Part II Pitra Swarup Vigyanopanistha part 2 — पृष्ठ 171–177
पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री २ · पृष्ठ 171–177
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड प्रेतपितर विज्ञानोपनिषत् * पुरुष के साथ चारों वर्णों का सम्बन्ध माना गया है । यह सब कुछ होने पर भी वैशेष्यात्तु तद्वादस्तद्-बाद: ” इस न्याय के अनुसार जिस पदार्थ में जो पितर प्रधान होता है वह उसी वर्ण के नाम से व्यवहृत होता है । इसी आधार पर पशुओं में श्रज ( बकरा ) ब्राह्मण कहलाता है, मेष ( मेंढा ) क्षत्रिय कहलाता है गौ वैश्य कहलाता है एवं श्रश्व शूद्र कहलाता है । इस प्रकार तत्तदेवता प्राणभेद से ये पितर देवता पदार्थ मात्र के उपादान बन जाते हैं । सोम ग्राही पितर सोमपा कहलाते हैं, हवि ग्रहण करने वाले पितर हविर्भुक् कहलाते हैं, श्राज्य ग्रहण करने वाले पितर " आज्यपा ” नाम से प्रसिद्ध हैं । आाज्य एवं सोम दोनों तरल द्रव्य हैं । इनका पान ही सम्भव है, अतएव तत्पानकर्त्ता दोनों पितर क्रमशः प्राज्यपा - सोमपा नाम से व्यवहृत हुए हैं । हविपदार्थ घन द्रव्य है । इसमें भोजन व्यवहार लोकसिद्ध है, अतएव तद्भोक्ता पितर हविर्भुक् नाम से सम्बोधित किए गए हैं । . जो द्रव द्रव्य अग्नि - संयोग से जल उठते हैं, दूसरे शब्दों में जो तरल पदार्थ अग्नि सम्बन्ध से ज्वालारूप परिणत हो जाते हैं, वे सब पदार्थ ( घृत - तैल - मदिरा आदि ) परिभाषानुसार " श्राज्य " नाम से प्रसिद्ध हैं | ऐसे द्रव - द्रव्य जो कि ( प्राप्यप्राण प्रधान वरुण के कारण ) अग्नि के संयोग से ज्वाला रूप में परिणत नहीं होते, वे सब पदार्थ ( दुग्ध आदि ) सोम ( श्राप्यसोम किंवा वरुण सोम ) नाम से व्यवहृत हुए हैं । कहना यही है कि सोम द्रव्य से प्राप्यायित होने वाले पितर सोमपा, प्राज्य द्रव्य से प्राप्यायित होने वाले पितर ज्या एवं हविद्रव्य से तृप्त होने वाले पितर हविर्भुक् नाम से प्रसिद्ध हैं, परन्तु जो पितर किसी भी द्रव्य का स्वधा सम्बन्ध से ग्रहण नहीं करते अपितु केवल स्वाहा सम्बन्ध से पदार्थों के साथ बहिर्या रूप से सम्बन्ध कर विमुक्त हो जाते हैं, वे पितर " सुकाली " नाम से प्रसिद्ध हैं । अग्नि - यम- सोमात्मक वसु - रुद्र - आदित्य ही उक्त पितरों के अभिमानी देवता हैं जैसा कि प्रकरण के प्रारम्भ में ही बतलाया जा चुका है । ऋतुपितर के प्रान्तरिक्ष्य पार्वणपितरों का यही संक्षिप्त स्वरूप निदर्शन है । लोकाः जनकाः जन्याः विभूतयः कविः सोमपाः ज्योतिर्भासाः प्राग्नेयानाम् ब्राह्मणानाम् काव्याः दिश: देवाः ऋषयः पितरः १ उत्तराः अग्निः २ मध्यमाः मरुतः पुलस्त्य: श्राज्यपाः मारीचाः वैश्वदेवानाम् वैश्यानाम् पौलस्त्याः ३ दक्षिणाः इन्द्रः अङ्गिराः हविर्भुजः तेजस्विनः ४ सर्वाः पूषा: वसिष्ठः सुकालिनः मानसाः ऐन्द्राणाम् क्षत्रियाणाम् पौलहाः पौष्णानाम् शूद्राणाम् वसिष्ठाः त इमे पार्वणाः, वर्ण प्रवर्त्तकाः, श्रमूर्त्ताः चत्वारः सप्त वा ऋतुपितरः पार्वणाख्या: - प्रान्तरिक्ष्याः संक्षेपेण निरूपिता द्रष्टव्या: * " पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतंयच्च भाव्यम् ” ( ऋक् ० १०/१०/२ ) के अनुसार मायापुर से घेष्टित प्रत्येक पदार्थ पुरुष शब्द से व्यवहृत हुआ है । इस प्राकृतिक वर्णं व्यवस्था का विशद वैज्ञानिक विवेचन " वेदेषु धर्मभेदः ' ' नाम के संस्कृत निबन्ध में देखना चाहिए । यह निबन्ध प्रकाशित हो गया है । [ १६७ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड - ३ प्रतपितरः- पार्थिवाः - श्रश्रुमुखाः-प्रेत पितरविज्ञानोपनिषत् तीसरे हैं श्रमुख नामक पार्थिव प्रेतपितर । ये प्रेतपितर गायत्रप्राणगर्भित पूषाप्राणप्रधान हैं । प्रधानतः काली ही पार्थिव पितर हैं, परन्तु अग्नि - यम - सोम के सम्बन्ध से प्रमुख पितर स्वरूप मीमांसा - यहाँ भी सात पितर हो जाते है, जैसा कि पूर्व में बतलाया जा चुका है । इस प्रकार तत्तत् अधिकारों में नियत, अतएव अधिकारिक नाम से प्रसिद्ध पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ भेद से वैधाविभक्त प्रेत ऋतु - दिव्य पितर त्रेलोक्य में व्याप्त हैं । " जायमानो वै जायते सर्वाभ्यो एताभ्यो एव देवताभ्यः " इस सिद्धान्त के अनुसार उत्पन्न होने वाली पार्थिव प्रजा में त्रैलोक्य के पितर देवता उपादान रूप से प्रविष्ट होते हैं, परन्तु इन पार्थिव प्रजाश्रों पृथिवीप्राण की प्रधानता है अतः इनमें पार्थिव प्रेत पितर ही प्रधान रहते हैं । शरीर अवसान के अनन्तर यह आध्यात्मिक प्रेत पितर तत्तत् कर्म विशेषों से तत्तत् प्राकृतिक पितरों के साथ युक्त होते हुए तत्तत् प्राकृतिक पितरों के नाम से व्यवहृत होने प्रेत पितृस्वरूप परिचय – लगते हैं । शरीर से निकले बाद ये प्रेत पितर कुछ काल तक त्रिवृत्स्तोमोपल-क्षित पार्थिव मण्डल में परिभ्रमण करते हैं । यहाँ इनमें पार्थिव प्रकरण की प्रधानता रहती है, अतएव यहाँ इस स्थिति में ये दुखी रहते हुए " प्रश्र मुख " नाम से प्रसिद्ध होते हैं । यही प्रेतपितरों की पहली अवस्था है आगे अन्तरिक्ष में जा कर तद्गत नित्य अधिकारिक पार्वण पितरों से युक्त होते हुए, तद्भावापन्न होते हुए ये भी पार्वणपितर नाम से ही प्रसिद्ध हो जाते | यही शारीर • पितर दिव्यलोक में जाकर, तद्गत नित्य आधिकारिक दिव्य पितरों के साथ सहयोग करते हुए, तद्-भावापन्न होते हुए " नान्दीमुख " नाम से प्रसिद्ध हो जाते हैं । इस प्रकार अधिकारिक नित्य पितरों के संयोग से इन कामिक, प्रनित्य शारीर ( आध्यात्मिक ) पितरों की भी तीन अवस्थाएँ हो जाती हैं । इसी अभिप्राय को प्रकट करता हुआ वायु पुराण कहता है—
" ब्रह्मचर्येण तपसा यज्ञेन प्रजया तथा ।
श्रद्धया प्रज्ञया चैव प्रदानेन च सप्तधा ॥१ ॥
कर्मस्वेतेषु ये युक्ता भवन्त्यादेहपातनात् । देवैस्तैः पितृभिः सार्द्ध मोदन्ते सोमपाज्यपैः " ॥ २ ॥ इति
" ये वै केचन अस्मात्लोकात् प्रयन्ति चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति " इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार पृथिवी लोकस्थ भूतात्मा भौतिकशरीरत्यागानन्तर गन्धर्वशरीर ( वायुमय प्रकरणोपसंहार - शरीर ) धारण करके १३ नाक्षत्रिक महीनों की अवधि में चन्द्रलोक में पहुँचते हैं । १ २ ३ ४ ही प्रेतपितर हैं । प्रारम्भ की सुकाली - हविर्भुक् प्राज्यपा - सोमपा ये चार अवस्थाएँ स्थूल हैं, मूर्त [ १६८ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्डं wwww ~ I प्रेतपितरविज्ञानोपनिषत् N. हैं । इन्हीं के लिए " लेपभाजचतुर्थाद्या: " यह कहा जाता है । सोमसद् - बर्हिषद् - प्रग्निष्वात्ता भेदभिन्न तीन नान्दीमुख पितर अमूर्त होने से लेपभाक् हैं । इस अवस्था में इनके प्रेतभाव की निवृत्ति है । उपर्युक्त अवस्थाएँ सद्गति से सम्बन्ध रखती हैं । ठीक इसके विपरीत कुकर्मा ( कुसंकारी ) प्रेतात्मा ( प्रेतपितर ) दुर्गति भाव से युक्त होते हुए, चान्द्र संस्था से वश्चित होते हुए कुत्सित योनि विशेषों में नाना रूप धारण करते हुए इतस्ततः घूमा करते हैं । आगे जा कर पाँच तिर्य्यग् योनियों में आते हुए ये ही अन्ततोगत्वा धातुजीव नाम से प्रसिद्ध स्थावर योनियों के बन्धन से सदा के लिए बद्ध हो जाते हैं । ये ही त्रिविध प्रेत- पितर " कर्म्मपितर " नाम से प्रसिद्ध हैं । श्रौतक ( पिण्डपितृयज्ञादि ) में नित्य आधिकारिक पितरों की प्रधानता है, एवं इन कर्म्म पितरों का प्रधान सम्बन्ध स्मार्तक से है । इन्हीं के लिए पिण्ड दान - प्रञ्जलिदानादि लक्षण श्राद्धकर्म का विधान है । श्रौत पितृकर्म्म " प्रेतकर्म्म " किंवा अशुभलक्षण कर्म्म " है | श्राद्ध सम्बन्धी इन्हीं त्रिविध प्रेतपितरों का दिग्दर्शन कराता हुआ प्रमाणान्तर कहता है-पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः । योमुखा ते पितरः परिकीर्तिताः ॥ १ ॥
तेभ्यः पूर्वतरा ये च प्रजावन्तः सुखचिताः । ते तु नान्दीमुखा नान्दी समृद्धिरिति कत्थते ॥२ ॥ ( ब्रह्म पुराण )
पितामहादुवं ते स्युर्नान्दीमुखाः पितरस्त्ररूपविज्ञानोपनिषत् समाप्त हुई । अब क्रमप्राप्त सापिण्ड विज्ञानोपनिषत् की और श्रद्धालु पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । इति - पितरस्वरूपविज्ञानोपनिषदि प्रेतपितरविज्ञानोपनिषत् समाप्ता इति - श्राद्धविज्ञाने पितरस्वरूपविज्ञानोपनिषत् समाप्ता -२ -[ १६ ९ ]
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शुद्धिपत्रम् पृष्ठ संख्या पंक्ति संख्या अशुद्ध शुद्ध ५ १३ ॥२ ॥
॥३ ॥
५ १६ प्रमाण्यवाद प्रामाण्यवाद ७ २ योगसाध्या योगसाध्य ७ २८ विपयों विषयों ८ १७ ।१२०।२ । १।६ ह. १४ वेदवाह्या वेदबाह्या ह २५ चर्म चर्म ११ २ ११ १७ दृष्टार्थों ११ २६ संसहता संहिता १२ २४ १०1१1१ १०।१५।१ १३ ५ गूलहं १३ १२ स्वधामिर्देव १४ १६ १०।१४।१०।११ गूळ्हं स्वधाभिर्देव १०1१४ । १० - ११ १५ १४ सुनव सूनवो १५ १६ शुक्रभुक्त शुक्रगत १६ २ तेभ्यः स्वराऽ तेभिःस्वराळ् १६ १६ पितृन् पितॄन् १७ १३ पितृन् पितॄन् १६ २ पितॄन् पितॄन् १६ १६ प्रतिरात्यायुः प्रतिरत्यायुः २० १३ कामदुधा कामदुघा २१ ह दक्षिणानि २२ २१ पितृणां पितॄणां २२ २६ है । हैं । २६ ५ वह २७ २४ सौमः सोमः २७ २४ पितृन् पितॄन् [ १७१ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड शुद्धिपत्रम् पृष्ठ संख्या पंक्ति संख्या अशुद्ध शुद्ध २८ ३ श्रामाद्यात् ग्रामात्ं, ३० १ इत इन ४ ३१ " पितर ": " पितर " ३१ १६ यषिर स्थविर ३३ १६ तर मनुष्य- पितर ३३ १७ मनुष्य पितर मनुष्य- पितर ३५ २६ अशानाया अशनाया ३६ २ अव्यवहिततर अव्यवहितोत्तर ३६ २६ ४० २ ४१ ५ कोइ सकी सर्वक्षा अवच्छेदका बच्छिन्न सर्वथा श्रवच्छेदकावच्छिन्न ४२ १० सनातन धर्धी ४३. १ सीदानी ४४ १७ समाप्ताः ४५ ५ ४६ १ सर्वम ४६ ३ भेद भिन्न ४६ २८ प्रक्षर ४७ ५ सृष्टि ४७ ह ४७ १२ ४८ २२ प्रशवः I २८ ५४ ६ ६३ ८ सानोपनिषत् तत्त्व ह् सनातन धर्मी सन्त समाप्ता विज्ञानोपनिषत् सर्वम् भेद - भिन्न अक्षर सृष्टि बीजमव्ययम् ” अव्ययानुगृहीत पशवः के तत्त्व ही प्राणात्माविज्ञानोपनिषत् प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् ६७ १६ ६७ २० ७७ २४ ७८ ८१ ८४ १२ w x x w x w ि विधृति ६ अङ्गिरा भृग तत्त्वा भव्यक्ति अङ्गिरा भृगु तत्त्वाभिव्यक्ति द्वितीयायावतस्थे द्वितीयावतस्थे [ १७२ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड शुद्धिपत्रम् पृष्ठ संख्या पंक्ति संख्या अशुद्ध शुद्ध ८५ ६ प्राणात्मविज्ञानोपनिषद् प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् 58 ७ प्रधान प्रधान ६० १५ अग्निव अग्निवे ६२ १८ सुरक्षित में ६४ १ पतिष्ठायेदं सुरक्षित रहने में प्रतिष्ठायेदं ६४ २४ भग - प्राण को भग - प्राण का ६५ ह ६५ ११ शक्तिधन सू प्रवग्यन्ति शक्तिधनसूर्य प्रवर्ग्यान्त ६५ १२ सत्तत् तत्तत् ६५ १३ भूतों का भूतों की ६५ १७ ( शत ०६ ) ६६ २२ अवर ( शत ० ६।२।१।२ ) अवसर ६७ १८ ( तां ० १४।२४ ) ( १४ | २ | ४ ) १०० १५ दो - दो १०४ २४ है । १०७ ६ १०७ १० ११२ १८ ब्रह्मण ११४ २५ दसवें इन्दुतत्त्व ( ३६०० ) हैं । इन्द्रतत्त्व ( ३६००० ) नवें ब्रह्मरणा ११५ २८ सौर - वान्द्र सौरचान्द्र ११६ २१ भौम सोम ११ २५ अभ्भ अम्भ १२३ १८ अपेक्षा अपेक्षा से १२५ १० सुस्वधावा सुस्वधावाः १२७ १४ अन्तभवि अन्तर्भाव १२८ २ सप्तप्राणः सप्तप्रारणाः १२८ १६ मनमाना बना मनमाना पाठ बना १२६ १६ सोपोपहूताः १३३ २१ सम्बन्धः सम्बद्धः १३३ २२ सम्बन्धः सम्बद्धः १३४ २० अरात्रवि अहोरात्र वि ० [ १७३ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड शुद्धिपत्रम् पृष्ठ संख्या पंक्ति संख्या अशुद्ध १३४ २५ सू १३५ १६ तमादे १३८ ३ १३८ २२ १४० ५ शब्द कालेऽग्निकरणः शुद्ध: सूर्य्योह तस्मादे शब्द कालेऽग्निकणाः विकलनधर्मा १४० २१ भूतान्यन्तर्बहि भूतान्यन्तहिं १.४२ १० शदद्धेमन्तः शरद्धेमन्तः १४३ २ सोमवदभ्य सोमवद्भ्य १४३ ३ सोमार्य वा सोमाय वा १४४ १५ पितृमान पितृमान् १४५ त्रिभुज सपिण्ड् १५३ ६ अश्वस्थ मेघस्थ अश्वस्य मेधस्य १५३ १४ रच - रच स्व - स्व १५८ १६ साख्य सांख्य [ १७४ ]