Part IV Atmgativigyanopanishta Part 4 — पृष्ठ 241–250
आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४ · पृष्ठ 241–250
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड श्रात्मगतिनिमित्तानि से चार विवर्त्त हैं । ब्रह्मलोक में पहुँच जाना सालोक्य है, ब्रह्मसान्निध्य प्राप्त कर लेना सामीप्य है, ब्रह्मवत् सर्वशक्तिघन बन जाना सारूप्य है एवं ब्रह्म के साथ अपने आत्मा का अभेद समझना सायुज्य है । इन चारों परामुक्तियों का श्रोतग्रन्थों में कामप्र, अशोकमहिम इन दो मुक्तिभावों में अन्तर्भाव माना गया है । एकविंशस्थ सूर्य से ऊपर पहुँचने पर २४ वें अहर्गण पर्य्यन्त जीवात्मा में कामना का सम्बन्ध रहता है, साथ ही यह कामना व्यर्थ होती है । इस प्रदेश में जीवात्मा की यं यं कामं कामयते, तं तमाप्नोति ' ' यथाकामो भवति, यथाचारः स्थिति हो जाती है । सालोक्य - सामीप्य भावों का इस अहर्गणत्रयात्मक कामप्रलोक में अन्तर्भाव है । इसी कामप्र स्थिति को लक्ष्य में रख कर श्रुति ने कहा है-यन्न दुःखेन सम्भिन्नं न च ग्रस्तमनन्तरम् । अभिलाषोपनीतं च तत् सुखं स्वः पदास्पदम् ॥ २५ वें अहर्गण से आरम्भ कर ( जो कि स्थान ' प्रत्नस्वर्ग ' नाम से प्रसिद्ध है ) ३६ वें पर्य्यन्त के प्रदेश में पहुँच कर जीवात्मा क्रमशः सारूप्य - सायुज्यभाव को प्राप्त होता हुआ कामना से एकान्ततः प्रतिमुक्त हो जाता है । कामप्रलोक में कामनोत्पत्तिरूप शोक का प्रभाव था, यहाँ कामनोत्पत्ति का भी विलयन है । यहाँ यह केवल स्वात्ममहिमा में लीन रहता है । दूसरे शब्दों में आत्मकाम, आत्मरति, आत्मक्रीड़ बनता हुआ निष्काम बना रहता है । अतएव इस लोक को ' अशोकमहिम ' नाम से व्यवहृत किया गया है । यही यत्र - तत्र ' आनन्दम् ' नाम से भी प्रसिद्ध है । यद्यपि यहाँ अद्वैत सम्पत्ति साक्षात् रूप से उपलब्ध नहीं होती, तथापि अद्वैतमहिमानुभूति अवश्य प्राप्त हो जाती है । यही क्रममुक्तिलक्षणा अपरामुक्ति का संक्षिप्त इतिवृत्त है । जिस प्रकार विद्यासमुच्चित यज्ञ - तपो दान लक्षण प्रवृत्तिरूप विशिष्ट सत्कर्म से देवस्वर्गावाप्ति होती है, विद्यानिरपेक्ष इष्ट - प्रापूर्त - दत्त लक्षण प्रवृत्तिरूप सामान्य सत्कर्म से पितृस्वर्गावाप्ति होती है, एवमेव भक्तियोग उक्त अपरामुक्ति प्राप्ति का कारण माना गया है । सगुण - निर्गुण ब्रह्म भेद से यह भक्ति-योग सकाम, निष्काम भेद से दो भागों में विभक्त है । देवताभक्ति लक्षरण सगुणब्रह्मोपासनारूप भक्तियोग सकामभक्तियोग है एवं इससे सालोक्य - सामीप्यलक्षण कामप्रलोकावाप्तिरूपा प्रपरामुक्ति प्राप्त होती है । देवाधारभूत अव्ययभक्तिलक्षण निर्गुणब्रह्मोपासनारूप भक्तियोग, निष्काम भक्तियोग है एवं इससे सारूप्य– सायुज्यलक्षणा अशोकमहिमलो कावाप्तिरूपा अपरामुक्ति प्राप्त होती है । यही निष्काम भक्तियोग दूसरे शब्दों में निष्कामकर्म्मयोग कहलाया है एवं गीता शब्दों में यही ' राजयोग ' नाम से व्यवहृत हुआ है । निष्कर्षतः कर्म्मकाण्ड स्वर्गावाप्ति का प्रवर्तक है एवं उपासनाकाण्ड अपरामुक्तिचतुष्टयी का साधक है । [ २०६ ]
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड पञ्चदशाहगोसवयज्ञात्मिका – ३० प्रपुनर्मारलोकात्मिका अपरामुक्तिचतुष्टयी ३६ ( १५ ) ३५ ( १४ ) ३४ ( १३ ) → ४ सायुज्यमुक्तिः ३३ ( १२ ) ३२ ( ११ ) ३१ ( १० ) २६ ( 5 ) २८ ( ७ ) २७ ( ६ ) + ३ सारूप्यमुक्तिः २६ ( ५ ) श्रात्मगतिनिमित्तानि → निष्कामभक्तिसाध्या अशोकमहिमलोकावाप्तिरूपा अपरामुक्तिः २५ ( ४ ) २४ ( ३ ) २ → २ सामीप्यमुक्तिः २३ ( २ ) → सकामभक्तिसाध्या कामप्रलोकावाप्तिरूपा १. २२ ( १ ) अपरामुक्तिः | +१ सालोक्यमुक्तिः, सायुज्य - सारूप्यक्षरणा अशोकमहिम लोकावाप्तिरूपा अपरामुक्तिद्वयी-अणुः पन्था विततः पुराणो मां स्पृष्टो अनुवित्तो मयैव । तेन धीरा अपियन्ति ब्रह्मविदः स्वर्गलोक इत ऊर्ध्वं विमुक्ताः ॥
तस्मिञ्छुक्लनीलमाहुः पिङ्गलं हरितं लोहितं च ।
एष पन्था ब्रह्मणा हानुवित्तस्तेनैति ब्रह्मवित् पुण्यकृत्तैजसश्च ॥
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड श्रात्मगतिनिमित्तानि सारूप्य - सालोक्यलक्षरणा कामप्रलोकावाप्तिरूपा श्रपरामुक्तिद्वयी-" तस्यैतस्य परस्तात् कामप्रो लोकः । प्रमृतं वै कामप्रम् । अमृतमेवास्य ( सूर्य्यस्य ) परस्तात् । तद्यत् तदमृतं एतत् तत् - यदेतदचर्दीप्यते । " परामुक्तिः ( शत ० ब्रा ० १० | २ | ६ | ४ ) । मुक्तिगतिलक्षणा क्रमगति का दूसरा विवर्त परामुक्तिलक्षणा क्रमगति है । निष्कामकर्म्मयोगलक्षण वह ज्ञानयोग ( ज्ञानकाण्ड ) ही इस परामुक्ति का प्रवर्तक बनता है, जिसे गीता के शब्दों में ज्ञानलक्षण बुद्धयोग कहा जा सकता है । उपासनाकाण्डात्मक राजयोग ( ऐश्वर्य्यलक्षण बुद्धियोग ) में जीव का जीवत्व सुरक्षित रहता है । परन्तु ज्ञानकाण्डात्मकं इस ज्ञानयोग में जीव का जीवत्व विलीन हो जाता है, अत सम्पत्तिप्राप्त जाती है । यही उपासनासाध्य अपरामुक्ति की अपेक्षा ज्ञानसाध्या इस मुक्ति का परत्व ( उत्कृष्टत्व ) है । अतएव इसे परामुक्ति कहना अन्वर्थ बनता है । ३६ से ऊपर ४८ पर्यंन्त व्याप्त ब्रह्मा-विशुद्ध उस ब्रह्मतत्त्व का साम्राज्य है, जिसे वाङ्मय परमाकाश कहा गया है । इस आकाश महिमा में पहुँच कर नाम रूप से एकान्ततः विमुक्त होता हुआ जीवात्मा निरूपाधिकरूप से आकाशमहिमा में विलीन हो जाता है । यही ज्ञानियों की परामुक्ति है, जिसका निम्नलिखित शब्दों में अभिनय हुआ है-" यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादगेव भवति ॥ एवं मुविजानत आत्माभवति गौतम ॥ " ( कठोपनिषत् २।१।१५ ) । क्रममुक्तिरूपा इस परामुक्ति के क्षीणोदर्क, भूमोदर्क भेद से दो विवर्त्त माने गए हैं । क्षीणोदर्क नामक परामुक्ति ' कैवल्यमुक्ति ' कहलाई है एवं भूमोदर्कलक्षणा परामुक्ति ' निर्वारणमुक्ति ' नाम से प्रसिद्ध हुई है । इन दोनों परामुक्तियों का क्रमशः कायक्लेशात्मक ज्ञानमार्ग तथा योगमार्ग से सम्बन्ध है । सर्वकर्म-परित्यागलक्षण ज्ञानयोगमार्ग में वित्त - पुत्र - लोकेषणात्रयी का परित्याग करते हुए अन्ततोगत्वा इन्द्रिय-मन - बुद्धि आदि समस्त आध्यात्मिक प्रपञ्चों का परित्याग अपेक्षित है । इस बाह्यपरिग्रह के ऐकान्तिक परित्याग से सर्वान्त में केवल विशुद्ध आत्मा बच रहता है, यही कैवल्यलक्षणा क्षीरणोदर्करूपा ज्ञानयोग-साध्या परामुक्ति है, जिसका निम्नलिखित रूप से स्पष्टीकरण हुआ है-अंगुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये संविष्टः । तं स्वाच्छरीरात् प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण ॥ ( कठ २।३।१७ ) ।
" न कर्म्मरणा न प्रजयाधनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः ।
परेण नाकं निहितं गुहायां विभ्राजते यद्यतयो विशन्ति ॥ १ ॥
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि वेदान्तविज्ञान सुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्वाः ॥ ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ॥ २ ॥
अनेन ज्ञानमाप्नोति संसारार्णव नाशनम् ॥ तस्मादेवं विदित्वैनं केवल्यं पदमश्नुते ॥ ३॥ ( कैवल्योपनिषत् ३, ४,२४ ) ।
" सैव कैवल्यमुक्तिः । अतएव ब्रह्मलोकस्था अपि ब्रह्ममुखाद्वेदान्तश्रवणादि कृत्वा ते न सह कैवल्यं लभन्ते । अतः सर्वेषां कैवल्यमुक्तिर्ज्ञानमार्गेणोक्ता, न कर्म-सांख्य योगो - पासनादिभिरित्युपनिषत् । ” ( मुक्तियोपनिषत् १।६ ) | वे ज्ञानयोगानुयायी, जो लोककल्याणार्थ संसारमय्र्यादा का अनुगमन करते हुए ध्यानयोग के अनुगामी बने रहते हैं, योगी कहलाए हैं । ऐसे योगयुक्तात्मा विदेह पुरुष निर्वाणपद के अधिकारी बनते हैं । इनकी सर्वत्र श्रात्मबुद्धि हो जाती है । किसी का परित्याग न कर ' यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् ' के अनुसार यच्चयावत् बाह्यपरिग्रहों में श्रात्मभूमा की भावना रखते हुए विशुद्धसत्वा ये योगी ही भूमोदर्कमुक्ति के अनन्य अधिकारी माने गए हैं । योगमार्गानुगता भूमोदर्कलक्षरणा इसी परामुक्ति का विश्लेषण करती हुई श्रुति कहती है-तस्माद्दोषविनाशार्थमुपायं कथयामि ते । ज्ञानं केचिद्वदन्त्यत्र केवलं तन्न सिद्धये ॥१ ॥
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योगहीनं कथं ज्ञानं मोक्षदं भवतीह भोः ।
योगोऽपि ज्ञानहीनस्तु न क्षमो मोक्षकर्म्मणि ॥२ ॥
तस्मात्ज्ञानं च योगं च मुमुक्षुर्द्दढमभ्यसेत् ।
ज्ञानस्वरूपमेवादौ ज्ञेयं ज्ञानैकसाधनम् ॥३ ॥
ज्ञान के साथ - साथ लोकसंग्रह दृष्टि से कर्मानुगमन तथा योगमार्गानुगमन ही इस मुक्ति का द्वार है । इस प्रकार ज्ञान तथा योग भेद से क्रममुक्तिलक्षणा परामुक्ति के दो विवर्त हो जाते हैं । १ - ज्ञानमार्गसाध्याक्रममुक्तिलक्षणा परामुक्तिः क्षीणोदर्कमुक्तिः — कैवल्यम् २ - योगमार्गसाध्याक्रममुक्तिलक्षणा परामुक्तिः -भूमोदर्कमुक्तिः - निर्वाणम् [ २१२ ]
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड ३ - प्रगतिगतिर्लक्षरणा - श्रात्मगतिः आत्मगति निमित्तानि नित्यगति एवं क्रमगति से सम्बन्ध रखने वाले गतिविवत्त का स्पष्टीकरण प्राप्त तीसरी ग ' कारात्मिका ' अगतिगति ' लक्षरणागति की ओर पाठकों किया गया । अब क्रम का ध्यान आकर्षित किया जाता है । इस अगतिगति के निम्नलिखित तीन प्रधान विवर्त्त माने गये हैं— क — समवलयलक्षणा परमोत्तमागति: ( प्रगतिः ) ख— जायस्वम्रियस्वभावलक्षरणा इहलोकगतिः ( गतिः ) ग — अन्धंत मोलक्षणा परमाधमागति: ( अगतिः ) क - समवलयरूपा - प्रगतिगतिः तीनों में से क्रमप्राप्त पहले समवलयगतिरूपा प्रगति को ही लक्ष्य बनाए ब्रह्मपथ, देवपथ, पितृपथ, यमपथ आदि किसी मार्ग का अनुगमन न । वह उत्तमगति, जिसमें रहते हुए इसी पाञ्चभौतिक शरीर से सर्वव्यापक ब्रह्मतत्त्व में आत्मा का करना अत्रैव पड़े विलयन , अपितु इसी भूपिण्ड पर मुक्ति ' है । चूंकि इस गति में ऊर्ध्वगमन नहीं करना पड़ता, अतएव इसे हो जाय, ' समवलय-जा सकता । क्रमगतिलक्षणा कैवल्य - निर्वाणात्मिका परामुक्ति में गमनरूपा अवश्य क्लान्ति ही ' प्रगति ' रूपा गति कहा रहती है । परन्तु इस समवलयभाव में उसका भी प्रभाव है । अतएव इसे ' परमोत्तमागति प्रांशिक रूप से विद्यमान बनता है । ' न तस्य प्रारणा उत्क्रामन्ति इहैव समवलीयन्ते ' ही इसका स्पष्टीकरण है ' कहना श्रन्वर्थ । एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते । दृश्यते त्वया बुद्धया सूक्ष्मया सूक्ष्मदशभिः ॥ ( कठ १।३।१२ ) । इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार आत्मतत्त्व सम्पूर्ण भूतों में समानरूप से निगूढ है नाम से प्रसिद्ध हुआ है । यदि भूतात्मासमष्टिरूप ब्रह्म के विशुद्ध प्रात्मभाव अतएव वह ' गूढोत्मा ' समवलय है । यदिविशिष्ट में समवलय है, तो भूमोदर्क समवलय है । वैराग्यबुद्धियोगलक्षण में समवलय है, तो क्षीर्णोदर्क योग ही इस समवलयमुक्ति का प्रवर्तक है, जिसका गीताविज्ञानभाष्य में विस्तार सुप्रसिद्ध समत्व-सर्वभूतहितरति नित्य प्रद्रोह, उत्थाप्याकांक्षा का एकान्ततः परित्याग, वर्णाश्रमानुगत से उपबृंहण हुआ है । तथा लोकसंग्राहक कर्मों का असङ्गबुद्धि से अनुगमन, इत्यादि लक्षणाबुद्धियोगनिष्ठा शास्त्रीय कर्म्मो का भाव की मूलप्रतिष्ठा है । इस मार्ग में ' अत्रैवब्रह्म समश्नुते । ' इसी समवलय का स्पष्टीकरण ही इस सर्वश्रेष्ठ विदेह श्रुति ने कहा है- करते हुए यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामायेऽस्यहृदिश्रिताः ॥ अथ मर्त्योऽमृतो भवति, अत्र ब्रह्म समश्नुते ॥१ ॥
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श्राद्धविज्ञान चतुथ खण्ड यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः ॥। श्रात्मगतिनिमित्तानि अथ मर्त्योऽमृतो भवति एतावदनुशासनम् ॥२ ॥ ( कठ२।३।१४-१५ ) ।
१ - क्षीणोदर्क समवलयमुक्तिः २ - भूमोदर्कसमवलयमुक्तिः → प्रगतिर्लक्षणा परामुक्तिः ( परमोत्तमा ) । ( विदेहमुक्तिः, सद्योमुक्तिः ) --ख - इहलोकगतिरूपा अगतिः-: -कृमि - कीट आदि योनियों में प्रविष्ट कर्मात्मा यहीं जन्मधारण करता रहता है, यहीं मृत्युभाव का प्रगतिरूपा ( लोकान्तर प्रगतिरूपा ) अनुगमन करता रहता है । इसका लोकान्तर में गमन नही होता । इसी निकृष्ट गति का स्वरूप बतलाती हुई श्रुति कहती है-" अथैतयोः पथोर्न कतरेण च तानीमानि क्षुद्राण्यसकृतावर्त्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व. स्त्रियस्व - इति । एतत् तृतीयं स्थानम् । तेनासौलोको न सम्पूर्य्यते । तस्माज्जुगुप्सेत । तदेष इलोक: -स्तेनो हिरण्यस्य सुरां पिबंश्च गुरोस्तल्पमावसन् । ब्रह्मदा चैते पतन्ति चत्वारः पञ्चमश्चावरं सौः । " वाला, स्तेयकर्म्म करने वाला, धूर्तता - छल - मिथ्याभाषण - प्रसद्वृत्तानुगमन द्वारा ग्रर्थोपार्जन करने के सहवास में रहने अभक्ष्य - अपेय का भक्षण पान करने वाला गुरुतल्पग, द्विजातिहन्ता एवं ऐसे कुकर्मों वाला इसी निकृष्टगति का अनुगामी बनता है । ग - अन्धं तमोलक्षरणा प्रगतिः----बन्धन आदि के जो मनुष्य अपने आत्मा का घात कर लेते हैं । विषपान, क्षुरि का प्रयोग, गलपाश होता है परन्तु द्वारा अपने आत्मा को शरीर से पृथक् कर देते हैं, उन ग्रात्मघातियों का गमन प्रपश्य कहा है? सुनिए— [ २१४ ]
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड सूर्य्यानाम ते लोका अन्धेन तमसावृत्ता । आत्मगति निमित्तानि तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनोजनाः ॥ ( ई ० ३ ) । आत्मा ज्योतिर्मय है, ज्योति ही इसका जीवन है, जैसा कि स्वर्गगति प्रकरण में स्वरूप बतलाते हुए स्पष्ट किया जा चुका है । आत्मा का प्रभव ' सूर्य्यं श्रात्मा जगतस्तस्थुषश्च पश्वज्योति का मन्त्रवर्णन के अनुसार ज्योतिर्मय सूर्य्यं माना गया है । इस ज्योतिर्म्मय सूर्यांशभूत ज्योतिर्म्मय ' इत्यादि को शरीर से पृथक् कर देना प्रकाशात्मक सूर्य्यलोक से विरोध करना है अतएव यह आत्मा आत्मा न जाकर सूर्य से विरुद्ध उस दिशा की ओर अनुगमन करता है जहाँ सौर प्रकाश सूर्य की ओर लोक का प्रलोक ( प्रकाश ) से सम्बन्ध है, आलोक का सूर्य ( सौरज्योति ) से का सर्वथा अभाव है । तक सौर आलोक ( प्रकाश ) रहता है, वहीं तक लोकसत्ता मानी गई है । इस आलोक सम्बन्ध के है अतएव जहाँ अन्धकारमय अलोक है । अलोक तथा आलोकमय लोक दोनों की सीमा ही ' लोकालोक बाहर निषिद्ध नाम से प्रसिद्ध हैं । आत्मघाती इसी स्थान का पात्र बनता है । ' ( लोक- अलोक ) समवलय मुक्ति का अधिकारी विदेहमुक्त पुरुष कही न जाकर यहीं चिज्ज्योति में विलीन है । इधर यह आत्मघाती जाता अवश्य है परन्तु प्रायुलयान्त वापस नहीं लौटता, हो जाता भाव है । नरकगामी पुनः जन्म धारण कर लेता है, मध्यगत्यनुयायी यहीं मर यही इस गति का अगति-करता है परन्तु यह आत्मघाती तो सदा के लिए अन्धलोक में विलीन हो जाता कर है पुनः । पुनः जन्म लिया अधोगति कहना अन्वर्थ बनता है । इसी आधार पर तो आत्महत्या सब से बड़ा तभी तो इसे परमा-विशद वैज्ञानिक व्याख्या ईशोपनिषद्विज्ञानभाष्य में दृष्टव्य है । समवलय पाप माना गया है, जिसकी में भी ऊर्ध्व गमन नहीं, इस परम अधोगति में भी ऊर्ध्वगमन नहीं । दोनों इस दृष्टि से समतुलित है । एक( समवलय ) प्रगति परमोत्तमा है, एक ( सूर्य ) प्रगति परमाधमा है । जिन गतिभावों का अब तक विश्लेषण हुआ है, उन सब की जैसा कि प्रकरणारम्भ में स्पष्ट किया जा चुका है । अपरामुक्तिलक्षण मूलप्रतिष्ठा ब्रह्मगति कर्म्म ही माना गया है, देवगति, पितृगतिलक्षणा पितृगति, चतुरशीतिनरकलक्षणा, यमगति ये चार गतियाँ , सप्तदेवस्वर्गग तिलक्षणा नुसार क्रमश: ' ब्रह्मपथ, देवपथ, पितृपथ, यमपथ ' हैं । इन चारों लोकात्मक ही प्रक्रान्त परिभाषा -कर्म्माश्वत्थ था, कर्म्माश्वित्थ प्रतिष्ठारूप ब्रह्माश्वत्थ का आगे के परिलेखों पथों का, गति - प्रधारभूत से भलीभाँति स्पष्टीकरण हो जाता है--[ २१५ ]
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* । पन्थाः देवयानः — यज्ञप्रदेशः नवाह – सौरज्योतिर्म्मयः -विद्यांसमुच्चितकर्मानुगतः – १ । पन्थाः पितृयारणः : शनिमण्डलप्रदेश – तमोमयः — विद्यानिरपेक्षकर्मानुगतः - २ ४ .: ' ' स्तप्तोमप्रदेश – सौरज्योतिर्म्मयः -विद्यासमुच्चितप्रवृत्तिकर्मानुगतः १ [ २१६ ] ३ ' -प्रदेशः ' प्रद्यौः –: चान्द्रज्योतिर्मय -विद्यानिरपेक्षप्रवृत्तिसत्कर्मानुगताः २ श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड १ ' ) देवपथः ' देवयानान्तर्गतो देवस्वर्गगतिनिमित्तभूतः ( → २ ।' ) ३ पितृपथः '-पितृस्वर्गगतिनिमित्तभूतः ( पितृयारणान्तर्गतः → विद्यासापेक्षनिवृत्तिसत्कर्म्मानुगतः १--: ' पञ्चदशाहयज्ञप्रदेश '-ज्ञानज्योतिर्लक्षणः विद्यानिरपेक्षनिवृत्तिसत्कर्मानुगतः २ -२ १ लौकिकनिवृत्तिसत्कर्मानुगतः - ३ ) ब्रह्मपथः - ' → -देवयानान्तर्गतो क्रममुक्तिगतिनिमित्तभूतः ( कम्र्मानुगतः लौकिकनिरर्थक - १ लौकिकविरुद्धकर्मानुगतः २-लौकिकस्वार्थकर्मानुगतः - ३ * ' । ) ४ यमपथः - ' पितृयाणान्तर्गतो नरकगतिनिमित्तभूतः ( : शनिप्रदेश -तपोमयः दिगनुगतः सूर्य्यविरुद्ध -अज्ञानमयः → श्रात्मगतिनिमित्तानि
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड श्रात्मगतिनिमित्तानि ब्रह्मापत्थ ईश्वरः ॥ ' ऊर्ध्वमूल मधः शाखमश्वत्थं प्राहुख्ययम् ॥ छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ यस्मात् बातीत: परं ना s परमस्ति किञ्चित्-वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येक--श्रश्वत्थ देवसदनस्तृतीयस्याऽमृतोदिवि ऊर्ध्वमूलो safe शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः परात्परः तस्मिन् लोकाः श्रिताः सर्वे तदुनात्येति कश्चन? प्रजापतिश्च परमेष्ठी च शृङ । इन्द्रः शिरः । द्यौ रुत्तरहनुः पृथिव्यधर हनुः । अग्निर्ललाटम्, यमः कृकाटम् । सोमोराजा मस्तिष्कः । स्वयंभूः प्रजापतिः सत्यः क्षर ब्रह्मा अक्षर : परमेष्ठी Samar • यज अक्षरः ( अथवं अ १ ) विश्वातीत परात्पर चैतन्यतत्व ही स्वयम्भू प्रजापति, सत्य, क्षर तथा अक्षर ब्रह्मा के द्वारा परमेष्ठी यज्ञ एवं विष्णु-ग्रक्षर तत्वों से संक्रमित होता हुआ अग्नि, पृथिवी, इन्द्र, सूर्य यादि क्षर- प्रक्षर तत्वों में परिणत हो जाताहै यही ईश्वररूप मूल ब्रह्मा है । सत्य स्वयंभूः सप रणन परमेषी मह स्व सूर्य भुवो भू - पृथिवी श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर ।
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड कम्मश्वत्थ आत्मगतिनिमित्तानि अपरा काशोकम कर्म्मात्मा शुभाशुभ कर्म्म संस्कारानुसार स्वर्ग - नरकादि लोक विशेषों में यावत् संस्कार मुक्ति पथ्यंन्त प्रतिष्ठित रहता हुया क्षयानन्तर पुनः भूपिण्ड पर योनि विशेषों में जन्म धारण कर लेता है । इस कम्मंगति में पुनः पुनरावर्तन है । यही गति कर्म्मसंस्कार ' संसृतिगति ' ( संसरणशीला संसारगति ) कहलाई है । इस गति में जन्म - मृत्यु चक्र से छुटकारा पाना असम्भव ' कम्मश्वत्थगति ' कहलाई है अर्थात् कम्मश्वत्थ से सम्बन्ध रखने वाली संमृतिगतिलक्षण क्रमगति है ही । यही ' कमंगति गति ' है वेद । विज्ञान में श्रीवासचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर ।