Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 111–120
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 111–120
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.प्रजातन्तु वितान देवघन सौरजगत् के महिममण्डल में पृथिव्यादि सब प्रतिष्ठित हैं, एवमेव आध्यात्मिक प्राणाग्नित्रयी महिमा - मण्डल में सौम्य पितरप्राण प्रतिष्ठित हो रहे हैं । देवप्राण की महिमा में के पितर अवश्य ही प्रतिष्ठित रह सकते हैं । इसी अभिप्राय से - ' महिम्न एषां पितरश्च नेशिरे ' ( पितर: -अपि आध्यात्मिकप्राणदेवानां महिम्नः - सकाशात् - ईशिरे ) । एषां -रही बात विजातीयता की । इसके सम्बन्ध में उत्तर दिया जा चुका है । सोम अन्न हैं, अग्नि अन्नाद है । अन्न अन्नाद का विरोधी नहीं है, अपितु अन्नाद की प्रतिष्ठा है । विरोध की बात तो विदूर, दोनों मिलकर ' अत्तैवाख्यायते ' न्याय से एकरूप बन जाते हैं । पितर देवता बन जाते हैं, देवता पितर बन जाते हैं । विकासधम्मविच्छिन्न अग्नितत्त्व विकास की चरमावस्था में ( प्रधि - परिधि-स्थान में ) पहुँच कर संकोचधर्म्माविच्छिन्न सोमतत्त्व रूप में परिणत हो जाता है, एवं संकं चधर्म्मा सोम संकोच की चरमावस्था में ( केन्द्र में ) पहुँच कर विकासधर्म्मा अग्निरूप में परिणत हो जाता है । केन्द्र - परिधि के समतुलन से दोनों अभिन्न हैं । केन्द्र में प्रतिष्ठित अग्नि, तथा परिधि से बाहिर प्रति-ष्ठित सोम, दोनों का मध्यक्षेत्र में यजन सम्बन्ध हो रहा है । इस पारस्परिक सम्बन्ध से अग्नि-सोम में प्रोत है, सोम अग्नि में त है, यही दोनों का ओतप्रोतभाव सम्बन्ध है । इसी याज्ञिक सम्बन्ध को लक्ष्य में' रखकर - ' देवा देवेष्वदधुरपितु समविव्यचुः ' गया है । याज्ञिक सम्बन्ध का तात्पर्य यही है कि, प्राकृतिक - आधिदैविक यज्ञ में अग्न्यादिप्राण-देवताओं में भौतिक सोमाहुति होने से ' सुत्या ' नामक सोमयज्ञ सम्पन्न होता है । परन्तु हमारे इस आध्यात्मिक सुत्यायज्ञ में देवता ( प्राणेन्द्रियवर्ग ) देवरूप सोममय पितृप्राण की ही स्त्री के शोणिताग्नि हुति दे रहे हैं । मनुष्य ( द्विजाति ) प्राकृतिक सुत्यायज्ञ से समतुलित अपने वैधयज्ञ में जहाँ भौतिक सोम की आहुति देते हैं, प्राणदेवता अपने प्राकृतिक सुत्यायज्ञ में जहाँ भौतिक सोम दे रहे हैं, वहाँ आध्यात्मिक यज्ञ में - ' देवाः इन्द्रिय देवाः - देवेषु - पितृप्राणात्मकेषु देवेषु की - क्रतु- आहुति सुत्यायज्ञ - श्रदधुः - सम्पादयाञ्चक्र ' के अनुसार प्राण देवता अन्य सौम्य प्राणदेवों में यज्ञस्वरूप प्रतिष्टित कर रहे हैं । मन्त्रगत ' यानि ' पद साकाङक्ष है । एवं पितृप्रारण से यह पद ' पित्र्यहांसि ' का ही संग्राहक बन रहा है । पित्र्यसहः परस्पर संश्लिष्ट हो कर ( शोणिताग्नि में हुत होकर ) ही व्यक्त रूप ( गर्भरूप ) में परि-त होते हैं । जबतक शुक्र में २ = चान्द्र पित्र्यसहः पिण्डरूप में परिणत नहीं हो जाते, तबतक ( १६ वर्ष पन्त ) न तो स्वयं बीजी में प्रजनशक्ति ही व्यक्त होती, एवं न पुत्रादि की ही अभिव्यक्ति होती. इसी अभिप्राय से ' यानि - समविव्यचुः ' ( पितृसहांसि प्रथमं सह संगम्य, मूलपुरुषस्याभिव्यब्ज-कानि भवन्ति, अनन्तरं च शोणिताग्नौ संगम्य पुत्रादिरूपेण व्यक्ति भावमगच्छन् ) कहा गया है । शुक्रगत पित्र्यसहः परस्पर संश्लिष्ट हो कर ही पुत्रादि व्यक्तियों में ( पुत्रादि की स्वरूप निष्पत्ति. के लिए ) शोणिताग्नि में आहुत होते हैं । · एक ही व्यक्ति ( पुत्र ) में जा कर इस पित्र्यसहः की गति ७५
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श्राद्धविज्ञान उपरत नहीं हो जाती, अपितु जब तक इस पितृपिण्ड का अपत्य भूपिण्ड पर प्रतिष्ठित रहता है, तब तक ( सातवीं सन्तान पर्यन्त ) वह पिण्ड अंशात्मना प्रदीप्त रहता है । इसी अभिप्राय से ' उत यानि विषुः ' कहा गया है । सातवीं पीढ़ीं पर्य्यन्त ऋणदान सम्बन्ध से प्रदीप्त ये पितर अपत्यों में भुक्त इन्हीं अपने तन्यभागों को लेने के लिए सपिण्डीकरण - काल में पुन: इन अपत्यों में प्रविष्ट होते हैं । सातों पितरों के सहोभाग एकत्र समवेत हो कर पुत्र - पौत्रादि तन्तुरूप से अभिव्यक्त होते हैं । तत्तत् तन्तु ( सन्तान ) की मृत्यु के अनन्तर तत्तत् तन्तु में ऋणरूप से प्रतिष्ठित तत्तत् संख्याक सहोभाग श्राचापकर्त्ता पितरों में समान रूप से प्रविष्ट हो जाते हैं । यही ' प्रत्यर्पण ' है । जिस संख्याक्रम से अर्पण होता है, उसी संख्याक्रम से ( सम संख्या से ) वे अंश उन में प्रविष्ट हो जाते हैं । इसी अभिप्राय से – ' नि विविषुः पुनः ' कहा गया है । ' आ एषां तनूषु पुनर्विविशुः ' ही निष्कर्षार्थ है । शारीर श्राग्नेय देवता भी प्रारणात्मक हैं, सौम्य पितर भी प्राणमूर्त्ति हैं । प्राणतत्त्व सर्वथा अधामच्छद है । स्थानावरोध करना भूत का धर्म है, प्राण का नहीं । ऐसी स्थिति में प्राणात्मक पितरों के लिए अवकाश की मीमांसा करना ही व्यर्थ है । फिर ये दोनों तत्त्व तो अभिन्न सखा हैं । अग्निमहिमा इन की आश्रय भूमि है, यहाँ श्राकर वे मिल जाते हैं । मिल कर करते हैं । फलत: प्रथम प्रश्न सर्वथा समाहित बन जाता है । २--सहोभिर्विश्वम् ० भाष्यकार ने ' सहोभिः ' का अर्थ ' बलैः ' किया है । कहना न होगा कि यह अर्थ विज्ञान -मर्यादा से सर्वथा बहिष्कृत है 1 । पुत्र - पौत्रादि में अभित होकर प्रजारूप से वितत होने वाला, साहस का प्रदाता, पुरुष शुक्र में प्रतिष्ठित,, नक्षत्रावच्छिन्न चान्द्ररसात्मक, नक्षत्रसंख्या - भेद से २८ कल सौम्य पितृप्राणमय तत्त्व विशेष ही ' सह ' है, जिस का पूर्व में निरूपण किया जा चुका है । सह १ नहीं, २८ हैं, अतएव ' सहोभिः ' कहा गया है । ' वि यस्तस्तम्भ पडिमा रजांसि ' इत्यादि दीर्घ-तमोक्त मन्त्रव्याख्यान में ततलाया जा चुका है कि, ६ रजों से प्रकृत में बीजी पुरुष की पुत्रावि ६ सन्तानें अभिप्रेत हैं । ' रजः ' शब्द सामान्यतः ' लोक ' का वाचक माना गया है । ' लोकस्तु भुवने जने ' के अनुसार ' जन ' भी लोक है । एवं ' प्रजास्यात् सन्ततौ जने ' के अनुसार प्रजा ' जन ' है । फलतः ‘ रजांसि ' का अर्थ ‘ अपत्यानि ' करने में कोई बाधा नहीं आती । श्रुतिपठित ' पूर्व ' शब्द पुत्रादि में हुत होने वाले पिण्डभाग की आहुति से पूर्वकाल का द्योतक है । ' धाम ' शब्द ' पितृसहः पिण्ड ' .का सूचक है । ' अमितानि ' का अर्थ है - व्यवच्छेदरहित, अविच्छिन्न रूप से सन्तत । ' तनूषु ' का अर्थ है - ' ७-६-५-४-३- २ - ११ इस क्रम से विभक्त रहने वाले ' पितृसहः ' नामक पिण्डांश । ' भुवन ' ' का अर्थ है – ‘२१ –१५-१०-६-३-१- इस क्रम से सूनु रूप में परिणत होने वाला प्रत्यंश । ' पुरुधा ' ७६
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प्रजातन्तुवितान का अर्थ है - बहुशः । इन परिभाषाओं के समन्वय के अनन्तर ही प्रकृत मन्त्रार्थ का यथावत समन्वय सम्भव है । सहोभिः – शुक्रस्थिताः २८. कलोपेताः पितृभागाः । रजः- - पुत्रपौत्रादयः । -पूर्वा-- आहते: पूर्वकालम् धामानि - पितृपिण्ड: तनूषु- - पितरः भुवना - सूनवः पुरुधां बहुशः " पत्नीशरीरस्थ योषाप्राणप्रधान शोणिताग्नि में आहुति होने से पहिले पहिले ' ७-६-५-४-३-२-१०.१ इन आत्मरूप व्यवच्छेदों से रहित, अतएव अमित ( एकरसात्मक ) पुरुषशरीरस्थ वृषा-प्राणप्रधान - महदात्मावच्छिन्न शुक्रस्थ अष्टाविंशतिकलात्मक पितरपिण्ड आहुत होता है । इस आहुति -सम्बन्ध से आगे आगे अपने तन्य भागों से पुत्रादि की उत्पत्ति का कारण बनता हुआ, स्वपिएंड को ७-६ - आदि पूर्वोक्त क्रमानुसार विभक्त करता हुआ, अतएव अपनी सहोमात्रा को उत्तरोत्तर परि-मित बनाता हुआ स्वसहः सन्तनन से सात पीढ़ी पर्यन्त अपत्यों में व्याप्त हो जाता है । अपने सहो भागों को ' पितरः - सूनवः ' दो भागों में विभक्त करता हुआ इन सहोभागों को अपत्य क्रमानुसार नियत कर देता है । " २१ सूनुभाग के साथ ७ पितृभाग को, १५ सूनु भाग के साथ ६ पितृभाग को, इस प्रकार पूर्वप्रदर्शित क्रमानुसार उत्तरोत्तर उत्पन्न होने वाले योनि - शरीरों में अपनी मात्राएँ देता हुआ इन मात्राओं को तत्तद्योनिशरीरों के आधीन करता जाता है । पुत्रपौत्रादिगत पितृसहों का मूल स्वयं मूल-पुरुष ( पर्य्यन्त व्याप्त रहतीं बीजी ) ' बद्ध रहता है । यहाँ बद्ध होकर वे सहः कलाएँ वृद्धातिवृद्धप्रपौत्र हैं । इस प्रकार सूनुरूप - पुत्र - पौत्रादि सम्पूर्ण भुवनों में वह बीजी पितर अपने अपत्य भागों को ( आत्मधेय कलाओं को ) व्याप्त कर देता है । पितर का यह प्रसार कर्म समानधारा से प्रवाहित नहीं होता । अपितु बीजी में ७, पुत्र में ६, पौत्र में ५, इस प्रकार न्यूनाधिकरूप से ही इसका प्रसार होता है, जैसा कि आगे के मन्त्र में स्पष्ट हो जायगा । द्वितीय मन्त्र व्याख्यान में बतलाया गया है कि, बीजी पिता के पितृसहभाग शोणिताग्नि में आहुत हो कर दो स्वरूप धारण कर लेते हैं । द्विधा विभक्त उन्हीं ' सूनवः ' का प्रकृत मन्त्र में विश्लेषण हुआ है । बीजी पिता के २८ पितृसहों • का पुत्र - पौत्रादि क्रम से २१-१५-१०-६-३-१ इस प्रकार विभाग हुआ है । इन ६ पितृसहों को ऋणरूप से लेकर पुत्र - पौत्र - प्रपौत्र - वृद्वप्र ० - प्रतिवृ०-वृद्धातिवृ ० उत्पन्न हुए हैं । उत्पन्न होने वाले पुत्रपौत्रादि ये ६ सूनु पुत्रोत्पादन रूप इस तीसरे कर्म से ७७
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श्राद्धविज्ञान सौम्यसहोरूप बलप्रद पित्र्यभाग को आत्मनीन किंवा आत्मधेय, तथा तन्य, इन दो भागों में विभक्त करते हैं । स्वयं पुत्रादि के महानात्मा में स्व प्रतिष्ठा के लिए प्रतिष्ठित रह जाने वाले सहभाग ' सवनी - त्याज्य ' हैं, एवं पुत्रादि के पुत्रादि में शुक्र द्वारा आहुत हो जाने वाले सहोभाग ' सवनीय - त्याज्य ' हैं । तात्पर्य यह हुआ कि मूलपुरुष में जो अपनी कमाई से २८ सहांसि आए, सूनवः कहलाए । इनमें ७ इसी में प्रतिष्ठित रह गए, २१ पुत्र में चले गए । स्वप्रतिष्ठ सप्तक अत्याज्य आत्मधेय कहलाया, पुत्रगत त्याज्य २१ भाग तन्य कहलाया । इस प्रकार २ = विध सूनवः ' ७-२१ ' क्रम से आत्म - तन्य भेद से दो भागों में विभक्त हो गए । बीजी पुरुष में स्वयं कंपनी कमाई के जहाँ २८ थे, वहाँ इस के पिता - पितामह प्रपिता ० वृद्धः - अतिवृः - वृद्धाति ० इन ६ के ऋगुरूप २१-१५-१०-६-३–१ – इतनी कला ओर प्रतिष्ठित रहतीं हैं, जिन के संकलन से ५६ सहभाग हो जाते हैं । इनमें से वृद्धातिवृद्धप्र ० की १ कला तो आत्मवेयरूप से बीजी में ही प्रतिष्ठित रहती है । वितानमात्राभाव से इस के सम्बन्ध में - ' द्विधा सूनवः ' नियम समन्वित नहीं होता । शेष ५ के स्वा-मधनवत् ( २८ वत् ) आत्मधेय - तन्य, भेद से दो दो भेद हो जाते हैं । ५६ में से बीजी की सातवीं पीढ़ी पर्यन्त ३५ ऋणकलाओं का भोग हो जाता है, -१ कला आत्मधेय रूप से बीजी में प्रतिष्ठित रह जातीं हैं । २१ आत्मधेय ऋणात्मक, ७ आत्मधेय धनात्मक, इस प्रकार बीजी में २८ आत्मधेयकला बच रहतीं हैं । स्वधन की २१ कला, ऋण भाग की ३५ कला, दोनों की समष्टिरूप ५६ कला तन्य-रूप में परिणत रहतीं हैं । इस प्रकार मूलपुरुषस्थ पितर अपने आत्मधनरूप २८ सूनुओं को, पिता- पितामहादि से ऋणरूप से आगत ५६ सूनुओं को, दो भागों में विभक्त मधेय २८ कलाओं को तो अपने आप में प्रतिष्ठित कर लेते हैं, एवं एकविंशतिकल आत्मघनरूप तन्यभाग को, ३५ कल आत्मऋणरूप तन्य-भाग को, सम्भूय ५६ कल तन्य भाग को अपनी अवर प्रजारूप सातवीं पीढ़ी पर्यन्त वितत कर देते हैं । अपने तन्यात्मक ५६ सूनुभागों को अवर पुत्रादि प्रजा में वितत करना ही तृतीय कर्म है,.. जैसा कि अगले मन्त्र से स्पष्ट हो रहा है । ४- नावा न क्षोदः ० मूलपुरुषस्थ पितर प्राणात्मक पित्र्यसहः पिण्ड उक्त कथनानुसार ( तृतीयकर्म से ) वर प्रजा -रूप पुत्र - पौत्रादि में प्रतिष्ठित हुआ । क्या यह क्रम वृद्धातिवृद्धप्रपौत्र पर जाके समाप्त हो जाता है?, ऋषिउत्तर देते हैं - नहीं । आगति के साथ गति का नित्य सम्बन्ध है, सम्भूति के साथ विनाश Sarfarara बध है, सर्ग के साथ साथ लयधारा प्रक्रान्त है । स्थिति बिना गति को आश्रय बनाए प्रतिष्ठित ही नहीं रह सकती । प्रकृतमन्त्र इसी गतिभावमूलक प्रत्यर्पण का रहस्य बतला. रहा है । ७८
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1 प्रजातवितान शरीरोत्क्रान्ति के अनन्तर पुत्र - पौत्रादि के सहोरूप पितृभाग महानात्मा के साथ अन्तर्याम सम्बन्ध रखते हुए चन्द्रलोक में चले जाते हैं, जैसा कि - " ये वै केचास्माल्लोकात् प्रयन्ति, चन्द्रम-. समेव ते सर्वे गच्छन्ति " इत्यादि वचन से प्रमाणित है । इस ओर भूपिण्ड है, उस ओर अन्तरिक्ष. में अपने दक्षवृत्त पर चन्द्रमा परिक्रमा लगा रहा है । दोनों के अन्तराल में ' अव ' नाम से प्रसिद्ध रोदसी समुद्र प्रतिष्ठित रहता है । भूपिण्ड से चन्द्रलोक में जाने वाले प्रेतपितर - लक्षण प्रेतात्मा को इस अवसमुद्र का सन्तरण करना पड़ता है । इसी स्थिति का दृष्टान्त द्वारा स्पष्टीकरण हुआ है । समुद्र के अपार ( इस ओर केकिनारे से उस ओर के किनारे तक, तथा उस पार से. इस पार तक ) आने - जाने वाली नौका से जैसे मनुष्य समुद्र सन्तरण में समर्थ होते हैं, ठीक इसी प्रकार अपने जीवन सूत्रों से ( जो कि जीवन सूत्र ' श्रद्धः सूत्र ' नाम से प्रसिद्ध हैं, जीवन प्रतिष्ठा के कारण बनते हुए जो सूत्र ' स्वस्ति ' नाम से व्यवहृत हुए हैं ) अवार रूप भूपिण्ड से पाररूप चन्द्रमा के मध्य में आने वाले श्याव - शवलादि क्रूर प्राणयुक्त अतिशय दुर्गमस्थानों में होकर चन्द्रलोक में इस प्रेतात्मा को इसकी प्रतिष्ठा रूप ' बृहदुक्थ ' नाम से प्रसिद्ध महानात्मा स्वशक्ति से ( चान्द्राकर्षण से ) एकविंशत्यादि युक्त पुत्र - पौत्रादि प्रजा को चान्द्रमण्डलस्थ पिता- पितामहादि पर पितरों में प्रतिष्ठित करता जाता है । अथवा महानात्मा ही स्वयं गन्ता है । कारण पितृसहः इसी में प्रतिष्ठित रहते हैं । विज्ञान, प्रज्ञान, भूतात्मा, महानात्मा, आदि सभी शारीर खण्डात्मा अपने अपने भावों के उक्थ हैं । परन्तु पूर्वप्रतिपादित ' महदात्मोपनिषत् ' के अनुसार चित् का योनिस्थानीय महानात्मा इतर सब खण्डात्म-वित्त का भी उक्थ है । यही क्यों, सर्वथा अखण्ड चिदात्मा ( अव्यय ) तक को इस के गर्भ में जाना पड़ता है । ऐसी स्थिति में इससे बड़ा उक्थ और कौन हो सकता है । तभी तो इस आत्म-विवर्त्त को ' महानात्मा ' कहना न्यायसङ्गत बनता है । महानात्मा की इसी बृहदुक्थता को लक्ष्य में रख कर ऋषि ने ' इसे ' बृहदुक्थ ' नाम से विभूषित किया है । यही चन्द्रलोक में गमन करता है, इसी के द्वारा पितृसहों का प्रत्यर्पण होता है । पुत्र का महान् पिता के ६ का, पौत्र का महान् पितामह के का, प्रपौत्र का महान् प्रपितामह के ४ का, वृद्धप्रपौत्र का महान् वृद्धप्रपितामह के ३ का, अति-वृद्धप्रपौत्र का महान् अतिवृद्धप्रपितामह के २ का, एवं वृद्धातिवृद्धप्रपौत्र का महान् वृद्धातिवृद्धप्रपितामह के १ का प्रत्यप करता है । इस अर्पण से अन्तिम महान् ( वृद्धातिवृद्धप्रपितामह का महान् ) सापिण्ड्यभाव को प्राप्त हो जाता है । तभी तो ' पिण्डदः सप्तमस्त्वेषाम् ' कहा गया है । पितर प्राणात्मक सौम्य सहोभाग सात भागों में विभक्त होकर कुछ काल पर्य्यन्त ( यावदायुर्भोगपर्य्यन्त ) तो पृथिवी पर रहते हैं । अनन्तर चन्द्रलोक में जाकर उन ऋण भागों का प्रत्यर्पण कर देते हैं, यही निष्कर्ष है । पितृसंह: की पृथिवी, तथा चन्द्रमा को छोड़कर अन्यत्र स्थिति नहीं है । " उक्त मन्त्रार्थों से विज्ञ पाठकों को यह भलीभाँति विदित हो गया होगा कि, यह पितृकर्म ७ ह
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श्राद्धविज्ञान चतुर्द्धा विभक्त है । बीजी पिता के शुक्र में प्रतिष्ठित २ = स्वात्मधन में से २१ धन, एवं बीजी पिता के ही शुक्र में प्रतिष्ठित ५६ ऋणात्मक धन में से ३५ ऋण, इन ५६ तन्यात्मक सूनवः को लेकर जन्म ग्रहण करना पितृसहः का प्रथम कर्म है । जन्म लेने के अनन्तर अपने शुक्र में स्वतन्त्र रूप से २८ कलात्मक चान्द्रसहों का ग्रहण करना द्वितीय कर्म है । इस के अनन्तर सवनीय त्याज्य षट्पञ्चाशत् कल ( ५६ ) तन्य भाग को वर प्रारूप अपने पुत्रादि में आहुत करना तृतीय कर्म है, जिस का मन्त्र में विश्लेषण हुआ है । एवं ऋणरूप से प्राप्त कलाओं का ( शरीरविच्युति के अनन्तर ) प्रत्यर्पण कर देना चतुर्थ कर्म है । १ - षट्पञ्चाशत्संख्यं पित्र्यं सहः - उपादाय जन्मग्रहणम्-- अष्टाविंशतिसंख्यं नवीनं निजं सह उपादत्ते -- तदिदं प्रथमं कर्म तदिदं द्वितीय कर्म ३ – षट्पञ्चाशत्संख्यस्य सवनीयभागस्यावरेष्वाधानम् - - तदिदं तृतीयं क ४ - अष्टाविंशतिसंख्यस्यात्मनीनभागस्य परेष्वाधानम्-- - तदिदं चतुर्थं कर्म्म प्रकरणोपसंहार-पितर प्राणमूर्त्ति सर्वात्माधिष्ठाता, अतएव ' बृहदुक्थ ' नाम से प्रसिद्ध महानात्मा के ही उक्त चार कम हैं । ऐसे महानात्मा को 9 महानात्मा के उक्त वैज्ञानिक स्वरूप को सर्वप्रथम जिस ऋषि ने समझा, समझ कर अपने शब्दों में प्रकट किया, वे भी तत्कालीन ' यशोनाम ' पद्धति के अनु-सार ' बृहदुक्थ ' नाम से ही प्रसिद्ध हुए । बृहदुक्थ महर्षि की पर्षत् में बृहदुक्थविज्ञान ( पितृविज्ञान ) काही प्राधान्य था । इसी पर्वत के द्वारा दीर्घतमा के प्रश्नों का यथावत् समाधान हुआ । दीर्घकाल विद्यारूप तम से अभिभूत, अतएव यौगिकमर्य्यादया ' दीर्घतमा ' नाम से पुकारे जाने योग्य वर्त्तमान युग के अभिनिविष्टों की मोहनिद्रा भंग करने के लिए बृहदुक्थ ( श्रीगुरवः ) के अर्कद्वारा सापिण्ड्य-विज्ञान से सम्बन्ध रखने वाला प्रकृत प्रजातन्तुवितानविज्ञान उपस्थित हुआ है । बृहदुक्थस्थानीय श्रीगुरुचरणों ने जिन शब्दों में यह रहस्य प्रकट किया है, मङ्गल भावना से उनमें से कुछ एक वचन उद्धृत करते हुए, साथ ही सन्तानपरम्परा का स्पष्टीकरण करने वाले परिलेखों को सुविधा के लिए व्यवस्थित रूप से उद्धतकरते हुए प्रस्तुत अवान्तर प्रकरण उपरत हो रहा है -श्रयमत्र मालिकसङ्ग्रहः--१ – दैवं सहो यन्निहितं हि तस्मिन् पित्र्यं सहोऽप्योतमितीममर्थम् । • संक्षिप्तमादौ भगवान् महर्षिः स वामदेव्यो बृहदुक्थ ऊचे ॥
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प्रजातन्तुवितान
२ - एषां बलानां पितरश्च देवाश्वापीशते. ते समविव्यचुश्च ।
क्रतु ' च देवेष्वदधुः पृथकस्थानिमान् प्रमीताः प्रविशन्ति पश्चात् ॥
३ – लोकान् सहोभिर्निखिलानटन्ति पूर्वाणि धामांन्यमितानि मत्वा ।
यच्छन्ति तन्वां भुवनानि तानि प्रसारयन्ते बहुधा प्रजाश्च ॥
४ – ये स्वविंदो येऽप्यथ राक्षसा इति द्वेधाऽसुराः स्वर्विदशुक्ल चन्द्रमाः ।
मासेन सौम्यांशव आत्मनि क्रमादाशेरते विंशतिरष्टचाह्निकाः ॥
५ -- इत्थं पितृ स्तोमगतिः सपिण्डता परेषु सप्तस्ववरेषु चोदिता ।
भूतात्मदिव्यात्मयुजोऽन्तरात्मनः सौम्यस्य नातः परितः स्थितिः क्वचित् ॥
६ - दातं सप्तसु पूरुषेषु श्रद्धानसूत्रं प्रवदामि तां गाम् ।
प्रत्यर्पणात् सोद्भियते तदासौ स्वयोनिमायाति जहाति यूथम् ॥
७ -नाक्षत्रिकेद्वादशमासरूपः सम्वत्सरः सोऽस्ति पिता स गर्भे । देहं विनिर्माति तदेवमर्थं कौषीतकीया भगवन्त आहुः || " ( श्रीगुरुप्रणीते - अहोरात्रवादे - आर्तवाधिकर णे ) “ आप्तोपदेशः प्रमाणम् " - " तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्य्यव्यवस्थितौ " - " यच्छ-ब्द आह, तदस्माकं प्रमाणम् " इत्यादिरूप से शास्त्रप्रामाण्य - निष्ठा को ही अपनी मान्यताओं में प्रधान अवलम्ब मानने वाले आस्था - श्रद्धानुगत धर्माचरणशील मानवों के परितोष के लिए यद्यपि " पितरः - सूनवः - तन्तवः - पिण्डाः - सहांसि - तन्तुवितानम् " आदि प्रजातन्तुवितानविज्ञानोपनिषत् के सम्बन्ध में तत्तद्विशेष - प्रसङ्गावसरों पर ही प्रमारग उद्धृत कर दिए गए हैं । तथापि सर्वान्त में. पुनः कुछ एक वे वचन और उद्धृत कर दिए जाते हैं, जो विस्पष्टरूप ' द्विर्बद्ध ' न्याय से परम्पराओं ' का समर्थन - प्रतिपादन - स्वरूपविश्लेषण कर रहे हैं । से इन ' तन्तु तत्त्व -वस्तुगत्या इस प्रामाण्यवाद से धर्मशील सनातनप्रजा की आस्था - श्रद्धा जहाँ श्वोवसीयस्ब्रह्मानुगता बनेगी वादियों के अभिनिवेश का भी वाग्बन्धन कर सकेगा, निश्चयेन कर सकेगा, इसी , वहाँ माङ्गलिक यही प्रामाण्यवाद. के साथ क्रमप्राप्त दूसरी ' ऋणमोचनोपायोपनिषत् ' की ओर श्रद्धाशील प्रजा का ध्यान आकर्षित अनुभूति कराया जा रहा है । १ – अवस्पृधि पितरं योऽधिविद्वान् पुत्रो यस्ते सहसः सून ऊहे । कदाँचिकित्वो अभिचक्षसे नोऽग्ने कदा ऋतचिद्यातयांसे ॥ ( ऋक् ०५।३।६ । ) २ - नाहं तन्तुं न विजानाम्योतुं न यं वयन्ति समरेऽतमानाः ॥ कस्य स्वित् पुत्र इह वक्त्वानि परो वदात्यवरेण पित्रा ॥ ( ऋक् ०६ । ६ । २ । ) । ८१
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श्राद्धविज्ञान स इत्तन्तुं स विजानात्योतुं स वक्त्वान्मृतुथा वदाति । य ई चिकेतदमृतस्य गोपा अवश्चरन् परो अन्येन पश्यत् ॥ ( ऋक् = ६।६।३ । ) । ४ते सूनवः स्वयसः सुदंससो मही जज्ञुर्मातरा पूर्वचित्तये । स्थातुश्च सत्यं जगतश्च धर्म्मणि पुत्रस्य पाथः पदमद्वयाविनः || ( ऋक् सं १ ९ ५६ | ३ | ) ।
५ - ते मायिनो ममिरे सुप्रचेतसो जामी स योनी मिथुना समोकसा ।
नव्यन्नव्यं तन्तुमा तन्वते दिवि समुद्र अन्तः कवयः सुदीतयः ॥
( ऋकू ० १११५६ | ४ | ) । ६ - वितन्वते धियो अपांसि वस्त्रा पुत्राय मातरो वयन्ति । उपप्रक्षे वृषणे मोदमाना दिवस्पथा वध्वो यन्त्यच्छ ॥ ( ऋक् ५।४७।६ ) । ७ - सप्त क्षरन्ति शिशवे मरुत्वते पित्रे पुत्रासो अप्यवीवतन्नृतम् । उभे इदस्योभयस्य राजत उभे यतेते उभयस्य पुष्यतः ॥ ( ऋक् ० १०।१३।५ । ) - एकस्वष्टुरश्वस्या विशस्ता द्वा यन्तारा भवतस्तथ ऋतुः या ते गात्राणामृतुथा कृणोमि ताता पिण्डानां प्रजुहोम्यग्नौ ॥ ( ऋक् ०१।१६२।१६ । ६ -- तपोष्पवित्रं विततं दिवस्पदे शोचन्तो अस्य तन्तवो व्यस्थिरन् । अवन्त्यस्य पवीतारमाशवो दिवस्पृष्ठमधि तिष्ठन्ति चेतसा ॥ ( ऋ ०६३२ । ) ।
१० - श्ररूरुचदुषसः पृश्निरग्रिय उता बिभर्त्ति भुवनानि वाजयुः ।
मायाविनो ममिरे अस्य मायया नृचक्षसः पितरो गर्भमादधुः ॥
( ऋ ०३३ ) । ११ - यो यज्ञो विश्वतस्तन्तुभिस्तत एकशतं देवकर्मेभिरायतः । इमे वयन्ति पितरो य आययुः प्र वयाप वयेत्यासते सते ॥ ( ऋकू ० १०।१३०।१ । ) ।
१२ – पुमाँ एनं तनुत उत्कृणत्ति पुमान् वि तत्ने अधिनाके अस्मिन् ।
इमे मखा उप सेदुरू सदः सामानि चक्रं स्तसराण्योतवे ॥ ( ऋक् ०१०११३० । २ ॥
इति - सापिण्ड्य विज्ञानोपनिषदि प्रजातन्तु वितान विज्ञानोपनिषत् प्रथमा –१–८२
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) | १ | | १३० १० ० कू ) । २ | | ०१०।१३० ऋटकू । ) । = ६।६।३ ऋक् ( ) | | ३ | १५६ १ | [ सं || तयः ४ ||| । ५६ त पोरेलेखः-चान्द्रसहोवितान ९-) ०/१३/५1 ॥ २।१६ ०१।१६ ऋक् ) । | २ | ८३ हा टक्क ॥ २५ २४ घनिष्ठा शताभष पूर्वभाद्रपद २६ अवरा २३ 0. 0000000000000 मात्मनमित्या 00000 मूल 0000000000000000000 उत्तराषाढ अभिजित् २२ २१ धनः मान अत एवं कलात्म वैज्ञानिका : नाना ( ) पुदीषाद २० चन्द्रमा विचक्षराः १३ पुनबेसु आद्रा मृगाशरा ज्येष्ठा १८ 7 महाख्य ध्यावत्या अनुराधा अश्लेषा सपा विशाखा .१५ २४ हस्त उत्तरफाल्गुनी पूर्व फल्गुनी 0000000000000000 धामान पूषा सूरजः परिचक्र सो रेमासार सुवनाने विश्वा 1 " अनु प्रजा पुरुष 100000000000000000000000 श्रण- पितामह वृद्ध तिवृद्ध सुशास वृद्धमपित सहाास ६ ११२३४ ८१०१२३४५६७ १०१११२३३१४१६ + १३४५६ हांसि -१५ पितामहणम् सहांसे प्रपितामहम् ७ महानात्मा विचक्षणाः s dotolo000 90 int I I 7 X रेक १६ १५ धनम् पः तन्तु १. सहःप्रपितामतः श्रृजुभावेन नाना (, प्रजा तदिन्यं वितनेषु ) रुपेभ्यः १० प्रर्वतक सभ्भूय सहांसि स्वार्जित स्वात्मने तिर्य्यगृरुपेशा , वृद्धप्रावतामहनः धनात्मकेषु . 1 भयः-तियर्यगृरूपे प्रतिष्ठितानि सहांसि ६ २८ तन्तुषु यः- + सहसि अतिवृद्धप्रपितामहतः पिनुः पितृभ्यः । तान्येतानेि सकाशात् सम्भूय २१ ५६ सहांसि ३ सांसि चतुरशीति सहांसि , पिना पितृप्रणमित्या वृद्वातिवृद्धमपितामहतः ( ८४ महत कलो ) ः १५ इयं हुपैज्ञानिकाः सहांसि महानात्मा , } +६२७ II III I
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