Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 381–390
आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 381–390
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श्राद्धविज्ञानं प्रथम खण्डे प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् यात्री यात्रा करने एकाकी नहीं जाता, अपितु यात्रोपयोगी अनेक उपकरणों को साथ लेकर खाने पीने की सामग्री ( पाथेय ) जुटा कर, सब प्रकार का प्रबन्ध करके ही यात्रा करने निकलता है । जीवयात्री का भौतिक शरीर रथ है । ज्ञान कम्र्मेन्द्रियाँ चपल घोड़े हैं । प्रज्ञान मन प्रग्रह ( लगाम ) है । बुद्धि सारथि है । भावना वासनात्मक संस्काररूप कर्म्म फल खाने पीने की सामग्री है । इस यात्री का बुद्धिरूप सारथी आदि सावधान रहता है, तो वह सारथी मनोरूप लगाम से इन्द्रिय रूप अश्वों को उत्पथ नहीं जाने देता, अपितु सावधानी के साथ यात्री को ठीक लक्ष्य स्थान पर पहुँचा देता है । यदि सारथी असावधानी कर बैठता है, तो उसके हाथ से लगाम ( मन ) छूट जाती है, घोड़े बिगड़ जाते हैं, रथ टूट जाता है, यात्री क्षत विक्षत होता हुआ पथभ्रष्ट हो जाता है । ऐसी अवस्था में यात्री का सब से प्रधान एवं प्रथम आवश्यक कर्तव्य होना चाहिए कि वह सदा अपने बुद्धिरूप सारथी के हाथ में मनोरूप लगाम को सौंपे रहे । यदि जीबात्मा का कर्म्म बुद्धिपूर्वक होता है, तो वह कभी बन्धन में नहीं पड़ता, कभी पथभ्रष्ट नहीं होता । यही कर्म्म बुद्धियोग है । इस में मन बुद्धि के वश में रहता है । यदि कर्म्म मनःप्रधान बन जाता है, तो बुद्धि निर्बल हो जाती है । आत्मा का मन के साथ योग हो जाता है । ऐसा यात्री कभी लक्ष्य पर नहीं पहुँच सकता ऐसे जीव की क्या परिस्थिति होती है? इस प्रश्न का समाधान करते हुए
भगवान् कहते हैं-नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥
इस निदर्शन से प्रकृत में हमें यही बतलाया है कि, मन - बुद्धि - इन्द्रियाँ: प्रधान रूप से भोग साधन हैं । भोक्ता जीव पशुपति है, भोगसाधनभूत मन - बुद्धि - इन्द्रियाँ प्राणस्थानीय जीवात्मा की विभूतियाँ होने से पाश है एवं इस पाश द्वारा भोक्ता जिन ऐहलौकिक पारलौकिक भोगों का भोग करता है, वे सब भोग्य विवर्त्त पशु है । भोगरूप पशु ( सांसारिक विषय ) बन्धन के कारण नहीं है, अपितु पाप्मा बन्धन के कारण है ईश्वर भी सम्पूर्ण विश्व एवं विश्व प्रजा का भोग करता है, परन्तु विभूति द्वारा जीव भी यदि विभूति को प्रधान बना कर ही भोग करता है, तो वह भी ईश्वरवत् कभी बन्धन में नही पड़ सकता । अब देखना यह है कि, जिन विभूतियों से जीव भोगरत रहता हुआ भी निर्लिप्त रहता है, वे विभूतियाँ कौनसी हैं? एवं जिन पाप्माओं के कारण यह बद्ध हो जाता है, वे पाप्मा कौन से हैं? ईश्वरसंस्था में ७२ आत्मकलाओं से अतिरिक्त २३१ तो सामान्य विभूतियाँ बतलाई गई है, एवं ५१ विशेष विभूतियाँ बतलाई हैं । वहीं यह भी कहा गया है कि २३१ सामान्य विभूतियाँ जीवेश्वर में समान है । अतः उन का पिष्टपेषण करने की प्रकृत जीव प्रकरण में कोई ग्रावश्यकता नहीं हैं । शेष ५१ विशेष विभूतियों के संस्थान में ग्रन्तर है, वह भी कहीं - कहीं । सूचीकटाहन्याय से पहले इन विशेष विभू-तियों का ही दिग्दर्शन करा दिया जाता है । जीव में प्रधान रूप से विद्या, काम, कर्म्म, शुक्र, प्रारण - ज्ञानेन्द्रिय- कम्र्मेन्द्रिय, ये सात विभूतियाँ हैं । सातों में से पहले विद्याविभूति को ही लीजिए । इस के जन्म काल से ही सूर्ख द्वारा जो धिषणा-[ ३४७ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्म विज्ञानोपनिषत् भाग अन्तर्य्याम सम्बन्ध से प्रतिष्ठित रहता है, वही इस की विद्याविभूति है । इस के धर्म्म - ज्ञान - वैराग्य-ऐश्वर्य, ये चार विवर्त्त हैं, जैसा कि ईश्वरीय विद्याविभूति प्रकरण से बतलाया जा चुका | यदि निष्काम-भाव है, तब तो यह विद्या चतुष्टयी बन्धविमोक का कारण बनती हुई विभूति है, सकामभाव में यही श्रविद्या से आवृत होकर अन्तर्हित हो जाती है । उस अवस्था में जीवात्मा अपनी इस विद्याविभूति को खो बैठता है । दूसरी है काम नाम की महाविभूति । बुद्धिपूर्विका उत्थिताकांक्षा ही काम विभूति है । ईश्वरात्मा में यह विभूति अव्यय मन से सम्बन्ध रखती थी एवं जीवसंस्था में इस कामविभूति का चान्द्र प्रज्ञान ( सर्वे -न्द्रिय मन ) से सम्बन्ध है । यही विशेषता है । यदि इस मन की कामना बुद्धिपूर्विका है, तब तो यह प्रबन्धन का कारण बनती हुई कामरूपा विभूति है । यदि बुद्धि का प्राधान्य नहीं है, तो ऐसी दशा में वह कामविभूति पथ से च्युत होता हुआ ' इच्छा ' रूप पाप्मभाव में परिणत हो जाता है, जैसा कि कामविभूति प्रकरण में विस्तार से बतलाया जा चुका है । तीसरी विभूतिकर्म्म हे । इसका उदय सूर्थ्य के प्राण भाग से होता है । तीन कर्म्म सौर हैं, तीन पार्थिव हैं । ६ प्रों निष्काम भावों में विभूति हैं, सकाम भाव में ये ही पाप्मा हैं | चौथी विभूति शुक्र । इसके सम्बन्ध में विशेष वक्तव्य है । ऐहिक - प्रामुष्मिक, भेद से कर्म्मक-लादो भागों में विभक्त है । वाणिज्य राज्य सेवा - शिल्प - कला - संगीत, प्रादि सांसारिक कर्म्म ऐहिक कर्म्म हैं । यज्ञ - तप - दान- इष्ट - प्रापूर्त - दत्तादि श्रामुष्मिक हैं । एक का फल प्रत्यक्ष दृष्ट है, दूसरे विभाग का फल श्रुति सिद्ध मात्र होने से प्रानुभविक है । ऐहिक कर्मों का फल हमें इसी लोक में मिल जाता है । हम इन कम्मों का फल इसी शरीर से यहीं देख लेते हैं । श्रतएव प्राधानिक दर्शन ने इन लौकिक कर्मों के फल को " दृष्ट " नाम से व्यहृत किया है । परन्तु — " ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत " इत्यादि शास्त्रीय अनुशासनों से सम्बन्ध रखने वाले पारलौकिक कम्र्मों का फल इस शरीर से न मिलकर परलोक में मिलता है | वह फल केवल सुना हुआ है, चर्म्म चक्षुत्रों के परे की वस्तु है । अतएव उक्त दर्शन में यह श्रानुश्रविक ( सुना हुआ ) नाम से सम्बोधित हुआ है । केवल श्रुतिवचन को सुनकर उसी पर विश्वास कर के स्वर्गादि सुख साधक कम्र्म्मो में हम प्रवृत्त हो जाते हैं । इन दोनों प्रकार के कम्मों का मूल है भावना - वासना संस्-कार । आत्मा ज्ञान कर्म्ममय है । ' ज्ञायते, अथ च किञ्चित् क्रियते " के अतिरिक्त हमारे समीप अन्य तोसरी सम्पत्ति का अभाव है । इनमें से ज्ञान द्वारा ग्रात्मा पर ( प्रज्ञान मन ) से अनुग्रहित मर्म्मात्मा पर उसमें भी विशेषतः प्राज्ञ भाग पर जो ज्ञानीय संस्कार होता हैं, वही भावना नाम से प्रसिद्ध है, एवं कर्म्म-जनित संस्कार वासना नाम से व्यवहृत हुआ है । भावना वासना संस्कार की चिति ( समूह ) ही विज्ञान भाषा में " बोर्जाचति ” नाम से प्रसिद्ध है । यही बीज चिति जन्म - मृत्यु की मूल प्रतिष्ठा है । इन दोनों चितियों में भी कर्म्ममयी बीजचिति ही प्रधान है । यह कर्म्म ग्रात्मा में प्रक्रम, श्रभिक्रम रूप से प्रतिष्ठित रहता है । एक एक कर्म प्रक्रम है, कर्म्म सन्तान अभिक्रम है । उदाहरणार्थ पाककर्म को लीजिए । चूल्हा-इंधन- दीपशलाका - फूत्कार - स्थाली- चढ़ाना, यादि पाक - कर्म्म के साधक अवान्तर सब कर्म्म ( प्रत्येक ) एक-एकस्वतन्त्र प्रक्रम है । इन अनेक प्रक्रम कम्र्मों से पाक कर्म्मरूप एक अभिक्रम कर्म का स्वरूप निष्पन्न होता है । जैमिनी दर्शन के अनुसार ऋत्वर्थ कर्म्म प्रक्रम है, पुरुषार्थ कर्म्म अभिक्रम है । अनेक ऋत्त्वर्थ कर्मों से एक पुरुषार्थ का स्वरूप निष्पन्न होता है | चौपाटी के मैदान से हम विक्टोरिया गार्डन जाते हैं । एक [ ३४८ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड श्रात्मभिज्ञानोपनिषत् पैर उठाते हैं, दूसरा आगे घरते हैं । इनमें एक एक पाद विन्यास ( पांवडा ) एक - एक प्रत्रम है, ऐसे ऐसे अनेक प्रक्रम मिलकर गतिरुष एक अभिक्रम रूपा महार्गात का स्वरूप निष्पन्न होता है । इसी महागति के प्राधार पर — " हम ग्राज विक्टोरिया गार्डन गये थे " ये अक्षर निकलते हैं । इसी प्रकार भोजन - शयन-पान- पठन - पाठन, आदि प्रत्येक कर्म्म को प्रक्रम अभिक्रम रूप दो दो अवस्थाओं से प्राक्रांत समझना चाहिए । अनेक प्रक्रम गर्भित ऐसे अनेक प्रभिक्रम कम्मं वासनारूप से प्रारमपरातल पर प्रतिष्ठित रहते हैं । इन सव अभिक्रम कम्मों की समष्टि को कम्ह " कहा जाता है । निर्ऋत किल्विए बारमा प्रागत एवं श्रतीत कम्मों से मुक्त हो सकता है । दूसरे शब्दों में बुद्धियोगानुवायी श्रात्मा ज्ञानाग्नि के प्रभाव से सञ्चित कम्मों को जलाकर, आगन्तुक कम्र्म्मसंस्कारों का द्वार अवरुद्ध कर विदेह मुक्ति का प्रमिष्ठाता बन सकता है । परन्तु जो अभिक्रम कम्म चल पड़ा है, उसका तब तक क्षय असम्भव है जब तक कि तद्गत सम्पूर्ण प्रक्रम कम्मों का भोग समाप्त नहीं हो जाता है । यही कम्मं " प्रारम्भ कर्म " कहलाए हैं- " प्रारम्य-कम्मरणां भोगादेव क्षयः " हो, जो मुक्तात्मा होते है, वे अभिक्रम ( प्रारब्ध ) कम्र्म्म फल भोगते हुए भी तज्जनित प्रत्यवाय, दुःखादि से असंस्पृष्ट रहते हैं । इसी कर्म्म विज्ञान को लक्ष्य में रखकर भगवान् करते हैं-नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥ ( गी ० २०४० ) उपर्युक्त ज्ञान कम्र्म्ममय जिन भावना वासना पंस्कारों को जन्म मृत्यु चक्र का कारण बतलाया गया है, उन दोनों का क्रमशः व्यक्त संसार एवं अव्यक्त प्रकृति से सम्बन्ध है । वासनात्मक कर्म्म व्यक्त संसार की ओर ले जाता है, भावनारूप ज्ञान अव्यक्त प्रकृति की ओर आकर्षित करता है । एक ऐहलौ-किक प्रवृत्ति का कारण है, दूसरा पारलौकिक प्रवृत्ति का हेतु है । दूसरे शब्दों में एक दृष्ट है, दूसरा त्रानु-श्रविक है । परिणाम में दोनों ही दुःख के मूल हैं । यदि अनासक्तिमय निष्काम कर्मरून, बुद्धियोगापर पर्य्यायिक ज्ञानयोग के द्वारा इस वासना भावनात्मक शुक्र को नष्ट कर दिया जाता है, तो प्रात्मा व्यक्त संसार एवं अव्यक्त प्रकृति, दोनों से पृथक् होता हुग्रा उस व्यक्ताव्यक्त से परे रहने वाले अव्यय पुरुष में लीन हो जाता है । इसी रहस्य को लक्ष्य में रखकर सर्वश्री ईश्वरकृष्ण कहते हैं— रष्टवदानुश्रविकः स ह्यविशुद्धक्षयातिशययुक्तः । तद्विपरीतः श्रेयान् व्यक्ताव्यक्तज्ञविज्ञानात् ॥ ( सांख्यकारिका २ कहना यह है कि, दृष्ट एवं श्रानुश्रविक फल से सम्बन्ध रखने वाले, ऐहिकामुष्मिक भावना वासना-रूप विषयसंस्कार ही जीवात्मा के पुनः पुनः होने वाले जन्म मृत्यु के कारण हैं । इस उपादान कारण के सम्बन्ध से ही इस संस्कार पुञ्ज को " शुक्र " कहा जाता है । पृथिवी का भूत भाग, दूसरे शब्दों में पार्थिव भौतिक संपत्ति ही वासना का कारण है । अतः हम इस शुक्रविभूति को पार्थिव विभूति मानने के लिए तैय्यार है । इतर सम्पूर्ण विभूतियों की मूल प्रतिष्ठा [ ३४ ९ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् यही शुक्रविभूति ही काम की जननी है । इस के बिना जन्म नही, जन्म के बिना इतर विभूतियों का उदय असंभव । इस शुक्रविभूति के साथ ऊष्मा का भी सम्बन्ध रहता है । शुक्र को पार्थिव कहा गया है । उधर पृथिवी में रहने वाला अग्नि चित्य - चितेनिधेय भेद से दो भागों में विभक्त है । चित्याग्नि भूत है, चितेनि-यानि प्राण है, यही ऊष्मा है । भूत भाग वासना का जनक है, प्राणभाग ऊष्मा का प्रभव है । दोनों परस्पर में नित्यसम्बद्ध हैं । इन दोनों में प्रधानता ऊष्मा भाग की ही है । जब तक शरीर में गर्मी प्रतिष्ठित रहती है, तभी तक शुक्र स्वस्वरूप से प्रतिष्ठत रहता है । जिस समय ऊष्मा उत्क्रान्त हो जाती है, उस के श्रव्यवहितोत्तरकाल में ही यह शुक्र भी जन्मान्तर का कारण बनने के लिए शरीर से उत्क्रान्त हो जाता है । “ शुक्र ” ग्रग्नि भाव है । यही ताप - रूप शोक का जनक है । तन्मय शुक्र भी जन्म मृत्युरूप शोकार्णव का ही प्रवर्त्तक है । जब तक शुक्र है, तभी तक जीव जीव है । चूंकि शुक्र के आधार पर ही जीव का स्वरूप प्रतिष्ठित रहता है, श्रतएव इस के दुःख मूल होने पर भी ( जीवापेक्षया ) इसे विभूति मान लिया गया है । जो विद्वान् निष्काम भाव से ग्रात्मदेव की उपासना करते हैं, वे ही इस संस्काररूपा शुक्र-द्वयी का प्रतिक्रमण कर मुक्त होने का अधिकार प्राप्त करने में समर्थ होते हैं - " उपासते पुरुषं ये हाका-मास्ते शुक्रमेतदतिवर्त्तन्ति धीराः " । पाँचवीं विभूति प्राण है । इस के ७ - सौरगुहाप्रारण ५- ब्रह्मप्रारण ५ – देवप्रारण भेद से १७ विवर्त्त हैं, जिनका कि स्वरूप परिचय ईश्वरीय प्राण विभूति निरूपणावसर में कराया जा चुका है । इन में से गुहाप्राणात्मक साकञ्जप्रारण शरीर की चारों गुहात्रों में समान क्रम से प्रतिष्ठित हो रहे हैं । अध्यात्म में इन के २८ विभागों का स्पष्ट विकास है । अतः यहाँ सात के स्थान में ( संख्याक्रम के अनुसार ) हम २८ गुहा प्रारण मानेंगे | परोरजा - वारुणादि पाँच ब्रह्मप्रारण हैं, प्रारणोदानादि पाँच देवप्रारण है । संभूय ३८ प्राण हो जाते हैं । गुहाप्राणचतुष्टयी का संस्थान क्रम देखिये- दो प्राण दोनों श्रोत्र विवरों में, दो प्राण दोनों नासा विवरों में, दो प्रारण दोनों चक्षुर्गोलकों में, एक मुख में प्रतिष्ठित है । सातों में ६ सयुक् हैं, जोड़ हैं, सातवाँ मुख्य स्थानीय प्राण एकाकी है । यह सप्तक शिरोगुहा का संचालक है । दो हाथ, दो स्तन, दो फुफ्फुस, हृदय, इन सातों में दूसरा सप्तक प्रतिष्ठित है । यह सप्तक उरोगुहा का सञ्चालक है । यकृत ( जिगर ), प्लीहा ( तिल्ली ), दो क्लोम, दो वृक्क, नाभि, इन सातों में तीसरा सप्तक प्रतिष्ठित है । यही उदरगुहा का सञ्चालक है । दोश्रोणी, मूत्र रेतसी, दो अण्ड, गुद, इन सातों में चौथा सप्तक प्रति-ष्ठित है । बस्तिगुहा का सञ्चालक है । ६-७ वीं विभुति ज्ञान - कर्मेन्द्रियाँ हैं । स्वायम्भुव - पारमेष्ठ्य - सौर- पार्थिव प्राणतत्त्व क्रमशः चित्-प्राण, रयि - प्राण, धिषणा प्राण, भूत - प्राण, इन नामों से प्रसिद्ध हैं । एवमेव चान्द्र प्राण प्रज्ञा - प्रारण भेद से दो भागों में विभक्त है । प्रज्ञा भाग सोम के कारण ज्ञानप्रधान है । प्राण भाग क्रियाप्रधान है | ज्ञान-क्रियामय प्रज्ञा - प्राणात्मक चान्द्ररस श्रौषधियों में प्रतिष्ठित होता है । औषधियाँ पार्थिव भूत से उत्पन्न हुई । फलतः ग्रौपधियों में प्रज्ञा - प्राणात्मक चान्द्र रस एवं पार्थिव भूत भाग की सत्ता सिद्ध हो जाती है । एतल्लक्षण पधिरूप अन्न शरीराग्नि में ग्राहुत होकर रस - मूल के क्रमिक विशकलन से क्रमश: रस- असृक् मांस - मेद प्रस्थि - मज्जा - शुक्र - प्रोज - धातुनों में परिणित होता हुआ अन्ततः अपने विशुद्ध रूप से " मनो " रूप में परिणित होता है । इस प्रकार प्रज्ञा प्राण - भूतमय अन्न से उत्पन्न इस मनमें भी इन तीनों कलाओं की [ ३५० ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् सत्ता सिद्ध हो जाती है । इन तीनों में से पार्थिव भूत भाग नाम, गन्ध, रूप, शब्द, धन्नरस, कर्म्म, सुख-दु: ख, श्रानन्द रति प्रजापति, इच्छा, घी - भेद से दस भागों में विभक्त है । दूसरे शब्दों में भूत मात्रा १० । इन के सम्बन्ध से ही प्रज्ञा - प्राणात्मक गन को भी अर्करूप से १० भागों में विभक्त हो जाना पड़ता है । उक्त दसों भूतमात्राओं में से गन्ध - रूप - रस- शब्द- घी- सुख दुःख, इन पांच मात्रात्रों का प्रज्ञा भाग से सम्बन्ध है, शेष कर्म्मप्रधान हैं । ज्ञानप्रधान भाग ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, कम्र्म्मप्रधान भाग कम्र्मेन्द्रियाँ हैं । श्रोत्र त्वक् - चक्षुः - जिह्वा - प्रारण, ये ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, वाक् - पाणि - पाद- पायु - उपस्य ये पांच कर्मेन्द्रियाँ हैं । प्रज्ञाभाग प्राण में ओत है, प्राणभाग प्रज्ञा में प्रोत है । इसी तादाम्यभाव को लक्ष्य में रखकर महर्षि कौषीतकि कहते हैं-" यो वै प्रारणः सा प्रज्ञा, या वा प्रज्ञा स प्रारणः । या वै प्रज्ञा स प्राणः, यः प्राणः सा प्रज्ञा । स ह ह्य ेतावस्मिन् शरीरे वसत सहोत्क्रामतः ॥ ” ( कौ ० उप ० २।३ ) । इससे बतलाना यही है कि प्रज्ञाप्रधान ज्ञानेन्द्रियों में भी प्राणमात्रा है एवं प्राणप्रधान कर्मेन्द्रियों में भी प्रज्ञामात्रा है । अतएव ज्ञानेन्द्रियों में भी क्रियाभाव प्रतीत होता है एवं कम्र्मेन्द्रियों में भी ज्ञान का आभास होता है । वस्तुतस्तु भूतमात्रा – रूप — रसगन्धस्पर्श – शब्द, भेद से पांच ही भागों में विभक्त है । यही प्रज्ञा - प्राण युक्त होकर १० भागों में विभक्त हो जाती हैं । पांच प्रज्ञा मात्राएँ ज्ञाने-न्द्रियों की प्रतिष्ठा हैं, पांच प्राणमात्राएँ कम्र्मेन्द्रियों की प्रतिष्ठा है । यह इन्द्रियविभूति प्रज्ञा प्राणात्मक प्रज्ञान मन से सम्बन्ध रखती हुई परम्परया चन्द्रमा से सम्बन्ध रखने के कारण चान्द्रविभूति कहलाती है । प्रज्ञान इन्द्र के सम्बन्ध से ही इन दसों विवतों को " इन्द्रिय " शब्द से व्यवहृत किया जाता है । जीवात्मा की इन सातों विभूतियों के अवान्तर भेदों का यदि संकलन किया जाता है, तो कुल ४० विभूतियाँ हो जाती है, जैसा कि निम्नलिखित तालिका से स्पष्ट हो जाता है -१ - विद्याविभूति: ( ४ ) - धम्र्मः – ज्ञानम् — वैराग्यम् – ऐश्वर्यम् + सौर विभूति: २ – कामविभूतिः ( १ ) - एक विधः – विषयभेदादनेकविधः → चान्द्रविभूतिः ३ – कर्म्मविभूतिः ( ६ ) – यज्ञः - तपः - दानम् - ( सौरविभूतिः ), इष्टं प्रापूर्त दत्तं पार्थिव विभूतिः ४ - शुक्रविभूतिः ( २ ) – १ – भावना, २ वासना पार्थिवी विभूतिः ५ - प्राण बिभूति: ( १७ ) पञ्च ब्रह्मत्राणः, पञ्च देवप्राणः सप्त गुहात्राणाः श्रात्मविभूतिः — — दैव निमूतिः-६ - ज्ञानेन्द्रियवि ० ( ५ ) — श्रोत्र – त्वक् — चक्षुः – जिह्वा – प्राणः ७ – कर्मेन्द्रियवि ० ( ५ ) – वाक् – पाणि: - पादः – उपस्थम् -पायुः - सूर्य्य विभूति: • चान्द्रविभूतिः [ ३५१ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड ७. + ( ४० ) तदित्थं चत्वारिंशत् प्राणात्म विज्ञानोपनिषत् १ – चतस्रो विद्या: - धर्मः, ज्ञानम्, वैराग्यम्, ऐश्वर्यमिति-२ - मनसः क्रिया कामः --. ३ – पट् कर्माणि – यज्ञतपदानेष्टापूर्तीनि ४ – ऐहिकामुष्मिकयोर्हष्टानुविक योविषयग्रामयोरुपजन हेतुभूते-भावनावासनाभिधेद्व शुक्रे ५ – ब्रह्म — देव – गुाभेदेन ३८ विभक्ताः प्राणाः-..- १७ ६ — श्रोत्र — त्वक् — त्रक्षुः - जिह्वा - प्राणमिति पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि - ५ ७ – वाक् - गणि - पादो - पस्थ - पायवः - इति पञ्च कर्मेन्द्रियाणि –५ चत्वारिंशत् ४० इति जीवविभूतयः R -४ -१ ६ उक्त सात विभूतियों के अतिरिक्त जीवसंस्था में ग्राठ प्रकार के पाप्मा रहते हैं । ये ही पाप्मा भोक्तात्मा के बन्धन के कारण हैं । जीवात्मा की ईश्वरता के दूसरे शब्दों में भोक्ता सुपर्ण के साक्षी सुपर्णभाव में परिणत होने में ये ही पाप्मा प्रतिबन्धक हैं । जीव एवं ईश्वर में व्यवच्छेद डालने वाले ये ही पाप्मा है । इन ग्राठ पाप्माग्री की प्रवान्तर - कलाएँ हो जाती हैं । क्रम- प्राप्त क्रमशः इन्हीं पाप्माओं का दिग्दर्शन कराया जाता है । १ – ऊम्मिः ( ६ ) ऊम्म शब्द का अर्थ है लहर - वीचि तरङ्ग । यह संसार रस बल का समुद्र है । रसरूप समुद्र में बलात्मिका तरङ्ग उच्चावचभाव से इतस्तत: दोलायमान रहती है । इन बम्मिस्वरूप परिचय बल तरङ्गों की ग्रवस्थाविशेष ही क्षुधा ( भूख ) पिपासा ( प्यास ) शोक ( मनो-वेदना ) मोह ( चित्त वैकल्य ) जरा ( बुढ़ापा ) व्याधि ( रोग ), इन, नामों से प्रसिद्ध हैं । भोकात्मा श्रासक्ति कर्म में रत रहता हुआ इन ६ यों ऊम्मियों में से एक न एक से नित्य आक्रान्त रहता है । इन ६ श्रों ऊम्मियों में से सब से प्रधान ऊम्मि क्षुधा है । यह प्रशनाया नाम का महापाप्मा है - " पाप्मा वै श्रशनाया । " जीवात्मा में निरन्तर किसी न किसी की भूख बनी रहती है । एक विषय की क्षुधा शान्त होती है, दूसरी का उदय हो जाता है । यही अवस्था पिपासा की है । [ ३५२ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्म विज्ञानोपनिपत् सांसारिक प्रपत्तियों का ग्राक्रमण सहने में यह असमर्थ है । कारण इसका यही है कि जिस संसार चक्र के गर्भ में जीवात्मा प्रतिष्ठित है, वह इस अध्यात्मसंस्था की अपेक्षा कहीं अधिक बल रखता है । प्रकृति का प्राघात सदा प्रबल होता है । इस को सहने में असमर्थ इसका मन व्याकुल हो पड़ता है । शरीर में मन के क्षोभ से जो एक प्रकार की जलन ( संताप ) होती है, वही " शुक्र " भाव है । शुक्र वृत्ति ही " शोक " किंवा सन्ताप है । यही तीसरी ऊम्म है । यदि यह शोकाग्नि पराकाष्ठा पर पहुंच जाता है, तो मन इस प्रवृद्धतम शोकाग्नि से अभिभूत होता हुआ अपने ज्ञानमय विकास स्वरूप से तिरोहित हो जाता है । उस समय मन को कुछ भी भाव ( ज्ञान ) नहीं होता । सुपुप्ति अवस्था में मन की जो दशा होती है, शोकातिवेग में मन की वही दशा हो जाती है । चक्षुर्द्वार खुले हुए हैं, मन पुरीतति नाड़ी में नहीं है, इसलिए तो इस अवस्था को सुपुप्ति नहीं कहा जा सकता । साथ ही में जाग्रदवस्था में ऐन्द्रियक ज्ञाना-नुभवरूप मन का जो व्यापार होना चाहिए, उसका भी यहां अभाव है, इसलिए इस अवस्था को जाग्रद-वस्था भी नहीं कहा जा सकता । वस्तुतः यह दोनों की मध्यावस्था है । इसमें एक प्रकार की स्तम्भवृत्ति रहती है । जिस वृत्ति के जिए लोकभाषा में " भौचक्का रह गया " " हक्का बक्का रह गया " इत्यादि शब्द प्रयुक्त होते हैं, वही वृत्ति यह मध्यमवृत्ति है । आत्मकल्याणेच्छु को सांसारिक प्रापत्ति से बचने के लिए, संसर्ग दोष से बचने के लिए इसी मध्यम वृत्ति का आश्रय लेना चाहिए- " मध्यां वृत्ति समाश्रयेत् । " दूसरे हमको पागल समझें, मोहग्रस्त समझें, उन्मत्त समझें, अमर्यादित मानते रहें, इसी न हमारा कल्याण है | इसी जड़वृत्ति का दिग्दर्शन कराते हुए अभियुक्त कहते हैं--नापृष्टः कस्यचिद्ब्रूयात् न चान्याये न पृच्छतः । जानन्नपि हि मेधावी जडवल्लोक प्राचरेत् ॥ ऐसा कृत्रिम मोहभाव जहां आत्मशान्ति का कारण है, वहां यह प्राकृतिक शोक समुत्थानमूलक मोह वास्तव में जड़भाव का कारण है । इसमें जाग्रत सुषुप्ति, दोनों ग्रवस्थानों का सम्मिश्रण है । इसी अभिप्राय से भगवान् व्यास ने इसका " मुग्धेऽर्द्ध सम्पत्तिः " ( शा ० सू ० ३।२।१० ) यह लक्षण किया है | गीता विज्ञान के अनुसार ग्रज्ञान से ग्रावृत्त ज्ञान ही मोह है । अर्द्धज्ञान किंवा यत् किञ्चित् ज्ञान ही मोह है | मोह ही भय का मूल कारण है । पूर्ण अज्ञान में भी भय का प्रभाव है — ' ग्रज्ञानं तस्य शरणम् ” पातञ्जल महाभाष्य ० १।१।२ ) एवं पूर्ण ज्ञान भी अभय भूमि है - " विज्ञानं तस्य शरणम् । " भग होता है - प्रर्द्धज्ञान स्वरूप मोह से । यही भयभूलिका मोह नाम की चौथी ऊम्म है । प्रत्येक मनुष्य प्रतिक्षण जीं होता रहता है । ग्रायु के २५ वर्ष पर्यन्त शरीरायव पुष्ट होते हैं । ५० वर्ष पर्य्यन्त समान रूप से रहते हैं । ५० के अनन्तर विक्षेपण धर्मा इन्द्र के प्रबल हो जाने से अधिक मात्रा से शारीर मात्राओं के निकल जाने से शरीरावयव क्रमशः शिथिल होते जाते हैं । यही जराभाव इसकी नित्य मृत्यु कहलाती है । यही जरा नाम की पांचवीं ऊम्मि है । हीनयोग प्रतियोग मिथ्यायोग -श्रयोग, त्रज्ञापराधमूलक इन चारों दुःखद योगों से मिथ्याहार - विहार करता हुआ जीवात्मा अनेक प्रकार के शारीरिक कष्ट मोल ले लेता है । खाना चाहिए सेर भर खाया पाव भर ही, यह हीनयोग है । सेर [ ३५३ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् के स्थान में २ सेर खा गए, यही प्रतियोग है । खाना चाहिए प्रकृति के अनुकूल अन्न खा गए प्रकृति से विरुद्ध ग्रन्न, यही मिथ्यायोग है । जिस समय ग्रन्न का आत्मा के साथ योग करना चाहिए, उस समय तो खाया नहीं, लोप विलोप करके ग्रनिश्चित समय में भोजन किया, यही प्रयोग । प्रज्ञापराधमूलक ये ही चार विषमयोग रोगोत्पत्ति के कारण हैं । ऋततत्त्व के प्रथमजा, अतएव श्रनृत संहित मनुष्य से प्रज्ञाप-राध होना स्वाभाविक है, फलतः रोग का आक्रमण होना भी स्वाभाविक ही है - " शरीरं व्याधिमन्दि-रम् । " यही व्याधि नाम की छठी ऊम्मि है । इन ६ त्रों में दो - दो के तीन युग्म हैं । तीनों युग्मों से प्रत्येक युग्म की प्रथम कला आधार है, दूसरी आधेयरूपा है । पिपासा के रहने पर क्षुधा नहीं भी रह सकती, परन्तु क्षुधा है, तो पिपासा अवश्य है । साथ ही में अन्न से क्षुधा शान्त कर लेने पर पिपासा श्रवश्य उदित होती है एवं क्षुधा के साथ साथ ही इस पिपासा को भी शान्त करना ग्रावश्यक हो जाता है । इसी प्रकार शोक ही मोह की मूल प्रतिष्ठा है । पहले शोक है, फिर मोह है । जरा ही व्याधि का उद्गम स्थान है । जरा और व्याधि का घनिष्ठ सम्बन्ध है । इसी भाव का बड़ी प्रासाद भाषा में दिग्दर्शन कराते हुए एक महात्मा कहते हैं— यम सेना की विमल ध्वजा 8 " जरा " दृष्टि में आती है, करती हुई युद्ध रोगों से देह हारती जाती है । १ – क्षुधा २ पिपासा १ – शोकः १ - जरा २ — मोहः २ – व्याधिः पडूर्म्मयः जिस प्रकार महासमुद्र में प्रक्षिप्त एक काष्ठ खण्ड समुद्र की उत्ताल तरङ्गों से इतस्ततः दोलायमान रहता है, इसी प्रकार विश्वरूप समुद्र में काष्ठ स्थानीय यह भोक्तात्मा उपर्युक्त बलरूप ऊम्मियों से इतस्ततः दन्द्रम्यमाण रहता है । २ - अवस्था ( ६ ) दूसरा पाप्मा अवस्था नाम से प्रसिद्ध है । जीवात्मा जाग्रत ( जागना ), स्वप्न ( सपना ), सुषुप्ति ( सोना ), मोह ( विक्षिप्तता ), मूर्च्छा ( बेहोशी ), मृत्यु ( शरीरावसान ), इन अवस्थाओं में से ग्रवश्य ही किसी एक न एक अवस्था से युक्त रहता है । अध्यात्मसंस्था में महान् ( सत्त्व ), विज्ञान ( बुद्धि ), प्रज्ञान ( मन ), भेद से षडवस्थास्वरूपपरिचय तीन स्वतन्त्र ज्ञान धाराएँ प्रवाहित रहती हैं । इन तीनों में महानात्मा प्रधान है, यही चिदात्मा की प्रति जरा- वृद्धावस्था, जरा थोडी सी । [ ३५४ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् ष्ठा है, जैसा कि पूर्व की महदात्मविज्ञामोपनिषत् में विस्तार से बतलाया जा चुका है । इसी महदज्ञान से विज्ञान ( बुद्धि ) प्रकाशित रहता है, विज्ञान से प्रज्ञान प्रकाशित रहता है । प्रज्ञान मन के द्वारा वही ज्ञान प्रकाश इन्द्रिय द्वारों से निकल कर विषयों को प्रकाशित करता है । विपयज्ञान में मनोज्ञान की प्रधानता है । बहिर्जगत के भौतिक विषयों के परिज्ञान के लिए मानस ज्ञान का इन्द्रियों के द्वारा बाहर निकलना सर्वथा अपेक्षित है । जिस समय मन का इन्द्रियों के द्वारा विषय जात के साथ सम्बन्ध होता है, ऐसी स्थिति में यह मान लेना पड़ता है कि, इस दशा में महान् विज्ञान- प्रज्ञान- इन्द्रियाँ - चारों जाग्रत हैं, उद्बुद्ध हैं । चारों अपना काम कर रहे हैं । इन चारों विवत्त की जाग्रदवस्था ही " जाग्रदवस्था " है । दूसरे शब्दों इन्द्रिय सहकृत जाग्रदवस्थापन प्रज्ञान ही जाग्रदवस्था का अधिष्ठाता है । जब इन्द्रियाँ अपना काम करना छोड़ देती हैं, इन्द्रिय द्वार अवरुद्ध हो जाते हैं, तो उस समय प्रज्ञान मन के पास बाहर के विषयों का आगमन बन्द हो जाता है । उस समय केवल भावना वासना रूप सांसारिक विषय ही रहते हैं । संस्कारात्मक इसी विषय समष्टि को " प्रन्तर्जगत् " कहा जाता है । प्रज्ञान-मन विज्ञान प्रकाश से अनुग्रहीत रहता हुग्रा सांस्कारिक विषयों के आधार पर नवीन रचना किया करता है । मन की इसी अवस्था का नाम " स्वप्नावस्था " है । यह अवस्था सुषुप्ति एवं जाग्रदवस्था के मध्य की प्रवस्था है, अतएव इसे " संध्यावस्था " भी कहा जा सकता है । " सन्ध्ये सृष्टि हि " - " निर्मातारं चंके पुत्रावयस्य " ( शा ० द ० ३।२।१ ) " सूकश्च हि " ( श ० दर्शन ३।२1४ ) इस दार्शनिक सिद्धांत के अनुसार जाग्रत - सुषुप्ति की सन्धि में रहने वाली इस स्वप्नावस्था में प्रज्ञान मन नवीन नवीन कल्पनाएं किया करता है । यह मानस कल्पनाएं शुभाशुभ फल को सूचित करती हैं । इस स्वप्न सृष्टि के सम्बन्ध में यह सिद्धांत समझना चाहिए कि, जाग्रदवस्था में इन्द्रियों के द्वारा जिन बाह्य विषयों का ( स्वप्नद्रष्टा ) साक्षात्कार करता है, स्वप्न में उन्हीं दृष्ट पदार्थों का प्रत्यक्ष होता है । हाँ, संस्कारों के समन्वय में अवश्य ही विट-ङ्खला हो जाती है । स्वप्न में श्राप वही बात देख सकते है, सुन सकते हैं, जो कि जाग्रदवस्था में देख - सुन चुके हैं । एक मनुष्य स्वप्नावस्था में अपने आप को ग्राकाश में उड़ता हुआ देखता है । ग्राप प्रश्न करेंगे कि, जाग्रदवस्था में वह आकाश में कभी नहीं उड़ा था, फिर स्वप्न में यह अपूर्वता कैसे उत्पन्न हुई? इस का उत्तर वही संस्कार विशृङ्खलता है । इस व्यक्ति ने आकाश में पक्षी का उड़ना देखा है । उसका संस्-कार इसके प्रज्ञा भाग पर खचित है । स्वप्न में इस के मन का उस उड़ने के साथ सम्बन्ध हो जाता है । फलतः यह अपने आपको उड़ता हुआ समझने लगता है । यही अवस्था असंभववत् प्रदृष्टवर प्रतीत अन्यान्य स्वप्न दृश्यों के सम्बन्ध में समझनी चाहिए । इसी अभिप्राय से - वृहदारण्यकश्रुति कहती है-" स्वप्नान्त उच्चावचमीयमानो रूपाणि देवः कुरुते बहूनि । उतेव स्त्रीभिः मह मोदमानो जक्षदुतेवापि भयानि पश्यन् ॥ यो खल्बाहुः - जागरितदेश एवास्यैष इति । यानि ह्येव जात् पश्यति, तानि सुप्त इति " ( वृ ० मा ० ६।३।१३।१४ ) । [ ३५५ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् कहना यही है कि, विज्ञानसहकृत संस्कारावच्छिन्न अन्तर्मुख प्रज्ञान मन ही स्वप्नावस्था का अधि-ष्ठाता है | यहाँ केवल अन्तर्जगत् का भोग है । ग्रागे जाकर विज्ञानात्मक प्रज्ञानात्मज्ञा को साथ लेता हुआ पुरीतति नाम से प्रसिद्ध हृदयस्थ व्यान नाड़ी में प्रविष्ठ हो जाता है । चिद्विशिष्ट महानात्मा ही इस व्यानात्मिका पुरीतति नाड़ी की प्रतिष्ठा है । यहीं विज्ञान अपीत हो जाता है । दूसरे शब्दों में अपने चिज्ज्योतिघन स्वस्वरूप में डूब जाता है । विज्ञान का स्वतन्त्र प्रकाश तिरोहित हो जाता है । वस प्रज्ञा-नावच्छिन्न विज्ञान की इस स्वस्वरूप में अपीति ही स्वपिति नाम की सुषुप्ति अवस्था है । चौथी अवस्था मोह है । ऊभिम वाला मोह स्तब्ध वृत्ति थी, इस ग्रवस्था सम्बन्धी मोह का विक्षि-प्तता से सम्बन्ध है । किसी आकस्मिक प्रबल आघात से, मादक पदार्थों के अत्यधिक मात्रा में सेवन से, शक्ति परिणाम से अधिक ज्ञान तन्तुओं को काम में लाने से, इत्यादि इत्यादि कारणों से मनुष्य के स्नायु तन्तु ( ज्ञानतन्तु ) शिथिल हो जाते हैं । ज्ञान तन्तुयों के आधार पर होने वाले सुव्यवस्थित इन्द्रिय व्यापारों की व्यवस्था टूट जाती है । विवेक नष्ट हो जाता है, मन उत्पथगामी बनता हुआ इन्द्रिय स्वातन्त्र्य का कारण बन जाता है । यही अवस्था मोह ( पागलपन ) है । यदि मोह की मात्रा पराकाष्ठा पर पहुंच जाती है, तो मन प्रतिमूच्छित हो जाता है । कारण इसका यही है कि, इन्द्रियों से उनकी नियत एवं परिमित शक्ति के अनुसार ही यदि काम लिया जाता है, तो वे स्वस्वरूप से सुरक्षित रहती हैं । परन्तु मोहावस्था में इन्द्रिय संयम टूट जाता हैं । किस इन्द्रिय से कितना काम लेना, यह विवेक जाता रहता है । मुग्ध ( पागल ) श्रादमी यदि दौड़ना प्रारम्भ कर देता है, तो वह घन्टों निरन्तर दौड़ा ही करता है । बोलना आरम्भ कर देता है, तो अनर्गल बोला ही करता है । इस नैरन्तर्य्यं से इन्द्रियों की शक्ति क्षीण हो जाती है । अन्ततोगत्त्वा इन्द्रियाँ अपना काम करना छोड़ देती हैं, निश्चेष्ट होकर आदमी धरा पर गिर जाता है । यही " मूर्च्छा " है । इस प्रकार प्रवृद्व मोह ही इस मूर्च्छावस्था का कारण बन जाता है । पाञ्चभौतिक स्थूल शरीर के साथ जीवात्मा को बद्ध रखने वाला सौर सूत्र ही " आयु " नाम से प्रसिद्ध है । इन्द्रात्मक सौर प्रात्मसूत्र ही हमारी आयु की प्रतिष्ठा है । जब तक शरीर एवं आत्मा ग्रायु: -सूत्र से बद्ध है, तभी तक जीवन सत्ता है । सामान्य सृष्टि विज्ञान के अनुसार सूर्य्य से ऐसे ३६००० ( छत्तीस-हजार ) प्रायु: सूत्र आते हैं । प्रतिदिन एक एक प्रायुःसूत्र को भोग समाप्त हो जाता है । इस क्रम से ३६००० दिन की समृष्टि रूप १०० वर्ष में आयुःसूत्र निःशेष हो जाता है । इसी आधार पर - " शतायुर्वे पुरुष: " यह श्रोत सिद्धांत प्रतिष्ठित है । जिस दिन यह आयुः सूत्र सर्वथा निःशेष हो जाता है, उस दिन जीवात्मा का पातिक शरीर बन्धन टूट जाता है यही अवस्था मृत्यु नाम से * ६ ठी अवस्था है । * इन ६ ग्रों अवस्थाओं का सोपपत्तिक वैज्ञानिक निरूपण माण्ड्य क्योपनिषत् - हिन्दी- विज्ञानभाष्य में देखना चाहिए । [ ३५६ ]