Part IV Atmgativigyanopanishta Part 4 — पृष्ठ 11–20

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४ · पृष्ठ 11–20

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड निगमानुगता पितृस्तुति अपने ऋतसोमध से स्वरूपतः ' ऋतासः ' ( सौम्य ) भी पितर देवप्राणानुशय सम्बन्ध से ' सत्यासः ' ( आग्नेय ) बनते हुए देववर्ग- संयुक्त इन्द्रदेवता के साथ संयुक्त होते हुए देवकर्म में पधारते रहते हैं ॥१० ॥

अग्निद्वारा आस्वादित, अतएव ' अग्निष्वाता ' नाम से प्रसिद्ध अन्नपितर ( गृह्य - भौम- पार्थिव पितर ) इस पितृकर्म में पधारें पधार कर अपने अनुरूप स्थानों में प्रतिष्ठित होने का अनुग्रह करें । स्वस्थता -पूर्वक विराजमान होकर हविर्भक्षरण का अनुग्रह करें । इससे तुष्ट - तृप्त बनते हुए वे पुत्रपौत्रादि युक्तः सम्पत्ति प्रदान का अनुग्रह करें ॥ ११ ॥

हे अग्ने! आपने अनुग्रह कर हमारी प्रार्थना पर अनुग्रहदृष्टि करते हुए हमारी यज्ञसामग्री को आपने अपने विशकल धर्म से देवपितृभोग बना दिया है । आपने सब प्राणदेवपितरों में आहुतिद्रव्य विभक्त कर दिया है । हे पितृदेवताओ! अग्नि के अनुग्रह से यथाभागविभक्त स्वधापूर्वक प्रदत्त इस हवि काप ग्रहण करें । हे अग्निदेव! आप भी हविर्ग्रहण से तृप्त होने का अनुग्रह करें ॥ १२ ॥

जो पितर यहाँ समुपस्थित हैं, जो उपस्थित नहीं हैं, जिन्हें हम जानते हैं, एवं जिन्हें हम नहीं जानते, वे सब उपस्थित - अनुपस्थित - ज्ञात - अज्ञात हमारे वंशपितर अग्निदेवता द्वारा अवश्य ही उपस्थित, एवं विज्ञात हैं । अतएव हम जातवेदा सर्वज्ञ उन अग्निदेव से ही यह प्रार्थना करेंगे कि आप ही अनुग्रह कर उन सब को प्रदत्त हवि से तृप्त करने का अनुग्रह करें ॥ १३ ॥

जो महपितर अग्निसंस्कार द्वारा चन्द्रलोक में पहुँचे हैं, जो पितर ( गाङ्ग यतोयप्रवाह विक्षेपादि ( द्वारा ) अबग्निरूप से तत्र प्राप्त हुए हैं, द्युलोक ( सौरलोक ) के मध्यस्थानरूप अन्तरिक्ष्य चन्द्रलोक में अवस्थित वे सर्वविध प्रेतपितर स्वधापूर्वक प्रदत्त इस हवि से तृप्त हो रहे हैं । हे अग्निदेव! अपने हविः -प्रदानरूप कर्म से विरारूप ( दशावयव ) बने हुए और उन पितरों के साथ संयुक्त होते हुए इस प्रदत्त हविद्रव्य से उन हमारे प्रेतपितरों की शरीरस्वरूपनिष्पत्ति का अनुग्रह करें || १४ || । इति नैगमिक मङ्गलस्तुति पितृणाम् । 1. [ ४ ]

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अथ श्राद्धविज्ञानम् आत्मगतिविज्ञानोपनिषत् चतुर्थ खण्ड सन्दर्भसङ्गति-सूक्ष्म, इन्द्रियातीत, विषयों के स्पष्टीकरण के सम्बन्ध में ऋतम्भरा निर्भ्रान्त प्रज्ञा ही मूल सुप्रतिष्ठा मानी गई है । जिस महानात्मा के लिए तंद्वशज पुत्रादि द्वारा श्राद्धकर्म्म किया जाता है, वह महानात्मा, जिस पितृप्रारण से महानात्मा का स्वरूप सम्पन्न होता है, वह पितृप्राण ( सौम्य प्राण ), जिस नक्षत्रावच्छिन्न प्रष्टाविशतिकल चान्द्रप्रारण से बीजपिण्ड का स्वरूप निष्पन्न होता. है, वह चान्द्रप्राण, जिन षट्पतृपरम्परात्रों से षट्पञ्चाशत्कल पितृप्राण ऋणरूप से बीजपिण्ड में प्रति-ष्ठित होता है, वह श्रागन्तुक पितृप्राणषट्क, जिस सौम्यप्राणप्रधान श्रद्धासूत्र के द्वारा सपिण्डों में परस्पर सम्बन्ध बना रहता है, वह श्रद्धासूत्र, जिन उच्चावच भावना - वासनात्मक ज्ञान - कर्म्म संस्कारों से भूतात्मा तत्तद् लोकगतियों का अनुगमन करता है, वे भावना - वासना संस्कार, जिन संस्कार विशेषों के प्रभाव से विशेष गतियों का भूतात्मा अनुगमन करता है, वह भूतात्मा एवं जिन गतियों का भूतात्मा अनुगमन करता है, वे गतिभाव, सभी तो इन्द्रियातीत विषय हैं । ऋतम्भरा सत्यप्रज्ञा से सम्बन्ध रखने वाली प्रार्षदृष्टि ( योगजदृष्टि ) ही इन प्रतीन्द्रिय - परोक्ष विषयों के सम्बन्ध में ' इदमित्थमेव ' रूप से निभ्रान्त व्यवस्था कर सकती है । ऐसी परिस्थिति में मादृश सामान्य - लौकिक - मनुष्य की अन्तप्रज्ञा से सम्बन्ध रखने वाला उक्त विवेचन यदि भ्रान्त मान लिया जाय, तो इसमें कोई आपत्ति नहीं है । यह सब कुछ स्वीकार करते हुए भी इस सम्बन्ध में यह तो बलपूर्वक कहा ही जा सकता है कि, भ्रान्त - प्रसत्य - प्रज्ञा_ से सम्बन्ध रखने वाला यह विवेचन ' असत्य वर्त्मनि स्थित्वा ततः सत्यं समीहते ' न्याय से अवश्यमेव आर्ष-प्रजा का ध्यान किसी इन्द्रियातीत निर्भ्रान्त - सत्य - तत्व की ओर आकर्षित करने के लिए पर्याप्त साधन है । इस साधन प्रामाण्य की मूलप्रतिष्ठा चूंकि शब्दप्रमाण है, अतएव इसके प्रामाण्य में कथमपि सन्देह नहीं किया जा सकता ।

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड सन्दर्भङ्गति श्रद्धातत्त्व को अपनी मूलप्रतिष्ठा बनाने वाला श्राद्धकर्म किस श्रात्मतत्त्व को अपना प्रधान लक्ष्य बनाता है? दूसरे शब्दों में पिण्डदानादिलक्षण श्राद्धकर्मे किसकी तृप्ति के लिए किया जाता है? ' श्राद्ध विज्ञान ' आरम्भ करने के साथ ही पहिले यह प्रश्न हमारे सम्मुख उपस्थित होता है । इस प्रश्न के समाधान के लिए ' आत्मविज्ञानोपनिषत् ' नामक प्रथम प्रकरण पाठकों के सम्मुख उपस्थित किया गया । १ २ ', एवं प्रथम खण्डात्मक इस प्रथम प्रकरण में ' अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् ', ' श्रव्यक्तात्मविज्ञानोपनिषत् ३ ४ ५ ६ ' यज्ञात्म विज्ञानोपनिषत् ' ' विज्ञानात्म विज्ञानोपनिषत् ' ' महदात्मविज्ञानोपनिषत् ' ' प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् ' - इन ६ अवान्तर प्रकरणों से क्रमशः अमृतात्मा, ग्रव्यक्तात्मा यज्ञात्मा, विज्ञानात्मा, महानात्मा, प्राणात्मा इन प्रात्मविवत्त का स्पष्टीकरण करते हुए सर्वान्त में यह सिद्धान्त स्थापित किया गया शरीर कि इन ६ आत्मविवत्तों में ५ वां ' महानात्मा ' ही प्रस्तुत श्राद्धकर्म की प्रधान लक्ष्य है । प्रतिवादिक धारण कर एक चान्द्र सम्वत्सर में स्वपुत्र चन्द्रलोक में पहुँचने वाले एवं अष्टाविंशतिकल स्वघनात्मक बीपिण्ड की पूर्णता से पहिले - पहिले इसी चन्द्रलोक में प्रतिष्ठित रहने वाले महानात्मा की तृप्ति के लिए ही, दूसरे शब्दों में तत्तस्तिथि- काल विशेषों में क्षीणपिण्ड बने हुए इस महानात्मा के पिण्डाप्यायन के लिए श्रद्धासूत्र पर प्रतिष्ठित ' श्राद्ध ' कर्म्म विहित है । महानात्मा के अतिरिक्त उक्त षट्प्रात्मविवत्त लक्ष्य है में । ' प्राणात्मा ' ( भूतात्मा - कम्र्मात्मा - भोक्तात्मा ) नामक ६ ठा श्रात्मविवर्त ही कर्म्मगति का प्रधान स्वशुभाशुभकर्मानुसार शुभाशुभ योनियों में परिणत होकर शुभाशुभ लोकगतियों का लक्ष्य बनने वाला यही प्राणात्मा है । इस प्रकार " श्राद्ध होता है चान्द्र महानात्मा के लिए, कर्मानुसारिणी गति का अधिकारी बनता है पार्थिव प्राणात्मा " इस सिद्धान्त के समर्थन के साथ ' ग्रात्मविज्ञानोपनिषत् ' नामक प्रथम प्रकरणात्मक प्रथम खण्ड समाप्त होता है । श्राद्धकर्म ' पितरकर्म्म ' नाम से भी व्यवहृत हुआ है । महानात्मा की तृप्ति के लिए विहित श्राद्धकर्म पितृकर्म क्यों कहलाया? महानात्मा के साथ पितरप्राण का सम्बन्ध कैसे हुआ? पितरप्राण की मूल प्रतिष्ठा ( मूलप्रभव ) कौन हैं? दिव्यपितर अपनी क्या परिभाषा रखते हैं? ऋतुपितरों का क्या स्वरूप हैं? प्रेतपितर की वस्तुस्थिति क्या है? क्रमप्राप्त इन पितरस्वरूप विषयक प्रश्नों के सोपपत्तिक समाधान के लिए " पितरस्वरूपविज्ञानोपनिषत् " नामक द्वितीय प्रकरणात्मक द्वितीय खण्ड की प्रावश्यकता समझी गई । साथ ही जिस वेदप्रामाण्य के श्रीधार पर " पिण्डदानादि लक्ष " पुत्रादि द्वारा कृत पिण्ड-दानादिलक्षण श्राद्धकर्म जिन पितरों के लिए किया जाता है, अपितु परलोकगत ( चन्द्रलोकगत ) महानात्मस्वरूप प्रेतपितरों की तृप्ति के लिए ही श्राद्धकर्म विहित हैं " इस सिद्धान्त के समर्थन की भी आवश्यकता हुई । इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए द्वितीय प्रकरणात्मक द्वितीय खण्ड में १ - प्रभारणीप निषत् २ - पितृपितर विज्ञानोपनिषत् ३- दिव्य पितर विज्ञानोपनिषत् ४ - ऋतु पितर विज्ञानोपनिषत्, ५- प्रेत पितर विज्ञानोपनिषत् इन पाँच अवन्तिरं प्रकरणों का समावेश करना आवश्यक माना गया । आगे जा कर श्राद्धकर्भ के सम्बन्ध में अनेक विप्रतिपत्तियाँ उपस्थित हुईं । पिता, पितामह, प्रपितामहादि के साथ पुत्र, पौत्र, प्रपौत्रादि का क्या सम्बन्ध? पुत्रादि द्वारा प्रदत्तपिण्ड सुदूर चन्द्रलोकस्थ [ ६ ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड सन्दर्भ सङ्गति पितादि की तृप्ति का कारण कैसे बन जाता है? पुत्रोत्पत्ति कर्म को ऋणमोचन कर्म्म किस आधार पर माना गया? श्राद्धकर्म्म से पुत्रादि पितादि के ऋण से कैसे उऋण हो जाते हैं? पुत्रादि द्वारा कृत पिण्डीकरण से चान्द्रपितादि कैसे सापिण्ड्यभाव को प्राप्त हो जाते हैं? सन्तानोत्पत्ति से तथा पितादि के मरण से तद्वशजों में अधाशौच नामक अशुचिभाव कैसे संक्रान्त हो जाता है? इत्यादि आवश्यक प्रश्नों के सोपपत्तिक समाधान के लिए " सापिण्ड्यविज्ञानोपनिषत् " नामक तृतीय प्रकरणात्मक तृतीय खण्ड की श्रावश्यकता का अनुभव किया गया एवं उक्त अवान्तर प्रश्न समाधि के लिए इस खण्ड में १ - प्रजातन्तु-वितानविज्ञानोपनिषत् २ - ऋणमोचनी पायविज्ञानोपनिषत्, ३ - श्राशौच विज्ञानोपनिषत् इव तीन प्रवान्तर प्रकरणों के समावेश की आवश्यकता समझी गई । इस प्रकार प्रस्तुत प्रकरण से पूर्व प्रतिपादित, ६-५०३ प्रवान्तर प्रकरणात्मक १-२-३ खण्डों से महात्मानुगत ' श्राद्धविज्ञान ' से सम्बन्ध रखने वाले प्रायः सभी प्रश्न यथावत् समाहित हो जाते हैं । श्राद्धविज्ञान के सम्बन्ध में कोई विशेष वक्तव्य नहीं है । ऐसी परिस्थिति में यद्यपि न्याय प्राप्त तो यही था कि तृतीय खण्ड के अवसान पर ही श्राद्धविज्ञान निबन्ध को विश्वाम का दिया जाता, तचापि किसी विशेष हेतु से इसी निबन्ध में सर्वान्त में ' श्रारमतिविज्ञानोपनिषत् ' नामक चतुर्थ प्रकरणात्मक चतुर्थ खण्ड का समावेश करना आवश्यक मान लिया गया है । ' लावुभौ भूतसंपृक्तौ महान् क्षेत्रज्ञ एव च ' इत्यादि मानव सिद्धान्त के अनुसार चन्द्रलोक में गमन करते हुए महानात्मा के साथ उस प्राणात्मलक्षण वामा ( कम्मरमा ) का भी घनिष्ठ सम्बन्ध रहता है, पूर्वकथनानुसार लोकमति का प्रधान लक्ष्य बन जहा है । इसके अतिरिक्त स्वयं महानात्मा को भी सापिण्ड्य से पहिले - पहिले पतिमार्ग का अनुसरण करना पड़ता है । इन्हीं कुछ एक विशेषताओं से श्राद्धकर्म्म के लक्षीभूत महानात्मा के साथ लोकमति के लक्षीभूत • भूतात्मा का सम्बन्ध सुरक्षित है । इसी सम्बन्ध के आधार पर भूतात्मा से सम्बन्ध रखने वाले इस गति-विज्ञान प्रकरण का महानात्मानुगत ' श्राद्धविज्ञान ' निबन्ध में समावेश करना उचित मान लिया गया है । महानात्मा से नित्य संश्लिष्ट भूतात्मा पञ्चभौतिक शरीर त्यागान्तर कहाँ जाता है? किस मार्ग से जाता है? क्यों जाता है? गन्तव्य स्थानों का क्या स्वरूप है? गति के निमित्त क्या - क्या हैं? कब तक गन्तव्य लोकों में रहता है? गतिचक्र से त्राण पाने के लिए क्या - क्या उपाय अपेक्षित हैं? इत्यादि श्रात्मगति-विषयक प्रश्नों का सोपपत्तिक समाधान करने के लिए ही प्रकृत खण्ड प्रस्तुत हुआ है । इसी प्रासङ्गिक सन्दर्भ सङ्गति के समन्वय के अनन्तर ' गतिस्वरूप ' की ओर विज्ञ पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । -8-[ ७ ] ह

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड गतिस्वरूप परिचय गतिस्वरूप परिचय " समं सर्वेषु भावेषु सर्वदा परिवर्तते । सा- गतिस्तद् प्रधार्यं गतिविज्ञानमुच्यते । " अमृत - मृत्यु, विद्या - कर्म्म, ज्ञान - क्रिया, सत् - प्रसत् श्रस्ति नास्ति, प्रात्मा - शरीर, स्थिति - गति, उपलब्धि - अनुपलब्धि, विज्ञान - प्रज्ञान, सुख - दुःख, पुण्य - पाप, चेतन - जड़, प्राण- भूत, वृषा - योषा, जन्म-मृत्यु इत्यादि असंख्य द्वन्द्वभावों से नित्य श्राक्रान्त स्थावर जङ्गमात्मक पाञ्चभौतिक विश्व हमारी दृष्टि का विषय बन रहा है । इस विश्वदृष्टि को वैज्ञानिकों ने विज्ञानदृष्टि, प्रज्ञानदृष्टि भेद से दो भागों में विभक्त किया है । वैज्ञानिकों ने कोई अपूर्वविभाग नहीं किए, अपितु जिन परस्परात्यन्तविरुद्ध दो विश्वदृष्टियों का आबालवृद्धवनिता सब को समान रूप से प्रत्यक्ष हो रहा है, उन्हीं का वैज्ञानिकों की ओर से व्यवस्थित रूप से विश्लेषण मात्र हुआ है । ज्योतिर्लक्षरण वह ज्ञान, जिसके सहयोग से, हम सूर्य्य - चन्द्रमा - पृथिवी-आन्तरिक्ष - नक्षत्र - विद्य ुत - अग्नि - मनुष्य - पशु - पक्षी - पर्वत - वृक्ष - सागर - जलचर आदि विश्वपदार्थों को उपलब्ध करने में समर्थ होते हैं, दूसरे शब्दों में वह ज्ञान, जिससे हमें इन सांसारिक विषयों का भान ( प्रतीति, बोध ) होता है, वही ज्ञानतत्त्व ' विज्ञान ' नाम से प्रसिद्ध है । यह ज्ञान यद्यपि स्वस्वरूप से एक-रस है, विविधभाव से पृथक् है, तथापि उक्त सूर्य्य चन्द्रादि विविध विषयों के सम्पर्क से इस एकरसात्मक ज्ञान की भी विविध रूप से प्रतीति होने लगती है । विषयानुगत इस वैविध्य से ही तद्रूप ( विषयाव च्छिन्न ) ज्ञान विविधज्ञानं ' निर्वचन से श्रागे जा कर ( विश्वमर्य्यादा में भुक्त होकर ) ' विज्ञान ' नाम में परिणत हो रहा है । ज्ञानलक्षण इसी विज्ञानधरातल पर सूर्य्य चन्द्रादि भौतिक विषय प्रतिष्ठित हैं । ज्ञानधरातल पर प्रतिष्ठित होकर ही ये विषय - ' सूर्य्योऽस्ति ' ' चन्द्रोऽस्ति ' इत्याकारक प्रतिभावप्रतीति के कारण बनते हैं । यही प्रथम विज्ञानदृष्टि, किंवा ज्ञानदृष्टि है । इस ज्ञानदृष्टि से दृष्ट पदार्थ ही अज्ञानदृष्टि है । ज्ञानाभाव अज्ञान नहीं है, अपितु अज्ञान से प्रावृत ज्ञान ही अज्ञान है, जिसे ' अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ' इत्यादि रूप से मोह का जनक बतलाया गया है । प्रभाव किसी कार्य का जनक नहीं बन सकता । कार्य्य - कारण सम्बन्ध भावात्मक पदार्थों पर ही अवलम्बित है । जबकि अज्ञान मोहकार्य्यं का जनक है, तो ऐसी स्थिति में इसे ' प्रभाव ' लक्षण नहीं माना जा सकता । अवश्य अज्ञान ( तमोगुण ) से आवृत ज्ञान ही अज्ञान है, ऐसा प्रज्ञान अवश्य ही वस्तुतत्त्व है, एवं यही मोह कार्य्यं का भावात्मक कारण है । गुणत्रयानुगतायोगमाया ( व्यक्त-प्रकृति ) ही तमोगुणप्राधान्य से भौतिक सृष्टि का उपादान कारण बनती है । रसात्मक ज्ञानतत्त्व ही बलात्मक क्रियातत्त्व से प्रावृत होता होता कालान्तर में भूतसर्ग का कारण बन जाता है, जैसा कि -' सतो बन्धुमसति निरविन्दन् ' मन्त्रवर्णन से प्रमाणित है । बलगर्भितरसप्रधान तत्त्व ही ज्ञान है, एवं रसगर्भित बलप्रधान तत्त्व ही अज्ञान ( भौतिक विषय ) है । भूतदृष्टि ही ज्ञानदृष्टि है, जिसके नाम-रूप - कर्म्म, ये तीन पर्व माने गए हैं । नामरूपकर्मात्मिका भूतसृष्टि ज्ञानदृष्टि पर प्रतिष्ठित होकर ही [ ८ ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड wwwww. गतिस्वरूप परिचय भाति का विषय बनती है । ज्ञानदृष्टि के मनः प्राण वाक्, ये तीन पर्व माने गए हैं । मनः प्राणवाङ्मयी ज्ञानदृष्टि ही विषय को अपने गर्भ में लेकर ' अस्ति ' प्रतीति का कारण बनती है । ' सूर्योऽस्ति ' में ' सूर्य्यः-अस्ति ' ये दो पर्व हैं । प्रथमपर्व नामरूपकम्मत्मिक ज्ञानपर्व है, द्वितीयपर्व मनः प्राणवाङ्मय ज्ञान -पर्व है । ज्ञानपर्व सत् है, अज्ञानपर्व असत् है । सल्लक्षण ज्ञानपर्व स्वतः एकरस है, असल्लक्षण ज्ञानपर्व भिन्न - भिन्न भावों का अनुगामी है । ज्ञानाधार पर प्रतिष्ठित विषय बदलते रहते हैं, परन्तु ज्ञानस्वरूप से अपरिवर्तनीय है । विषय जब ज्ञान के गर्भ से पृथक् रहता है, तब तो वह ' नास्ति ' है । ज्ञान सम्पर्क में आकर ज्ञानीय अस्ति के अनुग्रह से वह ' अस्ति ' बन जाता है । पुनः ज्ञानगर्भ से निकलने पर अपने प्रातिविक ' नास्ति ' भाव में आ जाता है । इस प्रकार ' नास्ति - अस्ति - नास्ति ' रूप से प्रतिक्षण विलक्षण नास्तिसार भूतजगत ही ग्रज्ञानदृष्टि की मूल प्रतिष्ठा बन रहा है एवं भौतिक विषयोपाधि सहकार से वैविध्यरूपेण प्रतीयमान होता हुआ, किन्तु स्वस्वरूप से सर्वथा एकरस प्रस्तिसार ज्ञान ही ज्ञानदृष्टि की मूल प्रतिष्ठा बन रहा है । ' दृष्टा ' के आधार पर विज्ञानदृष्टि समन्वित है, एवं दृश्य के आधार पर भूतदृष्टि किंवा अज्ञान -दृष्टि समन्वित है । साथ ही प्रत्येक वस्तु में, वस्तुगत प्रत्येक अणु में एक ही बिन्दु पर इन दोनों विरुद्ध तत्त्वों का समन्वय हो रहा है । क्या तत्त्व दो हैं? ' नेति होवाच ' । दृश्य की सत्ता द्रष्टा की सत्ता के आधार पर ही अवलम्बित है | मृत् सत्ता ही घट सत्ता है । फलतः सत्तादृष्ट्या मृद्घट - अभिन्न हैं । भातिलक्षण द्वौत कभी सत्ताभेदानुगत द्वंत का उपोद्बलक नहीं बन सकता । यही कारण है कि वैज्ञानिकों ने ' विज्ञान-' अज्ञान ' भेद से दो भातियाँ स्वीकार करते हुए भी सत्ताभेद सत्ता अभेदमूलक अद्वैतवाद का सर्वात्मना समर्थन किया है । अस्तु इस दार्शनिक चर्चा को अधिक तूलरूप न देते हुए विभिन्न दृष्टि द्वयी से प्रकृत में यही कहना है कि, विविध भाव संकुलित विश्व में समष्टिरूप से, तथा व्यष्टिरूप से उभयथा हम निश्चयेन तमः प्रकाशावत् अत्यन्त विरुद्ध दो भावों ( विषयी - विषयों ) का साक्षात्कार कर रहे हैं । उदाहरण के लिए एक ऐसे मनुष्य को लक्ष्य बनाइए, जिसकी जन्म, शिशु, पौगण्ड, बाल, तरुण, युवा,, प्रौढ, स्थविर, वृद्ध, दशमी ये दसों अवस्थाएँ आपकी दृष्टि में आ गई हों । आप अवश्य ही यह स्वीकार कर लेने में कोई आपत्ति न करेंगे कि, जन्मावस्था से प्रारम्भ कर दशमी अवस्था पर्य्यन्त इस मनुष्य दशा के १० प्रधान परिवर्तन हुए हैं । इसी आधार पर आपको आगे जाकर यह भी स्वीकार कर लेना पड़ेगा कि, प्रत्येक अवस्था भी कोई कूटस्थ स्थिर तत्त्व नहीं है । अपितु अनेक अवान्तर अवस्थानों के समन्वय से प्रत्येक अवस्था का स्वरूप निष्पन्न हुआ है । अन्ततोगत्वा उस क्षणिक सुसूक्ष्म परिवर्तन को आँखों से न देखते भी हुए अनुमान द्वारा आप यह मान ही लेंगे कि, जन्म से निधन पर्य्यन्त मानव शरीर में क्षणिक परिवर्तन हो रहा है । इस क्षणिक परिवर्तनानुगत अवस्था परिवर्तन के साथ - साथ ही आप उस क्षण-परिवर्तनीय - सत्ताभाव स्वीकृति से भी ना नहीं कर सकते, जो प्रवारपारीण रूप से उन अनन्त क्षरण -भावों का एक आधार बन रहा है । उसी प्रत्यक्षानुभूत प्रक्षणधरातल के कारण ही तो प्रतिक्षण पूर्व-दशा में आने वाले भी उस व्यक्ति के सम्बन्ध में आपके मुख से - " अरे! यह तो वही रामलाल है, जिसे बचपन में हमने गलियों में गुलेल खेलते देखा था, युवावस्था में पुलिस विभाग में देखा था, आज हम उसे [ 8 ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड गतिस्वरूप परिचय ही वृद्धावस्था में परिणत देख रहे हैं " यह वाक्य निकल पड़ते हैं । इस प्रकार एक ही रामलाल व्यक्ति ' क्षणदृष्टि, अक्षरणदृष्टि दोनों का केन्द्र बन रहा है । प्रक्षणदृष्टि ही अतिसारा विज्ञानदृष्टि है, यही प्रात्म-दृष्टि है, यही ब्रह्मदृष्टि है, यही स्थितिभाव है । क्षणदृष्टि ही नास्तिसारा अज्ञानदृष्टि है, यही शरीरदृष्टि है, यही मायिकदृष्टि है, यही गतिभाव है । प्रश्न होगा, जब दोनों प्रत्यन्त विरुद्ध हैं, तो दोनों का एकत्र समन्वय कैसे हुआ? उत्तर तमः - प्रकाश से पूछिए । प्रकाश और अन्धकार, दोनों से बढकर परस्पर विरुद्ध और कौन होगा । परन्तु आश्चर्य है-दोनों का एकत्र समन्वय हो रहा है । अन्धकार प्रदेश में प्रकाशयुक्त है, प्रकाश प्रदेश में अन्धकारयुक्त है । जिसे आप विशुद्ध अन्धकार कहते हैं, विश्वास कीजिए, उसके पर्व पर्व में प्रकाश का साम्राज्य है । तभी तो अन्धकार में तारतम्य उपलब्ध होता है । अभी - अभी सौरप्रकाश व्याप्त था, बादल हो गए, अन्धेरा हो गया । रात्रि का आगमन हुआ, अन्धकार और घना हो गया । यदि अमावस्या की रात्रि है, साथ ही आकाश मेघाछन्न है, तो घनता और भी प्रबल हो गई । यह तारतम्य ही यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त प्रमाण है कि अन्धकार के प्रकट हो जाने से प्रकाश पलायित नहीं होता, अपितु वह ( प्रकाश ) अन्धकार से अभिभूत हो जाता है । यही अवस्था प्रकाश की है । कृष्णपक्ष की रात्रियों में नक्षत्रों का साधारण प्रकाश है । चन्द्रोदय हुआ, अधिक उजाला हो गया । पूर्णिमा तिथि में प्रकाश और अधिक बढ़ गया । लीजिए - सूर्य निकल आया, प्रकाश और वृद्धिगत हुआ । मान लीजिए, यदि ऐसे - ऐसे १० सूर्य्यं आकाश में उदित हो जाय तो प्रकाशवृद्धि की क्या अवस्था होगी? उत्तर स्पष्ट है । छोड़िए इस प्राधिदैविक प्रकाश को । एक बन्द कमरे में अन्धकार है । आप १५ वाट का एक बल्ब ( गोला ) लगा देते हैं, प्रकाश हो जाता है । यदि वहीं १०० वाट का बल्ब लगा दिया जाता है, तो प्रकाश और भी अधिक हो जाता है । प्रश्न होगा कि, यदि प्रकाशसत्ता में अन्धकार नहीं ठहर सकता, तो १०० वाट के बल्ब से प्रकाश में आधिक्य क्यों उत्पन्न हुआ? प्रश्न का यही समाधान विज्ञानयुक्त माना जायगा कि प्रकाश के आगमन से अन्धकार न तो नष्ट ही होता, न पलायित ही होता, अपितु वह प्रकाशगर्भ में ही अभिभूतमात्र हो जाता है । साधनाधिक्य से ज्यों - ज्यों अन्धकार अधिकाधिक अभिभूत होता जाता है, त्यों - त्यों प्रकाशवृद्धि होती जाती है । तारतम्य को भी छोड़िए । पूर्ण प्रकाश हो रहा है । उस प्रकाश मण्डल में मेज - कुर्सी आदि रखी हैं, साथ ही विरुद्धदिक् में उसी प्रकाश मण्डल के गर्भ में इनकी छाया पड़ रही है । यह छाया उसी पूर्व प्रनभिभूत तम का अंश है । यदि प्रकाश ने स्वप्रदेश से अन्धकार को हटा दिया तो यह छायालक्षण अन्धकार कहाँ से प्राया- ' नासतो विद्यते भाव: '? प्रावरणप्रतिबन्धक से तत्स्थान का अन्ध-कार प्रकाश न हटा सका, इस युक्ति का उस समय कोई महत्व नहीं रह जाता, जब कि निरावरण प्रकाश-मण्डल में भी बाहर से लाए गए तृण की छाया का उद्गम प्रत्यक्ष दृष्ट है । इस प्रकार ग्रन्ततोगत्वा हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि, परस्परात्यन्त विरुद्ध होते हुए भी तमः - प्रकाश समान प्रदेश में निर्विरोध समन्वित है । ऐसा कोई प्रकाश नहीं, जिसके गर्भ में अन्धकार न हो, एवमेव ऐसा कोई अन्ध-कार नहीं, जिसके गर्भ में प्रकाश न हो । प्रकाशगभित अन्धकार ही अन्धकार है, एवं अन्धकारभित प्रकाश ही प्रकाश है । इसी तारतम्य से अन्धकार, प्रकाश, ये दो विरुद्धभाव प्रकट हो गए हैं । इसी तमः प्रकाश का अविनाभाव बतलाते हुए आचार्यों ने कहा है-[ १० ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड गतिस्वरूप परिचय न हि ध्वान्तमीङ न यत्र प्रकाशः -प्रकाशो न तङ न यत्रान्धकारः ॥ तमो वा प्रकाशोऽपि वा यत्र तत्र — प्रतीमस्ततोऽपि प्रकर्षात् प्रकर्षम् ॥१ ॥

वर्णे प्रत्यक् तमसि च वर्णं घनत्वेन तुल्यता दृष्टा ।

अन्तरतमं तमस्तद् विभु सर्वत्र प्रतीयते नित्यम् ॥ २ ॥

( अहोरात्रवाद ४ २ व ८ ) परस्परात्यन्तविरुद्धधम्मविच्छिन्न दो, किंवा अनेक पदार्थों का एक ही स्थान में समन्वय कैसे सम्भव है? इस प्रश्न का विज्ञानानुगता तत्त्वमर्थ्यादा की दृष्टि से कोई महत्त्व नहीं हैं । अग्नि विशकलन-धर्मा है, सोम संकोचधर्म्मा है । अग्नि उष्ण है, सोम शीत है, दोनों के एकत्र समन्वय से ही यज्ञात्मा का स्वरूप निर्माण हुआ है । आग पानी का सहज वैर माना गया है । परन्तु देखते हैं गरम पानी में दोनों का समन्वय हो रहा है । पानी और वायु दोनों विरुद्ध तत्त्वों के एकत्र समन्वय से ही ' फेन ' ( भाग ) नामक अपूर्व द्रव्य का जन्म हुआ है । पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, पाँचों भूत परस्पर विषम हैं । किन्तु देखते हैं, इन पाँचों विषमभूतधात्रों के समन्वय से ही शरीरस्वरूप की रक्षा हो रही है । एक ही शरीर पाँचों विरोधियों की आवासभूमि बन रहा है । अनेक विरुद्ध भावों का समन्वय जहाँ प्रशान्ति का कारण है, वहाँ इन्हीं विरुद्ध भावों का स्वस्वरूप रक्षापूर्वक निर्विरोध एकत्र समन्वय ही शान्ति का बीज माना गया है । प्राकृतिक गुणों का वैषम्यमूलक समन्वय ही तो विश्वस्वरूपरक्षा का अन्यतम कारण बन रहा है । भारतीय शिवोपासना के द्वारा विरुद्ध भाव समन्वयमूलक इसी शिवभाव का समर्थन हुआ है । स्वयं शिव आग्नेय तत्त्व है, शिवशक्ति ( जगदम्बा ) सौम्य तत्त्व है, शिववाहन ( वृषभ ) तथा शक्तिवाहन ( सिंह ), दोनों में सहज वैर है । स्कन्द अन्तरिक्ष्य प्राण हैं, गणपति पार्थिव प्राण है, स्कन्दवाहन मयूर तथा गणपतिवाहन मूषक, दोनों में सहज वैर है । मयूर - मूषक से स्वभावतः वैर रखने वाले सर्प भगवान् शङ्कर के आभूषण हैं । शिव जटाजूट में पुण्यसलिला भागीरथी प्रतिष्ठित है, जिससे बन्धनविमोक होता है । हाथ में नागपाश है, जिससे बन्धन प्रवृत्ति होती है । ललाट पर अमृतकला ( चन्द्रकला ) है, कण्ठ में महागल ( विष ) प्रतिष्ठित है । हमारे इस माङ्गलिक शिव परिवार में सभी तो व्यक्ति परस्परात्यन्त विरुद्ध हैं, परन्तु फिर भी यह परिवार ' शिव परिवार ' है । सचमुच जहाँ विरोधी भूतों का समीकरण है, वहीं ' भूतेश ' सम्पत्ति का उदय है । ठीक इसी न्याय से प्रतिसाराविज्ञानदृष्टि तथा नास्तिसारा अज्ञानदृष्टि ( ब्रह्म तथा माया ) दोनों का एकत्र निर्विरोध समन्वय हो रहा है । एवं " तत्तुसमन्वयात् " सिद्धान्त के अनुसार यही समन्वय विश्वस्वरूप-रक्षा की मूल प्रतिष्ठा बन रहा है । विविध भावापन्ना प्रज्ञानदृष्टि ही कर्म्मदृष्टि है, एवं एक रसात्मिका [ ११ ]

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श्राद्धविज्ञानं चतुर्थ खण्ड wwwww गतिस्वरूप परिचय ज्ञानदृष्टि ही ब्रह्मदृष्टि है । जिस प्रकार स्वप्नद्रष्टा प्रज्ञान ज्ञान स्वमहिमा से रथ, रथयोग, रथमार्ग, सारथि, रथी, आदि विविध भावों में परिणत हो जाता है, एवमेव भेदमूला कर्म्मदृष्टि के समन्वय से एकरसात्मिका ब्रह्मदृष्टि ( ज्ञानदृष्टि ) भी विज्ञानदृष्टि ( विविधदृष्टि ) रूप में परिणित हो रहा है । स्वप्नान्तिक विज्ञानवत् नानारूप में परिणत होने वाली इसी विज्ञानदृष्टि को लक्ष्य में रख कर श्रुति ने कहा है- ' स्वप्नान्ते उच्चावचमीयमानो रूपाणि देवः कुरुते बहूनि ' ( बृ.प्रा. ४ | ३ | १३ ) । क्षणिककर्म के सम्पर्क से प्रस्तिलक्षण नित्य विज्ञान ब्रह्म नानारूपों में परिणत हो जाता है । पूर्वरूप से नवीनरूप, नवीनरूप परित्यागान्तर पुनः अन्यरूप, इस प्रकार उस एक के आधार पर प्रतिक्षण नव नव परिवर्तन होता रहता है । जिसका यह परिवर्तन होता है वही कर्म है, जो इस क्षणिक परिवर्तन में प्रक्षण - कूटस्थ बना रहता है, वही ब्रह्म है । ब्रह्म स्थितिमान् है, कर्म गतिमत् है । गतिगर्भिता स्थिति ब्रह्म है, स्थितिगर्भिता गति कर्म है । स्थिति आत्मा है, गति शरीर है । स्थिति जगदीश्वर है, गति जगत् है । ' गच्छति ' ही तो ' जगत् ' शब्द का निर्वचन है । स्थितिलक्षण प्रात्मा मनः प्राणवाङ्मय है, गतिलक्षणशरीर नामरूपकमय है । दोनों नित्य सापेक्ष हैं । ' आत्मा ' कभी विशुद्ध नहीं रहता । अवश्य ही स्थूल सूक्ष्म - कारण, तीनों शरीरों की, अथवा तीनों में से किसी एक शरीर की इसे नित्य अपेक्षा रहती है । तात्पर्य - प्रतिसार नित्यविज्ञानब्रह्म का कम्र्म्मात्मक क्षणिक परिवर्तन ही ' गति ' तत्त्व है । इसी गतितत्त्व के समावेश से अन्यथाभाव से अन्यथाभाव में जाकर पुनः अन्यथाभाव में परिवर्तन होता रहता है । वही अस्ति है, वही नास्ति है । विज्ञानदृष्ट्या वही अस्ति है, कर्म्मदृष्ट्या वही नास्ति है । उसका नास्तिरूप जहाँ एकान्ततः भिन्न रस है, वहाँ उसी का अस्तिरूप एकान्ततः एकरस है, एवं सर्वत्र दोनों प्रत्यक्षानुभूत हैं, जैसा कि उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा चुका है । यही समष्टिलक्षण स्थितिगर्भिता गति का संक्षिप्त स्वरूप परिचय है, जिसे महालक्षण विश्वगति की मूलप्रतिष्ठा विश्वव्यापक अनन्त विज्ञान-घन - गतिगर्भितलक्षण जगदीश्वर माना गया है । जगदीश्वरविवर्त के गतिविवर्त्त का प्रत्यंश हमारा शरीर है, एवं उसके स्थिति विवर्त्त का प्रवश हमारा प्रत्यगात्मा ( कर्म्मात्मा ) है । प्रत्यगात्मा स्वयं स्वस्वरूप से स्थितिलक्षण है । परन्तु शरीरदृष्ट्या यही गतिमान बन रहा है | शरीरावच्छिन्नप्रत्यगात्मा ही गति -भाव का अनुगामी बनता है । फलतः ' आत्मगति ' शब्द से हमें ' शरीरावच्छिन्नप्रत्यगात्मागति ' इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है । प्रतिक्षरण विलक्षण कर्मात्मक - गतिधर्माविच्छिन्न शरीर सम्बन्ध से इस प्रत्यगात्मा की जो - जो गतियाँ होती हैं, उनका संक्षेप से दिग्दर्शन कराना ही प्रकृत ग्रात्मगति- प्रकरण का प्रधान प्रतिपाद्य विषय है । i.. - * -[ १२ ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड आत्मगतिविषये-- प्रश्नपरम्परा आत्मगतिविषये - प्रश्नपरम्परा " प्रतिक्षण परिवर्तनशील तत्त्वविशेष ही ' गति ' है । इस गति का शरीर के साथ प्रधान सम्बन्ध है एवं शरीर चूंकि प्रत्यगात्मा से अभिन्न है, अतएव शरीरावच्छेदेने प्रत्यगात्मा की लोकान्तर गति उपपन्न हो जाती है । " पूर्व के ' गतिस्वरूप परिचय ' से यही निष्कर्ष निकलता है । इस आत्मगति के सम्बन्ध में स्वयं शास्त्रीय वचनों के आधार पर ही अनेक प्रश्न उपस्थित होते हैं । विषय सङ्गति की दृष्टि से प्रकृत परिच्छेद में उन प्रश्नों की ही संक्षिप्त मीमांसा की जाती है । ( १ ) एक विशेष दृष्टिकोण से विचार करने पर आत्मस्वरूप के सम्बन्ध में हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि, जिस अन्नरसमयपुरुष ( पाञ्चभौतिक शरीर ) का हम चर्म्मचक्षुत्रों से प्रत्यक्ष कर रहे हैं, वही ' अहं ' पदार्थ है, वही ' प्रत्यगात्मा ' है । इस दृष्टिकोण से पञ्चभूतों के अतिरिक्त ' प्रत्यगात्मा ' नामक कोई स्वतन्त्र नहीं है, जिसकी परलोकगति का विचार किया जाय । पञ्चमहाभूतों से उत्पन्न भन्न ही शारीराग्नि में हुत होकर शुक्ररूप में परिणत होता है । यही शुक्र शोणिताग्नि में प्राहुत होकर गर्भ-स्थिति का कारण है । यही गर्भ दस मासान्तर भूपिण्ड होकर ' अयं इयं ' इत्यादि लक्षण ग्रहं शब्द का वाच्य बनता है । इस प्रकार पञ्चभूतात्मक अन्नरस से परम्परया शुक्र द्वारा उत्पन्न होने वाले अन्नरसमय इस पुरुष ( आत्मा ) में पाँच भूतों के अतिरिक्त प्रत्यक्ष में अन्य किसी नित्यतत्त्व का प्रात्यन्तिक प्रभाव ही प्रमाणित होता है । पञ्चभूतमय इस ( ऐसे ) आत्मा की केवल पञ्चत्वगति पर ही गतिभाव समाप्त मानना पड़ता | अन्नरसमय पुरुष के पाँचों भूत जन्मकाल से आरम्भ कर किसी निश्चित क्षण तक परस्पर संगठित रहते हैं । जब तक ये भूत परस्पर संगठित ( समन्वित ) रहते हैं, तभी तक यह ' जीवित ' कहलाता है । जिस दिन यह प्राकृतिक संगठन टूट जाता है, उसी क्षण यह मृत कहलाने लगता है, एवं उस अवस्था में इसका पार्थिव भाग स्वप्रभव पृथिवी में, जलभाग अप् में, तेजोभाग तेज में, वायुभाग वायु में, आकाशभाग आकाश में लीन हो जाता है । चूंकि पाँचों भाग स्वप्रभव पञ्चमहाभूतों में लीन हो जाते हैं, यहाँ आकर इसके लिए - ' नास्ति ' शब्द का प्रयोग होने लगता है । यही शरीरात्मकवादी नास्तिक का ' प्रत्यक्षमेवेति चार्वाका: ' मूलक प्रथम दृष्टिकोण है । जब शरीर आत्मा है, एवं जब इसकी पञ्चत्वगति होएकमात्र गति है तो, इस सम्बन्ध में परलोकगति नाम की एक अपूर्व गति की कल्पना का क्या प्रयोजन रह जाता है? चिकित्सा प्रसङ्ग में स्वयं आयुर्वेद ने भी पुरुष को अन्नरसमय बतलाते हुए, इसे ही चिकित्सा पुरुष मानते हुए परोक्षरूप से इस पञ्चत्वगति का ही समर्थन किया है । स्वयं श्रुति ने भी - " अन्नं ब्रह्म ेति व्यजानात् । अन्नाद्धयेवखल्विमानिभूतानि जायन्ते, अन्नेनजातानि जीवन्ति, अन्नं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । श्राकाशाद्वायुः, वायोरग्निः, अग्नेरापः, अद्द्भ्यः पृथिवी, पृथिव्या प्रोषधयः, श्रोषधीभ्योऽन्नं, अन्नाद्र ेतः, रेतसः पुरुषः । स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः " ( तै ० उ ० ) इत्यादि रूप से पुरुष ( आत्मा ) का अन्नरस मयत्व स्वीकार करते हुए पञ्चत्वगति का ही समर्थन किया है । ( २ ) कितने एक वैज्ञानिक इस सम्बन्ध में थोड़ा संशोधन चाहते हैं । उनका कहना है कि, पुरुष अन्नरसमय बनता हुआ पञ्चभूतात्मक है, इसमें तो कोई सन्देह नहीं, परन्तु देखते हैं पाँचों ही भूत [ १३ ]