पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 121–130
पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 121–130
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चौथा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * * [ चौदह प्रकारकी प्राणि - सृष्टि बृहदारण्यक उपनिषद् ४ । ३ । २ । १. मनुष्यके आनन्दकी पराकाष्ठाका सौगुना आनन्द पितरलोकवालोंको । २. पितरका सौगुना आनन्द गन्धर्वलोकवालोंको । ३. गन्धर्वका सौगुना आनन्द आजानजदेवलोकवालोंको । ४. आजानजदेवका सौगुना आनन्द प्रजापतिलोकवालोंको । ५. प्रजापतिलोकवालोंका सौगुना आनन्द ब्रह्माके लोकवालोंको । शतपथ १४ । ७ । १ । ३१ । १. मनुष्यका सौगुना आनन्द पितरलोकवालोंको । २. पितरका सौगुना आनन्द कर्मदेवलोकवालोंको । ३. कर्मदेवका सौगुना आनन्द आजानजदेवलोकवालोंको । ४. आजानजदेवका सौगुना आनन्द देवलोकवालोंको I ५०. देवका सौगुना आनन्द गन्धर्वलोकवालोंको । ६. गन्धर्वका सौगुना आनन्द प्रजापतिलोकवालोंको । ७. प्रजापतिका सौगुना आनन्द ब्रह्माके लोकवालोंको । उन्हीं सूक्ष्म लोकोंको ही चन्द्रलोक, सोमलोक और स्व:, मह:, जनः, तपः, सत्यम् कहते हैं । जिस प्रकार व्युत्थानकी अपेक्षा सम्प्रज्ञात - समाधि योग है, किंतु असम्प्रज्ञातसमाधिकी अपेक्षा सम्प्रज्ञातसमाधि व्युत्थान है, इसी प्रकार मनुष्यके मृत्युलोककी अपेक्षा यह सब अमरलोक और मनुष्यके बन्धनकी अपेक्षासे यह पुनरावृत्ति मुक्तिकी अवस्थाएँ हैं, किंतु अपुनरावृत्ति मुक्ति ( कैवल्य ) की अपेक्षासे यह सब बन्धन है । यथा— आ ब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन । मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥ ( गीता ८। १६ ) ब्रह्मलोकसे लेकर सब लोक पुनरावर्ती स्वभाववाले हैं, किंतु हे अर्जुन! मुझ ( शुद्ध ‘ चेतनतत्त्व ’ परब्रह्म परमात्मा ) को प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता । इस पुनर्जन्म न होनेवाली मुक्तिके भी दो भेद हो सकते हैं— ( १ ) वे योगी जो असम्प्रज्ञातसमाधिद्वारा चित्तके सर्व संस्कार और अविद्यादि क्लेश नाश कर चुके हैं, किंतु उनके चित्तमें केवल संसारके प्राणियोंके कल्याणका संकल्प शेष रह गया है, इसलिये यह संकल्प ईश्वरके प्राणियोंके कल्याणके नित्य संकल्पके तदाकार होनेके कारण, इनके चित्त ईश्वरके विशुद्ध सत्त्वमय चित्तमें लीन होकर पुनः न आनेवाली मुक्तिका लाभ करते हैं और समय - समयपर उसके नियमानुसार प्राणीमात्रके कल्याणके लिये संसारमें अवतरण करते हैं अर्थात् अवतार लेते हैं । यथा—
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ ( गीता ४। ७-८ ) हे भारत! जब - जब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है, तब - तब मैं अपने - आपको प्रकट करता हूँ । सज्जनोंकी रक्षा करनेके लिये और दूषित कर्म करनेवालोंका नाश करनेके लिये तथा ( ९९ )
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चौथा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ बन्ध और मोक्षके तीन प्रकार धर्मस्थापन करनेके लिये युग - युगमें प्रकट होता हूँ । ( २ ) जो योगी असम्प्रज्ञातसमाधिद्वारा सारे संस्कार और अविद्यादि क्लेश नाश कर चुके हैं तथा उपर्युक्त संकल्पशेष भी निवृत्त कर चुके हैं, उनके चित्त बनानेवाले गुण अपने कारणमें लीन हो जाते हैं और आत्मा ( चेतनतत्त्व ) अपने शुद्ध कैवल्य स्वरूपमें अवस्थित हो जाता है । पहली अवस्थावाले योगी इस संकल्पको हटाकर चित्तके बनानेवाले गुणोंको अपने कारणमें लीन करनेका हर समय अधिकार रखते हैं तथा कहीं - कहीं कलाओंकी न्यूनाधिकता दिखलाकर अवतारोंके कई अवान्तर भेद बतलाये हैं । इसी प्रकार कहीं - कहीं इन चित्तोंको सिद्ध चित्त तथा निर्माण चित्तके नामसे वर्णन किया गया है I सङ्गति — अगले सूत्रमें उनका बन्ध और मोक्ष बतलाते हैं । बन्ध और मोक्षके तीन प्रकार त्रिविधो बन्धः ॥ १ ९ ॥ त्रिविधो मोक्षः ॥ २० ॥
तीन प्रकारका बन्ध ( वैकृतिक, दाक्षिणिक और प्राकृतिक ) होता है ॥ १ ९ ॥ तीन प्रकारका मोक्ष ( वैकृतिक, दाक्षिणिक और प्राकृतिक ) होता है ॥ २० ॥
व्याख्या — बन्ध तीन प्रकारका है— वैकृतिक ( वा वैकारिक ), दाक्षिणिक और प्राकृतिक । जो योगी वितर्कानुगतवाली प्रथमभूमिमें आत्मसाक्षात्कारसे शून्य केवल भूत, इन्द्रिय, मन आदि १६ विकारोंमें ही आसक्त हो रहे हैं अथवा राजसी प्रवृत्तिवाले मनुष्य जिनके कर्म सत्त्वगुण, तमोगुण दोनोंसे मिश्रित हैं, वे इन वैकृतिक वासनाओंके अधीन उसी भूमिमें मनुष्यलोकमें जन्म लेते हैं । इनका यह बन्ध वैकृतिक वा वैकारिक कहलाता है । जो विचारानुगतवाली दूसरी भूमिमें आत्मसाक्षात्कारस शून्य रहकर केवल सूक्ष्म विषयोंमें ही आसक्त हो रहे हैं तथा जो आत्मसाक्षात्कारसे शून्य रहकर फल - कामनाके अधीन होकर केवल सकाम इष्ट - पूर्त आदि परोपकार और अहिंसात्मक सात्त्विक कर्मोंमें लगे हुए हैं, वे इन सात्त्विक वासनाओंके अधीन होकर दक्षिणमार्गसे चन्द्रलोक अर्थात् सात्त्विकताके तारतम्यानुसार सूत्र १८ में बतलायी हुई ६ दैव सर्गोंमें सात्त्विक वासनाओंका फल भोगकर आत्मसाक्षात्कारके लिये अपनी पिछली भूमिकी योग्यताको लिये हुए मनुष्यलोकमें फिर जन्म लेते हैं । इनका यह बन्ध दाक्षिणिक कहलाता है । ( देखो विभूतिपाद सूत्र ३ ९ का विशेष वक्तव्य ) सम्प्रज्ञात - समाधिकी उच्चतर और उच्चतम भूमि आनन्दानुगत और अस्मितानुगतको प्राप्त किये हुए योगी जो आत्मसाक्षात्कारसे शून्य रहकर केवल इन भूमियोंके आनन्दमें आसक्त रहते हैं और विवेकख्यातिद्वारा स्वरूपावस्थितिका यत्न नहीं करते हैं, वे शरीर त्यागनेके पश्चात् इन वासनाओंके अधीन लम्बे समयतक विदेह और ( अस्मिता ) प्रकृतिलय अवस्थामें कैवल्यपद - जैसी स्थितिमें रहकर आत्मसाक्षात्कारके लिये पानीमें डुबकी लगानेवाले पुरुषके सदृश फिर उठते हैं अर्थात् उच्च कुलवाले योगियोंके घरमें अपनी पिछली भूमिकी योग्यताको प्राप्त किये हुए फिर जन्म लेते समाधिपाद ० १८, १ ९ ) । इनका यह बन्ध प्राकृतिक बन्ध है । अर्थात् आत्मसाक्षात्कारसे हैं ( देखो वितर्कानुगत भूमिमें आसक्त हुए योगियोंका बन्ध वैकृतिक, विचारानुगतमें आसक्त हुए शून्य रहकर योगियोंका बन्ध ( १०० )
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चौथा प्रकरण ] * षड्दर्शनसमन्वय * [ अवरोहण - क्रम दाक्षिणिक और आनन्दानुगत तथा अस्मितानुगत भूमियोंमें आसक्त हुए योगियोंका बन्ध प्राकृतिक कहलाता है । इन तीनों बन्धोंसे छूटना तीन प्रकारका मोक्ष है । स्थूल विषयोंसे आसक्ति हटाना तथा राजसी, तामसी वासनाओंका छोड़ना वैकारिक बन्धसे मोक्ष है । सूक्ष्म विषयोंसे आसक्ति हटाना तथा सात्त्विक कार्योंमें निष्काम भाव होना दाक्षिणिक बन्धसे मोक्ष है | आनन्दानुगत तथा अस्मितानुगत भूमिके आनन्दमें आसक्तिसे परवैराग्यद्वारा चित्तको हटाकर स्वरूपावस्थितिका लाभ प्राप्त करना प्राकृतिक बन्धसे मोक्ष है ऊपर तीन प्रकारका बन्ध और मोक्ष दिखलाकर यह बतला देना आवश्यक हो जाता है कि बन्ध और मोक्ष किसको होता है? उसका क्या स्वरूप है? और किस कारणसे होता है? तथा नास्तिकोंकी इस शङ्काका समाधान कर देना उचित प्रतीत होता है कि यदि संसारकी उत्पत्ति करनेवाला कोई ईश्वर माना जाता है तो जीवोंके बन्ध और दुःखोंका उत्तरदायित्व भी उसीपर आ जाता है । दो अनादि तत्त्व सांख्य और योगमें चेतन और जड दो अनादि तत्त्व माने गये हैं । पुरुष अर्थात् चेतन - तत्त्व ज्ञानस्वरूप, निष्क्रिय, असङ्ग, निर्लेप और कूटस्थ नित्य है और जड तत्त्व ( सत्त्व, रजस्, तमस् ) त्रिगुणात्मक, सक्रिय और परिणामी नित्य है । सत्त्व प्रकाश, हल्का, सुख, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य और धर्म स्वभाववाला है । तमस् भारी अन्धकार, मोह, अज्ञान, अवैराग्य और अधर्म स्वभाववाला है । रजस् क्रिया, गति, चञ्चलता और दुःख स्वभाववाला है । इन तीनों गुणोंके सरूप अर्थात् साम्य परिणामकी अवस्थाका नाम मूल प्रकृति है जो केवल अनुमान और आगमगम्य है । चेतन - तत्त्व पुरुषकी संनिधिसे इस जड - तत्त्वमें एक प्रकारका विरूप अर्थात् विषम परिणाम हो रहा है । अवरोहण - क्रम ( Descent ) ( १ ) महत्तत्त्व- -पहिला विषम परिणाम महत्तत्त्व है जो सत्त्वमें रजस् क्रियामात्र और उस तमस् क्रियाको रोकनेमात्र है । यह महत्तत्त्व सत्त्वकी विशुद्धतासे समष्टि रूपमें विशुद्ध सत्त्वमय चित्त कहलाता है जिसमें समष्टि अहंकार बीजरूपसे रहता है जो ईश्वरका चित्त है । और सत्त्वकी विशुद्धताको छोड़े हुए अपने व्यष्टि रूपमें सत्त्व चित्त कहलाता है जो अनन्त हैं । इन अनन्त सत्त्व चित्तोंमें व्यष्टि अहंकार बीजरूपसे रहते हैं । ये जीवोंके चित्त कहलाते हैं । चेतन तत्त्वमें अपने ज्ञानके प्रकाश डालनेकी और महत्तत्त्वमें इस ज्ञानके प्रकाशको लेनेकी अनादि योग्यता चली आ रही है । उदाहरण थोड़े ही अंशोंमें घटा - -तत्त्व त और महत्तत्त्व - जैसी कोई भी वस्तु भौतिक संसारमें उदाहरण देनेके लिये नहीं करता है । किन्तु चेतन मिल सकती । इसीलिये पारिभाषिक उदाहरणोंसे इन दोनों तत्त्वोंकी संनिधि बतलानेके विषयको समझ लेना चाहिये । इनके लौकिक अर्थोंपर नहीं जाना चाहिये । योगका उदाहरण जिस प्रकार सूर्यका प्रतिबिम्ब अनन्त जलाशयोंमें पड़ रहा है, इसी प्रकार चेतन - तत्त्वके ज्ञानका प्रकाश समष्टि विशुद्ध सत्त्वमय चित्तमें तथा व्यष्टि सत्त्व चित्तोंमें पड़ रहा है । यथा— ( १०१ )
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चौथा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* * [ अवरोहण - क्रम भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः । एक एव तु दृश्यन्ते बहुधा चैव जलचन्द्रवत् ॥१ ॥
एकधा
यथा ह्ययं ज्योतिरात्मा विवस्वान् अपोभिन्ना बहुधैकोऽनुगच्छन् ।
उपाधिना क्रियते भेदरूपो देवः क्षेत्रेष्वेवमजोऽप्ययमात्मा ॥२ ॥
अर्थ - एक ही भूतात्मा भूत - भूतमें विराज रहा है । जिस प्रकार एक ही चन्द्रमा जलमें अनेक होकर दीखता है उसी प्रकार वह आत्मा ( चेतन - तत्त्व ) भी अनेक रूपसे प्रतीत हो रहा है ॥ १ ॥ जिस प्रकार
ज्योतिःस्वरूप सूर्य एक होता हुआ भी भिन्न - भिन्न जलाशयोंमें अनेक होकर दीखता है । यह भेद उसका केवल उपाधिके कारण है । उसी प्रकार अनादि परमात्मदेव ( चेतन - तत्त्व ) क्षेत्रभेदसे अनेक रूपमें दिखायी दे रहा है ॥२ ॥
सांख्यका उदाहरण जिस प्रकार चुम्बककी संनिधिसे लोहेमें क्रिया होती है, इसी प्रकार चेतनतत्त्वकी संनिधिसे समष्टि तथा व्यष्टि चित्तोंमें ज्ञान - नियम और व्यवस्थापूर्वक क्रिया हो रही है । यथा—
निरिच्छे संस्थिते रत्ने यथा लोहः प्रवर्तते ।
सत्तामात्रेण देवेन तथा चायं जगज्जनः ॥
अत आत्मनि कर्तृत्वमकर्तृत्वं च संस्थितम् ।
निरिच्छत्वादकर्त्ताऽसौ कर्त्ता संनिधिमात्रतः ॥
( सांख्य प्रवचनभाष्य १ । ९ ७ ) अर्थ — जैसे बिना इच्छावाले चुम्बकके स्थित रहनेमात्रमें लोहा ( आप - से - आप ) गतिशील होता है, वैसे सत्तामात्र देव ( चेतन - तत्त्व ) से जगत् की उत्पत्ति आदि होती है । इस कारण परमात्मा ( चेतन - तत्त्व ) में कर्तृत्व और अकर्तृत्व भी अच्छे प्रकार सिद्ध है । वह निरिच्छ होनेसे अकर्त्ता और सामीप्यमात्रसे कर्ता है । उपनिषदोंका उदाहरण जिस प्रकार वायु सारे भुवनोंमें व्यापक हो रहा है, वैसे ही चेतन - तत्त्व समष्टि तथा व्यष्टि चित्तोंमें
व्याप्त हो रहा है । यथा-अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥
वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥
( कठोपनिषद् २। २। ९ -१० ) जैसे एक ही अग्नि सारे भुवनोंमें प्रविष्ट होकर प्रतिरूप हो रहा है, इसी प्रकार एक ही आत्मा ( चेतन - तत्त्व ) जो सब भूतोंके भीतर है - रूप- रूपमें प्रतिरूप हो रहा है और बाहर भी है । जैसे एक ही वायु सारे भुवनोंमें प्रविष्ट होकर रूप रूपमें प्रतिरूप हो रहा है, इसी प्रकार एक ही आत्मा जो सब भूतोंके अंदर है । रूप - रूपमें प्रतिरूप हो रहा है और बाहर भी है । ( १०२ )
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चौथा प्रकरण ] * षड्दर्शनसमन्वय * [ अवरोहण - क्रम महत्तत्त्वके ज्ञानस्वरूप चेतन तत्त्वसे प्रकाशित होनेको गीतामें अति सुन्दर शब्दोंमें वर्णन किया गया है । यथा— मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् । हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥ ( अ ० ९ श्लो ० १० )
मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ।
सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥
( अ ० १४ श्लो ० ३-४ ) हे अर्जुन! मेरा आश्रय करके प्रकृति चराचरसहित सब जगत्को रचती है । इसी कारण सारा जगत् परिवर्तित हो रहा है । हे अर्जुन! मेरी योनि ( गर्भ रखनेका स्थान ) महत्तत्त्व है । उसीमें मैं गर्भ रखता हूँ ( अर्थात् अपने ज्ञानका प्रकाश डालता हूँ ) और उसी ( जड़ - चेतनके संयोग ) से सब भूतोंकी उत्पत्ति होती है । हे अर्जुन! सब योनियोंमें जो शरीर उत्पन्न होते हैं उन सबकी योनि महत्तत्त्व है और उनमें बीजको डालनेवाला मैं ( चेतन - तत्त्व ) पिता हूँ । पुरुषसे प्रतिबिम्बित समष्टि चित्त, समष्टि अस्मिता और व्यष्टि चित्त, व्यष्टि अस्मिता कहलाते हैं । पुरुष निष्क्रिय होते हुए भी अपने चित्तका द्रष्टा है अर्थात् चित्तमें उसके ज्ञानके प्रकाशमें जो कुछ भी हो रहा है वह उसे स्वयं ज्ञात रहता है । व्यष्टि चित्तोंके सम्बन्धसे चेतन - तत्त्वका नाम जीव है । जो संख्यामें अनन्त हैं और अल्पज्ञ हैं । समष्टि चित्तके सम्बन्धसे चेतन - तत्त्वका नाम ईश्वर, अपरब्रह्म, सगुण ब्रह्म और शबल ब्रह्म है जो एक, सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान् और सर्वज्ञ है । अपने शुद्धस्वरूपसे चेतन-तत्त्वका नाम परमात्मा, निर्गुण ब्रह्म, परब्रह्म और शुद्धब्रह्म है । पुरुष शब्दका प्रयोग जीव, ईश्वर और परमात्मा तीनों अर्थोंमें होता है । किस प्रकरणमें पुरुष शब्दका प्रयोग किया गया है इसका ठीक - ठीक विवेक न रहनेके कारण बहुधा विद्वान् सांख्य और योगके वास्तविक सिद्धान्तको समझनेमें धोखा खाते हैं । ( २ ) महत्तत्त्वका विषम परिणाम अहंकार - पुरुष ( चेतन - तत्त्व ) से प्रतिबिम्बित महत्तत्त्व ही सत्त्वमें रज और तमकी अधिकतासे विकृत होकर अहंकाररूपसे व्यक्त भावमें बहिर्मुख हो रहा है । यह अहंकार ही अहंभावसे एकत्व, बहुत्व, व्यष्टि, समष्टिरूप सर्व प्रकारकी भिन्नता उत्पन्न करनेवाला है । विभाजक अहंकारहीसे ग्राह्य और ग्रहण रूप दो प्रकारके विषम परिणाम हो रहे हैं । ( ३ ) अहंकारका विषम परिणाम ग्राह्यरूप पञ्च- तन्मात्राएँ - विभाजक अहंकार ही सत्त्वमें रज और तमकी अधिकतासे विकृत होकर परस्पर भेदवाली ग्राह्यरूप शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध तन्मात्राओंके रूपमें व्यक्तभावसे बहिर्मुख हो रहा है । ( ४ ) अहंकारका विषम परिणाम ग्रहणरूप एकादश इन्द्रियाँ - वही अहंकार सत्त्वमें रज और तमकी कुछ विशेषताके साथ अधिकतासे विकृत होकर परस्पर भेदवाली शक्तिमात्र पाँच ज्ञानेन्द्रियों, पाँच कर्मेन्द्रियों और ग्यारहवाँ इनके नियन्ता मनरूपमें व्यक्त होकर बहिर्मुख हो रहा है । ( ५ ) तन्मात्राओंके विषम परिणाम ग्राह्यरूप पाँच स्थूल भूत - अहंकारसे व्याप्य पाँचों तन्मात्राएँ ही सत्त्वमें रज और तमकी अधिकतासे विकृत होकर परस्पर भेदवाले आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी-( १०३ )
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चौथा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ अवरोहण - क्रम रूप पाँचों स्थूल भूतोंमें व्यक्तभावसे बहिर्मुख हो रही हैं । इस प्रकार बहिर्मुखता ( अवरोहण ) में महत्तत्त्वकी अपेक्षा अहंकारमें, अहंकारकी अपेक्षा पाँचों तन्मात्राओं और ग्यारह इन्द्रियोंमें और तन्मात्राओंकी अपेक्षा पाँचों स्थूल भूतोंमें क्रमशः रज और तमकी मात्रा बढ़ती जाती है और सत्त्वकी मात्रा कम होती जाती है । यहाँतक कि स्थूल जगत् और स्थूल शरीरमें रज और तमका ही व्यवहार चल रहा है । सत्त्व केवल प्रकाशमात्र ही रह रहा है । महत्तत्त्वमें प्रतिबिम्बित चेतन - तत्त्व भी उपरोक्त राजसी और तामसी आवरणोंमें आच्छादित होकर स्थूल शरीर और भौतिक जगत्में केवल झलकमात्र ही दिखायी दे रहा है । ऊपरके विवरणसे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि पुरुष अर्थात् चेतन तत्त्वके शुद्ध स्वरूपमें तथा जड अर्थात् गुणोंके साम्य परिणाममें न कोई कार्य हो रहा है और न हो सकता है । जड - तत्त्व क्योंकि त्रिगुणात्मक है । इसलिये चेतन तत्त्वकी संनिधिमात्रसे होनेवाले विषम परिणाममें ग्राह्य और ग्रहणरूपमें तीनों गुणोंकी न्यूनाधिकताके कारण सारे भेदभाव और कार्य तथा बन्ध और मोक्ष भी हो रहा है । कारण, सूक्ष्म तथा स्थूल जगत् के सम्बन्धसे चेतन तत्त्व ईश्वर और कारण, सूक्ष्म तथा स्थूल शरीरके सम्बन्धसे चेतन - तत्त्व जीव कहलाता है । इसलिये सारा कार्य जीव, ईश्वर और प्रकृति — इन तीनों तत्त्वोंमें हो रहा -है और हो सकता है । ईश्वरको समष्टिरूपमें और जीवको व्यष्टिरूपमें जड़ और चेतनका सम्मिश्रण समझना चाहिये । कारण जगत् अर्थात् समष्टि विशुद्ध सत्त्वमय चित्त एक है । इसलिये ईश्वर एक है । चूँकि इसमें जीवोंके प्रति कल्याण करनेका संकल्प, वेदोंका ज्ञान, सर्वव्यापकता, सर्वशक्तिमत्ता आदि सारी शक्तियाँ निरतिशयताको प्राप्त किये हुए हैं इसलिये ईश्वर इन लक्षणोंसे युक्त है । सत्त्वचित्त अर्थात् कारणशरीर संख्यामें अनन्त हैं इसलिये जीव संख्यामें अनन्त हैं । ये विशुद्ध सत्त्वमय चित्तकी अपेक्षा परिच्छिन्न, अल्पज्ञ और अल्प शक्तिवाले हैं इसलिये जीव भी इन लक्षणोंसे युक्त हैं । ये सत्त्व चित्त चूँकि सत्त्वकी विशुद्धताको छोड़े हुए हैं, इसलिये इनमें लेशमात्र तम है जिसमें अविद्या वर्तमान है । अविद्यासे आत्मा और चित्तमें अभिन्नताकी प्रतीति करानेवाला अस्मिता क्लेश उत्पन्न हो रहा है । दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता । ( यो ० द ० सा ० पाद सूत्र ६ ) -शक्ति आत्मा और दर्शन - शक्ति चित्तका एक स्वरूप - जैसा भान होना अस्मिता क्लेश है । द्रष्ट-: अस्मिता क्लेशसे राग, द्वेष और अभिनिवेश क्लेश, उनसे सकामकर्म, सकामकर्मसे जन्म, आयु और भोग — उनमें सुख और दुःख होते हैं । इस प्रकार बन्धकी शृङ्खला बढ़ती जाती है द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः । ( यो ० द ० सा ० पाद सूत्र १७ ) अर्थ- द्रष्टा और दृश्यका संयोग “ हेयहेतु ” ( दुःखका कारण ) है । तस्य हेतुरविद्या । यो ॰ द ॰ सा ॰ पाद सूत्र २४ ) अर्थ - इस संयोगका कारण अविद्या है । तदभावात् संयोगाभावो हानं तद्दृशेः कैवल्यम् । यो ० द ० सा ० पाद सूत्र २५ ) उसके ( अविद्याके ) अभावसे संयोगका अभाव ' हान ' है । वह चिति शक्तिका कैवल्य है । विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः । ( यो ० द ० सा ॰ पाद सूत्र २६ ) अविप्लव विवेक - ख्याति हानका उपाय है । ( १०४ )
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चौथा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय* [ अवरोहण - क्रम इस विवेक - ख्यातिकी अवस्थामें सत्त्व चित्तमें सत्त्वकी विशुद्धता इतनी बढ़ जाती है कि उसके लेशमात्र तममें जो अविद्या वर्तमान थी वह अपने अस्मिता क्लेश आदि परिवारसहित दग्धबीज - भावको प्राप्त होने लगती है और तम उस केवल सात्त्विक वृत्तिको रोकनेका काम करता रहता विवेक - ख्यातिमें जो आत्मसाक्षात्कार होता है उससे सत्त्व चित्तकी विशुद्धता इतनी बढ़ जाती है है कि । उस वृत्तिको स्थिर रखनेवाले तमको भी दबा दे । तब उस अन्तिम सात्त्विक वृत्तिके भी निरुद्ध हो जानेपर उस आत्माकी असम्प्रज्ञातसमाधिरूप परमात्मस्वरूपमें अवस्थिति हो जाती है । यही वास्तवमें मोक्षका नमूना है । प्राकृतिक किन्तु विवेक - ख्यातिकी प्राप्तिका उपाय अष्टाङ्गयोग बतलाया गया है । यथा— योगाङ्गानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः । ( यो ० द ० सा ० पाद सूत्र २८ ) योगके अङ्गोंके अनुष्ठानसे अशुद्धिके नाश होनेपर ज्ञानका प्रकाश विवेक - ख्याति - पर्यन्त हो जाता है । योगके आठ अङ्ग — यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि बतलाये गये हैं । इनमें सबसे अन्तिम अङ्ग ( सम्प्रज्ञात ) समाधि है । इस सम्प्रज्ञातसमाधिकी चार भूमियाँ – वितर्कानुगत, विचारानुगत, आनन्दानुगत और अस्मितानुगत हैं । ऊपर हमने अवरोह क्रम बतला दिया है । इससे उलटे आरोह क्रम ( Ascent ) में जितनी अन्तर्मुखता बढ़ती जायगी, उतना ही रज और तमका विक्षेप तथा मल हटकर सत्त्वका प्रकाश बढ़ता जायेगा । और इस सत्त्वके प्रकाशमें चेतन ( आत्म - स्पर्श ) की अधिक स्पष्टतासे प्रतीति बढ़ती जायेगी । यही क्रम बन्धको हटाने और मोक्षकी प्राप्तिका है । ( १ ) इस आरोह क्रममें सबसे पहली अवस्था वितर्कानुगत सम्प्रज्ञातसमाधि है, जिसमें रज और तमके दबनेपर सत्त्वके प्रकाशमें स्थूलभूतों और उनके व्यवहारके वास्तविक स्वरूपका साक्षात्कार होता है । इस भूमिका सम्बन्ध चूँकि पाँचों स्थूल भूतों और उनसे बने हुए स्थूल पदार्थ, स्थूल शरीर और स्थूल जगत् ( भूः, भुवः अर्थात् पृथ्वी और नक्षत्रलोक ) से है । इसलिये इस भूमितक वैकारिक बन्ध बतलाया गया है । ( २ ) दूसरी अवस्था विचारानुगत सम्प्रज्ञातसमाधि है । इसमें रज और तमके अधिक दबनेपर सत्त्वके अधिक प्रकाशमें पाँचों स्थूल भूतोंके कारण पाँचों सूक्ष्म भूतोंका उनकी सूक्ष्मताके तारतम्यसे पाँचों तन्मात्राओंतकका साक्षात्कार होता है और उसका सम्बन्ध पाँचों सूक्ष्म भूत, सूक्ष्म शरीर और सूक्ष्म जगत् ( चन्द्रलोक, सोमलोक अथवा स्वः, महः, जनः, तपः और सत्यम् जो एक प्रकारसे सूक्ष्मताकी अवस्थाएँ हैं ) से है और इनमें आसक्त योगी इस पुनरावर्त्तिनी मुक्तिको प्राप्त होता है । इसलिये इस वैकारिक बन्ध अर्थात् जन्म, मृत्यु, जरा और रोगसे तो मोक्ष हो जाता है किन्तु इसमें दाक्षिणिक बन्ध अर्थात् सूक्ष्म शरीर और उससे सम्बन्ध रखनेवाले राग - द्वेष आदि मानसिक विकार बने रहते हैं इसलिये इसे दाक्षिणिक बन्ध है बतलाया गया I न विशेषगतिर्निष्क्रियस्य । ( सांख्य ५ । ७६ ) विशेष गतिका प्राप्त हो जाना वास्तविक मुक्ति नहीं है; क्योंकि आत्मा अपने शुद्ध ज्ञानस्वरूपसे ( १०५ )
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चौथा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप '* [ अवरोहण - क्रम निष्क्रिय है । संयोगाश्च वियोगान्ता इति न देशादिलाभोऽपि । ( सांख्य ५। ८४ ) संयोग वियोगान्त है । इसलिये किसी देश विशेष ( चन्द्रलोकके अन्तर्गत किसी सूक्ष्म लोक ) का लाभ भी वास्तविक मुक्ति नहीं है । ( ३ ) तीसरी अवस्था आनन्दानुगत सम्प्रज्ञातसमाधि है । जिसमें तन्मात्राओंके रज और तम दब जानेपर, सत्त्वके प्रकाश बढ़नेपर उनके कारण अहंकारका " अहम् अस्मि " वृत्तिसे साक्षात्कार होता है । इस सत्त्वके आनन्द और प्रकाशमें चेतन तत्त्वकी इतनी स्पष्टतासे प्रतीति होती है कि कुछ योगी इसी अवस्थाको आत्मस्थिति समझकर इसीमें आसक्त हो जाते हैं और शरीर त्यागनेपर इस अवस्थामें दिव्य लोकोंसे परे होकर उनके कालकी अवधिसे अधिक समयतक कैवल्य - जैसे आनन्दको भोगते रहते हैं । ये विदेह कहलाते हैं । ( ४ ) चौथी अवस्था अस्मितानुगत सम्प्रज्ञातसमाधिकी है । इसमें अहंकारके रज और तमके दब जानेपर सत्त्वके प्रकाशमें उसके कारण चित्तका साक्षात्कार ' अस्मि ' वृत्तिसे होता है । इस सत्त्वके प्रकाशमें चित्तमें प्रतिबिम्बित चैतन्य ( आत्म - स्पर्श ) की इतनी स्पष्टतासे प्रतीति होती है कि कई योगी इसी अवस्थाको आत्म - स्थिति समझकर इसीमें आसक्त हो जाते हैं और शरीर त्यागनेपर इस अवस्थामें दिव्य लोकोंसे भी अधिक अवधितक कैवल्य - जैसे आनन्दको भोगते रहते हैं । ये प्रकृतिलय कहलाते हैं । उपर्युक्त दोनों अवस्थाओंमें दाक्षिणिक बन्ध अर्थात् सूक्ष्म शरीर और सूक्ष्म जगत्के बन्धसे तो मोक्ष हो जाता है किन्तु इसमें भी प्राकृतिक बन्ध बना रहता है । विदेहोंको अहंकारका और प्रकृतिलयोंको अस्मिताका । यथा-नानन्दाभिव्यक्तिर्मुक्तिर्निर्धर्मत्वात् । ( सांख्य ५। ७४ ) आनन्दका प्रकट हो जाना मुक्ति नहीं है, ( क्योंकि वह आत्माका ) धर्म नहीं है ( किन्तु अन्तःकरणका धर्म है ) । ( सांख्य १।५४ ) न कारणलयात् कृतकृत्यता मग्नवदुत्थानात् । कारण ( अस्मिता प्रकृति ) में लय होनेसे पुरुषको कृतकृत्यता ( स्वरूप - अवस्थिति ) नहीं हो सकती, क्योंकि इसमें डुबकी लगानेवालेके समान ( पानीसे ऊपर ) आत्म - स्थिति प्राप्त करनेके लिये उठना ( मनुष्य - लोकमें आना ) होता है । असम्प्रज्ञातसमाधि और कैवल्यकी अवस्थामें केवल इतना भेद है कि असम्प्रज्ञातसमाधिमें सब वृत्तियोंका निरोध होता है । चित्तमें निरोधके संस्कारसे अन्य सब व्युत्थानके संस्कार दबे रहते हैं और वह आत्माकार होता है और आत्माकी शुद्ध परमात्मस्वरूपमें अवस्थिति होती है किन्तु कैवल्यमें चित्तके बनानेवाले गुण अपने कारणमें लीन हो जाते हैं । यथा— पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति । ( योग कैवल्य पाद सूत्र ३४ ) पुरुषार्थसे शून्य हुए चित्तके बनानेवाले गुणोंका अपने कारणमें लीन हो जाना कैवल्य है अथवा ( १०६ )
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चौथा प्रकरण ] • षड्दर्शनसमन्वय * * [ तीन प्रमाण चितिशक्तिका अपने स्वरूपमें अवस्थित हो जाना कैवल्य है1 तीन प्रमाण त्रिविधं प्रमाणम् ॥ २१ ॥
प्रमाण तीन प्रकारका है ( प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम अर्थात् आप्तवचन ) । व्याख्या— प्रत्यक्ष प्रमाण - जो किसी इन्द्रियसे जाना जाय; अनुमान - जो किसी चिह्नसे समझा जाय और आप्तवचन- किसी आप्तका उपदेश - आप्त उसे कहते हैं जिसने पदार्थको साक्षात् किया हो और सत्यवक्ता हो । इसकी विस्तारपूर्वक व्याख्या यो ० समा ० पा ० सू ० ७ में की गयी है । विशेष वहाँ देखें । सङ्गति – तत्त्वज्ञानका फल कहते हुए अगले सूत्रमें ग्रन्थको समाप्त करते हैं । एतत् सम्यग् ज्ञात्वा कृतकृत्यः स्यात् । पुनस्त्रिविधेन दुःखेनाभिभूयते ॥ २२ ॥
न यह ठीक - ठीक जानकर पुरुष कृतकृत्य हो जाता है और फिर तीन प्रकारके दुःखोंसे नहीं दबाया जाता ।
सम्यग्ज्ञानाधिगमाद् धर्मादीनामकारणप्राप्तौ ।
तिष्ठति संस्कारवशाच्चक्रभ्रमिवद् धृतशरीरः ॥६७ ॥
प्राप्ते शरीरभेदे चरितार्थत्वात् प्रधानविनिवृत्तौ ।
ऐकान्तिकमात्यन्तिकमुभयं कैवल्यमाप्नोति ॥ ६८ ॥
यथार्थ ज्ञान ( विवेकज्ञान ) की प्राप्तिसे जब कि धर्मादि अकारण बन गये तो पुरुष संस्कारके वशसे चक्रके घूमनेके सदृश शरीरको धारण किये हुए ठहरा रहता है । अर्थात् जिस प्रकार कुम्हारके चक्रको चलाना बंद करनेपर भी कुछ देरतक चाक पहलेके वेगसे चलता रहता है । इसी प्रकार यथार्थ ज्ञान ( विवेकज्ञान ) की प्राप्तिपर भी पहले संस्कारोंके अधीन कुछ समयतक शरीर चलता रहता है । यह अवस्था जीवन्मुक्ति कहलाती है ॥ ६७ ॥ शरीरके छूट जानेपर और चरितार्थ होनेसे प्रधानकी निवृत्ति
होनेपर ऐकान्तिक ( अवश्य होनेवाले ) और आत्यन्तिक ( सदा रहनेवाले ) कैवल्यको प्राप्त होता है अर्थात् परमात्मस्वरूपमें पूर्णतया अवस्थित हो जाता है ॥६८ ॥
पञ्चविंशतितत्त्वज्ञो यत्र तत्राश्रमे
वसेत् ।
जटी मुण्डी शिखी वापि मुच्यते नात्र संशयः ॥
( गौडपादाचार्य ) जिसको ( सांख्यमें बतलाये हुए ) २५ तत्त्वोंका ( सम्यक् ) ज्ञान हो गया है, वह चाहे किसी आश्रममें स्थित हो, चाहे गृहस्थमें ही हो, चाहे संन्यासमें - वह अवश्य मुक्त हो जाता है । इसमें कोई भी संशय नहीं है । दर्शनोंके चार प्रतिपाद्य विषयोंपर सांख्यके मुख्य सिद्धान्त हेय — त्याज्य जो दुःख है, वह तीन प्रकारकी चोट पहुँचाता रहता है -१ आध्यात्मिक अर्थात् अपने अंदरसे शारीरिक चोट, जैसे ज्वर आदि या मानसिक चोट, जैसे राग - द्वेष आदिकी वेदना । २ आधिभौतिक अर्थात् किसी अन्य प्राणीद्वारा पीड़ा पहुँचना और ३ आधिदैविक अर्थात् किसी दिव्य शक्ति, जैसे बिजली आदिसे पीड़ा पहुँचना । ( १०७ )
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चौथा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सांख्यदर्शनमें पुरुषका बहुत्व इनके दूर करनेके साधन यद्यपि वर्तमान हैं और श्रौतकर्मोंसे इनका प्रतीकार हो जाता है, किंतु इनका नितान्त अभाव नहीं होता; क्योंकि इनका बीज बना ही रहता है । हेय - हेतु — इस दुःखकी जड़ अज्ञान, अविद्या, अविवेक है । जितना अज्ञान दूर होता जाता है, उतना ही दुःखका अभाव होता जाता है । इसलिये— हान — दुःखका नितान्त अभाव अज्ञान अर्थात् अविद्याका सर्वथा नाश हो जाना है । उपनिषदोंका भी यही सिद्धान्त है, यथा - अविद्याया अपाय एव हि परप्राप्तिर्नार्थान्तरम् । अर्थात् अविद्याकी निवृत्ति ही परमात्माकी प्राप्ति है, इससे भिन्न कोई अन्य वस्तु नहीं । ( मुण्डक १। १। ५ शांकरभाष्य ) हानोपाय — सारे तत्त्वोंका विवेकपूर्ण यथार्थ ज्ञान है । जिस - जिस तत्त्वका यथार्थ ज्ञान होता जायगा, उस - उस तत्त्वके दुःखकी निवृत्ति होती जायगी । सारे तत्त्वोंका विवेकपूर्ण ज्ञान होनेसे सारे दुःखोंकी निवृत्ति हो जाती है । ( तत्त्वोंका यथार्थ ज्ञान समाधिद्वारा ही अपनी - अपनी भूमियोंमें हो सकता है न कि व्युत्थान दशामें । ) मुख्य तत्त्व मुख्य तत्त्व दो हैं— जड और चेतन जडतत्त्वके चौबीस मुख्य विभाग हो सकते हैं; और चेतनतत्त्व पुरुष जडतत्त्वके सम्बन्धसे जीव तथा ईश्वर और अपने शुद्ध स्वरूपसे परमात्मतत्त्व कहलाता है । परमात्मतत्त्व अन्तिम ध्येय अथवा ' हान ' है । सारे तत्त्वोंके विवेकपूर्ण यथार्थ ज्ञानके पश्चात् वहीं पहुँचना है । इसलिये सांख्यने उसकी परीक्षा करनेकी आवश्यकता नहीं समझी । अन्य पचीस तत्त्वोंको इस प्रकार बतलाया है— अष्टौ प्रकृतयः, षोडश विकाराः, पुरुषः । कि आठ प्रकृतियाँ, सोलह विकार और पुरुष । ये इस प्रकार हैं—
मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त ।
षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः ॥
( सां ० का ० ३ ) ( आठ प्रकृतियोंमेंसे ) मूल प्रकृति विकृति नहीं है अर्थात् कारण - द्रव्य स्वयं किसीका विकार - विकृतं परिणाम – कार्य नहीं है । शेष सात महत्तत्त्व आदि ( महत्तत्त्व, अहंकार और पाँच तन्मात्राएँ ) प्रकृति-विकृति दोनों हैं । अर्थात् महत्तत्त्व मूल प्रकृतिकी विकृति और अहंकारकी प्रकृति, अहंकार महत्तत्त्वकी विकृति और पाँच तन्मात्राओं तथा ग्यारह इन्द्रियोंकी प्रकृति है और पाँच तन्मात्राएँ अहंकारकी विकृति और पाँच स्थूल भूतोंकी प्रकृति हैं । अन्य सोलह विकृतियाँ ( पाँच स्थूल भूत और ग्यारह इन्द्रियाँ ) केवल विकृति हैं, किसीकी प्रकृति नहीं हैं । यद्यपि सारी स्थूल वस्तुएँ इन्हीं पाँचों स्थूल भूतोंके कार्य हैं, किंतु वे अपने विकृत परिणामसे आगे कोई नया तत्त्व कारणरूप होकर नहीं बनाते । पुरुष न प्रकृति है न विकृति, अर्थात् न वह किसीका स्वयं विकृत परिणाम है, न उससे कोई विकृत परिणाम उत्पन्न होता है । ( १०८ )