पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 21–30
पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 21–30
पृष्ठ 21
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पातञ्जलयोगप्रदीप षड्दर्शनसमन्वय भूमिका पहिला प्रकरण वेद वेद ईश्वरीय ज्ञान है, जिसका प्रादुर्भाव ऋषियोंपर सृष्टिके आरम्भमें समाधिद्वारा होता है । द और अथर्ववेद १. मूल वेदमन्त्र – इन मन्त्रोंकी चार संहिताएँ हैं, जो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद कहलाती हैं । * इनकी ही पाठादि भेदसे ११३३ शाखाएँ कहलाती हैं । २. ब्राह्मणग्रन्थ — इनमें अधिकतर मूल वेदोंमें बतलाये हुए धर्म अर्थात् यज्ञादि कर्मों तथा विधि - निषेधकी विस्तृत व्याख्या और व्यवस्था है । ' ब्राह्मण ' नामकरणका कारण यह है कि इनका प्रधान विषय ब्रह्मन् ( बृह वर्धने, बढ़नेवाला अर्थात् वितान यज्ञ ) है । इनमेंसे चार प्रसिद्ध हैं — ऐतरेय ऋग्वेदका, शतपथ यजुर्वेदका, ताण्ड्यब्राह्मण सामवेदका और गोपथ अथर्ववेदका । ब्राह्मणग्रन्थोंमें कुछ अंश ऐसा भी सम्मिश्रित हो गया है, जो मूल वेदमन्त्रोंके आशयके विपरीत जाता है । ३. उपनिषद् — उपनिषद्का मुख्य अर्थ ब्रह्मविद्या है और यहाँ उपनिषद् ब्रह्मविद्या - प्रतिपादक ग्रन्थविशेषके हैं । इनमें अधिकतर वेदोंमें बताये हुए आध्यात्मिक विचारोंको समझाया गया है । इन्हींको, वेदान्त कहते हैं । इनमें मुख्य ग्यारह हैं – ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय श्वेताश्वतर, छान्दोग्य और बृहदारण्यक । दर्शन वेदोंमें बतलाये हुए ज्ञानकी मीमांसा दर्शनशास्त्रोंमें मुनियोंद्वारा सूत्ररूपसे की गयी है । दर्शन शब्दका जावे । अर्थ है ' दृश्यते अनेन इति दर्शनम् ' जिसके द्वारा देखा जाय अर्थात् वस्तुका तात्त्विक स्वरूप जाना " प्राणिमात्रकी दुःखनिवृत्तिकी ओर प्रवृत्ति " छोटे - से - छोटे कीटसे लेकर बड़े - से - बड़े सम्राट्तक प्रतिक्षण तीनों प्रकारके आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक दुःखोंमेंसे किसी - न - किसी दुःखकी निवृत्तिका ही यत्न करते रहते हैं; फिर भी दुःखोंसे छुटकारा नहीं मिलता । मृगतृष्णाके सदृश जिन विषयोंके पीछे मनुष्य उपस्थित सुख समझकर होते हैं- दौड़ता है, प्राप्त होनेपर वे दुःख ही सिद्ध होते हैं । इसलिये तत्त्वदर्शीके लिये निम्न चार प्रश्न लाम * चार उपवेद माने गये हैं— उपवेद ऋग्वेदका उपवेद अर्थवेद, यजुर्वेदका उपवेद धनुर्वेद, सामवेदका उपवेद गान्धर्ववेद, अथर्ववेदका आयुर्वेद | ( १ )
पृष्ठ 22
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पहिला प्रकरण ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ षड्दर्शन दर्शनोंके चार प्रतिपाद्य विषय १. हेय – दुःखका वास्तविक स्वरूप क्या है, जो ' हेय ' अर्थात् त्याज्य है? २. हेयहेतु – दुःख कहाँसे उत्पन्न होता है, इसका वास्तविक कारण क्या है, जो ‘ हेय' अर्थात् त्याज्य दुःखका वास्तविक ' हेतु ' है? ३. हान – दुःखका नितान्त अभाव क्या है, अर्थात् ' हान ' किस अवस्थाका नाम है? ४. हानोपाय — हानोपाय अर्थात् नितान्त दुःखनिवृत्तिका साधन क्या है? तीन मुख्य तत्त्व इन प्रश्नोंपर विचार करते हुए तीन बातें और उपस्थित होती हैं— १. चेतनतत्त्व: आत्मा, पुरुष ( जीव ) – दुःख किसको होता है? जिसको दुःख होता है, उसका वास्तविक स्वरूप क्या है? यदि उसका दुःख स्वाभाविक धर्म होता तो वह उससे बचनेका प्रयत्नही न करता । इससे प्रतीत होता है कि वह कोई ऐसा तत्त्व है, जिसका दुःख और जडता स्वाभाविक धर्म नहीं है । वह चेतनतत्त्व है । इस चेतन- I -आत्मा ( पुरुष ) के पूर्ण ज्ञानसे तीसरा प्रश्न ' हान ' सुलझ जाता है । अर्थात् आत्माके यथार्थरूपके साक्षात्कार- -'स्वरूपस्थिति ' से दुःखका नितान्त अभाव हो जाता है — २. जडतत्त्व: प्रकृति — इस चेतनतत्त्वसे भिन्न, इसके विपरीत, किसी और तत्त्वके माननेकी भी आवश्यकता होती है, जिसका धर्म दुःख है, जहाँसे दुःखकी उत्पत्ति होती है और जो इस चेतनतत्त्वसे विपरीत धर्मवाला है । वह जडतत्त्व है, जिसको प्रकृति, माया आदि कहते हैं । इसके यथार्थरूपको समझ लेनेसे पहला और दूसरा दोनों प्रश्न सुलझ जाते हैं । अर्थात् दुःख इसी जडतत्त्वका स्वाभाविक गुण है न कि आत्माका । जड और चेतनतत्त्वमें आसक्ति तथा अविवेकपूर्ण संयोग ही ' हेय ' अर्थात् त्याज्य दुःखका वास्तविक स्वरूप है और चेतन तथा जडतत्त्वका अविवेक अर्थात् मिथ्या ज्ञान या अविद्या ‘ हेयहेतु ' अर्थात् त्याज्य दुःखका कारण है । चेतन और जडतत्त्वका विवेकपूर्ण ज्ञान ' हानोपाय'-दुःखनिवृत्तिका मुख्य साधन है I ३. चेतनतत्त्व: परमात्मा, पुरुषविशेष ( ईश्वर, ब्रह्म ) – इन दोनों चेतन और जडतत्त्वोंके माननेके साथ एक तीसरे तत्त्वको भी मानना आवश्यक हो जाता है, जो पहले चेतनतत्त्वके सर्वांश अनुकूल हो और दूसरे जडतत्त्वके विपरीत हो, अर्थात् जिसमें पूर्ण ज्ञान हो, जो सर्वज्ञ हो, सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान् हो, जिसमें दुःख, जडता और अज्ञानका नितान्त अभाव हो, जहाँतक आत्माका पहुँचना आत्माका अन्तिम ध्येय है, जो ज्ञानका पूर्ण भण्डार हो, जहाँसे ज्ञान पाकर आत्मा जड - चेतनका विवेक प्राप्त कर सके और अविद्याके बन्धनोंको तोड़कर ' हेय ' दुःखसे सर्वथा मुक्ति पा सके । इस तर्कके द्वारा हमें तीसरे और चौथे दोनों प्रश्नोंका उत्तर मिल जाता है, अर्थात् यही ' हान ' है और ' हानोपाय ' भी हो सकता है । षड्दर्शन इन चारों रहस्यपूर्ण प्रश्नोंको समझानेके लिये ' दर्शनशास्त्रों ' में इन तीनों तत्त्वोंका छोटे - छोटे और सरल सूत्रोंमें युक्तियुक्त वर्णन किया गया है । इन दर्शनशास्त्रोंमें ' षड्दर्शन ' – छः दर्शन – मुख्य हैं । १. मीमांसा, -( २ )
पृष्ठ 23
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पहिला प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * * [ वेदोंके अङ्ग २. वेदान्त, ३. न्याय, ४, वैशेषिक, ५. सांख्य, ६. योग । ये षड्दर्शन वेदोंके उपाङ्ग कहलाते हैं । वेदोंके अङ्ग १. शिक्षा - जिसका उपयोग वैदिक वर्णों, स्वरों और मात्राओंके बोध करानेमें होता है । २. कल्प — जो आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन और कात्यायन आदि ऋषियोंके बनाये श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र हैं, जिनमें यागके प्रयोग, मन्त्रोंके विनियोगकी विधि है I ३. व्याकरण — जो प्रकृति और प्रत्यय आदिके उपदेशसे पदके स्वरूप और उसके अर्थका निश्चय करनेके लिये उपयोगी हैं ४. निरुक्त — जो पदविभाग, मन्त्रका अर्थ और देवताके निरूपणद्वारा एक - एक पदके सम्भावित और अवयवार्थका निश्चय करता है । ५. छन्द- – जो लौकिक और वैदिक पादोंकी अक्षर - संख्याको नियमित करने, पाद, यति और विराम आदिकी व्यवस्था करनेमें उपयोगी है । ६. ज्योतिष — जो यज्ञादि - अनुष्ठानके कालविशेषकी व्यवस्था करता है । ये वेदोंके अङ्ग कहलाते हैं । अर्थात् इनके द्वारा वेदमन्त्रोंके अर्थोंका यथार्थ बोध प्राप्त होता है । ( ३ )
पृष्ठ 24
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
दूसरा प्रकरण पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसा अर्थात् मीमांसा और वेदान्तदर्शन कर्मकाण्ड – वेदमन्त्रोंमें बतलायी हुई— कर्तव्य कर्मों अर्थात् इष्ट और पूर्त्त कर्मोंकी –शिक्षाका नाम कर्मकाण्ड है । इष्ट वे कर्म हैं, जिनकी विधि मन्त्रोंमें दी गयी हो, जैसे यज्ञादि और पूर्त्त वे सामाजिक कर्म हैं, जिनकी आज्ञा वेदमें हो, किंतु विधि लौकिक हो, जैसे पाठशाला, कूप, विद्यालय, अनाथालय आदि बनवाना इत्यादि । इन दोनों कर्मोंके तीन अवान्तर भेद हैं – नित्यकर्म, नैमित्तिककर्म और काम्यकर्म । १. नित्यकर्म — जो नित्य करने योग्य हैं, जैसे पञ्चमहायज्ञ आदि । २. नैमित्तिककर्म — वे कर्म हैं, जो किसी निमित्तके होनेपर किये जायँ, जैसे पुत्रका जन्म होनेपर जातकर्म - संस्कार । ३. काम्यकर्म — जो किसी लौकिक अथवा पारलौकिक कामनासे किये जायँ । इनके अतिरिक्त कर्मोंके दो और भेद हैं, निषिद्धकर्म और प्रायश्चित्तकर्म । ( क ) निषिद्धकर्म – जिनके करनेका शास्त्रोंमें निषेध हो । ( ख ) प्रायश्चित्तकर्म - जो विहितकर्मके न करने अथवा विधिविरुद्धके करने या वर्जित कर्म करनेसे अन्तःकरणपर मलिन संस्कार पड़ जाते हैं, उनके धोनेके लिये किये जायँ । किसी कामनाकी सिद्धिके लिये किये गये कर्मोंका फल भोगना ही पड़ेगा, तथा प्रतिषिद्धकर्मोंका आचरण अशुभ फल करेगा ही । अतः इनसे निवृत्ति वाञ्छनीय है, परंतु नित्य और नैमित्तिकका अनुष्ठान नितान्त आवश्यक है । अतः काम्य और निषिद्धकर्मोंसे निवृत्ति परंतु प्रायश्चित्त तथा नित्य और नैमित्तिक कर्मोंमें प्रवृत्ति मोक्षकी साधिका है । उपासनाकाण्ड – वेदमन्त्रोंमें बतलायी हुई लवलीनता अर्थात् मनकी वृत्तियोंको सब ओरसे हटाकर केवल एक लक्ष्यपर ठहरानेकी शिक्षाका नाम उपासना है । ज्ञानकाण्ड — इसी प्रकार वेदमन्त्रोंमें जहाँ - जहाँ आत्मा तथा परमात्माके स्वरूपका वर्णन है, उसको ज्ञानकाण्ड कहते हैं । मन्त्रोंके कर्मकाण्डका विस्तारपूर्वक वर्णन मुख्यतया ब्राह्मणग्रन्थोंमें, ज्ञानकाण्डका आरण्यकों तथा उपनिषदोंमें और उपासनाकाण्डका दोनोंमें किया गया है । मीमांसा – इन तीनों काण्डोंके वेदार्थविषयक विचारको मीमांसा कहते हैं । मीमांसा शब्द ' मान ज्ञाने ' से जिज्ञासा अर्थमें ' माने जिज्ञासायाम् ' वार्त्तिककी सहायतासे निष्पन्न होता है । मीमांसाके दो भेद हैं- पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसा । पूर्वमीमांसामें कर्मकाण्ड और उत्तरमीमांसामें ज्ञानकाण्डपर विचार किया गया है । उपासना दोनोंमें सम्मिलित है । इस प्रकार ये दोनों दर्शन वास्तवमें एक ही ग्रन्थके दो भाग कहे जा सकते हैं । पूर्वमीमांसा श्रीव्यासदेवजीके शिष्य जैमिनि मुनिने प्रवृत्तिमार्गी गृहस्थियों तथा कर्मकाण्डियोंके लिये बनायी है । उसका प्रसिद्ध नाम मीमांसादर्शन है । इसको जैमिनिदर्शन भी कहते हैं । इसके बारह अध्याय हैं, जो मुख्यतया कर्मकाण्डसे सम्बन्ध रखते हैं । उत्तरमीमांसा निवृत्तिमार्गवाले ज्ञानियों तथा संन्यासियोंके लिये श्रीव्यास महाराजने स्वयं रचा है । वेदोंके कर्मकाण्ड - प्रतिपादक वाक्योंमें जो विरोध प्रतीत होता है, केवल उसके वास्तविक अविरोधको दिखलानेके लिये पूर्वमीमांसाकी और वेदके ज्ञानकाण्डमें. ( ४ )
पृष्ठ 25
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
दूसरा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * * [ पूर्वमीमांसा समन्वयसाधन और अविरोधकी स्थापनाके लिये उत्तरमीमांसाकी रचना की गयी है । इस दोनों दर्शनोंमें शब्दप्रमाणको ही प्रधानता दी गयी है । दोनों दर्शनकार लगभग समकालीन कारण हैं इन 1 इसलिये श्रीजैमिनिका भी वही समय लेना चाहिये जो उत्तरमीमांसाके प्रकरणमें श्रीव्यासदेवजी महाराजका हुए बतलाया जायगा । पूर्वमीमांसा मीमांसाका प्रथम सूत्र है ' अथातो धर्मजिज्ञासा ' अर्थात् अब धर्मकी जिज्ञासा करते हैं । मीमांसाके अनुसार धर्मकी व्याख्या वेदविहित, शिष्टोंसे आचरण किये हु कर्मोंमें अपना जीवन ढालना है । इसमें सब कर्मोंको यज्ञों तथा महायज्ञोंके अन्तर्गत कर दिया गया है । भगवान् मनुने भी ऐसा ही कहा है- ' महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः'महायज्ञों तथा यज्ञोंद्वारा ब्राह्मण - शरीर बनता है । पूर्णिमा तथा अमावस्यामें जो छोटी - छोटी इष्टियाँ की जाती हैं, इनका नाम यज्ञ और अश्वमेधादि यज्ञोंका नाम महायज्ञ है । ( १ ) ब्रह्मयज्ञ - प्रातः और सायंकालकी संध्या तथा स्वाध्याय । ( २ ) देवयज्ञ – प्रातः तथा सायंकालका हवन । ( ३ ) पितृयज्ञ – देव और पितरोंकी पूजा अर्थात् माता, पिता, गुरु आदिकी सेवा तथा उनके प्रति श्रद्धा - भक्ति । ( ४ ) बलिवैश्वदेवयज्ञ – पकाये हुए अन्नमेंसे अन्य प्राणियोंके लिये भाग निकालना । ( ५ ) अतिथियज्ञ – घरपर आये हुए अतिथियोंका सत्कार — ये यज्ञके अवान्तर भेद हैं । ये यज्ञ और महायज्ञ वेदोंमें बतलायी हुई विधिके अनुसार होने चाहिये । इसलिये जैमिनि मुनिने इनकी सिद्धिके लिये ‘ शब्द ' अर्थात् ' आगम ' प्रमाण ही माना है, जो वेद है 1 वेदके पाँच प्रकारके विषय हैं- ( १ ) विधि, ( २ ) मन्त्र, ( ३ ) नामधेय, ( ४ ) निषेध और ( ५ ) अर्थवाद । ' स्वर्गकामो यजेत ' स्वर्गकी कामनावाला यज्ञ करे ' इस प्रकारके वाक्योंको ' विधि ' कहते हैं । अनुष्ठानके अर्थ - स्मारक वचनोंको ' मन्त्र ' के नामसे पुकारते हैं । यज्ञोंके नामकी ' नामधेय ' संज्ञा है अनुचित कार्यसे विरत होनेको ' निषेध ' कहते हैं तथा किसी पदार्थके सच्चे गुणोंके कथनको ' अर्थवाद ' कहते हैं । इन पाँच विषयोंके होनेपर भी वेदका तात्पर्य विधिवाक्योंमें ही है । अन्य चारों विषय उनके केवल अङ्गभूत हैं तथा पुरुषोंको अनुष्ठानके लिये उत्सुक बनाकर विधि वाक्योंको ही सम्पन्न किया करते हैं । विधि चार प्रकारकी होती है— कर्मके स्वरूपमात्रको बतलानेवाली विधि ' उत्पत्ति - विधि ' है । अङ्ग तथा प्रधान अनुष्ठानोंके सम्बन्धबोधक विधिको ' विनियोग - विधि ', कर्मसे उत्पन्न फलके स्वामित्वको कहनेवाली विधिको ' अधिकार - विधि ' तथा प्रयोगके प्राशुभाव ( शीघ्रता ) के बोधक विधिको ' प्रयोगविधि ' कहते हैं । विध्यर्थके निर्णय करनेमें सहायक श्रुति, लिङ्ग, वाक्य, प्रकरण, स्थान तथा समाख्या नामक षट् प्रमाण होते हैं । जैमिनि मुनिके मतानुसार यज्ञोंसे ही स्वर्ग अर्थात् ब्रह्मकी प्राप्ति होती है । ' स्वर्गकामो यजेत'स्वर्गकी कामनावाला यज्ञ करे । यज्ञके विषयमें श्रीमद्भगवद्गीतामें ऐसा वर्णन किया गया है-यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः । तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥ ( ३।९ ) ( ५ )
पृष्ठ 26
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
दूसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप ** [ पूर्वमीमांसा यज्ञके लिये जो कर्म किये जाते हैं, उनके अतिरिक्त अन्य कर्मोंसे यह लोक बँधा हुआ है । अर्थात् यज्ञार्थ किये जानेवाले कर्म ( भी ) तू आसक्ति अथवा फलाशा छोड़कर करता जा । तदर्थ
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥
( ३ । १० ) प्रारम्भमें यज्ञके साथ - साथ प्रजाको उत्पन्न करके ब्रह्माने ( प्रजासे ) कहा- -'इस ( यज्ञ ) के द्वारा तुम्हारी वृद्धि हो, यह ( यज्ञ ) तुम्हारी कामधेनु हो अर्थात् यह तुम्हारे इष्ट फलोंको देनेवाला हो । '
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥
( ३ । ११ ) ( प्रजापति ब्रह्मा यह भी बोले कि ) तुम इस यज्ञसे देवताओंको संतुष्ट करते रहो ( और ) वे देवता ( वर्षा आदिसे ) तुम्हें संतुष्ट करते रहें । ( इस प्रकार ) परस्पर एक - दूसरेको संतुष्ट करते हुए ( दोनों ) परम श्रेय अर्थात् कल्याण प्राप्त कर लो ।
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥
( ३ । १२ ) क्योंकि यज्ञसे संतुष्ट होकर देवता लोग तुम्हारे इच्छित ( सब ) भोग तुम्हें देंगे । उन्हींका दिया हुआ उन्हें ( वापिस ) न देकर जो ( केवल स्वयं ) उपभोग करता है, अर्थात् देवताओंसे दिये गये अन्न आदिसे पञ्चमहायज्ञ आदिद्वारा उन देवताओंका पूजन किये बिना जो व्यक्ति खाता - पीता है, वह सचमुच चोर है ।
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥
( ३ । १३ ) यज्ञ ( पञ्चमहायज्ञ आदि ) करके शेष बचे हुए भागको ग्रहण करनेवाले सज्जन सब पापोंसे मुक्त हो जाते हैं, परंतु ( यज्ञ न करके केवल ) अपने लिये ही जो ( अन्न ) पकाते हैं, वे पापीलोग पाप भक्षण करते हैं । अन्नाद्भवन्ति भूतानि
पर्जन्यादन्नसम्भवः ।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥
( ३ । १४ ) अन्नसे प्राणिमात्रकी उत्पत्ति होती है, अन्न पर्जन्यसे उत्पन्न होता है, पर्जन्य यज्ञसे उत्पन्न होता है और यज्ञकी उत्पत्ति ( वैदिक ) कर्मसे होती है ।
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥
( ३। १५ ) ( ६ )
पृष्ठ 27
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
दूसरा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * * [ पूर्वमीमांसा उस कर्मको तू वेदसे उत्पन्न जान और वेद अविनाशी परमात्मासे उत्पन्न हुआ है । इससे सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञमें प्रतिष्ठित है 1 यहाँ तीसरे चेतनतत्त्व अर्थात् ईश्वरको व्यष्टिरूपसे प्रत्येक यज्ञका अधिष्ठातृदेव माना गया है, जिसकी उस विशेष यज्ञद्वारा उपासना की जाती है । यथा-" तद् यदिदमाहुः ' अमुं यजामुं यज ' इत्येकैकं देवम्, एतस्यैव सा विसृष्टिः, एष उ ह्येव सर्वे देवाः । ( बृ ० १।४ । ६ ) जो यह कहते हैं कि उसका याग करो, उसका याग करो, इस प्रकार एक - एक देवताका याग बतलाते हैं, वह इसीकी ' विसृष्टिः ' बिखरा हुआ अर्थात् व्यष्टिरूप है, निःसंदेह यह ही सारे देवता हैं । अर्थात् अग्नि उस ब्रह्मसे उत्पन्न हुआ, उसीका प्रकाशक है । इसी प्रकार दूसरे देवता भी उसीके प्रकाशक हैं । इसलिये यज्ञोंमें जो अग्नि, इन्द्र आदि भिन्न - भिन्न देवताओंकी उपासना पायी जाती है, वह वास्तवमें उसी एक ब्रह्मकी उपासना है । पुनश्च -तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु
चन्द्रमाः ।
तदेव शुक्रं तद् ब्रह्मता आपः सः प्रजापतिः ॥
( यजु ० अ ० ३२ मं ० १ ) वह ही अग्नि है, वह सूर्य है, वह वायु है, वह चन्द्रमा है, वह शुक्र अर्थात् चमकता हुआ नक्षत्र · है, वह ब्रह्म ( हिरण्यगर्भ ) है, वह जल ( इन्द्र ) है, वह प्रजापति ( विराट् ) है । स धाता स विधर्ता स वायुर्नभ उच्छ्रितम् । ( अ ० वेद १३ । ४ । ३ ) सोऽर्यमा स वरुणः स रुद्रः स महादेवः । ( अ ० वेद १३ | ४ | ४ ) सो अग्निः स उ सूर्यः स उ एव महायमः । ( अ ० वेद १३ | ४ | ५ ) वह ( ईश्वर ) धाता है, वह विधाता है, वही वायु, वही आकाशमें उठा मेघ है । वही अर्यमा, वही वरुण, रुद्र और महादेव है । वही अग्नि, सूर्य और महायम है ।
स वरुणः सायमग्निर्भवति स मित्रो भवति प्रातरुद्यन् ।
स सविता भूत्वान्तरिक्षेण याति स इन्द्रो भूत्वा तपति मध्यतो दिवम् ॥
( अथर्ववेद १३ । ३ । १३ ) वह सायंकाल अग्नि और वरुण होता है और प्रातःकाल उदय होता हुआ वह मित्र होता है, वह सविता होकर अन्तरिक्षसे चलता है, वह इन्द्र होकर मध्यसे द्युलोकको तपाता है । यास्कने निरुक्तके दैवतकाण्ड ( सप्तम अध्याय ) में स्पष्ट शब्दोंमें विवेचना की है कि इस जगत्के मूलमें एक महत्त्वशालिनी शक्ति विद्यमान है, जो निरतिशय ऐश्वर्यशालिनी होनेसे ईश्वर कहलाती है । वह एक अद्वितीय है, उसी एक देवताकी बहुत रूपोंसे स्तुति की जाती है । ( ७ )
पृष्ठ 28
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
दूसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ पूर्वमीमांसा यथा— महाभाग्याद् देवताया एक एव आत्मा बहुधा स्तूयते । एकस्यात्मनोऽन्ये देवाः प्रत्यङ्गानि भवन्ति । ( ७।४।८ - ९ ) हानोपाय — इसी प्रकार जहाँ उत्तरमीमांसामें ' हानोपाय ' अर्थात् मुक्तिका साधन, ज्ञानियों तथा संन्यासियोंके लिये, ज्ञानद्वारा तीसरे तत्त्व अर्थात् परमात्माकी उपासना बतलायी गयी है, वहाँ पूर्वमीमांसामें कर्मकाण्डी गृहस्थियोंके लिये यज्ञोंद्वारा व्यष्टिरूपसे उसी ब्रह्मकी उपासना बतलायी गयी है । हान- - किंतु ' हान ' अर्थात् मुक्तिके सम्बन्धमें जैमिनि और व्यास भगवान्में कोई विशेष मतभेद नहीं है तथा अन्य दर्शनकारोंसे भी अविरोध है यथा-ब्राह्मेण जैमिनिरुपन्यासादिभ्यः । ( वेदान्तदर्शन ४।४ । ५ ) जैमिनि आचार्यका मत है कि मुक्त पुरुष ( अपर ) ब्रह्मरूपसे स्थित होता है, क्योंकि श्रुतिमें उसी
रूपका उपन्यास ( उद्देश्य ) है ।
चितितन्मात्रेण तदात्मकत्वादित्यौडुलोमिः ॥
( वेदान्तदर्शन ४ । ४ । ६ ) औडुलोमि आचार्य मानते हैं कि मुक्त पुरुष चितिमात्र स्वरूपसे स्थित होता है, क्योंकि यही उसका
अपना स्वरूप है ।
एवमप्युपन्यासात्पूर्वभावादविरोधं बादरायणः ॥
( के द ० ४।४ । ७ ) इस प्रकार भी उपन्यास ( उद्देश्य ) हैं और पूर्व कहे हुए धर्म भी उनमें पाये जाते हैं, इसलिये उन दोनोंमें कोई विरोध नहीं है । यह बादरायण ( सूत्रकार व्यासदेवजी ) मानते हैं । अर्थात् प्रवृत्तिमार्गवाले सगुण ब्रह्मके उपासक शबल ( सगुण ) स्वरूपसे मुक्तिमें शबल ब्रह्म ( अपरब्रह्म ) के ऐश्वर्यको भोगते हैं, जो जैमिनिजीको अभिमत है और निवृत्तिमार्गवाले निर्गुण शुद्ध ब्रह्मके उपासक शुद्ध निर्गुण स्वरूपसे शुद्ध निर्गुण ब्रह्म ( परब्रह्म ) को प्राप्त होते हैं जैसा कि औडुलोमि आचार्यको अभिमत है । व्यासजी दोनों विचारोंको यथार्थ मानते हैं; क्योंकि श्रुतिमें दोनों प्रकारकी मुक्तिका वर्णन है । मीमांसकोंके मोक्षकी परिभाषा इन शब्दोंमें है— ' प्रपञ्चसम्बन्धविलयो मोक्षः । त्रेधा हि प्रपञ्चः । पुरुषं बध्नाति तदस्य त्रिविधस्यापि बन्धस्य आत्यन्तिको विलयो मोक्षः ' । ( शास्त्रदीपिका ) इस जगत्के साथ आत्माके शरीर, इन्द्रिय और विषय- - इन तीन प्रकारके सम्बन्धके विनाशका नाम मोक्ष है; क्योंकि इन तीन बन्धनोंने ही पुरुषको जकड़ रखा है । इस त्रिविध बन्धके आत्यन्तिक नाशकी संज्ञा मोक्ष है । सांख्य और योगके अनुसार यह सम्प्रज्ञात समाधिका अन्तिम ध्येय है । जैमिनि ईश्वरवादी थे पूर्वमीमांसाका मुख्य विषय यज्ञ और महायज्ञ है । इसलिये जैमिनिमुनिने प्रसङ्ग - प्राप्त उसमें कर्मकाण्डका ही निरूपण किया है । ईश्वरके विस्तारपूर्वक वर्णनकी, जो उत्तरमीमांसाका विषय है, अपने ( ८ )
पृष्ठ 29
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
दूसरा प्रकरण ] * षड्दर्शनसमन्वय * [ उत्तरमीमांसा दर्शनमें आवश्यकता नहीं देखी । इसलिये कहीं - कहीं ( वैशेषिक और सांख्यके सदृशं ) इस दर्शनके सम्बन्धमें भी अनीश्वरवादी होनेकी शङ्का उठायी गयी है । इसके समाधानके लिये उपर्युक्त पर्याप्त है । अनेक व्यास - सूत्रोंसे जैमिनिजीका ईश्वरवादी होना सिद्ध होता है । यथा— स्पष्टीकरण साक्षादप्यविरोधं जैमिनिः । ( वेदान्तद ॰ १ । २ । २८ ) जैमिनी आचार्य साक्षात् ही वैश्वानर पदके ईश्वरार्थक होनेमें अविरोध कथन करते हैं तथा अध्याय १ पाद २ सूत्र ३१, अध्याय १ पाद ४ सूत्र १८, अध्याय ४ पाद ३ सूत्र ११ से १४ तक, अध्याय ४ पाद ४ सूत्र ५ जैमिनिके ईश्वरवादी होनेमें प्रमाण हैं । पूर्वमीमांसामें पशु - मांसकी बलिका निषेध पूर्वमीमांसामें जो कहीं - कहीं पशुओंके मांसकी आहुति देनेका विधान पाया जाता है । वह पीछेकी मिलावट मालूम होती है ( अथवा उसको हिंसक मांसाहारी मनुष्योंके लिये यज्ञके अतिरिक्त मांस - भक्षणमें प्रतिबन्धरूप समझना चाहिये ) मूल सूत्रोंमें यज्ञमें मांसमात्रका निषेध है । यथा ‘ “ मांसपाकप्रतिषेधः ” ( १२ । २ । २ ) मीमांसा । मांस पकाना श्रुतिसे निषिद्ध है और सब आर्षग्रन्थोंमें हिंसा वर्जित है । यथा—
सुरा मत्स्याः पशोर्मांसं द्विजातीनां बलिस्तथा ।
धूर्तेः प्रवर्तितं यज्ञे नैतद् वेदेषु कथ्यते ॥
( महाभारत, शान्तिपर्व ) ' मद्य, मछली और पशुओंका मांस तथा यज्ञमें द्विजाति आदि मनुष्योंका बलिदान धूर्तोंद्वारा यज्ञमें प्रवर्तित हुआ है— अर्थात् दुष्ट राक्षस मांसाहारियोंने यज्ञमें चलाया है । वेदोंमें मांसका विधान नहीं है । ' अन्य सब दर्शनोंके संदृश हम पूर्वमीमांसाके भी विशेषरूपको दिखलाना चाहते थे, किंतु यह विचार करके कि उसके यज्ञादिसम्बन्धी गूढ़ विषय और पारिभाषिक शब्द योगमार्गवालोंके लिये अधिक रुचिकर न हो सकेंगे, हमने उसका केवल वह सामान्य रूप ही, जिसका हमारे षड्दर्शनसमन्वयसे सम्बन्ध है और जो इस ग्रन्थके पाठकोंको लाभदायक हो सकता है, दे दिया है । मीमांसाग्रन्थ सब दर्शनोंमें सबसे बड़ा है । इसके सूत्रोंकी संख्या २६४४ तथा अधिकरणोंकी ९ ० ९ है । ये सूत्र अन्य सब दर्शनोंके सूत्रोंकी सम्मिलित संख्याके बराबर हैं । द्वादश अध्यायोंमें धर्मके विषयमें ही विस्तृत विचार किया गया है । पहले अध्यायका विषय है- धर्मविषयक प्रमाण, दूसरेका भेद ( एक धर्मसे दूसरे धर्मका पार्थक्य ), तीसरेका अङ्गत्व, चौथेका प्रयोज्य - प्रयोजकभाव, पाँचवेंका क्रम अर्थात् – कर्मोंमें आगे - पीछे होनेका निर्देश, छठेका अधिकार ( यज्ञ करनेवाले पुरुषकी योग्यता ), सातवें तथा आठवेंका अतिदेश ( एक कर्मकी समानतापर अन्य कर्मका विनियोग ), नवेंका ऊह, दसवेंका बाध, ग्यारहवेंका तन्त्र तथा बारहवेंका विषय प्रसङ्ग है । पूर्वमीमांसापर सबसे प्राचीन वृत्ति आचार्य उपवर्षकी है । उत्तरमीमांसा ` उत्तरमीमांसाको ब्रह्मसूत्र, शारीरिक सूत्र, ब्रह्ममीमांसा तथा वेदका अन्तिम तात्पर्य बतलाने से ( ९ )
पृष्ठ 30
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
दूसरा प्रकरण ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ उत्तरमीमांसा वेदान्तदर्शन और वेदान्तमीमांसा भी कहते हैं । इस दर्शनके चार अध्याय हैं और प्रत्येक अध्याय चार पादोंमें विभक्त है । ( १ ) पहले अध्यायका नाम समन्वय अध्याय है; क्योंकि इसमें सारे वेदान्तवाक्योंका एक मुख्य तात्पर्य ब्रह्ममें दिखाया गया है । इसके पहले पादमें उन वाक्योंपर विचार है, जिनमें ब्रह्मका चिह्न सर्वज्ञतादि स्पष्ट हैं । दूसरेमें उनपर विचार है, जिनमें ब्रह्मका चिह्न स्पष्ट है और तात्पर्य उपासनामें है । तीसरेमें उनपर विचार है, जिनमें ब्रह्मका चिह्न स्पष्ट है और तात्पर्य ज्ञानमें है । चौथेमें संदिग्ध पदोंपर विचार है ( २ ) दूसरे अध्यायका नाम अविरोध अध्याय है; क्योंकि इसमें इस दर्शनके विषयका तर्कसे श्रुतियोंका परस्पर अविरोध दिखाया गया है । इससे पहले पादमें इस दर्शनके विषयका स्मृति और तर्कसे अविरोध; दूसरेमें विरोधी तर्कोंके दोष; तीसरेमें पञ्चमहाभूतके वाक्योंका परस्पर अविरोध; और चौथेमें लिङ्ग - शरीर - विषयक वाक्योंका परस्पर अविरोध दिखाया गया है । ( ३ ) तीसरे अध्यायका नाम साधन अध्याय है; क्योंकि इसमें विद्याके साधनोंका निर्णय किया गया है । इसके पहले पादमें मुक्तिसे नीचेके फलोंमें त्रुटि दिखलाकर उनसे वैराग्य; दूसरेमें जीव और ईश्वरमें भेद दिखलाकर ईश्वरको जीवके लिये फलदाता होना; तीसरेमें उपासनाका स्वरूप और चौथे पादमें ब्रह्मदर्शनके बहिरङ्ग तथा अन्तरङ्ग साधनोंका वर्णन है । ( ४ ) चौथे अध्यायमें विद्याके फलका निर्णय दिखलाया है, इसलिये इसका नाम फलाध्याय है । इसके पहले पादमें जीवन्मुक्ति; दूसरेमें जीवन्मुक्तकी मृत्युः तीसरेमें उत्तरगति और चौथेमें ब्रह्मप्राप्ति और ब्रह्मलोकका वर्णन है । अधिकरण — पादोंमें जिन - जिन अवान्तर विषयपर विचार किया गया है, उनका नाम अधिकरण है । अधिकरणोंके विषय - अधिकरणोंमें निम्नलिखित विषयोंपर विचार किया गया है-१. ईश्वर, २. प्रकृति, ३. जीवात्मा, ४. पुनर्जन्म, ५. मरनेके पीछेकी अवस्थाएँ, ६. कर्म, ७. उपासना, ८. ज्ञान, ९. बन्ध, १०. मोक्ष । ब्रह्मसूत्रमें व्यासदेवजीने जहाँ दूसरे आचार्योंके मत दिखलाकर अपना सिद्धान्त बतलाया है, वहाँ अपनेको बादरायण नामसे बोधन किया है । इस दर्शनके अनुसार-१. ‘ हेय ’ — त्याज्य जो दुःख है उसका मूल जडतत्त्व है अर्थात् दुःख जडतत्त्वका धर्म है । ' हेयहेतु'- ' - त्याज्य जो दुःख है उसका कारण अज्ञान अर्थात् जडतत्त्वमें आत्मतत्त्वका अध्यास २. अर्थात् जडतत्त्वको भूलसे चेतनतत्त्व मान लेना है । चारों अन्तःकरण मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार और इन्द्रियों तथा शरीरमें अहंभाव और उनके विषयमें ममत्व पैदा कर लेना ही दुःखोंमें फँसना है । ३. ' हान ' – दुःखके नितान्त अभावकी अवस्था ' स्वरूपस्थिति ' अर्थात् जडतत्त्वसे अपनेको सर्वथा भिन्न करके निर्विकार निर्लेप शुद्ध परमात्मस्वरूपमें अवस्थित होना है । ४. ‘ हानोपाय ’ – स्वरूप - स्थितिका उपाय ' परमात्मतत्त्वका ज्ञान ' है, जहाँ दुःख, अज्ञान, भ्रम आदि लेशमात्र भी नहीं हैं और जो पूर्णज्ञान और शक्तिका भण्डार है । ( १० )