Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 581–590

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 581–590

पृष्ठ 581

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शौचविज्ञानोपनिषत् सप्तकोशचक्र परिलेख: -साप्तपौरुषं सापिण्ड्यम् ( ७ ) परमातिवृद्धप्रपितामहाल्लब्धा कला ( ६ ) अतिवृद्धप्रपितामहाल्लब्धाः कलाः ( ५ वृद्धप्रपितामहाल्लब्धाः कलाः ४ ) प्रपितामहाल्लब्धाः कलाः ( ३ ) पितामहाल्लब्धाः कलाः आत्मनिवेय-मूलकला: निवाप्यकला: कलाः १ ० १ ( २ ) पितुर्लब्धाः कलाः ( १ ) स्वतो लब्धाः कलाः -६. ३. ३ १० -१५ ५. १० -२१ ६. १५ २५. २१ सप्तकोशा: - कोशवितानानि ८४ २८ ५६ सप्तचक्रपरिलेख: -| परमातिवृद्ध - अतिवृद्ध - | वृद्धप्रपिता - प्रपितामहे पितामहे प्रपितामहे । प्रपितामहे । पितरि स्वस्मिन ७ १ २ ३ ४ . ५ ६ ७ पितृषु निवाप: १ ३ ६ १० १५ २१ २६ कूटस्थमूल-राशि: अपत्येषु -० १ ३ ६ १० १५ २१ निवापः परमाति- अतिवृद्ध -बृद्धप्रपौत्रे प्रपौत्रे वृद्धप्रपौत्रे पौत्रे पौत्रे पुत्रे ६ ५१६

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राशिपिण्डस्वरूपमीमांसा-राशिविभाजनचक्र परिलेख: --पितृलब्धराशि: - मूलराशिः पितृलब्धराशि: ( ५६ - ऋरणम् ) स्वलब्धराशि: ( २८ - धनम् ) ८४ श्राद्धविज्ञान पितृलब्धराशि: ( ३५ - ऋणम् ) स्वलब्धराशिः ( २१ - धनम् ) पितृलब्धर: ( २१ - ऋणम् स्वलब्धराशिः ( ७ - धनम् ) ५६ २८ ५०० ८४ ) शुक्रस्थ बीजपिण्ड उक्त चक्रद्वया से यह स्पष्ट हो जाता है कि, चतुरशीतिकल भेद से ( दो विभाग हो जाते हैं । मूलराशि है । इस मूलराशि के आगे जाकर अनिवाप्य, निवाप्य, से प्राप्त में से ७ कला, ऋणरूप से पितृषट्क स्वार्जित धनात्मक अष्टाविंशतिकल मूलराशि कला तो मूलराशि में में २१ कला, सम्भूय ऋणधनात्मिका २८ ऋणात्मक षट्पञ्चाशत्कल प्रतिष्ठित रहता है, अतएव इसे ' निवा tates ' है । क्योंकि यह यावज्जीवन कूटस्थ में ही पितृभाग है, स्वभाग तो ' वृद्धिराशि ' कहा अन्वर्थ वनता है । इस वृद्धिराशि में यद्यपि २१ कला से २१ कल पितृभाग भी केवल ७ ही कला है । तथापि यावज्जीवन स्व ( आत्मा ) सम्पत्ति बने रहने को स्वभाग माना स्वभाग ही मान लिया जाता है । इस प्रकार वृद्धराशिभूत इस २८ कल मूलराशि जासकता है । पितृपरम्परा से ऋणरूप से प्राप्त, अतएव ऋणात्मक षट्पञ्चाशत्कल मूलराशि में से ३५ कला, एवं स्वार्जित धनात्मक अष्टाविंशतिकल मूलराशि में से २१ कला, भुक्त सम्भूय है, ऋणधनात्मिका अतएव इसे ५६ कला, ' निर्वाप्यपिण्ड ' है । क्योंकि यह सन्ततिपरम्परा में परम्परया स्वभाग है, पितृभाग तो ' भुक्तराशि ' कहना श्रन्वर्थ बनता है । इस भुक्तराशि में यद्यपि २१ कला २१ कल स्वभाग भी ३५ कला ही है । तथापि उत्तरोत्तर पितृप्रारण के वितान में उपयुक्त होने से को पितृभाग पितृभाग ही मान लिया जाता है । इस प्रकार भुक्तराशिभूत इस ५६ कल मूलराशि , निवाप्य, रूप से माना जासकता है । वंशविच्छेदपय्यर्यन्त चतुरशीतिकल मूलराशि का अनिवाप्य एवमेव विभाजन होता रहता है । पितृनिवाप्यराशिः, अनिवाप्य सवनीयराशिः - पुत्रनिवाप्यराशिः राशि:

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५६ - कला: - ऋणभागः पितृभागः ( १ ) -२८ कला: -धनभागः - स्वभागः २१- ऋणभाग: - पितृभाग. ( २ ) -७ - धनभागः - स्वभागः ३४- ऋणभागः पितृभागः ( ३ ) --२ ९ - धनभागः स्वभागः सप्तकोशचक्रस्वरूपमीमांसा-परम्पराओं में भुक्त हो रहीं हैं । शौ वविज्ञानोपनिषत - ६४ कला: - मूलराशि ' -२६ कला: - वृद्धिराशि: ( स्वभागः ) -५६ कला: -मुक्तराशिः ( पितृभागः ) -५२१ अब इस सम्बन्ध में एक प्रश्न शेष रह जाता है । नियमित २८-२१-१५-१०-६-३-१, इन कलाओं से युक्त १-२-३-४-५ - ६ - ७ इन सात कोशों का, दूसरे शब्दों में सप्तकोशभुक्त कलाओं का. पुरुषपरम्परा में किस क्रम से वितान हो रहा है?, इसी ' शेषप्रश्न ' की मीमांसा कर प्रान्त यो निकृत - सम्बन्धसूत्र - विवेचन समाप्त किया जाता है । प्रतिशरीर में चतुरशीतिकलावच्छिन्न सप्तकोशात्मक बीजपिण्ड प्रतिष्ठित है, यह कहा जाचुका है! इन सात कोशों में से सर्वप्रथम कल स्वधनात्मक प्रथम कोश की कलाओं वितान पर ही दृष्टि डालिए--( १ ) - प्रथमकोशः - अष्टाविंशतिकलः ( २८ ) - स्वधनात्मक: -२८ में से ७ कला स्वयं कूटस्थ में भुक्त हैं, ६ कला पुत्र में भुक्त हैं, ५ कला पौत्र में मुक्त हैं, ४ कला प्रपौत्र में भुक्त हैं, ३ कला वृद्धप्रपौत्र में भुक्त हैं, २ कला प्रतिवृद्धप्रपौत्र में भुक्त हैं, १ का परमातिवृद्धप्रपौत्र में मुक्त है । इस प्रकार ७ ६-५-४-३-२-१ क्रम से स्वकलाएँ सात पुरुष-( २ ) - द्वितीयः कोश: - एकविंशतिकलः ( २१ ) - पितृधनात्मको ऋणरूप: -1. कूटस्थ पुरुष में अपने पिता से ऋणरूप से २१ कलाएँ आई हैं । इन में से ६ कला स्वय कूटस्थ में भुक्त हैं, ५ कला ततपुत्र में भुक्त हैं, ४ कला पौत्र में भुक्त हैं, ३ कला प्रपौत्र में भुक्त हैं, २ कला वृद्धप्रपौत्र में भुक्त हैं, १ कला अतिवृद्धप्रपौत्र में विभक्त है । इस प्रकार ६-५-४-३-२-१, इस रूप से ६ पुरुषपरम्पराओं में २१ पितृकलाएँ भुक्त हो रहीं हैं ।

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श्राद्धविज्ञान ( ३ ) - तृतीयः कोश: - पञ्चदशकलः ( १५ ) - पितामहधनात्मको ऋणरूप: -कूटस्थ पुरुष में अपने पितामह से ऋणरूप से १५ कलाएँ आईं हैं । इन में से ५ कला स्वयं कूटस्थ में भुक्त हैं, ४ कला तत्पुत्र में भुक्त हैं, ३ कला तत्पौत्र में भुक्त हैं, २ कला तत्प्रपौत्र में भुक्त हैं, एवं १ कला ततवृद्धप्रपौत्र में मुक्त हैं । इस प्रकार ५-४-३-२-१, इस रूप से ५ पुरुष -परम्पराओं में १५ पितामह कलाएँ भुक्त हो रहीं हैं । ( ४ ) - चतुर्थ: कोश: - दशकल: ( १० ) - प्रपितामहधनात्मक ऋणरूपः-कूटस्थ पुरुष में अपने प्रपितामह से ऋणरूप से १० कलाएँ आईं हैं । इन में से ४ कला तो स्वयं कूटस्थ में भुक्त हैं, ३ कला तत्पुत्र में भुक्त हैं, २ कला तत्रौत्र में भुक्त हैं, एवं १ कला तत्प्रपौत्र में भुक्त हैं । इस प्रकार ' ४-३-२-१ ' इस रूप से ४ पुरुष परम्पराओं में १० प्रपितामह-कलाएँ मुक्त हो रहीं हैं । ( ५ ) - पञ्चमः कोश: - पटकुल: ( ६ ) - वृद्धप्रपितामहावनात्मको ऋणरूप: -' कूटस्थ पुरुष में अपने वृद्धप्रपितामह से ऋणरूप से ६ कला आई हैं । इन में से ३ कला तो स्वयं कूटस्थ बोजी मूलपुरुष में भुक्त हैं, २ कला तत्पुत्र में भुक्त हैं, एवं १ कला तत्पौत्र में भुक्त हैं । इस प्रकार ‘ ३–२–१ ' इस रूप से ३ पुरुष परम्पराओं में ६ वृद्धप्रपितामहकलाएँ भुक्त हो रहीं हैं । ( ६ ) - षष्ठः कोश: - त्रिकल: ( ३ ) - प्रतिवृद्धप्रपितामहधनात्मको ऋणरूप: -कूटस्थ पुरुष में वृद्धप्रपितामह से ऋणरूप से ३ कला आईं हैं । इन में से स्वयं कूटस्थ पुरुष में मुक्त हैं, एवं शेष १ कला कूटस्थ के पुत्र में भुक्त है । इस प्रकार से २. पुरुषपरम्परा पर्यन्त ३ अतिवृद्धप्रपितामह कलाएँ भुक्त हो रहीं हैं । ( ७ ) - सप्तमः कोश: - एककल: ( १ ) - परमातिवृद्ध प्रपितामहधनात्मको ऋणरूपः-कला तो ' २-१ ' रूप कूटस्थ पुरुष में अपने प्रतिवृद्धप्रपितामह से ऋणरूप से केवल १ कला आई हैं । क्योंकि इस में वितानमात्रा का अभाव है, अतएव इस का आगे ( कूटस्थ पुत्रादि में ) वितान नहीं होता, अपितु यह १ कला कूटस्थ में आत्मघेयरूप से ही प्रतिष्ठित रह जाती है । पिण्ड सन्तानक्रमस्वरूपमीमांसा -मैं इस सप्तकोश - चक्र के आधार पर हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि, कूटस्थ-पुरुष ' ७ स्वधन की, ६-५-४-३-२-१, ये २१ पितृधन की, सम्भूय २८ कला ( सप्तकोशधन की ) आत्मरूप से यावज्जीवन प्रतिष्ठित रहतीं हैं ( १ ) । कूटस्थपुरुष के पुत्र में ६-५-४-३-२-१, इस क्रम से २१ कला ( सप्तकोशधन की ) यावज्जीवन प्रतिष्ठित रहतीं हैं । कूटस्थ पुरुष के पौत्र में ५-४-३-२-१ - इस क्रम से १५ कला ( सप्तकोशधन की ) यावज्जीवन प्रतिष्ठित रहतीं हैं । ५२२

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याशीच विज्ञानोपनिषत् कूटस्थ पुरुष के प्रपौत्र में ' ४-३-२-१ ' इस क्रम से १० कला ( सप्तकोशधन की ) यावज्जीवन प्रतिष्ठित रहतीं हैं । कूटस्थपुरुष के वृद्धप्रपौत्र में ३- २ - १ इस क्रम से ६ कला ( सप्तकोशधन की ) यावज्जीवन प्रतिष्ठित रहतीं हैं । कूटस्थपुरुष के अतिवृद्धप्रपौत्र में २-१ - इश क्रम से ३ कला -( सप्तकोशधन की ) याबज्जीवन प्रतिष्ठित रहती है । एवं कूटस्थपुरुष के परमातिवृद्धप्रपौत्र में १ कला ( सप्तकोशधन की यावज्जीवन प्रतिष्ठित रहतीं हैं । यहा आकर उर्ध्ववितानक्रम समाप्त हो जाता है । निम्न लिखित ' पिण्ड - सन्तानक्रमचक्र ' परिलेख से उक्त विषय का भलिभाँति स्पष्टी-' हो जाता है । पिण्डसन्तानक्रमचक्र परिलेख: -अवरसपिण्ड्यम्-परसापिण्ड्यम्-: मूलराशि -2 | स्वस्मिन् | ८४ पुत्रे पौत्रे प्रपौत्रे वृद्धप्रपौत्रे अतिवृद्ध परमाति प्रपौत्रे वृद्धप्रपौत्रे ३ १ २८ २१ १५ १० w o ० स्वानुगतस्य २८ ७ ६ ५ ४ ३ २ १ पितुः २१ ६ ५ Y २ १ O ० पितामहस्य १५ ५ ४ ३ I १ 0 प्रपितामहस्य १० ४ 20 ३ २ १ ० 0 ·० C वृद्धप्रपितामहस्य प्रतिवृद्धप्रपितामहस्य | परमातिवृद्धप्रपितामहस्य I ३ २ १ ३ २ १ १ १ ० ० ० 0 ५.२३ ० " O O 0 0 ० 0 ० o ० ० ० ० ० ० ० ०

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सन्तानराशि, शेषराशिस्वरूपमीमांसा-श्राद्धविज्ञान पितृ - पितामहादि षट् पर पुरुषों से कूटस्थ पुरुष में ऋणरूप से आगत षट्पञ्चाशत् - कल ( ५६ ) बीजपिण्ड को, तथा स्वार्जित धनात्मक अष्टाविंशतिकल ( २८ ) बीजपिण्ड को, सम्भूय चतुरशीतिकल ( ८४ ) वीजपिण्ड को यद्यपि पूर्व में मूलराशि ( मूलधन ) बतलाया गया है । तथापि धनदा की अपेक्षा से प्रधानतया चान्द्र षोडश सम्वत्सरों से नक्षत्रावच्छेदेन उत्पन्न २८ कल स्वार्जित धनात्मक बीजपिण्ड को ही वस्तुगत्या ' मूलराशि ' कहना श्रन्वर्थ बनता है । षट्पञ्चाशत् कल भाग तो वस्तुतः मूलराशि न होकर मूलऋण ही कहलाया है । अष्टाविंशतिकल प्रथमकोशात्मक मूलधनात्मक इस मूलराशि के सन्तानोत्पत्तिकाल की अपेक्षा से ' सन्तानराशि, सन्तान शेष राशि ' ये दो विभाग हो जाते हैं । जो भाग पुत्रादिशरीर में सन्तानित ( वितत हो जाता है, वे सन्तानित भाग तो ' सन्तानराशि ' कहलाए हैं, एवं स्वभुक्त भाग ' सन्तानशेषराशि ' नाम से व्यवहृत हुए हैं । इसी दृष्टिकोण को लक्ष्य में रखते हुए इन दोनों विभागों का साप्तपौरुष - सापिण्ड्य के साथ समन्वय कीजिए | कूटस्थ पुरुप में प्रतिष्ठित २८ कल भाग मूलराशि है । पुत्रसन्तानोत्पत्ति ( गर्भाधान ) काल में इस मूलराशि में से २१ कला तो पुत्रशरीर के निर्माण में तन्यरूप से सन्तामित हैं, शेष ७ कला स्वयं कूटस्थ में आत्मघेयरूप से भुक्त हैं । स्वभुक्त सप्तकल भाग ' सन्तान शेषराशि है, पुत्रगत एकविंशतिकल भाग सन्तानराशि है । ( १ ) । कूटम्थ पुरुष के पुत्र में कूटस्थ पुरुष से आगत २१ कल भाग मूलराशि है । पौत्रसन्तानोत्पत्तिकाल में इस मूलराशि में से १५ कला तो पौत्रशरीर-निर्माण में तन्यरूप से सन्तानित हैं, शेष ६ कला स्वयं कूटस्थपुरुष में श्रात्मवेयरूप से भुक्त हैं | स्वभुक्त ( कूटस्थ पुत्रमुक्त ) पदकल भाग ' सन्तान शेषराशि ' है, एवं पौत्रगत् पञ्चदशकलभाग सन्तानराशि है । यही दूसरा युग्म है । ( २ ) । कूटस्थपुरुष के पौत्र में कूटस्थपुरुष से आगत १५ कलभाग मूलराशि है । प्रपौत्र सन्तानकाल में इस मूलराशि में से १० कला तो प्रपौत्रनिर्माण में तन्यरूप से सन्तानित हैं, शेष ५ कला स्वयं कूटस्थपुरुष के पौत्र में आत्मघेयरूप से मुक्त हैं । स्वभुक्त ( कूटस्थ पौत्रमुक्त ) पञ्चकलभाग ' सन्तानशेषराशि ' है, एवं प्रपौत्रगत १० कल भाग सन्तनराशि है । यही तीसरा युग्म है । ३ ) । कूटस्थ पुरुष के प्रपौत्र में कूटस्थ पुरुष से आगत १० कलभाग मूलराशि है । वृद्धप्रपौत्र सन्तानकाल में इस मूलराशि में से ६ कला तो वृद्धप्रपौत्र के निर्माण में तन्यरूप से सन्तानित हैं, शेष ४ कला स्वयं कूटस्थ पुरुष के प्रपौत्र में आत्मरूप से मुक्त हैं । स्वभुक्त ( कूटस्थ प्रपौत्रभुक्त ) चतुष्कलभाग सन्तानशेषराशि है, एवं वृद्धप्रपौत्रगत ६ कल भाग सन्तानराशि है । यही चौथा युग्म है । ( ४ ) । कूटस्थपुरुप के वृद्धप्रपौत्र में कूटस्थ पुरुष से आग ६ कल भाग मूलराशि है । अतिवृद्धप्रपौत्र - सन्तानकाल में इस मूलराशि में से ३ कला तो अतिवृद्ध-५२४

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शौचविज्ञानोपनिषत् प्रपौत्रनिर्माण में तन्यरूप से सन्तानित हैं, शेष ३ कला स्वयं कूटस्थ पुरुष के बृद्धप्रपौत्र में आत्मरूप से मुक्त हैं । स्वयुक्त ( कूटस्थ वृद्धप्रपौत्र भुक्त ) त्रिकलभाग सन्तानशेषराशि है, एवं अतिवृद्धप्रपौत्रगत ३ कर्ल भाग सन्तानराशि है, यही पाँचवाँ युग्म है । ( ५ ) । कूटस्थपुरुष के अतिवृद्धप्रपौत्र में कूटस्थ पुरुष से आगत ३ कलभाग मूलराशि है । परमातिवृद्धप्रपौत्रसन्तानकाल में इस मूलराशि में से १ कलभाग तो परमातिवृद्धप्रपौत्र निर्माण में तन्यरूप से सन्तानित है, शेष. २ कला स्वयं कूटस्थपुरुष के अतिवृद्धप्रपौत्र में आत्मघेयरूप से भुक्त हैं । स्वभुक्त ( कूटस्थ अतिवृद्धप्रपौत्रभुक्तं ) द्विकल भाग सन्तानशेषराशि है, एवं परमातिवृद्धप्रपौत्रगत १ कलभाग सन्तानराशि है । यही छठा युग्म है 1 । ( ६ ) । कूटस्थ पुरुष के परमातिवृद्धप्रपौत्र में कूटस्थपुरुष से आगत १ कलभाग मूलराशि है । क्योंकि वितानमात्रा के अभाव से इस का उत्तर वितान असम्भव अतः इस का केवल ' सन्तान शेषराशि ' लक्षण एक ही रूप शेष रह जाजा है । इस युग्मद्वयी के साथ साथ यह भी स्मरण रखना चाहिए कि, सन्तानोत्पत्ति से पहिले पहिले तो प्रत्येक पुरुष आगत ५६ कलाओं से, तथा स्वार्जित २८ कलाओं से चतुरशीतिकल सम्पत्ति से युक्त रहता है एवं सन्तनोत्पत्यनन्तर ५६ को तन्यभाव में परिणत करता हुआ २८ आत्मधेयकलामात्र से युक्त । रहता है । निम्न लिखित परिलेखों से इस चक्र का भलीभाँति स्पष्टीकरण हो जाता है । सन्तान राशिचक्र परिलेख: -७ पुरुषः | ६ पुरुषः | ५ पुरुषः | ४ पुरुषः ३ पुरुषः २ पुरुषः १ पुरुषः सन्तान राशिचक्रम् २८ २ १५ १० ६ ३ O ( १ ) २८ २१ १५ १० ६. m १ ० २८ २१ १५ .१० ६ ३ १ ( ३ ) २८ २१ १५ १०. ६ ३ १ ० ( 8 ) २८ २१ १५ | १० ६ ३ १० २८ २१ | १५ १० ६ ३१ ( ६ ) २८ | २१५११० ६३ १ ० ५२५

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श्रद्धविज्ञान शेषराशिचक्र परिलेख: -७. पुरुषः ६ पुरुषः | ५ पुरुषः ४ पुरुषः ३ पुरुषः | २ पुरुषः ७ १ पुरुषः ५ ४ ३ २ १ ० ७ ६ ५ ४ ३ ४ ov१ ( २ ) ७ ६ ५ ४ ३ २ १ ( ३ ) ७ ६ ५ ४ ३ II १ ० ( 8 ) ७ ६ ५ ४ ३ १ ७ ६ ५ ४ ३ AN २१० ) 3 ( ७ ६ ५ ४ ३ २ १ ० शौचक द्वारमीमांसा-पाठकों को स्मरण होगा कि, आशौचसम्बन्ध के संक्रमण द्वारों का उपक्रम करते हुए हमने योनि, विद्या, यज्ञ, संसर्ग, इन चार निमित्तों का दिग्दर्शन कराया था । इन चारों सम्बन्धसूत्रों से ही घाशौच की व्याप्ति होती है । अधाशौच का प्रथम द्वार योनिसम्बन्ध है । इस की मीमांसा करते हुए प्रसङ्गतः विवाह - दाय- श्रशौच - सापिण्ड्यों का दिग्दर्शन कराया गया । एवं इसी प्रसङ्ग से सापिण्ड्यभावानुगत पिण्डस्वरूप की सिंहावलोकनन्यायेन मीमांसा की गई । सर्वान्त में योनिकृत सम्बन्धसूत्रमीमांसा समाप्त करते हुए यही कहना शेष रह जाता है कि, जनन - मरण भावों से उत्पन्न घाशौच का मुख्य भावापन्न योनिकृत साप्तपौरुषसापिण्ड्य से ही प्रधान सम्बन्ध है । आरोपित तथा सामान्य योनिसम्बन्ध घाशौच के लिए गौणसूत्र हैं । मुख्य योनिसम्बन्ध समान पिण्डावयों में व्याप्त समान श्रद्धा सूत्रद्वारा ही अघाशौच संक्रमण का द्वार बनता है । २ - विद्याकृतसम्बन्धसूत्राणि -वंशो द्विधा - विद्यया, जन्मना च ' इस आर्षसिद्धान्त के अनुसार वंशवितान ( प्रजातन्तुवितान ) जन्ममूलक, विद्यामूलक, भेद से दो भागों में विभक्त माना गया है । जिस प्रकार जन्म सम्बन्ध से जन्य - जनक परम्परा का श्रद्धासूत्र द्वारा पारस्परिक सम्बन्ध रहना है, एवमेव विद्या - सम्बन्ध से भी गुरु - शिष्य परम्परा का उसी श्रद्धासूत्र द्वारा पारस्परिक घनिष्ठ सम्बन्ध रहता है । इस विद्या सम्बन्ध के निगम - आगमविद्या भेद से आगे जाकर दो विवर्त्त हो जाते हैं । पार्थिवविद्यासंस्कार के लिए आगमदीक्षा विहित है, एवं सौरविद्यासंस्कार के लिए निगमदीक्षा विहित है । इन दोनों निगमागम - दीक्षाओं से दीक्षित शिष्यवर्ग का अन्तरात्मा दीक्षाप्रदाता गुरुवर्ग के अन्तरात्मा के साथ उभयनिष्ठ श्रद्धासूत्रद्वारा घनिष्ठ सम्बन्ध हो जाता है । यही विद्याकृत सम्बन्धसूत्र का ५२६

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शौचविज्ञानोपनिषत् संक्षिप्त दिग्दर्शन है । योनिकृत सम्बन्धसूत्रवत् यह विद्याकृत सम्बन्धसूत्र भी अवश्यमेव शौच संक्रमण का द्वार बनता है । इसी विद्या सम्बन्ध से द्विजातिवर्ग द्विजन्मा कहलाया है, एवं इसी दृष्टि से इस विद्यावंश को भी हम जन्मवंश कह सकते हैं, जैसाकि अन्यत्र संस्कार विज्ञानादि में विस्तार से निरूपित है । ३ - यज्ञकृतसम्बन्धसूत्राणि-प्रत्येक सद्गृहस्थ के श्रौतस्मार्त्त कर्मकलापों का स्वरूप सम्पादन करने के लिए एक एक कुलपुरोहित का समावेश आवश्यक माना गया है । इसे ही ' कुलगुरू ' भी कहा गया है ।.. इस कुलगुरू के साथ उस सद्गृहस्थ का घनिष्ठ सम्बन्ध रहता है । पारस्परिक श्रद्धासूत्रद्वारा यह कुलगुरू भी गृहस्थानुगत अघाशौच का पात्र बन जाता है । यही यज्ञकृत - सम्बन्ध सूत्र है । अवश्य ही गृहस्थ के शुभाशुभ भावों का कुलगुरू पर शुभाशुभ प्रभाव पड़ता है । यही कारण है कि, धर्माचानें इस सम्बन्ध में ब्राह्मणवर्ग को सावधान किया है कि, वह बिना सोचे समझे यथेच्छ किसी का कुलपौरोहित्य स्वीकार न करे । इस सम्बन्धसूत्र के ही आधार पर क्षत्रिय समाज में केवल कुलगुरुओं के गोत्रभेद से ही विवाह सम्बन्ध भी हो जाता है के अयोध्या महाराज दशरथ, विदेदजनक, दोनों सगोत्र मर्यादा से विवाहसापिण्ड्य द्वारा समबन्धु थे । परन्तु दशरथ के कुलगुरू वसिष्ठ, तथा विदेहजनक के कुलगुरू रहूगण गोतम, इन दोनों भिन्न गोत्रियों के गोत्र से दोनों कुलों में विवाह सम्बन्ध हो जाता है । इस निदर्शन से बतलाना हमें यही है कि, यज्ञानुगत आविज्यसम्बन्ध भी एक निष्ठ सम्बन्ध है | अतएव यह भी योनि, विद्यावत् अवश्यमेव अधाशौचसंक्रमण का द्वार बन जाता है । ४ - संसर्गकृतसम्बन्धसूत्राणि -१ - रोदन, २ -स्पर्शन ३ - अलङ्करण, ४- अनुगमन, ५ - वहन, ६ - दहन, ७- उदकदान, ८- पिण्डदान, इस प्रकार प्रेतसंसर्ग आठ भागों में विभक्त माना गया है । इन आठों के में से किसी एक भी संसर्ग से युक्त हो जाने पर शवानुगत अधाशौच संसर्गी में संक्रान्त हो जाता है । संसर्गसूत्र के बलाबल तारतम्य से ही इस शौच के बलाबल का तारतम्य हैं । एवं तदनुसार ही शुद्धिव्यवस्था में तारतम्य है । यही संसर्ग चौथा द्वार है । इस प्रकार चार द्वारों से जनन - मरणानुगत सूतक शावाशौचों का परस्पर सम्बन्ध हो जाता है । यही सम्बन्धसूत्र की संक्षिप्त मीमांसा है । सर्वान्त में-शौचविज्ञाननिबन्धन प्रायः सभी विषयों की मौलिक उपपत्ति के स्पष्टीकरण का प्रयास किया गया । इन उपपत्तियों के सम्बन्ध में हमारा यही स्पष्टीकरण है कि, अतीतानागतज्ञ - अधिगतयाथातथ्य-. विदितवेदितव्य महामहर्षियों की संविनिष्ठामूला सुसूक्ष्मा दिव्यदृष्टि से दृष्ट मौलिक रहस्यों का यथावत बोध प्राप्त कर लेना मादृश यथाजात भावुक मानव की स्थूल - भौतिक दृष्टि के लिए असम्भव ही है । एकमात्र गुरुकृपा द्वारा प्राप्त पितृश्रद्धा के बल पर इस सम्बन्ध में जो कुछ भी निवेदन किया गया है,. वह ' निरपवादः परिकरः ' न्याय से संग्राह्य ही मान लिया जायगा, ऐसी आत्मधारणा है । किसी भी उप-पत्तिजिज्ञासा - तत्समाधानान्वेषणपरम्परा से अपने आपको सर्वात्मना संस्पृष्ट बनाए रखते हुए आस्था-श्रद्धापूर्वक शास्त्रीय विधिविधानों के यथासमय - यथाशक्य अनुगमन में ही हमारे जैसे भावुकों की श्रेयः प्रेयोभाव - संसिद्धि है । ' तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते काय्र्याकार्यव्यवस्थितौ ' ही हमारे लिए अन्यतम प्रतिष्ठाभूमि है, जिसे लक्ष्य बना कर ही अन्त में शौच विज्ञानसम्बन्धी कतिपय आवश्यक परिलेखों का समन्वय करते हुए हमें अपनी आस्था श्रद्धा को दृढ़मूल बना लेना है । ५२७

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श्राद्धविज्ञान वर्णभेदानुगत - गर्भस्रावपातनिबन्धन- प्रत्याशौचदिनपरिमाणपरिलेख: -मासे १ ३ ४ .m ब्राह्मण्याः २ ३ ३ ४ ५ A क्षत्रियायाः ३ ४ ५ ६ ७ ir वैश्यायाः ४ ५ ६ ७ छ II शूद्रायाः ७ 5 ६ १० ११ १२ पुत्रकन्यानुगताशौच दिनपरिमाण परिलेख: -प्रसूतीन स्पर्शाशौचदिनानि कर्माशौचादिनानि पुत्रोत्पत्तौ कन्योत्पत्तौ १० २० ३० दाक्षिणात्यस्त्रीणाम् १० ३० ४० प्रत्यन्तस्त्रीणाम् १३ ३० ३० संसर्गिसम्बन्धिनां दिन परिमाण परिलेख: -प्रसूत्याः संगिणाम् संगिणाम् मातृपितृ-भ्रातृ-सपिण्डानाम् मातृपितृ-भ्रातृ-सपिण्डानाम् ara 11 ० ० २ | ३ | ४ २ | ३ | ४ | २ | ३ | ४ | पाते १ ॥ O ५/६ ५ | ६ ५ | ६ | प्रसवे ३ १ १० १० १० ५२८