पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 141–150

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 141–150

पृष्ठ 141

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 141 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

चौथा प्रकरण ] * षड्दर्शनसमन्वय,* [ ' ईश्वरासिद्धेः ' का समाधान अथवा-लीनवस्तुलब्धातिशयसम्बन्धाद्वादोषः । ( सा ० द ० १ । ९ १ ) योगियोंको लीन वस्तुओं ( सूक्ष्म, व्यवहित, विप्रकृष्ट ) में अतिशय सम्बन्ध होनेसे अव्याप्ति दोष नहीं आता । दूसरी शङ्का इस प्रकार उत्पन्न होती है कि योगियोंको ईश्वरका प्रत्यक्ष होता है इसलिये सूत्रमें बतलाये हुए लक्षणमें अव्याप्ति दोष आता है । इसका उत्तर सूत्रकार निम्न सूत्रमें देते हैं— ईश्वरासिद्धेः । ( सां ० द ० १ । ९ २ ) ईश्वरकी असिद्धिसे ( अव्याप्ति दोष नहीं आता है ) । यह सूत्र ईश्वरके अस्तित्वके अभावको नहीं बतलाता है, किंतु इससे ईश्वरके शुद्ध स्वरूपका प्रत्यक्ष अन्तःकरणद्वारा नहीं होता अर्थात् चित्तवृत्ति ईश्वरके शुद्ध स्वरूपके तदाकार होकर उसका ज्ञान नहीं प्राप्त करा सकती है । इसलिये इस सूत्रसे ईश्वरके अस्तित्वकी असिद्धि नहीं बतलायी गयी है, किंतु जिस प्रकार भौतिक पदार्थोंका साधारण मनुष्योंको बाह्य प्रत्यक्षसे और योगियोंको सूक्ष्म पदार्थोंका आभ्यन्तर प्रत्यक्षसे ज्ञान होता है, इस प्रकार ईश्वरका प्रत्यक्षद्वारा ज्ञान नहीं होता । सांख्यने ईश्वरको ऐसा स्वेच्छाचारी सम्राट् नहीं माना है, जो अपने मनोरञ्जनके लिये सृष्टिकी रचना करता है और स्वार्थ - सिद्धिके लिये सर्वहितकारी नियमोंका भी उल्लङ्घन कर सकता है; किंतु सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् और ज्ञानस्वरूप माना है, जिसकी ज्ञान - शक्तिसे जड- प्रकृतिमें सारे पुरुषोंके कल्याणार्थ सृष्टि, उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयकी ज्ञान, नियम और व्यवस्थापूर्वक क्रिया हो रही है । जैसा स्वयं विज्ञानभिक्षुने सूत्र सत्तानबेके प्रवचन - भाष्यमें लिखा है । निरिच्छे संस्थिते रत्ने यथा लोहः प्रवर्तते । सत्तामात्रेण देवेन तथा चायं जगज्जनः ॥

अत आत्मनि कर्तृत्वमकर्तृत्वं च संस्थितम् ।

संनिधिमानतः ॥

निरिच्छत्वादकर्तासौ कर्ता ( सांख्य - प्रवचन भाष्य १ । ९ ७ ) जैसे बिना इच्छावाले रत्न ( मणि चुम्बक ) के स्थित रहनेमात्रमें लोहा ( आप - से - आप ) प्रवृत्त होता है, वैसे ही सत्तामात्र देव ( ईश्वर ) से जगत्की उत्पत्ति आदि होती है । इस कारण ईश्वरमें कर्तृत्व और अकर्तृत्व भी अच्छी प्रकार सिद्ध है । वह निरिच्छ होनेसे अकर्ता और सामीप्यमात्रसे कर्ता है । इसी बातको गीताके पाँचवें अध्यायमें निम्नलिखित श्लोकोंमें दर्शाया है—

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।

न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ १४ ॥

नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।

अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥ १५ ॥

ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।

तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥ १६ ॥

( ११ ९ )

पृष्ठ 142

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 142 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

चौथा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप:* [ ' ईश्वरासिद्धेः ' का समाधान ईश्वर भूत - प्राणियोंके न कर्तापनको और न कर्मों तथा कर्मों के फलके संयोगको ( वास्तवमें ) रचता है, किंतु परमात्माके सांनिध्यसे प्रकृति ही बर्तती है । अर्थात् गुण ही गुणोंमें बर्त रहे हैं ॥ १४ ॥

सर्वव्यापी ईश्वर न किसीके पापको और न किसीके शुभ कर्मको भी ग्रहण करता है ( किंतु ) अविद्यासे ज्ञान ( विवेक - ज्ञान ) ढका हुआ है, इससे सब जीव मोहित हो रहे हैं ॥ १५ ॥

परंतु जिनका अन्तःकरणका अज्ञान विवेकज्ञानद्वारा नाश हो गया है, उनका वह ज्ञान सूर्यके सदृश उस परब्रह्म परमात्माके स्वरूपको हृदयमें प्रकाशित करता है अर्थात् साक्षात् कराता है ॥ १६ ॥

ईदृशेश्वरसिद्धिः सिद्धा । ( सा ० द ० ३ । ५७ ) उपर्युक्त सूत्रसे ईश्वरकी सिद्धि स्पष्ट शब्दोंमें बतलायी गयी है । विज्ञानभिक्षुने यहाँ अपने सांख्य - प्रवचनभाष्यमें ईश्वरको प्रकृतिलयका वाचक बतलाया है । इसलिये पाठकोंके स्वतन्त्रापूर्वक विचार करनेके लिये प्रकृतिलयके प्रसङ्गके साथ इस सूत्रको बतलाये देते हैं— न कारणलयात् कृतकृत्यता मग्नवदुत्थानात् । ( सां ० द ० ३ । ५४ ) कारणमें लीन होनेसे पुरुषको कृतकृत्यता नहीं हो सकती, क्योंकि डुबकी लगानेवालेके समान फिर ऊपर उठना होता है । इस विषयमें योगदर्शन १ । १ ९ की व्याख्या देखिये । अर्थात् प्रकृतिलय होना भी मुक्ति नहीं है, क्योंकि जिस प्रकार डुबकी लगानेवालेको श्वास लेनेके लिये ऊपर उठना होता है, इसी प्रकार प्रकृतिलयोंको भी एक नियत समयके पश्चात् विवेक - ज्ञानद्वारा स्वरूपावस्थिति प्राप्त करनेके लिये प्रकृतिलीनतासे निकलकर फिर जन्म लेना होता है । अकार्यत्वेऽपि तद्योगः पारवश्यात् । ( सा ० द ० ३ । ५५ ) यद्यपि प्रकृति कार्य नहीं है, तो भी परतन्त्रतासे उसका योग होता है । अर्थात् यद्यपि प्रकृति कार्य पदार्थ नहीं है, कारण है, फिर भी सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् ईश्वरके नियमोंके अधीन पुरुषके अपवर्ग ( स्वरूपावस्थिति ) करानेके लिये प्रवृत्त हो रही है । प्रकृतिलय पुरुष स्वरूपावस्थितिको प्राप्त किये हुए नहीं होते हैं । इसलिये प्रकृति ईश्वरीय नियमोंसे परतन्त्र हुई, उनको अपवर्ग दिलानेके लिये प्रकृतिलीनतासे निकालकर ऊँचे योगियोंके कुलमें जन्म दिलाती है । स हि सर्ववित् सर्वकर्ता । ( सा ० द ० ३ । ५६ ) वही सर्वज्ञ और सबका कर्ता है । अर्थात् वह चेतन - तत्त्व ईश्वर, प्रकृति जिसके अधीन ज्ञान, व्यवस्था और नियमपूर्वक पुरुषके अपवर्गके लिये प्रवृत्त हो रही है, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् है । ईदृशेश्वरसिद्धिः सिद्धा । ( सां ० द ० ३ । ५७ ) इस प्रकारकी ईश्वरकी सिद्धि सिद्ध है । अर्थात् प्रथम अध्यायके बानबे सूत्रमें ईश्वरके बद्ध तथा मुक्त दोनों प्रकारका न होनेसे असिद्धि बतलायी थी; पर इस प्रकार सर्वसृष्टिका नियन्ता, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् ईश्वरकी सिद्धि सिद्ध है । यहाँ प्रसङ्ग तथा युक्तिसे प्रकृतिलय पुरुष जिनमें न पूरा विवेकज्ञान है और जो न स्वरूपावस्थितिको प्राप्त किये हुए हैं, वे सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् ईश्वर नहीं हो सकते । यदि प्रकृतिलयसे सर्वज्ञ और ( १२० )

पृष्ठ 143

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 143 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

चौथा प्रकरण ] * षड्दर्शसमन्वय * [ ईश्वरासिद्धेः ' का समाधान सर्वशक्तिमान् ईश्वरके ही अर्थ लिये जायँ तो समष्टि प्रकृतिके अधिष्ठाता समष्टिरूपेण चेतन - तत्त्व ईश्वरके ही हो सकते हैं, जिसका योगदर्शन १ । २८ की व्याख्या तथा वि ० वि ० में विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है, जो उसका शुद्ध स्वरूप नहीं है, किंतु शबल अर्थात् प्रकृतिके संयोगसे है 1 सम्भव है विज्ञानभिक्षुने प्रकृतिलयके सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् ईश्वरके अर्थ इस अभिप्रायसे किये हों कि योगियोंको समाधिद्वारा केवल महत्तत्त्वतक ही साक्षात्कार होता है, इससे अव्यक्त मूल प्रकृति अनुमानगम्य होती है । इसलिये अनुमानगम्य अव्यक्त कारण प्रकृतिके अधिष्ठाता ईश्वर भी महत्तत्त्वके अधिष्ठाता हिरण्यगर्भरूपसे ही व्यक्त ( प्रकट प्रत्यक्ष ) हो सकते हैं । अतः डुबकी लगानेवालेके सदृश प्रकृतिसे बाहर निकलनेसे अभिप्राय महत्तत्त्व अर्थात् समष्टि - सूक्ष्म जगत्के अधिष्ठाता हिरण्यगर्भरूपसे पुरुषको अपवर्ग दिलानेके लिये सृष्टि - उत्पत्तिके समय प्रकट होना है । सांनिध्यमात्रेणेश्वरस्य सिद्धिस्तु श्रुतिस्मृतिषु सर्वसम्मतेत्यर्थः ।

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति ।

ईशानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते एतद्वै तत् ॥

सृजते च गुणान् सर्वान् क्षेत्रज्ञस्त्वनुपश्यति ।

गुणान् विक्रियते सर्वानुदासीनवदीश्वरः ॥।

( सांख्य - प्रवचन भाष्य ३ । ५७ ) अङ्गुष्ठपरिमाण हृदय - देश है, उस हृदयाकाशमें वर्तमान पुरुषको हृदयकी उपाधिके कारण अङ्गुष्ठमात्र कहा है । वह अङ्गुष्ठमात्र पुरुष शरीरके भीतर रहता है ( व्यापक होनेपर भी चूँकि हृदय - देशमें उपलब्धि होती है । अतः हृदयोपहित निर्देश किया है ) । जो उस भूत और भविष्यत्के स्वामी आत्माको जानकर फिर कुछ भी छिपाना नहीं चाहता, वही यह आत्मतत्त्व है और ( वह ) सब गुणोंको उत्पन्न करता है, पीछे क्षेत्रज्ञ तो देखता है ( गुणोंका द्रष्टा रहता है ), ईश्वर उदासीनके सदृश सब गुणोंको कार्यरूपमें परिणत करता है । गीताके अध्याय १३ के निम्नलिखित श्लोकोंका भी यही आशय है-अनादित्वान्निर्गुणत्वात्

परमात्मायमव्ययः ।

शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥ ३१ ॥

यथा सर्वगतं सौक्ष्यादाकाशं नोपलिप्यते ।

नोपलिप्यते ॥ ३२ ॥

सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा

यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।

भारत ॥ ३३ ॥

क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति हे अर्जुन! अनादि होनेसे और गुणातीत होनेसे वह अविनाशी परमात्मा शरीरमें स्थित हुआ भी ( वास्तवमें ) न कर्ता है और न लिपायमान होता है ॥ ३१ ॥

जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त हुआ भी आकाश सूक्ष्म होनेके कारण लिप्त नहीं रहता है, वैसे ॥ ३२ ही ॥ सर्वत्र देहमें स्थित हुआ भी आत्मा ( गुणातीत होनेके कारण देहके गुणोंसे ) लिप्त नहीं रहता है प्रकार एक हे अर्जुन! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको प्रकाशित करता है, उसी ( १२१ )

पृष्ठ 144

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 144 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

चौथा प्रकरण ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ कपिलमुनि आस्तिक थे - अन्य युक्तियाँ * ****** ही आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्रको प्रकाशित करता है ॥ ३३ ॥

कपिलमुनि आस्तिक थे- अन्य युक्तियाँ यदि कपिल मुनि नास्तिक होते तो श्वेताश्वतरादि उपनिषद् तथा गीतामें उनकी इतनी प्रशंसा नहीं की जाती जैसा कि इस प्रकरणके आरम्भमें दिखलाया गया है । सांख्य तथा योग सबसे प्राचीन वैदिक दर्शन हैं । योग कर्मयोग और सांख्य ज्ञानयोगके नामसे प्रसिद्ध हैं, जिनका गीतामें बार - बार वर्णन आता है । श्रीमद्भागवतके तीसरे स्कन्धमें जहाँ भगवान् कपिलने अपनी माताको आध्यात्मिक उपदेश दिया है, वहाँ उनको स्वयं ईश्वरका अवतार माना गया है । श्रीव्यासजी महाराजने योगदर्शनके भाष्यमें पञ्चशिखाचार्यके सांख्यसूत्रोंको अनेक स्थानोंपर उद्धृत किया है । सांख्यने वेदोंको अपौरुषेय, ईश्वरीय ज्ञान और आप्त प्रमाण माना हैं न पौरुषेयत्वं तत्कर्तुः पुरुषस्याभावात् । ( सा ० द ० ५/४६ ) उन ( वेदों ) का बनानेवाला कोई पुरुष नहीं ( दिखलायी देता है ) इसलिये उनका पौरुषेयत्व नहीं बन सकता । न मुक्तामुक्तयोरयोग्यत्वात् । ( सां ० द ० ५।४७ ) मुक्त और अमुक्त ( बद्ध ) के अयोग्य होनेसे ( वेदोंकी ) पौरुषेयता नहीं बन सकती । निजशक्त्यभिव्यक्तेः स्वतः प्रामाण्यम् । ( सां ० द ० ५। ५१ ) अपनी स्वाभाविक निज शक्तिद्वारा उत्पन्न होनेसे वेदोंकी स्वतः प्रमाणता है सांख्यने अपने सारे सिद्धान्तोंको वेदके आधारपर माना है और उनका श्रुतियोंसे अविरोध सिद्ध किया है । जैसे— निर्गुणादिश्रुतिविरोधश्चेति । ( सां ० द ० १ | ५४ ) निर्गुणादि श्रुतियोंसे भी विरोध है । पारम्पर्येण तत्सिद्धौ विमुक्तिश्रुतिः । ( सा ० द ० ६।५८ ) परम्परासे उस मोक्षकी सिद्धिमें मुक्ति प्रतिपादक श्रुति है । समाधिसुषुप्तिमोक्षेषु ब्रह्मरूपता । ( सां ० द ० ५। ११६ ) समाधि, सुषुप्ति तथा मोक्षमें ब्रह्मरूपता हो जाती है । द्वयोः सबीजमन्यत्र तद्धतिः । ( सां ० द ० ५ | ११७ ) दोमें सजीव और अन्यत्र ( तीसरेमें ) उस ( बीज ) का नाश हो जाता है । अर्थात् सुषुप्तिमें बन्धनके बीज पाँचों क्लेश संस्काररूपसे बने रहते हैं और ( असम्प्रज्ञात ) समाधिमें व्युत्थानके संस्कार चित्त - भूमिमें बीजरूपसे दबे रहते हैं, किंतु ( तीसरे ) मोक्षमें चित्तके नाशके साथ बीजका नाश हो जाता है । उस द्वयोरिव त्रयस्यापि दृष्टत्वान्न तु द्वौ । ( सां ० द ० ५ । ११८ ) दोके समान तीनोंके दृष्ट होनेसे केवल दो ही नहीं मान सकते । ( १२२ )

पृष्ठ 145

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 145 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

चौथा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय:* [ योग - दर्शन अर्थात् सुषुप्तिको सबने अनुभव किया है और समाधिको कुछ लोगोंने; इसलिये इन दोनोंसे मोक्षकी अवस्था भी सिद्ध होती है । वासनयानर्थख्यापनं दोषयोगेऽपि न निमित्तस्य प्रधानबाधकत्वम्। ( सां ० द ० ५। ११ ९ ) दोषके योग्य होते हुए भी वासनासे अनर्थकी ख्याति नहीं हो सकती और निमित्तको मुख्य बाधकता है 1 अर्थात् यद्यपि सुषुप्तिमें तमोगुण दोषका योग है तो भी वासनासे कोई अनर्थ ( क्लेशादि ) प्रकट नहीं हो सकता और सुषुप्तिका निमित्त तमोगुण मुख्यतया दुःख आदिको रोके रहता है; इसलिये सुषुप्तिमें भी ब्रह्मरूपता अवश्य है । इससे बढ़कर सांख्यमें ईश्वर - सिद्धिको और किस प्रमाणकी आवश्यकता रह जाती है । योग - दर्शन योगका महत्त्व योग सांख्यका ही क्रियात्मक रूप है । योग सारे सम्प्रदायों और मत - मतान्तरोंके पक्षपात और वाद द - -1 विवादसे रहित सार्वभौम धर्म है, जो तत्त्वका ज्ञान स्वयं अनुभवद्वारा प्राप्त करना सिखलाता है और मनुष्यको उसके अन्तिम ध्येयतक पहुँचाता है । सारी श्रुति - स्मृतियाँ योगकी महिमाका गान कर रही हैं । योगका वास्तविक स्वरूप योगके सम्बन्धमें नाना प्रकारकी फैली हुई भ्रान्तियोंके निवारणार्थ उसके वास्तविक स्वरूपको समझा देना अत्यावश्यक है । मोटे शब्दोंमें योग स्थूलतासे सूक्ष्मताकी ओर जाना अर्थात् बाहरसे अन्तर्मुख होना है । चित्तकी वृत्तियोंद्वारा हम स्थूलताकी ओर जाते हैं अर्थात् बहिर्मुख होते हैं । ( आत्मतत्त्वसे प्रकाशित चित्त अहंकाररूप वृत्तिद्वारा, अहंकार इन्द्रियों और तन्मात्राओंरूप वृत्तियोंद्वारा, तन्मात्राएँ सूक्ष्म और स्थूलभूत और इन्द्रियाँ विषयोंकी वृत्तियोंद्वारा बहिर्मुख हो रही है ) । जितनी वृत्तियाँ बहिर्मुख होती जायँगी उतनी ही उनमें रज और तमकी मात्रा बढ़ती जायगी और उससे उलटा जितनी वृतियाँ अन्तर्मुख होती जायँगी उतना ही रज और तमके तिरोभावपूर्वक सत्त्वका प्रकाश बढ़ता जायगा । जब कोई भी वृत्ति न रहे तब शुद्ध परमात्मस्वरूप शेष रह जाता है । योगके तीन अन्तर्विभाग - योगके मुख्य तीन अन्तर्विभाग किये जा सकते हैं - ज्ञानयोग, उपासनायोग और कर्मयोग । ज्ञानयोग – भौतिक पदार्थोंका जान लेना अर्थात् सांसारिक ज्ञान और विज्ञान ज्ञानयोग नहीं है । बल्कि तीनों गुणों और उनसे बने हुए सारे पदार्थोंसे परे अर्थात् स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर तथा स्थूल, सूक्ष्म और कारण जगत् अथवा अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय कोष अथवा शरीर, इन्द्रियों, मन, अहंकार और चित्तसे परे गुणातीत शुद्ध परमात्मतत्त्वको जिसके द्वारा इन सबमें, ज्ञान, नियम और व्यवस्थापूर्वक क्रिया हो रही है, संशय, विपर्ययरहित पूर्णरूपसे जान लेना ज्ञानयोग है । यह ज्ञान केवल पुस्तकोंके पढ़ लेनेसे या शब्दोंद्वारा सुन लेनेमात्रसे ही नहीं प्राप्त हो सकता । उसके लिये उपासनायोगकी आवश्यकता होती है । उपासनायोग — एक प्रत्ययका प्रवाह करना अर्थात् चित्तकी वृत्तियोंको सब ओरसे हटाकर केवल एक ( १२३ )

पृष्ठ 146

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 146 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

चौथा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप:* [ योग - दर्शन लक्ष्यपर ठहरानेका नाम उपासना है । किसी संसारिक विषयकी प्राप्तिके लिये इस प्रकार एक प्रत्ययका प्रवाह करना उपासना कहा जा सकता है उपासनायोग नहीं । यह उपासनायोग तभी कहलायगा जब इसका मुख्य लक्ष्य केवल शुद्ध परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो । इसको स्पष्ट शब्दोंमें यों समझना चाहिये कि जिस प्रकार जलके सर्वत्र भूमिमें व्यापक रहते हुए भी उसकी शुद्ध धाराको किसी स्थानविशेषसे खोदनेपर निकाला जा सकता है । उसी प्रकार परमात्म - तत्त्वके सर्वत्र व्याप्त रहते हुए भी उसके शुद्ध स्वरूपको किसी स्थानविशेषद्वारा अन्तर्मुख होकर प्राप्त किया जा सकता है । यह जो चित्तको किसी विशेष ध्येय ( विषय - लक्ष्य ) पर ठहराकर शुद्ध परमात्मस्वरूपको प्राप्त करनेका यत्न किया जाता है यही उपासनायोग है । इस एकाग्रतारूप उपासनाको सम्प्रज्ञात समाधि तथा सम्प्रज्ञात योग कहते हैं । इसके पश्चात् जो सर्ववृत्तियोंके निरोध होनेपर शुद्ध परमात्मस्वरूपमें अवस्थिति है, वह ज्ञानयोग है । इसीको असम्प्रज्ञात समाधि तथा असम्प्रज्ञातयोग कहते हैं । इसके लिये किसी एकान्त निर्विघ्न शुद्ध स्थानमें सिर, गर्दन और कमरको सीधा एक रेखामें रखते हुए किसी स्थिर सुख - आसनसे बैठना, प्राणोंकी गतिको धीमा करना और इन्द्रियोंको बाहरके विषयोंसे हटाकर चित्तके साथ अन्तर्मुख करना आवश्यक है । फिर यह देखना होगा कि अन्तर्मुख होनेके लिये किस स्थानको लक्ष्य बनाया जाय । वैसे तो परमात्मा सर्वत्र व्यापक हैं; किंतु उनके शुद्ध स्वरूपतक पहुँचनेके लिये अपने ही शरीरमें किसी स्थानको लक्ष्य बनानेमें सुगमता रहती है । इसमें पाँच विषयवती प्रवृत्तिके स्थान हैं । अर्थात् नासिकाका अग्र भाग गन्धका, जिह्वाका अग्र भाग रसका, तालु रूपका, जिह्वाका मध्य भाग स्पर्शका और जिह्वाका मूल भाग शब्दका स्थान है । इनसे भी अधिक प्रभावशाली ' विशोका ज्योतिष्मती प्रवृत्ति ' के सुषुम्ना नाड़ीमें विद्यमान मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सहस्रारचक्र हैं । सुषुम्ना, जो गुदाके निकटसे मेरुदण्डके भीतर होती हुई मस्तिष्कके ऊपरतक चली गयी है, सर्वश्रेष्ठ नाड़ी है । यह सत्त्वप्रधान, प्रकाशमय और अद्भुत शक्तिवाली है । यही सूक्ष्मशरीर, सूक्ष्म प्राणों तथा अन्य सब शक्तियोंका स्थान है । इसमें बहुत - से सूक्ष्म शक्तियोंके केन्द्र हैं जिनमें अन्य सूक्ष्म नाड़ियाँ मिलती हैं । इन शक्तियोंके केन्द्रोंको पद्म, कमल तथा चक्र कहते हैं । उनमें उपर्युक्त सात मुख्य हैं । उनमें भी मणिपूरक, अनाहत, आज्ञा और सहस्त्रार विशेष महत्त्वके हैं । किसके लिये ध्यानके वास्ते कौन - सा स्थान अधिक उपयोगी हो सकता है यह इस मार्गके अनुभवी ही बतला सकते हैं । जिस प्रकार तली तोड़ कुएँके खोदते समय कई प्रकारकी मिट्टीकी तहें तथा अन्य अद्भुत वस्तुएँ निकलती हैं ऐसा ही ध्यान अवस्थामें होता है । यहाँ भी स्थूलभूत, सूक्ष्मभूत, अहंकार और अस्मिता ( आत्मासे प्रकाशित चित्त ) -ये चार प्रकारकी तीनों गुणोंकी तहें आती हैं । जब स्थूलभूत अथवा उनसे सम्बन्ध रखनेवाले विषय सामने आवें उसको वितर्कानुगत सम्प्रज्ञात समाधि, * जब सूक्ष्मभूत अथवा उनसे सम्बन्धित विषय उपस्थित हों उसको विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधि, * जब इन दोनों विषयोंसे परे * पहली दो भूमियों वितर्काअनुगत और विचारानुगतमें गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द– -इन पाँचों विषयोंमें प्रायः रूप और शब्द ही समक्ष आते हैं, क्योंकि रूपको ग्रहण करनेवाली नेत्र इन्द्रिय और शब्दको ग्रहण श्रोत्र इन्द्रिय हर समय काम करती रहती है । इसलिये सुगमताके कारण कई आचार्य रूप या शब्दको करनेवाली ही ध्येय बनाकर ध्यान आरम्भ करना बतलाते हैं । ( १२४ )

पृष्ठ 147

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 147 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

चौथा प्रकरण ] * षड्दर्शनसमन्वय * [ योग - दर्शन केवल ‘ अहमस्मि ’ वृत्ति रह जाय उसको आनन्दानुगत और जब उससे भी परे जाये उसको अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि कहा जाता है केवल ‘ अस्मि ’ वृत्ति रह । जिस प्रकार सारी मिट्टीकी तहोंके समाप्त होनेपर जलको रेतसे अलग किया जाता गुणोंकी इन चारों तहोंके पश्चात् जब आत्माको चित्तसे अलग साक्षात् किया जाता है तब है उसको , इसी प्रकार ख्याति कहते हैं । उसके पश्चात् शुद्ध परमात्मस्वरूप शेष रह जाता है जो समाधि, असम्प्रज्ञात विवेक ज्ञानयोग कहलाता है । अतः उपासनायोगद्वारा ही ज्ञानयोगकी प्राप्ति हो सकती है । परंतु यह उपासनायोग योग या भी बिना कर्मयोगके नहीं साधा जा सकता । कर्मयोग – कोल्हूके बैलके सदृश कामोंमें लगे रहनेका नाम कर्मयोग नहीं है । शरीर, इन्द्रियों, धन, सम्पत्ति आदि सारे साधनों, उनसे होनेवाले कर्तव्यरूप सारे कर्मोंको तथा उनके फलोंको भी ईश्वरको समर्पण करते हुए अनासक्त निष्काम भावसे व्यवहार करनेका नाम कर्मयोग है । जिस प्रकार मञ्च ( Stage ) पर आया हुआ एक्टर ( Actor ) अपने पार्टको भलीभाँति करता हुआ अंदर इसका कोई भी प्रभाव अपने हृदयपर नहीं होने देता है, इसी प्रकार कर्मयोगी ईश्वरकी ओरसे आये हुए सारे कर्तव्योंको भलीभाँति करता हुआ भी अंदरसे अलिप्त रहता है ।

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।

लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥

कायेन मनसा बुद्धया केवलैरिन्द्रियैरपि ।

योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥

युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।

अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥

( गीता ५ । १०–१२ ) अर्थात् कर्मोंको ईश्वरके समर्पण करके और आसक्तिको छोड़कर जो कर्म करता है वह पानीमें पद्मपत्रके सदृश पापसे लिप्त नहीं होता ॥ १० ॥ योगी फलकी कामना और कर्तापनके अभिमानको छोड़कर

अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये केवल शरीर, इन्द्रियों, मन और बुद्धिसे काम करते हैं ॥ ११ ॥ योगी कर्मके

फलको त्यागकर परमात्मप्राप्तिरूप शान्तिको लाभ करते हैं । अयोगी कामनाके आधीन होकर फलमें आसक्त हुआ बँधता है ॥१२ ॥

कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम् ॥ ( योगदर्शन ४। ७ ) अर्थात् योगीके कर्म न पुण्यरूप होते हैं न पापरूप, क्योंकि वह कर्तव्यरूप कर्मोंको ईश्वरसमर्पण करके फलोंका त्याग कर निष्काम भावसे करता है । पाप कर्म तो वह कभी करता ही नहीं, क्योंकि वे उसके लिये सर्वदा त्याज्य हैं । दूसरे साधारण मनुष्योंका कर्म पाप, पुण्य और पुण्य - पापमिश्रित तीन प्रकारका होता है । उपासनामें जब चित्तकी वृत्तियोंको एक लक्ष्यविशेषपर ठहरानेका यत्न किया जाता है, तब मन अन्य विषयोंमें राग होनेके कारण उनकी ओर दौड़ता है । विषयोंमें राग सकाम कर्मोंसे होता है । इसलिये कर्म विषयोंसे वैराग्य प्राप्त करनेके लिये कर्मोंमें निष्कामता होना आवश्यक है । अर्थात् पापरूप अधर्म ( १२५ )

पृष्ठ 148

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 148 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

S भवन राज समाधि सम्प्रज्ञात चित्रण योगका रूपकद्वारा अस्मिता विवेक , समाधि सम्प्रज्ञात e पञ्चतन्मात्रा सडक क्की वाली भूत भाग पातञ्जलयोगप्रदीप पुल चार

पृष्ठ 149

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 149 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

चौथा प्रकरण ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ योग - दर्शन तो त्याज्य होते ही हैं । पुण्यरूप धर्म अर्थात् कर्तव्यकर्मोंको भी उनकी फलोंकी इच्छाको छोड़कर निष्कामभावसे करना चाहिये । इसलिये उपासनायोग बिना कर्मयोगकी सहायताके नहीं सिद्ध हो सकता । किंतु ये निष्कामताके भाव भी ध्यानद्वारा ही परिपक्व हो सकते हैं । अर्थात् कर्मयोगकी सिद्धि भी उपासना-योगकी सहायतासे ही हो सकती है । इसलिये जिस प्रकार संसारकी कोई भी वस्तु सत्त्व, रजस् और तमस्के सम्मिश्रणके बिना अपना अस्तित्व नहीं रख सकती, केवल इतना भेद होता है कि कहीं सत्त्वकी प्रधानता होती है, कहीं रजकी और कहीं तमकी । इसी प्रकार इन तीनों योगोंमें भी तमरूप उपासनायोग चित्तको एक लक्ष्यपर ठहरानेवाला, रजरूप निष्काम कर्मयोग और सत्त्वरूप ज्ञानयोग – ये तीनों किसी - न - किसी अंशमें बने ही रहते हैं । यह अवश्य होता है कि कहीं उपासनाकी प्रधानता होती है, कहीं कर्मकी और कहीं ज्ञानकी । तीनों योगोंके दो मुख्य भेद - सांख्य और योग इन तीनों योगोंके दो मुख्य भेद सांख्य और योग नामसे किये गये हैं । जहाँ भक्तियोग और कर्मयोगपर अधिक जोर दिया गया हो, वह योगनिष्ठा कहलाती है और जहाँ ज्ञानको प्रधानता दी जाती है, वह सांख्यनिष्ठा । इन दोनों निष्ठाओंका वर्णन सांख्य - प्रकरणके आरम्भमें विस्तारपूर्वक कर दिया गया है । रूपकद्वारा योगका स्वरूप योगका दार्शनिक महत्त्व बतलाकर अब एक रोचक रूपकद्वारा उसके अष्टाङ्ग स्वरूपको दिखलानेका यत्न किया जाता है— चित्त और पुरुषका जो अनादि स्व - स्वामी - भाव - सम्बन्ध चला आ रहा है उसके अनुसार ' स्व'रूप चित्तको अश्व और स्वामीरूप पुरुषको सवार समझना चाहिये । इस अश्वका मुख्य प्रयोजन अपने स्वामीको भोग ( इष्ट ) रूप मार्गको पूरा कराकर अपवर्गरूप लक्ष्यतक पहुँचा देना । यह मार्ग एक पक्की सड़कवाला चार भागोंमें विभक्त है— पहला स्थूलभूत, दूसरा सूक्ष्मभूतोंसे तन्मात्राओंतक, तीसरा अहंकार और चौथा अस्मिता । अन्तिम किनारेपर भेदज्ञानरूपी एक अश्वशाला है । यहाँ इस घोड़ेको छोड़ देना पड़ता है और अन्तिम लक्ष्य अपवर्ग परमात्मस्वरूप एक विशाल सुन्दर राजभवन है, जहाँ इस सवारको पहुँचा देना घोड़ेका मुख्य उद्देश्य है । सकाम कर्मरूप असावधानीसे पुरुष घोड़ेकी पीठपरसे नीचे गिरकर बाग पकड़े हुए घोड़ेके इच्छानुसार असमर्थतासे उसके पीछे घूम रहा है । इस अश्वकी असंख्य चालें हैं, जो वृत्तियाँ कहलाती हैं । ये दो प्रकारकी हैं - एक क्लिष्ट, जो पुरुषके लिये अहितकारी है । दूसरी अक्लिष्ट, जो पुरुषके लिये हितकर है । वह पाँच अवस्थाओंमें रहती है — मूढ़, क्षिप्त, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध । इनमें पहली तीन अवस्थाएँ पुरुषके प्रतिकूल हैं; केवल अन्तिम दो अनुकूल हैं । यह घोड़ा पहली तीन अवस्थाओंमें अपनी अनन्त क्लिष्ट चालोंसे संसाररूपी घोर भयङ्कर वनमें विषय - वासनारूप हरियालीकी ओर भाग रहा है और सवार जन्म, आयु और भोग ( अनिष्ट ) रूपी नदी - नालों, खाई - खंदक, काँटे और पत्थरोंमें असमर्थतासे घसिटता हुआ उसके पीछे चला जा रहा है और सुख - दुःखरूपी चोटोंसे पीड़ित हो रहा है । एक अपरिमित समयसे उस अवस्थामें रहते हुए पुरुष अपने वास्तविक स्वरूपको सर्वथा भूल गया है और घोड़ेके साथ एकात्मभाव करके उसके ही विषयोंको ( १२६ )

पृष्ठ 150

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 150 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

चौथा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * [ योग - दर्शन * अपना मानने लगा । ईश्वर - अनुग्रहसे जब अध्यात्मविषयक सत् - शास्त्रों और निःस्वार्थ आप्तकाम योगी गुरुओंके उपदेशसे उसको अपने और इस घोड़ेके वास्तविक स्वरूपका तथा अपने अन्तिम लक्ष्यका पता लगता है, तब वह यम - नियमके साधनोंसे घोड़ेकी क्लिष्ट चालोंको अक्लिष्ट बनाता है । आसनका सहारा लेकर घोड़ेकी रकाबपर पैर रखनेका यत्न करता है । प्राणायामकी सहायतासे रकाबपर पैर जमानेमें समर्थ होता है । प्रत्याहारद्वारा वशीकार करके उसकी पीठपर सवार होनेमें सफलता प्राप्त करता है । भोग ( इष्ट ) रूपी पक्की सड़ककी ओर घोड़ेका मुख फेरना धारणा है । घोड़ेको उस ओर चलाना आरम्भ कर देना ध्यान है और सड़कके निकट पहुँच जाना समाधि है । वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता अनुगतरूप एकाग्रताकी अवस्थाओंसे क्रमानुसार भोगरूपी मार्गके स्थूल, सूक्ष्म, अहंकार और अस्मितारूपी भागोंको समाप्त करता है, विवेकख्यातिद्वारा घोड़ेको अश्वशालामें छोड़कर सर्ववृत्तिनिरोध अपवर्ग नामक शुद्ध परमात्मस्वरूपरूपी विशाल राजभवनमें पहुँचता है । दूसरे मनोरञ्जक उदाहरणद्वारा योगका स्वरूप - सिनेमाके साधारण श्वेत रंगकी चादर ( पर्दा ) के समान सत्त्वचित्त ( जिसमें सत्त्व - हीं - सत्त्व है, रज क्रियामात्र और तम उस क्रियाको रोकनेमात्र है ) का स्वरूप समझना चाहिये । यह विद्युत्के सदृश आत्मा ( चेतन - तत्त्व ) के ज्ञानके प्रकाशसे प्रकाशित हो रहा है भेद केवल इतना है कि विद्युत् जड होनेके कारण स्वयं सिनेमाके पर्देका देखनेवाला नहीं है । उसको दूसरे चेतन - पुरुष देखते हैं । आत्मा ज्ञानस्वरूप होनेसे अपने ज्ञानके प्रकाशमें जो कुछ चित्तमें हो रहा है, उसका द्रष्टा है । यही चित्तरूपी पर्दा कुछ रज और तमकी अधिकताका मैल लिये हुए एक दूसरे अहंकाररूप पर्देके स्वरूपमें प्रकट हो रहा है । यह अहंकाररूपी पर्दा रज और तमकी अधिकताका मैल लिये हुए तन्मात्राओंसे लेकर सूक्ष्म भूतोंरूपी पर्देके स्वरूपमें प्रकट हो रहा है । सूक्ष्म भूतोंरूपी पर्दा कुछ रज और तमकी अधिकताको लिये हुए पाँच स्थूलभूतोंरूपी पर्देके स्वरूपमें प्रकट हो रहा है । इस पर्देपर विषय - वासनाओंसे युक्त अनन्त वृत्तियाँ सिनेमाके चित्रोंके सदृश घूम रही हैं । चित्तरूपी पर्देमें आत्माके ज्ञानका प्रकाश पड़ रहा है । इसलिये अपने ज्ञानके प्रकाशमें जो - जो रूप यह पर्दा धारण करता है उसका स्वयमेव ही आत्माको ज्ञान रहता है और अपने ज्ञानस्वरूपमें सर्वथा अवस्थित रहते हुए भी चित्तरूपी पर्देका द्रष्टा होनेके कारण जैसा आकार यह पर्दा धारण करता है वैसा ही वह प्रतीत होता है अष्टाङ्गयोग – बहिरङ्ग साधन यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहारकी सहायतासे अन्तरङ्ग साधन धारणा, ध्यान और समाधिद्वारा चित्तकी वृत्तिरूपी चित्रोंका वास्तविक स्वरूप साक्षात्कार होता है । वितर्कानुगत समाधिद्वारा चित्रोंका स्थूलस्वरूप तथा पाँच स्थूलभूतोंवाली चित्तकी अवस्थाका वास्तविक ज्ञान प्राप्त होता है । विचारानुगत समाधिद्वारा वृत्तिरूप चित्रोंके सूक्ष्मस्वरूप तथा चित्तरूपी पर्देकी सूक्ष्म भूतोंसे तन्मात्रातककी अवस्थाका ज्ञान प्राप्त होता है । इससे ऊपर आनन्दानुगत समाधिद्वारा चित्तकी अहंकाररूप अवस्थाका साक्षात्कार होता है । अस्मितानुगत समाधिद्वारा अस्मिता ( आत्मासे प्रकाशित चित्त ) के स्वरूपका ज्ञान प्राप्त होता है । विवेकख्यातिद्वारा आत्मारूपी विद्युत् और चित्तरूपी पर्देमें भेद - ज्ञान प्राप्त होता है । पर वैराग्यद्वारा इससे भी परे होकर आत्मारूपी विद्युत्की अपने वास्तविक परमात्मस्वरूपमें अवस्थिति होती है । ( १२७ )