Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 131–140
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 131–140
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इति सा पिएड्यविज्ञानोपनिषदि प्रजातन्तुवितानविज्ञानोपनिषत् प्रथमा - १-
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' सापिण्ड्यविज्ञानोपनिषदि -अथ " ऋणमोचनोपायोपनिषत् " द्वितीया २
देवतातिथिभृत्येभ्यः पितृभ्यश्चात्मनस्तथा ।
ऋणवाञ्जायते मर्त्यस्तस्मादनृणतां व्रजेत् ॥ १ ॥
स्वाध्यायेन महर्षिभ्यो देवेभ्यो यज्ञकर्म्मणा ।
पितृभ्यः श्राद्धदानेन नृणामभ्यर्चनेन च ॥ २ ॥
वाचाशेषावहार्येण पालनेनात्मनोऽपि च ।
यथावद्भृत्यवर्गस्य चिकीर्षेत् कर्म्म आदितः ॥ ३ ॥
- महाभारत शान्तिपर्व मोक्ष ० २६२ ० ६, १०, ११, श्ले
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श्रीः ऋणमोचनोपायोपनिषत् पञ्चविध - ऋणस्वरूपविज्ञान ऋणस्वरूपपरिचय आत्मदेवता स्वस्वरूप से नित्यशुद्ध - मुक्त है । वह शरीर बन्धन में आया कैसे?, महा-मायावच्छिन्नमायी चिदात्मा अविद्या- अस्मिता - रागद्वेष - अभिनिवेश- रा- क्षुधा पिपासा - जरा - मूर्च्छा-मृत्यु - जाग्रत्स्वप्न- सुषुप्ति - मोह - कर्म्मविपाक - आशय, इत्यादि सप्तदश पाप्माओं से युक्त हो कर जीव-स्वरूप में कैसे परिणत हो गया?, इन सब प्रश्नों का एकमात्र उत्तर है - त्रिगुणभावमयी योगमाया ऐकान्तिक अनुग्रह । त्रिगुणात्मिका इस योगमाया को हम थोड़ी देर के लिए ' व्यक्त - तर प्रकृति ' कह लेते हैं । इस व्यक्त - तर प्रकृति का प्रधानतः आपोमय परमेष्ठी से सम्बन्ध है, जो पारमेष्ठ्य तत्त्व प्रवर्ग्यभाग से अध्यात्मसंस्था का स्वरूप समर्पक बनता हुआ ' महान ' नाम से प्रसिद्ध है । सूर्थ्य, चन्द्रमा, पृथिवी, इन तीनों की दर्श- पूर्णमासप्रक्रिया से इस पारमेष्ठ्य महान में क्रमशः अहंकृति, प्रकृति, आकृति, इन तीन अवस्थाओं का उदय होता है । साथ ही सूर्य के दर्शपूर्णमास से इस में सत्त्व - रज - तम, इन तीन गुणों का आविर्भाव होता है । सौरतेजोऽवच्छिन्न पारमेष्ठ्य महान् ' सत्त्वगुणक ' हैं, अप्रकाशित महान् ' तमोगुणक ' है, एवं सान्ध्य महान् ' रजोगुणक ' है । इस प्रकार दर्शपूर्णमास से पारमेष्ठ्य महान् षड्भावापन्न बन रहा है जिस का ' महदात्मोपनिषत् ' में विस्तार से • निरूपण किया जा चुका है । परमेष्ठी महान् से ऊपर अव्यक्त स्वयम्भू है, नीचे हिरण्यगर्भ सूर्य है । हिरण्यगर्भ सू क्षेत्र है, अव्यक्त स्वयम्भू ' ब्रह्म ' है । उस ओर से ब्रह्म को इस ओर से क्षत्र को, दोनों को मध्यस्थ महान् ने अपना दन बना रक्खा है । दोनों तत्त्व इस के गर्भ में भुक्त हैं । और इस दृष्टि से भी यह त्रिगुणभावापन्न बन रहा है । स्वायम्भुवं ब्रह्मतत्त्व ' ऋषि ' नाम से प्रसिद्ध है, एवं यह ज्ञानतन्तु का वितान करता है । सौर क्षत्रतत्त्व ' देव ' नाम से प्रसिद्ध है, एवं यह यज्ञतन्तु का वितान करता है । उभयधर्मावच्छिन्न मध्यस्थ परमेष्ठी प्रारण ' पितर ' नाम से प्रसिद्ध है, एवं यह प्रजातन्तु का वितान करता है । इस प्रकार स्वायम्भुव ऋषिप्रारणात्मक ज्ञानतन्तुओं को सौर देवप्राणात्मक यज्ञतन्तुओं को, दोनों को अपने गर्भ में रखता हुआ स्वपितरप्राणात्मक प्रजातन्तुओं से युक्त पारमेष्ठ्य महान् ही * त्रयस्त्रिंशत् तन्तवो यं वितत्निरे । ८६
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चिदात्मा की योनि वनता है । ऋणमोचनोपायोपनिपत् योनिस्थानीय इस महानात्मा के गर्भ में आते ही चिदात्मा जीव-स्वरूप में परिणत हो जाता है । ब्रह्म - क्षत्र को ओदन बनाने वाले महान् के इसी स्वरूप का विश्लेषण करते हुए उपनिषच्छ्रुति ने कहा है-यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः । मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः । - कठोपनिषत् १ । २ । २४ । स्वायम्भुव ऋषिप्राण, सौर देवप्राण, दोनों को अपने गर्भ में रखने वाला पारमेष्ठ्य महान् ' भाव, योनिज, अयोनिज, ' भेद से तीन सृष्टियों का प्रवर्त्तक बन रहा है । ऋषिप्राण के द्वारा भाव-सृष्टि का विकास हुआ है, जिसे ' मानसी सृष्टि ' भी कहा जा सकता है । यही पहिली ' ऋषिसृष्टि ' ( प्राणसृष्टि ) है । देवप्राण के द्वारा अयोनिज सृष्टि का विकास हुआ है, जिसे ' गुणसृष्टि, भी कहा जा सकता है । यही दूसरी देवसृष्टि है । स्वप्राणद्वारा योनिज सृष्टि का विकास हुआ है, जिसे ' विकार सृष्टि ' भी कहा जा सकता है । यही तीसरी प्राणीसृष्टि ( मैथुनी सृष्टि ) है । इस प्रकार ऋषि-देव - पितर, तीनों के समन्वय से महान् के द्वारा तीन सृष्टियों का विकास हो रहा है । महान् से पहिले अपनी सत्ता रखने वाले स्वयम्भू ब्रह्म वेदमूर्त्ति हैं । ऋक्सामावच्छिन्न यजुः ही ब्रह्मनिःश्वसित नामक अपौरुषेय वेदतत्त्व है, जिस का ' उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका ' नामक स्वतन्त्र निबन्ध में ८०० पृष्ठों में विशद - वैज्ञानिक विश्लेषण हुआ है । जूरूप स्थितितत्त्व के आधार पर प्रतिष्ठित यत्रूप गति भाव ही ऋषितत्त्व है, जिसे ' प्राणा वा ऋषयः ' ( शत ०६ । १ । ० १ ब्रा ० १ कं ० ) इत्यादि रूप से ' प्राण ' भी कहा गया है । ऋक्साम सम्बन्ध से नित्य युक्त इस ऋषिप्राण के तपोलक्षण आभ्यन्तर व्यापार से वागूरूप जू भाग द्वारा प्रवर्ग्यरूप से सर्वप्रथम आपो-मय परमेष्ठी का ही व्यक्तीभाव हुआ है, जैसा कि - ' सोऽपोऽसृजत् वाच एव लोकात्, बागेव साऽसृ-ज्यत " ( शत ० ६ | १ | १ | ) ' अप एव ससर्जाद ' ( मनुस्मृतिः ) इत्यादि श्रौतस्मार्त्त प्रमाणों से प्रमाणित है । ऋक्साम सन्बन्ध से त्रयीमूर्त्ति बना हुआ यह ऋषिप्राण, किंबा त्रयीतत्त्व जू-भाग से आपोमय परमेष्ठी को उत्पन्न कर ' तत् सृष्ट्वा तदेवाऽनुप्राविशत् ' न्याय से इस आपोमय परमेष्ठी के गर्भ में प्रविष्ट हो जाता है, जिस गर्भीभाव का ' सोऽनया त्रय्या विद्यया सहोपः प्रावि-शत्, तत एडं समवर्त्तत ' ( शत ० ६ | | १ | ) इत्यादि शब्दों में विश्लेषण हुआ है । इस गर्भस्थिति से बतलाना यही है कि, आपोमय परमेष्ठी स्वायम्भुव - वेदात्मक ऋषिप्रारण को अपने गर्भ में लिए हुए है । गर्भीभूत इसी ऋषिप्राण के द्वारा यह उक्त ऋषिसृष्टि का प्रवतक बनता है । अपूतत्त्व उत्पन्न हुआ है ' यज्जू ' नामक यजुः से । यज्जू का यत् भाग गतिप्रकृतिक है, जू भाग स्थितिप्रकृतिक है । गतितत्त्व विकासधर्म्मा है, स्थितितत्त्व संकोचधर्म्मा है । संकोच
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श्राद्धविज्ञान विकासोभयधर्म्मावच्छिन्न कारणात्मक यज्जू से उत्पन्न कार्यात्मक अपतत्त्व में भी ' कारणगुणाः कार्य--विकास, दोनों धर्मं उद्भूत रहते हैं । इन दो विरुद्ध धम्म से गुणानारभन्ते ' न्याय से संकोच तत्त्व संकोचधर्म्मा ' युक्त अप्तत्त्व के स्नेह, तेज, भेद से दो विवर्त्त हो जाते हैं । स्नेहलक्षण है, यही ' अङ्गिरा ' है, यही ' भृगु ' नाम से प्रसिद्ध है । एवं तेजोलक्षण तत्त्व विकासधर्मा ऋषितत्त्व को नाम से प्रसिद्ध है । स्नेह - तेजो लक्षण, भृग्वङ्गिरोमय, पूर्व कथनानुसार त्रयीतत्त्वात्मक अपने गर्भ में रखने वाले इसी पारमेष्ठ्य तत्त्व का स्वरूप लक्ष्य में रखते हुए अथर्वश्रुति कहती है-पो भृग्वङ्गिरूपमापो भृग्वङ्गिरोमयम् । तर यो वेदा भृगूनङ्गिरसः श्रिताः ॥ ( गोपथ ब्राह्मण, पूर्वभाग ) । में विभक्त भृग्वङ्गिरोमय आप का भृगु भाग ' आप:, वायुः, सोमः ' भेद से तीन भागों है । अङ्गिरा भाग ' अग्नि- यमः - आदित्यः ' भेद से तीन भागों में विभक्त है । यही षड्ब्रह्म है यत् । - अग्नि- जूरूप द्विब्रह्म की प्रतिष्ठा ( वेदप्रतिष्ठा ) पर प्रतिष्ठित हो कर सर्वसृष्टिप्रवर्तक बन रहा है, एवं आपः वायु - आदित्यगर्भित आपः वायु- सोममूर्त्ति स्नेह प्रधान श्रापः पितृसृष्टि का प्रवर्त्तक प्रवर्त्त के बनता बनता है । पितृ-वायुः - सोम - गर्भित अग्नि वायु - आदित्यमूर्त्ति तेजः प्रधान आप: देवसृष्टि का । देवता सृष्टि में भार्गव तत्त्व का प्राधान्य है, देवसृष्टि में आङ्गिरस अपतत्त्व का प्राधान्य है पारस्परिक पितरों की आधारभूमि बने हुए हैं, पितर देवताओं की आधार भूमि बन रहे हैं । इसी है, जैसा कि सरबन्ध से इन के लिए ' समविव्यचुः ' ( सम विव्यचुः - ऋक्संहिता ) कहा जाता पूर्व प्रकरण में बृहदुक्थ - विज्ञान में स्पष्ट कर दिया गया है ।. सोमभाग को आधार बनाने वाला आदित्य सूर्य्य है, वायुभाग को आधार बनाने वाला आधार बनाने वाला पृथिवीलोक है । पृथिवी, वायु-अन्तरिक्ष्य चन्द्रमा है, एवं आप को चन्द्रयुक्त अन्तरिक्ष, आदित्यप्राणात्मक सूर्य्य, तीनों की समष्टि देवसृष्टि है । अग्नि के आधारभूत पार्थिव पितर वसु हैं, वायु के आधारभूत पितर रूद्र हैं, सूर्य्य के आधारभूत पितर आदित्य हैं । इस प्रकार अग्नि- वायु- सूर्य्य, तीनों देवताओं की महिमा में आधाररूप से प्रतिष्ठित पितर वस् - रुद्र-आदित्य नामों से ही व्यवहृत हो रहे हैं । ८ वसु, ११ रुद्र, १२ आदित्य, २ सान्ध्यप्रारण ( जिन्हें अश्विनीकुमार कहा जाता है ), इस प्रकार देवतन्तु ३३ भागों में विभक्त हो रहे हैं, जो अग्नीषोमा " मक यज्ञ का कर रहे हैं । यज्ञवहन करने वाले ये ही ३३ देवता उस पारमेष्ठ्य महान् की योनि देवसृष्टि है । जिस प्रकार: - वायुः - सोमात्मकं पितृतत्त्व का अग्नि वायु - आदित्यात्मिका देवसृष्टि के रूप से समन्वय है, एवमेव अग्न्यादि तीनों का बादि तीनों के साथ भी आधार-८८
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ऋणमोचनोपायोपनिपन् रूप से समन्वय हो रहा है । अनि अतत्त्व की, वायु तदनुगृहीत चन्द्रमा - वायुतत्त्व की, एवं आदित्य सोमतत्त्व की आधारभूमि बन रहा है । इन तीनों के सम्बन्ध से अब वायु सोममूर्त्ति महान् क्रमशः आकृति, प्रकृति, अहंकृति का, तथा तम - रज- सत्त्व गुण का अधिष्ठाता बन रहा है, जैसा कि प्रक--रारम्भ में ही स्पष्ट किया जा चुका है । अग्निगर्भित आपोमय महान् श्राप्यजीवों की, वायुगर्भित वायव्य महान् वायव्य जीवों की, तथा आदित्यगर्भित सौम्य महान् सौम्य जीवों की योनि बन रहा है । यही त्रिविध योनिजसृष्टि है, जिसे हम मैथुनीसृष्टि भी कह सकते हैं । प्रकृत में जिस योनि सृष्टि का विवेचन प्रक्रान्त है, उस का ' महानात्मा ' की पितृसृष्टि से ही प्रधान सन्बन्ध है, जिस के गर्भ में गौणरूप से देव, ऋषि भाग भी प्रतिष्ठित हो रहे हैं । १ - आप: - - ( अग्नि: ) -वायु: -- ( यमः ) - पितृसृष्टिप्रवर्तको महान् भार्गव: ( स्नेह प्रधान: ) । ३- सोमः. - ( आदित्य ) * १- अग्निः-- - ( आपः ) २ -- यम: - ( वायुः ) -- देवसृष्टिप्रवर्तको महान् - आङ्गिरसः ( तेजःप्रधानः ) । ३ - श्रादित्यः -- ( सोमः ) महानात्मा प्रजातन्तुवितानरूप से शुक्र में प्रतिष्ठित रहता है । इस महानात्मा के गर्भ में स्वायम्भुव ऋषिप्राण तथा सौर देवप्राण भी प्रतिष्ठित हैं, यह पूर्व कथन से भलीभाँति सिद्ध हो जाता है । इसी आधार पर मान लेना पड़ता है कि, पितृऋण के साथ साथ पुत्र को ऋषिऋण, देवऋण, इन दोनों का भी अधिष्ठान बन जाना पड़ता है । बीजी पिता के महानात्मा में प्रतिष्ठित २८ कल पितृसहों में से जिस प्रकार पुत्र के औपपातिक आत्मा को २२ मात्रा का ऋण लेना पड़ता है, तथैव aa के महात्मगत पितृसह: से अविनाभूत ऋषिमात्रा, देवमात्रा, इन दोनों का भी इसे ऋण लेना पड़ता है । इस प्रकार तीनों ऋणों को लेकर ही जीवात्मा जन्म धारण में समर्थ होता है | जब तक महानात्मानुगत भूतात्मा इन तीन ऋणों का परिशोध नहीं कर लेता, तब तक यह अपने नित्यशुद्ध-मुक्तरूप में नहीं आ सकता । क्योंकि बन्धनात्यन्तविमोक ही भूतात्मा का परमपुरुषार्थ माना गया है, aaya सद्धि के लिए इन तीनों ऋणों का अपाकरण आवश्यक हो जाता है ।
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श्राद्धविज्ञान कहा गया है कि ऋषिमात्रा से इस में ज्ञानतन्तु का प्रसार होता है । जितनी ज्ञानमात्रा इसे मिली है, इसका कर्त्तव्य है कि अपने ब्रह्मचर्यकाल में उसका स्वाध्यायद्वारा विकास कर उसे सच्छिष्यों कर दे । यही इसकी ऋषिऋण से मुक्ति मानी जायगी । देवमात्रा से इसके आध्यात्मिक जीवन-यज्ञतन्तुओं की स्वरूपरक्षा हो रही है । इसका कर्त्तव्य है कि, आधिभौतिक यज्ञकर्म्मद्वारा यह प्राकृतिक • देवयज्ञ का अनुगमन करता हुआ देवमात्रा का आध्यायन कर दे । यही इसकी देवऋण से मुक्ति मानी ' जायगी । एवं तीसरे पितृऋण से त्राण पाने के लिए इसे जो कुछ करना पड़ता है, उसमें प्रजोत्पादन प्रधान कर्म माना गया है, जैसा कि आगे जाकर स्पष्ट होने वाला है । इस प्रकार स्वाध्याय से ऋषि ऋण का, यजन से देवऋरण का, एवं पुत्रोत्पादन से पितृऋण का अपाकरण करता हुआ द्विजाति वास्तव में परमपुरुषार्थसाधन में समर्थ हो जाता है । ऐसे अनृणी का ही जन्म धन्य है । वही कृतकृत्य है । उक्त तीनों ऋणों से अतिरिक्त एक चौथा ' मनुष्यऋण ' ओर माना गया है । आप संसार उत्पन्न होते हैं । उत्पन्न होकर आयुर्भोग पर्य्यन्त अन्न, वित्त, पशु आदि सम्पत्तियों का प्रभूत मात्रा भोग करते हैं । यह यथार्थ है कि, यदि आप उत्पन्न न होते, तो आपके उपभोग में आने वाली यह प्रभूत सम्पत्तिं अवश्यमेव किसी अन्य मनुष्य के काम में आती । आपको यह नहीं भुला देना चाहिये कि, आप जिस पार्थिव अन्नादि सम्पत्ति का उपभोग कर रहे हैं, वह दूसरों की भी भोग्य है 1 आप उन मनुष्यों के ऋणी हैं, जिन्होंने सद्भावना से अपना सत्त्व हटा कर आपको सम्पत् - भोग का अवसर दिया है । यहीं आप पर मनुष्य का, मनुष्य का ही क्यों, प्राणिमात्र का ऋण है । इस ऋण छुटकारा पाने के उपाय हैं-आगत अतिथियों को अपने घर में सत्कार पूर्वक आश्रय देना । निर्धन, हीनाङ्ग, रुग्ण, समर्थ, मनुष्यों की सहायता करना । अपने सामर्थ्य से सर्वात्मना स्वोदर पोषण में असमर्थ पशु-पक्षी - कृमि - कीटादि के लिए घास, पानी, अन्नकरण, आदि प्रदान करना । पथिकों के लिए वापी - कूप-तड़ागादि बनवाना | अन्नक्षेत्र ( सदावर्त ), पाठशाला, मल्लशाला, आदि की स्थापना करना । निःसहाय कुलीन विधवाओं को गुप्तदान से उपकृत करना । इत्यादि सब कर्म्म मनुष्यऋण से आपको अनृणी बनावेंगे, जिस इस आनृण्यकर्म को धर्माचानें- ' आनृशंसधर्म्म ' नाम से व्यवहृत किया है । 1 करवृत्ति वाला निष्ठुर - निर्दयी मनुष्य ही ' नृशंसो घातकः क्रूरः ' के अनुसार ' नृशंस ' कहलाया है । सहजसिद्ध मानवीय सौहार्द को जलाञ्जलि समर्पित करने वाले, अपनी क्रूरता से रवि शासन करने वाले, आगत अभ्यागतों का अश्लील - उद्दण्डभाषा में तिरस्कार करने वाले मदमत्त धनमदान्ध ही ' नृशंस ' कहलाए हैं । यहाँ मानवता सर्वथा जर्जरित है । और मानवता के नाते ऐसे नृशंस प्रणम्य हैं, उपेक्षणीय हैं । मनुष्यता से विरुद्ध धर्म ही नृशंसधर्म्म ( धर्म ) है । ठीक इसके विपरीत मनुष्यमात्र के साथ सद्व्यवहार रखना, यथाशक्ति प्राणिमात्र
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् का उपकार करना मानवधर्म है, मनुष्यता है । यही आनृशंसधर्म है । इसी के अनुगमन से मनुष्यऋण नामक चतुर्थ ऋण का अपाकरण होता है । इन्हीं चारों ऋणों का स्वरूप बतलाती हुई ब्राह्मणश्रुति कहती है १ - ऋणं ह वै जायते - योऽस्ति । स जायमान एव देवेभ्यः, ऋषिभ्यः, पितृभ्यः, मनुष्येभ्यः । स यदेव यजेत - तेन देवेभ्यः ऋणं जायते । तद्ध ेभ्य एतत् करोति, यदेनान् यजते, यदेभ्यो जुहोति । ( १ ) । ” २. - " अथ यदेवानुत्र वीत - तेनर्षिभ्य ऋणं जायते । तदेभ्य एतत् करोति, ऋषीणान्निधिगोप इति, ह्यनूचानमाहुः । ( २ ) " ३ – “ अथ यदेव प्रजामिच्छेत - तेन पितृभ्य ऋणं जायते । तद्धयेभ्य एतत् करोति यदेषां सन्तता अव्यवच्छिन्ना प्रजा भवति । ( ३ ) " ४. - " अथ यदेव वासयेत - तेन मनुष्येभ्य ऋणं जायते । यदेभ्योऽशनं ददाति । ( ४ ) । स एतानि सर्वाणि करोति, स कृतकर्मा , तस्य सर्वमाप्तं, सर्वं जितम् ' ( शत ० ११७ / २ / १,२,३,३,५, ) । कहीं कहीं ब्राह्मणग्रन्थों में हीं मनुष्यऋण के अतिरिक्त एक ' भूतऋण ' और माना गया है । ` वस्तुतः प्राणऋण, भूतऋण, भेद से ऋण के दो ही मुख्य विभाग हैं । प्राणऋण ऋषि, पितर, देव, भेद से तीन भागों में विभक्त है । मनुष्य - पशु - पक्षी - कृमि - कीट, इन पाँच सर्गों में से मनुष्यविध भूतसर्ग पूर्णप्रज्ञ है, इस में प्रज्ञान ज्ञान का ( बुद्धि के सम्बन्ध से ) पूर्ण विकास है । शेष चारों भूतसर्गों का प्रज्ञानज्ञान मुकुलित है, अतएव इन्हें अपूर्णप्रज्ञ कहा जा सकता है । इस प्रकार एक ही भूतवर्ग के मनुष्यऋण, भूतऋण भेद से दो विवर्त्त हो जाते हैं । सम्भूय पाँच ऋण हो जाते हैं । इन पाँचों ऋणों के अपाकरण के लिए पञ्चमहायज्ञों का विधान हुआ है । सामान्यरूप से ऋण - अप करण करने वाले इन पाँचों महायज्ञों का निम्न लिखित शब्दों में स्पष्टीकरण हुआ है-" पञ्चैव महायज्ञाः । तान्येव महा सत्त्राणि भूतयज्ञः, मनुष्ययज्ञः, पितृयज्ञः, देवयज्ञः, ब्रह्मयज्ञः इति । अहरहभूतेभ्यो बलि हरेत्, तथैतं भूतयज्ञं समाप्नोति 1 । अहरहर्दद्यात् - ओपात्रात्, तथैतं मनुष्ययज्ञं समाप्नोति । अहरहः स्वधा कुर्यात् श्रदपात्रात्, तथैतं पितृयज्ञं समाप्नोति । अहरहः स्वाहा कुर्यात् - आकाष्ठात्, तथैतं देवयज्ञं समाप्नोति । अथ ब्रह्मयज्ञः । स्वाध्यायो वै ब्रह्मयज्ञः । ( शत ० ११।३।६।१,२,३, ) ।
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श्राद्धविज्ञान उक्त द्विविध ऋणों में से ऋषियोंने प्रारणऋरण को ही मुख्य माना है, जिसके ऋषि, पितर, देव, भेद से तीन अवान्तर विभाग हैं । कारण इस का यही है कि, पूर्णप्रज्ञ मनुष्य ( अतिथि ) से सम्वद्ध मनुष्यऋण, अपूर्णप्रज्ञ पश्चादि प्राणियों से सम्बद्ध भूतऋण, यह द्विविध भूतऋरण केवल लोकनिष्ठा से ही सम्बन्ध रखता है । उभयलोकानुगता प्राणसंस्था से इस का विशेष सम्बन्ध नहीं है । भूतऋरण परिशोध न करने वाला मानवता से बहिष्कृत है, वह क्रूर कहलाता है, उस का व्यावहारिक Marathi हो जाता है । परन्तु परलोकमा प्रत्यक्ष में विशेष अनिष्ट नहीं होता । इधर प्रारण-ऋत्री के परिशोध किए बिना यह उभयलोकसम्पत् से वञ्चित रह जाता है । इस लोक में अभ्युदय नहीं होता, परलोक में यामी - यातनाएँ सहनीं पड़तीं हैं । आत्मा जन्म - मृत्युबन्धन से छुटकारा नहीं पाता । अतएव अन्यत्र स्वयं श्र तिने इन तीनों का ही प्राधान्य स्वीकार किया है, जैसा कि निम्न लिखित वचन से प्रमाणित है -" एष व जायमानस्त्रिभि वाजायते - ब्रह्मचर्येण ऋषिभ्यः, यज्ञेन देवेव्यः, प्रजया पितृभ्यः । एष वा अनृणी - यः पुत्री, यज्वा ब्रह्मचारी च " । उक्त तीनों ऋणों में से प्रकृत प्रकरण में हमें केवल ' पितृऋण ' के परिशोध की मीमांसा ' करनी है । पूर्वप्रतिपादित ' प्रजातन्तुवितानविज्ञान ' से यह स्पष्ट हो जाता है कि, प्रत्येक पुरुष में ८४ कल पितृसह: पिण्ड प्रतिष्ठित रहता है । इन चौरासी में से मूलपुरुष के १ - वृद्धातिवृद्धप्रपितामह, २- श्रतिवृद्धप्रपितामह, ३ - वृद्धप्रपितामह, ४- प्रपितामह, ५- पितामह, ६- पिता, इन ६ परपुरुषों से इस मूलपुरुष को क्रमशः १-३-६-१०-१५ - २११ इतने सहभाग ऋणरूप से मिले हैं, जिन के संक-न से ५६ कला हो जातीं हैं । इसके अतिरिक्त स्वयं मूलपुरुष अपने शुक्रगत महानात्मा में २८ कला स्वपुरुषार्थ से उत्पन्न करता है । यह इस का आत्मधन है । इस प्रकार ५६ पितृऋण, २८ आत्म-धन, दोनों के संकलन से इस का शुक्रस्थ महानात्मा ८४ कल सहः पिण्ड से युक्त हो जाता है । मूलपुरुष में प्रतिष्ठित स्वात्मधनरूप २८ कलाओं का विचार छोड़ते हुए पहिले हमें परम्परया आगत, ऋणरूप से प्रतिष्ठित ५६ कलाओं का विचार करना है । प्रश्न इस सम्बन्ध में यह उपस्थित होता है कि, यदि पितृऋण के परिशोध के बिना आत्मबन्धन विमोक असम्भव है, तो इन के परि-शोध का उपाय क्या?, किन साधनों से, किन उपायों से मूलपुरुष अपनी इन ५६ ऋणकलाओं के भार से मुक्ति पा सकता है?, इन्हीं प्रश्नों के समाधान के लिए ऋषियों की ओर से चार उपाय हमारे सम्मुख उपस्थित हो रहे हैं-१ - प्रजोत्पादनकर्मणा - ऋणमुक्ति: - प्रजोत्पादनेनान्यत् । २- सपिण्डीकरणेन ऋणमुक्तिः -- सपिण्डीकरणेनान्यत् । ३ - श्राद्धकर्मणा ! ४ - गया पिण्डदानेन -ऋणमुक्तिः - श्राद्ध नान्यत् । • ऋणमुक्तिः - गयापिण्डदानेनान्यत् ।