Part II Pitra Swarup Vigyanopanistha part 2 — पृष्ठ 161–170

पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री २ · पृष्ठ 161–170

पृष्ठ 161

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड प्रेतपितर विज्ञानोपनिषत् wwwwwww है । गायत्राग्नि प्रधान बन जाता है । उधर यह गायत्राग्नि पूर्वकथनानुसार " प्रेति " भाव से युक्त है, अतएव तत् सम्बन्धावच्छिन्न पार्थिव पितर " प्रेतपितर " नाम से प्रसिद्ध होते हैं । सर्वत्र ( तीनों लोकों में ) सौम्यप्राण ही पितर हैं, परन्तु अग्नि - यम- सोम की प्रधानता से तीनों को क्रमशः प्राग्नेय, याम्य, सौम्य नामों से व्यवहृत कर दिया जाता है । वस्तुतः " प्रायन्तु नः पितरः सौम्यासः " यह सिद्धान्त अक्षुण्ण है । पितर को हमने प्रजोत्पादक बतलाया है । दूसरे शब्दों में प्रजा को उत्पन्न करने के कारण ही इस सौम्यप्राण की पितर संज्ञा रक्खी गई है । उत्पत्ति में इच्छा - तप- श्रम ये तीन प्रजोत्पादक पितर-- अनुबन्ध नितान्त अपेक्षित हैं, जैसा कि " अमृतात्म विज्ञानोपनिषत् " में विस्तार से बतलाया जा चुका है | बिना इन तीनों के समन्वय के सृष्टि कथमपि नहीं हो सकती । इनमें इच्छा का विकास ज्ञानमय मन से होता है, तप का विकास क्रियामय प्रारण से होता है, एवं श्रम की प्रवृत्ति प्रर्थमयी वाक् से होती है । ऐसी स्थिति में प्रजासृष्टि के प्रवर्तक पितरप्राण के साथ भी इन तीनों अनुबन्धों का समन्वय होना आवश्यक हो जाता है । उपर्युक्त तीनों ( पर- मध्यम अवर ) पितरों में अग्नि - यम- सोम इन तीनों तत्त्वों के समन्वय से उक्त तीनों अनुबन्धों का भोग सिद्ध हो जाता है । मनोमय ज्ञानमूर्ति अव्यय का सम्बन्ध महत् नाम के पारमेष्ठ्य " वीन " सोम के साथ होता है । अव्ययानुग्रह से महत् सोम ज्ञानमूर्ति बन जाता है । यही पहिली ज्ञान - कला है । इसी से इच्छा नाम के प्रथम अनुबन्ध का उदय होता है । क्रियाघन प्राणमूर्ति अक्षर का विकास प्रान्तरिक्ष्य यम नाम के वायु धरातल पर होता है । इस अक्षर के सम्बन्ध से यम - वायु क्रियामय बन जाता है । यही दूसरी क्रियाकला है । इसी से तप नाम के दूसरे सृष्ट्यनुबन्ध का उदय होता है, एवं अर्थमूर्ति क्षर के अनुग्रह से पार्थिव अग्नि अर्थमय बन जाता है । दूसरे शब्दों में अर्थधन वाङ्मूर्ति क्षर की विकास भूमि पार्थिव अग्नि ही है । यही तीसरी अर्थकला है । इसी से श्रम नाम के तीसरे सृष्ट्यनुबन्ध का उदय होता है । तीनों लोकों में ( प्रत्येक में ) अग्नि - यम - सोम की सत्ता बतलाई गई है साथ ही में पूर्व कथनानुसार तीनों क्रमशः अर्थ-क्रिया - ज्ञानमूर्ति बनते हुए इच्छा - तप - श्रम के प्रवर्तक हैं । फलतः इस त्रिविद्भाव के कारण तीनों लोकों में तीनों अनुबंधों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । हाँ, यह ध्यान अवश्य रखना पड़ेगा कि द्युलोक में होने वाली सृष्टि ज्ञानप्रधाना है, क्योंकि वहाँ ज्ञानमूर्ति सोम की ही प्रधानता है । ज्ञान ही प्रानन्द की विकास भूमि है । बिना ज्ञान न आनन्द का उदय हो सकता है, न आनन्द का अनुभव, अतएव इन सोमप्रधान अर्थात् ज्ञानमूर्ति दिव्य पितरों को नान्दीमुख ( श्रानन्दमुख - - प्रसन्नमुख ) कहना न्यायसंगत होता है । अन्तरिक्ष में होने वाली सृष्टि क्रिया प्रधाना है । कारण यहां क्रियामूर्ति यम - वायु की ही प्रधानता है । ऋतवायु ही ऋतभाव का प्रवर्तक है अतएव इन वायु - प्रधान अर्थात् क्रियामूर्ति प्रान्तरिक्ष्य पितरों को ऋतु पितर ( पार्वणपितर ) नाम से व्यवहृत करना न्यायसङ्गत होता है । पृथिवी में होने वाली प्रजा सृष्टि [ १५७ ]

पृष्ठ 162

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड wwwwwmi प्रेतपितरविज्ञानोपनिषत् श्रर्थप्रधाना ( भूत प्रधाना ) है, क्योंकि यहाँ अर्थमूर्ति पार्थिव गायत्र अग्नि ही प्रधान है । इसका प्रेति भाव . से सम्बन्ध बतलाया गया है । अतएव इन अग्निप्रधान अर्थात् अर्थमूर्ति पार्थिव पितरों को प्रेतपितर ( मुख पितर ) नाम से व्यवहृत करना न्यायसङ्गत हो जाता है । व्यवयव ( अग्नियमसोमावयव ) पितरप्राण का सोमांश पदार्थों की उत्पत्ति का कारण है, अग्न्यंश स्थितिभाव का प्रवर्त्तक है एवं यमांश उत्पादन भाव का अधिष्ठाता है । घनावस्थापन्न श्रब्रूमूर्ति पार्थिवसोम दिक्सोम है, अतएव " पृथिव्यन्तरिक्षंद्यौदिशः ” के साथ क्रमशः " अग्निवायुरादित्यः - आप: " इस वाक्य का सम्बन्ध माना जाता है । इस त्रैगुण्य भावानुगत पितर- अप्सोम के समन्वय से पार्थिव गायत्राग्नि द्वारा पृथिवी का स्वरूप निर्माण होता है । इसी आधार पर " अद्द्भ्यः पृथिवी " ( तै. उपनिषत् ) यह कहा जाता है । उपादान द्रव्य प्रप्तत्त्व है, यही रेतः ( आहुति द्रव्य ) है । गायत्राग्नि योनि है । पवमान वायु रेतोधा है । इन तीनों - रेत: - योनि - रेतोधा तत्त्वों के समन्वय से भूसृष्टि हुई है । आगे चलिए । प्रान्तरिक्ष्य गन्धर्वयुक्त ( वायुरूप ) चन्द्रसोम रेतः है ऋताग्नि ( नाक्षत्रिकारिन ) योनि है, पावक नाम का यमवायु रेतोधा है । तीनों के समन्वय से अन्तरिक्ष संस्था का उदय हुआ है । दिव्यलोकस्थ ब्रह्मणस्पति नाम का सोम रेतः है, सत्य सावित्राग्नि योनि है, शुचि नाम का वायु रेतोधा है । तीनों के समन्वय से दिव्य संस्था स्वस्वरूप से प्रतिष्ठित है । सत्त्वगुण ज्ञानप्रधान है, रजोगुण क्रिया प्रधान है । तथा तमोगुण अर्थप्रधान है । इसी त्रैगुण्य भाव की नियत व्यवस्था के कारण ज्ञानप्रधाना दिव्यसृष्टि को " सत्त्व विशाल सर्ग ” नाम से, क्रियाप्रधान आन्तरिक्ष्य सृष्टि को " रजोविशाल सर्ग " नाम से एवं अर्थप्रधान पार्थिवसृष्टि को " तमो विशालसर्ग ' नाम से व्यवहृत किया जाता है । प्राधानिक ( साख्य ) शास्त्रसम्मत चतुर्दशविधभूतसर्ग का इन्हीं तीनों सृष्टियों में अन्तर्भाव है । इस भूतसर्ग के प्रवर्त्तक पूर्वप्रतिपादित पर - मध्यम- अवर पितर ही हैं । " जायमानो वै जायते सर्वाभ्यो एताभ्यो एव देवताभ्यः ” इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार सब कुछ दृश्यमान प्रपञ्च ऋषि - पितर- देवता - असुर - गन्धर्वादि - प्राणदेवताओं के समन्वय - तारतम्य से ही उत्पन्न हुआ है । इस प्रकार पितर प्रारणवत् इतर ऋषि - देवप्राणादि को भी उत्पादक माना जा सकता है, तथापि अग्नि सोममयी मैथुनी सृष्टि का प्रथम प्रवर्त्तक इन प्राण देवताओं में से केवल पितरप्राण ही है, अतएव अङ्गिरागभित भार्गव सौम्यप्राण को ही पितर शब्द से सम्बोधित किया जाता है । इस प्रकार पितरत्राण का सृष्टि प्रवर्त्तकत्व भली भाँति सिद्ध हो जाता है । उक्त तीनों ही पितर अाधिकारिक पितर हैं । इन आधिकारिक पितरों के आधार पर तीन प्रकार के ही कामिक पितरों का स्वरूप सम्पन्न होता है जैसा कि आगे जा कर स्पष्ट हो जायगा । N [ १५८ ]

पृष्ठ 163

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड ' ब्रह्मणस्पतिः " दिव्यः प्राणमूर्तिर्ज्ञानमयो भावापन्नः विरल -सोमः विशुद्ध सोमः १ -( ” “ शुचिः + वायुः दिव्यो क्रियामयो प्राणमूत्तिः -भावापन्नः विरल --यमः २ – २ + पितरः सोमप्रमुखाः ३ – " “ सावित्रः --दिव्योऽग्निः प्राणमूत्तिरर्थमयो -भावापन्नः विरल प्रग्निः -( ३ ( प्रवर्त्तकाः नान्दीमुखाः सत्वविशालसर्ग-→ - पितरः : परा -**-" " पावकः वायुः क्रियामूत्तिरान्तरिक्ष्यो - * -भावापन्नः तरल -वायुः विशुद्ध – यमः १ -" ” नाक्षत्रिकः “ गन्धर्वः - " सोमः अग्निः प्रान्तरिक्ष्यः प्रान्तरिक्ष्यः – -वायुमूर्तिर्ज्ञानमयो वायुमूत्तिरर्थमयः भावापन्नो भावापन्नो तरल तरल - -सोमः प्रग्निः – २ – २३ २ --पितरः वायुप्रमुखाः - २ प्रवर्त्तकाः रजोविशालसर्ग- पार्वणाः + मध्यमाः [ १५६ ] " " नाक्षत्रिकः --पार्थिवोऽग्निः घनभावापन्नोऽर्थमूत्तिः -अग्निः विशुद्ध -अग्निः १ -( : -वायु सोमः-पार्थिव पार्थिवः अर्थमूत्तिः अर्थमूत्तिः - -भावापन्नः भावापन्नः घन घन - -यमः सोमः २ – ३ -( " पवमानः " " “ दिश्यः मुखाः प्रवर्त्तकाः श्रश्र + तमोविशालसर्ग-श्रवराः २ --पितरः अग्निमुखाः ३ ---ऋतुपितरविज्ञानोपनिषत्

पृष्ठ 164

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड I प्रेतपितरविज्ञानोपनिषत् ~ www १ - ब्रह्मणस्पतिः -+ सोमः + रेतः ३ - १२ - शुचि: -→ यमः— → रेतोधाः । सौर सृष्टि: - " ज्ञानमयीसत्त्व प्रधानाः ” १३ – सोवित्रः → अग्निः योनिः १ -पावकः → यमः रेतोधाः २ २ २ - गन्धर्वः-+ सोमः + रेतः - प्रान्तरिक्ष्य सृष्टि: - " क्रियामयीरजः प्रधानाः " ३ – नाक्षत्रिकः अग्निः—-योनिः ' १ – गायत्रः अग्निः -योनिः १ + - २ — पवमानः—— यमः रेतोधाः पार्थिव सृष्टि: - " अर्थमयीतमः प्रधानाः ". . ३ – दिश्यः -- सोमः -- → रेतः ( १ – ब्रह्मणस्पतिः सोमः — + ज्ञानघनेन मनसानुगृहीतः ( इच्छा मूत्तिः ) ३ ← ~ < २ – शुचिः– यमः क्रियाद्यनेन प्राणेनानुगृहीतः ( तपोमूत्तिः ) ( ज्ञानमूत्तिः सोमः ( ३ - सावित्रः अग्निः-१ पावकः यमः + अर्थघनेन वाचानुगृहीतः ( श्रममूर्तिः ) - * -- → क्रियाधनेन प्राणेनानुगृहीतः ( तपोमूत्तिः ) २-२ - गन्धर्वः सोमः . ३ – धिष्ण्यः प्रग्निः -ज्ञानघनेन मनसानुगृहीतः ( इच्छामूत्तिः ) अर्थघनया वाचानुगृहीतः ( श्रममूत्तिः ) → क्रियामूर्तिः यमः --१ – गायत्रः -- अग्निः १ + २ २ – पवमानः यमः ( ३ – दिश्य: - + सोमः श्रर्थवनया वाचानुगृहीतः ( श्रममूत्तिः ) क्रियावनेन प्राणेनानुगृहीतः ( तपोमूतिः ) ज्ञानघनेन मनसानुगृहीतः ( इच्छामूत्तिः ) + ग्रर्थमूत्तिः अग्निः [ १६० ]

पृष्ठ 165

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड ww navr १ - - सोमविभूतिः ino | सोमदण्ड : अग्नियमगभितः प्रेतपितरविज्ञानोपनिषत् १ – विरल सोमो मनोमयो ज्ञानमूर्तिर्ब्रह्मणस्पतिः - दिव्यलोकस्य: २ – विरलयमः प्राणमयः क्रियामूर्तिः शुचिः - दिव्य लोकस्थः ३ – विरलाग्निर्वाङ्मयोऽर्थमूर्तिः सावित्रः - दिव्यलोकस्थः सोममण्डलम् २ – यमविभूतिः सो माग्निगर्भितः यमदण्डः -- ** -१ - तरलयमः - प्राणमयः क्रियामूर्त्तिः पावकः — श्रान्तरिक्ष्य: २ - तरलसोमो मनोमयो ज्ञानमूत्तिर्गन्धर्वः - प्रान्तरिक्ष्यः ३ – विरलाग्निवाङ्मयोऽयं मूर्ति धिष्ण्यः - प्रान्तरिक्ष्यः ३ - अग्निविभूतिः अग्निदण्ड : यमसोमभितः १ - घनाग्निर्वाङ्मयोऽर्थमूत्तिर्गायत्रः --- पार्थिवः २ – घनयमः प्राणमयः क्रियामूर्तिः पवमानः –—पार्थिवः ३ – घनसोमो नोमयो ज्ञानमूर्तिदिश्य: - पार्थिवः अग्निमण्डलम् यममण्डलम् ~ m १ - नान्दीमुखाः - नित्याः - दिव्यपितरः सौम्या को पितरत्राण बतलाया गया है, साथ ही में यह भी कहा गया है कि सौम्यप्राण की मूल प्रतिष्ठारूप सोम ( भुत ) द्युलोक में विशुद्ध रूप से ( प्रतिस्विक नान्दीमुख पितृस्वरूप मीमांसा - रूप से ) प्रतिष्ठित रहता है । सौम्यप्राणयुक्त ( पितरत्राणयुक्त ) सोम सबका अन्न बनता है । ऐसी अवस्था में सोमात्मक ये द्युलोकस्थ दिव्य पितर प्रधानरूप से प्रन्नपितर नाम से व्यवहृत होने लगते हैं । ये अन्न पितर ग्रागे जा कर उष्ण - शीत-श्रनुष्णशीत इन तीन प्रकार के पदार्थों से खाए जाते हुए, इन विभिन्न तीन जाति के पदार्थों में प्राहुत [ १६ ९ ]

पृष्ठ 166

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड प्रेतपितर विज्ञानोपनिषत् होते हुए क्रमशः अग्निष्वात्ता- सोमसद् बर्हिषद् इन नामों से प्रसिद्ध हो जाते हैं । इस प्रकार दिव्य- पितर सात के स्थान में सोमापेक्षया तीन ही रह जाते हैं । इन तीनों में भी अग्निष्वात्ता पितरों में अग्नि की प्रधानता, बर्हिषदा पितरों में यम की प्रधानता, एवं सोमसद् पितरों में सोम की प्रधानता है, परन्तु साथ ही में इस क्रम धारा के होते हुए भी पाठकों को यह नहीं भूलना चाहिए कि उक्त तीनों पितरों का मूला-धार सोम तत्त्व ही है । सोमसद् पितरों में बहुत होने वाला पदार्थ एवं जिसमें इसकी प्राहुति होती है, वह पदार्थ दोनों ही सोमप्रधान हैं अतएव प्रग्निष्वात्ता बर्हिषद् पितरों की अपेक्षा सोमसद् पितरों में आहुत होने वाला पदार्थ एवं जिसमें इसकी आहुति होती है, वह पदार्थ दोनों ही सोमप्रधान हैं अतएव अग्निष्वात्ता बर्हिषद् पितरों की अपेक्षा सोमसद् पितरों में सौम्यप्राण का पूर्ण विकास माना गया है, यही कारण है कि सोमसद् पितर ( स्वमण्डली में ) राजा पदवी से अलंकृत माने गए हैं । इन्हीं सोमसद् पितृप्रमुख सौम्य पितरों के लिए तत्तत् श्रौतस्मार्त्त पौराणिक स्थलों में सोमषदः - सोमवन्तः - सौम्याः - सौम्यासः - सुभास्वराः इत्यादि शब्द प्रयुक्त हुए हैं । इन सब शब्दों में अर्थ सम्बन्ध में प्रायः अभिन्नता ही समझनी चाहिए । उपर्युक्त तीनों अन्नपितरों में से सोमसद् पितर साध्य देवताओं के प्रवर्त्तक बनते हुए " साध्यानां पितरः " ( साध्यों के पितर ) कहलाते हैं । ये साध्य पारमेष्ठ्य प्राप्य देवता हैं | देवघन सूर्य से ऊपर ' आपोमय परमेष्ठी में इन आपोमय सौम्य साध्य देवताओं का विकास होता है । प्राप्यप्राणप्रधान होने से ये पारमेष्ठ्य साध्य देवता ज्योतिर्धन इन्द्रप्रधान सौर देवताओं के विरोधी हैं । पारमेष्ठ्य होने से साध्य देवता “ पूर्वदेवाः ” नाम से प्रसिद्ध हैं, कारण सूर्य्य से पहिले परमेष्ठी का विकास हुआ है । परमेष्ठी के देवता विष्णु हैं | विष्णुप्रधान परमेष्ठीलोक ही " अपुनर " - " अशोकमहिम " - नाक इत्यादि नामों से प्रसिद्ध है । विष्णु यज्ञमूर्ति है । इसी यज्ञ से प्रापोमय साध्य देवता पारमेष्ठ्य यज्ञ के प्रवर्त्तक बनते हैं । साध्य देवताओं के इसी वैज्ञानिक स्वरूप को लक्ष्य में रख कर ऋषि कहते हैं " यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् । तेंह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥ " ( यजु ० सं ० ३१।१६ ) प्राप्यप्राणप्रधान होने से ही इन साध्य देवों के लिए अमरकार ने " पूर्व देवाः - सुरद्व ेषः ” ( अमर-कोश १।१२ ) यह कहा है । यम प्रधान बहिषद् नाम के दूसरे सौम्य पितर देवयोनि रूप देव - दानव-यक्ष - गन्धर्व - किन्नर - पिशाच - गुह्यक- सिद्ध - नाग - सुपर्ण - राक्षस आदि वायव्य प्राण देवताओं के उत्पादक हैं एवं अग्नि प्रधान श्रग्निष्वात्ता नाम के तीसरे सौम्य पितर प्रधानरूप से मरुतादि प्राण देवताओं के पितर माने गए हैं । उक्त तीनों पितरों का प्रतिष्ठास्थान सनातन, वैभ्राज्य, सोमपाथ नामों से प्रसिद्ध है । सोमसद् पितरों का लोक सनातन है, इसी को कहीं - कहीं संतानक नाम से भी व्यवहृत किया गया है । बद् पितरों का लोक सोमपथ है, यही सोमपद नाम से भी प्रसिद्ध है एवं अग्निष्वात्ता पितरों का लोक वैभ्राज है । यही लोक कहीं - कहीं विभ्राजमान नाम से भी व्यवहृत हुआ है । [ १६२ ]

पृष्ठ 167

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड प्रेतपितर विज्ञानोपनिषत् सोमसद् नाम के साध्यपितर ( साध्यों के पितर ) वैराज नाम से प्रसिद्ध हैं । इनकी अवान्तर विभूति गणना अनुपलब्ध है । बर्हिषद नाम के देवयोनिपितर सारीच नाम से प्रसिद्ध हैं । इनकी विभूति संख्या ८.६००० ( छियासी हजार ) है । अग्निष्वात्ता नाम के देवपितर पौलस्त्य नाम से प्रसिद्ध हैं । इनकी संख्या ६४००० ( चौसठ हजार ) सुनी जाती है । ३ १ २ उपर्युक्त तीनों पितरों के अग्नि - यम- सोम ये तीनों सहयोगी देवता कहलाते हैं । त्रि - श्रङ्गिरा -१ २ ३ भृगु इन तीन ऋषिश्रारणों के साथ कमशः जब सोम - अग्नि- यम का सम्बन्ध होता है तभी उक्त तीनों पितरों की स्वरूप निष्पत्ति होती है । सोमतत्त्व का अत्रि के साथ समन्वय होने से सोमसद् पितर का स्वरूप निष्पन्न होता है । सोम अत्रि ऋषि के पुत्र माने गए हैं । अत्रि चन्द्रपिता ( सोमपिता ) नाम से प्रसिद्ध हैं " पिता सोमस्य वै विप्रा जज्ञेऽत्रिर्भगवानृषिः । " इन पितरों में अत्रि - सोम की प्रधानता के तारतम्य से स्वरूप - भेद हो जाता है । यदि अत्रि का भाग प्रधान रहता है तो " सोमवद्द्भ्यः पितृभ्यः स्वधा " बोलते हुए आहुति दी जाती है । अत्रि एवं सोम दोनों समान सममात्रा में रहते हैं तो — “ सोमाय पितृमते स्वधा " यह प्रयोग होता हैं । यदि सोम की प्रधानता रहती है तो " सोमाय पितृपीताय स्वधा " यह वाक्य प्रयुक्त होता है । यम देवता का अङ्गिरा ऋषि के साथ सम्बन्ध माना गया है । अङ्गिरा की प्रधानता में यह यम अङ्गिरा नाम से व्यवहृत होता है अङ्गिरा एवं यम दोनों की समानता में वही यम श्रङ्गिरस्वान् कहलाने लगता है । यदि दोनों में से यम की प्रधानता हो जाती है तो वही यम " श्रङ्गिरसांपतिः " इस वाक्य से व्यवहृत होने लगता है । तीसरे भृगुप्राण के साथ अग्नि का समन्वय माना गया है । यही भृगुप्राण कवि नाम से प्रसिद्ध हैं । इसी का प्रत्यंश कव्य कहलाता है एतद्युक्त यह अग्नि " कव्यं वहति " इन निर्वचन के अनुसार कव्यवाट् नाम से ही व्यवहृत होगा । इस प्रकार " यमोऽङ्गिराः " - " यमोङ्गिरस्वान् " - " सोम पितृपीतः " तीनों देवता अभिन्नार्थक हैं । ब्रह्मवैवर्त पुराण में अग्नि और सोम का अङ्गिरा ऋषि के साथ सम्बन्ध बतलाया गया है । आगे जा कर कहा गया है कि इन तीनों में से अग्नि एवं सोम के लिए स्वधाकार करना चाहिए ( आहुति देनी · • चाहिए ) एवं तद्गत अङ्गिरा ऋषि के लिए केवल नमस्कार करना चाहिए । परन्तु वस्तु स्थिति के देखने से पुराण का उक्त मत सङ्गत प्रतीत नहीं होता । तीनों एक रूप में ही परिणत रहते हैं, ऐसी अवस्था में तदर्थकृत स्वधा नमस्कारं दोनों कर्मों का तीनों के ही साथ सम्बन्ध मानना न्यायसङ्गत प्रतीत होता है । यही कारण है कि ब्रह्मपुराण को छोड़ कर अन्यत्र कहीं भी पूर्वोक्त मत का उल्लेख नहीं मिलता । जैसा कि पूंर्व में कई बार बतलाया जा चुका है कि तीनों पितरों के साथ क्रमशः अग्नि - यम- सोम देवतानों का सम्बन्ध होता है । यही कारण है कि " पितृश्राद्ध " नाम से प्रसिद्ध श्रौत पिण्डपितृ यज्ञ में हवि द्वारा पहिले इन अग्नि - यमादि पितर देवताओं ( पितरों के देवता ) को प्राप्यायित किया जाता हैं, अनन्तर तक्षित [ १६३ ]

पृष्ठ 168

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड प्रेतपितर विज्ञानोपनिषत् www श्रग्निष्वात्तादि पितरों को स्वधा द्रव्य से तृप्त किया जाता है । " सोमायपितृमते " इस वाक्य से सोम-ज्येष्ठ, श्रतएव सोममय सोमसदा पितरों को तृप्त किया जाता है । " यमायाङ्गिरस्वते " इस वाक्य से यमज्येष्ठ, श्रतएव बहिषद् पितरों को तृप्त किया जाता है एवं " अग्नये काव्यवाहनाय " इस वाक्य से अग्निज्येष्ठ, अतएव श्रग्निमय अग्निष्वात्ता पितरों को तृप्त किया जाता है । इस देवक्रम से श्राद्ध देवता नाम से प्रसिद्ध अग्निप्रमुख वसु, यमप्रमुख रुद्र, सोमप्रमुख आदित्य नाम के गण देवता भी तृप्त हो जाते हैं । पूर्व प्रकरण से यद्यपि आग्नेय ( ग्रग्निव्वात्ता ), सौम्य ( सोमसद् ), याम्य ( वर्हिषद् ) इस क्रम से पितरों के तीन भेंद सिद्ध होते हैं, परन्तु ' तन्मध्यपतित ' न्याय से मध्यस्थ यमपितर का दोनों में ही अन्तर्भाव मान लियाजाता ऐसी परिस्थिति में पितृकरण के सम्बन्ध में अग्नि- सोम की ही प्रधानता रह जाती है । इस स्थिति को प्रधान मानने से निम्नलिखित पितृविषयक सारे विसंवादों का समन्वय हो जाता है । वायु पुराण के अनुसार अग्नि ही प्रधान पितर है । अन्यत्र अप ( सोम ) तत्त्व को ही पितर माना गया है । " तपोमय त्रैलोक्य में सर्वप्रथम प्रजापति ने अप् तत्त्व उत्पन्न किया । वे पानी ही स्वयंभू ब्रह्मा के पुत्र, एवं उत्तर में होने वाले देवतादि के पितर कहलाए " यही वहाँ निर्दिष्ट है । स्वयंभू ब्रह्मा वाङ्मय हैं । यही वाङ्भाग " सोऽपोऽ सृजत वाच एंव लोकात् " ( शत. ६ | १ | १ | ६ ) इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार परमेष्ठी रूप में परिणत होता है । यही प्रप्तत्त्व ( किंवाभृगु तत्त्व ) पितर है । वाक् इसकी मूल जननी है । इसी आधार पर " पितरोवाक्यमिच्छति " यह कहा गया है । " विष्णु भगवान वराह रूप धारण कर प्रापोमय समुद्र में से डूबते हुए भूपिण्ड को अपनी दंष्ट्रा पर उठाकर उसका उद्धार करते हैं । यह मृतपिण्ड पितर नाम से प्रसिद्ध है " इत्यादि रूप से महाभारत ने भूपिण्ड को पितर माना है । कारण स्पष्ट हैं । दिक्सोम एवं गायत्रग्नि की समुच्चितावस्था ही भूपिण्ड है, एवं अग्नि- सोम पितर की प्रतिष्ठा है । " प्रजापति के शरीर से रूप - रस- गन्ध - स्पर्श - शब्द नाम की पाँच तन्मात्राएँ उत्पन्न हुई । वे ही आकाश में इतस्ततः विचरती हुई पितर नाम से प्रसिद्ध हुई । " यह वराह पुराण का सिद्धान्त है । उक्त पञ्चतन्मात्राएँ सर्वप्रथम सरस्वान् नाम के पारमेष्ठ्य समुद्र में ही प्रादुभूर्त होती हैं । प्राण - प्राप - वाक् - अन्न अन्नादरूपक्षर प्रजापति का शरीर है । इसी से गुणभूत नाम से प्रसिद्ध रूपरसादि पञ्चतन्मात्राएँ उत्पन्न हुई हैं । परमेष्ठी के सम्बन्ध से ( सोममय होने से ) इन्हें भी पितर शब्द से सम्बोधित किया जा सकता है । उपर्युक्त अबान्तर सर्वविध पितरों का अन्ततोगत्वा श्रग्नि- सोम में ही पर्य्यवसान हो जाता है । उपर्युक्त तीनों पितरों को हमने विरलावस्थापन्न बतलाया है । विरलता प्राण का धर्म है । प्राण अमूर्त्त तत्त्व है प्रतएव इन पितरों को हम अवश्य ही " अमूर्त " शब्द से व्यवहृत कर सकते हैं । विधर्त्ता प्राणात्मक यही पितर त्रैलोक्य को धारण करते हैं । अतएव इन तीनों नान्दीमुखपितरों को " धर्ममूत्ति " भी माना जाता है । इनका नान्दीमुखत्व प्रकरण के आरम्भ में ही बतलाया जा चुका है । [ १६४ ]

पृष्ठ 169

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्डं परापित स्त्रयः नान्दीमुखा दिव्या प्रेतपितर विज्ञानोपनिषत् १ – सोमसदः → * सोमेनेजानानाम्-२ - बर्हिषदः-* पक्वेन दत्तेन लोकज यिनाम्-प ३ – अग्निष्वाताः --+ सनातन लोकाः पराः पितरः → सोमपथलोकाः मध्यमाः पितरः याजिनामग्निदग्धानाम्- - वैभाजलोकाः श्रवराः पितरः - ** -दिश: देवाः ऋषयः पितरः. लोकाः जनकाः जन्याः संख्याताः १ उत्तरा सोमः अत्रिः सोमसदः सनातनाः साध्यानाम् वैराजाः २ अन्तरा यमः | अङ्गिराः | बर्हिषदः सोमपथाः देवयोनीनाम् मारीचाः ८६००० ३ दक्षिणा अग्निः भृगुः अग्निष्वात्ताः वैभ्राजाः देवानाम् पौलस्त्याः ६४००० त इमे नान्दीमुखाः, धर्ममूर्तयः प्रभूतस्त्रयः सप्त वा दिव्यपितरः संक्षेपेण व्याख्याता द्रष्टव्याः - पार्वणाः- नित्या: - अधिकारिकाः - प्रान्तरिक्ष्याः-ऋतु पितर विज्ञानोपनिषत् में दिव्यपितरों की तरह पार्वण पितरों को भी श्रग्निष्वात्ता सोमसदादि अवान्तर सात अवस्थाएँ बतलाई गई हैं । वस्तुतः इनके तीन ही मुख्य पार्वण पितृस्वरूप मीमांसा - भेद समझने चाहिए । कहीं कहीं सुकाली पितर के समन्वय से ये चार प्रकार के हो जाते हैं । ये चारों पितर ऋतुपर्वों से सम्बन्ध रखने के कारण पार्वरण पितर नाम से प्रसिद्ध हैं । हविर्भुक् प्राज्यवा- सोमपा - सुकाली ये पार्वण पितर हैं । ' हविर्भुक् पितरों का ग्रीष्मऋतु के साथ सम्बन्ध है । आाज्यपा पितरों का वर्षाऋतु से सम्बन्ध है । सोमपा पितरों का शीत के साथ सम्बन्ध है । नान्दीमुख पितरों की तरह इन तीनों पितरों के अनुग्राहक भी अग्नि - यम-- सोम ही हैं । ये पितर अन्तरिक्षलोक को अपनी मूल प्रतिष्ठा बनाते हुए तिर्य्यङ्मुख रहते हैं । [ १६५ ]

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पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री २, पृष्ठ 170 का मूल पृष्ठ
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड प्रेतपितर विज्ञानोपनिषत् www ये धनभाव के मूर्त्तिमान माने जाते हैं । इनके शरीर होता है । ये ही देवयोनिविशेष हैं । इनके पैर नहीं होते हैं । ये चन्द्रमा के प्रकाश में ही रह सकते हैं । सौर प्रकाश में ये दग्ध हो जाते हैं । इन तीनों में से सोमपा नाम के सौम्यपितर " सोमवन्त " " सौम्यः " " काव्याः " " काव्यदाः " इत्यादि विविध नामों से प्रसिद्ध हैं । यह ध्यान रखना चाहिए कि दिव्य सात पितरों में भी सोमपा नाम के पितर हैं एवं इन प्रान्तरिक्ष्य पार्वण पितरों में भी सोमपा पितर हैं । एक वैराज हैं, दूसरे काव्य हैं । इनमें वैराज सोमपा पितर नान्दी-मुख हैं, एवं ये आन्तरिक्ष्य सोमपा पितर काव्य हैं । इन प्रान्तरिक्ष्य सोमपा पितरों का प्रवस्थान स्थान अन्तरिक्ष्य वायव्य विद्य त् - तेज के सम्बन्ध से " ज्योतिर्भासाः " नाम से प्रसिद्ध है । लोक संज्ञा के आधार पर ही इन्हें यत्र - तत्र प्रकरणों में " ज्योतिर्भासाः " नाम से भी व्यवहृत किया जाता है । दूसरे हैं हविर्भु नाम के अन्तरिक्ष्य पितर । इनका ग्रीष्म ऋतु पर्व से सम्बन्ध है । " हविर्भुजः " " हविष्मन्तः " दोनों शब्द अभिन्नार्थक हैं । हवि -- ग्रहरणार्थ इनका प्राह्वान किया जाता है, अतएव इन्हें " उपहूता: " भी कहा जाता है । श्रङ्गिराप्राण इनका प्रभव है । इनके लोक अन्तरिक्ष्य मरीचि पानी के सम्बन्ध से " मारीचाः " नाम से प्रसिद्ध हैं । इन्हीं लोकों को मरीचि नाम की सौर प्रान्तरिक्ष्य रश्मियों के गर्भ में रहने के कारण " मरीचिगर्भाः " नाम से व्यवहृत किया जाता है । तीसरे अन्तरिक्ष्य ऋतुपितर " श्राज्यपाः " नाम से प्रसिद्ध हैं । ये ही सुस्वधा नाम से भी व्यवहृत किए जाते हैं । पुलस्त्यप्रारण इनका आरम्भक है, अतएव इन्हें " पौलस्त्य " कहा जाता है । कितने ही आचार्यों के मतानुसार इनका उपादान कारण पुलस्त्यप्राण से प्रादुर्भूत होने वाला कर्दमप्रारण है । इस मत की अपेक्षा से कार्द्दम शब्द से भी व्यवहृत किया जाता है । " तैजो वै घृतम् ' ( तै ० सं ० २।२६।६ ) “ घृतमन्तरिक्षस्य ' ' ' ' ' ' ( शत ० ७ ५ १ ३ ) इत्यादि श्रीतप्रमाणों के अनुसार ये अन्तरिक्ष्य ऋतुपितर तेजोमूर्ति घृतमय अन्तरिक्ष के सम्बन्ध से " तेजस्विनः " नाम से प्रसिद्ध हैं । चौथे हैं काली पितर इन्हें कहीं कहीं सुकाला नाम से भी व्यवहृत किया जाता है । इनका आरम्भक वसिष्ठप्रारण है, अतएव इन्हें " वासिष्ठ " कहा जाता है । मनोमय प्रजापति के इनके लोक ' मानस ' नाम से प्रसिद्ध हैं । उपर्युक्त प्रान्तरिक्ष्य चारों पार्वण पितर क्रमशः ब्रह्म क्षेत्र विट् पौष्ण वीर्य्यो के प्रवर्त्तक हैं | स्थावर जङ्गमात्मक विश्व प्रपश्व में अग्निप्रधान आग्नेय पदार्थ बाह्मण हैं । इन्द्र प्रधान ऐन्द्र पदार्थ क्षत्रिय हैं । विश्वेदेव प्रधान वैश्वदेव पदार्थ वैश्य हैं । पूषा देवताप्रधान पौष्ण पदार्थ शूद्र हैं । अग्नि इन्द्र मरुत् पूषा के समन्वय से उक्त चारों पितर चारों वर्णों के प्रवर्तक बनते हैं । अग्नि से युक्त सोमपितर ब्राह्मणवर्ण के, इन्द्र से युक्त हविभुक् पितर क्षत्रियवर्ण के मरुत् ( विश्वेदेव ) से युक्त प्राज्यपापितर वैश्यवर्ग के तथा पूषाप्राण से युक्त सुकालीपितर शूद्रवर्ण के अधिष्ठाता हैं । प्रत्येक पदार्थ में भी उक्त चारों वर्णों का भाग होता है । कारण यही है कि प्रत्येक के उपादान ये चारों बनते है, श्रतएव " ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहूराजन्यः ' ( ऋक् ० १० / ६०।१२ ) के अनुसार प्रत्येक [. १६६