Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 551–560

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 551–560

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} _ आशौचविज्ञानोपनिषत् की गर्भसंज्ञा हो गई । पूर्ण परिपुष्टि से पहिले हो किसी दोषविशेष से शनैः शनैः गर्भवित्र सन होने ' लगा, यही स्थिति ' गर्भस्राव ' है । एक ही समय में गर्भविच्युति हो गई, यही स्थिति ' गर्भपात ' है । गर्भावस्थापन्न अपत्य पृथिवी- जल - तेज- वायु- श्राकाश, इन पाँच भूतविकारात्मक भूतधातुओं से, तथा चेतना नामक ६ ठे धातु से युक्त होता हुआ षड्धातुलक्षण बना रहता है । गर्भस्राव, किंवा गर्भपात से इसकी चेतना उत्क्रान्त हो जाती है, चेतनोत्क्रान्ति से पाञ्चभौतिक शरीर अशुचिभावापन्न हो जाता है । इस शुचि से स्त्री एवं तत्सम्बन्धी उसी सम्बन्धसूत्र से अशुचिभावापन्न हो जाते हैं । यही गौणभावापन्न मध्यम जन्माशौच है । न तो डिम्भादि का स्राव - पात हुआ, नाहीं गर्भ का स्त्राव पात हुआ । गर्भ क्रमशः पुष्ट होता गया । दशमास में पूर्णावयव बन कर ' एवयामरुत् ' नामक वायुविशेष ( गर्भवायु ) के प्रत्याघात से वह नियत समय पर भूमिष्ठ हुआ । इसी स्थिति के लिए ' गर्भप्रसव ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । जब तक गर्भ गर्भाशय में प्रतिष्ठित रहता है, तब तक नाड़ी ( नाल ) द्वारा गर्भिणी से भुक्त अन्न रस से उसकी पुष्ट होती रहती है । प्रसवानन्तर नालच्छेद कर दिया जाता है । इस नालच्छेद से दोनों का सम्बन्ध विच्छेद हो है । यह प्राणीका मुख्य जन्मकाल है । दूसरे शब्दों में नालच्छेद से जातक ( उत्पन्न शिशुं ) का सूती ( माता ) के शरीराभि से पार्थक्य हो जाता है । इस अन्योन्यसम्बन्ध परित्याग से इस अशुचि का सूतिका में, जातक में, एवं सम्बन्धसूत्र द्वारा समसम्बन्धियों में संक्रमण हो जाता है । यही मुख्य-भाषापन तीसरा मुख्य जन्माशौच है, जिसकी मूलप्रतिष्ठा स्त्री का मलिन - रज ही बनता है । ( २ ) यही स्थिति मरणनिमित्तक दूसरे शाावशौच की समझिए । पाञ्चभौतिक शरीर से प्राप्त " युगान्तर पाञ्चभौतिक शरीर को जिस समय महानयुक्त कर्मात्मा छोड़ देता है, उस समय शारीर वैश्वानर अग्नि से इस उत्क्रान्त आत्मा का आत्मा से शारीर अग्नि का विच्छेद हो जाता है । जीवन -दश में इसमें यज्ञ होता रहता है, इसी अन्नयज्ञ से उभयाग्निसम्बन्धलक्षण ( आत्मशरीरसम्बन्ध-लक्षण ) शुचिभाव सुरक्षित रहता है । ब्रह्मणस्पति जैसे पवित्र सोम के सम्बन्ध से यह तप्ततनू ( श्रात्मयुक्त शरीर ) पवित्र रहता है, परमपूता ज्ञानधारा प्रवाहित रहती है । परन्तु आत्मोत्क्रान्ति के } सहकाल में ही शरीर आत्मपावन धम्मों से वश्चित होता हुआ शक्तिशून्यं शवावस्था में परिणत हो जाता है | यह शवशरीर आत्यन्तिकरूप से वारुण बनता हुआ पूर्तिभावापन्न है, अशुचिभावापन्न है । इसके सम्पर्क से निष्क्रान्त भूतात्मा भी अवश्यमेव अशुचिभावापन्न हो जाता है । उत्क्रान्त प्र ेतात्मा के महाभाग ' से सम्बद्ध यच्चयावत् सपिण्ड वंशजों में की उसी श्रद्धासूत्र द्वारा यह अशुचिभाव संक्रान्त हो जाता है । * - " पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः । तप्ततनूनं तदामों समश्नुते मृतास इद्वहन्तस्तत्समाशत ” ( ऋक् ॰ ( सं ०६।८३।१ । ) । ४८६

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श्राद्धविज्ञान शवगत अशुचि ही इस मरणशौच का निमित्त है । अतएव ' शावाशौच ' इसे कहना अन्वर्थ बनता है 1 शरीर से निकलते हुए आत्मा को आत्मसत्तावञ्चित, अतएव सर्वता अशुचि शरीर के अशुचिसम्पर्क से आंशिकरूप से बचाने के लिए ही मुमूर्षु को परमशुचिभावापन्न गाय पानका, तुलसीदलभक्षण का आदेश हुआ है । ( ३ ) तीसरे क्रियानिमित्तक आशौच की मूलप्रतिष्ठा भी यही शवशरीर बनता है । शवशरीर के वहन, दाह, आदि से तद्गत अशुचि का संसर्गियों के साथ भी सम्बन्ध होना अनिवार्य है । इस उत्तरक्रियाशौच का सम्बन्ध प्रधानतः प्रज्ञाभाग के साथ ही माना गया है । अतएव शवयात्रा में सहयोग देने वाले जो जातिबन्धु शव दहनादि कम्मों में सहयोग देते हैं, केवल वे व्यक्तिरूप से ही इस ' क्रियाशौच ' से युक्त होते हैं । यही तीसरे क्रियाशौच की संक्षिप्त मीमांसा है । ( 3 ) अब क्रमप्राप्त ' अधदोष ' से सम्बन्ध रखने वाले चौथे दोषाशौच की मीमांसा कीजिए । पूर्व परिच्छेदारम्भ में स्त्रीरज के सम्बन्ध में जिन दोषाशौचों का दिग्दर्शन कराया गया है, उनका नोदोष से सम्बन्ध है । प्रकृत अदोषानुगत अघाशौच से उनका कोई सम्बन्ध नहीं है । केवल अत्रि - भाव- साम्य से प्रसङ्गतः: उनकी मीमांसा कर दी गई है । विषयग्रन्थिविमोकदृष्टि से इस दोषा-शौच के ' एन: - घम् ' इन दोनों निमित्तों को लक्ष्य में रखते हुए ही दोषाशौच का समन्वय करना चाहिए । दोषों का स्वरूप बतलाते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि, श्रवदोष का महानात्मा से सम्बन्ध है, एवं एनोदोष का प्राज्ञ कम्र्मात्मा से सम्बन्ध है । रजःस्वला स्त्री का मलिन रज, शारीर-मलिन रज, असच्छूद्रशरीरों में प्रतिष्ठित मलीमस असुरप्राण एवमेव अन्यान्य नैमित्तिक, तथा प्राकृतिक अशुचिभावापन्न जड़ - चेतनपदार्थ ( भूमिष्ठ - केशनख - अस्थि - चम्र्मादि जड़पदार्थ, श्वान, काक, आदि तनपदार्थ ), इन सब में प्रतिष्ठित अशुचिभाव ' एनोदोष ' हैं । इस एनोदोष से ये एनस्वी बने रहते हैं । इनके साथ संसर्ग रखने वाले द्विजातिवर्ग का प्राज्ञ भाग भी एन दोष से युक्त हो जाता है, फलतः ये भी एनस्वी बन जाते हैं । इस एनोलक्षण अशुचि की निवृत्ति धर्मशास्त्र-विहित तत्तद्विशेष प्रायश्चित्तादि से होती है । एवं एनोलक्षण, एनवी भावप्रवर्त्तक - प्राज्ञात्मानुगता ऐसा ' दोषाशौच ' प्रकृत अघाशौच प्रकरण से कोई सम्बन्ध नहीं रखता । इस दोष के निमित्त स्पर्श-समान - शय्यासनानुगमन, सहभोज आ द बनते हैं । ' दूसरा अघदोष ही अघाशौच प्रकरण में ग्राह्य है । इस अधाशौच के ' जनन - मरण - क्रिया-दोष ' ये चार निमित्त बतलाए गए हैं । जननाशौच की मूलप्रतिष्ठा मलिन रज है.. मरणाशौच की मूलप्रतिष्ठा शवशरीर है, क्रियाशौच की मूलप्रतिष्ठा भी शवशरीर ही है । एवं दोषाशौच की मूल प्रतिष्ठा स्पर्श - समानशय्यासनानुगमन, सहभोजादि संसर्ग हैं । श्रद्धासूत्र के द्वारा मलिन रज को मूलप्रतिष्ठा बनाने वाले जननाशौच ( सूतकाशौच ) का, तथा इसी श्रद्धासूत्र - द्वारा शवशरीस्थित अशुचिभाव को ४६०

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आशौचविज्ञानोपनिषत् अपनी मूल प्रतिष्ठा बनाने वाले मरणाशौच ( शावाशौच ) का, दोनों का प्रधानतः महानात्मा से सम्बन्ध है । इसी महपिण्ड के कारण श्रद्धासूत्र - द्वारा ये दोनों अधाशौच जातक, मृतक के सपिण्डवंशजों संक्रान्त हो जाता है । तीसरे क्रियाशौच के दो विवर्त्त हैं । जो सपिण्डबन्धु शववहन - दहनादि में सहयोग देते हुए क्रियाशौच से युक्त होते हैं, उनमें तो यह क्रियाशौच उसी समश्रद्धासूत्र - द्वार । महानात्मा में ही प्रतिष्ठित रहता है । एवं ऐसे श्रद्धासूत्रानुगत ( सपिण्डों के ) क्रियाशौच का मरणा-शौच में हीं अन्तर्भाव है । इनके अतिरिक्त जो समीपवर्ती जातिबन्धु शववहन - दहनादि में प्रवृत्त होते हैं, उनमें क्रियाशौच का सम्बन्ध होता अवश्य है । परन्तु यह सम्बन्ध महानात्मा के साथ न होकर प्रज्ञात्मा के साथ ही होता है । एनोदोषवत् यह कियाशौचदोष प्रज्ञानुगत हो बनता है । फलतः महानात्मा, एवं तदनुगत श्रद्धासूत्र के अभाव से प्राज्ञानुगत इस क्रियाशौच का केवल व्यक्तितन्त्र पर ही अवसान हो जाता है । जननाशौचयुक्त, मरणाशौचयुक्त, तथा क्रियाशौचयुक्त व्यक्तियों की शरीरसंस्था भी अशुचिभावा-क्रान्त होता है । अंतएव जो इन से संसर्ग करता है, उनका सत्त्वभाग भी इस स्पर्श के द्वारा इन्हें शौच में परिणत कर देता है । स्पर्श के अतिरिक्त अधाशौच भावापन्न व्यक्तियों के साथ भोजनादि लक्षण इतर संसर्ग से भी संसर्गी अशुचिभावापन्न हो जाते हैं । यही चौथा अवलक्षण ' दोषाशौच ' है । शववाहन - दहन लक्षण क्रियाकलाप में सहयोग न देने वाले, किन्तु शवयात्रा में सहयोग देने वाले भी इसी चतुर्थ दोषाशौच से युक्त होते हैं । यह आशौच स्नान - देवदर्शनादि से विमुक्त हो जाता है । इसार घार निमित्तों के भेद से यह अधाशौच चार संस्थाओं में विभक्त हो जाता है । १ - स्त्रीरज: सम्बन्धेन जन्माशौचप्रवृत्तिर्महदात्मनि- -सपिण्डेषु - जननाशौचं - वंशानुगतम् २ - शवशरीराशुचिसम्बन्धेन मरणाशौचप्रवृत्तिर्महदात्मनि - सपिण्डेषु - मरणाशौचं - वंशानुगतम । ३ - वहनदहनादिकर्मभिरशुचि सम्बन्धः प्राज्ञे आत्मनि -- समसम्बन्धिषु - क्रियाशौचं वैय्यक्तिकम् । ४ शवयात्रादिसंसगैरशुचिसम्बन्धः - प्राज्ञे - श्रात्मनि- -- ज्ञातिबन्धुषु दोषाशौचं वैय्यक्तिकम् । मीमांसा प्रकृत परिच्छेद में विशेषरूप से यह विचार करना है कि, जनन, मरण, क्रिया, दोष, इन चार • निमित्तों से उत्पन्न होने वाले शौच का उद्भव होता है । इन चारों निमित्तों से उत्पन्न किसी भी व्यक्तिविशेष में, जो कि चारों निमित्तों में से किसी एक निमित्त की सीमा में युक्त हो रहा है, शौच उत्पन्न होता है । उस विशेष व्यक्ति में वह अधाशौच कालयाध्य - मर्यादा से प्रतिष्ठित होता अन्य व्यक्तियों में भी संक्रान्त हो जाता है । उदाहरण के लिए पिता की मृत्यु पर पुत्र में शौच उत्पन्न हो जाता है । पुत्र ही इस आशौच का विशेष पात्र है । पुत्र के द्वारा इस आशौच का पौत्र - भ्राता-भ्रातृव्यादि अन्य सपिण्ड - व्यक्तियों में यह संक्रान्त हो जाता है । एवमेव पुत्रोत्पत्ति पर स्त्री के रज तथा पुरुष ( पति ) के शुक्र में आशौच उत्पन्न हो जाता है । तद्द्वारा अन्य सपिण्डों में संक्रान्त हो जाता ४६१

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श्राद्धविज्ञान है । इस सम्बन्ध में यह प्रश्न उपस्थित होता है कि, व्यक्तिविशेष में उत्पन्न यह अधाशौच मनुष्यता-नुगत व्यक्तिभाव से सम्बन्ध रखता है?, अथवा इसके संक्रमण के कोई नियत द्वार हैं । दूसरे शब्दों में इस शौच का संक्रमण, यथेच्छ - अमर्याद रूप से मनुष्यमात्र से होता है?, अथवा तो इसके संक्रमण के लिए विशेष मनुष्य ही ( विशेष निमित्तों से, विशेष सम्बन्ध से ) पात्र बनते हैं? ) । इन प्रश्नों की मीमांसा ही सम्बन्ध - सूत्रमीमांसा है । वैज्ञानिकों नें इस सम्बन्ध में अपना यह निर्णय प्रकट किया है कि, व्यक्तिविशेष से अन्य व्यक्तियों में संक्रान्त होने लाले इस आशौच के लिए व्यक्तिविशेष, तथा जिनमें शौच संक्रमण होने वाला है, उन व्यक्तियों में परस्पर कोई सम्बन्धसूत्र प्रतिष्ठित रहता है । जिन व्यक्तियों का इस विशेष व्यक्ति के साथ सम्बन्ध - सूत्र सुरक्षित है, वे सूत्रसम्बन्धी ही इस आशौच के पात्र बनते हैं । सूत्रात्मक वह सम्बन्ध “ योनि, विद्या, यज्ञ, संसर्ग, " इन चार द्वारों की अपेक्षा रखता है । योनिकृत सम्बन्ध, विद्याकृत सम्बन्ध, यज्ञकृत सम्बन्ध, संसर्गकृत सम्बन्ध, ये चार सम्बन्ध ही इस आशौच संक्रमण के प्रधान द्वार बनते हैं । जिन व्यक्तियों का परस्पर जन्मानुगत योनिगत ( सापिण्ड्य ) सम्बन्ध है, जिन व्यक्तियों का परस्पर अध्ययनाध्यापनलक्षण विद्यासम्बन्ध है, जिन व्यक्तियों का परस्पर यजनयाजनात्मक यज्ञसम्बन्ध है, एवं जिन व्यक्तियों का जननाशौचयुक्त व्यक्तियों के साथ, तथा मरणाशौचयुक्त व्यक्तियों के साथ संसर्ग सम्बन्ध है, वे ही इस सम्बन्धसूत्र के द्वारा शौच के पात्र बनते हैं । एवं इन योनि - विद्यादि चारों द्वारों से सम्बन्ध रखने वाले मर्यादित सम्बन्ध सूत्रों की मीमांसाही प्रकृत परिच्छेद का मुख्य प्रतिपाद्य विषय है । चारों में से क्रमप्राप्त योनिकृत प्रथम सम्बसूत्र की ओर ही पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । प्रस्तुत परिच्छेद में सम्बन्धसूत्र के स्पष्टीकरण के लिए जिन सापिण्ड्यभावों का, जिन वंशवितानों का दिग्दर्शन कराया जाने वाला है, अवश्य ही सुरुचिपूर्ण पाठकों के लिए यद्यपि वह एक नीरस विषय होगा । तथापि विषयसमन्वय की दृष्टि से प्रस्तुत होने वाले इस नीरस विषय के सम्बन्ध में यह कहना पड़ेगा कि, विवाहादि -सम्बन्धों के सम्बन्ध में इस सम्बन्धसूत्र के अपरिज्ञान से आज जो अनर्थ हो रहे हैं, जिस सूत्रविज्ञान की विलुप्ति से जिस प्रकार आर्षप्रजा विवाहादि सम्बन्धों को केवल सामाजिक अनुबन्ध मानने की भूल करती हुई, वर्णसंस्कार भावप्रवर्त्तक ' अन्तर्जातीय विवाह ' जैसी घातक, मूलोच्छेदक प्रथाओं का अनुगमन करती हुई अपना सर्वस्व नष्ट कर रही है, उन भ्रान्त पथिकों की भ्रान्ति के निरा-करण के लिए अवश्य ही प्रस्तुत विषय उपादेय होगा । एकमात्र इसी लक्ष्य से विशुद्ध श्रेयोभावात्मक ( हितकर ) प्रेयोभावविरहित ( रुचिविरहित ) इस नीरस भी विषय का दिग्दर्शन कराना आवश्यक समझा गया है । ( १ ) - योनिकृतसम्बन्धसूत्राणि-द्ध सम्बन्धी योनिमूलक सम्बन्ध सूत्र की मूल प्रतिष्ठा माना गया है । दूसरे शब्दों में गोत्रसम्बन्ध ही योनिसम्बन्ध है । किसी भी एक पुरुष को मूल मान कर उस से सन्ततिपरा ४६२

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शौचविज्ञानोपनिषत् की जो प्रवृत्ति होती है, वही गोत्रसम्बन्ध है । उस मूलपुरुषात्मक एक पुरुष के गोत्र में विभक्त समान शाखीय, तथा भिन्न शाखीय गोत्रसम्बन्धियों में जो पारस्परिक सम्बन्ध रहता है, वही-योनिकृत सम्बन्ध कहलाया है । जिस पुरुष को मूल मान कर जिस गोत्रपरम्परा की गणना की जाती है, उस गोत्रपरम्परा में वही मूलपुरुष ' कुटस्थ ' पुरुष कहलाया है । ' बीजी- ' गोत्री ' - ' मूलपुरुष ' ' कुटस्थ ' इत्यादि शब्द गोत्र परम्पराप्रवर्त्तक पुरुष के लिए ही प्रयुक्त हुए हैं । गोत्रानुगत इस योनिभाव की प्रतिष्ठा शुक्रस्थित महानात्मा माना गया है । महानात्मा में प्रतिष्ठित ' सहांसि ' नामक पितृभाग ही गोत्रानुगता सन्ततिपरम्परा के प्रवर्त्तक बनते हैं । ऋण धनात्मक अपत्य, सूनुभाव से सन्ततिपरम्परा में वितत पितृसूत्र ही गोत्रात्मक, एवं योनिकृत सम्बन्धसूत्र हैं: । इस सम्बन्धसूत्र की व्याप्ति कहाँ तक, किस सन्तति पर्यन्त है १, जहाँ तक सन्तति का वितान है, क्या वहाँ तक शौच सम्वन्ध संक्रान्त होता है?, इत्यादि प्रश्न उपस्थित होते हैं । इन सब प्रश्नों का निम्न लिखित प्रश्न रूप से उत्थान कर समन्वय किया जासकता है । “ महदात्मानुगत सापिण्ड्यभाव अनुशय रूप से किस सन्तति पर्यन्त व्याप्त रहता है "?, इस प्रश्न का व्यावहारिक उत्तर यद्यपि ' सप्त- सन्तति परम्परा ' को लक्ष्य बना कर दिया जाता है । अधिक से अधिक ७ - सपिण्ड पितर, ७ - सोदकपितर, ७ - सगोत्रपितर, इस प्रकार २१ वीं परम्परा को अन्तिम सीमा माना जासकता है, जैसा कि ' प्रजातन्तु वितान विज्ञानोपनिषत् ' के सपिएड़ - सोदक - सगोन नामक पितृसप्तकों के निर्वचन में स्पष्ट कर दिया गया है । तथापि ' बीजाङ्करन्याय ' से सम्बन्ध रखने वाले इस पितृप्राणपरम्परा के बीजविनान का जब विश्लेषण किया जाता है, तो शत- सहस्र - लक्ष, ततोऽप्यधिक इस परम्परा की व्याप्ति माननी पड़ती है । पितृप्राणपरम्परा के इसी अनन्त - वितान ' से ' कम्मश्वत्थ ' का स्वरूप निष्पन्न होता है, जिस का विशद वैज्ञानिक विवेचन ' आत्मगतिविज्ञानो-पनिषत् ' नामक स्वतन्त्र चतुर्थखण्ड में हुआ है । स्वल्पकाय वीजी मूलपुरुष के शुक्रगत सौम्य महानात्मा में प्रतिष्ठित चतुरशीतिकल ( ८४ ) पितृसहोमूर्त्ति बीज अनन्त संख्या में, अनन्त वंशपरम्परा में कैसे विभक्त हो जाता है?, स्वल्पमात्रा-वच्छिन्न बीज का विकास इस आनन्त्यभाव में कैसे परिणत हो जाता है?, इत्यादि समाधेय अतीन्द्रिय प्रश्नों का उस समय भलीभाँति समाधान होजाता है, जब कि हम एक सूक्ष्म वृक्षबीज की अनन्त भावापन्ना सन्ततिपरम्परा दृष्टि डालते हैं । अश्वत्थ ( पिप्पल ) वृक्ष का बीज स्वल्पकाय है । तत्रापि जिसे बीज - कहना चाहिए, वह तो एकान्ततः सुसूक्ष्म अतएव इन्द्रियातीत बनता हुआ भावापन्न ही है । दृष्ट बीज उस सूक्ष्म बीज का शरीर है, सुसूक्ष्म अष्ट बीज आत्मा है । आत्मबीज की उत्पादन शक्ति को आन्तरीक्ष्य - बीजशक्तिविघातक - याम्य वायु के आघात से यह दृष्ट बीज बचाता है । जब बीज को भूगर्म में न्युप्त कर दिया जाता है, साथ ही जलसेक आरम्भ होता है, तो कालान्तर में बाह्य रक्षक हट जाता है, अन्तःस्थ बीज अ रित हो जाता है । ४६३

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श्राद्धविज्ञान मृत्, आप:, सौर- चान्द्र - तेज, शिववायु, आदि कारणसामग्रियों के सहयोग से यही अङ्कर कालान्तर में शाखा, प्रशाखा, पर्ण, फल, आदिरूप से विस्तार भाव में परिणत होता हुआ ' अश्वत्थवृक्ष ' बन जाता है । पुरोऽवस्थित महाकायात्मक अश्वत्थवृक्ष उस सुसूक्ष्म अष्ट बीज का ही विस्तार है । एक बीज के महाविस्तारात्मक एक अश्वत्थवृक्ष में असंख्य फल ( गूलर ) हैं । प्रत्येक फल में असंख्य बीज हैं । प्रत्येक बीज स्वतन्त्र रूप से एक एक अश्वत्थ वृक्ष का जन्मदाता है । असंख्य फल, प्रत्येक फल में असंख्य बीज, प्रत्येक बीज का अत्थोत्पादकत्त्व इस सब आनन्त्यभावों की मूल प्रतिष्ठा कौन?, वही प्रारम्भिक - भूगर्भनिहित सुसूक्ष्म बीज । उसी मात्रा का विभाजन किस सुसूक्ष्म भाव से हुआ?, सुसूक्ष्म मूलबीज की मात्रा का विस्तार कैसा आश्चर्य्यप्रद है?, यही उस अणु, तथा महान के आश्चर्यमय दर्शन हैं । एक ओर आरम्भक उस सुसूक्ष्म अश्वत्थ बीज को रखिए, दूसरी ओर अनन्त विस्तार भापन्न अश्वत्थवृक्ष को रखिए, और फिर दोनों का समतुलन कीजिए । इस समतुलन से आप को इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि, अणु महान् का प्रतिरूप है, तथा महान् अणु का प्रतिरूप है! जिस सुसूक्ष्म बीज को हम अणु समझते हैं, वही अपनी महिमा से महान् बन रहा है । जिस महाविस्तार को हम मह न् कहते हैं, अन्तर्जगत् की दृष्टि से वही अणु है । अवारपारीणा दृष्टि से वही तत्त्व अणोरणीयान् भी है, महतो महीयान् भी है । ऋणु में पिण्डं भुक्त है, पिण्ड में अणु भक्त है । ' यदेवेह ' ही ‘ तदमुत्र ' का समर्थक है, ' यदमुत्र ' ही ' तदन्विह ' का उपोद्बलक है । ' अद: ' भी पूर्ण है, ' इदं ' भी पूर्ण है । ' पूर्णमदः ' ( बीज ) से विनिःसृत ' इदं ( विश्व ) ' भी पूर्ण ही है । यही आत्म-सन्तानवृक्ष वैज्ञानिकों की परिभाषा में ' ब्रह्माश्वत्थ वृक्ष ' कहलाया है । ' ब्रह्माश्वत्थवृक्ष हो पितृप्राणपरम्परात्मक कम्मश्वत्थवृक्ष की मूल प्रतिष्ठा है । दोनों समतुलित हैं । दोनों में अन्तर केवल यही है कि, ब्रह्मात्थ आत्मा धर्मप्राधान्य से जहाँ शाश्वत है, वहाँ कर्म्माश्वत्थ विश्व कर्म्मप्राधान्य से अशाश्वत है । कम्मश्वत्थ की मूल प्रतिष्ठा मूलबीजात्मक सौम्यतत्त्व-इसी आनन्त्य प्रवृत्ति से ' महानात्मा ' कहलाया है । जो तत्त्ववेत्ता ब्रह्माश्वत्थमूलभूत आत्मबीज से साक्षात्कार करता हुआ महानात्ममूलक इस कम्र्माश्वत्थबीज का स्वरूप यथावत् जान लेता है, वह विमुक्तात्मा ' महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति इस औषनिषद - सिद्धान्त के अनुसार घाशौच संक्रमगमर्यादा से सर्वथा बहिर्भूत हो जाता है । महानात्मानुगत उक्त आनन्त्यभावापेक्षया बीजीपुरुष को लक्ष्य बना कर यद्यपि अनन्त-सन्ततिपरम्परा पर्य्यन्त समानगोत्रव्यवहार किया जासकता है । तथापि प्रस्तुत घाशौच - मर्यादा का अनुधावन वहाँ तक नहीं होता । मूलपुरुष से आरम्भ कर पूर्व की २१ वीं पीढ़ी पर्यन्त ही अधा-४६४

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शौचविज्ञानोपनिषत शौच की व्याप्ति स्वीकार करनी पड़ती है । कारण यही है कि संक्रामक सौम्य श्रद्धासूत्र २१ पर्य्यन्त ही यथाकथंचित् सुरक्षित रहता है । इससे आगे सोमसम्बन्ध सर्वथा उत्क्रान्त हो जाता है, केवल असङ्ग प्राणसम्बन्ध शेष रह जाता है । ' यथाकथंचित ' शब्द का प्रयोग इसलिए करना पड़ रहा है कि, २१ पर्य्यन्त व्याप्त रहने वाले सौम्य श्रद्धासूत्र में भी उत्तरोत्तर हाम है । उत्तरोत्तर क्षीयमारणा सोममात्रा से सोममय श्रद्धासूत्र भी उत्तरोत्तर क्षीयमाण है । फलतः श्रद्धासूत्र के आधार पर संक्रमण करने वाला शौच भी उत्तरोत्तर क्षीयमारण है । इसी तारतम्य से २१ पर्य्यन्त व्याप्त रहने वाला अघाशौच-निमित्तक गोत्रभाव सात संस्थाओं में विभक्त हो जाता है । मुख्य, गौण. सर्वथागौण, आशौचाभास, रूप से इस शौच को पहिले चार भागों में - विभक्त कीजिए । १- वीजी मूलपुरुष, २- तत्त्पता, ३- पितामह, ४- प्रपितामह, ५ - वृद्धप्रपितामह, ६ - अतिवृद्धप्रपितामह, ७ - वृद्धातिवृद्धप्रपितामह, इन सात पुरुषों का एक स्वतन्त्र विभाग है । यही सप्त-पुरुषानुगत सापिण्ड्य है । यहाँ तक श्रद्धासूत्र सबल रहता है । अतएव तदनुगत ( सपिण्डपितरानुगत ) आशौच मुख्य आशौच माना गया है । वें परपुरुष से आरम्भ कर १४ वें परपुरुषपर्यन्त दूसरा सोदक पितृ-सप्तक है | यहाँ श्रद्धासूत्र निर्बल हो जाता है । अतएव सोदक पितरानुगत आशौच गौण माना गया है । वें परपुरुष से आरम्भ कर २१ वें परपुरुषपर्यन्त तीसरा सगोत्रपितृसप्तक है । यहाँ श्रद्धासूत्र क्षीण-१५ प्राय है । अतएव सगोत्रपितर नुगत शौच सर्वथा गौण माना गया है । २२ वें से २४ पर्य्यन्त, इससे आगे यथेच्छ ( नामस्मरण पर्यन्त ) ' ज्ञाति ' लक्षणा पितृपरम्परा है । यहाँ श्रद्धासूत्र की प्रतिच्छायामात्र अतएव तदनुगत शौच आशौचाभास माना गया है । इस प्रकार श्रद्धातारतम्य से योनिकृत शौच चार श्रेणियों में विभक्त हो जाता है, जैसा कि परिलेख से स्पष्ट है-४६५

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२० २१. ११६ ११० ( ३ ) ११- ४ ) १२- ( ५ ) | १३– | ( ६ ) ११४. ( 1 ) ११५-( १ ) | १६– ( २ ) ( ३ ) S X पितरः एव सगोत्रा ४. ( १ ) बीजी ( २ ) पिता ( ३ ) | पितामहः ( ४ ) | प्रपितामहः ( ५ ) वृद्धप्रपितामहः ( ६ ) अतिवृद्धप्रपितामहः ( ७ ) वृद्धा तिंवृद्धप्रपितामहः सगोत्राच -सोदकाः ७ पितरः पितरः गौणभावापन्नाः ) ( सोदकाशौचम् पितरः ) भावापन्नाः गौण सर्वश्रा सत्राशौचम् ( ४६६ २३ -- गोत्राभासाः, श्राशौचाभासाः २४ ( स्मरणाशौचम् ) पितरः सगोत्राश्च :, सोदका , सपिण्डाः श्रद्धविज्ञान पितरः मुख्यभावापन्नाः सपिण्डाशौचम्

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आशौचविज्ञानोपनिषत् उक्त विभागचतुष्टयी ही आगे जाकर सात संस्थाओं में विभक्त मान ली जाती है त्रयी के दो दो विवर्त्त, चतुर्थ एकाकी, सम्भूय सात गोत्रसंस्था हो जातीं हैं । बीजी, । आरम्भ की इन तीन सपिण्डों में अतिशयरूप से श्रद्धासूत्र प्रबल है । अतएव इन तीनों का ' सन्निहितसपिण्ड पिता, पितामह, लक्षण सन्निकृष्टतम ( नजदीक से नजदीक ) रूप पहिला विभाग मान लिया जाता है ' वृद्धाति ०, इन चार सपिण्डों में सामान्य रूप से श्रद्धासूत्र प्रबल है । अतएव इन चारों । प्र ० वृ ० अ ० लक्षणसनिकृष्टतर ( बहुत समीप ) रूप दूसरा विभाग मान लिया जाता है । इस प्रकार का ' सपिण्ड ' प्रबलश्रद्धा-सूत्रानुगत सात पुरुषों के अतिशय सामान्य भेद से ३-४ भेद से दो विवर्त्त हो जाते हैं । एवमेव ं सोदक सप्तक के भी इसी श्रद्धातारतम्य से ३-४ भेद सेदो विवर्त्त हो जाते हैं । ८ १० पर्यन्त सकुल्यलक्षण सन्निकृष्ट ( समीप ) रूप प्रथम विभाग है, ११ से २४ पर्यन्त सोदकलक्षण मध्यमरूप द्वितीय विभाग है । एवमेव सगोत्रसप्तक के भी ३-४ भेद से दो विवर्त्त हो जाते हैं । १५ से १७ पर्य्यन्त सन्निहितसगोत्रलक्षण विप्रकृष्ट ( दूर ) रूप प्रथम विभाग है, १८ से २१ पर्य्यन्त सगोत्र-लक्षणं विप्रकृष्टत ( बहुत दूर ) रूप द्वितीय विभाग है । २२ से २४ पर्य्यन्त का विभाग विप्रकृष्टतम है । परिलेख से सातों संस्थाओं का स्पष्टीकरण हो रहा है । १-१ - त्रिपुरुषं यावत् २- २ - सप्तपुरुषं यावत् ३ - १ - दशपुरुषं यावत् सकुल्यः ४-२ - चतुद्दशपुरुषं यायत् सोदकः ५-१ - सप्तदशंपुरुषं यावत् ६-२- एकविंशपुरुषं यावत् सगोत्र: सन्निहितसपिण्डः सपिण्ड: स सन्निकृष्टतमः ३ स सन्निकृष्टतर: ४ ७-७ स सन्निकृष्टः -१४ स मध्यमः ४ सन्निहितसगोत्रः स विप्रकृष्टः ३ स विप्रकृष्टतरः } azz ७- - चतुर्विंशपुरुषं यावत्-तदूर्ध्वं च देशाति • ज्ञाति: स विप्रकृष्टतमः ३ }, } २-२४ सपिण्डाशौचम् -सोदकाशौचम् सगोत्राशौचम् अपने पूर्व पुरुषों के जन्मनाम के स्मरण, तथा अस्मरण से भी आशौचसम्बन्ध में तारतम्य हो जाता है । ' नाम ' वाङमय है । वाकू - सूत्र ही वस्तुतत्त्व का आत्मजगत के साथ सम्बन्ध कराने में समर्थ है | इसी आधार पर वाकू को ग्रह माना गया है ( देखिए शत ० ४ | ५ | ३ | १ | ) | इसी आधार ४६७

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महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३, पृष्ठ 560 का मूल पृष्ठ
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भावविज्ञान पर धर्मशास्त्र ने यह व्यवस्था की है कि, जहाँ तक जन्मनाम स्मरण है, वहाँ तक तो ' सोदक ' होता है । जैसा कि निम्नलिखित वचन व्यवहार होता है । एवं नाम स्मरणाभाव में सगोत्र व्यवहार

से प्रमाणित है--समानोदकभावस्तु निवर्त्तेताचतुद्द शात् ।

जन्मनाम्नोः स्मृतेरेके तत्परं गोत्रमुच्यते ॥

उक्त चार विभागों में से हमारे इस आशौच प्रकरण में सपिण्डसप्तक, सोदकसप्तक, सगोत्र-सप्तत, ये तीन विभाग ही ग्राह्य हैं । सपिण्ड सनाभि, दोनों शब्द, सोदक - समानोदक शब्द, तथा सगोत्र - सगोत्रज शब्द समानार्थक हैं । इन तीनों सप्तकों का जिसके साथ जैसा सम्बन्ध है, वह निम्न-लिखित गोत्र, सापिण्ड्यमेरुपरिलेखों से स्पष्ट हो रहा है -गोत्र मेरुपरिलेख: -: सगोत्रा / २१ १८१६,२० १७ १६ १६ १५ १५ १४ १४ 281010 १३ १३ सोदकाः १२ १२ ११ 2012 20/0/101 १० w w , ६/१०/११ ८ ९ ७८ ७ ६ | ६ 281503 ५, ५ 2013 सपिण्डाः ४ ४ xixm ३ ३ ३ २ २ २ 2/2 L १ १ २० १ ९ १८ २ 19 १८ 60 १७ १६ १५ 19./m १४ १४१५,१६१७१८ १३ १३ १२ १२ ११ ११ १० १० ९ ९ ८ ८ ८ II ७ ७ ७ w 6 ww 6 w ६ ६ ६ X m ५ ५ ५ 201ar ५ 18 ४ ४ ४ ४ ४ m OC १४ ३ ३ | m Ir ३ ३ ३ २ २ १ २ २ १ १ १७ १६ १५ १४ 12/2 १३ १२ ११ १० १६ १५ १४ ११,१२,१३ ६१० = ७ ६ ५ ४ ३ २ D -/ १४,१५ १४ १३ १३ १२ / १२ ११ ११ १० १० ९ ६ " ८ ८ 9 ७ ७ ६ ६ m ५ ५ 2010 2010 ४ ४ ३ २ ~ -२ 10 2/0/00/0 १३ १२ ११ १० ६ ६/१०/१११२ १०११७ = S I १० / U ६ / 3 w w ! // * RC m [ कार ५ x ] + Pr गल x [क w / 1 5/0/10 - v [ v IIIII III " ) ७ I ७ 20 NY 6 my