Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 31–40
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 31–40
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संक्षिप्त विषयसूची १६३ - लोकसंग्रहस्वरूपमीमांसा १६४ - अज्ञकर्म्मसङ्गीमानव १६५ - कर्मसङ्गी अज्ञ के चार विव १६६ - लोकसंग्राह्य कर्मसङ्गी मानव 4725 १६७ - परवञ्चकों का स्वरूपविश्लेषण १६८ - वाङ मात्रेणापि नाच्चर्येत् १६६ - लोकमानव का तात्पर्यार्थ २०० - ऋषिमानवसमर्थक निगमागमवचन २०१ - देवमानवसमर्थक निगमागमवचन २०२ - पार्थिव मानवसमर्थक निगमागमबचन २०३ - निगमागममान्यतानुगामी भारतीय मानव २०४ - भारतीय मानव की शाश्वतनिष्ठा २०५ - अवधेय भारतीय वैज्ञानिक दृष्टिकोण २०६ - आलोचनासमाधानोपराम २८७- पुनः प्रकृतानुसरण, एवं सन्दर्भसङ्गति २०८ - श्रपपातिक प्रेतात्मबन्धनविमोचक गया श्राद्ध २०६ - गया क्षेत्र का वैज्ञानिकस्वरूपपरिचय २१० - द्वितीयपरिच्छेदोपसंहार पृ ० सं ० ० ४०३ से ४३२ पर्यन्त १- परिभाषाज्ञान की विलुप्ति, एवं सांस्कृतिक पतन २ -- अस्पृश्यता के सम्बन्ध में राष्ट्रिय दृष्टिकोण ३ - प्रकृति का प्राकृतिक वैषम्य - समानाधिकारव्यामोहन ४ ५ - जात्युपजातिमीमांसा ६ -- सर्वोच्छेदक दृष्टिको ३५ ३३७ ३७६ ३७६ $ 5 ३६५ ३८६ I II ३६६ ३६६ ४०१ 4640 99 * II " Xos lates ' समाप्ता चात्र ऋणमोचनोपाय विज्ञानोपनिषत् ' द्वितीया सपिएड्यविज्ञानोपनिषदन्तर्गता * श्राशौचविज्ञानोपनिषत् ' नामक तृतीय परिच्छेद
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संक्षिप्त विषयसूची ७ - समविषमभावमीमांसा - आदर्शसमतुलन .६ - मानवीय मर्यादा का आत्यन्तिक स्खलन १० - ब्रह्मानुगत समदर्शन ११ - विश्वानुगत विषमवर्त्तन १२ - ऐच्छिक सर्वनाश को आमन्त्रण १३ - प्राकृतिक विधि - विधानों की उपयोगिता १४- तत्त्वमूला अस्पृश्यता १५ -- समानाधिकारपङ्कनिमग्नता १६ - शुचि - अशुचिभावमीमांसा १७. 9- बाह्य आभ्यन्तर शुचिभाव १८ - अशुचिभाव, और शौच १६- श्राशौचपात्रस्वरूपमीमांसा २० - सूर्य, और आत्मा २१- दृष्टान्त समन्वय २२- द्वन्द्वातीत आत्मा २३- - विदेहमुक्त - मुक्तात्मा २४ -- ब्रह्मानन्दसमतुलनमीमांसा २५ - स्त्रिययासम्परिष्वक्तः का समन्वय २६-- आक्षेप, और तत्समाधान २७-- चान्द्ररसमयप्रज्ञानमनका प्रेमभाव २६-- पशु - पक्षी - कृमिकीटादि की आराधना २६ -- श्रद्धा मस्वरूपपरिचय ३० - - वात्सल्यप्रेमस्वरूपपरिचय ३१ - स्नेहप्र मस्वरूपपरिचय ३२ -- कामप्रेमस्वरूपपरिचय ३३ -- रतिप्रेमस्वरूपपरिचय ३४ -- रतिप्रेम के दो क्षेत्र ३५ -- जड़ - चेतन ममीमांसा -- ३६-- रतिक्षेत्र का समतुलन 1302 4434 ४०८५ ४१० 35 ४११ ४१३ ४१४ ४१५ ४१६ ४१७ ४१८ ४२० ४२१ ४३३ ४२४ ४३५ ... ४२६ ४३१ ४३३ १ ९ ४३४ ४३६ I I ४३७ "
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३७ -- प्रवच्छेदकावच्छिन्नमीमांसा ३८ - आशौचातीत आत्मा ३६ -- आशौचानुगत अन्तरात्मा ४०- -- परिग्रहान्विता अन्तरात्मन्त्रयी ४१ -- आशौचस्वरूपमीमांसा ४२ -- पञ्चविधअशुचिभाव ४३ - - आयुर्वेद का त्रिधातुवाद ४४ - भारतीयत्रिधातुवाद ४५ - धातुत्रयी के समविषमभाव. ४८ - स्थूलशरीर के अशुचिभाव... ४६ - - द्रव्यदोष, एवं शरीरदोषमीमांसा ५० -- भावदोषमीमांसा, एवं चतुविधयोग ५१ -- एनोदोषमीमांसा "... ५२ -- स्पृश्यास्पृश्यविवेकमीमांसा ' ५३ - अघाशौचस्वरूपमीमांसा ( ५४ --- स्पर्शास्पर्शमीमांसा ५५ - कर्त्तव्यकर्त्तव्यमीमांसा ५६ - आशौचनिमित्तमीमांसा ५७ - अत्रिप्राणमूलामूर्त्तसृष्टि ५८ - अत्रि प्राणस्वरूपपरिचय ५६ - आत्रेयीयोषित् ६०---- आत्रेयरजोऽनुगत अधाशौच ६१ -- मलीमस स्त्रो - वैश्यशूद्रवर्गत्रयी ६२ -- शीतलानुगता मातृरोगमीमांसा ६३ - - पुराणरजोऽनुगत दोषाशौच.. ६४ - - शारीरमलानुगत दोषाशौच ६५ -- जन्माशौचमीमांसा ६६ -- शावाशौचमीमांसा ६७ - - क्रियाशौचमीमांसा ६८ -- दोषा शौचमीमांसा ६६ -- सम्बन्धसूत्रमीमांसा ७० --- योनिकृत सम्बन्धसूत्राणि ७१ -- विवाहसापिण्ड्यमीमांसा संक्षिप्त विषयसूची 4444 ३७ ४६ - विकित्साशास्त्रत्रयी के तीन चिकित्सा प्रकार ४७ -- श्रायुर्वेद - धर्म - दर्शन, तीनों शास्त्रों की अभिन्नता
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७२ -- दाय पापिण्ड्यमीमांसा ७३ -- शौच सापिण्ड्यमीमांसा ७२ -- अववयसापिण्ड्यस्वरूपपरिचय ७५ -- पुत्रनिवाप्यसा पिण्ड्यस्वरूपपरिचय ७६ -- पितृनिवाप्यसा पिण्ड्यस्वरूपपरिचय ७७ -- उत्तरसापिण्ड्यस्वरूपपरिचय ७८ -- पिण्डस्वरूपसिंहावलोकन ७६ --- उत्तरसा पिण्ड्यस्वरूपपरिचय : - पिण्डस्वरूपसिंहावलोकन ८०-८१ - वीज पिण्डकोशानुगत ऋणधन विभाग - प्रेतात्मा की परंमा सम्पन ३- सुतासुतपिण्डमीमांसा ८४ - - राशिपिण्डस्वरूपमीमांसा ८५ -- सप्शकोशचक्रस्वरूपमीमांसा ६- प्रथमकोशस्वरूपपरिचय -- द्वितीयकोशस्वरूपपरिचय --- तृतीयकोशस्वरूपपरिचय - चतुर्थकोशस्वरूपपरिचय ६० -- पश्चमकोशस्वरूपपरिचय ६१ - बष्टको स्वरूपपरिचयं १२- सप्तमकोशस्वरूपपरिचय ६३ -- पिण्डसन्तानक्रमवरूपमीमांसा ६४-- सन्तानराशि - शेषराशिस्वरूपमीमांसा ६५-- शौच संक्रमणद्वारमीमांसा .६६ -- यज्ञकृत सम्बन्ध सूत्राणि ६७ -- ससर्गकृत सम्बन्धसूत्राणि ६- सर्वान्त में ६६ -- प्रकरणोपसंहार संक्षिप्त विषयसूची- रेखाचित्रयुक्त परिलेखसूची X ----३८ ५०६ ५०५ 39 ५०६ ५१० ५११ 35 93 ५१२ ५.१३ ५१७ ५१८ ५२० ५२१ 19 " ५२२ ५२४ ५२६ ५२७ 13 ५.३२ समाप्ता चात्र ' आशौचवि रानोपनिषत् ( तृतीयपरिच्छेदात्मिका ) समाप्ता चेयं तृतीयखण्डस्य सापिण्ड्यविज्ञानोपनिषद्र पस्य तुष्टिमनुभूयन्तामनया सूच्या सूची - मात्रबोधव्यग्रास्तत्परा भाबुका:
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सापिण्ड्य विज्ञानोपनिषद--" प्रजातन्तु वितानविज्ञानोपनिषत् ” प्रथमा I दिने दिने ये प्रतिगृह्णतेचा मासान्तपूज्या भुवि येऽष्टकासु ॥ ये वत्सरान्तेऽभ्युदये च पूज्याः प्रयान्तु ते मे पितरोऽत्र तृप्तिम् ॥१ ॥
पूज्या द्विजानां कुमुदेन्द्रभासो ये क्षत्रियाणाञ्च नार्कवर्णाः ॥ तथा विशां ये कनकावदाता नीलीनिभाः शूद्रजनस्य ये च ॥ २ ॥
तेऽरिमन् समस्ता मम पुष्पगन्धधूपान्न तोयादि निवेदनेन ॥ तथाग्निहोमेन च यान्तु तृप्ति सदा पितृभ्यः प्रणतोऽस्मि तेभ्यः ॥ ३ ॥
- श्रीमार्कण्डेयपुराण ६६ अ ० ।
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विषयोपक्रम -अथ श्राद्धविज्ञानग्रन्थे सापिण्ड्य विज्ञानोपनिषत् तृतीया ( तृतीय खण्ड ) तत्र प्रथमा प्रजातन्तुवितान विज्ञानोपनिषत् कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्म्माः सनातनाः ॥ धर्मे नष्टे कुतं कृत्स्नमवमोऽभिभवत्युत ॥ १ धम्मभिभवात् कृष्ण! प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ॥ स्त्रीषु दुष्टषु वार्ष्णेय! जायते वर्णसंकरः ॥ २ ॥
संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ॥ पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥ ३ ॥
श्रीमद्भगवद्गीता ११४०,४१,४२, । श्राद्धकर्म के मूलप्रतिष्ठारूप अनेकात्मवाद का, एवं पितर प्राण का विशद विवेचन क्रमशः पूर्व. की आत्मविज्ञानोपनिषत्, एवं पितरविज्ञानोपनिषत् में किया जाचुका है । इन दोनों प्रकरणों के सम्यक् लोडन विलोडन से पाठकों को यह विदित हो गया होगा कि, हमारे शरीर में महानात्मा नाम का एक आत्मा अवश्य ही ऐसा है, जो कम्मात्मा के उत्कान्त हो जाने पर चन्द्रलोक में जाकर प्रतिष्ठित होता है । एवं साथ ही में महानात्मा में प्रतिष्ठित सौम्यप्राण की ही ' पितर ' संज्ञा है । लोकान्तर में सवरण करने वाले इस पितर की लोकभेद से क्रमशः अश्रु मुख- पार्वण - नान्दीमुख ये संज्ञाएँ हो जाती हैं । लोकान्तर में जाते हुए इस प्रेतात्मा को जिस पिण्डदानादि कर्म से तृप्त किया जाता है, बही कर्म्म " श्राद्ध " नाम से प्रसिद्ध है । इस सम्बन्ध में प्रश्न यह उपस्थित होता है कि, लोकान्तर ( चन्द्रलोक )
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श्राद्धविज्ञान गमन करने वाले प्रेतात्मा ( महानात्मा ) के साथ तद्वंशधरों का क्या कोई वास्तविक सम्बन्ध रह जाता है? | वह ऐसा कौनसा मार्ग है, जिसके द्वारा पुत्रादि से दत्त पिण्ड परलोकगत प्रेतात्मा की तृप्ति, का कारण बनता है? | चर्म्मचक्षु इन सब प्रश्नों के समाधान में कुटित है । इसके लिए तो हमें विज्ञानचक्षु का ही आश्रय लेना पड़ेगा | सापिण्ड्यविज्ञानोपनिषत् में इन्हीं प्रश्नों के समाधान की चेष्टा की गई है । विहङ्गमदृष्ट्या प्रस्तुत तृतीय खण्ड में प्रेतात्मा का तद्वंशधरों के साथ क्या सम्बन्ध है?, सात पीढ़ी पर्यन्त सापिरड्य सम्बन्ध क्यों माना गया है?, पितृऋण का क्या स्वरूप है?, ८४ संख्या में विभक्त शुक्रस्थित पितरप्राण का वितान वैसे होता है?, इत्यादि प्रश्नों पर विशेष रूप से प्रकाश डाला गया है । हमारा यह दृढ़ विश्वास है कि, वैदिक विज्ञान के विलुप्तप्राय होजाने से, साथ ही अङ्गभक्त भारतीय विद्वानों के द्वारा युक्तियुक्त समाधान प्राप्त न होने से जिन महानुभावों ने इस श्रौत -सिद्ध पिण्डदान लक्षण श्राद्धकर्म का परित्याग कर दिया है, वे इस प्रकरण से सत्यनिर्णय पर पहुँचते हुए अवश्य ही अपने विचारों में परिवर्तन कर सकेंगे, एवं देवकार्य से भी कहीं अधिक महत्त्व रखने वाले इस पितृकार्य में श्रद्धा से प्रवृत्त हो सकेंगे । इतिं विषयोपक्रमः महानात्मानुगत पितृतव --आत्मविज्ञानोपनिषदन्तर्गत महदात्मविज्ञानोपनिषत् का प्रतिपादन करते हुए यह सिद्ध किया गया है कि पुरुषात्मा - अव्यक्तात्मा - यज्ञात्मा - प्रज्ञानात्मा - विज्ञानात्मा - कम्मरमा - हंसात्मा, इन सब खण्डात्माओं में से श्राद्धकर्म का सम्बन्ध एकमात्र चान्द्र महानात्मा के साथ ही है । ( देखिए श्रा वि ० प्र ० सं ० २४ = पृष्ठ ) । महानात्मा का आरम्भक ( उपादान ) चन्द्रमा है । इधर अध्यात्म-संस्था में शुक्र नाम का प्रसिद्ध सातवाँ धातु चान्द्र है । इस सजातीयता के कारण ही चान्द्र महानात्मा चान्द्र शुक्र में प्रतिष्ठित रहता है । यह चान्द्र महत्सौम्यप्राण ही " पितर " नाम से सम्बोधित हुआ है । " विधूर्ध्वभागे पितरो वसन्ति " यह प्राप्त सिद्धान्त है । सौम्य पितर प्रेत- पार्वण - नान्दीमुख नामों से प्रसिद्ध हैं, जैसा कि पूर्व की पितर विज्ञानोपनिषत् में विस्तार से बतलाया जा चुका है । शुक्रगत महानात्मा पितर प्राणमूर्ति है । यह पितरप्राण पृथिवी - अन्तरिक्ष- द्यौ - भेद से तीन भागों में विभक्त है । पार्थिव पितर प्रधान हैं । " भ्रू स्थानः " ( या ० नि ० दे ० कां ० ५।१ । ) यह सर्वविदित सिद्धान्त है । आन्तरिक्ष्य पितर यमाख्य वायुप्रधान हैं । “ वायुर्वेन्द्रो वाऽन्तरिक्षस्थान ः " ( यास्कनिरुक्त ) यह प्रसिद्ध है । दिव्यपितर आदित्यप्रधान हैं । " सूर्यो द्य स्थान: " ( यास्कनिरुक्त ) यह भीप्रसिद्ध ही है । अग्नि - यम् आदित्य -, तीनों अनि ही हैं । इन तीनों के साथ
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प्रजातन्तुवितान हमने क्रमशः दिक्सोम, चान्द्रसोममयं गन्धर्वसोम, किंवा गन्धर्वसोममय चान्द्रसोम, ब्रह्मणस्पति नाम से प्रसिद्ध प्राणात्मक पवित्रसोम का सम्बन्ध बतलाया है । ( देखिए श्रा ० प्र ० खं ०२४८ पृ ० ) । अग्नि-सोम, यम- सोम, आदित्य - सोम, त्रैलोक्य के इन तीनों हीं विवत्तों में यद्यपि अग्नि - सोम दोनों की सत्ता है, तथापि स्वस्थान की प्रधानता से दिव्यलोकस्थ पवित्रसोम आदित्यानि का अधिष्ठाता जाता है, सोम की प्रधानता रह जाती है । अतएव अग्निसोम दोनों के रहने पर भी ये नान्दीमुख बन • नाम के दिव्य पितर " सौम्य " ही कहलाते हैं । इसी प्रकार वायुप्रधान अन्तरिक्ष मेंयम वायु की प्रधानता, एवं गन्धर्वसोम की गौरांता भी स्वतः सिद्ध है । अतएव इन पार्वण नाम के अन्तरिक्ष्य पितरों को " याम्य " कहना न्यायसङ्गत होता है । एवमेव पृथिवी में अग्नि की प्रधानता है ।फलतः विमुख पितरों को " आग्नेय " कहने में कोई आपत्ति नहीं की जा सकती । पूर्वोक्त महानात्मा में सौम्य याम्य- - आग्नेय, तीनों पितर प्रतिष्ठित रहते हैं । इन तीन पितरों के कारण ही महानात्मा मेंसच - रज - तम, ये तीन गुण, एवं श्रहङ्क ति - प्रकृति प्रकृति -, ये तीन भाव उत्पन्न होते हैं । दिव्यसोम शुद्ध सत्रमूर्ति है । तत्सम्बन्धी सत्त्वप्रधान नान्दीमुख पितरप्राण महान् सत्त्वगुण का विकास करते हैं । आन्तरिच्य सोम वायुमय होने से क्रियामूर्त्ति बनता हुआ रजोि में है । तत्सम्बन्धी रजः प्रधान पार्वण पितर महान में रजोगुण का उत्तेजक बनता है । पार्थिव सोम अग्निमय होने से अर्थमूर्त्तिं ( आवरणमूर्त्ति ) बनता हुआ तमोमूत्ति है । तत्सम्बन्धी तमःप्रधान अमुख पितर महान् में तमोगुण का सञ्चार करता है । पार्थिवाग्नि त्वष्टाप्राण के सम्बन्ध से अपेन्द्र सोमाहुति के द्वारा इन्द्रतत्त्व को खण्ड खण्ड परिणत कर आकाररूप का अधिष्ठाता बनता है - ( देखिए शत ० प्रा ० १२ / ७ / १।१४ सौत्रामणीयज्ञ ) । इस पार्थिवाग्नि के सम्बन्ध से ही महदवच्छिन्न शुक्रस्थित पार्थिव अर्थमूर्ति अग्निप्रधान पितरप्राण तत्तत् प्राणियों के आकारों का अधिष्ठाता बनता है । आन्तरिक्ष्य यमवायु चान्द्रसोम के सम्बन्ध से ( जोकि चान्द्रसोम इन्द्रियप्रवर्त्तक प्रज्ञामय प्राणेन्द्रमूर्ति हैं ) प्रकृतिभाव ( इन्द्रियस्वभाव - इन्द्रियसामर्थ्य ) का प्रेरक बनता है । इस अन्तरिक्ष्य रजोमूर्त्ति चान्द्रसोममय यम के सम्बन्ध से, दूसरे शब्दों में चन्द्रमा के सम्बन्ध से ही शुक्रस्थ महदवच्छिन्न अन्तरिक्ष्य क्रियामूर्त्ति वायुप्रधान पितरप्राण तत्तत् प्रकृतियों का अधिष्ठाता बनता है । दिव्यलोकस्य आदित्य विशुद्ध, अत एव वीध्र चिन्मय ( आत्ममय पवित्रसोम के सम्बन्ध से यह भाव का प्रवर्त्तक बनता है, जैसा कि " सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ) इत्यादि मन्त्रवर्णन से स्पष्ट है । यह अह भाव जब तक स्वस्वरूप से प्रबुद्ध रहता है, तभी " प्राणियों की जीवन सत्ता रहती है । घोरतम सुषुप्तिकाल में भी अह भाव विकसित रहता तक है । तत्तत् सदा जाग्रत महतस्वरूप के इसी अहंभाव के अनुग्रह से सुपुप्तिकाल के समाप्त होने पर हमारे मुख से -" सुखमहमस्वाप्सीः " यह अक्षर निकल पड़ते हैं ।
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श्राद्धविज्ञान इस प्रकार अग्नि - यम - आदित्य, इन तीन पितृकलाओं से क्रमशः महान् में आकृति - प्रकृति-अहङ्कति भावों का उदय होता है, एवं दिक्सोम - चान्द्रसोम - पवित्रसोम इन तीन पितृकलाओं से क्रमशः तम - रज - सत्त्व इन तीन गुणों का उदय होता है । महानात्मा ही अध्यात्मसंस्था का मूलाधार है, यह भावापन्न है । इसी आधार पर - - ' " पाटकौशिकमिदं सर्वम् ” यह सूक्ति प्रचलित है । ३ - पवित्र सोमः - दिव्याग्निरादित्यः-२– चान्द्रसोमः – आन्तरिक्ष्याग्निर्वायुः -- पार्वणा याम्याः पितरः १ – दिक्सोमः --- पार्थिवाग्निरग्निः-नान्दीमुखाः सौम्याः पितरः अश्रुमुखा आग्नेयाः पितरः ३- { १ - पवित्र सोमः - सत्त्वगुणप्रवर्त्तकः - नान्दीमुखाः २- दिव्याग्निः - अहङ्क, तिभावप्रवर्त्तकः १ - चान्द्रसोम: -- रजोगुण प्रवर्त्तकः - पार्वणाः २ - श्रन्तरिक्ष्याग्निः - प्रकृतिभावप्रवर्त्तकः १ - दिक्सोमः - तमोगुणप्रवर्त्तकः १ - अश्रुमुखाः २ - पार्थिवाग्निः -- आकृतिभावप्रवर्त्तकः ::( 1 महानात्मा - सौम्यः, शुक्रस्थः पितरप्राणाधिष्ठाता -१ – अहङ्क तिमहान् -- आत्मप्रामाधिष्ठाता - - दिव्यपितर प्राणमूर्त्तिः - - सत्त्वगुणोपेतः २ – प्रकृतिमहान् - -- प्राणग्रामाधिष्ठाता - आन्तरिच्यपितरमूत्तिः रजोगुणापेतः ३ – आकृतिमहान् -- भूतप्रामाधिष्ठाता - - पार्थिवपितरमूर्त्तिः- - तमोगुणोपेतः प्रजातन्तुप्रतिष्ठालक्षणमहानात्मा पाट कौशिक महानात्मा वास्तव में महान - आत्मा है । विज्ञान - प्रज्ञान - भूतात्मा आदि इतर खण्डात्माएँ, सम्पूर्ण खण्डात्माओं की आधारभूमि स्वयं चिदात्मा ( अव्ययप्रधान पोडशी पुरुष ) भी इस पारमेष्ठ्य, किंवा चान्द्र महान के गर्भ में प्रविष्ट है " देवी ह्यषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ” ( गी ० ७ | १४ । ) । सत्त्वविशाल ऊर्ध्वसर्ग, रजोविशाल तिर्यक्सर्ग, तमोविशाल मूलसर्ग, पदार्थमात्र की आकृतियाँ, प्रकृतियाँ, अहक तियाँ, सब की आधारभूमि यही महानात्मा है । अग्नी-षोमात्मिका याज्ञिकी सृष्टि, योषावृषात्मिका मैथुनी सृष्टि का मूलाधार भृगुमूर्ति यही महान् है । ४