Part II Pitra Swarup Vigyanopanistha part 2 — पृष्ठ 11–20

पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री २ · पृष्ठ 11–20

पृष्ठ 11

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड wwwww प्रमाणोपनिषत् है । किसी भी विषय को देख कर कहना दृष्टि है, एवं किसी विषय को सुन कर कहना श्रुति । दृष्टि श्रुति कहा जाता है, एवं श्रुति को स्मृति कहा जाता है । तात्पर्य्य यह है कि, जिन अलीकिक इन्द्रियातीत विषयों का हम अपने चर्म्मचक्षुनों से प्रत्यक्ष करने में सर्वथा असमर्थ रहते हैं, तपः प्रभाव से विशुद्धान्तःकरणमना महर्षिगरण उसी परोक्ष अर्थ का अपनी विज्ञान दृष्टि से साक्षात्कार कर लेते हैं । यही विज्ञानदृष्टि " दिव्यदृष्टि " दिव्यचक्षु " " योगप्रत्यक्ष ” " प्रार्षष्टि " " आचक्षु " इत्यादि विविध नामों से प्रसिद्ध हुई है । इसी दृष्टि का निरूपण करते हुए श्रभियुक्त कहते हैं-अनागतमतीतञ्च वर्त्तमानमतीन्द्रियम् ॥ विप्रकृष्टं व्यवहितं सम्यक् पश्यन्ति योगिनः ॥१ ॥

आविर्भूतप्रकाशानामनभिप्लुतचेतसाम् " अतीतानागतज्ञानं प्रत्यक्षान्न विशिष्यते ॥२ ॥

अतीन्द्रियानसंवेद्यान् पश्यन्त्यार्षेण चक्षुषा ॥ ये भावान् वचनं तेषां नानुमानेन बाध्यते ॥२ ॥

जां तत्त्व जैसा है, उसे वैसा ही समझना ' सत्यभाव ' है, विपरीत समझना ' प्रसत्यभाव ' है । दूसरे शब्दों में जिसकी सत्ता हो, उसी की भाति ( ज्ञान ) होना सत्य है, स्वतः - परतः - प्रमाण्यवाद - यही " प्रमा " ज्ञान है । सत्यज्ञान को ही ' प्रमाज्ञान ' कहा जाता है । सत्ता किसी अन्य की है, ज्ञान अन्य किसी का हो रहा है, यह अस्ति-भाति का पार्थक्य असत्यज्ञान है । " यथास्ति तथा प्रतिपत्तिः " ही प्रमा है । जिसके आधार पर " सत्य-लक्षण " इस प्रमाज्ञान का उदय होता है, वही प्रमाजनक बनता हुआ ' प्रमाण ' कहलाया है । इस वैज्ञानिक लक्षण के अनुसार प्रथमतः प्रत्यक्ष - शब्द अनुमान ये तीन प्रमाण हो जाते हैं । इन तीनों में अनुमान और शब्दत्रमाण प्रत्यक्षप्रमाण को मूल में रख कर प्रमाण बनते हैं, अतः इन दोनों को हम ' परतः प्रमाण ' मानने के लिए तय्यार हैं । इतर प्रत्यक्षप्रमाण किसी अन्य प्रमाण की अपेक्षा न रखता हुआ ' स्वत: -प्रमाण ' नाम से प्रसिद्ध है । क्षुरिन्द्र में प्रकृति ने सत्य सत्त्व प्रतिष्ठित किया है । कारण इसका यही है कि चक्षुरिन्द्रिय का ( साथ ही ' विज्ञानचक्षु ' नाम से प्रसिद्ध बुद्धि का भी ) निर्माण सत्यभावापन्न * सूर्य्य से हुआ है । एवं प्रत्यक्ष का सम्बन्ध चक्षु से ही है । अतएव चक्षुषा दृष्ट प्रत्यक्ष तत्त्व को हम अवश्य ही सर्वथा ' सत्य '. * “ तद्य े तत् - सत्यं, असौ स आदित्यो य एव एतस्मिन्मण्डले पुरुषः " । - शतपथ ब्रा ० १४।८।३ । [ ५ ]

पृष्ठ 12

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड प्रमाणोपनिषत् wwwww कहने के लिए तैय्यार हैं । यही कारण है कि यदि हमारे समीप किसी विषय की सूचना देते हुए दो मनुष्य आाकर पृथक् पृथक् रूप से - " मैने ऐसा देखा है, मैने ऐसा सुना है " यह कहते हैं, तो जो मनुष्य " मैने ऐसा देखा है " यह कहता है, उसी पर हमारा विश्वास होता है । फलतः चक्षु का सत्यत्त्व सिद्ध हो जाता है । इसी सत्यभाव का स्पष्टीकरण करती हुई श्रुति कहती है-te ( १ ) – “ सत्यं दीक्षा । तस्माद्दीक्षितेन सत्यमेव वदितव्यम् । अथो खल्वाहुः — कोऽर्हति मनुष्यः सर्वं सत्यं वदितुम् । सत्यसंहिता वै देवाः, श्रनृत-संहिता वै मनुष्याः । विचक्षरगवतीं वाचं वदेत् । चक्षुर्वै विचक्षणम् । विनेन पश्यति । एतद्ध वै मनुष्येषु सत्यं निहितं यच्चक्षुः । तस्मादाचक्षाणमाहुः- -अद्राक् इति । स यदि - ' प्रदर्शम् ' इत्याह, अथास्य श्रद्दधति । यद्यु स्वयं पश्यति ( तदा ) न बहूनां चनान्येषां श्रद्दधाति " - - ऐतरेय ब्रा ० २।१।६ ( २ ) - " सत्यं वै चक्षुः । सत्यं हि वै चक्षुः - तस्माद्यदिदानीं द्वौ विबद-मानावेयातां - ' अहमदर्शम्, अहमश्रौषम् ' इति य एव ब्रूयात् – ' हमदर्शम् ' इति, तस्मा ( तस्मै ) एव श्रद्दध्याम " । - शतपथ ब्रा ० १।३।१।२७ * ( १ ). " सत्य दीक्षा है । इसलिए ( यज्ञ में ) दीक्षित ( यजमान ) से सत्य ही प्रयुक्त होना चाहिए ( दीक्षित को ' दीक्षा ' की रक्षा के लिए सत्यभावरण ही करना चाहिए ) । इस सम्बन्ध में वैज्ञानिक कहते हैं ( प्रश्न करते हैं ) कि - ' कौन मनुष्य सर्वात्मना सत्य बोल सकता है ( श्रर्थात् मनुष्य जब सत्य-भाषण में असमर्थ है, तो इसे यह असम्भव आदेश किस आधार पर दिया गया? ) । देवता ही निव सत्यसंहित ( सत्यमर्थ्यादा से मर्यादित ) हैं, ( उधर ) मनुष्य ( तो ) असत्यसंहित है ( ऐसी दशा में उक्त आदेश का क्या अर्थ है? प्रश्न का समाधान करती हुई श्रुति कहती है, वह दीक्षित यजमान ) विचक्षणवती ( प्राँखों देखी ) वाणी बोले चक्षुरिन्द्रिय ही विचक्षण है । इसी ( चक्षु ) से मनुष्य देखता है | मानब में ( प्रकृति की ओर से ) यही वह सत्य प्रतिष्टित हुआ है, जो कि चक्षु है । इसीलिए प्राँखों देखी बात कहने वाले मानव के प्रति यह कहा जाता है विप्रमुक ने वास्तव में ठीक कहा है । ' ( यह नियम है कि किसी विषय का प्रतिपादन करने वाला मानव ) यदि यह कहता है कि ' मैंने देख लिया है ' ( देख कर ऐसा कह रहा हूँ ) तो इस मानव पर लोग विश्वास कर लेते हैं । यदि कोई मानव स्वयं अमुक विषय का साात्कार कर लेता है तो ( अपने इस प्रत्यक्ष ज्ञान की तुलना में ) यह अन्य अनेक मानवों के ( स्वदृष्ट से विरुद्ध ) सुने हुए विषय पर विश्वास नहीं करता । ' " ( २ ) - " सत्य निश्चयेन चक्षु है । सत्य निश्चय ही तो चक्षु है । यही कारण है कि, ' मैंने ऐसा देखा है ' ' मैंने ऐसा सुना है ' इस प्रकार परस्पर विवाद करते हुए उपस्थित मानवों में से जो मानव-' मैं ऐसा देखा है ' कहता है, उसी पर हम विश्वास करते हैं । " [ ६ ]

पृष्ठ 13

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श्राद्ध विज्ञान द्वितीय खण्डं प्रमाणोपनिषत् प्रत्यक्ष - प्रभाणरूपा यह दृष्टि चमं - विज्ञान भेद से दो भागों में विभक्त है । चर्मचक्षु सर्व-साधारण है, विज्ञानचक्षु योगसाध्या होने से योगज है । यह दृष्टि प्रत्यक्षप्रमारण के दो विवर्त- तपस्वी महर्षियों में तपःप्रभाव से उदित होती है, अतएव इसे " प्रादृष्टि " कहते हैं, जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है । साधा-रण लौकिक विषयों के सम्बन्ध में चर्मचक्षुः -- सम्बन्धी प्रत्यक्षप्रमाण का अधिक महत्त्व है । जो मूढधी पारलौकिक विषयों के सम्बन्ध में भी इसी दृष्टि को प्रधान मानते हुए, चर्म्मचक्षु से उनका साक्षात्कार करने में असमर्थ होते हुए उनकी सत्यता में सन्देह करने लगते हैं, ऐसे लौकिक विशुद्ध चाक्षुष प्रत्यक्षवादी ही नास्तिक- चार्वाक कहलाए हैं - " प्रत्यक्षमेवेति चार्वाकाः " । उधर बुद्धिमान् मनुष्य लौकिक विषयों के सम्बन्ध में जहाँ चर्मचक्षुः- सम्बन्धी प्रत्यक्ष का आदर करते हैं, वहाँ पारलौकिक अतीन्द्रिय विषयों के सम्बन्ध में प्रार्षचक्षुष्मन्त महर्षियों के प्रार्षप्रत्यक्ष का ही समादर करते हैं । दोनों प्रत्यक्ष लौकिक- वैदिक स्थित हैं । इसी रहस्य को लक्ष्य में रख कर " इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्य-व्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम् " ( न्या ० सू ० १।१४ ) प्रत्यक्ष का यह लक्षरण करते हुए प्राचार्य तन्मूलक शब्दप्रमाण का दिग्दर्शन कराते हुए — “ प्राप्तोपदेशः शब्दः, स द्विविधः, दृष्टाऽदृष्टार्थत्वात् ” ( १।१।७-८ ) यह सिद्धान्त स्थापित करते हैं । उक्त दोनों प्रत्यक्षों को सूत्रकाराभिमत बतलाते हुए भाष्यकार कहते हैं— “ प्राप्तः खलु साक्षात्कृतधर्म्मा, यथादृष्टस्यार्थस्य चिख्यापयिषया प्रयुक्त उपदेष्टा । साक्षात्करणमर्थस्याप्तिः, तया प्रवर्त्तते इत्याप्तः । ऋष्याय्र्यम्लेच्छानां समानं लक्षणम् । तथा च सर्वेषां व्यवहाराः प्रवर्त्तन्ते । एवमेभिः प्रमाणैर्देव-मनुष्यतिरश्चां व्यवहाराः प्रकल्पन्ते नातोऽन्यथा - इति । + + यस्येह दृश्यतेऽर्थः, स दृष्टार्थः । यस्यामुत्र प्रतीयते, सोऽदृष्टार्थः । एवमृषिलौकिक वाक्यानां विभाग इति | किमर्थं पुनरिदमुच्यते? स न मन्येत - दृष्टार्थ एवाप्तोपदेशः प्रमाणम्-अर्थस्यावधारणात् - इति । प्रष्टार्थोऽपि प्रमाण - प्रर्थस्यानुमानात् - इति ” । ( वात्स्यायन भाष्य १1१1७-८ ) भाष्यकार का अभिप्राय यही है कि जो व्यक्ति अपने चर्मचक्षु से लौकिक विषय का साक्षात्कार कर, जैसा उसने स्वयं देखा है, ठीक वैसा ही कहने की इच्छा रखता हुआ वह " प्राप्त " कहलाता है । चाहे से लौकिक विषय पर पहुँचा हो, अथवा प्रार्षचक्षु से अलौकिक विषय पर पहुँचा हो । उभयथा विषय का साक्षात्कार ही प्राप्ति है, ठीक निशाने पर पहुँच जाना ही प्राप्ति हैं । वह उपदेष्टां इस प्राप्तिभाव को लेकर ही हमें उपदेश देने के लिए प्रवृत्त हुआ है, अतएव वह " आप्त " कहलाता है । अपने - अपने प्रत्यक्ष - परोक्ष विपयों की प्राप्ति के सम्बन्ध से ऋषि - आर्य्यं - म्लेच्छ, सब स्व स्व स्थान में प्राप्त हैं । इन्हीं प्राप्तों के उपदेश से लौकिक वैदिक सब व्यवहारों का सञ्चालन होता है । [ ७ ]

पृष्ठ 14

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड ~ प्रमाणोपनिषत् इन्हीं दोनों प्राप्तियों का और भी अधिक स्पष्टीकरण करते हुए आगे जा कर भाष्यकार कहते हैं कि जिस आप्तवाक्य का प्रतिपाद्य विषय चर्म्मचक्षु से देखा जा सकता है, वह शब्दप्रामाण्यवाद - वाक्य इस चर्म्मचक्षु से दृष्ट अर्थ का साधक बनता हुआ " दृष्टार्थ " है । एवं जिस वाक्य के अर्थ का सम्बन्ध यहाँ न हो कर परलोक में होता है, वह वाक्य " अर्थ " है । इस प्रकार अदृष्टार्थ - सम्बन्धी ऋषिवाक्यों का, एवं दृष्टार्थसम्बन्धी लौकिक वाक्यों का विभाग कर लेना चाहिए । " आप्तोपदेशः शब्दः " केवल इतना ही कह देने से दृष्टार्थ की तो प्रामाणिकता सिद्ध हो जाती, कारण वहाँ उपद्विष्ट अर्थ आँखों के सामने रहता है, फलतः उस पर विश्वास होना सुगम है । परन्तु दृष्टार्थ को प्रमाण न माना जाता । अपेक्षित इसकी भी प्रामाणिकता है । कारण यह अर्थ प्रत्यक्षाधार पर प्रतिष्ठित होता हुआ अनुमानमूलक है । परीक्षक महर्षि अपनी ग्रार्षदृष्टि से पहिले स्वयं उस विषय का साक्षात्कार करता है, अनन्तर अपने दृष्ट अर्थ ( प्रत्यक्षीकृत विषय ) कां शब्दोपदेश के द्वारा प्रस्मदादि के लिए प्रयुक्त करता है । अपना देखाहुआ वह अपने प्रत्यक्षार्थ ' मुख से ही शब्द द्वारा ( स्वप्रत्यक्षानुभव को शब्दरूप में परिणत कर ) कहता है । द्रष्टा परीक्षक का यह शब्द, दृष्टि का अनुसरण रखता हुआ हमारे लिए " श्रुति " बन जाता है । हम उससे वही सुनते हैं, जिसका हमने प्रत्यक्ष किया है । दूसरे शब्दों में उसके लिए जो दृष्टि है, वहीं हमारे लिए शब्दरूपमयी श्रुति है । इसी उपदेश - परम्परा को लक्ष्य में रख कर अभियुक्त कहते हैं--• “ साक्षातकृतधर्म्माण ऋषयो बभूवुः । ते प्रसाक्षात्कृतधर्म्मभ्योऽवरेभ्य उपदेशेन मन्त्रान् सम्प्रादु: - ' देवीं वाचमुद्यासमिति ” । यास्कनिरुक्त । १२०१२ । द्रष्टा के मुख से निकला हुआ शब्द द्रष्टा की दृष्टि ( प्रत्यक्ष दृष्ट अर्थ ) को ही अपना विषय बनाता है, उधर शब्द और अर्थ का तादात्म्य माना गया है । इसी आधार पर हम इस दृष्टि - ( प्रत्यक्ष ) कोही श्रुति कह सकते हैं । प्रकारान्तर से यों समझिए कि, यदि हमें यह विदित हो जाता है कि " यह शब्द द्रष्टा का कहा हुआ है " तो इस प्रत्यभिज्ञा के ग्रव्यवहितोत्तर काल में ही इस शब्द पर हमारा विश्वास हो जाता है, उस समय में हमें अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं रहती । अपितु द्रष्टा के इस शब्द से ही बिना किसी विप्रतिपत्ति के उस शब्द के द्वारा प्रतिपाद्य अर्थ को प्रत्यक्षवत् सुनते हैं । अतएव द्रष्टा का यह शब्द “ श्रुति ” के नाम से व्यवहुत होता है । यह श्रुति प्रत्यक्ष स्थानीया होती हुई इतर की अपेक्षा नहीं रखती, प्रतएव भीमांसा ने इसका “ निरपेक्षोरवः श्रुतिः " यह लक्षण किया है । हाँ तो निष्कर्ष यह निक्ला कि, हम जो शब्द द्रष्टा के मुख से सुनते हैं, वह हमारे से श्रुत होने के कारण " श्रुति " कहलाता हुआ भी स्वयं द्रष्टा की अपेक्षा से ( शब्दार्थ भेदव्यवस्था से ) साक्षात् दृष्टि ( प्रत्यक्ष ) होता हुआ, सायही में हमारे आत्मा में प्रत्यक्षवत् विश्वासोत्पत्ति का कारण बनता हुआ व्यवहार के लिए शब्दप्रमाण कह-लाता हुआ भी वस्तुतः " प्रत्यक्षप्रमाण " ही है । द्रष्टा का प्रत्यक्ष ही उसका वाक्य है । फलतः प्रत्यक्ष अर्थ एवं तदभिन्न शब्द दोनों एक वस्तु बन जाती है । " श्रुति " ही वेद है । यही शाब्दी दृष्टि किंवा शब्द [ ८ ]

पृष्ठ 15

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड प्रमाणोपनिषत् १ प्रत्यक्षम् २- [ १ – १ – प्रत्यक्षम् - प्रशाब्दम् — दृष्टिः – स्वतःप्रमाणम् अनुमानम् - [ २ – २ – अनुमानम् - प्रशाब्दम् - युक्तिः - परतः प्रमाणम् — लौकिके } -३ ३ - १ - प्रत्यक्षम् शाब्दम् - १-श्रुतिः - स्वतः प्रमाणम् शब्द: -} - वैदिके १- शब्द: -४ – २ – अनुमानम् - शाब्दम् - स्मृतिः परतः प्रमाणम्, १ - श्रुतिः -- दृष्टिः ( द्रष्टुर्वाक्यं श्रुतिः ) - प्रत्यक्षम् - शाब्दीदृष्टिः - शास्त्रीय प्रत्यक्षम् स्वतः प्रमाणम् * ( २ - स्मृतिः श्रुतिः ( श्रोर्वाक्यं स्मृतिः ) - अनुमानम् - शाब्दीयुक्तिः - शास्त्रीयतर्कवादः परतः प्रमार्णम् २ – प्रत्यक्षम्– [ ३ – दृष्टि: - ( चाक्षुषप्रत्यक्षं दृष्टि: ) - प्रत्यक्षम् - चाक्षुषीदृष्टि: लौकिक प्रत्यक्षम् - स्वतः प्रमाणम् ३ - अनुमानम् - [ ४ – युक्ति — ( तर्कवादी - युक्तिः ) - अनुमानम् - लौकिकीयुक्तिः विशुद्धतर्कवाद: - परतः प्रमाणम् चाक्षुषष्टि से दृष्ट भौतिक विश्व का सञ्चालन किसी अदृश्य शक्ति के आधार पर ही हो रहा है, यह निर्विवाद विषय है । वही अदृश्य शक्ति, किंवा शक्तिमान् पुरुष वृद्धव्यवहारकी प्रामाणिकता - " अन्तर्यामी " नाम से प्रसिद्ध है । इस अन्तर्यामी शास्ता पुरुष का वह अदृश्य लोक ही ' परलोक ' नाम से प्रसिद्ध है । परलोक ही इस लोक की प्रतिष्ठा है । जिन महापुरुष ने श्रुति स्मृति के द्वारा इस अदृश्य जगत् का स्वरूप हमारे सामने रखने का अनुग्रह किया है, उसको अभिनिवेश में पड़ कर हम उपेक्षावृत्ति में डाल दें, इस से बढ़ कर हमारा और अहित क्या हो सकता है । अवश्य ही आत्म - परमात्म - परलोक - श्रात्मगति - श्राद्धकर्म-इत्यादि इन्द्रियातीत विषयों के सम्बन्ध में हमें श्रुति स्मृति का अनुगमन करना चाहिए । थोड़ी देर के लिए पारलौकिक विषयों को छोड़ दीजिए । बिना लौकिक शब्द प्रमाणरूप प्रत्यक्ष एवं युक्तिरूप अनुमान प्रमाण के लौकिक व्यवहारों का भी सञ्चालन नहीं हो सकता । आप बाजार जाते हैं, केवल वृद्धव्यवहार के आधार पर तत्तदभिलषित वस्तुओं का क्रय कर लेते हैं । हम आप से पूछते हैं कि, क्या कभी आपने * स्मृति स्वयं शास्त्रीय तर्कमूला है । उधर धर्म स्मृतिमूल है । अतएव धर्मनिर्णय में इस शास्त्रीय, तर्क को ही प्रधान माना है, जैसा कि स्मृति कहती है-.. आर्ष धर्मोपदेशं च वेदशास्त्राविरोधिना । यस्तर्केणानुसंधत्ते स धर्मं वेद नेतरः ॥ ( मनुः ) [ १० ]

पृष्ठ 16

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड wwwwwwwwwwww प्रमाणोपनिषत् जौ - गेहूँ - उदं - मूंग - घृत - तन्दुलादि अन्नों की पूर्ण परीक्षा कर यह निश्चय कर लिया है कि यही जो है, यही गेहूं है, यहीं उर्द, मूंग आदि हैं । यदि कभी परीक्षा नहीं की, तो फिर आप ( बिना परीक्षा किए हीं ) यह जौ है, यह गेहूं है, यह विश्वास किस आधार पर कर लेते हैं । साथ ही में अमुक अन्न में अमुक गुण है, अमुक में प्रमुक गुण है — यह विश्वास कैसे कर बैठते हैं । एवमेव एक भिषग्वर आपको सोंठ, मिर्च, पिप्पल के क्वाथ के लिए औषधपत्र ( नुसखा ) लिख देता है । आप एक पन्सारी की दूकान पर जाते हैं । आप यह जानते हैं कि ज्ञानदृष्टि से पन्सारी आपके सामने प्रयोग्य है, फिर भी केवल उसी के विश्वास पर उससे दी गई वस्तुनों को सोंठ - मिर्चादि मान कर आप सन्तुष्ट हो जाते हैं । क्या कभी आपने इन औषधियों की परीक्षा की थी । नहीं तो फिर क्यों विश्वास किया? इन सब प्रश्नों के समाधान के लिए सिवाय प्रत्यक्षकर्ता आचार्यों के शब्दोपदेश के आपके पास दूसरा कोई समाधान नहीं है । वृद्धव्यवहार, प्रत्यक्षकर्त्ता वृद्धों का शब्दादेश ही आप के विश्वास के लिए पर्याप्त है । यदि दुर्भाग्यवश आप — " हम तो बिना परीक्षा किए बिना प्रत्यक्ष किए बात नहीं मानते " इस दुराग्रह में पड़ जायंगे तो उन्नति की कथा दूर रही जीवन ही संकट में पड़ जायगा । बाध्य होकर आपको शब्दप्रमाण का आश्रय लेना पड़ेगा । जिस प्रकार लौकिक दृष्टार्थ विषयों के सम्बन्ध में आप स्वयं प्रत्यक्ष न करते हुए भी प्रत्यक्षकर्त्ता वृद्धों के शब्दादेश पर विश्वास करते हुए तत्तल्लौकिक व्यवहारों में प्रवृत्त होते हैं, एवमेव आपको अलौकिक दृष्टार्थ विषयों के सम्बन्ध में स्वयं उनका प्रत्यक्ष न करते हुए भी प्रत्यक्ष-कर्त्ता ऋषियों के शब्दादेशरूप श्रुति स्मृति शास्त्र प्रामाण्य पर कभी अविश्वास नहीं करना चाहिए । यदि आप यह कहें कि, यदि हम चाहें तो दृष्टर्थों का प्रत्यक्ष कर सकते हैं । हम कहेंगे — यह हमारे लिए इष्टापत्ति है । प्रयास से आप क्या नहीं कर सकते । यदि विद्यालयों में अध्ययन का परिश्रम कर आप भौषधियों की परीक्षा कर सकते हैं तो — सत्यभाषण, ब्रह्मचर्य - अहिंसा - वेदानुपालन - श्रद्धा - उपनिषत् -श्रादि इन उपायों से चिरकाल की तपश्चर्या से उत्पन्न योगजदृष्टि से आप उन अलौकिक दृष्टार्थों का भी प्रत्यक्ष कर ही सकते हैं । दोनों जगह समान प्रश्न है, समान समाधान है । हाँ, एकमात्र दुराग्रह की चिकित्सा न इस लोक में है, न परलोक में है - " नतु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत् ” । श्राद्ध कर्म का प्रात्मा से सम्बन्ध है, पितर प्राण से सम्बन्ध है, श्रद्धासूत्र से सम्बन्ध है, परलोक से सम्बन्ध है । सभी प्रदृष्टार्थ हैं । फलतः इनके सम्बन्ध में शब्द-श्राद्धकर्मानुगत प्रामाण्यवाद- प्रमाण सर्वथा आवश्यक बन जाता है । केवल तर्कवाद पर, अथवा ( कुछ एक महानुभावों की दृष्टि में कल्पनाप्रधान, अतएव प्रमाण कोटि से बहिष्कृत ) पुराण तन्त्र - निबन्ध आदि कल्पित प्रमाणों के आधार पर श्राद्धकर्म को विश्वस्त कर्म्म नहीं माना जा सकता । इस की प्रामाणिकता के लिए श्रुतिस्मृति प्रमाण, उस में भी प्रधानतया श्रुति-प्रमाण, उस में भी विशेषत: श्रुति के संसहता भाग का ही प्रमाण अपेक्षित | ' शब्द प्रमाणका वयं यदस्माकं शब्द प्राह, तदस्माकं प्रमारणम् " । अब देखना यह है कि, श्रुति स्मृति में, विशेषत: श्रुति में श्राद्धकर्म को शास्त्रीय कर्म सिद्ध करने वाले दृढ - दृढतर- दृढतम प्रमाण उपलब्ध होते हैं, अथवा नहीं । [ ११ ]

पृष्ठ 17

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड प्रमाणोपनिषत् पूर्व - प्रतिपादिता ' श्रात्मविज्ञानोपनिषत् ' से विज्ञ पाठकों को यह भलीभाँति विदित हो गया होगा कि, अध्यात्मसंस्था में पुरुष - अव्यक्त - यज्ञ श्रादि भेद से आत्मविवर्त्त अनेक भागों में विभक्त हैं । इन सब खण्डात्मानों में से श्राद्धकर्म का सम्बन्ध एकमात्र प्रज्ञानात्मगर्भित महानात्मा के साथ ही है । यह चान्द्र महानात्मा पितृश्राणमय है । श्राद्ध के द्वारा महानात्मा में प्रतिष्ठित प्र ेत पितरों को ' स्वधा ' द्रव्य से तृप्त किया जाता है । स्वधान से तृप्त पितर स्ववंश में प्रजातन्तु को सम्यक् रूप से ( सन्तान रूप से ) वितत रखते हैं, यही इस कर्म्म का प्रधान फल है । श्रात्मस्वरूप के निरूपण के अनन्तर हमारा यह श्रावश्यक कर्त्तव्य हो जाता है कि, पितरप्राण का वैज्ञानिक स्वरूप पाठकों के सम्मुख उपस्थित किया जाय । जिस प्रकार श्रुति का " आत्म " शब्द जटिल है, एवमेव " पितर " शब्द भी सर्वथा मीमांस्य है । विचार सागर के ग्रन्तस्तल पर पहुंचे हुए श्रौततत्त्ववेत्ता विद्वान् यदि मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद के पितर शब्द पर दृष्टि डालेंगे तो उन्हें यह मान लेने में कोई आपत्ति न होगी कि, पितर शब्द वास्तव में किसी गुहा-निहित रहस्य से सम्बन्ध रखता है । श्रुति में पितर शब्द – १ – अग्नि, २ – सोम, ३ – ऋतु, ४ – संवत्सर, ५. – विट्, ६ – मास, ७ – श्रौषधि, ८ – यम, ९ – अपराह्न १० – कूप, ११ –नीवि, १२ – मघा, १३ – मन, १४ – लीक, १५ – ऊष्मा, १६ – ऊम, १७ – ऊर्व, १८ – काव्य, १६ – देव, २० – प्राण, २१ – रात्रि, २२ – अवान्तर दिशाएँ, २३ – तिर, २४ – सुप्तभाव, २५ – प्रग्नि से खाया जाने वाला तत्त्व, २६ – मर्त्य तत्त्व, २७ – प्रजापति, २८ – गृहपति, २६ - वाक् मन का समुच्चय, ३० –प्रप्त इत्यादि भेद से अनेक भावों के लिए प्रयुक्त हुआ है । जीवित पिता पितामहादि भी " पितर " न कहलाते हों यह बात नहीं है- " पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति " में पिता शब्द जीवित ( शरीर ) भाव का ही अनुग्राहक 1 है । यह सब कुछ मान लेने पर भी यह सर्वथा निःसंदिग्ध विषय है कि, जिन पितरों के लिए श्राद्ध का विधान है, वे प्रेत- पितर ही हैं, जैसा कि आगे के प्रकरणों से स्पष्ट हो जायगा । प्रथम संहिता भाग में उपात्त पितर - तत्त्व का साक्षात्कार कीजिए, साथ ही में मीमांसा सम्मत अर्थसङ्गति - विषयक नियमों के अनुसार बिना किसी पक्षपात के उनका क्या अर्थ हो सकता हैं? यह विचार कीजिए । वेदसंहितोक्तप्रामाण्यवाद-१ - उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः । असु य ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु ॥ ऋक् ० १०।१।१. “ प्रथम मध्यम एवं उत्तम श्रेणि के पितर ( हमारे लिए ) सौम्य ( अनुग्रह करने वाले ) बनते हुए ( हमारी ) उन्नति के कारण बनें । ऋतु को पहिचानने वाले अहिंसक पितर, प्राण - प्रदाता हैं । ऐसे वे पितर हमारी प्रार्थना सुनें, हमारी रक्षा करें । " मन्त्र के अक्षरार्थ से यह सिद्ध होता है कि, पितर कोई तत्त्व- विशेष है, प्रारणविशेष है । पितर प्रारण का सोम तत्त्व से सम्बन्ध है । साथ ही में यह तत्त्व प्राणशक्ति का प्रदाता है । यदि श्रुत्युक्त पितर का [ १२ ]

पृष्ठ 18

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड --—- ** -- ** -[ १३ ] प्रमाणोपनिषत् ऋक् ० ७।७६।४ । —ऋक् ० १०।१६ ९ / ४ जीवित पितर - परक अर्थ लगाया जाता है, तो वह कथमपि सङ्गत नहीं होता । कारण, प्रत्येक व्यक्ति के लिए जीवित पिता पितामह आदि समान रूप से पूज्य हैं । उनमें प्रथम - मध्यम - उत्तम, इस प्रकार का लौकिक विभाग सर्वथा असङ्गत है ।

२ - त इद्देवानां सधमाद आसनृतावानः कवयः पूर्व्यासः ।

गूलहं ज्योतिः पितरो न्वविन्दन्त्सत्यमन्त्रा अजयन्नुषासम् ॥

" ॠल मार्ग ( सरल मार्ग ) के अनुयायी, भृगुवंशी पूर्वकालिक वे अङ्गिरा नाम के पितर ही देवताओं के साथ प्रेम करने में समर्थ हुए । गुहा निहित ज्योति ( सूर्य्य ) को इन्होंने ही प्रकट किया । सत्यब्रह्म के उपासक, किंवा सत्यमन्त्र ( ब्रह्म ) मूर्ति इन पितरों ने ही उषा को उत्पन्न किया । " प्रकाश - उषा आदि तत्त्व प्राकृतिक हैं जो पितर इन प्राकृतिक तत्त्वों के उपादान ( उत्पादक ) माने जाते हैं, उनका जीवित पितरों के साथ कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता । अवश्य ही यह पितर प्रारण आधिदैविक जगत् की कोई मौलिक प्रारणात्मक वस्तु ं होनी चाहिए । ३ - सरस्वति या सरथं यथाथ स्वधामिर्देवि पितृभिर्मदन्ती । सद्यास्मिन् बर्हिषि मादयस्वानमीवा इष प्राधेह्यस्मै ॥ ऋक् ० १०।१७।८ " पितरों के साथ रथ पर ग्रारूढ होती हुई, एवं स्वधा नामक अन्न से मोदमान होती हुई हे सरस्वती देवी! इस यज्ञ में विराजमान होकर आप प्रसन्न भूर्ति बनिए, हमें एवं हमारे अन्नों को निर्दोष कीजिए । " इस मन्त्र ने सरस्वती नाम की वाग् देवता के साथ पितरों का सम्बन्ध बतलाया है । परमेष्ठी के सरस्वान समुद्र से ही इस सरस्वती वाक् का विनिर्गम है । उसी सौम्य परमेष्ठी मण्डल में सौम्य प्राण-रूप पितरतत्त्व प्रतिष्ठित है । ऐसी स्थिति में पितर शब्द को जीवित पितादि परक ही मानना क्या शास्त्रसम्मत पक्ष है?

४- प्रजापतिर्मह्यमेता रराणो विश्वैर्देवैः पितृभिः संविदानः ।

शिवाः सतीरुप नो गोष्ठमाकस्तासां वयं प्रजया संमदेम ॥

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड प्रमाणोपनिषत् " विश्वेदेव ” नामक ( पारमेष्ठ्य ) देवता, एवं पितरों के साथ संयुक्त होते हुए - ( मिलते हुए ) प्रजापति ( परमेष्ठी ) मेरे लिए गौसंपत्ति प्रदान करते हैं । वह प्रजापति देवता कल्याणकारिणी बनती हुई, उन गायों को हमारे गोस्थान ( गौशाला ) के सन्निकट करें, एवं उन गौसंतानों से ( गोवंश से ) हम प्रसन्न हों । " भृगु - अङ्गिरात्मक परमेष्ठी ही मैथुनी दृष्टि से अधिष्ठाता बनते हुए प्रजापति हैं । सायंसवतीय देवता ही “ विश्वेदेव " हैं । रात्रि का उपक्रम काल ही सोमोपक्रम काल है । सोम परमेष्ठी की ही वस्तु है । विश्वेदेव एवं पितर दोनों प्राणों की प्रतिष्ठा सौम्य परमेष्ठी ही है । परमेष्ठी में ही सहस्रधा विभक्त गोतत्त्व उत्पन्न होता है । इसी को " व्रजं गच्छ गोष्ठानम् " ( यजु ० सं ० १।२५ ) इत्यादि रूप से व्रज नाम का गोष्ठान ( गोचारणस्थान ) कहा गया है । इसी पारमेष्ठ्य वैष्णव गौतत्त्व को लक्ष्य में रखकर " या ते धामन्युष्मसि गमध्ये यत्र गावो भूरिशृङ्गा प्रयास: " ( यजुः सं ० ६ । ३ ) यह कहा जाता है । पूर्व मन्त्र इसी गौप्रवर्तक पारमेष्ठ्य सौम्य प्रारण को पितर शब्द से सम्बोधित कर रहा है ।

- ** --५ - प्रतिद्रव सारमेयौ श्वानौ चतुरक्षौ शबलौ साधुना पथा ।

प्रथा पितृन्त्सुदाँ उपेहि यमेन ये सधमादं मदन्ति ॥ १ ॥

६ - यौ ते श्वानौ यमरक्षितारौ चतुरक्षौ पथिरक्षी नृचक्षसौ ।

ताभ्यामेनं परिदेहि राजन् स्वस्ति चास्मा अनमीवञ्च धेहि ॥ २ ॥

- ( ऋक् सं ० १०।१४।१०।११ " हे ( प्रेत ) पितर! ( परलोक जाने वाले प्रेतात्मन् ) ( श्राप ) चार आँखों वाले, श्यावशबल ( चितकबरे ) सारमेय नाम से प्रसिद्ध दोनों कुत्तों से बच कर जाइए । तुम्हें उत्तम पितृलोक प्राप्त हो, जहाँ के कि पितर यम के साथ प्रानन्दित होते हैं । " उक्त दोनों मन्त्रों में जिन दो कुत्तों के साथ जिन पितरों का सम्बन्ध बतलाया गया है, वे अवश्य स्थूल शरीर छोड़ कर लोकान्तर में जाते हुए प्रेतपितर ( प्रारणात्मक पितर ) हैं ।

द्वौ श्वानौ श्यावशबलौ वैवस्वतकुलोद्भव ।

ताभ्यामन्नं प्रयच्छामि स्यातावेत्तावहिंसकौ ॥

इत्यादि रूप से परलोक जाते हुए प्रेतात्मा को दक्षिण प्रकाश में स्थित नाक्षत्रिक याम्य श्वान प्राणों के आघात से बचाने के लिए उन श्वानों के लिए बलि दी जाती है, जैसा कि पद्धति - प्रकरण में विस्तार से बतलाया जाने वाला है । [ १४ ]

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड प्रमाणोपनिषत् wwwwwwwwwwwwww ७ – यो यज्ञो विश्वतस्तन्तुभिस्तत एकशतं देवकर्मेभिरायतः । इमे वयन्ति पितरो य आययुः प्र वयाप वयेत्यासते तते ॥ - ऋ ० १० १३०।१ । " जो यज्ञ चारों ओर से ( अहर्गणात्मक ) तन्तुनों से फैला हुआ है, एक शत ( १०० ) देव कर्म्म से ( १०० आयु: - सूत्रों से ) जो वितत हो रहा है, उस ( वितान ) यज्ञ को पितर लोग बुनते हैं । बे पितर प्राणात्मक हैं, एवं साथ ही में वे कहते हैं कि प्रागे श्रागे बुनते जाओ - पीछे का ठीक करते हुए " । हमारा शरीर एक प्रकार का आयुःसूत्रात्मक वस्त्र है । शुक्र में प्रतिष्ठित पितर प्रारण ही प्राणों का ताना - बाना लगा कर इस शरीरात्मक वस्त्र का निर्माण करते हैं । फलतः इस पितर की प्राणात्मकता सिद्ध हो जाती है । ८- पाकः पृच्छामि मनसाऽविजानन् देवानामेना निहिता पदानि ।

वत्से बष्कयेऽधि सप्ततन्तून् वितत्निरे कवय तवा उ ॥ १ ॥ ऋ ० १।१६४

९ - महिम्न एषां पितरश्च नेशिरे देवा देवेष्वदधुरपि क्रतुम् ॥

समविव्यचुरुत यान्यत्विषुरैषां तनूषु निविविशुः पुनः ॥ २ ॥

१० - सहोभिर्विश्वं परिचक्रमूरजः पूर्वा धामान्यमिताभिमानाः ॥

तनूषु विश्वा भुवनानि येमिरे प्रासारयन्त पुरुध प्रजा अनु ॥ ३ ॥

११ - द्विधा सुनवोऽसुरं स्वविदमास्थापयन्त तृतीयेन कर्मणा ॥

स्वां प्रजां पितरः पित्र्यं सह प्रवरेष्यदधुस्तन्तुमाततम् ॥४ ॥

१२ - नावा न क्षोदः प्रदिशः पृथिव्याः स्वस्थिभिरति दुर्गाणि विश्वा ॥

स्वां प्रजां बृहदुक्थो महित्वा ऽ वरेष्वदधादापरेषु ॥५ ॥

" चन्द्रमा से आने वाले ' सहः प्रारण ' की प्रतिष्ठाभूत शुक्र ही पितरप्राण की आवास भूमि है । शुक्रभुक्त यह सहोमूर्ति पितरप्रारण सात पीढी तक वितत होता हुआ सापिण्ड्य भाव का कारण बनता है । उपर्युक्त पाँचों मन्त्र सापिण्ड्यप्रवर्त्तक इसी पितरप्राण का कर्म्मविज्ञान बतला रहे हैं । इन मन्त्रों का सोपपत्तिक निरूपण आगे आने वाली " सापिण्ड्य विज्ञानोपनिषत् " में होने वाला 1 [ १५ ]