Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 141–150
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 141–150
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् १- प्रजोत्पादन त्मकं प्रथममानृण्यं कर्म्म प्रजोत्पादनानुगत आनृण्यविज्ञानोपक्रम — सर्वप्रथम क्रमप्राप्त प्रजोत्पादनलक्षण प्रथम ऋणपरिशोध की ओर ही पाठकों आकर्षित किया जाता है । शास्त्रविहित पद्धति के अनुसार पुरुष ने समावर्त्तनसंस्कारानन्तर का ध्यान गृहमेधी बनने की कामना से ' असमानार्षगोत्रजां ' कन्या के साथ विवाह किया । प्राप्तवयस्का पत्नी साथ ऋतुकाल में पति ने गर्भाधानसंस्कार किया । परिणामस्वरूप दम्पती के शुक्र - शोणित के के समन्वय से गर्भस्वरूप सम्पन्न हो गया । कालान्तर में माता पिता ने पुत्रमुखदर्शन कर अपने आप को पितृऋण से उऋण माना । और यही भारतीय विवाह बन्धन काप्रधान लक्ष्य माना गया । शुक्राहुति के द्वारा सुतमुखावलोकन से दम्पती पितृऋण से कैसे उऋण हो गए?, यही विचारणीय प्रश्न है । शुक्र का शोणित में आवाप करने वाला, शुक्रात्मक बीज का शोणितात्मक क्षेत्र में वन करने वाला, अतएव ' बीजी ' नाम से व्यवहृत होने वाला पिता शुक्राहुति के साथ साथ शुक्रस्थ ऋण-कलाओं का भी आधान कर देता है । एवं यही इस का आनृण्यकर्म है, जिस का निम्नलिखित शब्दों में स्पष्टीकरण किया जा सकता है, मात्रानुगतऋणतत्त्ववितान-ऋणरूप से प्राप्त जिन ५६ कलाओं का पूर्व में दिग्दर्शन कराया गया है, वे सभी तो शुक्रद्वारा शोणित में आहुत नहीं हो जातीं । अपितु ' आत्मधेय - तन्य ' रूप से इन के दो विभाग हो जाते हैं । इनमें से श्रात्मधेयकलात्मक ऋण का तो बीजी पुत्रोत्पादन कर्म से परिशोध नहीं कर सकता । परिशोध करता है केवल तन्यत्तात्मक ऋण का । कहा गया है कि, वृद्धातिवृद्वप्रपितामह से इसे केवल १ कला ऋणरूप से मिली है । क्योंकि इस में आगे वितान का अभाव है, अत-एव यह सातवें पुरुष की ऋणकला तो केवल बीजी में आत्मघेयरूप से ही प्रतिष्ठित रह जाती हैं । इस का शुक्रद्वारा परिशोध असम्भव है । अतिवृद्धप्रपितामह से इसे ३ कला ऋणरूप से मिली है । इन में संख्यानुगत मात्राधिकता से आगे वितत होने का धर्म्म विद्यम न है । फलतः इस के आत्म-- तन्य भेद से दो विभाग हो जाते हैं । १ ऋण कला आत्मवेयरूप से बीजी में ही प्रतिष्ठित रहती है, शेष २ ऋण कला तन्यरूप से शुक्रद्वारा पुत्रोत्पादन कर्म में उपयुक्त हो जातीं हैं । वृद्ध-प्रपितामह से इसे ६ कला ऋणरूप से मिलीं हैं । इन में से ३ प्रतिष्ठित रह जातीं हैं, ३ पुत्रोत्पा-दनकर्म में उपयुक्त हो जातीं हैं । प्रपितामह से १० कला मिलीं हैं । इन में से ४ प्रतिष्ठित रह जातीं हैं, ६ कला उपयुक्त हो जातीं हैं । पितामह से १५ कला मिलीं हैं । इन में से ५ प्रतिष्ठित रह जातीं हैं, १० कला उपयुक्त हो जातीं हैं । अपने पिता से २ ९ मिलीं हैं । इन में से ६ प्रतिष्ठित रह जातीं हैं, १५ कला उपयुक्त हो जातीं हैं । इस प्रकार वृद्धातिवृद्ध०- अतिवृद्धप्र ० - वृद्धप्रपिता ० - प्रपिता०-£ 3
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श्राद्धविज्ञान. ' पितामह -- एवं पिता से मिलने वालीं १-३-६-१०-१५-२१ ' इन ऋणकलाओं में से १-२-३-४-५-६ ये २१ ऋणकलाएँ तो आत्मघेयरूप से वीजी में हीं प्रतिष्ठित रह जातीं हैं, एवं शेष १-३-६-१० हैं, जैसा कि परिलेख से १५ ' ये ३५ कला तन्यरूप से शुक्रद्वारा पुत्रोत्पादनकर्म में उपयुक्त हो जातीं स्पष्ट है-वृद्धातिवृद्धप्रपितामहत: -अतिवृद्धप्रपितामहतः-- * मात्राभावादूवितानाभावः वृद्धप्रपितामहत: -प्रपितामहतः पितामहतः -६ --४ .१५ --- १० पितुः सकाशात् - २१--१५--६ ( पितृऋणम् ) ऋणभागः ५६ ३५. २१ ( ३५ + २१ – ५६ ) -1 1 तन्याः आत्मधेयाः इस दृष्टिकोण को विशेषरूप ध्यान में रखना होगा कि, पुरुष के शुक्र, में शेष ऋण- २१ रूप से प्रतिष्ठित ५६ कलाओं में से ३५ कलाओं के ऋण से ही इस की मुक्ति होती है ऋणकलाएँ आत्मघेयरूप से इसी में प्रतिष्ठित रह जाती हैं । यदि पुत्रोत्पादन कर्म्म न हो, तो इन ३५ कलाओं का परिशोध सर्वथा असम्भव बन जाय । इस के अतिरिक्त यह स्वयं भी अपूर्ण बन व्यर्थ चली रह जाय । अपनी अपूर्णता का कारण यही है कि, पुत्रादि उत्पन्न न होने पर शुक्राहुति है, एवं न जाती हैं । और उस समय न तो इस के आत्मधन के तन्यभाग की ही पूर्णता होती लिए पितृऋण का ही परिशोध होता है । इसी अपूर्णतानिवृत्ति - पूर्णताप्राप्ति - पितृऋणमोचन - के जो कि समानार्ष गोत्रजा कन्या के साथ यैवा-. प्रजोत्पादन कर्म्म आवश्यक माना गया है, है । हिक सम्बन्ध के द्वारा दाम्पत्यभाव प्राप्त करने पर ही सफल बन सकता ' पर पुरुषों से ऋणरूप से जैसे ५६ कला आती हैं, वैसे इसके अपने शुक्र में नक्षत्रा-वच्छिन्न, अतएव २८ कल विभक्त चान्द्ररस के द्वारा २८ कल पितृसहांसि और आते हैं । यही इसका आत्मधन कहलाया है । जिस प्रकार पितृऋण की ३५ कलाएँ तन्यरूप से पूर्वक्रमानुसार शुक्रद्वारा प्रजोत्पादन से पुत्र में जातीं हैं, शेष २१ कला आत्मधेयरूप से बीजी में प्रतिष्ठित । रह २८ जाती में हैं से, एवमेव स्वात्मधन की २८ कलाओं के भी आत्मधेय - तन्यरूप से दो विवर्त्त हो जाते हैं २१ मात्राएँ पुत्रोत्पादनकर्म में उपयुक्त हो जातीं हैं, ये ही आत्मधन की तन्यकला हैं । एवं ७ कलाएँ-$
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् स्वयं बीजी में प्रतिष्ठित रह जातीं हैं, ये ही आत्मधन की आत्मधेयकला हैं । पितृऋण की ३५ तन्यकला, आत्मधन की २१ तन्यकला, सम्भूय जो ५६ कला ऋणरूप से पुत्रोत्पादन कर्म में उपयुक्त होतीं हैं, वे कालक्रम से पुत्र - पौत्रादि के द्वारा चन्द्रलोकगत बीजी, तत्पिता - पितामहादि को पुनः मिल जातीं हैं, जैसा कि सपिण्डीकरण में स्पष्ट होने वाला है । कालक्रम इसलिए मानना पड़ता है कि, बीजी के सातवें पुरुष ( वृद्धातिवृद्धप्रपौत्र ) पर्य्यन्त व्याप्त पितृसहों को वह बीजी पुत्र - पौत्रादि क्रम से ही वापस प्राप्त करने में समर्थ हो सकता है । हाँ, यदि पुत्र से पहिले पौत्र का निधन हो जाता है, तो कालक्रम का विपर्यय भी हो जाता है । परन्तु पूरी मात्राओं का प्रत्यर्पण सातवीं पीढ़ी पर जाके ही समाप्त होता है । सातवीं सन्तान के द्वारा जो ऋणकलाएँ वापस मिलतीं हैं, उन से मुक्ति केवल वृद्धातिवृद्ध-प्रपितामह की होती है । कारण स्पष्ट है । सातवीं पीढ़ी में वृद्धातिवृद्धप्रपितामह का एक सहः ऋणरूप से भुक्त है । इसी से उसे अपना यह एक अंश प्राप्त होता है । इस अंश को प्राप्त करने के अन्तर ही सातवें वृद्धातिवृद्धप्रपितामह का पृथिवी से सम्बन्ध टूट जाता है । बीजी ने यदि पुत्र उत्पन्न कर दिया, तो पिता से आने वाली २१ कलाओं में से १५ देकर वह वह ऋणमुक्त हो गया । पुत्र यदि पुत्र उत्पन्न कर दिया तो आत्मस्थ १५ में से १० कला देकर इस अंश से वह उऋण हो गया । यही क्रम आगे समझिए । सातवीं पीढ़ी पर जाके परम्परया प्राप्त इन ३५ कलाओं का पूर्ण परिशोध हो जायगा । शेष कलाएँ सपिएडीकरण से ही वापस मिलेंगी । बीजीपुरुष का आत्मधन किस व्यवस्था से आत्मधेय, तन्यरूप से विभक्त होता है, यह निम्न लिखित परिलेख से भलीभाँति स्पष्ट हो जाता है-१ --- आत्मन्येव स्थास्थानं--सप्त कला: ७ - आत्मधेयाः २ - पुत्रे - श्रोतैकविंशतेः. --षटू कलाः .६ - पुत्रात्मधेयाः ३ - पौत्रे - प्तपञ्चदशभ्यः--पश्च कलाः ५- पौत्रात्मवेयाः ४ -- प्रपौत्रे - प्रप्तदशभ्यः-- चतस्रः कलाः ५- वृ ०प्र०- ० - आप्तेभ्यः षड्भ्यः - तिस्रः कलाः ६- प्रति ० - प्रोप्तेभ्यस्ति सृभ्यः - द्वे कले ७ - वृ ० अति - ओप्तावशिष्टा - एका कला ' ऋणमस्मिन् संनयति ' ४-- प्रपौत्रात्मवेयाः ३ - वृद्ध प्रपौत्रात्म घेयाः २ - अतिवृद्धप्रपौत्रात्मधेयाः १ - वृद्धातिवृद्धप्रपौत्रात्मधेयाः उक्त क्रमानुसार अष्टाविंशतिकल आत्मधन का ६ सन्तानों में आवाप होने से स्वयं बीजी पुरुष में आत्मधनरूप से केवल ७ मात्राएँ ( आत्मप्रतिष्ठा के लिए ) बच रहतीं हैं । प्रत्येक पुरुष ६५
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श्राद्धविज्ञान अपने पिता का पुत्र है, पितामह का पौत्र है, प्रपितामह का प्रपौत्र है, वृद्धप्रपितामह का वृद्धप्रपौत्र है, अतिवृद्धप्रपितामह का अतिवृद्धप्रपौत्र है, वृद्धातिवृद्धप्रपितामह का वृद्धातिवृद्धप्रपौत्रहै । इस आपेक्षिक भाव से प्रत्येक पुरुष परम्परया आगत ५६ ऋणकलाओं से, स्वोपार्जित २८ कलाओं से ८४ कल बन जाता है । इनमें से ऋण की ५६ में से इसमें २१ आत्मवेयरूप से बचतीं हैं, धन की २८ कला में से आत्मघेयरूप से ७ कला बचतीं हैं । सम्भूय आत्मधेय कला २८ बच रहती हैं । प्रत्येक पुरुष के शुक्रावच्छिन्न महानात्ना में २८ कला नित्य प्रतिष्ठित रहतीं हैं । " प्रकरणार्थ यही है कि, स्वप्रतिष्ठा के लिए, पितृऋण के द्वारा प्राप्त ३५ कलाओं के परिशोध के लिए प्रजोत्पादनक ( पुत्रोत्पादन ) आवश्यकरूप से अपेक्षित है । जिसके पुत्र उत्पन्न नहीं होता, वह ॠण - धन से भी मुक्त नहीं होता, साथ ही अपने आत्मधन से भी वह वञ्चित रह जाता है, जैसा कि— ' पुत्रस्य गतिर्नास्ति ' इत्यादि से स्पष्ट है । इस सम्बन्ध में यह स्मरण रखना चाहिए कि, उत्पन्न पुत्र का मुखदर्शन आवश्यक है । दृष्टि में सत्यतत्त्व विद्यमान है, सत्य ही श्रद्धातत्त्व का रूपान्तर है । उधर श्रद्धा सूत्र के द्वारा ही प्रजातन्तुओं का पारस्परिक सम्बन्ध सुरक्षित रहता है । इसी सम्बन्धदा लिए पुत्रमुखदर्शन को धर्माचार्थ्यांने आवश्यक बतलाया है, जैसा कि निम्न लिखित वचन से स्पष्ट है-" ऋणमस्मिन् संनयति, अमृतत्वं च गच्छति । पिता पुत्रस्य जातस्य पश्येच्चेञ्जीवितो मुग्वम् ॥ " ( वसिष्ठः १७ श्र ० ) । इससे यह भी निष्कर्ष निकलता है कि, उत्पन्नपुत्र के साथ एक बार यदि पिता का दृष्टि-सम्बन्ध हो गया, एवं दुदैववश पुत्र का यदि पिता से पहिले निधन हो गया, तब भी आनृण्यकर्म में कोई क्षति नहीं होती । यदि पुत्र पिता के दृष्टिसम्बन्ध से वञ्चित रहता हुआ कालकवलित हो गया, तो आनृण्यकर्म संशयास्पद बन जाता है । बीजी पिता अपनी २६ में से २१ का पुत्र को ऋणी बनाता हुआ, ५६ पारम्परिक मात्राओं से ३५ का पुत्र पर उत्तरदायित्त्व डाल देता है, इसी अभिप्राय से ऋणमस्मिन् ' संनयति ' कहा गया है । अपुत्री, अतएव उभयलोक - प्रतिष्ठा से वञ्चित, एवं पुत्री, अतएव उभयलोक प्रतिष्ठा से युक्त पुरुष की प्राकृतिक दशाओं का स्पष्टीकरण करते हुए ऋषि कहते हैं-१ - " अनन्ताः पुत्रिणां लोका नापुत्रस्य लोकोऽस्ति " । २ - " प्रजाः सन्त्वपुत्रिणः " इत्यभिशापः । ३ – “ प्रजाभिरग्नेऽमृतत्त्वस्याम् ' इत्यपि निगमो भवति ४ - " पुत्रेण लोकाञ्जयति, पौत्रेणानन्त्यमश्नुते । अथ पुत्रस्य पौत्रेण वनस्याप्नोति विष्टपम् || ” ६६ 7
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ऋखमोचनोपायोपनिषत् चतुर्थ वचन बीजी की जीवितदशा से सम्बन्ध रखता है । बीजी - पिता अपनी जीवितदशा में ( जीते जी ) पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, इन तीन पीढ़ियों को यदि अपनी आँखों से देख नाम लेता से है प्रसिद्ध , तो उस सौर- का भूतात्मा ' ब्रध्नस्य विष्टपू ' नामक, पृथिवी के २१ वें अहर्गण पर प्रतिष्ठित ' नाक ' तत्त्वानुशय से युक्त हो जाता है । सौरतत्त्व हिरण्मय है, जिस सौरतत्त्वातिशय के प्रवेश से पड़बाबा सुवर्ण ) धातु भी ' हिरण्य ' कहलाया है । यही कारण है कि, प्रपौत्रजन्मोत्सव पर प्रपितामह ( है । को सोने की सीढ़ी पर चढ़ाया जाता है । यह प्राकृतिक हिरण्मयी - नाकगति का अभिनयमात्र यदि किसी पुरुष के स्वयं के पुत्र उत्पन्न नहीं होता, तो उस की ऋणमुक्ति का क्या भ्राताओं उपाय? में इस सम्बन्ध में शास्त्र ( स्मृति ) यह व्यवस्था की है कि समानोदर ( सहोदर पुत्रवान् ) अनेक बन जाते हैं । से यदि किसी एक के पुत्र उत्पन्न हो जाता है, तो इससे वे सभी समानोदर । इसी क्योंकि समानरूप से वितत ऋणतन्तुओं का परिशोध एक के पुत्र हो जाने से गतार्थ है अभिप्राय से वसिष्ठ ने कहा है-बहूनामेकजातानामेकश्चेत् पुत्रवान्नरः ॥ सर्वे ते तेन पुत्रेण पुत्रवन्त इति श्रुतिः ॥ १ ॥
बीनामेकपत्नीनामेका पुत्रवती यदि । सर्वास्तास्तेन पुत्रेण पुत्रवत्य इति श्रुतिः ॥ २ ॥ ( वसिष्ठस्मृतिः ) ।
द्वादशविधपुत्रस्वरूपपरिचय — धर्मशास्त्र में जिन द्वादशविध पुत्रों का उल्लेख उपलब्ध होता है, उनमें से प्रथम क्षेत्री ( औरस ) पुत्र के अतिरिक्त शेषं ११ पुत्र श्रौत विज्ञानसिद्ध ऋणमोचनकर्म्म से सम्बद्ध हैं, अथवा नहीं?, इस प्रश्न की कोई मीमांसा न करते हुए प्रसङ्गोपात्त यहाँ केवल उनका स्वरूप उद्धृत कर दिया जाता ' है । दत्तकविधि के सम्बन्ध - अभी मौनपक्ष ही श्र ेयः पन्था है । तत्त्वदर्शी विद्वानों के लिए होते कारण हैं । परोक्ष नहीं है । अस्तु ' पुत्र ' नाम से व्यवहृत १२ विभाग यत्रतत्र स्मार्त्तग्रन्थों माना में उपलब्ध गया है । उत्तर-इन १२ हो में पूर्वषट्क ' दायाद ' है, इसे कुलक्रमानुगत सम्पत्ति का अधिकारी से व्यवहृत हुए हैं— षट्क ' अदायाद ' माना गया है । एवं ये पुत्र विभाग निम्न लिखित नामों १- क्षेत्री ( १ ) २ - दौहित्रः ( २ ) ३ - क्षेत्रजः ( ३ ) ४ - गूढजः ( 8 ) ५- कानीनः ( ५ ) ६ - पौनर्भवः ( ६ ) दायादाः -षड् ६७ १- दत्तकः ( ७ ) . २ - क्रीतः ( = ) ३ – कृत्रिमः ( E ) ४ - दत्तात्मा ५ - सहोढजः ( ११ ) ( १० ) ६- अपविद्धः ( १२ अदायादाः -षड्
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श्राद्धविज्ञान १ - क्षेत्री-ब्राह्म, दैव, श्रार्ष, प्राजापत्य, चारों में से किसी एक शास्त्रपद्धति से परिणीता धर्मपत्नी से यथाविधि उत्पन्न पुत्र ही ' क्षेत्री ' है । यही ' औरस ' पुत्र कहलाया है, जैसा कि - ' औरसो धर्मपत्नीज: ' इत्यादि याज्ञवल्क्यस्मृति से प्रमाणित है । उक्त चारों विवाहों के धर्म्मशास्त्र में निम्न लिखित लक्षण बतलाए गए हैं-" ब्राह्म विवाह श्राय दीयते शक्त्यलङ्कृता । ( तजः पुनात्युभयतः पुरुषानेकविंशतिम् " ( या ० स्मृ ० श्र ० ५८। ) । " कुल- शील- वय - आदि लक्षणों से परीक्षित बर का सम्मानपूर्वक निमन्त्रण कर संकल्पपूर्वक स्वशक्त्यनुसार वस्त्रालङ्कारादिपूर्वक कन्यादान करना ही ' १ - ब्राह्मविवाह ' है । ऐसी कन्या से उत्पन्न औरस पुत्र अपने सपिण्डसप्तक, सोदकसप्तक, एवं सगोत्रसप्तक, इन २१ पितृपरम्पराओं को पवित्र करता है । एवं पिता- पितामहादि १० पूर्वपुरुषों को, तथा स्वपुत्र - पौत्रादि १० उत्तरपुरुषों को, स्वयं अपने आपको इस प्रकार इन २१ पुरुषों को पवित्र करता है " । २ - यज्ञस्थऋत्विजे दैव दायार्थस्तु गोद्वयम् । चतुद्दश प्रथमजः पुनात्युत्तरजश्च षट् ॥॥ " ( या ० ५६ । ) । " अपने श्रौत वितानयज्ञ में ऋत्विकूरूप से वृत योग्य श्रोत्रिय ब्राह्मण को कन्यादान करना ' २ - दैवविवाह ' है । एवं गोमिथुन पूर्वक कन्यादान करना ' ३ - आषविवाह ' है । दैवविवाह से कन्या में उत्पन्न पुत्र अपने सपिण्डसप्तक, सोदकसप्तक, इन १४ पितृपरम्पराओं को, तथा पिता - पितामहादि सात पूर्वपुरुषों को, तथा पुत्र - पौत्रादि सात उत्तरपुरुषों को इस प्रकार १४ पुरुषों को पवित्र करता है । विवाह से उत्पन्न होने वाला पुत्र पिता, पितामह, प्रपितामह ३ पूर्वपुरुषों को, एवं पुत्र - पौत्र-प्रपौत्र, इन तीन उत्तर पुरुषों को, सम्भूय ६ पुरुषों को पवित्र करता है " । ४ - इत्युक्त्वा चरतां धर्मं सह या दीयतेऽर्थिने । स कामः पावयेत्तः षट् षट् वंश्यान् सहात्मना । ( या ० ६० । ) “ विवाहकामुक अर्थी के लिए ' सह धर्मं चरताम् ' इस संकल्पोच्चारण के साथ जो कग्यादान होता है, वही ' ४ - ' प्राजापत्यविवाह ' कहलाया है । प्राजापत्यविवाह से उत्पन्न पुत्र पिता - पितामहादि ६ पूर्वपुरुषों को, पुत्र - पौत्रादि ६ उत्तर पुरुषों को, स्वयं अपने आपको, सम्भूय १३ पुरुषों को पवित्र करता है " ।
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२ - ' दौहित्र: ' ( औरससमः ) ऋणमोचनोपायोपनिषत् " अभ्रातृकां प्रदास्यामि तुभ्यं कन्यामलङ्कृताम् । अस्य यो जायते पुत्रः स मे पुत्रो भवेदिति " ॥ ( वसिष्ठस्मृतिः १७।१८ । ) । “ बिना भ्राता की यह कन्या मैं आपको इस सन्धा ( शर्त्त ) के साथ दान कर रहा हूँ कि, इसके जो प्रथम पुत्रसन्तान होगी, वह मेरा ( कन्यादानकर्त्ता - कन्यापिता ) का पुत्र होगा, " इस प्रकार जो कन्यादान होता है, उस कन्या से उत्पन्न पुत्र ' दौहित्रपुत्र ' कहलाया है । रक्तसम्बन्ध के सन्निकट होने से ' द्वितीयः पुत्रकैव ' के अनुसार इसे द्वितीयपुत्र मान लिया गया है । स्वसंकल्प द्वारा इस भविष्यत् -कन्यापुत्र में ' यो यच्छ्रद्धः स एव सः ' सिद्धान्तानुसार कन्यादान समय में हीं दाता स्वगोत्र - सम्बन्ध स्थापित कर देता है । इसी आधार पर- - ' तत्समः पुत्रिकासुतः ' ( या ० = १२ = ) यह सिद्धान्त स्थापित हुआ है । ३ - क्षेत्रज: -" क्षेत्रजः क्षेत्रजातस्तु सगोत्रेणेतरेण वा " ( या ० ८ | १/२८ ) " तदलाभे नियुक्तायां क्षेत्रज: " ( वसिष्ठः १७ | १४ ) इत्यादि वचनों के अनुसार सगोत्रबन्धु के द्वारा, अथवा सपिण्ड देवर के द्वारा नियोगविधि से उत्पादित पुत्र ही ' क्षेत्रजः ' कहलाया है । " पुत्रेण परक्षेत्रे नियोगोत्पादितः सुतः । उभयोरप्यसौ Raat पिण्डदाता च धर्म्मतः ॥ " ' उपयुक्त स्मार्त्त सिद्धान्त के अनुसार- ' अपुत्रां गुर्वनुज्ञातः ' इत्यादि शास्त्र - विधिपूर्वक पर • भाया में अन्य पुरुष से उत्पादित पुत्र ही ' क्षेत्रज ' कहलाया है । इस नियोगविधि का अधिकारी देवरादि स्ववंश का ही व्यक्ति माना गया है । यदि नियोगकर्त्ता देवर स्वयं भी अपुत्री है, तो नियोग-विधि से परक्षेत्र में उत्पन्न क्षेत्रज पुत्र बीजी, क्षेत्री, दोनों का पुत्र कहलाता है । यदि नियुक्त देवरादि पुत्रवान है, केवल क्षेत्री के लिए ही यदि वह पुत्र उत्पन्न करता है, तो ऐसी दशा में वह क्षेत्रज केवल क्षेत्री का ही रिक्थहा, तथा पिण्डदाता बनता है । इसी सिद्धान्त का समर्थन करते हुए भगवान् मनु कहते हैं-- फलं त्वनभिसन्धाय क्षेत्रिणा बीजिना तथा प्रत्यक्षं क्षेत्रिणामर्थो बीजाद्योनिर्बलीवसी ॥ ६६
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श्राद्धविज्ञान स्त्री परक्षेत्र के साथ नियोग करना शास्त्रसम्मत है, परन्तु वह परक्षेत्र कैसा?, क्या विधवा है?, इस नियोग के द्वारा पुत्र उत्पन्न कर सकती है?, नहीं, सर्वथा नहीं । नियोग की अधिकारीणी कौन प्रश्न की मीमांसा करते हुए मनु ने व्यवस्था की है कि--देवराद्वा सपिण्डाद्वा स्त्रिया सम्यङ नियुक्तया || प्रजेप्सिताधिगन्तव्या सन्तानस्य परिक्षये ॥ विधवायां नियुक्तस्तु घृताक्तो वाग्यतो दिशि ॥ एकमुत्पादयेत् पुत्रं न द्वितीयं कथञ्चन ॥ २ ॥
नियुक्त विधि वा वर्त्तेयातां तु कामतः ॥ तावुभौ पतितौं स्यातां स्नुषागगुरुतल्पगौ २ ॥ 1 का प्रसङ्ग जहाँ ( राज्यतन्त्रानुशासक प्रजाव्यवस्थासापेक्ष राजवंश में ) वंशोच्छेद से नियोग-उपस्थित हो जाय, उस परिस्थिति में विधवा स्त्री से अपने देवर से, अथवा अन्यं सपिण्ड विधिद्वारा सन्तानोत्पत्ति की जा सकती है, जिस का एकमात्र लक्ष्य है- अराजकता का निरोध । इस विधवा से नियोग करने वाला अपने शरीर से घृत लिम्पन कर सर्वथा मौन रहता हुआ रात्रि में बड़े संयम के साथ कामचेष्टाओं से अपने आप को सर्वथा बचाता हुआ ही नियोग करेगा । नियोगविधि में प्रवृत्त स्त्री, पुरुष, दोनों में से किसी एक ने भी काम चेष्टा का अनुगमन किया, तो दोनों का पतन हो जायगा । उक्त व्यवस्था के अनन्तर ' विधवा ' का प्रश्न उपस्थित हुआ । नियोगविधि में ' विधवा ' से कौन गृहीत है?, इस प्रश्न का उत्तर है - ' वाग्दान से अन्य मृतपति की स्त्री ' । जिस जाता के है प्रति । कन्या का वाग्दान ( सगाई ) हो जाता है, आर्षपद्धति के अनुसार वही उस का ' पति ' बन वह पति यदि दुर्भाग्य से वाग्दान होने के अनन्तर तथा साप्तपदीन से पहिले ( विवाह से पहिले ) मर जाता है, तो वह वाग्दत्ता विधवा बन जाती है । ' सकृत् कन्या प्रदीयते ' सिद्धान्त के अनुसार, वाग्दान समय में ही कन्यादान गतार्थ है । अब पुनः अन्य के लिए इस का दान अवरुद्ध है कर्म दाता वाग्दान से पिता के स्वत्व की निवृत्ति हो चुकी है, एवं भावी पति के स्वत्व का ऐसी स्थापन हो चुका है । अब इस वाग्दत्ता का वंश कैसे चले?, इस प्रश्न समाधि के लिए ही, विधवा के लिए ही उक्त नियोगविधि विहित हुई है । विवाहानन्तर जिस का पति मर जाता है, उस विघवा के लिए तो यह नियोगविधि भी सर्वथा अवरुद्ध है । हाँ, द्विजातिवर्गातिरिक्त शूद्रवर्ग में ऐसी विधवा भी नियोगविधि का अनुगमन कर सकती है । इसी सम्बन्ध में यह भी स्पष्ट कर लेना चाहिए कि, यदि कहीं राज्यतन्त्रोच्छेद का अवसर आ जाय, तो क्षत्रियराजा के लिए भी ऐसा नियोग विधान अपवाद रूप से ग्राह्य बन जाता है । परन्तु सामान्यतः मृतपति की विधवा के लिए नियोग-विधान सर्वथा वर्ज्य ही है । इसी व्यवस्था का स्पष्टीकरण करते हुए आगे जाकर मनु ने कहा दे-१००
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ऋणमोचनोपायोपनिपत्
" नान्यस्मिन् विधवा नारी नियोक्तव्या द्विजातिभिः ।
अन्यस्मिन् हि नियुञ्जाना धर्म्म हन्युः सनातनम् ॥ १ ॥
नोद्वाहिकेषु मन्त्रेषु नियोगः कीर्त्यते क्वचित् ।
न विवाहविधावुक्त विधवावेदनं पुनः ॥
यं द्विजैर्हि विद्वद्भिः पशुधम्मों विगर्हितः ।
मनुष्याणामपि प्रोक्तो वेने राज्यं प्रशासति ॥ २ ॥
स महीमखिलां भुञ्जन् राजर्षिप्रवरः पुरा ॥
वर्णानां सङ्करं चक्र े कामोपहतचेतनः ॥ ४ ॥
ततः प्रभृति यो मोहात् प्रमीतपतिकां स्त्रियम् ॥
नियोजयत्यपत्यार्थं तं विगर्हन्ति साधवः || ५ || ” X X X X X " यस्या म्रियेत कन्याया वाचा सत्ये कृते पतिः ॥ तामनेन विधानेन निजो विन्देत देवर: " ( ६ ) । ४ - गूढजः-X ' गूढे प्रच्छन्न उत्पन्नो गूढजस्तु सुतः स्मृतः? ( या स्मृ ० ८।१२६ | ) के अनुसार अपने पति के घर में हीं किसी स्वजातिपुरुष से उत्पन्न पुत्र ' गूढज ' कहलाया है । इस के सम्बन्ध में सवर्णत्त्व का निश्चय होना आवश्यक माना गया है । ऐसी यह गूढज सन्तति भ - ' बीजाद्यो-निर्बलीयसी ' के अनुसार ' क्षेत्री ' की ही मान ली गई है । ५- कानीनः -४-१ - " कानीनः कन्यकाजातो माताहमसुतो मतः " ( या ० = १२६ )
२ - " पितृवेश्मनि कन्या तु यं पुत्रं जनयेद्रहः ।
तं कानीनं वदेनाम्ना वोढुः कन्यासमुद्भवम् ॥
” ( मनुः ) ३ - या पितृग - असंस्कृता कामादुत्पादयेत्, मातामहस्य पुत्रो भवतीत्याहुः " ( वसिष्ठः १७ । २४ ) उक्त वचनों के अनुसार पिता के ही घर में यदि गुप्तरूप से किसी सवर्ण पुरुष के संयोग से कन्या के पुत्र उत्पन्न हो जाता है, तो वह पुत्र ' कानीन ' कहलाता है । यदि इस दशा में कन्या अवि-वाहित होती है, तो यह कानीनपुत्र ' बीजाद्योनिर्बलीयसी ' न्याय से माताहम का पुत्र मान लिया जाता १०१ 35
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—पौनर्भवः-७ -दत्तक: -८- क्रीतः: -श्राद्धविज्ञान ५ -------६ " क्रीतश्च ताभ्यां विक्रीतः " ( या ० ८१३१ ) । “ क्रीणीयाद्यस्त्वपत्यार्थं मातापित्रोर्यमन्तिकात् । १०२ है । इक प्रकार से ऐसा कानीन इस मातामह का ' दौहित्र ' लक्षण कानीन पुत्र बनता है । यदि कन्या विवाहित है, और उस समय मातामह के घर में प्रच्छन्न रूप से अन्य सवर्ण सम्बन्ध से इस के . पुत्र उत्पन्न हो जाता है, तो उस दशा में यह वोढा - पति का ही पुत्र माना जाता है । " अक्षतायां क्षतायां वा जातः पौनर्भवः सुतः " ( या ० ८।१३० ) " या कौमारं भर्त्तारमुत्सृज्य - अन्यैः सह चरित्वा तस्यैव कुटुम्बमाश्रयति सा पुन-भूर्भवति । याच क्लीवं, पतित, मुन्मत्त वा भर्त्तारमुत्सृज्य - अन्यं पतिं विन्दते, मृते वा, सा पुनर्भूर्भवति " ( वसिष्ठः १७ । २१ ) । इत्यादि वचनों के अनुसार पूर्वलक्षण क्षत, अथवा अक्षत पुनर्भू स्त्री में सवर्ण पुरुष मे उत्पन्न ' पौनर्भव ' कहलाया है । " दद्यान्माता पिता वा यं स पुत्रो दत्तको भवेत् " ( या ०८।१३० ) । " माता पिता वा दद्यातां यमद्भिः पुत्रमापदि । सदृशं प्रीतिसंयुक्तः स ज्ञ े यो दत्रिमः सुतः || ” ( मनुस्मृतिः ) " यं मातापितरौ दद्याताम् ” ( वसिष्ठः १७।२६ ) । इत्यादि वचनों के अनुसार सवर्ण पुत्र को यदि उस के माता पिता प्रसन्नता पूर्वक सोदक-संकल्प पूर्वक स्वस्वत्त्व हटा कर इसे परःस्वत्त्व से युक्त कर देते हैं, तो यह पुत्र गृहीता का ' दत्तक ' ( दानप्राप्त ) पुत्र कहलाता है । यदि दाता के एक ही पुत्र है, तो उस दशा में ' न त्वेवैकं पुत्रं दद्यात् ' के अनुसार दाता को जहाँ देने का निषेध है, वहाँ ' प्रतिगृह्णीयाद्वा ' के अनुसार गृहीता को लेने का भी निषेध है । साथ ही - ' ज्येष्ठेन जातमात्रेण पुत्री भवति मानवः ' सिद्धान्त के अनुसार अनेक पुत्रों में से ज्येष्ठपुत्र के भी दान का निषेध है । स क्रीतकः सुतस्तस्य सदृशोऽसदृशोऽपि वा ॥ " ( मनुः )