Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 21–30
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 21–30
पृष्ठ 21
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१४३ - पिण्डसन्तानक्रमचक्र परिलेखः १४४ - सन्तानराशिचक्रपरिलेखः १४५ - शेष राशिचक्रपरिलेखः १४६ - प्रसूत्याशौच दिनपरिमाण परिलेखः परिलेख, तथा रेखाचित्रसूची १४७ - पुत्रकन्यानुगताशौच दिनपरिमाण परिलेखः १४८ - संसर्गिसम्बन्धिनां दिनपरिमाण परिलेखः १४६ - प्रसूतिकापत्यानुगताशौच दिनपरिमाण परिलेखः १५० - वर्णानुगतपरिशिष्टपरिलेखः १५१ - शिशु मरणानुगताशौचदिनपरिमाण परिलेखः १५२ - मासानुगतदिनपरिमाणशौच परिलेखः १५३ - वर्षानुगत दिनपरिमाणाशौच परिलेखः १५४ - कृतचूड़ाकृतचूड़ाशौच दिनपरिमाण परिलेखः १५५ - उपनातमरणाशौच दिनपरिमाण परिलेखः १५६ - सपिण्डसकुल्य सोदकसगोत्राणामाशौचपरिलेखः १५७ - अविवाहित विवाहिताशौचपरिलेखः 4444 ' सापिण्डयविज्ञानोपनिषत् ' नामक तृतीय खण्ड के रेखाचित्र ( १८ ) तथा परिलखों ( १३६ ) ( सम्भूय १५७ - परिलेखों तथा चित्रों ) की सूची समाप्त २५
पृष्ठ 22
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीः श्राद्धविज्ञानोपनिषद्प्रन्थान्तर्गंत - ' सापिण्ड्यविज्ञानोपनिषत् ' नामक तृतीय खण्ड की संक्षिप्तविपयसूची १ पृष्ठ से ८४ पृष्ठ पर्यन्त ( १ ) - प्रजातन्तुवितानविज्ञानोपनिषत् ( २ ) - ऋणमोचनोपायविज्ञानोपनिषत्-८५ पृष्ठ से ४० २ पृष्ठ पर्य्यन्त ( ३ ) - श्राशौचविज्ञानोपनिषत् ---४०३ पृष्ठ से ५३२ पृष्ठ पर्यन्त * - ' प्रजातन्तुवितानविज्ञानोपनिषत् नामक प्रथम परिच्छेद ( १ ) -पृ ० १ से ८४ पर्यन्त १- महामाङ्गलिक पितृस्वरूप संस्मरण ( स्तुत्यात्मक तथास्वरूपवर्णनात्मक ) परिशिष्ट - ० ६ से १७ पृष्ठ पर्यन्त २ - विषयोपक्रम ३ - महानात्मानुगत पितृतत्त्व ४ - प्रजातन्तुप्रतिष्ठा लक्षण महानात्मा ५ -- महानात्मा का आविर्भावक ६- रेतोमय कम्र्मात्मा ७ - प्रपदप्रतिष्ठ कम्मरमा 5- करारविन्देन पदारविन्दम ६ - कम्र्मात्मा के तीन जन्म १०- कौषीतकि का विचक्षण २१ - मासि मासि वोऽशनम् १२- दधि - मधु- घृतलक्षण कम्मरमा १३- आत्मविवर्त्तसम्परिष्वक्ति १४ - चन्द्रलोकानुगत महानात्मा १५ - गमनस्थिति विश्लेषण १६ - गोत्रसृष्टिमीमांसा १ बे ४ ६. ७ है १० १२ १५ १६ १ 99 " १६ २६
पृष्ठ 23
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१७ - पितृसहः स्वरूपविज्ञान १८ - सहस्तत्त्व के आह्निकादि चार पिण्ड - १६ - सहभाग का पितृप्रारणात्मकत्व २० - शुक्रक्षयमीमांसा २१--- - १ अपत्य - पत्यपुरुषमीमांसा ... २२ -- पितृसोमयज्ञद्वारा ऋणप्रवृत्ति २३ - पितृधनावापमीमांसा संक्षिप्त विषयसूची २४ - - श्रावापपिण्ड - बीजपीएडमीमांसा २५ - निवास - पितृ - तन्य - पिण्डत्रयीमांसा २६- आत्मधन - आत्मऋण - स्वरूपमीमांसा २७- ' को ददर्श प्रथमं जायमानम् ( १ ) २८ - पाकः पृच्छामि मनसाऽविजानन् ( २ ) ' २६ -- ' अचिकित्त्वाञ्चिचिकितुषश्चिदत्र ( ३ ) ३० - - ' मातापितरमृत श्राबभाज ( ४ ) ' ३१ - - ' स्त्रियः सतीस्ताँ उ मे पुंस ( ५ ) ' ३२ -- ' अवः परेण पर एनावरेण ( ६ ) ' ३३ - - ' वः परेण पितरम् ( ७ ) ' ३४ - ' ये ववस्ताँ उ पराचः ( ८ ) ' ३५ - महर्षि बृहदुक्थ का प्रजातन्तुवितान ३६- - ' महिम्न एषां पितरः ( १ ) * ३. - ' सहोभिर्विश्वं परिचक्रम् ( २ ) ' ३८ - ' द्विधा सूनवोऽसुरम् ( ३ ) ' ३६- ६ - ' नावान चोद: प्रदिशः ( ४ ) ४० - प्रकरणोपसंहार. समाप्ता चात्र प्रजातन्तुवितान विज्ञानोपनिषत् प्रथमा सापिण्ड्यविज्ञानोपनिषदन्तर्गता १ २७.
पृष्ठ 24
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
परिलेख, तथा रेखाचित्रसूची पृष्ठ ८५ से ४०२ पर्यन्त १ - माङ्गलिक ऋणदेवतासंस्मरण २- पञ्चविध ऋणस्वरूपविज्ञान ३ – प्रजोत्पादनानुगत, आनृण्यविज्ञानोपक्रम ४ - मात्रानुगत ऋणतत्त्ववितान - ' ऋणमस्मिन् संनयति ' ५ ६ - द्वादशविध ( १२ ) पुत्रस्वरूपपरिचय ७ - पुत्रमाहात्म्य प्रदर्शक वैदिक आख्यान = - सपिण्डीकरणानुगत आनृण्यविज्ञानोपक्रम ६ -- पितृतन्तु का ताना बाना २ १० - श्राद्धकर्मानुगत आनृण्यविज्ञानोपक्रम ११ - तन्तुलक्षण श्राद्धकर्त्ता का स्वरूपपरिचय १२ - देवयज्ञस्वरूप मीमांसा १३ - श्रद्धा का तात्त्विकस्वरूपविज्ञान १४ श्रद्धामय श्रद्धासूत्र १५ - श्रद्धा सूत्रानुगत श्राद्धकर्म १६- सन्ततिनिरोधक पितृदोष १७- श्रद्धातारतम्य से श्रद्धासूत्र में तारतम्य १८ - पत्र अहोरात्र १६- श्रद्धोपचय २०- पितृप्राणोपचय २१ - प्राकृतिक हेतुद्वारा श्रद्धासूत्र की हास - वृद्धि, २८ ८६ ६३. $ 1 ६५ ६७ १०५ ११५ पर्यन्त ) १११. ११२ ११६ १२० १२२ १२८ १३१ १३३ 39 35 " १३५ * - ऋणमोचनोपायविज्ञानोपनिषत् ' नामक द्वितीय परिच्छेद * ' प्रजोत्पादनात्मकं प्रथममानृण्यं कर्म्म ' * ( १ ) ( ६३ से ११० पय्यन्त ) * - ' सपिण्डीकरणात्मकं द्वितीयमानृण्यं कर्म्म ' * ( २ ) ( १११ * ' श्राद्धेनानृण्यं तृतीय कम्र्म्म ( ३ ) ( ११६ से १८१ पर्यन्त ) -
पृष्ठ 25
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
संक्षिप्त विषयसूची २२ - श्रमा, और पूर्णिमा २३ - श्रमावास्यानुगत श्राद्धक * श्रतश्राख्यानद्वारा श्राद्ध विज्ञान का स्पष्टीकरण - १३६ से १६४ पर्य्यन्त २४ - प्रजाकामुक प्रजापति २५- प्रजापति की पञ्चविध प्रजा २६ - यज्ञोपवीती देवता - प्राचीनावीती पितर २७--! २६-- प्रावृत मनुष्य ०६-- यथाजात पशु ३०-- सर्वज्येष्ठअसुर ३१ - पञ्चविधप्रजा के लिए भोग्यव्यवस्था १३२ - आत्मप्राणपशुसमष्टिः प्रजापतिः ३३ - ऋषिसर्ग की मौलिकता ३४ - त्रयीमय प्रजापति ३५ सम्वत्सरानुगता लोकत्रयी. ३६ - अक्ष- दक्ष - क्रान्ति - वृत्तत्रयी ३७-- अहोरात्र का तात्त्विक स्वरूप ३८-- पार्थिव अहोरात्र ( उदयास्तमनानुगत ) ३६ -- चान्द्र अहोरात्र " ४०- --सौर अहोरात्र 55 ४१ -- ब्राह्मअहोरात्र 33 ४२ -- अद्यतनानद्यतनलक्षणपार्थिव अहोरात्र ४३ 35 चन्द्र अहोरात्र ४४ " 3 ४५ 35 ४६ -- उदयास्तमनानुगत मानुष अहोरात्र ४७ पत्र अहोरात्र ४ " ४६ व aritra २६
पृष्ठ 26
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
संक्षिप्त विषयसूची -- श्रौत - आख्यानानुगता अहोरात्रत्रयी ५०--५१ -- सहस्रसम्वत्सर का तात्त्विक अर्थ ५३ - - महासुर्पर्ण सम्वत्सर प्रजापति ५४ -- अख्यानोपसंहार * ५५ -- प्राणविद्यामूलक श्राद्धकर्म्म ' ५६ -- लौकिकदृष्टान्त के माध्यम से तत्त्वसमन्वय ४७ - श्राद्धकर्मानुगत श्रतपरिभाषाविज्ञान - श्रङ्गिरस तेजोमय श्रद्धासूत्र -- अमास्वरूपमीमांसा ५६ ६० - एति - प्रेति भावात्मिका गायत्री, और पितर ६१ -- ज्योति - छाया - तमोभावत्रयी.. ६२ - श्राद्धोपकरणों की सोमात्मकता ६३ - - प्रेतात्मतृप्तिप्रवर्त्तक श्राद्धकर्म ६४ -- श्राद्धकर्मभेदमीमांसा ( ६५ -- श्राद्धकर्मानुगता कालमीमांसा ६६ -- श्राद्धकर्म, और ब्राह्मणभोजन ६७ --- गया श्राद्धानुगत नृविज्ञानोपक्रम ६ --- खण्डात्माओं का यथास्थान विलयन ६६-- ' गया ' प्राणस्वरूप विज्ञान ७० -- गयाप्राणात्मक आगन्तुक महानात्मा ७१ -- गयाप्राणात्मक आत्मा का क्लान्तिभाव -मुख्य प्र ेतपितरों की भोग्य सामग्री --७३ - - रात्रि जागरण निबन्धन पितृदेवतासंस्मरण .... . ७४-- द्विविध पितृदेवता ३० १५६ १५७ १५८ १६१ १६४ १६४ १६५ १६६ १६७ 39 १६६ १७८ १७१ १७३ 99 १७४ १७५ १८२ १, १८३ १८७ 99 १८८ १८६ 33 ५२ - जान्वधःस्थापन - यज्ञान्न - अमृत सम्पत्ति - ऊर्क रस - सूर्यज्योति * गयाश्रद्वात्कं चतुर्थमानृण्यं कर्म ( ४ ) - ( १८२ से ३६६ - पर्यन्त ) * –कुलस्त्रियों के प्रासङ्गिक महासङ्गीत की पावनस्मृति - १८६ से २६४ पर्य्यन्त
पृष्ठ 27
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
1 ७५ - औपपातिक महानात्मा ७६ -- ' ह ' पितर, और ' हि ' पितर ७७ -- बुद्धधनुबन्धी दिव्य पितर ७८-- ' श्मशा ' प्राण, और श्मशान ७८ - ' शमशान ', और ' श्मशान ' ८०-- गरुड़ात्मक हंसात्मा = १ -- हंसात्मा का बन्धन विमोक = २- कारण जिज्ञासा, और केवल श्रद्धा = ३ - नैगमिक मूलान्वेषण ४- महेन्द्रयाग, और पितृकर्म ८५-- अन्न, ओर अन्नादपितर **** ८६-- नित्य और अनित्य पितर -- अन्नादपितृषट्कपरिलेख ---- अन्न पितृषट्कपरिलेख ---= -- सर्वसमष्टि परिलेख ६०-- व्यवच्छेदात्मक समसमन्वय ६१ - पितृपरिवार स्वरूपमीमांसा ६२ -- पितृपरिवार की मूलभूमिका ६३ -- सांख्यसम्मत भूतसर्ग ६४ - चान्द्र प्रजापति, और पितर ६५ - भगवान् जैमिनी का मद्दानात्मदेव ६६ - पितरों का भगिनी, भ्रातृवंश ६७-- पितरों का शुक्ल - कृष्णवंश ६- पितरों की सामान्य संज्ञा ६६ - पितरप्रतीक कुमार.... १०० - परिवृत्ती लक्षणा मलिना भगिनी १०१ -- रोहिणीलक्षणा शुक्ला भगिनी १०२ - अविवाहित कुमार, और पितर १०३ - श्रद्धात्मक पितरकर्म १०४ - अभिनिविष्टों का समाधान... संक्षिप्त विषयसूची ३१
पृष्ठ 28
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
संक्षिप्त विषयसूची १०५ - रुद्रयागात्मक पैत्रक १०६ - रुद्रस्वसा अम्बिका १०७ - रुद्रपशु का स्वरूप परिचय... १०८ - महावीर, और बजरंगवाला... १०६ - गृह्य पितृपरिग्रह १०- पितृपट्टस्वरूप १११ - कन्या का श्वेतदुकूल, और पितर ११२ - वधू का रक्तवस्त्र, और पितर ११४ - जाया एवं गृहिणी JALI ११५ - पितरों का श्वेत - रक्त - पीतवस्त्र ११६ - पार्थिव पितृपरिवारपरिलेख ११७ - लोककर्म्म, और महासङ्गीत ११- आलोच्य लोकगीतग्रन्थ ११६ - राजस्थान की आम्नायशून्यता १२० - राजस्थान और जयपत्तन 414. १२१ - जयपत्तन को आम्नायपरायणता १२२- श्राम्नायसंरक्षक जयपुर राजवंश १२३ - महाराज जयसिंह, और निगमनिष्ठा. १२४ - श्रद्धावल्लभते ज्ञानम् १२५ - कुलदेवी संस्मरणात्मक महासङ्गीत ( १ ) १२६ - कुलदेव्यातिथ्यात्मक महासङ्गीत ( २ ) १२७ - गोदोहन कर्मात्मिक महासङ्गीत ( ३ ) १२- पितृकर्मानुगत मुख्य महासङ्गीत ( ४ ) १२६ - पितृस्तुतिरूप महासङ्गीत ( ५ ) १३० - मुख्यपितृनिरोधात्मक महासङ्गीत ( ६ ) १३१ - महासती संस्मरणात्मक महासङ्गीत ( ८ ) १३२ - पितृस्थापनात्मक महासङ्गीत ( ८ ) १३३ - पितृकर्मानुगता संख्या सम्पत १३४ - सख्यासम्पत् परिलेख: उपरता चेयं - पावन स्मृतिः - प्रासङ्गिकी f ३२ २१८ २१६ ,, २२० 33 59 २२१ २२३ २०५ २२५ 49 २२६ २२७ = २२६ .२३० २: २ २४० २४५ २४६ २६४ २७७ २८७ २८७ २८६ २६३ ११३ - पुत्रवती का पीतवस्त्र, और पितर, सीमन्तिनी, और सीमन्त
पृष्ठ 29
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
संक्षिप्त विषयसूची * - प्रासङ्गिकी तटस्थ आलोचना, और तत् समाधान ( पृ ० २६४ से ३६४ पट १-३५ - आलोचक स्वरूपमीमांसा १३६- श्रद्धालु की सहज मान्यता १३७ - मान्यता की निर्मम श्रलोचना १३८ - आलोचनाप्रसङ्ग ' ओम् ' इत्येतत् १३६- प्रतिप्रश्नपरम्परा १४० - श्रद्धास्खलनमीमांसा १४१ - श्रतिमान से पराभव १४२ - शानसम समाधान १४३ - युक्ति - तर्क - विज्ञानसम्मत समाधानोपक्रम १४४ - वादविवादमूला तर्कपरम्परा १४५ - निगमोपेक्षा के दुष्परिणाम १४६ - वेदस्वाध्याय के सुपरिणाम १४७ - विज्ञान का निस्तत्त्व आकर्षण १४६ - कीटाणु की मान्यता १४६ - भारतीय विज्ञानोद्घोष १५० - भारतीय विज्ञान के आधारसूत्र १५१ - भारतीय नैगमिक निष्ठा १५२ - देवविद्यात्मक निगमविज्ञान १५३ - भारतीय गुण की दोषात्मकता १५४- ग्रीक विद्वत्त्रयी का दृष्टिकोण - १५५- पश्चिम के तत्त्वविचारक -१५६- पश्चिमी जगत् की तत्वमीमांसा १५७ - पश्चिम की मीमांसाचतुष्टयी १५६ - प्रतीच्यविज्ञानमीमांसा का afte १५६ - गणननिष्ठ - सापेक्षवादी - आइन्स्टीन-१६० - तत्ववेत्ता वाले का मतानुषादानुगत भय १६१ - प्रतीच्यदर्शनों के freefore १६२ - सुप्रसिद्ध दार्शनिक ' कान्त ' का दार्शनिक दृष्टिकोण
पृष्ठ 30
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
संक्षिप्त विषयसूची १६३ - कान्त का ' रिलीजन ' वाद १६४ - पश्चिम की जिज्ञासा १६५ - डॉ ० पालब्रन्दन की खोज का परिणाम १६६ - प्रणवसर्गत्रयीमीमांसा १६७ - वैशेषिक - सांख्य- वेदान्त के आलोच्य दृष्टिको १६ = -- वेदान्त का विवर्त्तवाद १६६ - सम्वत्सरचक्रत्रयी, और सर्गत्रयी १७० - ' सेतु ' माध्यम से मीमांसोपक्रम १७ - भारतीय दर्शन का आलोच्य दृष्टिकोण १७२ - तटस्थ आलोचना का मुख्य लक्ष्य बिन्दु १७३ - नैगमिकमानचतुष्टयो १७४- चेतनाचेतनसर्गमीमांसा १७५ - चेतन जड़व्यवहारमीमांसा १७६ - जड़चेतनानुगता महतो समस्या १७७ - पशुमानव की अनुभूतियाँ १७- पञ्चविध मानवसर्ग - समन्वय १७६ - अलौकिक मानव की लोकसंग्राहकता १०- लोकसंग्रहविघातक विभा १८२ - मानवोद्बोधक विभूति १८२ - देवमानधानुगता देवीसम्पद्विमोक्षाय १३- श्रसुरभावानुगता श्रसुरीसम्पन- निबन्धाय १८४ द्वयोः सम्पदो: -उदक ६- श्रासुरमानवस्वरूपोपवर्णनम् - दैवमानवोदयोधनधिया १८६-१७- तिमान की मुरमीमांसाि स्वायम्भुव - पारमेष्ठ्य - सौरमानयी १८६-: -मुनिवानवस्वरूपपरिचय १६८ - यतिमानवस्वरूपपरिचय १६१ - ऋषिमानस्वरूपपरिचय .१६२. लोकमानवस्वरूपपरिचय 4868 ३४ ३१६ ३१८ ३१६ ३२२ ३२५ ३२७ 39 ३३४ ३३५ ३३६ ३४१ ३४३ " ३४४ 39 ३४६ ३४० .६५१ ३५३ ३५५ ३५७ ३५८ ३३० ३६७ ३६८ ३७१ 37 ३७२ १८५ - देव - सुरभावभेदभिन्नप्राकृतिकसर्गद्वयस्वरूपमीमांसा