Part II Pitra Swarup Vigyanopanistha part 2 — पृष्ठ 1–10

पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री २ · पृष्ठ 1–10

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अथ खण्डष्टात्मक " श्राद्धविज्ञान " - प्रन्थान्तर्गत " पितर " स्वरूपविज्ञानोपनिषत् द्वितीय काण्ड २ व्याख्याता एवं भाष्यकार पं ० मोतीलालशम्र्मा - वेदवीथीपथिक प्राङ्गिरसो भारद्वाज ( १ ) - प्रमाणोपनिषत् - प्रथमा ( २ ) - पितृ पितरविज्ञानोपनिषत् - द्वितीया ( ३ ) - दिव्य पितरविज्ञानोपनिषत् - तृतीया ( ४ ) - ऋतु पितर विज्ञानोपनिषत् - चतुर्थी ( ५ ) - प्रेत पितर विज्ञानोपनिषत् पञ्चमी मूल्य: २० ) रुपये मात्र

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भूमिका मेरी रुचि का आधार ' वेद विज्ञान ' स्वर्गीय पण्डित मोतीलालजी शास्त्री के लिखे हुए हिन्दी ग्रन्थ ही हैं । इन ग्रन्थों का खण्ड - खण्ड पारायण करते - करते वैदिक शब्दों के अर्थ समझ में आने लगे और यह अनुभूति हुई कि सर्वसाधारण में इनका प्रचार हो । स्वर्गीय पण्डित श्री मोतीलाल जी शास्त्री ने अपनी ५१ वर्ष की अल्पायु में लगभग अस्सी हजार पृष्ठ लिख डाले जिनमें केवल दस हजार पृष्ठ ही अब तक प्रकाशित हैं । उन्हें तो स्वयं श्री शास्त्री जी ही अपने जीवन काल में प्रकाशित कर गए । इसके बाद इस विशाल वैदिक वाङ्मय का कोई उपयोग ही नहीं हुआ । पिछले एक वर्ष में मैंने राजस्थान पत्रिका में विज्ञान वार्ता के नाम से एक साप्ताहिक स्तम्भ लिखना चालू रखा । मैंने पाठकों के मानस पर इस स्तम्भ का गहन प्रभाव देखा और अनुभव किया कि यह वैदिक कार्य अधिकाधिक प्रकाश में लाया जाए । मैंने राजस्थान पत्रिका के प्रबन्धक मण्डल के सामने प्रस्ताव किया कि हिन्दी में लिखित श्री शास्त्री जी के ग्रन्थों का एक - एक करके प्रकाशन किया जाए । मुझे यह कहते हुए सर्वत्र प्रसन्नता है कि प्रबन्धकमण्डल ने बड़े उत्साहक वर्द्धक भाव से प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान की । स्वर्गीय पण्डित श्री मोतीलाल जी शास्त्री के ज्येष्ठ पुत्र श्री कृष्णचन्द्र शर्मा ने सहर्ष सहयोग का हाथ बढ़ाया और प्रकाशन का काम चालू हो गया । श्री शास्त्री जी ने अपने गुरु, समीक्षा - चक्रवर्ती पण्डित मधुसूदन जी श्रौझा की वैज्ञानिक शैली पर चार खण्डों में श्राद्धविज्ञान का प्रणयन किया था । प्रथम और तृतीय खण्ड का प्रकाशन तो वे स्वयं कर गए थे । द्वितीय एवं चतुर्थ खण्ड अप्रकाशित रह गए । श्री कृष्णचन्द्र शम्र्मा के साथ परामर्श करके हमने शेष दो खण्डों का प्रकाशन निश्चय किया, जिसका प्रमाण प्रस्तुत ग्रन्थ के रूप में जैविक विज्ञान की यह श्रेष्ठ रचना है जो पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है । यह संयोग की ही बात है कि इस ग्रन्थ का प्रकाशन भी इसके यशस्वी लेखक पण्डिल मोतीलाल जी शास्त्री की पुण्य तिथि २० सितम्बर, १ ९ ८६ के साथ ही हुआ है । मैं आशा करता कि पाठक इससे अवश्य ही लाभान्वित होंगे । हमारी चेष्टा होगी कि शनैः शनैः श्री शास्त्री जी के शेष ग्रन्थ भी प्रकाश में आयेंगे । श्राद्धविज्ञान का चतुर्थ खण्ड प्रेस में दिया जा चुका है । इस गुरुतर कार्य को सम्पन्न करने में डा ० मदनगोपाल शर्मा ने उल्लेखनीय योगदान किया है जिसके लिए वे साधुवाद के पात्र हैं डा ० श्रीमती उर्मिला शर्मा ने ग्रन्थ के सम्पादन में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया । शास्त्री जी के सुपौत्र श्री प्रद्युम्नकुमार शर्मा की देख - रेख में प्रकाशन का कार्य सुचारू रूप से हो सका । मैं उनके प्रति कृतज्ञता प्रगट करना चाहूँगा । - कर्पूरचन्द ' कुलिश '

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11 17 11 समर्पण दिवंगत - चन्द्रलोकस्थ - महानात्ममूर्ति स्वर्गीय -पितुःश्री वेदवाचस्पति पं ० मोतीलालजी शास्त्री [ निधन - तिथि आश्विन अमावस्या, सम्वत् २०१७ ] की २६ वीं पुण्यतिथि के अवसर पर श्राद्धकर्ता की ओर से श्रद्धापूर्वक समर्पित [ सर्वाधिकार सुरक्षित ] मुद्रकः- ~ - ~ प्रद्य ुम्नकुमार शम्र्मा श्री बालचन्द्र यन्त्रालय, " मानवाश्रम ", टोंक रोड, जयपुर -302015 -कृष्णचन्द्र शर्मा ( श्राद्धकर्ता )

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पूज्यपाद वेदवाचस्पति पं. मोतीलालजी शास्त्री [ सन् 1908-1960 ] wwwwwww

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अथ खण्ड चतुष्टयात्मक “ श्राद्धविज्ञान " ग्रन्थान्तर्गत ' पितरस्वरूप विज्ञानोपनिषत् ' नामक द्वितीय खण्ड की संक्षिप्त विषयसूची पितरस्वरूपविज्ञानोपनिषत् नामक द्वितीय खण्ड १. प्रमाणोपनिषत् -- प्रथमा २. पितृणां पितरविज्ञानोपनिषत् - द्वितीया ३. दिव्य पितरविज्ञानोपनिषत् - तृतीया ४. ऋतुप्रितरविज्ञानोपनिषत् - चतुर्थी ५. प्रेतपितर विज्ञानोपनिषत् पञ्चमी विषय १. आर्षप्रजा की शास्त्र निष्ठा २. ' प्रमाण ' शब्द की मीमांसा ३. शाब्दी दृष्टि, युक्ति ४. स्वतः परतः प्रामाण्यवाद ५. प्रत्यक्षप्रमारण के दो विवर्त्त ६. शब्दप्रामाण्यवाद ७. प्रमाण चतुष्टयी प्रमाणोपनिषत् - प्रथमा ३ ४५ १.२३ १३१ १५१ ३-४४ विषय पृष्ठ संख्या ४ ८. १० ४ ४ ६. श्राद्ध कर्मानुगत प्रामाण्यवाद १०. वेदसंहितोक्त प्रामाण्यवाद ११ १२ ५ ११. ब्राह्मणभागोक्त प्रामाण्यवाद २२ पृष्ठ संख्या वृद्धव्यवहार की प्रामाणिकता ७ १२. शास्त्रीय प्रश्न प्रतिवचन मीमांसा ४१ ८ I १३. प्रमाणोपनिषत् प्रकरणोपसंहार ४४ २ - पितृ णांपितरविज्ञानोपनिषत् - द्वितीया १. पितृस्वरूपविज्ञानोपनिषत् में अमृतात्मक ब्रह्म का सिंहावलोकन ४५ २. लेखात्मिका पुरविभूति ३. त्रयीब्रह्म का वैभव ४५-१२२ ४. ब्रह्म की स्वात् विभूति ५५ ५२ ५. पितर- प्राण प्रतिष्ठात्मक तत्त्व ६. पितृलक्षण पवित्र सोम ५६ ५७ ५३ ७. भृगु द्वारा विजातीय प्राण - प्रवृत्ति ५८ [ ५ ]

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड विषय सूची wwwww विषय पृष्ठ संख्या विषय पृष्ठ संख्या ८. अङ्गिरा के तैंतीस विवर्त्त ५८ ३२. धाता ६३ ६. दाम्पत्य भावमूलक विराट् पुरुष ५६ ३३. भगः ६४ १०. अमृत- सत्य यज्ञ त्रयी मीमांसा ६० ३४. पूषा ६५ ११. संस्कार्य विश्वविवत्तं ६० ३५. मित्रावरुणौ ६६ १२. ऋषि - पितर देव वर्गत्रयी ६१ ३६. अर्य्यमा ६७ १३. प्राकृतिक पितृ - प्रारण मीमांसा ६२ ३७. अंशुः ६६ १४. पर - मध्यम - अवर पितर ६४ ३८. विवस्वान् ६६ १५. ब्रह्म की ऋत - सत्य सृष्टि ६६ ३ ९. त्वष्टा १०२ १६. सत्तास्वरूप परिचय ६७ ४०. सविता १०३ १७. विधृतिस्वरूप परिचय १८. धृतिस्वरूप परिचय १६. आत्मसत्य स्वरूप परिचय ६७ ४१. विष्णुः १०६ ६६ ४२. मनुनिरुक्तिः १०६ ७० ४३. यम - मृत्यु निरुक्तिः ११२ २०. सर्व प्रतिष्ठा तत्त्व ७१ ४४. दशविध सोमविभूति परिचय ११३ २१. सर्वाग्रज सत्य - तत्त्व ७२ ४५. अश्ना सोमः ११५ २२. अग्नित्रयी मीमांसा ७३ ४६. असुर सोमः ११५ २३. सोमत्रयी मीमांसा ७४ ४७. आप्यः ११६ २४. यम स्वरूप परिचय ७४ ४८. अन्नम् ११७ २५. अग्निसोम की अभिन्नता ७६ ४६. भृगुः ११७ २६. अङ्गिरा - भृगु - यम का पितृत्व ७७ ५०. अङ्गिरा ११८ २७. तत्त्वाभिव्यक्ति ७८ ५१. सहः ११८ २८. अग्निविभूति स्वरूप परिचय ८१ ५२. रसः ११६ २६. वायुविभूति परिचय ८२ ५३. ब्रह्मणस्पति ११६ ३०. आदित्यविभूति स्वरूप परिचय ८८ ५४. यज्ञियः १२० ३१. इन्द्रः ६२ ५५. प्रकरणोपसंहार १२२ ३ - दिव्य पितरविज्ञानोपनिषत् - तृतीया १२३-१३० १. दिव्य पितर स्वरूप विज्ञानोपक्रम १२३ ४. सप्त दिव्य पितरः १२६ २. सौम्यासः पितरः १२३ ५. आत्मब्रह्म की पुरुषता १२७ ३. अङ्गिरसः पितरः १२४ ६. प्रकरणोपसंहार १२८ [ ६ ] ·

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड विषय सूची ४ - ऋतुपितरविज्ञानोपनिषत् - चतुर्थी १३१-१४९ १. ऋतुपितरस्वरूप जिज्ञासा १३१ ७. यज्ञानुगत पञ्चतु विभाग १३६ २. ऋतु और ऋत्विक् १३१ ८. षड्ऋतु स्वरूप प्रदर्शन १३७ ३. दशविध अग्निविवर्त्त १३३ ६. उद्ग्राभ - निग्राभ १३८ ४. त्रिंशद्विध सोम तत्त्व १३३ १०. ऋतुकालानुगत सृष्टि विवर्त १४१ ५. प्रयोजिका धर्म्मत्रयी १३३ ११. ऋतु पितृस्वरूप परिचय १४१ ६. ऋतुसर्ग मीमांसा १३४ १२. ऋतु पित्र्यनुगता सप्तपुरुषता १४४ १. लोकानुगत पितृस्वरूप परिचय २ स्तौम्य पितृ - स्वरूप परिचय ३. प्रायन्तु नः पितरः ५ - प्रतपितरविज्ञानोपनिषत् - पञ्चमी १५१ ७. पार्वण पितृस्वरूप मीमांसा १५५ ८.अश्रमुख पितर स्वरूप मीमांसा १५१-१६८ १६५ ४. प्रजोत्पादक पितर ५. त्रैगुण्य भावानुगत पितर ६. नान्दीमुख पितृस्वरूप मीमांसा १५६ ६. प्र ेतपितृस्वरूप परिचय १५७ १०. प्रकरणोपसंहार १५८ ११. शुद्धिपत्रम् १६१ 1 १६८ १६८ १६८ १७१ [ ७ ]

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श्राद्धविज्ञानम् " पितर " स्वरूप विज्ञानोपनिषत् द्वितीय काण्ड २

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्त्तते कामकारतः ।

न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥ १ ॥

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते काय्र्याकार्य्यव्यवस्थितौ ।

ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म्म कर्तुमिहार्हसि ॥२ ॥

- गीता १६ श्र ० । २३ – २४ श्लोक ।

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अथ " पितर " स्वरूपविज्ञानोपनिषदि ' प्रमाणोपनिषत् ' प्रथमा [ १ ] वेदोऽखिलो धर्म्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् ॥ आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ॥१ ॥

यः कश्चित् कस्यचिद्धर्मो मनुना परिकीर्तितः ॥ स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ॥ २ ॥

सर्वं तु समवेक्ष्येदं निखिलं ज्ञानचक्षुषा ॥ श्रुतिप्रामाण्यतो विद्वान् स्वधर्मे निविशेत वै ॥३ ॥

श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममनुतिष्ठन् हि मानवः ॥ इह कीतिमवाप्नोति प्रेत्यचानुत्तमं सुखम् ॥।४ ॥ श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः ॥ ते सर्वार्थेष्वमीमांस्ये ताभ्यां धर्मो हि निर्बभौ ॥५ ॥

योऽवमन्येत ते मूले हेतुशास्त्राश्रयाद्विजः ॥ स साधुभिर्बहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दकः ॥६ ॥

( मनुः २ प्र ० । ६-११ श्लोक 1 ) [ ३ ]

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड शाब्दी दृष्टि, युक्ति-[ ४ ] प्रमाणोपनिषत् N १ २ ३ ४ अनन्त काल से झञ्झावात के प्रबल झोंकों को सहती हुई प्रजाति किस बल के आधार पर आज तक स्थिर रह सकी? कराल काल के कुटिल भ्र विक्षेपों का श्रार्षप्रजा की शास्त्रनिष्ठा- उपहास करती हुई— प्रार्यसभ्यता, आर्यसंस्कृति किस महाशक्ति के आधार पर आज तक अपना स्वरूप सुरक्षित रख सकी? जहाँ का मौलिक साहित्य सरस्वती के अन्यतम शत्रु, कला के निकृष्टतम घातक नरराक्षसों के हम्मामों को गरम रखने के लिए महीनों तक ईंधन के काम में श्राता हुआ भी किस अमृतसञ्जीवनी से आज तक जीवित दशा में हमें उपलब्ध हो रहा है? इत्यादि उद्वेगकर प्रश्नों के उत्तर हैं— शास्त्रनिष्ठा! प्राप्त वचन पर पूर्ण विश्वास!! ऋषियों की वाणी पर अनन्य श्रद्धा!!! युक्ति एवं तर्कवाद उसी सीमा तक उपयोगी बना रहता है, जहाँ तक कि प्रत्यक्षवाद का सम्बन्ध ' है । प्रत्यक्षातीत विषयों में अशास्त्रीय - निरर्थक शुष्क तर्कवाद ' प्रमाण ' शब्दमीमांसा- कथमपि सफल नहीं हो सकता - ' तर्काप्रतिष्ठानात् ' । परोक्षतत्त्वों के सत्यासत्य का निर्णय परोक्षद्रष्टा महर्षियों के वचन पर ही अवलम्बित है । उन्होंने अपनी प्रार्यदृष्टि से जिन तत्त्वों का साक्षात्कार किया है, उन तत्त्वों को शब्द द्वारा हमारे कान में पहुँचाने वाला शास्त्र ही वेदशास्त्र है । यही हमारी विषय - सिद्धि के लिए इतरत्रमा-गानपेक्ष स्वतः प्रमाण है । जिस तत्त्व के आधार पर हमारा आत्मा लक्षीभूत विषय की सत्यता का कारण बन जाता है, दूसरे शब्दों में जो तत्त्व प्रमेय ( विषय ) सम्बन्धिनी प्रमा ( ज्ञान ) का जनक बन जाता है, विषय- सिद्धि का हेतु बन जाता है, वही तत्त्व विशेष - " प्रमाजनकं प्रमाणम् " इस निर्वचन के अनुसार ' प्रमाण ' नाम से व्यवहृत होता है । यह ' प्रमाण ' तत्त्व प्रत्यक्ष अनुमान उपमान शब्द – भेद से प्रधानतया चार भागों में ( दर्शन मतानुसार ) विभक्त माना गया है । इन चारों प्रमाणों में प्रत्यक्ष प्रमाण ही इतर तीनों प्रमाणों का मूलाधार है । विज्ञान - परिभाषा के अनुसार इन चारों प्रमाणों का प्रत्यक्ष - अनुमान, इन दो प्रमाणों में ही अन्तर्भाव है । दृष्टि प्रमाण को प्रत्यक्ष प्रमाण कहा जाता है, एवं युक्ति प्रमाण को अनुमान प्रमाण कहा जाता है । यह दृष्टि एवं युक्ति, दोनों ही शब्द - प्रशब्द भेद से दो भागों में विभक्त । फलतः दो के चार प्रमाण ' जाते हैं । चर्मचक्षुओं ( श्राँखों ) से जो देखा जाता है, वह " शाब्दष्टि " है, एवं बिना किसी प्रमाण को आधार बनाए प्रयुक्त होने वाला विशुद्ध तर्कवाद ' प्रशाब्दीयुक्ति ' है । चक्षुर्हष्टिमूला अशाब्दी दृष्टि ही ' प्रत्यक्ष प्रमारख ' है, एवं विशुद्ध तर्कमूला प्रशाब्दी युक्ति ही अनुमान प्रमाण ' है । यथाजात साधारण मनुष्यों के लौकिक व्यवहार प्रायः इन्हीं दोनों प्रमाणों पर अवलम्बित हैं । दूसरे शब्दों में लौकिक मनुष्य प्रत्यक्ष शब्द से प्राँखों देखे का, एवं अनुमान शब्द से तर्कवाद का ही ग्रहण किया करते हैं । विज्ञान दृष्टि से जो देखा जाता है, वह ' शाब्दीदृष्टि ' है, एवं शाब्दी दृष्टि का अनुगमन करने वाला तर्कवाद ' शाब्दीयुक्ति ' है । दूसरे शब्दों में इन्हें ' शास्त्रीय-दृष्टि ' - एवं ' शास्त्रीय - युक्ति ' इन नामों से भी व्यवहृत किया जा सकता है शास्त्रीय दृष्टि ' प्रत्यक्ष प्रमाण ' है, एवं शास्त्रीय युक्ति ' अनुमान - प्रमाण ' है । प्रत्यक्ष प्रमाण का दृष्टार्थ से सम्बन्ध है, एवं अनुमान प्रमाण का श्रुतार्थ से सम्बन्ध