पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 111–120

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 111–120

पृष्ठ 111

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चौथा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * [ सृष्टि और प्रलय * चित्तमें ' जिसका विशेष स्थान आनुमानिक अङ्गुष्ठमात्र हृदय है, बतलाया गया है और सांख्य तथा ********** योगद्वारा उसकी प्राप्तिका उपाय स्थूलभूत, तन्मात्राएँ अहंकार और महत्तत्त्वसे क्रमशः अन्तर्मुख होते हुए स्वरूपावस्थित होना बतलाया है । जिस प्रकार उत्तरमीमांसाके प्रथम चार सूत्र वेदान्तकी चतुःसूत्री कहलाती हैं, इसी प्रकार तत्त्वसमासके ‘ अष्टौ प्रकृतयः ', ' षोडश विकाराः ', ' पुरुषः ', ' त्रैगुण्यम् ' – ये चार सूत्र सांख्यकी चतुःसूत्री हैं, जिनका कपिलमुनिने सारे ज्ञेय पदार्थोंका जिज्ञासु आसुरिको समाधि - अवस्थामें अनुभव कराके उपदेश किया है । सङ्गति – तीनों गुणोंका कार्य अगले सूत्रमें बतलाते हैं । सृष्टि और प्रलय संचरः प्रतिसंचरः ॥ ६ ॥

सृष्टि और प्रलय ( इन तीनों गुणोंकी अवस्थाविशेष है ) । व्याख्या – ग्यारह इन्द्रियाँ और पाँच स्थूलभूत, इन सोलहों केवल विकृतियोंका, जो तीनों गुणोंके केवल विकार हैं, रजपर तमके अधिक प्रभावसे वर्तमान स्थूल रूपको छोड़कर अपने कारण, अहंकार और पाँचों तन्मात्राओंमें क्रमसे लीन हो जानेका नाम प्रलय है और अपने प्रकृतियोंसे, इनका तमपरं रजके अधिक प्रभावके कारण फिर विकृतिरूपमें प्रकट होनेका नाम सृष्टि है । सृष्टिके पीछे प्रलय, प्रलयके पीछे सृष्टि — यह क्रम - प्रवाह अनादिसे चला आ रहा है । जिस प्रकार ठीक रातके बारह बजेसे दिन आरम्भ होकर रातके बारह बजे समाप्त होता है, यद्यपि सूर्योदयसे सूर्यास्ततक दिन और सूर्यास्तसे सूर्योदयतक रात्रि कहनेमें आती है, इसी प्रकार सृष्टि - उन्मुख और प्रलय - उन्मुख अवस्था - परिणाम निरंतर चलता रहता है, यद्यपि स्थूलभूतोंमें जबसे व्यवहार चलानेकी योग्यताका अभिभव होता है, तबसे प्रलय और जब इसका प्रादुर्भाव होता है, तबसे सृष्टिका आरम्भ होना कहा जाता है । प्रलयमें सातों प्रकृतियोंका, सुषुप्तिमें अन्तर्मुख होनेके सदृश, केवल वृत्तिरूपसे ही लय होना बन सकता है, न कि स्वरूपसे; क्योंकि अविद्यादि क्लेश, कर्मोंके विपाक और वासनाओंके संस्कारोंकी निवृत्ति होनेपर चित्तका स्वरूपसे ( अर्थात् चित्तको बनानेवाले सत्त्व, रजस् और तमस्का ) अपने कारणमें लीन होना तो केवल कैवल्यरूप मुक्तिमें ही हो सकता है । ( ब्रह्मसूत्रमें भी अध्याय ४ पाद २ सूत्र १ से ५ तक इस बातको दर्शाया है । देखो शांकरभाष्य । ) यहाँ यह भी बतला देना आवश्यक है कि स्थूलभूतोंकी सूक्ष्मताके “ तारतम्यको लिये हुए तन्मात्राओंतक एक सूक्ष्मावस्था होती है, जिसके अन्तर्गत सारे सूक्ष्म लोक - लोकान्तर हैं । प्रलयमें केवल पृथिवी, जल और अग्निका स्वरूपसे लय और सृष्टिमें स्वरूपसे उत्पन्न होना होता है । यथा-तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत । तत्तेज ऐक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तदपोऽसृजत । तस्माद् यत्र क्व च शोचति स्वेदते वा पुरुषस्तेजस एव तदध्यापो जायन्ते ॥ ३ ॥ ता आप ऐक्षन्त बह्व्यः स्याम प्रजायेमहीति ता अन्नमसृजन्त । तस्माद् यत्र

क्व च वर्षति तदेव भूयिष्ठमन्नं भवत्यद्भ्य एव तदध्यन्नाद्यं जायते ॥ ४ ॥ ( छान्दोग्य ० ६।२ )

( ८ ९ )

पृष्ठ 112

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चौथा प्रकरण ] पातञ्जलयोगप्रदीप* * [ सृष्टिके तीन भेद उसने ईक्षण किया — मैं बहुत हो जाऊँ, प्रजावाला होऊँ । उसने तेजको रचा । उस तेजने ईक्षण किया — मैं बहुत होऊँ, प्रजावाला होऊँ । उसने जलको रचा । इसलिये जहाँ - कहीं पुरुष गर्म होता है और उसे पसीना आता है, वहाँ तेजसे ही जल उत्पन्न होते हैं ।॥ ३ ॥

उस जलने ईक्षण किया — मैं बहुत होऊँ, मैं प्रजावाला होऊँ । उसने पृथिवीको रचा । इसलिये जहाँ-कहीं वर्षा होती है, वहीं बहुत अन्न अर्थात् पार्थिव पदार्थ उत्पन्न होते हैं ॥४ ॥

न्याय और वैशेषिक भी यहींसे सृष्टिको आरम्भ करते हैं । श्रीकृष्णमहाराजने गीता अध्याय ८ में सृष्टिकी उत्पत्ति और प्रलयका क्रम इसी प्रकार बतलाया है । यथा-पुनरावर्तिनोऽर्जुन । आब्रह्मभुवनाल्लोकाः मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥ १६ ॥

सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यदब्रह्मणो विदुः ।

रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥ १७ ॥

अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।

रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥ १८ ॥

भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।

रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥ १ ९ ॥

हे अर्जुन! ब्रह्मलोकसे लेकर सब लोक पुनरावर्ती स्वभाववाले हैं, परंतु हे कुन्तीपुत्र! मुझको ( परब्रह्मको ) प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता है ॥ १६ ॥

ब्रह्माका जो एक दिन है उसको हजार चौकड़ी युगतक अवधिवाला और रात्रिको भी हजार चौकड़ी युगतक अवधिवाली जो पुरुष तत्त्वसे जानते हैं अर्थात् जो अनित्य जानते हैं, वे योगीजन कालके तत्त्वको जाननेवाले हैं ॥ १७ ॥

सम्पूर्ण दृश्यमात्र भूतगण ब्रह्माके दिनके प्रवेशकालमें अव्यक्त मूलप्रकृतिसे उत्पन्न होते हैं और ब्रह्माकी रात्रिके प्रवेशकालमें उस अव्यक्त मूलप्रकृतिमें ही लय होते हैं ॥ १८ ॥

हे अर्जुन! वही यह भूतसमुदाय उत्पन्न हो - होकर प्रकृतिके वशमें हुआ रात्रिके प्रवेशकालमें लय होता है और दिनके प्रवेशकालमें फिर उत्पन्न होता है ॥ १ ९ ॥ संगति — अब सृष्टिके अवान्तर भेद बतलाते हैं । सृष्टिके तीन भेद कप अध्यात्ममधिभूतमधिदैवं च ॥ ७ ॥

( सृष्टिके तीन अवान्तर भेद हैं ) अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैव । ( १ ) अध्यात्म – जो सीधे अपने साथ सम्बन्ध रखनेवाले हैं, जैसे बुद्धि, अहंकार, मन, इन्द्रियाँ ( २ ) अधिभूत — जो अन्य प्राणियोंकी भिन्न - भिन्न सृष्टिसे सम्बन्ध रखनेवाले हैं, जैसे और गौ, शरीर अश्व ।, पशु - पक्षी आदि । ( ३ ) अधिदैव — जो दिव्य शक्तियोंकी सृष्टिसे सम्बन्ध रखनेवाले हैं, जैसे पृथ्वी, सूर्य आदि । ( ९ ० )

पृष्ठ 113

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चौथा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * * [ पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ व्याख्या – अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैव सृष्टिके सम्बन्धसे तीन ही प्रकारका सुख - दुःख होता है — आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक । आध्यात्मिक सुख - दुःख दो प्रकारका है — शारीरिक और मानसिक । शरीरका बलवान्, फुर्तीला और स्वस्थ होना शारीरिक सुख है, शरीरका दुर्बल, अस्वस्थ और रोगी होना शारीरिक दुःख है । इसी प्रकार शुभ संकल्प, शान्ति, वैराग्यआदि मानसिक सुख है, ईर्ष्या, तृष्णा, शोक, राग, द्वेष आदि मानसिक दुःख है 1 आधिभौतिक सुख वह है जो दूसरे प्राणियोंसे मिलता है, जैसे गौ आदिसे दूध - घृतका, घोड़े आदिसे सवारीका और आधिभौतिक दुःख जैसे सर्प, बिच्छू आदिके काटनेसे होता है । आधिदैविक सुख प्रकाश, वृष्टि आदिसे होता है, आधिदैविक दुःख अतिवृष्टि और बिजली आदिके गिरनेसे होता है । सङ्गति – मोक्षकी उपयोगिनी अध्यात्मसृष्टिका अगले सूत्रोंमें सविस्तर वर्णन करते हैं । पाँच वृत्तियाँ पञ्चाभिबुद्धयः १ ॥ ८ ॥

बुद्धिकी वृत्तियाँ पाँच हैं । व्याख्या – वृत्तियाँ पाँच प्रकारकी हैं — प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति । प्रमाण यथार्थ ज्ञानको कहते हैं । यह तीन प्रकारका है— प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम । विपर्यय मिथ्या ज्ञानको कहते हैं, जो वस्तुके असली रूपमें प्रतिष्ठित न हो; जैसे रस्सीमें सर्प और सीपमें चाँदीकी भ्रान्ति । विकल्प भेदमें अभेद और अभेदमें भेदवाले ज्ञानको कहते हैं; जैसे ' पानीसे हाथ जल गया'-यहाँ अग्नि और पानीके भेदमें अभेदका ज्ञान है; और ' काठकी पुतली ' – यहाँ काठ और पुतलीके अभेदमें भेदका ज्ञान है । निद्रा अभावकी प्रतीतिका आलम्बन करनेवाली वृत्तिका नाम है और स्मृति उन पाँचों वृत्तियोंद्वारा अनुभूत ज्ञानका स्मरण होना है । ( इनका विस्तारपूर्वक वर्णन आगे योगदर्शन सा ॰ पा ० सू. ५ से ११ तक देंखे । ) पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ पञ्च दृग्योनयः २ ॥ ९ ॥

पाँच ज्ञानके स्रोत ( ज्ञानेन्द्रिय – नेत्र, श्रोत्र, घ्राण, रसना और त्वचा ) हैं । व्याख्या– नेत्र, श्रोत्र, घ्राण, रसना और त्वचा- -ये पाँच ज्ञानके स्रोत हैं । ये ज्ञानके प्रवाह बुद्धिके लिये अंदर बहते रहते हैं । नेत्र रूप - ज्ञानका, श्रोत्र शब्द - ज्ञानका, घ्राण गन्ध - ज्ञानका, त्वचा स्पर्श - ज्ञानका प्रवाह अंदर बहाती है । १. भावागणेश आदिने आठवें सूत्रके अर्थ इस प्रकार किये हैं-अभिबुद्धि, अभिमान, इच्छा, कर्तव्यता, क्रिया — ये पाँच अभिबुद्धि हैं । इनमें अभिबुद्धि अभिमुखी बुद्धि है चाहको अर्थात् यह अवश्य करना है, इस रूपवाली बुद्धिका नाम अभिबुद्धि है । मैं करता हूँ — यह वृत्ति अभिमान है । इच्छा कहते हैं । यह संकल्प मानसीवृत्ति है । कर्तव्यता, ज्ञानेन्द्रियोंकी शब्दादि विषयोंमें वृत्तिका नाम है । क्रिया वचन आदि लक्षणवाली कर्मेन्द्रियोंकी वृत्ति है । २. ‘ सांख्य - तत्त्व - विवेचन ' और ' तत्त्वयाथार्थ - दीपन ' आदिमें नवें सूत्रका पाठ “ पञ्च कर्मयोनयः ” दिया है, जिसके ( ९ १ )

पृष्ठ 114

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चौथा प्रकरण ] पातञ्जलयोगप्रदीप* * [ पाँच गाँठवाली अविद्या पाँच प्राण पञ्च वायवः ॥ १० ॥

पाँच वायु ( प्राण ) हैं । व्याख्या - वायु पाँच हैं — प्राण, अपान, समान, व्यान, उदान; इन पाँचोंको प्राण भी कहते हैंI प्राण - वायुका निवास - स्थान हृदय है । यह शरीरके ऊपरी भागमें रहता हुआ ऊपरकी इन्द्रियोंका काम संचालन करता है । अपान वायुका निवास - स्थान गुदाके निकट है और शरीरके निचले भागमें संचालन करता है, निचली इन्द्रियोंद्वारा मल - मूत्रके त्यागादिका काम उसके आश्रित है । समान - वायु शरीरके मध्यभाग नाभिमें रहता हुआ हृदयसे गुदातक संचार करता है, खाये - पिये अन्न, जल आदिके रसको सब अङ्गोंमें बराबर बाँटना उसका काम है । व्यान- वायु सारी स्थूल, सूक्ष्म और अतिसूक्ष्म नाड़ियोंमें घूमता हुआ शरीरके प्रत्येक भागमें रुधिरका संचार करता है । उदान वायु सूक्ष्म शरीरको शरीरान्तर वा लोकान्तरमें ले जाता है । प्राणका विस्तारपूर्वक वर्णन. योगदर्शन समाधि पा ० सू ० ३४ के वि ० वि ० में देखें । पाँच कर्मेन्द्रियाँ पञ्च कर्मात्मानः १ ॥ ११ ॥

पाँच कर्मकी शक्तियाँ ( कर्मेन्द्रियाँ ) हैं । - ये पाँच शारीरिक कर्म हैं । इन व्याख्या – बोलना, पकड़ना, चलना, मूत्र - त्याग और मल - त्याग-पाँचों कर्मोंके करनेवाली वाणी, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा – ये पाँच शक्तियाँ कर्मेन्द्रिय कहलाती हैं । पाँच गाँठवाली अविद्या पञ्चपर्वा अविद्या ॥। १२ ॥ पाँच गाँठोंवाली अविद्या है । व्याख्या — अविद्या पाँच प्रकारकी है— अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश । अनित्यमें नित्य, अपवित्रमें पवित्र, दुःखमें सुख और अनात्मामें आत्माका ज्ञान अविद्या है । बुद्धिमें आत्मबुद्धि अस्मिता है । सुखकी इच्छा अर्थात् लोभकी वृत्तिका नाम राग है । सुख - साधनमें विघ्न अर्थ इस प्रकार किये हैं, – कर्मजन्य और कर्मजनक होनेसे धृति, श्रद्धा, सुखा, अविविदिषा और विविदिषा — ये पाँच कर्मयोनि कहलाती हैं । इनके क्रमसे लक्षण इस प्रकार हैं - वाणी, कर्म और संकल्पमें जो प्रतिष्ठित हो, वह धृति है । अनसूया, ब्रह्मचर्य, यजन, याजन, तप, दान, प्रतिग्रह और होम - यह श्रद्धाका लक्षण है । जो अर्थार्थीका विद्या, कर्म और तपका आचरण करना, नित्य प्रायश्चित्तपरायण होना ( भूलोंका शोधन करना ) है, इसको सुखा कहते हैं । वेद - ज्ञानकी इच्छामें प्रतिबन्धक क्रिया अविविदिषा है । यह अचेतन एकत्व है, पृथक्त्व है, नित्य है — यह जाननेकी इच्छा विविदिषा है । इनमें चार धृति, श्रद्धा, सुखा, अविविदिषा बन्धके है, सूक्ष्म है, सत्कार्य है, अक्षोभ्य विषयमें एकत्व और पृथक्त्व आदि विषयवाली विविदिषा मोक्षका हेतु है; क्योंकि यह ज्ञान और कारण मोक्षके हैं । केवल आत्माके करनेवाले कर्मोंसे उत्पन्न होती है और उन कर्मोंकी जनक भी है । प्रतिबन्धको नाश १. ग्यारहवें सूत्रमें भावागणेश आदिने ' पञ्च कर्मात्मानः ' में कर्मात्माके अर्थ वैकारिक, तैजस, भूतादि, सानुमान और निरनुमान किये हैं । ( ९ २ )

पृष्ठ 115

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चौथा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * * तुष्ट डालनेवालोंके प्रति घृणा अथवा द्वेष - वृत्ति द्वेष है और मृत्युसे भयकी वृत्तिका नाम अभिनिवेश है । इनको क्रमसे तमस्, मोह, महामोह, तामिस्र और अन्धतामिस्र कहते हैं । इनकी विस्तारपूर्वक व्याख्या योगदर्शन सा ० पा ० प्रथम नौ सूत्रोंमें देखें । अट्ठाईस अशक्तियाँ अष्टाविंशतिधाऽशक्तिः ॥ १३ ॥

अट्ठाईस प्रकारकी अशक्ति है । एकादशेन्द्रियवधाः सहबुद्धिवधैरशक्तिरुद्दिष्टा । सप्तदशवधा बुद्धेर्विपर्ययात् तुष्टिः सिद्धानाम् ॥ ( सां ० का ० ४ ९ ) इन्द्रियोंके जो ग्यारह वध हैं, वे बुद्धिके वधोंके साथ मिलकर ( ग्यारह ) अशक्ति बतलायी गयी हैं । ( नौ ) तुष्टि और ( आठ ) सिद्धिसे उलटी ( नौ अतुष्टियाँ और आठ असिद्धि ) ये सत्रह बुद्धिके वध ( सत्तरह अशक्ति ) हैं । ( इस भाँति अट्ठाईस प्रकारकी अशक्ति हैं ) । व्याख्या – मनुष्यके पास बुद्धि ही ऐसी शक्ति है, जिसके द्वारा वह भोग - अपवर्गका प्रयोजन सिद्ध कर सकता है, यदि उसमें पूर्ण शक्ति हो अर्थात् यदि उसकी शक्तिका किसी प्रकार भी ह्रास न हुआ हो । जितनी भी त्रुटि होती है, वह सब बुद्धिकी अशक्तिसे ही होती है । बुद्धिकी अशक्ति अट्ठाईस प्रकारकी है । ग्यारह अशक्तियाँ ग्यारह इन्द्रियोंके मारे जानेसे होती हैं; जैसे नेत्रसे अंधा होना, कानसे बहिरा होना, घ्राणसे गन्ध न ज्ञात होना, रसनासे रसका स्वाद न आना, त्वचासे कुष्ठ होना, वाणीसे गूँगा होना, हाथोंसे पाँवोंसे होना, उपस्थसे नपुंसक और गुदासे गुदावर्त ( मलबन्ध ) होना, मनसे उन्माद लूला तथा पङ्गु होना — ये ग्यारह इन्द्रियोंकी अशक्तिसे बुद्धिकी अशक्ति ग्यारह प्रकारकी है । बुद्धिकी साक्षात् अशक्ति सत्तरह प्रकारकी है । नौ तुष्टियाँ एवं आठ सिद्धियाँ जो अगले दो सूत्रोंमें बतलायी जायँगी, उनसे उलटी नौ अतुष्टियाँ और आठ असिद्धियाँ मिलकर बुद्धिकी सतरह अशक्तियाँ हैं । ये तुष्टियाँ स्वयं अपने रूपसे तो आत्मोन्नतिमें सहायक और उपादेय हैं । इसलिये शक्तिरूप हैं । केवल इनमें आसक्ति अर्थात् इनमें संतुष्ट होकर आत्मोन्नतिके लिये यत्न करना छोड़ देना हेय कोटिमें है । इस कारण इनसे उलटी नौ अतुष्टियाँ नौ अशक्तिरूप हैं । नौ तुष्टियाँ नवधा तुष्टिः ॥ १४ ॥

तुष्टियाँ नौ प्रकारकी हैं । प्रकृत्युपादानकालभाग्याख्याः । आध्यात्मिकाश्चतस्त्रः नव तुष्टयोऽभिमताः ॥ बाह्या विषयोपरमात् पञ्च ( सां ० का ० ५० ) तुष्टियाँ नौ मानी गयी हैं । उनमेंसे चार आध्यात्मिक हैं, जिनके नाम प्रकृति, उपादान, काल और भाग्य हैं । और पाँच बाह्य हैं, जो ( आत्मसाक्षात्कारसे पूर्व ही उसके साधनरूप ) विषयोंमें वैराग्यसे होती हैं1 ही उसके व्याख्या – तुष्टि, उपरति अथवा उपरामता हटे रहनेको कहते हैं, अर्थात् मोक्ष - प्राप्तिसे पहले ( ९ ३ )

पृष्ठ 116

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चौथा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ नौ तुष्टियाँ साधनोंको छोड़कर संतुष्ट हो जानेका नाम तुष्टि है । यह दो प्रकारकी होती है— बाह्यतुष्टि और आध्यात्मिकतुष्टि । बाह्य तुष्टि अन्तरात्माको समझे बिना केवल बाहरके विषयोंसे उपरतिको कहते हैं । वह पाँच प्रकारकी है — शब्द - तुष्टि, स्पर्श - तुष्टि, रूप - तुष्टि, रस - तुष्टि और गन्ध - तुष्टि । इन शब्द - स्पर्शादि पाँचों विषयोंसे पाँच प्रकारके दुःख होते हैं । अर्थात् ( १ ) इनके प्राप्त करनेमें दुःख, ( २ ) रक्षामें दुःख, ( ३ ) नाशमें दुःख, ( ४ ) भोगमें दुःख, क्योंकि भोगके अभ्याससे कामना बढ़ती है और कामनाकी अपूर्तिमें दुःख होता है — और ( ५ ) दूसरोंकी हिंसाका दुःख, क्योंकि बिना किसीकी हिंसाके भोगकी प्राप्ति नहीं हो सकती । उपर्युक्त तुष्टियाँ हेय कोटिमें हैं, किंतु जब साधनरूप कर्तव्यको बिना किसी प्रकारके आलस्य और प्रमादके इन विषयोंसे सर्वथा आसक्ति और लगावको त्यागकर किया जाता है तब इस प्रकारकी तुष्टिसे संतुष्ट हुआ मन निश्चल और कामनारहित होकर परम शान्तिको प्राप्त कर लेता है । अतः इस प्रकार ही तुष्टि शक्तिरूप है । आध्यात्मिक तुष्टियाँ चार प्रकारकी हैं - प्रकृति - तुष्टि, उपादान - तुष्टि, काल - तुष्टि और भाग्य - तुष्टि । ये तुष्टियाँ उनको होती हैं जो यह जानते हुए भी कि जड - तत्त्व और चेतन - तत्त्व सर्वथा भिन्न हैं, किसी झूठे भरोसेपर स्वरूपावस्थितिके लिये यत्न नहीं करते । इन तुष्टियोंके क्रमसे ( १ ) पार, ( २ ) सुपार, ( ३ ) पारापार, ( ४ ) अनुत्तमाम्भ और ( ५ ) उत्तमाम्भ नाम हैं १ - प्रकृति - तुष्टि — यह जानकर भी कि आत्मा प्रकृतिसे अलग है, आत्माके साक्षात्कारके लिये इस भरोसेपर धारणा - ध्यान - समाधिका अभ्यास न करना कि प्रकृति पुरुषके भोग अपवर्गके लिये स्वयं प्रवृत्त हो रही है । इसलिये भोगके सदृश अपवर्ग भी आप ही प्राप्त हो जायगा – यह प्रकृतिके भरोसेपर प्रकृति - तुष्टि है यह भरोसा इसलिये झूठा है कि प्रकृति पुरुषकी इच्छाके अधीन चल रही है, जब वह स्वयं संतुष्ट होकर मोक्षके साधनसे उपराम हो रहा है तो प्रकृति उसके लिये क्या कर सकती है । २ - उपादान - तुष्टि — इस भरोसेपर कि संन्यास ग्रहण करनेसे अपवर्ग स्वयं मिल जायगा, उसके लिये उपादान- -तुष्टि है । यह भरोसा इसलिये झूठा है कि संन्यास एक चिह्नमात्र है । उसमें भी उपाय न करना धारणा, ध्यान और समाधि ही आत्मसाक्षात्कारका हेतु है । ३ - काल - तुष्टि — इस विश्वासपर कि समय पाकर स्वयं मुक्ति प्राप्त हो जायगी, उसके लिये कोई यत्न न करना काल - तुष्टि है । यह कालका भरोसा इसलिये झूठा है कि काल सब कार्योंका समान हेतु है — उन्नतिके सदृश वह अवनतिका भी हेतु है । इसलिये उन्नतिके लिये यत्न ही अपेक्षित है । ४ - भाग्य - तुष्टि — इस भरोसेपर कि यदि भाग्यमें होगा तो स्वयं तत्त्वज्ञान प्राप्त होकर मुक्ति हो जायगी, उसके लिये कोई यत्न न करना भाग्य - तुष्टि कहलाती है । यह भरोसा इसलिये झूठा है कि भाग्य भी अपने पुरुषार्थका ही बनाया हुआ होता है । उपर्युक्त तुष्टियाँ हेय कोटिमें हैं, किंतु जब साधनरूप कर्तव्यको बिना किसी और प्रमादके किया जाता है, तब इन तुष्टियोंसे धैर्य और शान्ति प्राप्त होती है । अतः प्रकारके आलस्य इस प्रकारकी तुष्टि शक्तिरूप हैं । ( ९ ४ )

पृष्ठ 117

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चौथा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * * [ आठ सिद्धियाँ आठ सिद्धियाँ अष्टधा सिद्धिः ॥ १५ ॥

सिद्धि आठ प्रकारकी है 1 शब्दो ऽध्ययनं ऊहः दुःखविघातास्त्रयः सुहृत्प्राप्तिः । दानं सिद्धयोऽष्टौ सिद्धे पूर्वोऽङ्कुशस्त्रिविधः ॥ ( सां ० का ॰ ५ ९ ) च ऊह, शब्द, अध्ययन, तीन दुःखविघात, सुहृत्प्राप्ति और दान — ये सिद्धियाँ हैं । सिद्धिसे पूर्व तीन -है । प्रकारका अङ्कुश व्याख्या – सिद्धियाँ आठ हैं – ऊह, शब्द, अध्ययन, सुहृत्प्राप्ति, दान, आध्यात्मिक दुःखहान, आधिभौतिक दुःखहान और आधिदैविक दुःखहान । ऊह - सिद्धि – पूर्व - जन्मके संस्कारोंसे स्वयं इस सृष्टिको देख - भालकर नित्य - अनित्य, चित् - अचित्के निर्णयसे चौबीस तत्त्वोंका यथार्थ ज्ञान होना । शब्द - सिद्धि - विवेकी गुरुके उपदेशसे ज्ञान होना । अध्ययन - सिद्धि - वेद आदि शास्त्रोंके अध्ययनसे ज्ञान होना । सुहृत्प्राप्ति - सिद्धि – वे सिद्ध पुरुष जो स्वयं मनुष्योंका अज्ञान मिटानेके लिये घूम रहे हैं, उनमेंसे किसी दयालुके मिल जानेसे ज्ञानका प्राप्त होना । दान - सिद्धि – वे योगी जो अपने खाने - पीनेकी आवश्यकताओंसे निरपेक्ष होकर आत्मसाक्षात्कारमें लगे हुए हैं उनकी भोजन आदि सब प्रकारकी आवश्यकताओंको श्रद्धा - भक्तिके साथ पूरा करनेसे उनके प्रसादसे ज्ञान लाभ करना । गीता अध्याय १७ में सात्त्विक, राजस और तामस मनोवृत्तिके भेदसे तीन प्रकारका दान बतलाया गया है1 यथा-दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे । देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥ २० ॥

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः । दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥ २१ ॥

अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते । असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥

दान देना ही कर्तव्य है— ऐसे भावसे जो दान देश, काल और पात्रके प्राप्त होनेपर प्रत्युपकार न करनेवालेके लिये दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है ॥ २० ॥ और जो दान क्लेशपूर्वक तथा

प्रत्युपकारके प्रयोजनसे अथवा फलको उद्देश्य रखकर फिर दिया जाता है, वह दान राजस कहा गया है ॥ २१ ॥ और जो दान बिना सत्कार किये अथवा तिरस्कारपूर्वक अयोग्य देश, कालमें कुपात्रों

( मद्यमांसादि अभक्ष्य वस्तुओंका सेवन करनेवाले, हिंसक, दुराचारी, पाप कर्म करनेवाले ) के लिये दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है ॥ २२ ॥ दान देनेवाले तथा दान लेनेवाले दोनोंके लिये सात्त्विक

तामसी दान ही इष्ट है । राजस तथा तामस दान देनेवाले तथा लेनेवाले दोनोंके लिये राजसी तथा वृत्तियोंका उत्पन्न करनेवाला होता है । ( ९ ५ )

पृष्ठ 118

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चौथा प्रकरण ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ दस मूल धर्म उपर्युक्त पाँच सिद्धियाँ तत्त्वज्ञानके उपाय हैं और निम्न तीन सिद्धियाँ उनके फल हैं । आध्यात्मिक दुःख - हान— सब आध्यात्मिक दुःखोंका मिट जाना । आधिभौतिक दुःख - हान — सब आधिभौतिक दुःखोंका मिट जाना । आधिदैविक दुःख - हान– सब आधिदैविक दुःखोंका मिट जाना । इनसे उलटी आठ प्रकारकी असिद्धियाँ बुद्धिकी आठ प्रकारकी अशक्तियाँ हैं । सङ्गति — आध्यात्मिक विषयोंका वर्णन करके अब अगले सूत्रमें मूल तत्त्वोंका धर्म बतलाते हैं । दस मूल धर्म दश मौलिकार्थाः ॥ १६ ॥

दस मूलभूत धर्म हैं ( अस्तित्व, संयोग, वियोग, शेषवृत्तित्व, एकत्व, अर्थवत्त्व, परार्थ्य, अन्यता, अकर्तृत्व और बहुत्व ) । अव्यक्त और पुरुषके संयोगसे सृष्टि -रचना - र हुई है । पुरुष तो सदा ही अपने वास्तविक व्याख्या – शुद्ध ज्ञानस्वरूपसे असंग, निर्लेप और निर्विकार ही रहता है, यह जड अव्यक्तका धर्म- संयोग उसमें विकल्पसे कहा जाता है । सृष्टिमें जो धर्म पाये जाते हैं, वे कार्य - जगत्के धर्म हैं । उससे पहले मूलभूत अव्यक्त और पुरुषमें जो धर्म पाये जाते हैं, वे मौलिक धर्म हैं । अस्तित्व, संयोग, वियोग और शेष वृत्तित्व – ये चार धर्म पुरुष और अव्यक्त दोनोंके हैं । संयोग और वियोग परिणामी अव्यक्तके स्वाभाविक और वास्तविक धर्म हैं, किंतु कूटस्थ नित्य पुरुषमें विकल्पसे कहे गये हैं । अव्यक्त और पुरुष दोनोंमें अस्तित्व है । दोनों परस्पर संयुक्त होते हैं, जिससे सृष्टि - रचना होती है । दोनों वियुक्त होते हैं, जब मोक्ष होता है । दोनों विद्यमान रहते हैं, जब प्रलय होती है ( भावागणेशादिने जीवन्मुक्तके संस्कारमात्रसे ' चक्रभूमिवत् ' शरीरकी जो स्थिति है, उसको शेष - वृत्ति मानकर केवल पुरुषका धर्म बतलाया है । ) एकत्व, अर्थवत्व और परार्थ्य- ये तीन धर्म अव्यक्तमें हैं । अव्यक्त एक है, प्रयोजनवाला है, पुरुष ( जीव ) को भोग और अपवर्ग देना इसका प्रयोजन है और परार्थ है, क्योंकि पुरुषके लिये काम करता है अपने लिये नहीं । ( भावागणेशादिने ' अर्थवत्त्व ' को पुरुषार्थवत्त्व मानकर पुरुषका धर्म कहा है । ) एकत्व- - यह धर्म पुरुष अर्थात् शुद्ध चेतन- -तत्त्वका तथा समष्टि अन्तःकरण ( विशुद्धसत्त्वमय चित्त ) की अपेक्षासे उसके शबलस्वरूप ईश्वरका भी है । अन्यता और बहुत्व — जडवर्गसे भिन्न होनेसे अन्यत्व धर्म पुरुषका है और व्यष्टि अन्तःकरणोंके सम्बन्धसे जीव अर्थ पुरुषका बहुत्व धर्म है, जो व्यष्टि अन्तःकरणों ( सत्त्वचित्तों ) की अपेक्षासे परस्पर भिन्न और संख्यामें बहुत ( अनन्त ) हैं । अकर्तृत्व — यह धर्म पुरुष ( शुद्ध - चेतन - तत्त्व ) का है । पुरुष अपने शुद्ध चेतन - स्वरूपसे कर्ता नहीं है, किंतु द्रष्टा है । कर्तृत्व — यह धर्म गुणोंमें है । सङ्गति – अगले सूत्रमें सृष्टि- -रचनाका प्रयोजन बताते हैं । ( ९ ६ )

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चौथा प्रकरण ] * षड्दर्शनसमन्वय* [ चौदह प्रकारकी प्राणि - सृष्टि सृष्टिका रूप अनुग्रहः सर्गः ॥ १७ ॥

अनुग्रह सृष्टि है ।

इत्येष प्रकृतिकृतो महदादिविशेषभूतपर्यन्तः ।

प्रतिपुरुषविमोक्षार्थं स्वार्थ इव परार्थ आरम्भः ॥

( सां ० का ० ५६ ) इस प्रकार यह प्रकृतिसे किया हुआ महत्तत्त्वसे लेकर विशेष अर्थात् पाँचों स्थूल भूतों और इन्द्रियोंतकका आरम्भ प्रत्येक पुरुषके मोक्षके लिये स्वार्थके सदृश परार्थ है । जिस प्रकार एक मित्र अपने मित्रके कार्यमें प्रवृत्त हुआ उसे अपने स्वार्थके सदृश साधता है, इसी प्रकार यह प्रकृति पुरुषके प्रयोजनको स्वार्थकी भाँति साधती है; जबतक वह मोक्ष नहीं पा लेता । मोक्ष पा लेनेपर फिर उसके लिये रचना नहीं रचती, यद्यपि दूसरोंके लिये रचती है ( क्योंकि मुक्तको अब उसकी रचनासे कोई प्रयोजन नहीं है ) । औत्सुक्यनिवृत्त्यर्थं यथा क्रियासु प्रवर्तते लोकः । पुरुषस्य विमोक्षार्थं प्रवर्तते तद्वदव्यक्तम् ॥ ( सां ० का ० ५८ ) उत्कण्ठाके मिटानेके लिये जैसे लोक ( दुनिया ) कामोंमें प्रवृत्त होता है ( भूख मिटानेके लिये भोजनमें प्रवृत्त होते हैं ), इसी प्रकार पुरुषके मोक्षके लिये प्रधान अर्थात् प्रकृति प्रवृत्त हो रही है 1 व्याख्या - अव्यक्तकी पुरुषके अनुकूल प्रवृत्ति सृष्टि है; क्योंकि अव्यक्त सृष्टि - रचनामें पुरुषके लिये बुद्धि, अहंकार, इन्द्रियाँ, शरीर और विषय आदि रचता है । उसकी सारी रचना पुरुषके भोग और अपवर्गके लिये ही है; क्योंकि पुरुषकी संनिधिमें पुरुषके ही ज्ञानसे पुरुषके लिये ही उसमें सारी क्रियाएँ ज्ञान, नियम और व्यवस्थापूर्वक हो रही हैं । सङ्गति — अगले सूत्रमें प्राणियोंकी सृष्टि बतलाते हैं । चौदह प्रकारकी प्राणि - सृष्टि चतुर्दशविधो भूतसर्गः ॥ १८ ॥

चौदह प्रकारकी प्राणियोंकी सृष्टि है ।

अष्टविकल्पो दैवस्तैर्यग्योनिश्च पञ्चधा भवति ।

मानुष्यश्श्चैकविधः समासतो भौतिकः सर्गः ॥

ऊर्ध्वं सत्त्वविशालस्तमोविशालश्च मूलतः सर्गः ।

मध्ये रजोविशालो ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तः ॥

( सां ० का ० ५३-५४ ) आठ प्रकारकी दैवी सृष्टि है । पाँच प्रकारकी तिर्यक् योनियोंकी है । मनुष्यकी एक प्रकारकी है । ये संक्षेपसे प्राणियोंकी सृष्टि हैं । ऊपरकी सृष्टि सत्त्वप्रधान है, निचली तमः प्रधान है और मध्यकी रजःप्रधान है । ये ब्रह्मासे लेकर शैवालतक सृष्टि हैं । व्याख्या – चौदह प्रकारकी प्राणियोंकी सृष्टि इस प्रकार है— ब्राह्म, प्राजापत्य, ऐन्द्र, दैव, गान्धर्व, पित्र्य, विदेह और प्रकृतिलय – यह आठ प्रकारका दैव - सर्ग है, जो भिन्न - भिन्न कर्मोपासनाका फल है 1 ( ९ ७ )

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चौथा प्रकरण ] पातञ्जलयोगप्रदीप* * [ चौदह प्रकारकी प्राणि - सृष्टि इसके बाद नवाँ मानुष - सर्ग अर्थात् मानुषी - सृष्टि है और अन्तमें, मनुष्यसे नीचे पशु, पक्षी, सरीसृप अर्थात् रेंगनेवाले जन्तु, कीट और स्थावर – इन पाँचका तिर्यक् - सर्ग है । -उपर्युक्त १४ प्रकारकी सृष्टिमेंसे मनुष्यसे नीचे ५ प्रकारके तिर्यक् - सर्गका तो प्रत्यक्ष होता है, किंतु मनुष्यसे ऊँचे ८ प्रकारके दैव - सर्गका मनुष्योंसे सूक्ष्म होनेके कारण प्रत्यक्ष नहीं हो सकता । वितर्कानुगतसे ऊँची प्रकाशमय विचारानुगत सम्प्रज्ञात - समाधिमें सूक्ष्मताके तारतम्यसे जो आनन्दमें अन्तर है, इसी प्रकार इनमेंसे पहले ६ सर्गोंमें परस्पर अन्तर है । इन छहों में भी सूक्ष्मताके तारतम्यसे आनन्दमें परस्पर और कई अवान्तर भेद हो सकते हैं । इसी कारण बृहदारण्यक उपनिषद्, शतपथ ब्राह्मण और तैत्तिरीय उपनिषदादिमें इनके नामोंमें कुछ अन्तर प्रतीत होता है; किंतु जिस प्रकार प्रकाशमय विचारानुगत संकल्पमयी अवस्था समानरूपसे होती है, यद्यपि इसमें समाधि - अवस्थाकी सूक्ष्मताके अनुसार अन्तर होता है । इसी प्रकार इन सब सर्गोंमें जीव संकल्पमय होता है, यद्यपि संकल्पोंमें परस्पर सूक्ष्मता और आनन्दके तारतम्यसे अन्तर होता है । ये सब स्वः, महः, जनः, तपः और सत्यम् के अन्तर्गत हैं । विदेह और प्रकृतिलयोंका आनन्द और सूक्ष्मता पहले ६ सर्गोंकी अपेक्षा अधिक है और उनकी अवधि भी इनसे अधिक है; क्योंकि विदेह विचारानुगतसे ऊँची आनन्दानुगत सम्प्रज्ञातसमाधिकी भूमितक पहुँचे हुए हैं और शरीरसे अभिमान छोड़े हुए हैं तथा प्रकृतिलय इससे भी ऊँची अस्मितानुगत भूमिमें अहङ्कारका भी अभिमान छोड़े हुए हैं । ये दोनों अवस्थाएँ केवल योगियोंको ही प्राप्त होती हैं । इसलिये तैत्तिरीय उपनिषद्, बृहदारण्यक उपनिषद् और शतपथ ब्राह्मणमें इनका वर्णन नहीं है । श्रीव्यासजी महाराज विभूतिपाद सूत्र २६ के भाष्यमें इनके सम्बन्धमें लिखते हैं- ' विदेह और प्रकृतिलय नामक योगी कैवल्यके तुल्य स्थितिमें हैं, इसलिये वे किसी ( दिव्य ) लोकमें निवास करनेवालोंके साथ नहीं उपन्यास किये गये । ' अवान्तर भेदोंको लेकर ही उपर्युक्त प्रथम छः सर्गोंका कई प्रकारसे वर्णन किया गया है । यथा-तैत्तिरीय उपनिषद्, शीक्षावल्ली अनुवाक ८ । १. मनुष्यके आनन्दकी काष्ठाका सौगुना आनन्द मनुष्य - गन्धर्वलोकवालोंको । २. मनुष्य - गन्धर्वका सौगुना आनन्द दैव - गन्धर्वलोकवालोंको । दैव - गन्धर्वका सौगुना आनन्द पितरलोकवालोंको । ३. ४. पितरका सौगुना आनन्द आजानजदैवलोकवालोंको । ५. आजानज देवताओंका सौगुना आनन्द कर्मदेवलोकवालोंको । ६. कर्मदेवका सौगुना आनन्द दैवलोकवालोंको । ७. दैवका सौगुना आनन्द इन्द्रलोकवालोंको । ८. इन्द्रका सौगुना आनन्द बृहस्पतिलोकवालोंको । ९. बृहस्पतिका सौगुना आनन्द प्रजापतिलोकवालोंको । १०. प्रजापतिका सौगुना आनन्द ब्रह्माके लोकवालोंको । ( ९ ८ )