Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 561–570

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 561–570

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सपिण्ड मैरुपरिलेख: -श्राशौचविज्ञानोपनियत ५ ड ४ ज ४ ८ ३ घ ३ झ २ ख २ च २८ क ग छ | | १ | १ | १ भावः पि ० १८ ७ र ६ ध ६ ल ५ प.व ४.५ ३ त श ४ व ३ थ २ भ | | २ १ द ष ३ स २ प १ १ ह ७ - गोत्रमेरू, तथा सपिण्ड्यमेरू की मूलप्रतिष्ठारूप इस योनिसम्बन्ध के मुख्य आरोपित, सामान्य, भेद से तीन विवर्त्त हो जाते हैं । जो व्यक्ति जिस किसी भी गोत्र में उत्पन्न होकर यावज्जीवन उसी गोत्र में प्रतिष्ठित रहते हैं, ऐसे सगोत्रियों का जो पारस्परिक योनिकृत सम्बन्ध है, वह मुख्य माना गया है । सहोदरभ्राताओं का, भगिनियों का साक्षात् रूपेण योनिसम्बन्ध है, एवं पुत्र - पौत्र - प्रपौत्रादि का परस्पर परम्परया योनिसम्बन्ध हैं । यह उभयविध सम्बन्ध ( तद्गोत्र में ही अवस्थित रहने पर मुख्य - योनिसम्बन्ध माना जायगा । दूसरा आरोपित योनिसम्बन्ध है । इसके सगोत्रीकरण, विगोत्रीकरण, विगोत्रसापिण्ड्य, भेद से अवान्तर तीन विवर्त्त हैं । वसिष्ठगोत्री किसी पुरुष के सन्तान नहीं है । वह किसी भारद्वाज गोत्री के पुत्र का दत्तकसंस्कार रूप से ग्रहण करता है । इस संस्कार द्वारा दत्तक पुत्र स्वगोत्र ( भार-( द्वाज ) से च्युत होता हुआ परगोत्रानुवर्त्ती ( वसिष्ठ गोत्रानुवर्त्ती ) बन जाता है । इस प्रकार परगोत्री का जो अपने गोत्र के साथ सम्बन्ध स्थापित करना है, वह ' सगोत्रीकरण ' लक्षण आरोपित योनिसम्बन्ध माना गया है । परगोत्रात्मक परकुल से श्रागत पत्नियों की पितृगोत्र से विच्युति, तथा श्वशुरगोत्र से सम्बन्ध हो जाता है । यह विवाहसंस्कार का माहात्म्य है । एवं इसे भी सगोत्रीकरण लक्षण आरोपित योनिसम्बन्ध का ही उदाहरण माना गया है । इसी सम्बन्धं का विपरीत दिशा से विचार कीजिए । अपने गोत्र में उत्पन्न पुत्र को अन्य विगोत्री का दत्तक बना डाला, अपने गोत्र में उत्पन्न कन्या का अन्य विगोत्री के पुत्र के साथ विवाह कर डाला । दोनों इस स्वस्वत्वनिवृत्ति, परस्वत्त्वस्थापनलक्षण दानसम्बन्ध से दानदाता के गोत्र से च्युत होते हुए ग्रहीता के गोत्र से युक्त हो गए । इस दाता, तथा ग्रहीता का जो परस्पर सम्बन्ध होगा, बही ४६६

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श्राद्धविज्ञान विगोत्रीकरणलक्षण आरोपित योनिसम्बन्ध कहलाएगा । दत्तक पुत्रों का, परीणीता कन्याओं का ग्रही ताओं के साथ सगोत्रीकरण सम्बन्ध है, एवं दाता के साथ विगोत्रीकरण सम्बन्ध है, यही तात्पर्य्य है । भिन्नगोत्रियों के साथ जो सापिण्ड्य सम्बन्ध है, वही तीसरा विगोत्रसापिष्ठ्य लक्षण आरोपित योनिसम्बन्ध है | अपने बन्धुबान्धव, माता के बन्धुबान्धव, पिता के बन्धुबान्धव, इत्यादि के साथ जो सापिण्ड्य ( योनि ) सम्बन्ध है, वह विगोत्र सम्बन्ध माना गया है । इस प्रकार दूसरे मध्यस्थ आरोपित योनिसम्बन्ध के अवान्तर तीन विवर्त्त हो जाते हैं । तीसरा योनिसम्बन्ध सामान्य कोटि में अन्तर्भूत है । भ्राता के पुत्रों के साथ, भ्राता की पत्नियों के साथ, जामाता, वशुर, जामातृ भ्राता श्वशुरभ्राता, आदि के साथ इसी तीसरे सामान्य योनिसम्बन्ध का समन्वय है । प्रसङ्गवश उपात्त इस योनिसम्बन्ध में से मुख्य योनिसम्बन्ध ही शौच मर्यादा में संग्राह्य है । सपिण्डतालक्षण सापिण्ड्य सम्बन्ध ही घाशौच - संक्रमण का प्रधान निमित्त है । योनिकृत सम्बन्धसूत्र के प्रसङ्ग में गोत्रमेरू, सापिण्ड्यमेरू, से सम्बन्ध रखने वाली सन्तानपरम्परा का दिग्दर्शन कराते हुए अन्त में यह सिद्ध किया गया कि, मुख्य आरोपित, सामान्य इन तीन योनिसम्बन्धों में से सापिण्ड्यभावानुगत मुख्य योनिसम्बन्ध ही आशौचसम्बन्ध प्रधानरूप से ग्राह्य है । क्योंकि अधाशौच संक्रमण में सपिण्डतालक्षण योनिसम्बन्ध ही ग्राह्य है, अतएव प्रसङ्गतः आवश्यक हो जाता है कि, संक्षेप से सापिण्ड्यभाव की भी मीमांसा कर दी जाय । यद्यपि पूर्व में ‘ प्रजातन्तुवितानविज्ञानोपनिषत् ' नामक अवान्तर प्रकरण में सापिण्ड्यभाव का वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाचुका है । तथापि अघाशौच - मर्यादा से सम्बन्ध रखने वाली सपिण्डता, साथ ही विवाह, तथा दायभाग से सम्बन्ध रखने वाला सापिण्ड्य उस प्रकरण से तार्थ है । यहाँ भी उसका एक विशेष दृष्टिकोण से समन्वय करना आवश्यक मान लिया गया है । शुक्रगत महानात्मा में प्रतिष्ठित चतुरशीतिकल पितृपिण्डों के वितान से सात पुरुष परम्परा में व्याप्त रहने वाला ' सापिण्ड्य ' तत्त्वतः एक ही प्रकार का है । विवाह, दाय, तथा शौच, इस - सापिण्ड्य के स्वरूपनिर्माता, किंवा निमित्त नहीं हैं । पितृसहांसि का वितान ही इसका प्रधान निमित्त है! एवं इस एक निमित्त से यद्यपि सापिण्ड्य एक ही प्रकार का है । तथापि विवाह, दाय, शौच, इन आगन्तुक भावों के सम्बन्ध से तत्त्वतः एकरूप रहने वाला भी सापिण्ड्य ' विवाहसापिण्ड्य, दायसापिण्ड्य, आशौचसापिण्ड्य ' भेद से तीन प्रकार का मान लिया जाता है । सपिण्डों में से जिन सपिण्डों का विवाह सम्बन्ध में निषेध है, तदनुगत सापिण्ड्य ही विवाह -सापिण्ड्य है । जिन सपिण्डों के लिए दायभाग नियत हुआ है, तदनुगत सापिण्ड्य ही दायसा पिण्ड्य ५००

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1 श्राशीवविज्ञानोपनिषत् है । एवं जिन सपिण्डों में परस्पर शौच सम्बन्ध होता है, तदनुगत सापिण्ड्य ही आशौचसापिण्ड्य है । यदि विवाहप्रतिषेध, दायभागित्त्व, तथा अघाशौचभागित्त्व, सब सपिण्डों में समान ही होता, तब तो सापिण्ड्य के इन तीन विभागों की कोई आवश्यकता न थी । परन्तु देखते हैं - तीनों में विशेषता है, निमित्तभेद है । इसी आधार पर एक भी सापिण्ड्य तीन भागों में विभक्त हो जाता कुछ है । तीनों में से क्रमप्राप्त सर्वप्रथम विवाहसापिण्ड्य की ओर ही विज्ञ पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है— ( क ) - विवाहसापिय सगोत्रसापिण्ड्य, विगोत्रसापिण्ड्य, साधारण सापिण्ड्य, भेद से यह सापिण्ड्य तीन श्रेणियों में विभक्त है । जिसे मूल मान कर इस विवाहसापिण्ड्य की मीमांसा की जायगी, वह परिभाषानुसार ' बीजी ' कहलाएगा । पुत्र सन्तान, कन्यासन्तान, भेद से इस बीजी पिता से दो सन्तान धाराएँ प्रवाहित होतीं हैं । इन दोनों में से पुत्रपक्ष में सात पुरुषों को लक्ष्य बना कर, तथा कन्यापक्ष में पाँच पुरुषों को लक्ष्य बना कर सापिण्ड्यसम्बन्ध प्रवाहित माना गया है । जिस पुत्र का विवाह सम्बन्ध अपेक्षित है, वह संज्ञातः ' वर ' कहलाया है । यही ' वर ' पुत्र प्रथम - कूटस्थ पुरुष है । इस कूटस्थ पुरुष से आरम्भ कर सातवीं संस्थापर्यन्त क्रमशः १, २, ४, ८, ८, १६, इतने पितृद्वन्द्व प्रतिष्ठित मानें गए हैं । इन पितृद्वन्द्वों तक विवाहसापिण्ड्य की व्याप्ति रहती है । अतएव इतने सपिण्ड विवाहसम्बन्ध में वर्ज्य मानें गए हैं । यदि इनके अवान्तरद्वन्द्वों का संकलन किया जाता है, तो ६३ पितृद्वन्द्व हो जाते हैं । एवमेव मातृपक्ष में पञ्चमस्थान पर्यन्त इस सापिण्ड्य की व्याप्ति रहती है, जिस में १५ अपत्यद्वन्द्व प्रतिष्ठित हैं । निम्न लिखित तालिकाओं, तथा परिलेखों से इस विलुप्तप्राय विवाहसापिण्ड्य का यथाकथञ्चित स्पष्टीकरण किया जासकता है । ५०१

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प्रतिस्थानं द्वन्द्वसंख्या वरसम्बन्धिनः सप्त स्थाना: | नांसमष्टि द्वन्द्वं जन्य: नांसमष्टिः संख्या द्वन्द्वसंख्या संख्या प्रथम थाने द्वितीयस्थाने द्वन्द्वमेकम् ? वरः केवलः छ वरस्य पितरौ १ ६३ ६३ तृतीयस्थाने द्वन्द्वमेकम् १ १ - पितामहौ २ ६३ १२६ चतुर्थस्थाने द्वे द्वन्द्वे १- प्रपितामहौ ३ ६३ १८६ २ . २- पितृपितामहौ ४ ६३ २५२ १- वृद्धप्रपितामह ५ ६३ ३१५ पञ्चमस्थाने चत्वारि द्वन्द्वानि २- पितामहमातामहौ ६ ६३ ३७८ ४ ३- पितृप्रमातामहौ ७ ६३ ४४१ ४- पितामही मातामहौ ६३ ५०४ १- प्रतिवृद्धप्रपितामहौ ह ६३ ३६७ २- प्रपितामह मातामहौ १० ६३ ६३० ३- पितामहप्रमातामहौ ११ ६३ ६६३ ४- प्रपितामही मातामहौ १२ ६३ ७५६ ५- पितृवृद्धप्रमातामहौ १३ ६३ ८१६ ६- पितृमातामहप्रमातामहौ १४ ६३ ८८२ ७- पितामहप्रमातामहौ १५ ६३ ६४५ - पितामहीमातृमातामहौ १६ ६३ १००८ १- परमातवृद्धप्रपितामहौ १७ ६३ २०७१ २- वृद्धप्रपितामहमातामहौ. १८ ६३ ११३४ ३ - प्रपितामहप्रमातामहौ १६ ६३ १४६७ ४ - वृद्धप्रपितामही मातामहौ २० II १२६० ५- प्रपितामहप्रपितामहौ २१ ६३ १३२३ द्वन्द्वानि षोडश सप्तमस्थाने १६ ६- प्रपितामहपितृमातामहौ II ६३ १३८६ ७- प्रपितामही प्रमातामहौ २३ ६३ १४४६ - प्रपितामही मातृमातामहौ २४ ६३ १५१० ह.६- पितामही वृद्धप्रपितामहौ २५ ६३ १५७५ १०- पितृप्रमातामहमातामहौ ६ ६३ १६३८ ११- पितृमातामहप्रमातामहौ २० ६३ १७०१ १२ - पितृमातामहमातृमातामहौ २८ ६३ १७६४ १३ - पितामही वृद्धप्रमातामहौ २६ ६३ १८२७ १. - पितामही मातामहमातामहौ ३० ६३ १८६० १५ - पितामहीमातामहीपितामह ३१ ६३ १६५३. १६- पितामहीनानामही मातामही ६३ २०१६ तान्येतानि पितृपक्ष्यारि-जनकद्वन्द्वानि द्वात्रिशन्मितानि

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प्रथम स्थाने द्वन्द्वमेकम् कूटस्थम् १ द्वितीयस्थाने द्वन्द्वमेकम् १. तृतीयस्थाने द्वन्द्वे द्वे २ चतुर्थस्थाने द्वन्द्वानि चत्वारि ४ पञ्चमस्थाने द्वन्द्वान्यष्टौ स्थाने द्वन्द्वानि षोडश १६ शौच विज्ञानोपनिषत मातापितरौ कूटस्थस्य पुत्रः, दुहिता च १ - पौत्रः पौत्री च २ - दौहित्रः दौहित्री च १ - प्रपौत्रः प्रपौत्री च २- पौत्रीपुत्रः पौत्री पुत्री च ३ - दौहित्रपुत्रः दौहित्रपुत्री ४- दौहित्रीपुत्रः दौहित्री पुत्री च १ - वृद्धप्रपौत्रः वृद्धप्रपौत्री च २- प्रपौत्रीपुत्रः प्रपौत्रीपुत्री च ३ - पौत्री पौत्रः पौत्री पौत्री च ४ - पौत्रीदौहित्रः पौत्रीदौहित्री च ५- दोहित्रपौत्रः दौ हत्रपौत्री च ६ - दौहित्र दौहित्रः दौहित्रदौहित्री च ७ दौहित्रपौत्रः दौहित्री पौत्री च --दौहित्रीदौहित्रः दौहित्रीदौहित्री च १- अतिवृद्धप्रपौत्रः अतिवृद्धप्रपौत्री च २- प्रपौत्र दौहित्रः प्रपौत्र दौहित्री च ३ - प्रपौत्री पौत्रः प्रपौत्री पौत्री च ४- प्रपौत्रीदौहित्रः प्रपौत्री दौहित्री च ५- पौत्रीप्रपौत्रः पौत्रीप्रपौत्री च ६ - पौत्रीपुत्र दौहित्रः पौत्री पुत्र दौहित्री च ७- पौत्री पुत्री पौत्रः पौत्रीपुत्रपौत्री च पौत्रीपुत्र दौहित्रः पौत्री पुत्री दौहित्री च Eater प्रपौत्रः दौहित्रप्रपौत्री च १० - दौहित्रपुत्रदौहित्रः दौहित्रपुत्रदौहित्री च ११- दौहित्रपुत्रपौत्रः दौहित्रपुत्री पौत्री च १२ - दौहित्रपुत्र दौहित्रः दौहित्रपुत्री दौहित्री च १३- दौहित्रपुत्रपौत्रः दौहित्रपुत्रपौत्री च १४- दौहित्री पुत्र दौहित्रः दौहित्रीपुत्रदौहित्री च १५ - दौहित्रीपुत्रपौत्रः दौहित्रीपुत्रपौत्रीच १६- दौहित्री पुत्री दौहित्रः दौहित्रीपुत्रो दौहित्री च ५०३ 9 २ ३ ४ ५ ६ ७ ६ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ १७ १८ १६ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २६ ३० ३१ जनकद्वन्द्वानां - जन्यद्वन्द्वानि - त्रिषष्टि ( ६३ ) मितानि-

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श्राद्धविज्ञान बरसम्बन्धिनः पञ्चमस्थानाः प्रतिस्थानं द्वन्द्वसंख्या वरः केवलः प्रथमस्थाने द्वितीयस्थाने वरस्य माता मातामहौ तृतीयस्थाने द्वन्द्वमेकम् १ प्रमातामहौ चतुर्थस्थाने द्वे द्वन्द्वे २ वृद्धप्रमातामहौ मातामहमातामहौ पञ्चमस्थाने चत्वारि द्वन्द्वानि. प्रमातामह ४ ५०४ संख्या १ २ ३ 20 ४ ५ ६ ७ प्रतिजनक - | जन्यद्वन्द्वं-द्वन्द्वंजन्य संख्यानां द्वन्द्वानि समष्टिसंख्या * १५ १५ ३० १५ ४५ १५ ६० १५ ७५ १५ 1 ६० १५ १०५ १५ उक्त जन्यद्वन्द्व में सातवाँ स्थान अभी शेष है । षष्ठस्थान के १६ द्वन्द्वों के ३२ व्यक्ति हो जाते हैं । प्रत्येक व्यक्ति पुत्र - कन्या रूप से एक एक स्वतन्त्र द्वन्द्व का जनक है । इस प्रकार सातवें स्थान में ६ ठे स्थान के १६ द्वन्द्वों के ३२ व्यक्तियों से ३२ पुत्र - कन्याद्वन्द्व हो जाते हैं । यदि इन सातों स्थानों के द्वन्द्वों का संकलन किया जाता है, तो १, २, ४, ८, १६, ३२, इनके ६३ द्वन्द्व हो जाते हैं । इनके जन्यद्वन्द्वों की संख्या भी पूर्वप्रदाशित जनकद्वन्द्वानुसार २०१६ पर विश्राम करती है | विवाहंसापिण्ड्य के इस सुसूक्ष्म विशकलन से हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि, पितृपक्ष की २०१६ कन्याएँ विवाहसम्बन्ध में वर्ज्य हैं । इन से विवाहसापिण्ड्य के नाते विवाह - नहीं किया जासकता । अब क्रमप्राप्त पञ्चस्थानात्मक मातृपक्ष की मीमांसा कीजिए । निम्न लिखित रूप से मातृपक्षानुगत पञ्चस्थानों के सात विवर्त्त हो जाते हैं-

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शौचविज्ञानोपनिषत प्रथमे स्थाने किञ्चिदेकं मूलद्वद्व मातापितरौ कूटस्थम् द्वितीयस्थाने कूटस्थपुत्रो दुहिता च तृतीयस्थाने पौत्रः पौत्री च दौहित्र दौहित्रीच चतुर्थस्थाने प्रपौत्रः प्रपौत्री च पौत्रीपुत्रः पौत्री पुत्री च दौहित्रपुत्रः दौहित्रपुत्री च दौहित्रीपुत्रः दौहित्रीपुत्री च पञ्चमस्थाने वृद्धप्रपौत्रः वृद्धप्रपौत्री च प्रपौत्रीपुत्रः प्रपौत्रीपुत्री च पौत्रपौत्रः पौत्रीपुत्री च: पौत्रीदौहित्रः पौत्रीदौहित्री च airavi ananta च दौहित्रदौहित्रः दौहित्रदौहित्री च दौहित्रपौत्रः दौहित्रपौत्री च दौहित्र दौहित्रः दौहित्रीदौहित्री च पितृकुलानुगता षोडशाधिकद्विसाहस्री ( २०१६ ), एवं मातृकुलानुगता पचोत्तरशत ( १०५ ), सम्भूय - एकविंशत्यधिकैकविंशतिशतसंख्या ( २१२१ ) का अनुपात हो जाता है । यही विवाह -सापिण्ड्य का दाक्षिणात्यसम्मत सुसूक्ष्म विस्तार हैं । गौडसम्प्रदायानुगत विशुद्ध विवाहसापिण्ड्य इस ' से भिन्न है, जिसे विस्तारभय से छोड़ा जाता है । इस विवाहसापिण्ड्य से हमें प्रकृत में यह बताना है कि, प्राणविद्या के आचार्य परमर्षियोंनें वंशविशुद्धि के लिए जो सुसूक्ष्म अन्वेषण किया है, भले ही वर्त्तमान जगत् की भौतिक दृष्टि में उस का कोई महत्व न हो, ५८५

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श्राद्धविज्ञान भले ही वर्त्तमानयुग के बुद्धिमानों की दृष्टि में अन्तर्जातीय विवाह, सापिण्डयविवाहादि अनाचार, किंवा दुराचार प्रत्यक्ष में कोई हानि उत्पन्न न करता हो, परन्तु विवाहसापिण्ड्य की मर्य्यादा का अतिक्रमण करने वाली हमारी आज की उच्छृङ्खलता वर्णसंकरता की जननी बनती हुई हमारे आध्यात्मिक क्षेत्र की अवनति का ही मूलकारण प्रमाणित हो रही है । ( ख ) - दायसा पिण्ड्यम् -सांत पुरुषों से सम्बन्ध रखने वाले दायसापिण्ड्य के सम्बन्ध में विशेष वक्तव्य नहीं है । स्व, पिता, पितामह, प्रपितामह, ये चार पुरुष एवं इन चारों के प्रत्येक के पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, इस प्रकार सम्भूयह १६ पुरुष दायसापिण्ड्य में गृहीत हैं । ग्व, स्वपुत्र, स्वपौत्र, स्वप्रपौत्र, इन चारों की समष्टि स्वर्ग है । पिता, तत्पुत्र, तत्पौत्र, तत्प्रपौत्र इन चारों की समष्टि पितृवर्ग है । पितामह, है । एवं प्रपितामह, तत्पुत्र, तत्पौत्र, तत्पुत्र, तत्पौत्र, तत्प्रपौत्र, इन चारों की समष्टि पितामहवर्ग तत्प्रपौत्र, इन चारों की समष्टि प्रपितामहवर्ग है । इस वर्गभेद से षोडशपुरुषानुगत चतुः - पौरुषमर्यादा पर दासापिण्ड्य विश्रान्त है । वंशक्रम मर्यादा की अपेक्षा से प्रपितामह से प्रथमपुरुषानुगम है । पितामह तथा प्रपितामह पुत्रों से द्वितीयपुरुषानुगम है । पिता, पितामहपुत्र, तथा प्रपितामहपौत्रों से तृतीयपुरुषानुगम है । स्व, पितृपुत्र, पितामहपौत्र, प्रपितामहपौत्र, से चतुर्थपुरुषानुगम है । स्वपुत्र, पितामहप्रपौत्र से पञ्चमपुरुषानुगम है । स्वपौत्र, पितृपौत्रों से षष्ठपुरुषानुगम हैं । एवं स्वप्रपौत्रों से सप्तमपुरुषानुगम है । इस प्रकार पिता, पितामह, प्रपितामह तीन पर पुरुष, पुत्र - पौत्र - प्रपौत्र ये तीन अपरपुरुष एवं इन पर अपरपुरुषों के मध्य में प्रतिष्ठित कूटस्थ स्वपुरुष, इस दृष्टि से दायसा पिण्ड्य साप्तपौरुष बन जाता है । स्व, पितृ -पितामह प्रपितामह, इन उक्त चार वर्गों में से दायभाग सम्बन्ध में उत्तर उत्तर की अपेक्षा पूर्व पूर्व का प्राधान्य है । प्रथमाधिकार स्ववर्गचतुष्टयी का है । स्ववर्गाभाव में पितृवर्ग, तदभाव में पितामहवर्ग, एवं तदभाव में प्रपितामहवर्ग का प्राधान्य है । कारण इस का यही है कि, प्रपितामहवर्गापेक्षया पितामहवर्ग, इस की अपेक्षा पितृवर्ग, एवं सर्वापेक्षया स्ववर्ग सपिण्ड्य से अधिकाधिक सन्निकट है । इन चारों वर्गों में भी प्रत्येक के चारों पर्वों में उत्तरोत्तर-पेक्षा पूर्व - पूर्व पर्व का प्राथम्य है । प्रथम स्व, अनन्तर तत्पुत्र, वानन्तर तत्पौत्र, सर्वान्त में तत्प्रपौत्र का अधिकार हैं । एवमेव पितामह वर्ग में प्रथम पितामह, अनन्तर तत्पुत्र, अनन्तर तत्पौत्र, सर्वान्त में तत्प्रपौत्र का अधिकार है । एवमेव प्रपितामहवर्ग में प्रथम प्रपितामह, अनन्तर तत्पुत्र, अनन्तर तत्पौत्र, सर्वान्त में तत्प्रपौत्र का अधिकार है । वर्ग, तथा पर्वसान्निध्यमूला इस दायविभाग- व्यवस्था का समर्थन करते हुए धर्माचायोंनें कहा है-" यस्त्वासन्नतरस्तेषां सोऽनपत्यधनं हरेत् " " ५०६

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-: दायसापिण्ड्यपरिलेख ४०७ : प्रपितामहवर्ग: -पितामहवर्ग प्रपितामहः प्रपितामहकक्षा-) -( ३ -१ पितामहकक्षा-) -( २ २-पितृकक्षा-) -( १ ३– : पितृवर्ग पुत्रः । पितामहः ४-----कूटस्थकता ) -( * -४ -४-13 : स्ववर्ग पुत्रः पिता पौत्रः ) -पुत्रकक्षा-( १ ५-पौत्रः पुत्रः स्व प्रपौत्रः पुत्रः प्रपौत्रः पौत्रःप्रपौत्रः पौत्रःप्रपौत्रः ( पितामहवर्ग:) | ( पितृवर्ग:) ( स्ववर्ग:) ( प्रपितामह वर्ग:) पौत्रकक्षा- ) -( २ ६-प्रपौत्रकक्षा-) -( ३ -७ : प्रथमपुरुष ) -( १ पुरुषः ) - द्वितीयः - ( २ पुरुषः - तृतीयः - ( ३ : : पुरुष - चतुर्थ ४ )- ( पुरुषः पञ्चमः ) -- ( ५ . पुरुष षष्ठः ) -६- ( पुरुषः सप्तमः ) -- ( ७ शौ वविज्ञानोपनिषत्

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( ग ) - शौचसा पिण्ड्यम् — श्राद्धविज्ञान प्रसङ्गोपांत्त विवाह, दायसापिण्डयों का दिग्दर्शन कराने के अनन्तर तीसरे उस आशौच सापिण्ड्य की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है, जो हमारे इस आशौच प्रकरण की मूलप्रतिष्ठा बन रहा है । वैज्ञानिकों नें इस सापिण्डय के " अवयवसापिण्ड्य, पुत्रनिवाप्यसापिण्ड्य, पितृनिवाप्यसापिण्ड्य, उत्तरसापिण्ड्य, भेद से चार विवर्त्तमानें हैं । सवप्रथम क्रमप्राप्त अव्यवसापिण्डयलक्षण आशौचसापिण्डय का ही दिगदर्शन कराया जाता है । ( १ ) - महानात्मगत अष्टा - विंशति ( २ ) - कल पितृप्राणमूत्ति आत्मधन ही सन्तति की मूलप्रतिष्ठा माना गया है । इस आत्मधन के ॠण - धन से ही सात पुरुषों का वितान हुआ है । एकशरीरावयवभूत सन्ततिप्रवर्त्तक, किंवा सन्ततिजनक इन २८ आत्मघनकलाओं का वितान क्रमशः पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, वृद्धप्रपौत्र, अतिवृद्धप्रपौत्र, वृद्धातिवृद्धप्रपौत्र ( परमातिवृद्धप्रपौत्र ) इन ६ सन्तति परम्पराओं में होता है । ६ अपत्य, सातवाँ स्वयं जनक, इस प्रकार सात पुरुषपर्यन्त एकशरीरावय-भूत २८ मात्राओं का अनुवर्त्तन होता है । मात्राभाव से आगे इस अवयव वितान का अभाव है । अतएव यह अवयवसापिण्डय सप्तपुरुषपर्यन्त ( कूटस्थबीजी से आरम्भ कर वृद्धातिवृद्धप्रपौत्र पर्य्यन्त ) ही माना गया है । ' सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्त्तते ' से यही अवयवसापिण्डथ भित है । इस अवयव सापिण्ड से सम्बन्ध रखने वाला, बीजी से ६ ठे अपत्यपर्यन्त व्याप्त रहने वाला यही आशौच ' अवयव सापिण्ड्या शौच ' कहलाया है । अष्टाविंशतिकल सहःपिण्ड ही आत्मधन है, जो कि कूटस्थ वीजी ( पिता ) के महानात्मा में प्रतिष्ठित है । इन २ = शरीरावयों का उक्त सात पुरुषों में क्रमशः ७ कला स्वयं बीजी में, ६ कला पुत्र में, ५ कला पौत्र में, ४ कला प्रपौत्र में, ३ कला वृद्धप्रपौत्र में, २ कला प्रतिवृद्धप्रपौत्र में, एवं १ कला वृद्धातिवृद्धप्रपौत्र में भुक्त हैं । इस प्रकार सात स्थानों में विभक्त ये निवाप्यपिण्ड ह्रीं सातों के पारस्परिक सम्बन्ध की प्रतिष्ठा हैं । कूटस्थ बीजी के २८ कल मूलपिण्ड को प्रतियोगी बनाने वाला, एवं पुत्रादि ६ अपत्यों को अनुयोगी बनाने वाला सापिण्डय ही अवयव सापिण्डय है, तन्मूलक आशौच ही अवयवसापिण्ड्या -शौच है, जैसाकि परिलेख से स्पष्ट है-५०८