Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 101–110
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 101–110
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4 प्रजातन्तुवितान. वृषाप्राणप्रधान है, यही शुक्र की प्रतिष्ठा है । जिस प्रकार शरीर प्रतिष्ठा दृष्टि से पुरुष स्त्री कहलाया है, वहाँ शुक्र की प्रतिष्ठा की दृष्टि से इसे ' पुरुष ' कहना ही न्यायसङ्गत वन सकता है । शोणित आग्नेय है, एवं इस दृष्टि से स्त्री पुरुष है, यह भी मान लिया । परन्तु आग्नेय शोणित के गर्भ में प्रति-ष्ठित रहने वाला ' स्त्री ' सौम्ययोषाप्राणप्रधान है, यही शोणित की प्रतिष्ठा है । जिस प्रकार -शरीरप्रतिष्ठा की दृष्टि से स्त्री पुरुष कहलाई है, वहाँ शोणित की प्रतिष्ठा की दृष्टि से इसे स्त्री कहना अर्थ बनता है । सौम्यशुक्र में प्रतिष्ठारूपेण प्रतिष्ठित आग्नेय वृषाप्रारणात्मक पुभ्ररण, तथा आग्नेय शोणित में प्रतिष्ठारूपेण प्रतिष्ठित सौम्य योषाप्राणात्मक स्त्रीभ्र ए, जब तक इन दोनों भ्रूणों - शोणित का मिथुनभाव व्यर्थ है । अतएव हम का दाम्पत्यभाव नहीं हो जाता, तबतक शुक्र कह सकते हैं कि, वस्तुगत्या यह तीसरा मिथुनभाव ही गर्भस्थिति का कारण है, जिस के लिए--' वृषा योषामनुधावति ' कहा गया है । जक्क तीन युग्मों से अग्नि - सोम संस्था के तीन विभाग हमारे सम्मुख उपस्थित हो जाते हैं । स्त्री - पुरुष के शरीरों का युग्म प्रथम युग्म है, स्त्री - पुरुष के शोणित- शुक्र का युग्म द्वितीय युग्म है, एवं स्त्रीपुरुष के स्त्रीभ्रूण - पु ंभ्र ूणों का युग्म तृतीय युग्म है । प्रथम युग्म की दृष्टि से पुरुष पुरुष है, स्त्री स्त्री है । द्वितीय युग्म दृष्टि से पुरुष स्त्री है, स्त्री पुरुष है । एवं तृतीय युग्म की दृष्टि से पुनः पुरुष पुरुष है, स्त्री स्त्री है । पुरुषसंस्था मध्यदृष्टि से जहाँ स्त्रीप्रधाना है, वहाँ उपक्रमोपसंहार-दृष्ट्या पुरुषप्रधाना ही है । स्त्रीसंस्था मध्यदृष्टि से जहाँ पुरुषप्रधाना है, वहाँ उपक्रमोपसंहार-दृष्ट्या स्त्रीप्रधाना ही है । १ --- पुरुषशरीरम्-- आग्नेयम् ( पुरुषः ) २- स्त्रीशरीरम् --- मौम्यम् ( Fat ). -१ - पुरुषरेतः--सौम्यम् ( स्त्री ) -पुरुष संस्था ४ २ - स्त्रीशोणितम् - आग्नेयम् ( पुरुष: ) स्त्रीसंस्था १- पुम्भ्रूण: --आग्नेयः ( पुरुष: M २ - स्त्रीभ्रूण: --सौम्यः ( FET ).
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श्राद्धविज्ञान " उक्त रहस्य को न जानने वाले लौकिक पुरुष सर्वथा अन्धे हैं । रहस्य को जानने वाले ही आँख वाले हैं । किंवा आँखों वाले ही इस रहस्य को जान सकते हैं, अन्धे नहीं जान सकते " इस कथन से ऋषि को क्या आदेश देना है?, विचार कीजिए । विषयभोगपरायण कामकामी मनुष्य दाम्पत्यभाव का एक ही अर्थ समझते हैं - कामशान्ति, इन्हीं को ' कामान्ध ' कहा गया है । कामान्ध व्यक्ति को यह विचारने की अपेक्षा नहीं है कि, मैं शुक्र का निरर्थक व्यय कर रहा हूँ, अथवा इसे सार्थक बना रहा हूँ । यह शुक्र पितृधनात्मक ऋण है । फलतः ' प्रजातन्तुसन्तान ' का ऐसे वैषयिक लौकिकपुरुष की दृष्टि में कोई महत्त्व नहीं रह जाता । परन्तु जो विचारशील हैं, विज्ञानचक्षुष्क हैं, वे इस रहस्य को जान कर इस तथ्य पर पहुँचते हैं कि, शुक्र- शोणित का मिथुनभाव केवल विषयैषणा ही नहीं है, अपितु इसमें ऋणमोचन की वह गुप्तप्रक्रिया सुरक्षित है, जिसके अनुगमन करने के बिना कभी बन्धनमुक्ति नहीं हो सकती । इसी लक्ष्य से वे विवाहसूत्र में बद्ध होते हैं, ऋतुकाल में यथानियम दाम्पत्यभाव का अनुगमन कर ऋण से उऋण होते हैं । रेतःसृष्टि - विज्ञान के अनुसार पुरुष ( बीजी ) के शुक्र में प्रतिष्ठित पुम्भ्रूण ही २१ मात्रा सेपुत्ररूप में परिणत होता है । शुक्र सौम्य है, सोम भार्गव तत्त्व है । भृगु ही कवि है । इस eve से इसे अवश्य ही कवि - पुत्र कहा जा सकता है । जो कवि ( सोमात्मक रेत ) है, वही शोणि-ताग्नि में जाकर पुत्ररूप में परिणत होता है । जो विद्वान् इस रहस्य को जान कर सापिण्डन दृष्टि से गर्भस्थिति का प्रवर्त्तक बनता है, वह अपने पिता का भी पिता बन जाता है । पिता के २१ अंश लेकर आज यह पुत्र बन रहा है । परन्तु यही प्रजातन्तु वितान द्वारा पिता से प्राप्त आत्मरूप ७ कलाओं के प्रत्यर्पण से पिता के पिण्ड का पूरक बनता हुआ, चान्द्रलोकस्थ पिता के पूर्ण स्वरूप को " पूर्णरूप देता हुआ सचमुच ' पितुष्पितासत् ' को चरितार्थ कर रहा है । - अचः परेण पर एना ० मन्त्र का अर्थ करते हुए सायणाचार्य ने कहा है कि, ' अत्राग्नौ हूयमानाहुतिगौरूपेण स्तूयते ' । सायणाचार्य का अभिप्राय यही है कि, वैधयज्ञ में आहवनीय अग्नि में जिस वल्ली सोम की आहुति दी जाती है, वह गौरूप ( रश्मिरूप ) में परिणत हो जाती है । यही मन्त्र का आधिभौतिक समन्वय है । आधिदैविक समन्वय की दृष्टि से सूर्य आहवनीय है, पारमेष्ठ्य सोम आहुति द्रव्य है । ' त्वं ज्योतिषा वि तमो ववर्थ ' इत्यादि ऋग्वर्णन के अनुसार सौरसावित्राग्नि में हुए यह पारमेष्ठ्य सोम ही रश्मिरूप सप्त गौ - रूप में परिणत होता हुआ प्रकाशरूप में परिणत हो रहा है । हमें प्रकृत में आध्यात्मिक दृष्टि से ही मन्त्र का समन्वय करना है । मातृगर्भाशयस्थित शोणिताग्नि अग्नि है, पितुःशुक्रस्थ सोम सोम है । इस सौम्य शुक्र की
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प्रजातन्तुवितान उस शोणिताग्नि में आहुति होती है । इस आहुति से आहुत सोम शोणिताग्नि के समन्वय से गौरूप में परिणत होता है । इस आध्यात्मिक रश्मिभाव से यह सोम पर अवर, दो भांवों में बितत हो जाता है । गर्भस्थित गर्भी वत्स है । पुत्ररूप बीजी में पिता- पितामहादि ६ पीढ़ियों का ऊपर की ओर से सम्बन्ध रहता है, एवं स्वयं इसके सोमसहों का इस की पुत्र - पौत्रादि ६ पीढ़ियों पर्य्यन्त वितान होता है । प्रत्येक पुत्र इस रश्मिभावात्मक सापिण्ड्यभाव से ६ परभावों से, ६ अवरभावों से युक्त रहता है । रह रश्मिरूपा सोमवी पुत्र ' के निधन पर अंशत: कहाँ चली जाती है?, कहाँ अपना अंश समर्पण कर देती है?, यह परोक्ष विषय है, इन्द्रियातीत विषय है, इसी भाव को व्यक्त करने के लिए ' कद्रीची ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । सापिण्ड्य' सम्बन्ध रखने वाले इस तन्तुयूथ के विस्तार का जब हम विचार करने लगते हैं, तो हमें आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है । कहाँ से इस सन्तान परम्परा का उपक्रम हुआ?, कहाँ इसका अवसान होगा?, कौन वह मूलपुरुष है, जहाँ से सापिण्ड्यभाव आरम्भ हुआ?, कौन वह अन्तिम वृद्धातिवृद्धप्रपौत्र है, जहाँ सापिण्ड्यभाव का प्रात्यन्तिक विश्राम हो जायगा?, सृष्टिगर्भ में इन प्रश्नों की इयत्ता निर्धारित करना असम्भव ही है, जैसा कि - ' को ददर्श प्रथमं जायमानम् ' इत्यादि मन्त्रार्थ प्रकरण में कहा जा चुका है । सापिण्ड्यभावानुगत इसी तन्तु -आनन्त्यका श्रुति ने ' कास्थित् सूते नहि यूथे अन्त: ' इन शब्दों में अभिनय किया है । ७- अवः परेण पितरम् ० पितृम्परम्परा से सम्बद्ध परभाव, पुत्रपरम्परा से सम्बद्ध अव - भाव, दोनों के इसी आनन्त्य - का दूसरे शब्दों में अभिनय करते हुए दीर्घतमा कहते हैं कि, पुत्र - पौत्रादि में स्थित पितर को ( पितृ-सहः कलाओं को ) पिता - पितामहादि से युक्त, तथा पिता - पितामहादि को पुत्र - पौत्रादि से युक्त, इस प्रकार श्रवस्थानीय पुन्नादि का परस्थानीय पितादि से, तथा परस्थानीय पितादि का अवस्थानीय ( अवरस्थानीय ) पुत्रादि से जो स्वाभाविक तन्दु - वितान सम्बन्ध है, उसे जिस विद्वान् ने जान लिया है, ऐसे विद्वान् दुर्लभ हैं । आज तक कितने विद्वान् ऐसे हुए हैं, जिन्होंने इस परोक्ष अवर - पर, पर- अवर सम्बन्ध को देखा, और हमें बतलाया?, साथ ही किस मूल से इस सम्बन्ध सूत्र का आरम्भ हुआ?, कहाँ अवसान होगा?, ये सभी विषय सर्वसाधारण के लिए दुरधिगम्य हैं । - वञ्श्वस्ताँ उ ० · 19. पुत्र - पौत्र - प्रपौत्रादि अवर प्रजावर्ग कहने को तो अवर हैं । परन्तु सापिण्ड्य सृष्टि से जब इनके शुक्र में प्रतिष्ठित पितृसहों का विचार किया जाता है, तो मानना पड़ता है कि, ये अर्वाः पुत्रादि पराञ्चः हैं । पिता - पितामहादि पराश्च: हैं, उनके सहोभागों का ऋणरूप से आदान ६७
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( ग्रहण ) कर के ही तो इन पुत्रादि अवानों की अर्वाः पुत्रादि को अवश्य ही पराञ्चः कहा श्राद्धविज्ञान स्वरूप- निष्पत्ति हुई है । इस ऋण के सम्बन्ध से जा सकता है । एवमेव चन्द्रलोकगत पिता - पितामहादि पर प्रजावर्ग कहने को तो पराञ्च: है । परन्तु पृथिवी - लोकस्थ पुत्रादि में समर्पित अपने सोभागों की दृष्टि से हैं । पुत्रादि में इन पराञ्चः का ही तो ऋणभाग प्रतिष्ठित है । इसी से तो ये श्राद्धपक्ष में अर्वाञ्चः बनते हैं । ' इस प्रकार अर्वाञ्चः एवं पराञ्चः पितादि ऋण प्रदान से अर्वाञ्चः बन रहे हैं । पुत्रादि ऋण आदान से पराञ्चः बन रहे हैं, पुत्रादि पितरभागों से युक्त रहते हुए पितादि बन रहे हैं, एवं पितादि पुत्रों में अन्य कला समर्पित करते हुए पुत्रादि बन रहे हैं । दूसरी दृष्टि से समन्वय कीजिए । सर्वसाधारण में यह प्रसिद्ध है कि, पिता- पितामह आदि पराच: है । परन्तु वस्तुगत्या ये पिता- पितामहादि अपने सहोभागों को पुत्रादि में प्रदान करने से पुत्रादि रूप से पृथिवी पर प्रतिष्ठित रहते हुए अर्वाञ्चः ही मानें जायँगे । इस प्रकार पुत्रादि में भुक्ति होने वस्तुतः ः बने हुए पिता पितामहादि को लोक में ' पराचः ' कहा जा रहा है । एवमेव पुत्र-पुत्रादि लोकव्यवहार में ' अ ' कहला रहे हैं । परन्तु वस्तुगत्या ये पुत्र - पौत्रादि अपने पिता-पितामहादिरूप पराचों के ऋणभाग से स्वस्वरूप का निर्माण करने में समर्थ बनते हुए ' पराच: ' हैं । इस प्रकार पिता - पितामहादि के पराचः भागों की भुक्ति से वस्तुतः पराचः बने हुए पुत्र - पौत्रादि को लोक में : कहा जा रहा है । बात यथार्थ में यह है कि, जिस प्रकार रथचक्र घूमता हुआ अर्वाञ्चः - पराचः भावों से बद-लता रहता है, कभी ऊपर का चक्र नीचे आ जाता है, नीचे का चक्र ऊपर चला जाता है, इसी प्रकार चन्द्रगति की अपेक्षा से अवनिः घुर भाग कभी पराचः बनते हैं, पराचः कभी अवञ्चः बन जाते हैं । एवमेव इन्द्रलक्षण आत्मनाभि में प्रतिष्ठित सोमात्मक सहोभागों से निष्पन्न यह सन्तानचक्र अर्वाञ्चः से पराचः रूप में, पराचः से अर्वाः रूप में परिणत होता रहता है ।. महर्षि बृहदुक्थ का प्रजातन्तुविज्ञान विज्ञान -महर्षि दीर्घतमा के उक्त मन्त्रवर्णनों से हमें मान लेना पड़ता है कि, वास्तव में शुक्रस्थ महानात्मा के आधार पर प्रतिष्ठित चतुरशीतिकलोपेत पितृसहः पिण्ड के आत्मधेय - तन्य भेद से दो विवर्त्त होते हैं । आत्मधेय पिएड की २८ कला स्वप्रतिष्ठा में उपयुक्त हैं, एवं तन्य-पिण्ड की ५६ कला तन्तुवितान में उपयुक्त हैं । वैदिकयुग में इस ' पिण्डपितृविज्ञान ' के जानकार स्वल्प संख्या में ही रहे होंगे, यह अनुमान इस आधार पर लगाया जा सकता है कि, ऋषियों का प्रधान लक्ष्य यज्ञकाण्ड ही रहा है । यज्ञिय तत्त्वों का समन्वय ही प्रधानतः ऋषियों का दृष्टिकोण रहा है । यही कारण है कि, ब्राह्मणग्रन्थों में बड़े ही संक्षेप से परिगणित स्थानों में ही ' पिण्ड-६८...:
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• प्रजातन्तुवितान -पितृयज्ञ' रूप इस पितृ - विद्या का विश्लेषण हुआ है । ओर ऐसा होने का एक प्रधान कारण भी था । सूर्य्यमूला त्रयीविद्या के आधार पर वितत यज्ञविद्या से सम्बन्ध रखने वाला वैधयज्ञकर्म अपूर्व-आविष्कारों का जनक है । इसके द्वारा विशेष - फलसिद्धियाँ सम्भव हैं । उधर परमेष्ठीमूलक, अथर्वा -सूत्र पर प्रतिष्ठित श्राद्धकर्म केवल पितरप्राणतृप्ति का कारण है । इस के द्वारा यज्ञवत लौकिक. पारलौकिक कोई अतिशयविशेष प्राप्त नहीं किया जासकता नित्यकाम्यलक्षण श्राद्धकर्म के करने से विशेष अतिशय तो नहीं होता, परन्तु न करने से हानि अवश्य है । यही नहीं, न करने से मुक्ति ही सम्भव है । इसी आधार पर - ' देवकार्य्याद् द्विजातीनां पितृकार्य्यं विशि-यते ' यह कहा गया है । देवकार्यात्मक यज्ञकर्म का जहाँ समष्टि से सम्बन्ध है, वहाँ पितृकार्यात्मक श्राद्धकर्म का व्यष्टि से सम्बन्ध है । अन्य कर्मठों के द्वारा सम्पादित यज्ञकर्म देवतत्त्व का संग्राहक बन-सकता है । यदि कोई भी ' कारीरी इष्टि ' करेगा, तो वृष्टि हो जायगी, एवं सब प्रजावर्ग इस फल का. भोक्ता बन जायगा परन्तु श्राद्धकर्म ऐसा नहीं है । जब तक प्रेतात्मा के पुत्रादि वंशज श्रद्धासूत्र-द्वारा स्वतपितरों के लिए पिण्डदानादि लक्षण श्राद्धकर्म नहीं करते, तब तक उन की तृप्ति, बन्धन-विमोक, इन का वंश वितान, असम्भव है । इसी प्रातिश्विक वैय्यक्तिक भाव के कारण देव-कार्य की अपेक्षा पितृकार्य का विशेष महत्त्व है । क्योंकि वह प्रातिश्विक कर्म है - इसलिए, साथ ही विशेषातिशयप्रवर्त्त के देवयज्ञ की भाँति तत्त्वाविष्कारों की दृष्टि से कोई सम्बन्ध न रखने के कारण पितृविज्ञानविषयक परामर्श कतिपय विद्वानों पर्यन्त ही सीमित रहा होगा, इस अनुमान का समर्थन किया जा सकता है । महर्षि ' बृहदुक्थ - वामदेव ' इस पितृविद्या के उस युग के महापण्डित माने जाते थे । इन की पर्षत् में समय समय पर इस विषय को लेकर प्रश्नोत्तर हुआ करते थे । महर्षि दीर्घतमा ने-' पाकः पृच्छामि ० ' रूप से जो प्रश्न उठाए हैं, उन का सम्यक् समाधान हमें वृहदुक्थ के मन्त्रों से उपलब्ध हो रहा है । इसी आधार पर बृहदुक्थ को इस विद्या का परपारगामी विद्वान् कहा जा सकता है । दीर्घतमा ने ' पाकः पृच्छामि ० ' रूप से एतद्विषय में जो प्रश्न किए हैं, पहिले. उन की मीमांसा कीजिए, अनन्तर बृहदुक्थ समाज ने उन प्रश्नों का जो वैज्ञानिक समाधान किया, उन पर दृष्टि डालिए, पितृविद्या से सम्बन्ध रखने वाले सन्देह एकान्ततः निवृत्त हो जायगे । हमारे पाञ्चभौतिक शरीर में ' पितर ' कह कर व्यवहृत करने योग्य कोई तन्त्वविशेष प्रति-ठित है | शरीरत्यागानन्तर यह पितर परलोक में जाता है, तद्वंशधरों के द्वारा प्रदत्त पिण्ड परलोकगत पितर की तृप्ति का कारण बनता है " इन सब विषयों पर तब हमारा श्रद्धान सम्भव है, जब कि पहिले हमें यह विश्वास हो जाय कि, शरीर में अमुक स्थान पर तो पितर रहता है, अमुक प्रकार से प्रजा ६६
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श्राद्धविज्ञान स्ववंशधरों से तन्तुवितान करता हुआ वह परलोक में चला जाता है, एवं अमुकसूत्र के द्वारा दीर्घतमा उसका के निम्न लिखित अविच्छिन्न सम्बन्ध बना रहता है । इसी स्थिति को लक्ष्य बनाते हुए प्रश्न वृहदुक्थ समाज में उपस्थित होते हैं-, अतिरिक्त, " हम अपने शरीर में सर्वत्र देवतत्त्व का ही साम्राज्य देखते हैं । देवतत्त्व से है, ' पितृत्त्व ' कहने योग्य तत्त्वान्तर शरीर में सर्वथा अनुपलब्ध है । यही प्रथम प्रश्न भूमिका जिसका विश्लेषण यों किया जा सकता है । ' बस्तिगुहा, उदरगुहा, उरोगुहा, शिरोगुहा चारों में ' प्रत्येक भेद से में श्रीपाद - मस्तकावच्छिन्न पाञ्चभौतिक शरीर में चार गुहा मानी गई हैं । इन अग्नीषोमीय देवता प्रतिष्ठित हैं । प्रत्येक गुहा में प्रतिष्ठित यह देवतत्त्व सात - सात संख्या में विभक्त है । अतएव सप्तप्राणसमष्टिरूप इस देवसंप्तक को ' साकज ' कहा गया है । " अग्नि, वायु, आदित्य, दिक्सोम, भारवरसोम, " ये पाँच प्राणदेवता सुप्रसिद्ध हैं । पांचों में आरम्भ कि, के ' भास्वर तीन ' आग्नेय देवता हैं, अन्त के दो सौम्य देवता हैं । साथ ही यह भी स्पष्ट कर लेना चाहिए सोमात्मक मनोदेवात्मक देवता सर्वाङ्गशरीर को आशय, हृदय को प्रतिष्ठा, अन्न को प्रभव, बनाता हुआ शरीर में प्रतिष्ठित है । यह उस देवसप्तक से पृथक है । देवसप्तक का केवल अग्नि- वायु - श्रादित्य-का एक दिक्सोम, इन चार देवताओं के साथ ही सम्बन्ध है । चारों में आरम्भ के अग्निदेवता विवत है, शेष तीनों दो दो विवर्त्त हैं । फलतः ४ के ७ प्रारणदेवता हो जाते हैं । इन्हीं साकञ्ज ( सहोत्पन्न ) सात देवप्राणों के स्थान बतलाती हुई श्रुति कहती है--सावजानां सप्तथमाहुरेकर्ज षडिद्यमा ऋषयो देवजा इति । deforfa विहितानि धामशः स्थात्रे रेजन्ते विकृतानि रूपशः ॥ ( ऋक्सं ० १ । १६४ । १५ । ) " ' अग्निर्वाण भूत्वा मुखं प्राविशत्, वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशत् श्रादित्यश्चद्दु- उप-भूत्वाऽक्षिणी प्राविशत् दिशः श्रोत्रं भूत्वा कर्णौ प्राविशत् ” ( ऐ ० उ ० २ । ४ । ) इत्यादि निषच्छ्रुति के अनुसार विल - ऊर्ध्वचमस शिरोगुहा में प्रतिष्ठित वाक्- प्राण - चक्षु श्रोत्र, नामक इन्द्रिय देवता क्रमशः अग्नि, वायु, आदित्य, दिक्सोम, देवताओं के ही प्रवग्यांश है । वागाधार मुख, एक है, अतएव वाङमय अमिदेवता एक ही स्वरूप में परिणत रहता है । शेष तीनों के नासिका चक्षु, कर्ण, तीनों दो दो विवरों में विभक्त हैं, श्रतएव तत्र प्रतिष्ठित प्राणमय वायु, चतुर्म्ममय श्रादित्य, श्रोत्रमय दिक्सोम, तीनों देवता दो दो विवर्त्तभावों में परिणत हो जाते हैं । इस प्रकार दो श्रोत्रप्राण, । दो चक्षुः प्राण, दो नासाप्राण, ये तीन तो यमज ( जोड़ले ) हैं, सातवाँ मुखप्राण एकज है देवताओं , एकाकी का है ही यही प्रथम सप्तक इस रूप से शिरोगुहा में प्रतिष्ठित है । सप्तधाविभक्त अमीषोमीय शिरोहा में साम्राज्य है ।
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प्रजातन्तुवितान यही स्थिति ' उरोगुहा ' की है । दिक्सोमानुगत २ भुजा, आदित्यानुगत २ स्तन, वाय्व-नुगत २ फुप्फुस, अग्न्यनुगत १ - हृदय, इस प्रकार उरोगुहा में भी अग्नीषोमीय देवसप्तक का ही साम्राज्य है । उदरगुहा में यकृत् ' ( जिगर ) - प्लीहा ( तिल्ली ), ये दोनों दिक्सोमानुगत हैं २ - क्लोम आदित्यानुगत हैं, २- वृक्क वाय्वनुगत हैं, १ - नाभि अग्न्यनुगता है । फलतः उदरगुहा में भी इस रूप से देवसप्तक का ही अनन्य प्रभुत्व सुरक्षित हैं । सर्वान्त की बस्तिगुहा में २ - श्रोणी दिक्सोमानुगत हैं, २ - मूत्र - रेतसी ( नालिका द्वयी ) श्रादित्यानुगत हैं, २- ग्राण्ड वाय्वनुगत हैं, १ - मूत्रद्वार अग्न्यनुगत है । इस प्रकार बस्तिगुहा में भी सप्तकातिरिक्त अन्य प्राणविशेष का भाव है । चार गुहाओं की समष्टि का ही नाम शरीर है । चारों गुहा स्थान देवप्राण से नित्य आक्रान्त हैं । इन अग्नीषोमीय देवताओं के पद ( स्थान ) सर्वथा निहित ( निश्चित, सुव्यवस्थित ) हैं । कोई प्रदेश ऐसा नहीं, जहाँ देवप्राण व्याप्त न हो । ऐसी स्थिति में दीर्घतमा का प्रश्न - स्वा-भाविक बन जाता है कि, " जब कि सम्पूर्ण शरीर देवपदों से आक्रान्त है, तो फिर ऐसा रिक्त-स्थान बचा ही कौनसा, जिसमें सप्ततन्तु वितान करने वाला पितर प्राण प्रतिष्ठित रहा? । इस प्रकार ' देवानामेना निहिता पदानि ' से यही प्रश्न बृहदुक्थ- वामदेव के सम्मुख उपस्थित हुआ । इस एक ही प्रश्न के साथ दो प्रश्न स्वयं ही ओर उपस्थित हो रहे हैं । " अग्निः सर्वा देवताः, वायुः सर्वा देवताः इन्द्रः सर्वा देवताः ” इन निगमवचनों के अनुसार प्राणाग्निदेवता सोमगर्भित अग्निप्रधान हैं, अग्निमय हैं । अग्नि श्रन्नाद है, सोम अन्न है । अन्नाद अग्नि के गर्भ में भुक्त अन्नसोम अन्नादाग्निरूप में परिणत होता हुआ अपना सोमभाव छोड़ देता है, जैसाकि - ' तवा-ख्यायते नाद्यम् ' ( शत ० ब्राह्मण ) इत्यादि ब्राह्मण श्रुति से प्रमाणित है । इसी आधार पर कहा जा • सकता है कि, अग्नि की ही घन - तरल - विरलावरथाओं से सम्बन्ध रखने वाले अग्नि - वायु- आदित्य, इन तीन प्रधान अन्नाद देवताओं की सीमा में प्रविष्ट दिक्सोमदेवता श्रग्निप्रधान बनता हुआ तद्-रूप ही बन रहा है । फलतः सर्वाङ्गशरीर में समानजातीय आग्नेय देवताओं का ही श्रयतम प्रभुत्व सिद्ध हो रहा है । उधर पितर प्रारण ' आयन्तु नः पितरः सोम्यासः ' ( यजुः सं २ ) इत्यादि मन्त्रवर्णन के अनुसार सौम्य बनते हुए इन शारीर श्राग्नेय प्राणदेवताओं की तुलना में ' विजातीय ' हैं । एक विजातीय तृण भी जहाँ दन्तच्छिद्रों में स्थान नहीं पा सकता, जब तक वह निकल नहीं जाता, तबतक इन्द्रिय देवता शान्त नहीं होते, तो ऐसी अवस्था में सर्वथा विजातीय एक नहीं, ८४ सौम्य पितरप्राणों का शरीर में आगमन भी हो गया, वे प्रतिष्ठित भी हो गए, यह कैसे सम्भव है?, ' विजातीयत्वेन पितरप्राण का आगमन ही कैसे हुआ? ' यही दूसरा प्रश्न है । * सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् सप्तार्चिषः समिधः सप्तहोताः । सप्त इमे लोक येषु चरन्ति प्रारणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ॥ ( मुण्डकोप ० २ । १ । ८ ) · ७१
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श्राद्धविज्ञान : अभ्युपगमवाद का आश्रय लेते हुए थोड़ी देर के लिए हम मान लेते हैं कि, विजातीय होने पर भी सौम्य पितरप्राणों का शरीर में आगमन हो गया । साथ ही यह भी स्वीकार कर लेते हैं । कि, देवताओं अपना स्थान संकुचित करते हुए पितरप्राण को स्थान भी दे दिया । यह सब - कुछ स्वीकार कर लेने पर भी वह तन्तुवितानधर्म सर्वथा परोक्ष ही ( अविज्ञात ही ) बच रहता है, . जिस के सम्बन्ध में यह कहा जाता है कि, शारीर पितर अगली पीढ़ियों पर्य्यन्त अपने सहभाग का fart करते हैं । इस प्रकार दीर्घतमा के द्वारा निम्न लिखित तीन प्रश्नों का उद्गम हो जाता है— १ - विजातीय होने से पितरप्राण का शरीर में आगमन कैसे हुआ? २ - शरीर में आकर भी ( स्थान के अभाव से ) वे प्रतिष्ठित कहाँ हुए? ३ - प्रतिष्ठित होकर भी उन्होंनें तन्तु वितान कैसे किया? दीर्घतमा ऋद्वारा ' पाकः पृच्छामि मनसा श्रविजानन् ' रूप से उपस्थित होने वाले पितर-विषयक इन्हीं प्रश्नों का समाधान करते हुए महर्षि बृहदुक्थ कहते हैं
66 १ - महिम्न एषां पितरश्च नेशिरे देवा देवेष्वदधुरपि क्रतुम् ।
समविव्यरुत यान्यत्विषुरैषां तनूषु नि विविशुः पुनः ॥
२ - सहोभिर्विश्वं परिचक्रमू रजः पूर्वा धामान्यमिता विमानाः ।
तनूषु विश्वा भुननानि येमिरे प्रासारयन्त पुरुष प्रजा अनु ॥
३ - द्विधा सूनवोऽसुरं स्वर्विदमास्थापयन्त तृतीयेन कर्मणा ।
स्वां प्रजां पितरः पित्र्यं सह वरेष्वदधुस्तन्तुमाततम् ॥
४ - नावा न क्षोदः प्रदिशः पृथिव्याः स्वस्तिभिरति दुर्गाणि विश्वा ।
स्वां प्रजां वृहदुक्थो महित्वावरेष्वदधादा परेषु ॥
( ऋकसं ० १० । ५६ । ४, ५, ६, ७, मं ० ) जिस ऋक्संहिता के मन्त्र यहाँ उद्धृत हुए हैं, वह ऋक्संहिताग्रन्थ भी दुर्लभ नहीं है । साथ ही सनातनधर्मावलम्बियों के प्रारणभूत: सर्वश्री सायणाचार्य ने इस संहिता पर जो विस्तृत भाष्य लिखा है, वह भी दुष्प्राप्य नहीं है । भारतीय विद्वानोंनें अथ से इति पर्यन्त सायण-भाष्य का पारायणं न किया होगा, यह भी असम्भव है । परन्तु, | ' परन्तु इसलिए कि, सायणभाष्य हमारी उस पितृनिष्ठा की रक्षा न कर सका, जिस पर आज अज्ञजनों के कुतर्कपूर्ण आक्षेप हो रहे हैं । अवश्य ही विज्ञान- परम्परा के उच्छेद से विज्ञानप्रधान मन्त्रों का भाष्य हमारी } }
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प्रजातन्तुवितान तुष्टि का कारण नहीं बन सकता । एवं न ऐसे भाष्यसहस्रों को आगे रखते हुए हम अपने मौलिक सिद्धान्तों को परालोचना से बचा ही सकते । जिस तत्त्वदृष्टि से जिन विस्पष्ट शब्दों में मन्त्रोंनें पितृविज्ञान का विश्लेषण किया है, उस के विद्यमान रहते किस का यह सामर्थ्य है कि, जो सापिण्ड्य भाव से सम्बन्ध रखने वाले ' श्राद्धकर्म्म ' पर आक्षेप कर सके, अथवा तो इसे अवैदिक कहने की धृष्टता. करसके । अस्तु सायरणनिष्टानुगत ( भावुकतानुगत ) महानुभावों की निष्ठा ( उपनाम भावुकता ) को सुरक्षित रखने के लिए प्रथम भाष्यदृष्टि से ही मन्त्रार्थ का समन्वय होगा, एवं अनन्तर विज्ञानप्रधान आर्षदृष्टि से मन्त्रार्थ का विश्लेषण होगा । दोनों में से कौन उपादेय होगा, इस प्रश्न का निर्णय स्वयं प्रजा की सहजनिष्ठा पर निर्भर होगा । : १ - महिम्न एषाम् ० ( भाष्यकाराः ) -" हमारे अङ्गिरादि पितर इन देवताओं की महिमा से समर्थ हो रहे हैं । देवता सम्बन्ध । से देवत्त्वभाव को प्राप्त होते हुए इन हमारे पितरोंनें इन्द्रादि देवताओं में संकल्प प्रतिष्ठित किए ये पितर उन तेजोभावों में परिणत हो गए, जो इन के तेज प्रदीप्त हो रहे हैं । इन देवताओं के शरीर में ये पितर पुनः प्रविष्ट हो गए " । २ - सहोभिर्विश्वम् ० “ मेरे पितर अपने बलों से सम्पूर्ण लोकों में व्याप्त हैं । ( सर्वलोक - परिक्रमा हुए के, साथ साथ साथ ) मेरे इन पितरोंनें दूसरों से अमित ( अनाक्रान्त ) पूर्व स्थानों को चारों ओर से घेरते मात्राओं को • ही ( उन स्थानों के ) सम्पूर्ण भूतों को घेरते हुए ( भूतों में व्याप्त होते हुए ), उन लोक - भूत पानियों को फैला अपने शरीरों में प्रतिष्ठित करते हुए अपनी प्रजा को लक्ष्य बना कर ज्योतियों से सम्पूर्ण तथा लोक को अप दिया । दूसरे शब्दों में- मेरे अङ्गिरा नामक पूर्व पितरोंनें अपनी शक्ति बना कर, सम्पूर्ण भूतों का अधिकार में कर, अति रातन ग्रह - नक्षत्रादि को अपनी सीमा से परिच्छिन्न नियमन कर प्रजा के प्रति जलों, तथा तेजों को फैला दिया । " ३- द्विधा सूनवः ० " स्वर्ग को जानने वाले, स्वर्गस्थान को प्राप्त होने वाले बलवान् आदित्य को आदित्य के कर पुत्र अङ्गिराने प्रजोत्पादन रूप तीसरे कर्म से उदय - अस्तरूप दो अवस्थाओं अपने में पिता परिणत आदित्य ' दिया । अपिच अङ्गिरा नामक पितर अपनी प्रजा को उत्पन्न कर स्वभाग के साथ धन की सर्वात्मना के वल को निकृषु प्रजारूप मनुष्यों में स्थापित करते हैं । जिस प्रकार पित्र्य प्रकार श्रङ्गिरा - पितरोंनें रक्षा करते हुए यह धन पुत्रों में ( दायाद रूप से ) बाँट दिया जाता है, उसी अपिच-सर्वथा सुरक्षित पित्र्य धन रूप आदित्य पिता के बल को मनुष्य प्रजा में बाँट दिया है । ७३
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श्राद्धविज्ञान. ' अयं ह्याततं तन्तुर्यत् प्रजा ' - ' प्रजातन्तु ' मा व्यवच्छेत्सीः ' ' प्रजा वै तन्तुः ' इत्यादि श्रुतियों के अनुसार तन्तु नाम से प्रसिद्ध मतुष्यप्रजा का उन्हीं पितरों में आदित्य के बल से वितान किया है " । ४ - नावा न क्षोदः ० " जिस प्रकार एक नौका से समुद्र का सन्तरण किया जाता है, एवमेव जैसे स्वस्तिभावों ( मङ्गलों ) से विघ्न - बाधारूप दुर्गमों ( मङ्गलों ) को पार किया जाता है, इसी प्रकार बृहदुक्थ नामक तत्त्वविशेष अपनी प्रजा को, ' वाजी ' नाम से प्रसिद्ध अपने मृत पुत्र को स्वशक्ति से अग्न्यादि अवर-प्रजावर्ग में, तथा सूर्यादि पर देवताओं में स्थापित कर दिया है " । भाष्यकार के उक्त मन्त्रार्थों का हमें इस लिए स्वागत करना चाहिए कि, उनके अनुग्रह से आज हमें ' वेदभाष्य ' के दर्शनों का तो सौभाग्य प्राप्त हो रहा है । रही बात वेदाक्षरों के आप्यायन की । इस सम्बन्ध में - ' वृद्वास्तेन विचारणीयचरिताः ' का अनुगमन ही श्रेयः प्रन्थाः है । अब उस वैज्ञानिक अर्थ की ओर वैज्ञानिकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है, जिसके यथावत स्वरूप परिचय से प्रश्नत्रयी का यथावत् समाधान गतार्थ बन रहा है । १- महिम्न एषां पितरः ० " विजातीय पितर आग्नेय देवता - प्रधान शरीर में प्रविष्ट कैसे हुए '?, प्रकृत मन्त्र इसी प्रश्न का समाधान कर रहा है । अग्नि वायु आदित्य भेदभिन्न आध्यात्मिक आग्नेय - प्रारण देवता सौम्य पितरों के विरोधी नहीं, अपितु ये तो अग्नि के अन्यतम सखा मानें गए हैं । अग्नि - सोम, दोनों सयुक् ( एक साथ रहने वाले ) सखा हैं । देखिए, इस सम्बन्ध में श्रुति क्या कह रही है-निजगार ' तमुचः कामयन्ते, अग्निर्जागार तमु सामानि यन्ति । अग्निर्जागर तमयं सोम आह, तवाहमस्मि ' सख्ये ' न्योका ॥ ( ऋकसंहिता ) प्रत्येक वस्तुतत्त्व ' आत्मा, पदं, पुनः पदम् ' भेद से तीन संस्थाओं में परिणत होकर ही स्व-स्वरूप से प्रतिष्ठित रहता है । हृदयावच्छिन्नभाव ' आत्मा ' है, जिसे ' प्रजापतिश्चरति गर्भे ' के अनुसार ' प्रजापति ' भी कहा गया है । हृदयाधारेण प्रतिष्ठित स्पृश्य- वस्तुपिण्ड आत्मप्रपत्तिस्थान बनता हुआ ' पदम् ' है | हृदयस्थ आत्मथ से अर्क रूप से विनिःसृत, वस्तुपिण्ड से भी बाहिर बड़ी दूर तक सामरूप से अपनी व्याप्ति रखने वाला प्राणमण्डल ' पुनःपदम् ' है । यही ' पुनः पदम् ' ' महिमा ' नाम से प्रसिद्ध है । उदाहरण के लिए सूर्य के न्द्रावच्छिन्न आदित्यपुरुष आत्मा है, स्वयं सूर्य गोलक ' पदम ' है, एवं सौर-प्रकाशमण्डल ‘ पुनःपदम् ' है । ' स्वे महिम्नि प्रतिष्ठितः ' इत्यादि औपनिषद सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक वस्तुपिड का आत्मा पुनः पदरूप अपने महिममण्डल के केन्द्र में प्रतिष्ठित रहता है । जिस प्रकार ७४