Part IV Atmgativigyanopanishta Part 4 — पृष्ठ 1–10

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४ · पृष्ठ 1–10

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अथ खण्डचतुष्ट्यात्मक ' श्राद्धविज्ञान ' ग्रन्थान्तर्गत श्रात्मगतिविज्ञानोपनिषत् चतुर्थ खण्ड पं. मोतीलाल शास्त्री वेदवीथिपथिकः ब्राह्मणो ब्रह्मन् ब्रह्मवर्चसी राजस्थान वैदिक संस्थान तत्व शोध - ११ द्यापीठ मूल्य: ४०

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प्रकाशक: राजस्थान पत्रिका प्रा ० लिमिटेड, केसरगढ़, जवाहरलाल नेहरू मार्ग, जयपुर । © सर्वाधिकार --- लेखकाधीन मुद्रक: श्री बालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', दुर्गापुरा रोड, जयपुर -१५

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वेदवाचस्पति पं. मोतीलाल जी शास्त्री [ वि. सं. १ ९ ६५ -- २०१७ ]

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प्रकाशकीय ( स्व ० ) पण्डित मोतीलालजी शास्त्री कृत ' श्राद्धविज्ञान ' के चतुर्थ एवं अन्तिम खण्ड को प्रस्तुत करते हुए हार्दिक प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है । शास्त्रीजी कदाचित् इस ग्रन्थ को तीन ही खण्डों में समाप्त कर देना चाहते थे, परन्तु तृतीय खण्ड छपने के बाद उन्हें ऐसा अनुभव हुआ कि ' आत्मगतिविज्ञान " पर कुछ लिखना नितान्त आवश्यक है । उनकी इस वैज्ञानिक अनुभूति का परिणाम चतुर्थ खण्ड के रूप में सामने आया । दुर्भाग्यवश वे इसका प्रकाशन स्वयं नहीं कर पाये । लगभग पचास वर्ष पूर्व लिखी गई इस रचना का प्रकाशन हुए बिना यह ग्रन्थ सचमुच अपूर्ण ही था । इसी महती कमी को पूरा करने के अभिप्राय से राजस्थान पत्रिका ने शास्त्रीजी के सुपुत्र श्री कृष्णचन्द्र शर्मा से पाण्डुलिपि उपलब्ध कराने का अनुरोध किया जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया । इतना ही नहीं, उन्होंने प्रकाशन की देखरेख का भार भी अपने ऊपर लिया । इस ग्रन्थ के प्रकाशन से विज्ञ पाठकों को यह भलीभाँति स्पष्ट हो जायेगा कि जिस श्राद्ध एवं पिण्डदान को हम एक अन्धविश्वासपूर्ण रूढ़ि मानते आये हैं वह एक विलक्षण विज्ञान है । श्राद्ध का आधार श्रद्धा है और श्रद्धा एक विशिष्ट तत्त्व है, यह भी समझ में आ जायगा । जैविक विज्ञान पर जो विज्ञानवेत्ता नित नई गवेषणाएं कर रहे हैं और नाना प्रकार के प्रयोग कर रहे हैं, उनके लिए इससे अधिक मूल्यवान ज्ञान - सामग्री अन्यत्र दुर्लभ है । यही नहीं, यदि वे ' श्राद्धविज्ञान ' का आद्योपान्त स्वाध्याय करें तो कई ' वैज्ञानिक ' धारणाएं ही बदल जायेंगी और उन्हें एक नया प्रकाश मिलेगा । इस ग्रन्थ का दुर्भाग्य यही है कि यह हिन्दी में है । अच्छा हो, कि कोई अंग्रेजी और हिन्दी का सक्षम जानकार व निष्ठावान् विद्वान् यह बीड़ा उठाये । वह सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण का भागी होगा । राजस्थान पत्रिका ने अभी इतना तो निश्चय किया है कि वेद - विज्ञान के विषय में जो सामग्री हिन्दी - संस्कृत में उपलब्ध है और अप्रकाशित है, उसका प्रकाशन किया जाय । यदि कोई प्रज्ञावान् इस सामग्री का अंग्रेजी में रूपान्तरण करने के लिए उद्यत हुआ तो उसका भी स्वागत किया जायगा, अन्यथा इतने से ही अपने प्रयत्न की इतिश्री मान लेंगे । महती आवश्यकता तो यही है कि पाण्डुलिपि पुस्तक का रूप धारण करे ताकि उसकी आयु बढ जाय, उसका प्रायतन बढ जाय और भविष्य में काम करने वालों के लिए एक आधारभूमि प्रस्तुत हो जाय । ' आत्मगतिविज्ञान ' नामक इस चतुर्थ खण्ड के प्रकाशन के साथ ' श्राद्ध विज्ञान- परियोजना ' का संकल्प पूर्ण हो गया है । इस ग्रन्थ की पाण्डुलिपि से प्रेसकापी तैयार करने एवं सम्पादन में महाराजा संस्कृत कॉलेज के प्राचार्य श्री कैलाश चतुर्वेदी ने एवं शीघ्र सुचारु मुद्रण कार्य में शास्त्रीजी के सुपौत्र श्रीप्रद्युम्न कुमार ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है, जिसके लिए वे साधुवाद के पात्र हैं । कर्पूरचन्द ' कुलिश '

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समर्पण दिवंगता - चन्द्रलोकस्था स्नेह - ममतामयीमूत्ति-माता ' त्रिवेणी देवी जिनकी सतत् प्रेरणा एवं श्रहनिश सेवा इस ग्रन्थलेखन में सहयोगिनी बनी - कृष्णचन्द्र शर्मा

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अथ श्राद्धविज्ञानम् आत्मगतिविज्ञानोपनिषत् चतुर्थ खण्ड विषयसूची क्र ० सं ० विषय पृ ० सं ० क्र ० सं ० विषय १. निगमानुगता पितृस्तुति १ ग- नाड्यः २. सन्दर्भसङ्गति ५ ३. स्वरूपपरिचय द ४. आत्मगतिविषये प्रश्नपरम्परा १३ ५. आत्मगतिमूलकात्मस्वरूपपरिचयः २६ ६. प्रश्नपरम्परासमाधि ४५ ७. गत्यारूढः प्रत्यगात्मा ८. आत्मोत्क्रान्तिनिमित्तानि ६. आत्मोत्क्रान्तिपरिचायकाः १०. श्रात्मगति निमित्तानि क- पन्थानः ख - कर्माणि II घ- छन्दांसि ङ - देवताः च - प्रतिवाहिकाः प्रतिवाहिकपरिशिष्ट छ- आकाशः ( ज ) लोका: ( श्रात्मगतिस्थानानि ) ५५ नित्यगतिः ७२ क्रमगतिः ७७ ७७ अगतिगतिः प्रकरणोपसंहार ७८

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श्राद्धविज्ञानग्रन्थान्तर्गत ' आत्मगतिविज्ञानोपनिषत् ' चतुर्थखण्ड परिलेख सूची क्र ० सं ० परिलेख पृ ० सं ० | क्र ० सं ० परिलेख पृ ० सं ० १ - सप्तपुरुषात्मकपुरुषावच्छिन्नस्यान्नमय कोशस्य १७- कुटिलदेवयान परिलेख १४६-१४७ प्रतिकृति ३२ १८ - वीथि स्वरूप परिलेख १६० २- परमार्थ - परार्थ - स्वार्थक परिलेख ८४ १६ - प्रकाश परिलेख १६२-१६३. ३- अमृत - मृत्यु तारतम्य परिलेख ८७ २०- भूपिण्डानुगत प्रकाश परिलेख १६२-१६३ ४ - रोदसी त्रैलोकस्य तदवच्छिन्नप्राण-२१ - आत्मगति त्रैलोक्य परिलेख १६२-१६३ पञ्चकस्य वा प्रतिकृतिः ६६-६७ २२- उत्तरायण - दक्षिणायनानुगत-५ - चतुष्ट्यात्मक भाव परिलेख ६७ आकाश परिलेख १६२ - १६३ ६- पञ्चभूतानुगत व्याननाड़ी विवर्त्त परि ० १०३ २३- शुक्रषटात्मक भूविवर्त परिलेख १८० - १८१ ७- पञ्चप्रारणानुगत - नाड़ीचक्र परिलेख १०४ २४ - पार्थिव त्रैलोक्य त्रिलोकी परि ० १८४ - १८५ 5- नाड़ीनिमित्त परिलेख १०८-१०६ २५ - षट्शुकात्मक चित्य भूपिण्ड परि ०१८४–१८५ - पार्थिवसाम प्रतिकृति २६ - वेद साहस्री - ऐन्द्री परिलेख १०- १६१ ( रथन्तरसाम मण्डलम् ) १२६–१२७ २७ - लोक साहस्री परिलेख १६२-१९ ३ १० - सौरसाम प्रतिकृति २८ - वाक्साहस्री परिलेख १६२-१९ ३ ( बृहत्साम मण्डलम् ) १२६–१२७ २६ - नवायज्ञमण्डल परिलेख १६४-१६५ ११ - सौर - पार्थिव समातिमान परि ० १२६-१२७ ३० - त्रिविष्ट्प मण्डल परिलेख १६८-१६६ १२ - सौरपार्थिव सम्वत्सर भोग परि ० १२६-१२७ ३१ - बाक्साहस्री मण्डल परिलेख १६८ - १६६ १३ - सौर प्रातपपथ - चान्द्र छायातपौः १३० - १३१ ३२- पितृस्वर्गत्रयी परिलेख १६८ - १६६ १४ - पार्थिव छायातपौः १३०-१३१ १५ - ब्रह्मपथातिवाहिक परिलेख १३६ १६ - ऋजुदेवयान मार्ग परिलेख १४६-१४७ १ ९ ३३ - चान्द्रगतित्रयी परिलेख ३४- चन्द्रच्छाययोपपन्न सूर्य्यग्रहण यी ३५ - ब्रह्माश्वत्थ ईश्वरः परिलेख २०१ - २०२ २०२ २१५-२१६

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अथ श्राद्धविज्ञानम् आत्मगतिविज्ञानोपनिषत् चतुर्थ खण्ड निगमानुगता पितृस्तुति

उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः ।

असुं य ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु ॥ । १ ॥

इदं पितृभ्यो नमो अस्त्वद्य ये पूर्वासो य उपरास ईयुः ।

ये पार्थिवे रजस्या निषत्ता ये वा नूनं सुवृजनासु विक्षु ॥ २ ॥

हं पितृ सुविदत्राँ प्रवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः ।

दो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पित्वस्त इहागमिष्ठाः ॥ ३ ॥

बर्हिषदः पितर ऊत्यर्वागिमा वो हवा चक्रमा जुषध्वम् ।

त आ गतावसा शन्तमेनाथा नः शं योररपो दधात ॥ ४ ॥

उपहूताः पितरः सोम्यासो बर्हिष्येषु निधिषु प्रियेषु ।

त श्रागमन्तु त इह श्रुवन्त्वधि ब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्वान् ॥५ ॥

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड निगमानुगता पितृस्तुति

प्राच्या जानु दक्षिणतो निषद्येमं यज्ञमभि गृणीत विश्वे ।

माहिंसिष्ट पितरः केन चिन्नो यद्व प्रागः पुरुषता कराम ॥ ६ ॥

श्रासीनासो अरुणीनामुपस्थे रयिं धत्त दाशुषे मर्त्याय ।

पुत्रभ्यः पितरस्तस्य वस्वः प्रयच्छत न इहोर्जं दधात ॥७ ॥

ये नः पूर्वे पितरः सोम्यासोऽनूहिरे सोमपीथं वसिष्ठाः ।

तेभिर्यमः संरराणी हवींष्युशनुशद्भिः प्रतिकाममत्तु ॥ ८ ॥

येतातृदेवत्रा जेहमाना होत्राविदः स्तोमतष्टासो अर्कैः ।

श्राग्ने याहि सुविदत्रेभिरर्वाङ सत्यैः कव्यैः पितृभिर्धर्मसद्भिः ॥ ९ ॥

ये सत्यासो हविरदो हविष्णा इन्द्रेण देवैः सरथं दधानाः ।

श्रग्ने याहि सहल देववन्दैः परैः पूर्वैः पितृभिर्धर्मसद्भिः ॥ १० ॥

श्रग्निष्वात्ताः पितर एह गच्छत सदः सदः सदत सुप्रणीतयः ।

श्रत्ता हवींषि प्रयतानि बहिष्यथा रयिं सर्ववीरं दधातन ॥ ११ ॥

त्वमग्न ईलितो जातवेदोऽवाढव्यानि सुरभीणि कृत्वी ।

प्रादाः पितृभ्यः स्वधया ते अक्षन्नद्धि त्वं देव प्रयता हवींषि ॥ १२ ॥

ये चेह पितरो ये च नेह यांश्च विद्म याँ उ च न प्रविद्म ।

त्वं वेत्थ यति ते जातवेदः स्वधाभिर्यज्ञं सुकृतं जुषस्व ॥ १३ ॥

ये ना ये नग्निदग्धा मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते ।

तेभिः स्वराडसुनीतिमेतां यथावशं तत्वं कल्पयस्व ॥ १४ ॥

( ऋग्वेद संहिता १०।१५ ) [ " पार्थिव प्रथम श्रेणी के पार्थिव पितर और उत्तम श्रेणी के दिव्यपितर एवं मध्यम श्रेणी के अन्तरिक्ष्य पितर, जो कि स्वरूपतः सोमप्राणप्रधान बनते हुए सोम्य हैं, हमारे लिए यशः प्रदाता बनें । ऐसे जो पितर हैं, वे अपने सुशान्त सोम्यभाव से, अपने सोमलोकात्मक पारमेष्ठ्य ऋतुस्वरूप से पितृकर्म्मा-ष्ठाता यजमान की अध्यात्मसंस्था के अभिमुख बनते हुए हमारी प्रार्थना सुनें, हमारी रक्षा करें " ] इति प्राकृत भाषा समन्वयः ॥ १ ॥

[ २ ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड निगमानुगता पितृस्तुति प्राकृतिक पूयुर्भोगानन्तर जो प्राध्यात्मिक महत्पतर चन्द्रलोक में अवस्थित हैं, वे ' पूर्वास: ' हैं । एवं अकालमृत्यु से जो चन्द्रलोक में स्वल्पावस्था में ही चले गए हैं - वे ' उपरास: ' हैं । जिन महत् पितरों की औपपातिक भावानुबन्ध से अभी चन्द्रलोकगति नहीं हुई है, वे पार्थिव रजोलोक में इतस्ततः चंक्रममाण पितर हैं । श्राध्यात्मिक पितर के ये तीन ही श्रेणिविभाग होते हैं । तीनों श्रेणियों के प्रेतपितर सम्पत्ति-शाली श्रद्धाशील अपनी पुत्रादि प्रजा ( सुवृिजनासु विक्षु ) में प्राश रूप से अनुगत रहते हैं, जिन्हें नमस्कार पूर्वक- हव्यप्रदान द्वारा श्रद्धालु प्रजा तृप्त किया करती है ॥२ ॥

पितृकर्मकर्त्ता श्रद्धालु यजमान ने अनुग्रह करने वाले पितरों को अपने अनुकूल बना लिया है, पारमेष्ठ्य सौम्य विष्णु का भी इस सौम्य पितर अनुग्रह से अनुग्रह प्राप्त कर लिया है । ' बर्हिषदः ' नाम के अन्न पितर पार्थिव पितर इस पुराड़ाशाहुतिरूप द्रव्य का, तथा सोम का यजमान के इस पितृयज्ञकर्म में उपभोग कर रहे हैं ॥३ ॥

हे ' बर्हिषद: ' नामक पितृदेवताओ! आप हमारी अर्वाचीन- श्रागे की वंशपरम्परा का अवश्य ही संरक्षरण करेंगें । हम आपके लिए यह हविद्रव्य सम्पन्न कर रहे हैं । आप इन से तुष्ट तृप्त बनिए, एवं हमारे लिए तथा हमारे परिवार के लिए शान्ति स्वस्ति प्रदान करने का अनुग्रह कीजिए ॥ ४ ॥

वे हमारे पितृदेवता हमारे इस श्रद्धात्मक पितृकर्म में हमारी प्रार्थना से यहाँ पधारें, यहाँ पधार कर वे हमारी प्रार्थना सुनने का अनुग्रह करें । प्रार्थना सुन कर हमें आशीः प्रदान करने का अनुग्रह करें || ५ || ' दक्षिणं जान्वाच्य पितरः उपासीदन् ' ( शत ० ) इत्यादि श्रुति के अनुसार प्राचीनावीती बन कर दक्षिण जानु को नत बनाकर समुपस्थित पितर बड़े ही अनुग्रह से हमारे इस कर्म से सन्तुष्ट तृप्त हो रहे हैं । पितृदेवता! इस पितृकर्म में यदि आपके आतिथ्य में हम से कुछ अपराध बन पड़ा हो, तो हमें विश्वास है, आप अवश्य हमें क्षमा कर देंगे ॥ ६ ॥

तेजोमय आग्नेय देवताओं के सान्निध्य में समुपस्थित हे पितृदेवताओ! आप इस पितृकर्म में हविः प्रदान करने वाले यजमान के लिए सम्पत्ति प्रदान का अनुग्रह करेंगे । यजमानप्रजा को सम्पत्ति-शालिनी बनाने का अनुग्रह करेंगे || ७ || जो हमारे वृद्धातिवृद्धप्रपितामहादि पूर्व पितर यथासमय देव - पितृ - कम्मों के द्वारा तुष्ट तृप्त होते रहे हैं, उन पितरों के साथ समन्वित दक्षिणपथाधिष्ठाता यमदेवता ( रुद्रदेवता ) भी तुष्ट - तृप्त बनते हुए हमारे लिए अनुग्रहप्रदाता प्रमाणित हो रहे हैं ॥ ८ ॥

प्राकृतिक स्थिति क्रमानुसार कालान्तर में अपने पितृभाव से देवभाव में परिणत होते हुए ' नांदी-मुख ' बन जाने वाले पितर स्तुतिकर्ता - हविःप्रदाता - श्रद्धाशील - यजमानों के लिए अनुग्रहभाजन बन जाते हैं । ग्निदेवता! देवभावापन्न वे दिव्य नान्दमुख पितर आपके साथ हमारे इस देवकर्म्म में यथासमय पधारने का अनुग्रह करते रहें ॥ ६ ॥

[ ३ ]