृढ़ विश्वास है कि, इस आत्मोपनिषत् के सम्यक् परिशीलन से आत्मविपयिणी जिज्ञासः सर्वात्मना शान्त हो जायगी एवं आत्मस्वरूप को न जानने के कारण श्राद्ध के सम्बन्ध में जो शङ्काएँ उपस्थित होती हैं, उनका भी समूलोच्छेद हो जायगा । प्रकरणोपसंहार १ – पिपासासे शांकमोहौ जराव्याधी, इति षट्-२ – जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तयो मोहमूर्च्छामृत्यवः - इति षट्-३ - प्रविद्यास्मितारागद्वेषाभिनंवेशाः - इति पञ्च-४ – अध्यात्माचि भूताधिदैवतभेदन त्रयो--- ऊम्मय: ---अवस्था; -क्लेशा: --arent: ५ – जात्यायुर्भोगाः, सप्तान्नानि चेति - दश ६ – शुभाशुभी भोग हेतु दो ---कर्म विपाका: --प्रारायी. १० २ [ ३६४ ]
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-: देवसत्यात्मकलापरिलेख श्रर्द्धमात्रा --श्रमृतम् सामान्य श्रात्मा प्राणाः पशवः श्रकारः उकारः मकारः विभूतयः विभूयः विशेष पाप्मानः ४० ३३ २३१ १ परात्परः श्रव्ययः ब्रह्माक्षरः : प्राण अव्यक्तात्मा प्राणो | वाक्-आकाशः १० १६ २८ ३७ ४६ ४७ ६४ - ऋषयः १२ - ४ : विद्या - १ ६-ऊम्मयः १-परात्परः श्रव्ययः आपः विष्णुरक्षरः बज्ञात्मा प्राणी रमि- ४८ वायुः - पितरः ८ २ २ ११ २० २६ ३८ १-: काम २-६-: अवस्था २-II ६५ श्रसुराः ६६-परात्परः अव्ययः इन्द्रोऽक्षरः : वाकू विज्ञानात्मा प्राणी धिषणा तेजः देवाः ३३-६-कम्र्माणि - ३ - ५ : -क्लेशा ३ ३ १२ २१ ३० ३६ ५१ ५० ६६ मनवः ४-परात्परः श्रव्ययः ४ ४ १३ २२ सोमोऽक्षरः ग्रन्नम् गर्भितो प्रज्ञान प्रज्ञा-प्राणी श्रापः गन्धर्वाः -२७ ३१ ४० महानात्मा - २ -- शुक्रे ४ ३.-: बन्धा ४-५२ ५३ ६७ -ग्रहाः ४० परात्परः श्रव्ययः १ ५ १८ २३ इन्द्रोऽक्षर | प्रज्ञात्मा | त्राणान्नाद चित्-प्राणी संस्-भावनः ३२ ४१ ५४ - १० : विपाका ५-१७ -: प्राणा ५-५५ ६८ कारः परात्परः . ६ १५ प्राणान्नाद २४ वायुरक्षरः श्रव्ययः तेजसात्मा प्राणौ ३३ ४२ ५७ वायु- ५६ ६६ क्रियासंस्कारः पशवः -५ ज्ञाने०-५ ६-२-श्राशय ६-परात्परः अव्ययः प्राणान्नाद अग्निरक्षरः प्राणौ श्रग्नि-वैश्वानात्मा ३ ७ १६ २५ ३४ ४३ ५६ ४८ ७० कारः वासनासंस् -१ अपूर्णत्वम् ७-अपूर्णत्वम् ७-परात्परः १७ अव्ययः वायुरन्नादः : युरक्षर २६ भूवा ३५ ४४ हसात्मा ६१ प्राणी वायु- ६० ७१ भूतरसः पय्र्यायाः -कीटाणवः ४० चत्वारिंशत् परात्परः ६ १८ श्रव्ययः . भूतान्नाद : मूतोग्निरक्षर २७ ६२ प्राणौ भूत- ६२ | ४५ ) भूतात्मा शरीरम् ( ७२भोक्ता तयः श्रौषधिवनस्प देवसत्यात्मा-श्रहङ्कारमूत्तिरयं -. कलात्मक ३६ ३७६-३६ पत्रिशत् ब्रह्मा - स देव सत्यागर्मी → त्यात्मा
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श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् ७ स्त्रीपुरुषाभ्यामात्मनो द्विधाभावात्-८ --- संसारः — बन्धपर्य्यायः, मुक्तपर्य्यायः - इति त्रयः -- प्रपूर्णत्वम्--१ - पर्याया: ---- -३ ८- पाप्मान: -मात्मकलाविभागाः सामान्य विभूतिकलाविभागाः विशेष बिमतिकलाविभागाः-पाप्मकलाविभागाः -७२ - २३१ ४० --३६ , पाप्मान: षट्त्रिंशत् - ३६ संभूय जीव संस्थायां-३७६ कलाः । इत्यात्मविज्ञानोपनिषदि प्रथमायां-प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् - षष्ठी समाप्ता समाप्तश्चायं श्राद्धविज्ञाने प्रथमखण्डः ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!! [ ३६६ ]