पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 151–160

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 151–160

पृष्ठ 151

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चौथा प्रकरण ] पातञ्जलयोगप्रदीप* [ योगदर्शनके चार पाद योगके आदि आचार्य योगके आदि आचार्य हिरण्यगर्भ हैं । हिरण्यगर्भ सूत्रोंके आधारपर ( जो इस समय लुप्त हैं ) पतञ्जलिमुनिने योगदर्शनका निर्माण किया है । इसको विस्तारपूर्वक समाधिपादके प्रथम सूत्रमें दर्शाया जायगा । पतञ्जलिमुनिकी जीवनी तथा योगदर्शनके भाष्यकारोंका वर्णन इस प्रकरणके अन्तमें किया जायगा । योगदर्शनके चार पाद योगदर्शनके चार पाद हैं और १ ९ ५ सूत्र हैं । समाधिपादमें ५१, साधनपादमें ५५, विभूतिपादमें ५५ और कैवल्यपादमें ३४ । १ समाधिपाद — जिस प्रकार एक निपुण क्षेत्रज्ञ सबसे प्रथम सबसे अधिक उपजाऊ भूमिको तैयार करके उसमें श्रेष्ठतम बीज बोता है, इसी प्रकार श्रीपतञ्जलि महाराजने समाहित चित्तवाले सबसे उत्तम अधिकारियोंके लिये सबसे प्रथम समाधिपादको आरम्भ करके उसमें विस्तारपूर्वक योगके स्वरूपका वर्णन किया है ।

सारा समाधिपाद एक प्रकारसे निम्न तीन सूत्रोंकी विस्तृत व्याख्या है ।

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥ २ ॥

योग चित्तकी वृत्तियोंका रोकना है ।

तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ॥ ३ ॥

तब ( वृत्तियोंके निरोध होनेपर ) द्रष्टाकी स्वरूपमें अवस्थिति होती है ।

वृत्तिसारूप्यमितरत्र ॥ ४ ॥

दूसरी ( स्वरूपावस्थितिसे अतिरिक्त ) अवस्थामें द्रष्टा वृत्तिके समान रूपवाला प्रतीत होता है । चित्त, बुद्धि, मन, अन्तःकरण लगभग पर्यायवाचक समानार्थक शब्द हैं, जिनका भिन्न - भिन्न दर्शनकारोंने अपनी - अपनी परिभाषामें प्रयोग किया है । मनकी चञ्चलता प्रसिद्ध है । सृष्टिके सारे कार्योंमें मनकी स्थिरता ही सफलताका कारण होती है । सृष्टिके सारे महान् पुरुषोंकी अद्भुत शक्तियोंमें उनके मनकी एकाग्रताका रहस्य छिपा हुआ होता है । नैपोलियनके सम्बन्धमें कहा जाता है कि वह इतना एकाग्रचित्त था कि रणभूमिमें भी शान्तिपूर्वक शयन कर सकता था, किंतु ये सब एकाग्रताके बाह्य रूप हैं । योगके अन्तर्गत मनको दो प्रकारसे रोकना होता है— एक तो केवल एक विषयमें लगातार इस प्रकार लगाये रखना कि दूसरा विचार न आने पावे, इसको एकाग्रता अथवा सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं । इसके चार भेद हैं । ( १ ) वितर्क – किसी स्थूल विषयमें चित्तवृत्तिकी एकाग्रता ( २ ) विचार — किसी सूक्ष्म विषयमें चित्तवृत्तिकी एकाग्रता । ( ३ ) आनन्द – अहंकार विषयमें चित्तवृत्तिकी एकाग्रता । ( ४ ) अस्मिता — अहंकाररहित अस्मिता विषयमें चित्तवृत्तिकी एकाग्रता । इसकी सबसे ऊँची अवस्था विवेकख्याति है, जिसमें चित्तका आत्माध्यास छूट जाता है और उसके ( १२८ )

पृष्ठ 152

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चौथा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * * [ योगदर्शनके चारपाद द्वारा आत्मस्वरूपका उससे पृथक् रूपमें साक्षात्कार होता है, किंतु योगदर्शन इसको वास्तविक आत्मस्थिति नहीं बतलाता है । यह भी चित्तहीकी एक वृत्ति अथवा मनका ही एक विषय है, किंतु इसका निरन्तर अभ्यास वास्तविक स्वरूपावस्थितिमें सहायक होता है । उपर्युक्त विवेकख्याति भी चित्तहीकी एक उच्चतम सात्त्विक वृत्ति है । इसको ' नेति - नेति ’ ( यह वास्तविक स्वरूपावस्थिति नहीं है, यह आत्मस्थिति नहीं है इत्यादि ) रूप परवैराग्यद्वारा हटाना मनका दूसरी प्रकारसे रोकना है - इसके भी हट जानेपर चित्तमें कोई भी वृत्ति न रहना अथवा मनका किसी विषयकी ओर न जाना, सर्ववृत्ति - निरोध असम्प्रज्ञात समाधि है । इसकी विस्तारपूर्वक व्याख्या योगदर्शनमें यथास्थान की जायगी । निरोध अपने स्वरूपका सर्वथा नाश हो जाना नहीं है, किंतु जड - तत्त्वके अविवेकपूर्ण संयोगका चेतन - तत्त्वसे सर्वथा नाश हो जाना है । इस संयोगके न रहनेपर द्रष्टाकी ( शुद्ध- परमात्म- ) स्वरूपमें अवस्थिति होती है । इसको तीसरे सूत्रमें बतलाया गया है । ' स्वरूपावस्थिति ' इतना व्यापक शब्द है कि सारे सम्प्रदाय और मत - मतान्तरवाले इसके अपने अभिमत अर्थ ले सकते हैं, किंतु योग क्रियात्मकरूपसे अन्तिम लक्ष्यपर पहुँचाकर यथार्थ स्वरूप अनुभव कराकर शब्दोंके वाद - विवादमे नहीं पड़ा है I स्वरूपावस्थितिसे अतिरिक्त भिन्न अवस्थाओंमें यद्यपि द्रष्टाके स्वरूपमें किसी प्रकारका परिवर्तन नहीं होता है, तथापि जैसी चित्तकी वृत्ति सुख - दुःख और मोहरूप होती है, वैसा ही द्रष्टा भी प्रतीत होता है । जैसे जलमें प्रतिबिम्बित चन्द्रमा जलके हिलनेसे चलायमान और स्थिर होनेसे शान्त प्रतीत होता है । ब्रह्मसूत्र तथा सांख्यसूत्रके सदृश योगदर्शनके भी प्रथम चार सूत्र योगदर्शनकी चतुःसूत्री हैं, जिनमें सारा योगदर्शन सामान्यरूपसे बतला दिया है । शेष सब सूत्र इन्हींकी विशेष व्याख्यारूप हैं | २ साधनपाद — दूसरे पादमें विक्षिप्त चित्तवाले मध्यम अधिकारियोंके लिये योगका साधन बतलाया गया है-सर्वबन्धनों और दुःखोंके मूल कारण पाँच क्लेश हैं— अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश । अविद्या — अनित्यमें नित्य, अशुद्धमें शुद्ध, दुःखमें सुख, अनात्मामें आत्मा समझना अविद्या है । इस अविद्यारूपी क्षेत्रमें ही अन्य चारों क्लेश उत्पन्न होते हैं । अस्मिता — इस अविद्याके कारण जड चित्त और चेतन पुरुष चितिमें भेद ज्ञान नहीं रहता । यह अविद्यासे उत्पन्न हुआ चित्त और चितिमें अविवेक अस्मिता क्लेश कहलाता है । -चित्त और चितिमें विवेक न रहनेसे जडतत्त्वमें सुखकी वासना उत्पन्न होती है । अस्मिता राग-क्लेशसे उत्पन्न हुई चित्तमें सुखकी इस वासनाका नाम राग है । द्वेष — इस रागसे सुखमें विघ्न पड़नेपर दुःखके संस्कार उत्पन्न होते हैं । रागसे उत्पन्न हुए दुःखके संस्कारोंका नाम द्वेष है । अभिनिवेश – दुःख पानेके भयसे भौतिक शरीरको बचाये रखनेकी वासना उत्पन्न होती है; इसका नाम अभिनिवेश क्लेश है । क्लेशोंसे कर्मकी वासनाएँ उत्पन्न होती हैं । कर्म - वासनाओंसे वृक्षमें जाति, आयु और भोगरूपी तीन प्रकारके फल लगते हैं । जन्मरूपी इन तीनों फलोंमें वृक्ष उत्पन्न सुख होता है । उस - दुःखरूपी दो ( १२ ९ )

पृष्ठ 153

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चौथा प्रकरण पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ दृश्यका प्रयोजन प्रकारका स्वाद होता है । जो पुण्य - कर्म अर्थात् हिंसारहित दूसरेके कल्याणार्थ कर्म किये जाते हैं, उनसे जाति, आयु और भोगमें सुख मिलता है और जो पाप - कर्म अर्थात् हिंसात्मक दूसरोंको दुःख पहुँचानेके लिये कर्म किये जाते हैं, उनसे जाति, आयु और भोगमें दुःख पहुँचता है । किंतु यह सुख भी तत्त्ववेत्ताकी दृष्टिमें दुःखरूप ही है; क्योंकि विषयोंमें परिणाम - दुःख, ताप दुःख और संस्कारदुःख मिला हुआ होता है; और तीनों गुणोंके सदा अस्थिर रहनेके कारण उनकी सुख - दुःख और मोहरूपी वृत्तियाँ भी बदलती रहती हैं । इसलिये सुखके पीछे दुःखका होना आवश्यक है । १ हेय — त्याज दुःख क्या है? हेयं दुःखमनागतम् ॥ १६ ॥

आनेवाला दुःख हेय — त्यागने योग्य है । २ हेयहेतु - त्याज्य दुःखका कारण क्या है? द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः ॥ १७ ॥

संयोग हेयहेतु – दुःखका कारण है । द्रष्टा औरदृश्यका दृश्यका स्वरूप प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम् ॥ १८ ॥

सारा दृश्य त्रिगुणात्मक है, सत्त्वका स्वभाव प्रकाश है, रजस्‌का क्रिया और तम्सका स्थिति है । इनका स्वरूप पाँच स्थूलभूत – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश और पाँच तन्मात्राएँ – गन्धतन्मात्रा, रसतन्मात्रा, रूपतन्मात्रा, स्पर्शतन्मात्रा और शब्दतन्मात्रा तथा तेरह इन्द्रियाँ – पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, मन, अहंकार और चित्त हैं- इनका प्रयोजन पुरुषको भोग और अपवर्ग दिलाना है । विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि ॥ १ ९ ॥ गुणोंकी चार अवस्थाएँ हैं— १ विशेष- -पाँचों स्थूलभूत और ग्यारहों इन्द्रियाँ, २ अविशेष – पाँच तन्मात्राएँ और अहंकार, ३ लिङ्गमात्र – महत्तत्त्व और ४ अलिङ्ग - प्रधान अर्थात् अव्यक्त मूलप्रकृति | द्रष्टाका स्वरूप द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः ॥ २० ॥

द्रष्टा यद्यपि देखनेकी शक्तिमात्र निर्मल और निर्विकार है, फिर भी उसे चित्तकी वृत्तियोंका ज्ञान रहता है । दृश्यका प्रयोजन तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा ॥ २१ ॥

यह सारा दृश्य द्रष्टा पुरुषके अपवर्ग ( स्वरूपावस्थिति ) करानेके लिये है । यह दृश्य मुक्त पुरुषोंका प्रयोजन सिद्ध करके अन्य पुरुषोंके लिये इसी प्रयोजनके सिद्ध करानेमें

लगा रहता है ।

कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात् ॥ २२ ॥

जिनका प्रयोजन सिद्ध हो गया है, उनके लिये यह दृश्य नष्ट हुआ भी अपने स्वरूपसे नष्ट नहीं ( १३० )

पृष्ठ 154

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चौथा प्रकरण ] * षड्दर्शनसमन्वय * [ दृश्यका प्रयोजन होता; क्योंकि वह दूसरोंकी साँझा वस्तु है अर्थात् दूसरोंके भोग - अपवर्गके साधनमें लगा रहता है L द्रष्टा और दृश्यके संयोगके वियोगका कारण अगले सूत्रमें बतलाते हैं-स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः ॥ २३ ॥

स्वशक्ति और स्वामिशक्तिके स्वरूपकी उपलब्धिका कारण संयोग है । अर्थात् संयोग हटानेके लिये स्वशक्ति और स्वामिशक्तिके स्वरूपकी उपलब्धि की जाती है । स्वशक्ति अर्थात् दृश्यके स्वरूपकी उपलब्धि, जो भोगरूप है, सम्प्रज्ञात समाधिद्वारा और स्वामिशक्ति अर्थात् पुरुषके स्वरूपकी उपलब्धि, जो अपवर्गरूप है, असम्प्रज्ञात समाधिद्वारा की जाती है । दृश्य और द्रष्टा अर्थात् चित्त और पुरुषका जो आसक्तिपूर्वक स्वस्वामि अर्थात् भोग्यत्व और भोक्तृत्व - भाव सम्बन्ध है, वह संयोग है । संयोगकी उत्पत्तिका कारण अगले सूत्रमें बतलाते हैं-तस्य हेतुरविद्या ॥ २४ ॥

द्रष्टा और दृश्यके अविवेकपूर्ण संयोगका कारण अविद्या है । ३ हान – दुःखका नितान्त अभाव क्या है? तदभावात्संयोगाभावो हानं तद्दृशेः कैवल्यम् ॥ २५ ॥

अविद्याके अभावसे संयोगका अभाव होता है — यही ' हान ' है । यह चेतनस्वरूप पुरुषका कैवल्य है । ४ हानोपाय – दुःखके नितान्त अभावका साधन क्या है? विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः ॥ २६ ॥

निर्मल अडोल विवेक- ख्याति हानका उपाय है विवेकख्यातिकी सबसे ऊँची अवस्थावाली प्रज्ञा अगले सूत्रमें बतलायी गयी है— तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा ॥ २७ ॥

उस विवेक ख्यातिकी सात प्रकारकी सबसे ऊँची अवस्थावाली प्रज्ञा होती है । १ जो कुछ जानना था जान लिया, अर्थात् जितना गुणमय दृश्य है वह सब परिणाम, ताप और संस्कारदुःखों तथा गुणवृत्तिविरोधसे दुःखरूप ही है । इसलिये ‘ हेय ' है । अब कुछ जानने योग्य नहीं रहा । २ जो कुछ दूर करना था दूर कर दिया, अर्थात् द्रष्टा और दृश्यका संयोग जो ‘ हेय - हेतु ' है वह दूर कर दिया । अब कुछ दूर करने योग्य नहीं रहा । जो कुछ साक्षात् करना था साक्षात् कर लिया, अर्थात् निरोध समाधिद्वारा ' हान ' को साक्षात् कर लिया । अब कुछ साक्षात् करने योग्य नहीं रहा । ४ जो कुछ करना था कर लिया, अर्थात् ' हान ' का उपाय ' अविप्लव विवेक - ख्याति ' सम्पादन कर लिया । अब कुछ करने योग्य नहीं रहा । ५ चित्तने अपने भोग अपवर्ग दिलानेका अधिकार पूरा कर दिया, अब कोई अधिकार शेष नहीं ६ चित्तके गुण अपने भोग अपवर्गका प्रयोजन सिद्ध करके अपने कारणमें लीन हो रहे रहा हैं ॥ ७ गुणोंसे परे होकर शुद्ध परमात्मस्वरूपमें अवस्थिति हो रही है 1 ( १३१ )

पृष्ठ 155

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चौथा प्रकरण ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ कैवल्यपाद निर्मल विवेक - ख्याति, जिसे हानका उपाय बतलाया है, अब उसकी उत्पत्तिका साधन बतलाते हैं । योगाङ्गानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः ॥ २८ ॥

योगके अङ्गोंके अनुष्ठानसे अशुद्धिके क्षय होनेपर ज्ञानकी दीप्ति ( प्रकाश ) विवेक - ख्यातिपर्यन्त बढ़ जाती है । योगके आठ अङ्ग योगके आठ अङ्ग – यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि हैं । इनका विस्तारपूर्वक वर्णन योगदर्शनमें यथास्थान किया जायगा । ३ विभूतिपाद धारणा, ध्यान और समाधि — तीनों मिलकर संयम कहलाते हैं । ये तीनों अन्य पाँच अङ्गोंकी अपेक्षा सबीज समाधिके अन्तरङ्ग साधन हैं; किंतु निर्बीज समाधिके ये भी बहिरङ्ग साधन हैं, क्योंकि उसका अन्तरङ्ग साधन पर वैराग्य है । इस संयमके विनियोगसे नाना प्रकारकी सिद्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं, जिनका तीसरे पादमें वर्णन है । ये सिद्धियाँ यद्यपि अश्रद्धालुओंकी योगमें श्रद्धा बढ़ाने और असमाहित ( विक्षिप्त ) चित्तवालोंके चित्तको एकाग्र करनेमें सहायक होती हैं, किंतु इनमें आसक्ति नहीं होनी चाहिये । इसकी कई सूत्रोंसे चेतावनी दी गयी है; जैसे— ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः ॥ ३७ ॥

ऊपर बतलायी हुई प्रातिभ आदि सिद्धियाँ व्युत्थानमें सिद्धियाँ हैं, किंतु समाधिमें विघ्न हैं I योगमार्गपर चलनेवालेके लिये नाना प्रकारके प्रलोभन आते हैं । अभ्यासीको उनसे सावधान रहना चाहिये, उनमें फँसनेसे और घमण्डसे बचे रहना चाहिये । इस सम्बन्धमें निम्न सूत्र है— स्थान्युपनिमन्त्रणे संगस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसंगात् ॥ ५१ ॥

स्थानवालोंके आदरभाव करनेपर लगाव और अभिमान नहीं करना चाहिये, क्योंकि ऐसा करनेसे

फिर अनिष्टके प्रसंगका भय है ।

सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च ॥ ४ ९ ॥

चित्त और पुरुषके भेद जाननेवाला सारे भावोंके अधिष्ठातृत्व और सर्वज्ञातृत्वको प्राप्त होता है 1 किंतु योगीको उसमें भी अनासक्त रहकर अपने असली ध्येयकी ओर बढ़ना चाहिये, जैसा कि अगले सूत्रमें बतलाया है— तद्वैराग्यादपि दोषबीजक्षये कैवल्यम् ॥ ५० ॥

उससे भी वैराग्य होनेपर, दोषोंका बीज क्षय होनेपर कैवल्य होता है । ४ कैवल्यपाद इसमें कैवल्यके उपयोगी चित्त तथा चित्तके सम्बन्धमें जो - जो शङ्काएँ हो सकती हैं, उनका

युक्तिपूर्वक निवारण किया है ।

चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनम् ॥ २२ ॥

( १३२ )

पृष्ठ 156

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चौथा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * * [ कैवल्यपाद पुरुषको, जो क्रिया अथवा परिणामरहित है, स्वप्रतिबिम्बित चित्तके आकारकी आकारकी प्राप्ति आकारका तरह आता होनेपर अपने विषयभूत चित्तका ज्ञान होता है । अर्थात् निर्विकार पुरुषमें दर्शन - कर्तृत्व, ज्ञातृत्व स्वाभाविक नहीं है, किंतु जैसे निर्मल जलमें प्रतिबिम्बित हुए चन्द्रमामें अपनी चञ्चलताके बिना ही जलरूपी उपाधिकी चञ्चलतासे चञ्चलता भासती है वैसे ही चित्तमें प्रतिबिम्बित जो चेतन है, वह भी स्वाभाविक ज्ञातृत्व और भोक्तृत्वके बिना ही केवल प्रतिबिम्बाधार चित्तके विषयाकार होनेसे तदाकार भासता है । वह सदा अपरिणामी, क्रियारहित और ज्ञानस्वरूप रहता हुआ इसका साक्षी बना रहता है । अगला सूत्र चित्तके सम्बन्धमें है-द्रष्टृदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम् ॥ २३ ॥

द्रष्टा और दृश्यसे रँगा हुआ चित्त सारे आकारवाला होता है । अर्थात् एक तो चित्तका अपना स्वरूप है, दूसरा पुरुषसे प्रतिबिम्बित होकर चेतन अर्थात् ज्ञानवाला प्रतीत होता है । यह उसका द्रष्टासे उपरक्त हुआ गृहीता स्वरूप है । तीसरा बाह्य विषयोंसे प्रतिबिम्बित होकरउन- न - जैसा भासता हुआ स्वरूप है । यह उसका दृश्य उपरक्त बाह्य स्वरूप है । इस प्रकार चित्तको एक ऐसा दर्पण समझना चाहिये, जिसमें सूर्यका प्रकाश पड़ रहा हो और अन्य विषयोंका प्रतिबिम्ब आ रहा हो । इस शङ्काके निवारणार्थ कि जब चित्तसे ही सब व्यवहार चल रहे हैं और उसीमें सब वासनाएँ रहती हैं तो द्रष्टा प्रमाणशून्य होकर चित्त ही भोक्ता सिद्ध हो जायगा । अगला सूत्र है-तदसंख्येयवासनाभिश्चित्रमपि परार्थं संहत्यकारित्वात् ॥ २४ ॥

यद्यपि चित्त अनगिनती वासनाओंसे चित्रित है तथापि वह पुरुषके लिये है; क्योंकि वह संहत्यकारी है । यहाँतक चित्त और पुरुषका भेद युक्तिद्वारा बतलाकर अब अगले सूत्रमें यह बतलाते हैं कि इसका

वास्तविक ज्ञान तो अनुभवगम्य है ।

विशेषदर्शिन आत्मभावभावनाविनिवृत्तिः ॥। २५ ॥

समाधिद्वारा जब योगीको पुरुष और चित्तके भेदका साक्षात्कार हो जाता है, तब उसकी आत्मभाव - भावना कि ‘ मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कैसा हूँ ' – इत्यादि निवृत्त हो जाती है । अब इस पादके अन्तिम सूत्रमें कैवल्यका स्वरूप बतलाते हैं । पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तेरिति ॥ ३४ ॥

पुरुषार्थसे शून्य हुए गुणोंका अपने कारणमें लीन हो जाना कैवल्य है; अथवा चिति - शक्तिका अपने स्वरूपमें अवस्थित हो जाना कैवल्य है । गुणोंकी प्रवृत्ति पुरुषके भोग और अपवर्गके लियेहै । जब यह प्रयोजन सिद्ध हो जाता है, तब उस पुरुषके प्रति उनका कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता । इसलिये वे अपने कारणमें लीन हो जातें हैं । इस प्रकार पुरुषका अन्तिम लक्ष्य अपवर्ग - सम्पादन करनेके पश्चात् गुणोंका अपने कारणमें लीन हो जानेका ( १३३ )

पृष्ठ 157

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चौथा प्रकरण ] • पातञ्जलयोगप्रदीप * [ चित्तकी नौ अवस्थाओंका संक्षिप्त वर्णन * नाम कैवल्य है । अथवा यों समझना चाहिये कि धर्मी चित्तके परिणामक्रम बनानेवाले गुणोंका अपने कारणमें लीन हो जानेपर चिति - शक्ति ( पुरुष ) का चित्तसे किसी प्रकारका सम्बन्ध न रहनेपर ( शुद्ध - परमात्म- ) स्वरूपमें अवस्थित हो जानेका नाम कैवल्य है चित्तकी नौ अवस्थाओंका संक्षिप्त वर्णन सांख्य और योग फिलासफीमें चित्तका विषय महत्त्वपूर्ण है । उसके वास्तविक स्वरूपको समझानेकी दृष्टिसे चित्तकी नौ विशेष अवस्थाओंको यहाँ समन्वयके अन्तमें संक्षेपसे वर्णन कर देना आवश्यक समझते हैं । इसको चित्तकी क्षिप्त - विक्षिप्त आदि पाँच भूमियोंके विषयसे जिसका समाधि - पादमें वर्णन हुआ है, पृथक् समझना चाहिये । १ जाग्रत् - अवस्था — ' सत्त्व चित्त ' में सत्त्वगुण गौणरूपसे दबा रहता है, तम सत्त्वको वृत्तिके यथार्थरूपके दिखलानेसे रोके रखता है, परंतु रज प्रधान होकर चित्तको इन्द्रियोंद्वारा बाह्य विषयोंमें उपरक्त करनेमें समर्थ होता है । प्रमाण, विपर्यय, विकल्प और स्मृति - वृत्तियोंका उदय होता है । इन्द्रियाँ बहिर्मुख होकर स्थूल शरीरद्वारा कार्य करती हैं । चित्तमें व्युत्थानके संस्कार तथा व्युत्थानका परिणाम होता है । पुरुष वृत्ति - सारूप्य प्रतीत होता है I २ स्वप्नावस्था – सत्त्वगुण गौणतर रूपसे दबा रहता । तम रजको इतना दबा लेता है कि वह चित्तको इन्द्रियोंद्वारा बाह्य विषयोंमें उपरक्त नहीं कर सकता है किंतु रजकी क्रिया सूक्ष्मरूपसे होती रहती है, जिससे वह चित्तको मनद्वारा स्मृतिके संस्कारोंमें उपरक्त करनेमें समर्थ रहता है । इसमें भावित स्मर्तव्य स्मृति वृत्ति रहती है । मन इन्द्रियोंके अन्तर्मुख होनेसे सूक्ष्मशरीरमें स्वप्नका कार्य करता है । चित्तमें व्युत्थानके संस्कार तथा व्युत्थानका परिणाम होता है । पुरुष वृत्तिसारूप्य प्रतीत होता है । ३ सुषुप्ति - अवस्था – सत्त्वगुण गौणतम रूपसे दब जाता है । तमोगुण रजोगुणकी स्वप्नावस्थावाली क्रियाओंको भी रोककर प्रधानरूपसे चित्तपर फैल जाता है । इसलिये किसी विषयका किसी प्रकारका भी ज्ञान नहीं रहता; किंतु रजका नितान्त अभाव नहीं होता, वह कुछ अंशमें बना ही रहता है । जिसके कारण किसी विषयके ज्ञान न होनेकी अर्थात् अभावकी प्रतीति होती रहती है । सूक्ष्मशरीरमें कार्य बंद होकर कारण - शरीरमें निद्रावृत्ति बनी रहती है । पुरुष वृत्ति - सारूप्य प्रतीत होता है ४ प्रलयावस्था - प्रलयमें चित्तकी अवस्था सुषुप्ति - जैसी होती है, केवल इतना भेद है कि यह बद्ध जाव गाढ़ निद्रा - जैसी अवस्थामें व्यष्टि - चित्तकी सुषुप्ति है और प्रलय समष्टि - चित्तकी, जिससे सर्वबद्ध जीव रहते हैं । ५ समाधि प्रारम्भ - अवस्था- तमोगुण गौणरूपसे रहता है । रजोगुणकी चित्तको चलायमान करनेकी क्रिया निर्बल होती जाती है । सत्त्वगुण प्रधान होकर चित्तको एकाग्र करने और उसमें वस्तुके यथार्थरूपको दिखलानेमें समर्थ होता जाता है । इसमें सर्वार्थताका दबना और एकाग्रवृत्तिका उदय उदय होना होना प्र प्रारम्भ होता है । पुरुष वृत्ति - सारूप्य प्रतीत होता है । ६ सम्प्रज्ञात समाधि ( एकाग्रता ) – तमोगुण गौणतर रूपसे दबा रहता है । सत्त्वगुण रजोगुणको दबाकर प्रधानरूपसे अपना प्रकाश करता है, जिससे चित्त वस्तुके तदाकार होकर उसका यथार्थ रूप दिखलानेमें ( १३४ )

पृष्ठ 158

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चौथा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * * [ पतञ्जलिमुनिका परिचय समर्थ होता है । स्थूलशरीरमें कार्य बंद होकर सूक्ष्मशरीरमें एकाग्रवृत्ति रहती है । स्वप्नावस्थासे इसमें यह विलक्षणता है कि तमके स्थानपर इसमें सत्त्वकी प्रधानता हो जाती है, चित्तमें समाधि परिणाम होता है I पुरुष एकाग्रतावृत्ति-- - सारूप्य प्रतीत होता है । ७ सम्प्रज्ञात समाधि और असम्प्रज्ञात समाधिके बीचकी अवस्था ( विवेकख्याति ) – तमोगुण गौणतम रूपसे नाममात्र रहता है । चित्तसे रजोगुण- तमोगुणका आवरण हटकर सत्त्वगुणका पूर्णतया प्रकाश फैल जाता है । रजोगुण केवल इतनी मात्रामें रहता है कि जिससे पुरुषको चित्तसे भिन्न दिखलानेकी क्रिया हो सके और तम इस वृत्तिको रोकनेमात्र रह जाता है । सुषुप्तिसे इसमें यह विलक्षणता है कि तमके स्थानपर इसमें सत्त्व प्रधानरूपसे रहता है । सुषुप्तिमें कारण - शरीरमें अभावकी प्रतीतिके के स्थानपर इसमें कारण - शरीरमें चित्तद्वारा पुरुषका चित्तसे भेदज्ञान ( विवेकख्याति ) होता है । ८ असम्प्रज्ञात समाधि ( स्वरूपावस्थिति ) – ' सत्त्व चित्त ' में बाहरसे तीनों गुणोंका ( वृत्तिरूप ) परिणाम होना बंद हो जाता है । तीनों गुणोंका नितान्त अभाव होनेसे विवेक- ख्याति अर्थात् पुरुषको चित्तसे भिन्न प्रतीत करानेवाली वृत्ति भी रुक जाती है । सर्ववृत्तियोंके विरुद्ध हो जानेपर चित्त अपने वास्तविक सत्त्व स्वरूपसे पुरुषमें अवस्थित रहता है और पुरुषकी शुद्ध परमात्मस्वरूपमें अवस्थिति होती है । चित्तमें केवल निरोध - परिणाम अर्थात् संस्कार शेष रहते हैं, जिनके दुर्बल होनेपर उसे फिर व्युत्थानदशामें आना होता है । ९ प्रतिप्रसव अर्थात् चित्तको बनानेवाले गुणोंकी अपने कारणमें लीन होनेकी अवस्था - चित्तमें निरोध - परिणाम अर्थात् संस्कार - शेष भी निवृत्त हों जाते हैं । चित्तको बनानेवाले गुण पुरुषका भोग - अपवर्गका प्रयोजन पूरा करके अपने कारणमें लीन हो जाते हैं औरपुरुष शुद्ध कैवल्य परमात्मस्वरूपमें अवस्थित हो जाता है I पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तेरिति । ( ३ । ३४ ) पुरुषार्थसे शून्य हुए गुणोंका अपने कारणमें लीन हो जाना कैवल्य है; अथवा चिति शक्तिकी स्वरूपावस्थिति कैवल्य है । पतञ्जलिमुनिका परिचय योगदर्शनके सूत्रकार श्रीपतञ्जलिमुनिकी जीवनीका ठीक - ठीक पता नहीं चलता, किंतु यह बात निःसंदेह सिद्ध है कि श्रीपतञ्जलिमुनि भगवान् कपिलके पश्चात् और अन्य चारों दर्शनकारोंसे बहुत पूर्व हुए हैं । किसी - किसीका मत है कि पाणिनि व्याकरणका महाभाष्य तथा वैद्यककी चरक - संहिता — ये दोनों जो अपने - अपने विषयके अद्वितीय ग्रन्थ हैं, इन्हींके रचे हुए हैं । जैसे कि कहा गया है-योगेन चित्तस्य पदेन वाचां मलं शरीरस्य च वैद्यकेन । योऽपाकरोत्तं प्रवरं मुनीनां पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोऽस्मि ॥ मैं उन मुनियोंमें श्रेष्ठ पतञ्जलिको बद्धाञ्जलि ( हाथ जोड़कर ) नमस्कार करता हूँ, जिसने कि योगसे अन्तःकरणके, पद ( व्याकरण - महाभाष्य ) से वाणीके और वैद्यक ( चरक - ग्रन्थके द्वारा ) से शरीरके मलको दूर किया है ( धोया है ) । योगदर्शनके प्रथम सूत्र ' अथ योगानुशासनम् ' के सदृश महाभाष्यको भी प्रथम सूत्र ' अथ शब्दानुशासनम् ' से आरम्भ किया गया है तथा चरकमें भी सांख्ययोग फिलासफीको ही वैद्यकका ( १३५ )

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चौथा प्रकरण ] पातञ्जलयोगप्रदीप [ पतञ्जलिमुनिका परिचय * * ******* आधार - शिला बनाया गया है । यथा— सत्त्वमात्मा शरीरं च त्रयमेतत्त्रिदण्डवत् । लोकस्तिष्ठति संयोगात्तत्र सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ स पुमांश्चेतनं तच्च तच्चाधिकरणं स्मृतम् । वेदस्यास्य तदर्थं हि वेदोऽयं सम्प्रकाशतः ॥ ( २ । ४५-४६ ) चित्त, आत्मा और शरीर इन तीनोंका तीन दण्डोंके समान परस्पर सम्बन्ध है । इन तीनोंके सम्बन्धसे

संसार ठहरा हुआ है । उसीमें सब कुछ प्रतिष्ठित है ॥४५ ॥

इन तीनोंके सम्बन्धको ही पुमान् ( पुरुष ), चेतन और ( आयुर्वेदका ) अधिकरण माना गया है । इस पुरुषके लिये ही इस आयुर्वेदका प्रकाश किया गया है ॥४६ ॥

निर्विकारः परस्त्वात्मा

सत्त्वभूतगुणेन्द्रियैः ।

चेतने कारणं नित्यो द्रष्टा पश्यति हि क्रियाः ॥ ५५ ॥

आत्मा निर्विकार है, पर है, चित्त, भूतगण ( शरीर ) और इन्द्रियोंके चैतन्यमें कारण है । नित्य है, द्रष्टा है, ( क्रियारहित होता हुआ भी ) सर्व चित्तकी क्रियाओंको देखनेवाला है ॥ ५५ ॥

किंतु इन दोनों ग्रन्थोंके साथ पतञ्जलिमुनिका नाम केवल इन ग्रन्थोंकी प्रतिष्ठा बढ़ानेके लिये लगाया गया है । अन्यथा दोनों ग्रन्थ योगदर्शनकी अपेक्षा बहुत पिछले समयके बने हुए हैं । वैद्यक अनुभवसिद्ध विषय है । इसलिये सांख्ययोग फिलासफीके साथ इसका समन्वय होना स्वाभाविक ही है । पाणिनि-मुनिप्रणीत अष्टाध्यायीपर यह महाभाष्य लिखा गया है, इस कारण अनुशासनका शब्द प्रयोग किया गया है । प्राचीन कालके पतञ्जलिमुनिका महाभाष्यका रचयिता होना भी एक विचित्र रूपमें दिखलाया गया है । जिसके अनुसार पतञ्जलिमुनिको शेषनागका अवतार मानकर काशीमें एक बावड़ीपर पाणिनिमुनिके समक्ष सर्परूपमें प्रकट होना बतलाया गया है । पाणिनिमुनि घबराकर ' को भवान् ' के स्थानपर ' कोर्भवान् ' बोलते हैं । सर्प उत्तर देता है । ' सपोऽहम् ' । पाणिनिमुनि पूछते हैं— ' रेफः कुतो गतः । ' सर्प उत्तर देता है- -'तव मुखे ' । इसके पश्चात् सर्पके आदेशानुसार एक चादरकी आड़ लगा दी गयी । उसके अंदरसे शेषनाग पतञ्जलिमुनि अपने हजारों मुखोंसे एक साथ सब प्रश्नकर्ताओंको उत्तर देने लगे । इस प्रकार सारा महाभाष्य तैयार हो गया । किंतु सर्पकी इस आज्ञाके कि कोई पुरुष चादर उठाकर अंदर न देखे, एक व्यक्तिद्वारा उल्लङ्घन किये जानेपर शेषनागकी फुंकारसे ब्राह्मणोंके सारे कागज जल गये । ब्राह्मणोंकी दुःखी अवस्थाको देखकर एक यक्षने, जो वृक्षपर बैठा पत्तोंपर भाष्यको लिखता जाता था, वे पत्ते उनके पास फेंक दिये । उन पत्तोंमेंसे कुछको बकरी खा गयी । इसीलिये कुछ स्थानोंमें महाभाष्यमें असङ्गति - सी पायी जाती है । पाराशर्यशिलालिभ्यां भिक्षुनटसूत्रयोः । ( ४ । ३ । ११० ) अष्टाध्यायीके उपर्युक्त सूत्रसे व्यासजीका पाणिनिमुनिसे पूर्व होना सिद्ध होता है । फिर पाणिनिमुनिप्रणीत अष्टाध्यायीपर महाभाष्यकर्ता पतञ्जलि योगदर्शनके सूत्रकार पतञ्जलि किस प्रकार हो सकते हैं । यह सम्भव है कि पतञ्जलि नामके कोई अन्य व्यक्ति इन दोनों उच्च कोटिके ग्रन्थोंके रचयिता हुए हों । ( १३६ )

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चौथा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय [ योगदर्शनपर भाष्य तथा वृत्ति आदि * * योगदर्शनपर भाष्य तथा वृत्ति आदि योगदर्शनके ऊपर अनेक भाष्य, वृत्तियाँ और टीकाएँ रची गयी हैं । उनमें सबसे अधिक प्रामाणिक, प्रसिद्ध और प्राचीन व्यासभाष्य है । व्यासभाष्य स्वयं बहुत ही गूढ़ार्थ है । उसके अर्थको समझानेके लिये वाचस्पति मिश्रने तत्त्ववैशारदी और विज्ञानभिक्षुने योगवार्तिककी रचना की है । विज्ञानभिक्षुने एक अलग पुस्तक योगसारमें योगके सिद्धान्तोंका सारांश उपस्थित किया है । वृत्तियोंमें “ राजमार्तण्ड ” जिसका प्रसिद्ध नाम “ भोजवृत्ति ” है, अत्यन्त लोकप्रिय और प्रामाणिक है । गणेश भट्टकी एक बड़ी वृत्ति योगवार्तिकके आधारपर निर्मित हुई है । योगदर्शनके भाष्यकार व्यासका ठीक - ठीक समय निश्चय करना कठिन है । कई एक विद्वानोंका मत है कि ब्रह्मसूत्रकार व्यास ही योगदर्शनके भाष्यकार व्यास हैं । योगदर्शनके प्रथम वार्तिकमें विज्ञानभिक्षुने भी ब्रह्मसूत्रकार बादरायणको ही योगदर्शनका भाष्यकार व्यास बतलाया है । अन्य कई विद्वान् ऐसा मानते हैं कि योगदर्शनके भाष्यकार व्यास ब्रह्मसूत्रकार व्याससे भिन्न हैं और बहुत पूर्व समयमें हुए हैं । व्यास - भाष्यमें भिन्न - भिन्न स्थानोंमें लगभग इक्कीस सूत्र षञ्चशिखाचार्यके, कुछ वचन जैगीषव्य और वार्षगण्याचार्यके तथा एक - दो घटनाएँ रामायणकी भी उद्धृत की गयी हैं । इससे सिद्ध होता है कि सांख्यके प्राचीन ग्रन्थ पञ्चशिखाचार्यके सूत्र और वार्षगण्याचार्यप्रणीत षष्ठी - तन्त्र जो इस समय लुप्त हैं तथा वाल्मीकीय रामायण व्यासभाष्यके समय विद्यमान थे । श्रीमद्भगवद्गीता और महाभारत आदि ग्रन्थ तथा ब्रह्मसूत्र उसके पश्चात् बनाये गये हैंI ( १३७ )