Part IV Atmgativigyanopanishta Part 4 — पृष्ठ 251–253
आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४ · पृष्ठ 251–253
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[ २१७ ] आत्मगतिविवर्त्तभावाः ↓ नित्यगतिः क्रमगतिः सम्वत्सरगतिः अहरहर्गति + ↓ अगतिगतिः लोकालोकगतिः इहलोकगतिः समवलयम् भूमोदर्कसमवलयम् क्षीणोदर्कसमवलयम् 4 मुक्तिगतिः संसृतिगतिः पञ्चत्वगतिः भूतपञ्चतत्वम् देवपञ्चतत्वम् आत्मपञ्चतत्वम् श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड अपरामुक्तिः परामुक्तिः योनिगतिः दुर्गतिः सद्गतिः ८४ पितृस्वर्गगतिः देवस्वर्गगतिः 4 + 4 ) ७ ( २४ ६ ) ( २३ ) ५ ( २२ ) ४ ( २१ ) ३ ( २० ) २ ( १६ १ ) ( १८ + सायुज्यम् सारूप्यम् सामीप्यम् सालोक्यम् भूमोदर्कनिर्वारणम् क्षीणोदर्ककैवल्यम् उद्भिज्जगतिः २१००००० स्वेदजगतिः २१००००० पिण्डजगतिः २१००००० २१००००० अण्डजगतिः प्रद्यौः पीलुमती उदन्वतो श्रात्मगतिनिमित्तानि
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड श्रात्मगतिनिमित्तानि -१ - विद्यासमुच्चित प्रवृत्तिकर्मानुगता देवस्वर्गगतिः २ - विद्यानिरपेक्षप्रवृत्तिसत्कर्मानुगता पितृस्वर्गगतिः, ३ - असत् कम्मानुगता-४ - भक्तियोगसाध्या-५ - ज्ञानयोगसाध्या-६ - बुद्धियोगसाध्या-७ - हीनकर्मानुगता-८ -आत्महननानुगता-- कर्मयोगसाध्याः ( क्रमगतिः ) - → नरकगतिः ( क्रमगतिः ) परामुक्ति: ( क्रममुक्तिः ) + परामुक्ति: ( क्रममुक्तिः ) * समवलयम् ( सद्योमुक्तिः — अंगतिः ) * इहलोकगति: ( प्रगतिः ) + अन्धंत मोगति: ( अगतिः ) प्रकरणोपसंहार श्रद्धासूत्रमय पितृचरणों के अनुग्रह से ग्रात्मगतिविज्ञानोपनिषत् के साथ - साथ खण्डचतुष्ट्यात्मक ' श्राद्धविज्ञान ' विश्राम ग्रहण कर रहा है । ' पितरोवाक्य मिच्छन्ति ' प्रदेशनिष्ठ अन्तःकरण के समाधान के लिए स्वान्तः सुखाय प्रस्तुत इस निबन्ध के द्वारा श्रद्धालु पाठकवर्ग के सम्बन्ध में केवल यही वक्तव्य शेष रह है कि, महामहर्षियों ने अनन्तकाल के तपोयोग से प्राप्त ऋतम्भराप्रज्ञायुता प्रार्षदृष्टि से जिस इन्द्रिया-तीत कर्म्मरहस्य का साक्षात्कार किया, कम्र्मानुगत लोकगतियों का अन्वेषण किया एवं अतीन्द्रियतत्त्वों के स्पष्टीकरण के लिए लोककल्याणभावना से शास्त्रोपदेश दिया, उस शास्त्रोपदेश के अनुगमन में ही हमारा कल्याण एवं जीवनसाफल्य है । साथ ही प्रत्यक्षात्मिका जिस चार्वाकदृष्टि को आगे कर जो नवशिक्षित आदेशों की उपेक्षा, उपहास करने में ही अपने पुरुषार्थ की इतिश्री समझ रहे हैं, उन बान्धवों से भी हम मानवता के नाते, भारतीयता के नाते, आर्षप्रजानुगत समसम्बन्ध के नाते यह नम्र निवेदन करेंगे कि, नित्य प्राकृतिक विज्ञानधरातल पर प्रतिष्ठित अतएव सर्वथा निभ्रान्त - सत्य धम्मदेशों के क्षणिक आवेशों में पड़कर उपेक्षा करने की भूल न करें । लौकिक व्यावहारिककल्पनाप्रधान बुद्धि से, तदनुगत निरर्थक तर्कवाद से तन्मूलक संशयवाद से न केवल पारलौकिक आनन्द से ही, अपितु ऐहलौकिक सुख से भी हमें वञ्चित रह जाना है । क्या हम आशा करें कि, हमारे मान्य बन्धु निम्नलिखित भगवदादेश को लक्ष्य बनाते हुए जीवन के मूल्यधनं श्रद्धा - विश्वास की रक्षा के लिए प्रयत्नशील बनेंगे । प्रोमित्येत् । [ २१८ ]
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥ १ ॥
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्य्याकार्य्यव्यवस्थितौ ।
ज्ञात्वाशास्त्रविधानोक्तं कर्मकर्तुमिहार्हसि ॥२ ॥
समाप्ता चेयं - आत्मगतिविज्ञानोपनिषत् समाप्तं चेदं खण्डचतुष्टयात्मकं " श्राद्धविज्ञानम् ” ओम् शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!! [ २१ ९ ] श्रात्मग