पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 11–20

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 11–20

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[ २ ] श्रीस्वामी दिव्यानन्दजी महाराज ( पूर्व बा ० देवकीनन्दन गुप्त वानप्रस्थी ) ( संयोजक पातञ्जलयोगप्रदीप- प्रकाशन- प्रबन्ध परिषद् ) सन् १ ९ ३ ९ के अप्रैल मासमें स्वर्गीय लाला रघुवरदयालजी मैजिस्ट्रेटकी प्रेरणासे श्रीस्वामी ओमानन्दजी महाराज, स्वर्गीय लाला प्यारेलालजी रिटायर्ड डिस्ट्रिक्ट ऐंड सेशन जज, ब्रह्मचारी शिवचरणजी नगीनानिवासी और मैं रामगढ़ जिला नैनीताल गये । वहाँ हम ' श्रीनारायण स्वामी आश्रममें ' ठहरे । वहाँके शान्त वातावरणमें श्रीस्वामी ओमानन्दजी महाराजने दो बजे अपना मौनव्रत खोलनेके पश्चात् एक घंटा प्रतिदिन योगदर्शनका प्रवचन करना स्वीकार किया । प्रवचन समाप्त होनेपर लाला रघुवरदयालजीकी इच्छा हुई कि जनताकी जानकारीके लिये योग - दर्शनके सिद्धान्त बहुत संक्षिप्तरूपमें जनताके समक्ष रखे जायँ । अतः उन्होंने एक छोटी - सी पुस्तक लिखी और उस पुस्तकको श्रीस्वामीजी महाराजकी ओरसे छपवानेका विचार प्रकट किया । स्वामीजीने कहा कि इससे कुछ लाभ न होगा; अच्छा तो यह होगा कि पुस्तक पर्याप्त विस्तृत हो । लालाजीके इच्छानुसार स्वामीजीने एक घंटा प्रतिदिन मौन खोलनेके पश्चात् लिखवाना शुरू कर दिया । परंतु ऐसा करनेसे पूर्व पूज्यपाद गुरुदेवजी श्री १०८ स्वामी सोमतीर्थजी महाराजकी स्वीकृति आवश्यक समझी गयी । गुरुदेवजी महाराजका उत्तर आया कि भाषाटीकाएँ बहुत हैं, अतः इससे कुछ लाभ न होगा । यदि टीका विशेष महत्त्वकी हो तो कोई आपत्ति नहीं है । स्वामीजी गुरुदेवजीके आदेशके अनुसार अपने अनुभवके आधारपर प्रतिदिन एक घंटा लिखाते रहे । ब्रह्मचारी शिवचरणजी और लाला रघुवरदयालजी लिखते थे । लिखनेके पश्चात् दोनों मिलाकर भूलोंको ठीक कर लेते थे । कुछ दिनोंके पश्चात् बाबू गंगाप्रसादजी चीफ जस्टिस भी रियासत टिहरीसे रिटायर्ड होकर वहाँ आ गये । पहाड़से नीचे उतरनेपर यह उचित समझा गया कि छपवानेसे पूर्व गुरुजी महाराज पुस्तकको एक बार सुन लें । स्वास्थ्य अत्यन्त खराब होनेपर भी गुरुजी महाराज दिनमें अवकाश न मिलनेके कारण रातके समय सुनते रहे और अनुभवके आधारपर यथा - तथा संशोधन कराते रहे । यह भी उचित समझा गया कि सूत्रोंकी व्याख्या व्यासभाष्यके आधारपर की जाय और जनता लाभके लिये जहाँ आवश्यक हो भोजवृत्ति, विज्ञानभिक्षुके योगवार्त्तिक तथा वाचस्पति मिश्रकी टीका भी दी जाय । कुछ मित्रोंके अनुरोध करनेपर हिप्नोटिज्म ( Hypnotism ), मेसमेरिज्म ( Mesmerism ) आदि एवं. उत्तरायण, दक्षिणायन आदिकी यथास्थान व्याख्या भी कर दी गयी और हठयोगकी षट् क्रियाएँ तथा प्राणायाम, आसन, मुद्रा आदिका विस्तारसे वर्णन कर दिया गया, जिससे पाठकोंको दूसरी पुस्तकोंका सहारा ढूँढ़ना न पड़े । प्रत्येक पादके अन्तमें उपसंहारके रूपमें यह बतला दिया गया कि उसमें क्या - क्या विषय है । स्वामीजी महाराजको बहुत - सी अनुभूत ओषधियाँ साधुओं, महात्माओंसे प्राप्त हुई थीं तथा उन्होंने स्वयं अनुभव किया था और कराया था । साधकोंके हितार्थ कुछ मित्रोंके आग्रहसे उनको भी यथास्थान प्रकाशित करा देना आवश्यक समझा गया । पुस्तकके प्रकाशनका कार्य एक प्रकाशन- प्रबन्ध - परिषद्के अधीन कर दिया गया, जिसके निम्नलिखित सभासद् थे-१- श्री १०८ स्वामी सोमतीर्थजी महाराज २- श्रीस्वामी ओमानन्दजी तीर्थ ३ - रायबहादुर श्रीगंगाप्रसादजी एम ० ए ० रिटायर्ड चीफ जस्टिस टिहरी गढ़वाल ४- श्री बा ० प्यारेलालजी रिटायर्ड डिस्ट्रिक्ट ऐंड सेशन जज ( स्वर्गीय ) ५ - श्री ला ॰ रघुवरदयालजी रिटायर्ड मैजिस्ट्रेट ( स्वर्गीय ) ( ७ )

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६ - श्री ला ॰ हरप्रसादजी एम् ए ०, एल् एल् बी ०, दिल्ली ७- श्री मास्टर बाबूप्रसादजी कोषाध्यक्ष, सेंट्रल को - ऑपरेटिव बैंक, अजमेर ८ - श्री बा ॰ जगदीशप्रसादजी एम् ० ए ०, सम्पादक प्रदीपप्रेस, मुरादाबाद ९- श्री बा ० देवकीनन्दनजी गुप्त वानप्रस्थी ( वर्तमान स्वामी श्रीदिव्यानन्दजी ) श्री ला ॰ प्यारेलालजी तथा ला ॰ रघुवरदयालजीने पुस्तकके प्रकाशनार्थ सौ - सौ रुपये प्रदान किये । पुस्तकको अङ्कोंके रूपमें छपवाना आरम्भ किया गया । किंतु कुछ अङ्कोंके निकल जानेके पश्चात् बड़ी कठिनाईका सामना करना पड़ा । कुछ मित्रोंने सलाह दी कि कार्यको बंद कर दिया जाय, परंतु स्वामीजीको यह असह्य था कि कुछ ग्राहकोंसे पूरी पुस्तकके दाम लेकर उन्हें थोड़े - से अङ्क दिये जायँ । कुछ मित्रोंकी सहायतासे ऋण लेकर कार्य पूरा हो पाया । परंतु प्रेसके ऋणसे सर्वथा मुक्त करवानेका श्रेय श्री ला ० ब्रजलालजी Inspector of schools D. A. V. College विभागको है । पुराने पुस्तक - विक्रेताओंका अनुमान था कि पहला संस्करण निकलनेमें ८-१० वर्ष लग जायँगे, परंतु जनताने इसे इतना पसंद किया कि लगभग एक वर्षमें ही सब प्रतियाँ समाप्त हो गयीं और माँगको देखते हुए दूसरे संस्करणका निकालना अनिवार्य हो गया । किंतु युद्धके कारण कागजके न मिलनेसे यह कार्य स्थगित करना पड़ा । स्वामीजी महाराजने इस अवसरका लाभ उठाते हुए पुस्तकमें कई स्थानोंपर अधिक विस्तारसे व्याख्या कर दी है और कुछ चित्र भी दे दिये हैं । विशेष वक्तव्य और विशेष विचार उनके अपने अनुभवके आधारपर हैं, जिनसे पाठकोंको विशेषरूपसे लाभ उठाना चाहिये । हम उन सब महानुभावोंके अत्यन्त आभारी हैं, जिन्होंने इस पुस्तकके प्रकाशनमें हमारी सहायता की है । [ ३ ] श्री बा ० गंगाप्रसादजी एम ० ए ०, एम् ० आर ० ए ० एस्. ( रायबहादुर ), रिटायर्ड चीफ जस्टिस, टिहरी गढ़वालराज्य, भूतपूर्व प्रधान सार्वदेशिक आर्य - प्रतिनिधि - सभा । श्रीस्वामी ओमानन्दतीर्थकृत पातञ्जलयोगप्रदीप भाष्यके पहले संस्करणका जनताने अच्छा मान किया । पहला संस्करण भी एक प्रकारसे सर्वाङ्गपूर्ण था । श्रीस्वामीजीने दूसरे संस्करणमें कई विषय बढ़ा दिये हैं । योगसम्बन्धी शायद ही कोई विषय हो, जो ग्रन्थके भीतर न आ गया हो । षड्दर्शन - समन्वयका विषय परि-वर्द्धित करके बहुत स्पष्ट कर दिया है । आशा है कि योग - साधनके इच्छुक और साधक ग्रन्थसे बहुत लाभ उठायेंगे । [ ४ ] ( महामहोपाध्याय डॉ ॰ गोपीनाथजी कविराज, एम् ० ए ०, डी ० लिट्, वाराणसी ) श्रद्धेय श्रीओमानन्द स्वामीजीकृत पातञ्जलयोगप्रदीप नामक ( द्वितीय संस्करण ) ग्रन्थ देखकर प्रसन्नता हुई । इस ग्रन्थमें पातञ्जलयोगसूत्रोंका भावार्थ व्यास - भाष्य, तत्त्व - वैशारदी, भोजवृत्ति तथा योग - वार्तिकके अनुसार विस्तृत रूपसे हिंदीमें संकलित किया गया है । योग - मार्गके साधकोंके लिये उपयोगी बहुत - से विषय चित्रादिकोंके साथ इसमें संनिविष्ट हुए हैं । इसमें उपनिषद् और भारतीय दर्शनोंके विभिन्न तत्त्वोंका आलोचन भी प्रासंगिक रूपमें निपुणताके साथ किया गया है । इसकी भाषा सरल तथा सुगम है और व्याख्याकारकी तत्त्वविश्लेषण - प्रणाली भी अत्यन्त चित्ताकर्षक है । ग्रन्थारम्भसे पहले ग्रन्थकारका लिखा हुआ षड्दर्शन - समन्वय भी इसमें विस्तृत भूमिका रूपमें दिया गया है । इससे ग्रन्थकी उपयोगिता और भी बढ़ गयी है । इस पुस्तकमें कुछ अनुभूत ओषधियोंका विवरण भी दे दिया गया है । आशा है, योग - तत्त्व-जिज्ञासु, ज्ञानिसमाज तथा विद्वद्गोष्ठीमें इस ग्रन्थका समुचित आदर तथा बहुल प्रचार होगा । ( ८ )

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ब्र ० स्वामी श्रीओमानन्दतीर्थजी

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II ( चतुर्थ संस्करणके सम्बन्धमें ) ग्रन्थकारका वक्तव्य पातञ्जलयोगप्रदीपका यह चौथा संस्करण पाठकोंके समक्ष आ रहा है । प्रथम संस्करणकी छपाईका कार्य सन् १ ९ ४१ में बिना किसी साधन और सामग्रीके अङ्कोंके रूपमें निकालना आरम्भ किया गया था । बीच - बीचमें कई प्रकारकी कठिनाइयाँ उपस्थित होती रहीं । वे सब जिस परम गुरु परमेश्वरकी प्रेरणासे और जिसके समर्पणरूपमें यह कार्य किया गया था, उसीकी अपार और अद्भुत शक्तिद्वारा दूर होती रहीं और अन्तमें मार्च १ ९ ४२ को यह पुस्तकरूपमें तैयार हो ही गयी । इसके प्रकाशन - प्रबन्ध - परिषद् के सदस्योंको प्रेस तथा अन्य सज्जनोंके ऋण चुकानेके सम्बन्धमें अत्यन्त चिन्ता थी, पर एक वर्षके अंदर ही पुस्तककी इतनी माँग बढ़ी कि न केवल उस ऋणका ही निबटारा हो गया प्रत्युत लगभग सारी पुस्तकें समाप्त हो गयीं और सन् १ ९ ४३ में ही दूसरी आवृत्ति निकालनेकी आवश्यकता प्रतीत होने लगी । उस भयंकर युद्धके समयमें इतने बड़े धार्मिक ग्रन्थका बिना किसी बाह्य सहायताके निकालना असम्भव था । सन् १ ९ ४६ में युद्धकी समाप्तिपर ऐसा प्रयत्न किया गया कि धार्मिक ग्रन्थ छपवानेके लिये जो दानियोंके कई ट्रस्ट हैं, उनमेंसे कोई इसको छपवाकर कम - से - कम मूल्यपर जनतातक पहुँचा दे, अथवा किसी ऐसे दानी महानुभावकी सहायतासे जो अपने रुपयोंको इस प्रकारके आध्यात्मिक कार्योंमें लगाना चाहते हैं थोड़े दामोंमें पाठकोंतक पहुँच सके । इसमें सफलता प्राप्त न होनेपर दूसरे संस्करणको " आर्यसाहित्य मण्डल, अजमेर " को जो इस प्रकारके धार्मिक ग्रन्थ छापनेमें सराहनीय कार्य कर रहा है; इस विश्वासपर सौंप दिया गया कि वह इसको अधिक - से - अधिक उपयोगी और सुन्दर बनाते हुए कम - से - कम दामोंमें सर्वसाधारणके हाथोंमें पहुँचाने का यत्न करेगा । तीसरा संस्करण गीताप्रेस, गोरखपुरद्वारा उत्तम - से - उत्तम रूपमें और कम - से - व दामोंमें गत -कम अगस्त १ ९ ५ ९ ई ० में ५००० की संख्यामें प्रकाशित हुआ था । किंतु पुस्तककी माँग इतनी अधिक हुई कि प्रकाशकको जनवरी १ ९ ६० ई ० के आरम्भमें ही चौथा संस्करण निकालनेकी आवश्यकता प्रतीत होने लगी । नये संस्करणके मुद्रणका कार्य प्रारम्भ कर दिया गया परन्तु अनेक कठिनाइयोंके कारण छपाई शीघ्र न हो सकी । इस चतुर्थ संस्करणमें कई स्थलोंपर विषयको अधिक स्पष्ट करनेके उद्देश्यसे परिवर्द्धन किया गया है । आशा है पाठकगण इससे अधिक - से - अधिक लाभ प्राप्त कर सकेंगे । षड्दर्शनसमन्वय - योगके दार्शनिक स्वरूपको समझनेके लिये तो दर्शनोंका ज्ञान आवश्यक है ही; 1 ' किंतु दर्शनोंका यथार्थ ज्ञान भी योगद्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है, इसके बिना उसको बोध करानेवाले बाह्य स्थूल शब्द आदि बुद्धिके केवल व्यायामरूप साधन ही रहते हैं । प्राचीन विशाल हृदय व्यापक दृष्टिवाले ऋषि समत्व ( समन्वय ) बुद्धिसे युक्त होते थे । यथा- - वेदोंके कर्मकाण्ड तथा ज्ञानकाण्डमें जो विरोध प्रतीत होने लगा था, उसीके अविरोधकी स्थापना और समन्वय - साधनके उद्देश्यसे श्रीजैमिनिजीने पूर्वमीमांसा और श्रीव्यासजीने उत्तरमीमांसाकी रचना की थी, किंतु कई नवीन संकीर्ण विचारवाले व्यक्ति नाना प्रकारके. भेद - भाव उत्पन्न करके हिंदुओंके व्यक्तिगत, सामाजिक, धार्मिक और राष्ट्रीय अवनति और पतनका कारण हुए हैं, वे ही प्राचीन ऋषियोंके भाष्योंमें भी परस्पर भेद और विरोधका विष फैला गये हैं । आधुनिक कालमें महर्षि दयानन्दने सबसे प्रथम इस त्रुटिका अनुभव किया और दर्शनोंके अविरोध तथा समन्वय - साधनपर पूरा जोर दिया, किंतु उनके पश्चात् इस उद्देश्यकी पूर्तिके लिये कोई विशेष प्रयत्न नहीं किया गया । न्याय, वैशेषिक, सांख्य और योग - इन चारों दर्शनोंका मुख्य उद्देश्य प्रकृतिके सर्वथा परित्यागपूर्वक शुद्ध अर्थात् परब्रह्मको प्राप्त करना है, न कि अपर ब्रह्म अर्थात् ईश्वरके खण्डनमें जैसा कि सामान्यतया उनपर दोष आरोपित किया गया है । सांख्य और योग ही दो प्राचीन निष्ठाएँ हैं और वास्तवमें यही प्राचीन वेदान्त ( फिलासफी ) है, जिसका श्रुतियों ( उपनिषदों ) और स्मृतियोंमें स्थान - स्थानपर वर्णन ( १० )

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पाया जाता है । गीता तो सांख्ययोगका ही मुख्य ग्रन्थ है । सांख्य और योगके आभ्यन्तर रूपके अतिरिक्त कार्यक्षेत्रमें उनका बाह्य व्यावहारिक रूप कैसा होना चाहिये, इस बातको गीतामें विशेषताके साथ स्पष्ट शब्दोंमें दर्शाया है । उदाहरणार्थ, जहाँ ईश्वर - समर्पणद्वारा निष्काम कर्मयोग बतलाया गया है, वहाँ योगकी निष्ठा है और जहाँ ' गुण ही गुणोंमें वर्त रहे हैं, आत्मा अकर्त्ता हैं ' इस भावनाद्वारा ज्ञानयोग बतलाया गया है, वह सांख्यनिष्ठा है । इसी प्रकार जहाँ - जहाँ ' अन्यादेश ' अर्थात् प्रथम पुरुष और मध्यम पुरुषद्वारा परमात्माकी उपासना बतलायी गयी है, वह योगकी निष्ठा है और जहाँ ' अहङ्कारादेश ' और ' आत्मादेश ' अर्थात् उत्तम पुरुष और आत्माद्वारा परमात्माका बोध कराया गया है वह सांख्यनिष्ठा है, इत्यादि । जैन और बौद्ध भारतवर्षके दो प्रसिद्ध धर्मोके प्रवर्तक आचार्य उच्चकोटिके अनुभवी योगी हुए हैं । सांख्ययोगके सदृश इनका ध्येय भी असम्प्रज्ञात समाधि अर्थात् शुद्ध परब्रह्म परमात्माकी ही प्राप्ति है । बाह्य स्थूल शब्दोंके भ्रमजालमें फँसकर इनके वास्तविक स्वरूपको समझनेमें भी बहुत धोखा खाया गया है । ये भी एक प्रकारसे हमारे दर्शन - समन्वयके अन्तर्गत हो सकते हैं । अर्थात् जैसे जलके सर्वत्र पृथ्वीमें व्यापक हुए भी पृथ्वीसे पृथक् उसके शुद्ध स्वरूपसे ही पिपासाकी तृप्ति हो सकती है, इसी प्रकार चेतन तत्त्वके सर्वत्र व्यापक होते हुए भी उनका लक्ष्य उसके शुद्ध स्वरूप परमात्मा - परब्रह्मको प्राप्त करना है । इससे उसके शबल - स्वरूप अपर ब्रह्म - ईश्वरका निराकरण न समझना चाहिये, प्रत्युत उन्होंने भी किसी रूपमें इस लक्ष्यकी प्राप्तिमें उसके अपर स्वरूपका ही सहारा लिया है । योग, किसी स्थान - विशेषपर जिसको देश कहा गया है ( देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ), अपर ब्रह्म ईश्वरका सहारा लेकर ( ईश्वरप्रणिधानाद्वा ) त्रिगुणात्मक स्थूलभूत, तन्मात्रोंतक सूक्ष्मभूत, अहङ्कार और चित्तके आवरणोंको क्रमशः वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मितानुगत समाधिद्वारा हटाता हुआ विवेकख्यातिद्वारा गुणोंको सर्वथा पृथक् करके असम्प्रज्ञात समाधिमें शुद्ध परब्रह्म परमात्म - स्वरूपमें अवस्थिति कराता है । इस सूक्ष्मदृष्टिसे उनके मन्तव्य और साधनोंमें भी अधिक अन्तर नहीं प्रतीत होगा । योगमार्ग में प्रवेशसे पूर्व संकीर्ण विचारोंके कूपमण्डूक न रहकर अभ्यासीगण हृदयकी विशालता की दृष्टिसे यह देख सकें कि किस प्रकार वैदिक दर्शनरूपी नदियाँ विश्वरचयिता पिताके अनन्त ज्ञानके अथाह सागरमें समावेश करती हैं, इस उद्देश्यसे षड्दर्शन - समन्वयकी ' पातञ्जलयोगप्रदीप ' का भूमिका रूप बनाया गया है । अखिल भारतवर्षीय आर्यकुमार- परीक्षा - परिषद्ने ' षड्दर्शन - समन्वय'को अपनी सिद्धान्त - शास्त्रकी परीक्षामें रख लिया । अतः उनके आग्रहसे षड्दर्शनसमन्वयको पृथक् पुस्तकरूपमें शाहपुरा - दर्बार स्वर्गीय श्रीराजा उम्मेदसिंहजीने छपवा दिया है । प्रथम संस्करणकी अपेक्षा दूसरे संस्करणमें षड्दर्शन- समन्वय द्विगुणित हो गया है; क्योंकि दर्शनोंके वास्तविक स्वरूपको विस्तारके साथ दिखलाने तथा नाना प्रकारकी प्रचलित शङ्काओंके संतोषजनक समाधान करनेका इसमें पूरा यत्न किया गया है । पातञ्जलयोगप्रदीप - कई योगके प्रेमी सज्जनोंका विशेषकर प्रोफेसर विश्वनाथजी विद्यालङ्कार भूतपूर्व उप - आचार्य गुरुकुल काँगड़ीका आग्रह था कि सूत्रोंके भावों तथा कहीं - कहीं व्यासभाष्यको भी अधिक - से - अधिक खोलनेका यत्न किया जाय । सूत्रोंकी व्याख्यामें विशेषरूपसे व्यासभाष्य और भोजवृत्तिको जिनका उचित स्थानोंमें टिप्पणीके रूपमें भाषार्थ भी उद्धृत किया गया है तथा सामान्य - रूपसे विज्ञानभिक्षुके योगवार्त्तिक ( जिसके बहुत - से सूत्रोंका जहाँ आवश्यकता प्रतीत हुई है टिप्पणीमें भी भाषार्थ दे दिया गया है ), वाचस्पति मिश्रके तत्त्ववैशारदी तथा और बहुत - से प्राचीन और नवीन भाष्योंको दृष्टिगोचर रखा गया है । विशेष विचार और विशेष वक्तव्यमें अपने स्वतन्त्र विचारोंको लेते हुए प्रसङ्गप्राप्त बहुत - से दार्शनिक और योग - सम्बन्धी विषयों तथा उपनिषदोंके रहस्योंको खोलनेका यत्न किया गया है । योगदर्शनके दो उच्चकोटिके भाष्यकार विज्ञानभिक्षु और वाचस्पति मिश्रके भाष्योंमें जहाँ कहीं परस्पर विरोध और अर्थोंमें अयुक्ति प्रतीत हुई है, उसका भी युक्ति और प्रमाणसहित स्पष्टीकरण आवश्यक समझा गया है । यथा, स ० पा ० सूत्र ७ सूत्र १ ९ और सूत्र ४६ का वि ० व ०, सा ० पा ० सूत्र ४ का वि ॰ व ॰ । ( ११ )

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साधारण मनुष्य स्थूल शरीरद्वारा कोई विचित्र क्रिया तथा भौतिक जगत्से आश्चर्यजनक चमत्कार अथवा बाह्य व्यवहारसे सम्बन्धित सिद्धि और विभूति आदिको सम्बन्ध रखनेवाले समझते हैं, उनका यह बाह्य - दृष्टि हटाकर यह निर्देश करानेके उद्देश्यसे कि योगका वास्तविक ही योगका गौरव अन्तर्मुख होना है, समाधिपाद सूत्र १८ के वि ० व ० में योगकी चार भूमियों - वितर्क, विचार स्वरूप अस्मिता तथा विवेक- ख्याति, पर - वैराग्य, असम्प्रज्ञात - समाधि और कैवल्य तथा उनके अन्तर्गत, चन्द्रलोक आनन्द, ( सूक्ष्मलोक ), आदित्यलोक ( कारणजगत् ), क्रममुक्ति, सद्योमुक्ति और अवतार आदिका भी वर्णन आवश्यक समझा गया है । समाधिपाद सूत्र ३४ के वि ० व ० में सूक्ष्म प्राणोंके वर्णनके साथ - साथ सूक्ष्म नाड़ियों, स्वरों, तत्त्वों, चक्रों और कुण्डलिनी शक्तिका भी दिग्दर्शन करा देना आवश्यक था । चक्रोंके सम्बन्धमें बहुत - सी ऐसी बातें, जिनका राजयोगसे कोई सम्बन्ध नहीं है और काल्पनिक हैं, केवल तान्त्रिक विचारोंकी जानकारीके उद्देश्यसे लिखी गयी हैं । तान्त्रिक ग्रन्थ और तान्त्रिक सम्प्रदायोंके सम्बन्धमें हम किसी प्रकारकी विवेचना करना उचित नहीं समझते । निःसन्देह इनमेंसे कई एककी तो पञ्चमकारके सम्बन्धमें बड़ी उच्च आध्यात्मिक धारणा है; यथा- ' - " पुण्यापुण्य पशुको ज्ञानखड़से मारकर पर - तत्त्वमें चित्तलयका नाम ' मांस ' भक्षण है, इन्द्रियोंका मनसे निरोध कर आत्मामें संयोजन करना ' मत्स्य ' भोजन है । कुण्डलिनी शक्तिको जाग्रत् कर सहस्त्रदलस्थित शिवके साथ सोमरसके उत्पादनका नाम ' मैथुन ' है इत्यादि " । हिंदुओंमें वैष्णव, शैव और शाक्त- तीन प्रकारके तान्त्रिक ग्रन्थ तथा वैष्णव, शैव और शाक्त- - -तीन प्रकारके तान्त्रिक सम्प्रदाय हैं तथा उनके अन्तर्गत और बहुत - से अवान्तर भेद हैं । जैन और बौद्धोंमें भी बहुत - से तान्त्रिक ग्रन्थ और तान्त्रिक सम्प्रदाय हैं । इनके अतिरिक्त और बहुत - से स्वतन्त्र तान्त्रिक सम्प्रदाय और पद्धतियाँ प्रचलित हैं । लगभग सभी तान्त्रिक सम्प्रदाय शुद्ध परब्रह्म परमात्मस्वरूपमें अवस्थितिकी अपेक्षा प्राकृतिक शक्तियोंकी प्राप्तिमें विशेष प्रवृत्ति रखते हैं । राजयोगके अध्यात्म - उन्नति चाहनेवाले साधकोंके लिये उनकी केवल उन्हीं बातोंको ग्रहण करना चाहिये, जो उनके अपने मुख्य उद्देश्यमें सहायक हो सकें । साधनपाद सूत्र ३० की व्याख्यामें जहाँ हमने योगियों तथा साधारण मनुष्योंके लिये व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक तथा अन्ताराष्ट्रिय सम्बन्धसे अहिंसा, सत्य आदि यमोंका आदर्श बतलाया है, वहाँ सूत्र ३१ के विशेष वक्तव्यमें राष्ट्रपतियोंके लिये जिनके ऊपर सारे राष्ट्र तथा मनुष्यसमाजका उत्तरदायित्व होता है, उनके लिये इसका क्या स्वरूप होना चाहिये, इसको महाभारत आदिके कई उदाहरणोंके साथ दर्शाया है तथा श्रीकृष्णजी महाराजने राष्ट्रके रक्षणार्थ कर्णपर्वमें जो सूक्ष्मदृष्टिका उपदेश दिया है, उसको भी उद्धृत कर दिया है । साधनपाद सूत्र १७, २६, २ ९ की टिप्पणियोंमें वैदिक दर्शनोंके चार प्रतिपाद्य विषयोंका बौद्धदर्शनके चार आर्य सत्योंके साथ, योगदर्शनके अष्टाङ्गयोगका बौद्ध दर्शनके अष्टाङ्गिक मार्गके साथ तथा योगके पाँच यमोंका बौद्धदर्शनके पञ्चशीलके साथ समन्वय दिखलाते हुए बौद्धधर्मके इन विषयोंपर यथोचित प्रकाश डाला गया है । तथा जैनधर्ममें जो पाँच यमोंका पाँच महाव्रतोंके नामसे जैनधर्मका आधारशिलारूप माना है उनको भी इन्हींकी प्राकृत भाषामें अर्थसहित दिखला दिया गया है । आध्यात्मिक विषयसे भौतिक शरीरका क्या सम्बन्ध है ऐसे विचार योगमार्गमें कोई स्थान नहीं रख सकते । आध्यात्मिक उन्नतिमें शरीर ही सबसे प्रथम और मुख्य साधन है । बिना स्वस्थ, स्वच्छ और निर्मल शरीरके योगमार्गकी प्रथम सीढ़ीपर भी पग धरना दुर्गम है । अतः शरीरके स्वच्छ, शुद्ध, निर्मल और नीरोग रखनेके चार उपाय सा ० पा ० सूत्र ३२ के वि ० व ० में विस्तारपूर्वक बतलाये हैं- ( १ ) हठयोगकी षट् क्रियाएँ, ( २ ) प्राकृतिक चिकित्सा, ( ३ ) सम्मोहन और संकल्प - शक्ति । उपर्युक्त तीनों साधन तभीतक काम दे सकते हैं जबतक कि शरीर और मन इनके करनेके योग्य स्वस्थ अवस्थामें हों । किंतु किसी ऐसी व्याधि आदि पीड़ाकी उपस्थितिमें, जब शारीरिक अथवा मानसिक शक्तियाँ इन क्रियाओंके करनेमें सर्वथा असमर्थ हो जायँ, तब ओषधियोंका ही सहारा लेना पड़ता है । इस मार्गमें प्रवेश करनेवाले लगभग ९ ० ( १२ )

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प्रतिशत किसी - न - किसी प्रकारकी व्याधि लिये हुए शरीरसे अस्वस्थ अवस्थामें ही देखे लिये सबसे प्रथम कार्य उन व्याधियोंको निवृत्त अथवा शिथिल करना होता है । प्राचीन समयमें जाते हैं, उनके पहाड़ोंमें रहनेवाले योगीजनोंके लिये वहाँसे प्राप्त होनेवाली जड़ी - बूटी आदिका ज्ञान रखना जंगलों और था, जिससे आवश्यकतानुसार उनको काममें लाया जाता था । किंतु इस समय न तो ऐसे स्थान आवश्यक होता उपयुक्त हो सकते हैं और न वहाँकी कठिनाइयोंको सहन करनेके योग्य शरीर रहे हैं । आधुनिक आसानीसे कालमें ओषधियोंमें भी नाना प्रकारके अन्वेषण किये गये हैं और उत्तम् - से - उत्तम ओषधियाँ हो सकती हैं, इसलिये हमने ऐसी ओषधियोंको, जिनको हमने अनुभवी संन्यासियों, हर महात्माओं स्थानपर, उपलब्ध डाक्टरों और वैद्योंसे प्राप्त किया है तथा जिनको हमने स्वयं अनुभव किया है अथवा कराया है, उपायरूप ( में लेखबद्ध कर दिया है । जिससे साधक अथवा पथदर्शक किसी योग्य वैद्य तथा डाक्टरकी अनुपस्थितिमें ४ ) आवश्यकतानुसार काममें ला सके । रोग तथा व्याधि एक प्रकारसे पापरूप है और ओषधि प्रायश्चित्तरूप; पूर्ण सावधानीपूर्वक यत्न होना चाहिये कि यह पाप निकट न आ सके, किंतु उसकी उपस्थितिमें प्रायश्चित्तरूप ओषधिसे बचनेके लिये नाना प्रकारकी युक्तियोंको ढूँढ़ना बुद्धिमत्ता नहीं है । इन चार उपायोंमेंसे ओषधियोंको साधनपादके अन्तमें परिशिष्ट भागमें दे दिया गया है । सा ० पा ० सूत्र ४० की व्याख्यामें जहाँ हमने ध्यानपर बैठनेके लिये कई उपयोगी आसनों और नियमोंका वर्णन किया है, वहाँ विशेष वक्तव्यमें ध्यानके उपयोगी स्थान आदिको बतलाकर सब प्रकारके बन्धों, मुद्राओं और आसनों तथा गुफामें लंबे समयतक बैठनेके नियमों आदिका वर्णन कर देना भी उचित समझा है; क्योंकि इनकी न केवल शरीरको स्वस्थ और नीरोग रखनेमें उपयोगिता है वरं वे नाड़ीशोधन और प्राणके उत्थानमें भी अत्यन्त सहायक होते हैं । सा ० पा ० सूत्र ४ ९ की व्याख्यामें प्राणायामका विस्तारपूर्वक वर्णन करनेके पश्चात् उसके विशेष वक्तव्यमें हठयोगकी पुस्तकोंके आठों प्रकारके प्राणायाम तथा उनके अन्तर्गत और बहुत - सी प्राणायामकी विधियों को भी दिखलाया गया है । सिद्धियों, विभूतियों और चमत्कारों आदिके सम्बन्धमें प्रचलित अन्धविश्वास और भ्रान्त ज्ञान हटाने के उद्देश्यसे वि ० पा ० सूत्र ६ के विशेष वक्तव्यमें संयमके वास्तविक स्वरूप तथा सदुपयोग और दुरुपयोगपर पूरी विवेचना की गयी है । विभूतिपाद सूत्र २६ के पिछले संस्करणमें टिप्पणीमें व्यासभाष्यका केवल शब्दार्थ ही दिया गया था, उसके सम्बन्धमें अपने विचारोंको सुरक्षित रखा गया था । कई महानुभावोंके आग्रहसे नये संस्करणमें उसका स्पष्टीकरण कर दिया गया है । विभूतिपाद सूत्र ३ ९ में उत्क्रान्ति शब्दको लेते हुए विशेष वक्तव्यमें देवयान, पितृयान, क्रममुक्ति, सद्योमुक्ति, अवतार आदि गूढ़ विषयोंके स्पष्टीकरणकी आवश्यकता समझी गयी है । कैवल्यपाद सूत्र ३४ के भोजवृत्तिमें योगके साथ सब दर्शनोंका समन्वय दिखलाया गया है । किसीको उसके द्वारा अन्य दर्शनोंके खण्डनकी शङ्का न होने पावे, इस हेतु उसका स्पष्टीकरण भी उचित समझा गया है । सूत्रोंके विशेष विचार और विशेष वक्तव्य अवश्य पढ़ने चाहिये, उनमें पाठकगण बहुत - सी उपयोगी और जानने योग्य बातोंको पायेंगे । सूत्रोंकी व्याख्यामें व्यासभाष्य, भोजवृत्ति और योगवार्त्तिक आदिकी सभी मुख्य बातें आ गयी हैं । टिप्पणियोंमें उनका भाषानुवाद केवल विशेष जानकारीके उद्देश्यसे किया गया है । योगवार्त्तिक जो किंचित् बड़ा और गूढ़ विषयक है केवल उच्च श्रेणियोंके पाठकोंके लिये है । इन टिप्पणियोंको यदि चाहें तो स्वेच्छानुसार छोड़ सकते हैं । बहुत - सी उपयोगी आवश्यक और जाननेयोग्य बातोंके बढ़ा देनेसे वर्तमान ग्रन्थ प्रथम संस्करणकी अपेक्षा लगभग दुगुना हो गया है । इस प्रकार जहाँ इस पातञ्जलयोगप्रदीपमें लगभग सभी आवश्यक विषयोंका संकलन किया गया है और केवल इस एक पुस्तकको रखते हुए अन्य बहुत - सी पुस्तकोंकी आवश्यकता नहीं रहती है, वहाँ बहुत - से सत्संगियों तथा अन्य कई प्रेमी सज्जनोंके विचारोंको दृष्टिमें रखते हुए दैनिक पाठके लिये " सांख्य - तत्त्व-( १३ )

पृष्ठ 18

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 18 का मूल पृष्ठ
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समास ' ' तथा योगदर्शनके अर्थसहित सूत्र गुटकारूपमें " सांख्ययोगसार " नामसे अलग छपवा दियेगये हैं । सारा ही मनुष्य - जीवन योगके अन्तर्गत है । इसलिये मनुष्य- जीवनसे सम्बन्ध रखनेवाले सारे विषयोंको यथोचित स्थानमें दर्शाया गया है । मनुष्योंकी प्रकृतियाँ और रुचियाँ भिन्न - भिन्न हैं । यह असम्भव है कि सारी बातें सब मनुष्योंको संतुष्ट कर सकें । अतः पाठक महानुभावोंसे निवेदन है कि नाना प्रकारके विचाररूपी पुष्पोंकी इस ग्रन्थरूपी वाटिकामेंसे अपने रुचिकर पुष्पोंकी सुगन्धको ग्रहण कर लें 1 । जो उनके दृष्टिकोणसे अनावश्यक अथवा दोषयुक्त प्रतीत हों, उनके प्रति उपेक्षावृत्ति द्वारा अपने उदार भावोंका परिचय दें 1 सारे ही विषयोंको स्वतन्त्र विचारोंके साथ युक्ति, अनुभूति और श्रुतिके आधारपर निष्पक्षभावसे उनके सूक्ष्म से सूक्ष्म रूपमें दर्शानेका यत्न किया गया है । आशा है पाठकगण साम्प्रदायिक पक्षपात तथा मत - मतान्तरोंकी संकीर्णताकी क्षुद्रतासे परे होकर हृदयकी विशालतामें प्रत्येक विषयपर अपनी स्वच्छ, निर्मल और सात्त्विक बुद्धिसे विवेकपूर्ण विचार करके वास्तविक लाभ उठायेंगे । कुछ बातोंको कई प्रकरणोंमें उद्धृत किया गया है । इसको पुनरुक्ति दोष नहीं समझना चाहिये । महत्त्वपूर्ण और गहन विषयोंको पाठकोंको हृदयङ्गम करानेके लिये ऐसा किया गया है जैसी कि धार्मिक ग्रन्थोंकी शैली चली आ रही है । जो महानुभाव इस ग्रन्थमें किसी प्रकारकी त्रुटियों और भूलोंके बतलाने, किसी स्थानपर न्यूनाधिक वा परिवर्तन करने अथवा अपने विशेष विचारोंके प्रकट करनेकी कृपा करेंगे, उनका बड़े आदर, सम्मान और धन्यवादके साथ स्वागत किया जायगा तथा इसके अगले संस्करणमें उनके सम्बन्धमें पूरा विचार किया जायगा । पाठकोंके सुभीतेके लिये ग्रन्थके अन्तमें चार परिशिष्ट दिये गये हैं । परिशिष्ट ( १ ) में सांख्य और योगदर्शनके मूल सूत्र, ( २ ) में वर्णानुक्रमसूत्रसूची, ( ३ ) में शब्दानुक्रमणी और ( ४ ) में विषयसूची है । आशा की गयी थी कि दूसरे संस्करणमें अशुद्धियाँ न होने पायेंगी, किंतु प्रेसवालोंके प्रयत्न करनेपर भी बहुत - सी अशुद्धियाँ रह गयी थीं और एक लंबा शुद्ध्यशुद्धिपत्र लगाना पड़ा था । इस संस्करणमें उन भूलोंको यथासाध्य सुधार दिया गया है । अन्तमें जिन महानुभावोंने इस ग्रन्थके तैयार कराने और प्रकाशन करानेमें किसी प्रकारकी भी सहायता दी है उनका धन्यवाद तथा जिन प्राचीन ऋषियों और वर्तमान समयके महापुरुषों और विद्वानोंके उच्च, पवित्र और रहस्यपूर्ण विचारोंसे इस ग्रन्थको सुशोभित किया गया है और उपयोगी बनाया गया है उनके प्रति कृतज्ञताका प्रकट कर देना अत्यन्त आवश्यक प्रतीत होता है । ओम् तीर्थ पातञ्जलयोगाश्रम, पुष्कर ( १४ )

पृष्ठ 19

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 19 का मूल पृष्ठ
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पातञ्जलयोगप्रदीप ANAN 000000000000000000000000In 000000000000 000000000000000 FISH पूज्यपाद योगिराज श्री १०८ श्रीयुत स्वामी सोमतीर्थजी महाराज

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पूज्यपाद योगिराज श्री १०८ श्रीयुत स्वामी सोमतीर्थजी महाराज का आशीर्वाद

क्लेशान्धकारनाशाय मुमुक्षूणां विमुक्तये ।

तत्त्वज्ञानप्रदानाय क्षमो योगप्रदीपकः ॥

( भूयात् ) क्लेशरूपी अन्धकारको नाश करनेके लिये तथा मुमुक्षुजनोंकी मुक्तिके लिये और तत्त्वोंका ज्ञान प्रदान करनेके लिये पातञ्जलयोगप्रदीप समर्थ हो । ( १६ )