पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 171–180
पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 171–180
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समाधिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र २ , अधर्म , अनैश्वर्य , प्रवृत्ति राग अज्ञान , धर्म , मोह क्रोध , लोभ | निमित्त काम की - गति नीच मनुष्यों स्थिति ,,, , अधर्म अनैश्वर्य धर्म ,, ऐश्वर्य , ज्ञान वैराग्य अज्ञान राग धर्म ,, ऐश्वर्य ज्ञान वैराग्य द्वेष , राग संसारी साधारणमनुष्योंकी , कर्म निष्काम अनासक्ति , मनुष्यों जिज्ञासुओं-ऊँचे यथार्थ ज्ञान वस्तुका वैराग्य अपर योगियोंकी स्वरूप कीस्थिति द्रष्टा वैराग्य पर ऊँचे योगियोंकी स्वरूप अस्वाभाविक वृत्तिका अस्वाभाविक अवस्थाएँ वृत्ति सर्वार्थता सर्वार्था पाँच दशा व्युत्थान , चित्तकी , , दीनता मोह , आदि , तन्द्रा भ्रम गुणवृत् आलस्य , निद्राभय व्युत्थान । , संसारके , प्रवृत्ति में , चञ्चलता शोक , कामों दुःख चिन्ता , गौण परिणामप्रधान सत्त्व तम, रज गुणका ; गौण , प्रधान सत्त्व रज, तम अस्वाभाविक ; स्वाभाविक ; अभाव स्वरूप-स्वाभाविक प्रतिष्ठिति अस्वाभाविक और चित्तकी वृत्तियोंका आरम्भ एकाग्रता सर्वार्थता एकाग्रता निरोध सर्ववृत्ति-; आरम्भ व्युत्थान समाधि , , , , क्षमा , दान चैतन्यता , आदि , वीर्य धैर्य , प्रसन्नता , दया उत्साह सुखश्रद्धा ; गौण प्रधान तम , सत्त्वरज ; ; सम्प्र- समाधियोग समाधि असम्प्रज्ञात योगज्ञात तटस्थता स्वरूपस्थिति ; प्रधान , वृत्तिमात्र सत्त्व तम , रज शेष ; ' चित्त बंद ' में निरोधसंस्कार सत्त्व परिणामपरिणाम अवस्था अवस्था मूढ़ १ नाम अवस्था क्षिप्त २ अवस्था विक्षिप्त ३ ( १४८ ) अवस्था एकाग्र ४ अवस्था निरुद्ध ५
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सूत्र २ ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ समाधिपाद १ मूढावस्था — इस अवस्थामें तम प्रधान होता है, रज तथा सत्त्व दबे हुए गौणरूपसे रहते हैं । यह अवस्था काम, क्रोध, लोभ और मोहके कारण होती है । जब चित्तकी ऐसी अवस्था होती है, तब मनुष्यकी प्रवृत्ति अज्ञान, अधर्म, राग और अनैश्वर्यमें होती है । यह अवस्था नीच मनुष्योंकी है । २ क्षिप्तावस्था — इसमें रजोगुणकी प्रधानता होती है, तम और सत्त्व दबे हुए गौणरूपसे रहते हैं, इसका कारण रागद्वेषादि होते हैं । इस अवस्थामें धर्म - अधर्म, राग - विराग, ज्ञान - अज्ञान, ऐश्वर्य और अनैश्वर्यमें प्रवृत्ति होती है । अर्थात् जब तमोगुण सत्त्वगुणको दबा लेता है, तब अधर्म, अज्ञानादिमें और जब सत्त्व तमको दबा लेता है, तब धर्म, ज्ञानादिमें प्रवृत्ति होती है । यह अवस्था साधारण सांसारिक मनुष्योंकी है । ३ विक्षिप्तावस्था — इस अवस्थामें सत्त्वगुण प्रधान होता है, रज तथा तम दबे हुए गौणरूपसे रहते हैं । यह निष्काम कर्म करने तथा राग - द्वेष, काम - क्रोध, लोभ और मोहादिके छोड़नेसे उत्पन्न होती है । इस अवस्थामें, क्योंकि सत्त्वगुण किसी मात्रामें बना रहता है, इस कारण मनुष्यकी प्रवृत्ति धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्यमें होती है । परंतु रजोगुण चित्तको विक्षिप्त करता रहता है । यह अवस्था ऊँचे मनुष्यों तथा जिज्ञासुओंकी है । यह तीनों अवस्थाएँ चित्तकी अपनी स्वाभाविक नहीं हैं और न योगकी हैं, क्योंकि बाहरके विषयोंके गुणोंसे चित्तपर उनका प्रभाव पड़ता रहता है । ४ एकाग्रावस्था – जब एक ही विषयमें सदृश वृत्तियोंका प्रवाह चित्तमें निरन्तर बहता रहे, तब उसको एकाग्रता कहते हैं । यह चित्तकी स्वाभाविक अवस्था है, अर्थात् जब चित्तमें बाह्य विषयोंके रज तथा तमका प्रभाव न रहे, तब वह निर्मल चमकते हुए स्फटिकके सदृश स्वच्छ होता है । उस समय उसमें परमाणुओंसे लेकर महत्तत्त्वपर्यन्त ग्राह्य, ग्रहण और ग्रहीतृ विषयोंका यथार्थ साक्षात् हो सकता है । इसीकी अन्तिम स्थिति विवेक ख्याति है, जिसकी ऊपर व्याख्या कर आये हैं । एकाग्रताको सम्प्रज्ञात-समाधि भी कहते हैं । इसमें प्रकृतिके सर्व कार्यों ( गुणोंके परिणामों ) का पूर्णतया साक्षात् हो जाता है । ५ निरुद्धावस्था – जब विवेक- ख्यातिद्वारा चित्त और पुरुषका भेद साक्षात्कार हो जाता है, तब उस ख्यातिसे भी वैराग्य ( पर - वैराग्य ) उदय होता है; क्योंकि विवेक- ख्याति भी चित्तकी ही एक वृत्ति है । इस वृत्तिके भी निरुद्ध होनेपर सर्ववृत्तियोंके निरोध होनेसे चित्तकी निरोधावस्था होती है । इस निरोधावस्थामें अन्य सब संस्कारोंके तिरोभावपूर्वक पर - वैराग्यके संस्कारमात्र शेष रहते हैं । निरोधावस्थामें किसी प्रकारकी भी वृत्ति न रहनेके कारण कोई पदार्थ भी जाननेमें नहीं आता, तथा अविद्यादि पाँचों क्लेशसहित कर्माशय - रूप जन्मादिकोंके बीज नहीं रहते । इसलिये इसको असम्प्रज्ञात तथा निर्बीजसमाधि भी कहते हैं । इस शङ्काके निवारणार्थ सर्ववृत्तियोंके निरोध होनेपर क्या पुरुषका भी निरोध हो जाता है? अथवा क्या वह शून्य अवस्था है? अगले सूत्रमें बतलाया है कि सर्ववृत्तियोंके निरुद्ध होनेपर पुरुष ( शुद्ध परमात्म ) स्वरूपमें अवस्थित होता है । विशेष विचार सूत्र २ – योगके विषयको समझनेके लिये चित्तके स्वरूप तथा सृष्टिक्रमका ज्ञान अति आवश्यक है, इसलिये इसका कुछ विस्तारपूर्वक वर्णन कर देना उचित समझते हैं ( १४ ९ )
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समाधिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र २ मूल प्रकृति जड, अलिङ्ग परिणामिनी तथा त्रिगुणमयी अर्थात् प्रकाश, क्रिया ( प्रवृत्ति ) और स्थितिशील है । प्रकाश सत्त्वका, क्रिया रजका और स्थिति ( रोकना, दबाना ) तमका धर्म है । गुण अपने स्वरूपसे ही परिणाम - स्वभाववाले हैं । इसलिये इनका सत्तामात्र साम्य - परिणाम अर्थात् सत्त्वसे सत्त्वमें, रजसे रजमें और तमसे तममें परिणाम, इनके विषम परिणामोंके प्रत्यक्ष होनेसे अनुमानगम्य और आगमगम्य है । गुणोंकी साम्य - परिणामवाली अवस्थाका नाम ही प्रधान अथवा मूल - प्रकृति है । यह परोक्ष अर्थात् प्रत्यक्षं न होनेयोग्य अव्यक्त गुणोंका परिणाम पुरुषके लिये निष्प्रयोजन है । पुरुषका प्रयोजन भोग और अपवर्ग है । भोग गुणोंके परिणामोंका यथार्थरूपसे साक्षात्कार और अपवर्ग पुरुषकी स्वरूपावस्थिति है । बिना गुणोंके साक्षात्कार किये हुए स्वरूपावस्थिति दुर्लभ है । चेतन तत्त्वका शुद्धस्वरूप जड - तत्त्वसे सर्वथा विलक्षण है । जड - तत्त्वके सम्बन्धसे उसकी ' ईश्वर ' तथा ' जीव ' संज्ञा है । जड - तत्त्व परिणामी नित्य और चेतन तत्त्व कूटस्थ नित्य है । जड - तत्त्व विकारी और चेतन तत्त्व निर्विकार है । जड - तत्त्व सक्रिय और चेतन तत्त्व निष्क्रिय, केवल ज्ञानस्वरूप है । जड - तत्त्वमें ज्ञान, नियम तथा व्यवस्थापूर्वक क्रिया चेतन तत्त्वकी संनिधिमात्रसे है । अर्थात् चेतन -तत्त्व - त क्रियाका निमित्त - कारण और जड - तत्त्व समवायी अथवा उपादान कारण है । समष्टि जड - तत्त्वके सम्बन्धसे चेतन तत्त्वकी संज्ञा पुरुष - विशेष अथवा ईश्वर है । वह सर्वज्ञ, सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान् है । उसके स्वाभाविक ज्ञानद्वारा पुरुषोंके कल्याणार्थ गुणोंमें विषम परिणाम हो रहा है, जिससे सारी सृष्टिकी रचना हो रही है, जो इस प्रकार है— १ प्रथम विषम - परिणाम महत्तत्त्व – सत्त्वगुणमें रजोगुणका क्रियामात्र तथा तमोगुणका स्थितिमात्र विषम परिणाम अर्थात् सत्त्वगुण -प्रधान रजोगुण और तमोगुणका लिङ्गमात्र प्रथम विषम - परिणाम महत्तत्त्व है । यही लिङ्ग है और सृष्टिके नियमोंका बीजरूप है । इसीसे सारी सृष्टिकी उत्पत्ति होती है । वह योगदर्शनके अनुसार समष्टि तथा व्यष्टि चित्त और सांख्यके अनुसार समष्टि तथा व्यष्टि बुद्धि है । वेदान्तमें चेतन - तत्त्वकी महत्तत्त्व ( समष्टि चित्त ) के सम्बन्धसे ' हिरण्यगर्भ ' और व्यष्टि - चित्तके सम्बन्धसे ' तैजस ' संज्ञा है । यह चित्त व्यष्टिरूपसे पुरुषके लिये गुणोंका साक्षात्कार करानेका ( साधन ) है । कहीं - कहीं मन, बुद्धि, अहंकार और चित्तको एकार्थक और कहीं - कहीं चार प्रकारकी वृत्तिभेदसे इनको अन्तःकरण-चतुष्टय कहा गया है । अर्थात् संकल्प - विकल्प करनेसे मन, अहंभाव प्रकट करनेसे अहंकार, निर्णय तथा निश्चय करनेसे बुद्धि और स्मृति तथा संस्कारोंसे चित्रित होनेसे चित्त । सांख्यमें महत्तत्त्वके लिये ' बुद्धि ' और योगमें ' चित्त ' शब्द प्रयोग हुए हैं । सांख्यमें बुद्धिमें चित्तको और योगमें चित्तमें बुद्धिको सम्मिलित कर लिया गया है । सिद्धान्तात्मक होनेसे सांख्यमें बुद्धिद्वारा सब पदार्थोंका विवेकपूर्ण निर्णय करना और क्रियात्मक होनेसे योगमें चित्तद्वारा अनुभव अर्थात् साक्षात्कार क़रना बताया गया है । फोटो लेनेके प्लेटके सदृश ग्राह्य तथा ग्रहण सब प्रकारके विषयोंको पुरुषको प्रत्यक्ष करानेके लिये चित्त दर्पणरूप है । चित्तहीमें सुख - दुःख, मोहादिरूप सत्त्व, रजस् तथा तमस्के परिणाम होते हैं । चित्तहीका वृत्तिमात्रसे सूक्ष्म शरीरके साथ, एक स्थूल शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरमें जाना ( १५० )
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सूत्र २ ] योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः * * [ समाधिपाद ( आवागमन ) होता है । असङ्ग, निर्लेप पुरुष केवल इसका द्रष्टा है । इस चित्तमें ही अहंकार बीजरूपसे है रहता 1 २ द्वितीय विषम - परिणाम अहंकार - अहम्भावसे एकत्व - बहुत्व, व्यष्टि - समष्टि आदि सर्व प्रकारकी भिन्नता उत्पन्न करनेवाला, महत्तत्त्वका विषम - परिणाम अहंकार है । अहंकारहीके ग्राह्य और ग्रहण भेदवाले दो प्रकारके विषम - परिणाम उत्पन्न होते हैं । ३ ग्यारह इन्द्रियाँ ग्रहण विषम - परिणाम - परस्पर भेदवाली पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ शक्तिरूप — श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, रसना, घ्राण; इसी प्रकार परस्पर भेदवाली पाँच कर्मेन्द्रियाँ शक्तिरूप – हस्त, पाद, वाक्, पायु ( गुदा ), उपस्थ ( मूत्रत्यागकी इन्द्रिय ) और ग्यारहवाँ मन । ये विभाजक अहंकारके ग्रहण विषम-परिणाम हैं । ४ ग्राह्य सूक्ष्म विषम - परिणाम पञ्च - तन्मात्राएँ – परस्पर भेदवाली शब्द- तन्मात्रा, स्पर्श - तन्मात्रा, रूप - तन्मात्रा, रस - तन्मात्रा, गन्ध - तन्मात्रा — ये भेदभाव उत्पन्न करनेवाले विभाजक अहंकारके ग्राह्य विषम - परिणाम हैं । ५ ग्राह्य स्थूल विषम - परिणाम - अर्थात् पाँच स्थूलभूत – पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश पाँच तन्मात्राओंके ग्राह्य स्थूल विषम - परिणाम हैं । इन विषम - परिणामोंमें सत्त्वमें रजस् तथा तमस्का प्रभाव क्रमसे बढ़ता जाता है । अर्थात् महत्तत्त्वको अपेक्षा अहंकारमें, अहंकारकी अपेक्षा पञ्च - तन्मात्राओं और ग्यारह इन्द्रियोंमें और पाँच तन्मात्राओंकी अपेक्षा पाँचों स्थूल - भूतोंमें रजस् तथा तमस्की मात्रा क्रमशः बढ़ती जाती है । यहाँतक कि पाँचों स्थूल - भूतोंमें रजस् तथा तमस्की मात्रा इतनी ( प्रधानरूपसे ) बढ़ जाती है कि वे उसके कारण स्थूलरूपमें हमारे दृष्टिगोचर हो रहे हैं ।
प्रकृतेर्महांस्ततोऽहंकारस्तस्माद् गणश्च षोडशकः ।
तस्मादपि षोडशकात् पञ्चभ्यः पञ्चभूतानि ॥ २२ ॥
( सां ॰ का ० ) प्रकृतिसे महत्, उससे अहंकार, उससे सोलह ( पाँच - तन्मात्राएँ, ग्यारह इन्द्रियाँ ) का समूह; उस सोलहमें जो पाँच ( तन्मात्राएँ ) हैं, उनसे पाँच ( स्थूल ) भूत उत्पन्न होते हैं ।
मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त ।
षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः ॥ ३ ॥
( सां ॰ का ० ) मूल प्रकृति विकृति नहीं है ( केवल प्रकृति है ), महत् आदि सात ( महत्तत्त्व, अहंकार, पाँच तन्मात्राएँ ) प्रकृति - विकृतियाँ हैं, सोलह ( पाँच स्थूलभूत, ग्यारह इन्द्रियाँ ) केवल विकृतियाँ ही हैं ( प्रकृतियाँ नहीं हैं ) । पुरुष न प्रकृति है न विकृति । पुरुष उसका प्रयोजन- भोग और अपवर्ग, गुणोंका साम्यपरिणाम – मूल प्रकृति तथा उनके ( गुणोंके ) विषम - परिणाम- -सात प्रकृतियाँ - विकृतियाँ अर्थात् महत्तत्त्व, अहंकार एवं पञ्च - तन्मात्राएँ, अनादि अर्थात् आरम्भरहित हैं । सोलह केवल विकृतियाँ अर्थात् ( १५१ )
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समाधिपाद ] • पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र २ ग्यारह इन्द्रियाँ और पाँच स्थूलभूत ( और उनसे रचा हुआ यह सारा विश्व ) सादि माने गये हैं, पर यह भी स्वरूपसे ही सादि हैं; क्योंकि सृष्टिके आरम्भमें अपने कारणसे कार्यरूपमें प्रकट होते हैं । प्रवाहसे तो ये भी अनादि हैं; क्योंकि प्रलयमें अपने कार्यस्वरूपको कारणमें लीन करके, दूसरी सृष्टिमें फिर पहलेकी तरह उत्पन्न होते हैं । यह प्रवाह प्रत्येक सृष्टिके आरम्भमें क्रमसे होता चला आ रहा है । इसलिये ये प्रवाहसे अनादि हैं । सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथा पूर्वमकल्पयत् । ( ऋग् ॰ १० । १३० । ३ ) उस ईश्वरने इस सूर्य और चन्द्रको पहले कल्पोंके अनुसार बनाया । अब एक शङ्का यह उत्पन्न होती है कि चित्त जड है; उसमें वस्तुका ज्ञान किस प्रकार हो सकता है और पुरुष असङ्ग, निर्लेप और क्रियारहित है; उसमें जाननेकी क्रिया किस प्रकार हो सकती है? इसका समाधान इस प्रकार है कि चित्त -सत्त्व जड होते हुए भी ज्ञानस्वरूप पुरुषसे प्रतिबिम्बित अर्थात् प्रकाशित है । इसलिये इसमें ( चित्तमें ) ज्ञान दिलानेकी योग्यता है और पुरुषको चित्तमें अपने प्रतिबिम्बित अर्थात् प्रकाश जैसी चेतनासे उसका ( चित्तका ) तथा उसके सारे विषयोंका स्वतः ज्ञान रहता है । इसीलिये इस दर्शनमें चित्तको दृश्य और पुरुषको द्रष्टा कहा गया है । ग्राह्य - ग्रहणरूप, स्थूलभूतोंसे लेकर महत्तत्त्वपर्यन्त गुणोंके सारे परिणामोंको पुरुषको साक्षात्कार करानेका चित्त ही एक करण ( साधन ) है । इस प्रकार गुणोंके परिणामोंका यथार्थरूपसे साक्षात्कार करना भोग है । यही सम्प्रज्ञात - समाधि है अथवा सम्प्रज्ञात - योग है और गुण- परिणामके साक्षात्कारके पश्चात् स्वरूपावस्थिति अपवर्ग है अर्थात् असम्प्रज्ञात - समाधि अथवा असम्प्रज्ञात - योग है । यह समाधि सब अवस्थाओंमें चित्तका धर्म है । इस धर्मके छिपे रहने और प्रकट न होनेका कारण यह है कि हमारा सारा व्यवहार स्थूल - जगत् अर्थात् सोलह ( केवल ) विकृतियोंमें ग्राह्य - ग्रहणरूपसे चल रहा है । इनमें तम तथा रजकी प्रधानता है और सत्त्व गौणरूपसे है । इसलिये इस व्यवहारमें आसक्ति हो जानेके कारण तमस् तथा रजस्के परिणाम —राग, द्वेष और अभिनिवेशके संस्काररूप आवरण और अहंकारमें जो रजस् तथा तमस्की मात्रा है; उससे अस्मिताक्लेशके संस्काररूपी आवरण और चित्त - सत्त्वमें जो सत्तामात्र तमस् तथा रजस्का परिणाम है; अविवेकके संस्कारोंका आवरण, चित्तसत्त्वपर उससे अविद्या, क्लेश अर्थात् जड चित्त और चेतन पुरुषमें संस्कारोंसे चढ़ जाता है । इस प्रकार इन आवरणोंसे मलिन और विक्षिप्त हुए चित्त- सत्त्वपर प्रतिक्षण इन हैं । नाना रूपके आन्तरिक तथा बाह्य परिणाम होते रहते हैं, जो वृत्ति कहलाते उदय होती मूढावस्थामें जब तम प्रधान होता है, तब निद्रा, आलस्य, प्रमाद आदि तामसी वृत्तियाँ होती हैं हैं । क्षिप्तावस्थामें जब रज प्रधान होता है, तब चञ्चल, अस्थिर करनेवाली राजसी वृत्तियाँ उदय और विक्षिप्तावस्थामें वस्तुके यथार्थस्वरूपकी प्रकाशक सात्त्विक वृत्तियाँ उदय होती हैं, किंतु यह सात्त्विक वृत्तियाँ राजसी वृत्तियोंसे अस्थिर और चलायमान होती रहती हैं । , इस प्रकार इस सर्वार्थता ( मनके सब विषयोंकी ओर जानेकी प्रवृत्ति ) में यथार्थ तत्त्वका प्रकाशक ( १५२ )
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सूत्र ३ ] * तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्* [ समाधिपाद चित्तका एकाग्रता — धर्म दबा रहता है । अभ्यास और वैराग्यद्वारा जब सर्वार्थताका निरोध होता है, तब तमस् तथा रजस्के दबनेसे सत्त्वके प्रकाशमें वस्तुका यथार्थ ज्ञान प्राप्त करानेवाली एकाग्रता ( सम्प्रज्ञात - समाधि ) का उदय होता है, जिसकी पराकाष्ठा गुण - परिणाम साक्षात्कारपर्यन्त पुरुष और चित्तमें विवेक - ज्ञान है । इस वृत्तिसे भी परवैराग्यद्वारा आसक्ति निवृत्त होनेपर सब वृत्तियोंका निरोधरूप असम्प्रज्ञात - समाधि अर्थात् द्रष्टाकी स्वरूपावस्थिति होती है । उस समय चित्तमें केवल निरोधके संस्कार शेष रहते हैं, ये निरोधके संस्कार अपनी दुर्बल अवस्थामें निरोधसे पुनः व्युत्थानमें ले जानेके कारण होते हैं । निरन्तर अभ्यास एवं वैराग्यसे निरोध - संस्कारोंकी दृढ़भूमि होनेपर अन्य सब व्युत्थानके संस्कारोंको सर्वथा निवृत्त करनेके पश्चात् ये संस्कारशेष भी स्वयं निवृत्त हो जाते हैं तब पुनः व्युत्थान - अवस्थामें न आनेवाली स्वरूपावस्थिति कैवल्य कहलाती है । प्रथम धर्म ( रूप ) को छोड़कर दूसरे धर्मको धारण करना परिणाम कहलाता है । सारा संसार गुणोंका ही संनिवेशमात्र है । इसलिये प्रत्येक वस्तुमें प्रतिक्षण परिणाम हो रहा है । परिणाम दो प्रकारसे होता है; एक साम्य अथवा सरूप - परिणाम, जैसे दूधके बने रहनेतक जो दूधसे दूधमें परिणाम हो रहा है; उसको साम्य अथवा सरूप - परिणाम कहेंगे, दूसरा दूधसे दही बनते समय अथवा उसमें और कोई अन्य विकार आते समय जो परिणाम होता है; उस दूधसे ही दही इत्यादिमें होनेवाले परिणामको विषम अथवा विरूप - परिणाम कहेंगे । विषम परिणाम ही प्रत्यक्ष होता है, उस प्रत्यक्षसे साम्य - परिणामका अनुमान किया जाता है । इसकी विस्तारपूर्वक व्याख्या विभूतिपाद सूत्र ९ की सङ्गति, सूत्र तेरहसे सोलहतक और कैवल्यपाद सूत्र चौदहमें की गयी है । सृष्टि - उत्पत्ति - क्रम १ चेतन - तत्त्व, निष्क्रिय, कूटस्थ नित्य — आत्मा तथा परमात्मा ( जड - तत्त्वके सम्बन्धसे व्यष्टिरूपमें -जीव तथा समष्टिरूपमें ईश्वर ) । २ जडतत्त्व, सक्रिय, परिणामिनी, नित्य, अव्यक्त, अलिङ्ग, प्रधान, त्रिगुणात्मक मूल प्रकृति, अविकृति, गुणोंकी साम्यावस्था । ३ लिङ्गमात्र, गुणोंका प्रथम विषम परिणाम, प्रकृति - विकृति महत्तत्त्व ( समष्टि - चित्त तथा व्यष्टि - चित्त ) । ४ महत्तत्त्वका कार्य — अहंकार, प्रकृति - विकृति, गुणोंका द्वितीय विषम - परिणाम । संगति — सब वृत्तियोंके निरोध होनेपर पुरुषकी क्या अवस्था होती है? तदा द्रष्टः स्वरूपेऽवस्थानम् ॥ ३ ॥
( वृत्तियोंके निरोध होनेपर ); शब्दार्थ - तदा = तब द्रष्टुः = द्रष्टाकी; स्वरूपे = स्वरूपमें; अवस्थानम् = अवस्थिति ( होती है ) । अन्वयार्थ– तब द्रष्टाकी ( शुद्ध परमात्म ) स्वरूपमें अवस्थिति ( होती है ) । व्याख्या – द्रष्टा ( पुरुष ) की चित्तवृत्ति निरुद्धकालमें वैसी ही चेतनमात्र ( शुद्ध परमात्म ) स्वरूपमें स्थित होती है जैसी कैवल्यमें होती है । चित्तकी व्युत्थान ( निरुद्धावस्थासे इतर) अवस्थामें भी पुरुष अपने ( १५३ )
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समाधिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप [ सूत्र ४ स्वाभाविक असङ्ग चेतनरूपमें स्थित होता है । पर चित्तकी उपाधिसे चित्तवृत्ति - जैसा शान्त, घोर और मूढादि प्रतीत होता है । वृत्ति - निरोधावस्थामें वृत्तियोंके निरोधसे पुरुषका निरोध नहीं होता, किंतु चित्तरूप उपाधिकी वृत्तिके अभावसे जब औपाधिक शान्त, घोरादि रूपका अभाव हो जाता है, तब पुरुष अपने उपाधिरहित रूपमें अवस्थित होता है । अभिप्राय यह है कि विवेक - ख्याति उत्पन्न होनेपर वस्तु आकारमें परिणामसे रहित चित्तमें कर्तापनका अभिमान निवृत्त हो जाता है । अर्थात् ' मैं करता हूँ ', ' मैं सुखी हूँ ', ' मैं दुःखी हूँ ' इत्यादि अभिमानकी निवृत्ति हो जाती है और बुद्धि ( अन्तःकरण ) में वृत्तिरूप परिणाम होना भी रुक जाता है; तब आत्माकी ( शुद्ध परमात्म ) स्वरूपमें अवस्थिति होती है । चितिशक्ति कूटस्थ नित्य होनेसे स्वरूपसे कभी प्रच्युत नहीं होती है । जैसा निरोधकालमें पुरुषका स्वभाव है वैसा ही व्युत्थानकालमें है, किंतु अविवेकसे वैसा प्रतीत नहीं होता । जिस प्रकार जब भ्रमसे शुक्ति ( सीप ) में रजत ( चाँदी ) का भान होता है, तब उस भ्रमकालमें उस भ्रमसे न सीपका अभाव और न चाँदीकी ही उत्पत्ति होती है, फिर भ्रम दूर होनेपर जब यह ज्ञान होता है कि यह चाँदी नहीं किंतु सीप है, तब इस ज्ञानसे सीपकी उत्पत्ति और चाँदीका अभाव नहीं होता — केवल अस्ति - नास्ति आदिका ( भाव - अभावका ) व्यवहार होता है । वैसे ही चिति - शक्ति सर्वदा एकरस ही है, किंतु व्युत्थानकालमें अविवेकके कारण अन्यरूपसे भान होती है और निरोधकालमें कैवल्यके सदृश निज शान्तरूपसे भान होती है । यह निरोध और व्युत्थानमें भेद है । विवेक - ख्याति सबसे अन्तिम सात्त्विक वृत्ति है जिसमें चित्तद्वारा आत्माका साक्षात्कार होता है । यहींतक पुरुषार्थका विषय है । इसमें जो आत्मसाक्षात्कार होता है उससे चित्तकी इतनी सात्त्विकता बढ़ जाती है कि इस वृत्तिसे भी आसक्ति हट जाती है । इस आसक्तिके हट जानेका नाम ही परवैराग्य है I तब चित्तमें किसी प्रकारकी कोई भी वृत्ति न रहनेपर द्रष्टाकी शुद्ध परमात्मस्वरूपमें अवस्थिति होती है । द्रष्टा, पुरुष, चितिशक्ति, दृक्शक्ति, चेतन, आत्मा एकार्थक शब्द हैं तथा अभ्यास, उपाधि, आरोप, भ्रम एकार्थक हैं संगति - निरोधसे भिन्न व्युत्थान- अवस्थामें पुरुषका क्या स्वरूप होता है? वृत्तिसारूप्यमितरत्र ॥ ४ ॥
शब्दार्थ – वृत्तिसारूप्यम् = वृत्तिकी समानरूपता; इतरत्र = दूसरी अर्थात् निरोधसे भिन्न व्युत्थान-अवस्थामें ( पुरुषकी होती है ) । अन्वयार्थ – दूसरी अर्थात् निरोधसे भिन्न व्युत्थान- अवस्थामें द्रष्टाकी वृत्तियोंके समानरूपता होती है अर्थात् द्रष्टा वृत्तियोंके समान रूपवाला प्रतीत होता है । व्याख्या- —दूसरी अर्थात् निरोधसे उठनेपर व्युत्थानकालमें द्रष्टा वृत्तियोंके, जो आगे लक्षणसहित कहा है— कही जायगी, समान रूपवाला प्रतीत होता है । जैसा पञ्चशिखाचार्यने एकमेव दर्शनं ख्यातिरेव दर्शनम् ॥ १ ॥
एक ही दर्शन है, ख्याति ( वृत्ति ) ही दर्शन है अर्थात् पुरुष वैसा ही दीखता चित्तकी है जैसी वृत्तियाँ वृत्ति होती होती है, इसलिये सुख - दुःख, मोहरूप सत्त्वगुणवाली, रजोगुणी अथवा तमोगुणी सुखी है जैसी , यह दुःखी है, यह मोहमें हैं, वैसा ही व्यवहार - दशामें पुरुषका स्वरूप जाना जाता है । अर्थात् यह ( १५४ )
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सूत्र ५ ], * वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः * [ समाधिपाद है; ऐसा लोग समझते हैं । जब चित्त एकाग्रतासे परिणत होता है, तब चितिशक्ति भी उस रूपमें प्रतिष्ठित होती है जब चित्त इन्द्रिय - वृत्तिके साथ विषयाकारसे परिणत होता है, तब पुरुष भी उस वृत्तिके रूपाकार ही जान पड़ता है । 1 अर्थात् यद्यपि परमार्थतः पुरुष असङ्ग और निर्लेप है तथापि अयस्कान्तमणि ( चुम्बक पत्थर ) के समान असंयुक्त रहते हुए भी केवल संनिधिमात्रसे उपकारकरणशील चित्तरूप दृश्यका दृश्यत्वरूपसे पुरुषके साथ भोग - अपवर्ग सम्पादनार्थ अनादि स्वस्वामिभाव सम्बन्ध है । इसलिये शान्त, घोर, मूढ़ाकार वृत्तिविशिष्ट चित्तकी संनिधिसे पुरुष अपनेको चित्तसे भिन्न न जानकर ' मैं शान्त ( सुखी ) हूँ ', ' मैं दुःखी हूँ ', ' मैं मूढ़ हूँ ' इत्यादि - इस प्रकार अपनेमें चित्तके धर्मोंका आरोप कर लेता है । इसी बातको बृहदारण्यक उपनिषद् में निम्न शब्दोंमें दर्शाया है— ' स समानः सन् ध्यायतीव लेलायतीव ' वह आत्मा बुद्धिके समान होकर अर्थात् बुद्धिके साथ तादात्म्याध्यासको प्राप्त होकर मानो ध्यान करता है, मानो चलता है । अथवा मलिन दर्पणमें प्रतिबिम्बित मुखमें मलिनताका आरोप करके अविवेकीजन ' मेरा मुख मलिन है ', इस प्रकार शोक करता है, वैसे ही पुरुष भी चित्तके उपाधि - धर्मोंका अपनेमें आरोप करके ‘ मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ ' इत्यादि; इस प्रकार भ्रमजालमें फँसकर शोकग्रस्त हो जाता है, यह वृत्तिसारूप्य पदका अर्थ है । यद्यपि पुरुष असङ्ग है तथापि उसकी चित्तके साथ योग्यता- लक्षण -संनिधि है अर्थात् पुरुषमें भोक्तृत्व - शक्ति और द्रष्टृत्व - शक्ति है और चित्तमें दृश्यत्व - शक्ति और भोग्यत्व - शक्ति है । यही इन दोनोंकी परस्पर योग्यता है । इस योग्यता - लक्षण -संनिधिसे ही चित्त सुख - दुःख, मोहाकाररूप परिणामसे भोग्य और दृश्य हुआ स्व कहा जाता है और पुरुष भोक्ता और द्रष्टा हुआ स्वामी कहा जाता है । यह जो पुरुषके भोगका हेतु स्व - स्वामि - भाव- सम्बन्ध है, यह भी चित्तसे ही अपने निजरूपके अविवेक प्रयुक्त है और अविवेक तथा वासनाका प्रवाह बीज और अंकुरके सदृश अनादि है । इस प्रकार चित्तवृत्तिविषयक उपभोगमें जो चेतनका अनादि स्व - स्वामि - भाव- सम्बन्ध है, वह वृत्ति - सारूप्यमें कारण है । जैसे जलाशय ( नदी अथवा तालाब ) में जब नाना प्रकारकी तरङ्गे उछलती होती हैं, तब गगनस्थ चन्द्रमण्डलका प्रतिबिम्ब उस जलाशयमें स्थिर निज यथार्थरूपसे नहीं भान होता है और जब तरङ्गे उठना बंद हो जाती हैं, तब स्वच्छ निश्चलरूपसे प्रकाशमान होकर चन्द्र- प्रतिबिम्ब प्रतीत होता है । वैसे ही जब चित्तकी वृत्तियाँ विषयाकार होनेसे चञ्चल रहती हैं, तब चेतन भी चन्द्रमण्डलकी भाँति चित्तमें प्रतिबिम्बित हुआ तदाकार होनेसे निजरूपमें नहीं भासता है । जब चित्तवृत्तियाँ निरुद्ध हो जाती हैं, तब चन्द्रमण्डलके सदृश चेतन निज स्थिररूपमें स्थित हो जाता है । यह तीसरे और चौथे सूत्रका फलितार्थ है I संगति — चित्तकी वृत्तियाँ बहुत होनेपर भी निरोध करनेयोग्य हैं । उनको अगले सूत्रमें पाँच श्रेणियोंमें
विभक्त करके बतलाते हैं ।
वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः ॥ ५ ॥
शब्दार्थ – वृत्तयः = वृत्तियाँ; पञ्चतय्यः - पाँच प्रकार ( की होती हैं ); क्लिष्टाः = क्लिष्ट ( राग - द्वेषादि क्लेशोंकी हेतु और ); अक्लिष्टाः - अक्लिष्ट ( राग - द्वेष आदि क्लेशोंकी नाश करनेवाली ) । अन्वयार्थ - वृत्तियाँ पाँच प्रकारकी होती हैं । क्लिष्ट अर्थात् रागद्वेषादि क्लेशोंकी हेतु और अक्लिष्ट अर्थात् राग - द्वेषादि क्लेशोंकी नाश करनेवाली । ( १५५ )
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समाधिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप E [ सूत्र ७ व्याख्या – बाह्य - पदार्थ असंख्य होनेके कारण उनसे उत्पन्न होनेवाली वृत्तियाँ भी असंख्य हैं । इन सबका सुगमतासे ज्ञान हो सके इसलिये उन सब निरोद्धव्य वृत्तियोंको पाँच श्रेणियोंमें विभक्त किया गया है । जिनके नाम अगले सूत्रमें दिये जायँगे । इन पाँच प्रकारकी वृत्तियोंमेंसे कोई क्लिष्टरूप होती हैं और कोई अक्लिष्टरूप । सत्त्व - प्रधान वृत्तियाँ अक्लिष्टरूप और तमस्प्रधान वृत्तियाँ क्लिष्टरूप हैं अर्थात् जिन वृत्तियोंके हेतु अविद्या आदि पाँच क्लेश ( २ । ३ ) हैं, जो कर्माशय ( २ । १२ ) के समूहकी उत्पत्तिकी भूमियाँ हैं, वे क्लिष्ट कहलाती हैं अर्थात् अविद्या आदि मूलक जो कर्माशयके समूहका क्षेत्ररूप वृत्तियाँ होती हैं, वे क्लिष्ट वृत्तियाँ कहलाती हैं और जो अविद्या आदि पाँचों क्लेशोंकी नाशक और गुणाधिकारकी विरोधी विवेकख्यातिरूप वृत्ति होती है, वह अक्लिष्ट कहलाती है । पहले अक्लिष्ट वृत्तियोंको ग्रहण करके क्लिष्ट वृत्तियोंका निरोध करना चाहिये । फिर परवैराग्यसे उस अक्लिष्ट वृत्तिका भी निरोध हो जाता है । यद्यपि क्लिष्ट वृत्तियोंके संस्कार बहुत गहरे जमे हुए होते हैं तथापि उनके छिद्रोंमें सत् - शास्त्र और गुरुजनोंके उपदेशसे अभ्यास और वैराग्यरूप अक्लिष्ट वृत्तियाँ वर्तमान रहती हैं । अर्थात् उनके द्वारा अक्लिष्ट वृत्तियाँ उत्पन्न हो सकती हैं । वृत्तियोंका यह स्वभाव है कि वे अपने सदृश संस्कारोंको उत्पन्न करती हैं— क्लिष्ट वृत्तियाँ क्लिष्ट संस्कारोंको और अक्लिष्ट वृत्तियाँ अक्लिष्ट संस्कारोंको । इस प्रकार छिपी हुई अक्लिष्ट वृत्तियाँ उत्पन्न होकर अक्लिष्ट संस्कारोंको और अक्लिष्ट संस्कार अक्लिष्ट वृत्तियोंको उत्पन्न करते हैं । यह चक्र यदि निरन्तर चलता रहे तो क्लिष्ट वृत्तियोंका निरोध हो जाता है । पर इनके संस्कार सूक्ष्मरूपसे अक्लिष्ट वृत्तियोंके छिद्रों ( बीच ) में बने रहते हैं ( ४ । २७ ) । उनका नाश निर्बीज समाधिके अभ्याससे होता है ( २ । १० ) । उपर्युक्त विधिके अनुसार जब क्लिष्ट वृत्तियाँ सर्वथा दब जाती हैं, तब अक्लिष्ट वृत्तियोंका भी निरोध परवैराग्यसे हो जाता है । इन सब वृत्तियोंका निरोध असम्प्रज्ञात योग है संगति — पाँचों वृत्तियोंके नाम बतलाते हैं— प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः ॥ ६ ॥
शब्दार्थ– प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, स्मृति — ये पाँच प्रकारकी वृत्तियाँ हैं जिनका लक्षण अगले सूत्रमें बतलायेंगे । संगति – प्रमाण - वृत्तिके तीन भेद दिखलाते हैं-प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि ॥ ७ ॥ ह
शब्दार्थ — प्रत्यक्ष - अनुमान - आगमाः = प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम; प्रमाणानि = प्रमाण हैं । अन्वयार्थ — प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम - भेदसे तीन प्रकारकी प्रमाण - वृत्ति है । व्याख्या – प्रमा ( यथार्थ ज्ञान ) करण ( साधन ) को प्रमाण कहते हैं । मैं देखता हूँ, मैं सुनता हूँ, मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ, मैं यह अनुमानसे जानता हूँ, मैं यह वेद - शास्त्रसे जानता हूँ इस प्रकारके ज्ञानका नाम बोध है । यह बोध यदि यथार्थ हो तो प्रमा कहलाता है, अयथार्थ हो तो अप्रमा । जिस वृत्तिसे प्रमा ( यथार्थ बोध ) उत्पन्न होता है, उसका नाम प्रमाण है । न हो ) प्रमाका लक्षण — अनधिगत ( स्मृति - भिन्न ) अबाधित ( रस्सीमें सर्पकी तरह जो नाशवान् वा अर्थको विषय करनेवाले पौरुषेय ज्ञान ( पुरुषनिष्ठ ज्ञान ) को प्रमा कहते हैं । इसीको यथार्थ अनुभव ( १५६ )
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सूत्र ७ ] * प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि * [ समाधिपाद सत्य - ज्ञान भी कहते हैं । यह प्रमा चक्षु आदि इन्द्रियोंद्वारा वा लिङ्ग - ज्ञानद्वारा अथवा आप्त - वाक्य-श्रवणद्वारा चित्तवृत्तिसे उत्पन्न होती है । इसलिये उस चित्तवृत्तिको प्रमाका करण होनेसे प्रमाण कहा जाता है। वह प्रमाण चित्तवृत्ति तीन प्रकारकी है-१ जो चक्षु आदि इन्द्रियोंद्वारा विषयाकार चित्तकी वृत्ति उदय होती है, वह प्रत्यक्ष प्रमाण कहलाती है । २ जो लिङ्गद्वारा उत्पन्न होती है, वह अनुमान प्रमाण कहलाती है । ३ और जो आप्त - वाक्य - श्रवणद्वारा उत्पन्न होती है, वह शब्द - प्रमाण या आगम - प्रमाण कहलाती है । इन प्रमाणोंसे जो पुरुषको ज्ञान होता है, वह फलप्रमा कहलाता है । वह फलप्रमा भी चित्तवृत्तिरूप प्रमाणोंके तीन प्रकारके होनेसे प्रत्यक्ष - प्रमा, अनुमिति प्रमा और शाब्दी - प्रमा भेदसे तीन प्रकारका है । प्रत्यक्ष - प्रमाण एवं प्रत्यक्ष - प्रमा- ग्रहण - रूप प्रत्येक ज्ञानेन्द्रिय ( नासिका, रसना, चक्षु, त्वचा और श्रोत्र ) और ग्राह्यरूप उनके विषय ( गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द ) क्रमसे एक ही कारणसे उत्पन्न होते हैं, इसलिये इन दोनोंमें एक - दूसरेको आकर्षण करनेकी शक्ति होती है । उदाहरणार्थ जब किसी रूपवाले घटादिक विषयका आँखसे संनिकर्ष होता है, तब आँखकी रश्मि उसपर पड़ती है । चित्तका उस विषयमें राग होनेसे वह इस नेत्र- प्रणालीद्वारा विषय - देशपर पहुँचकर उस विशेष घटादिके आकारवाला हो जाता है । चित्तके ऐसे घटादिक आकार - विशिष्ट परिणामको प्रत्यक्ष - प्रमाणवृत्ति कहते हैं और उसमें जो ‘ अहं घटं जानामि ' ‘ मैं घटविषयक ज्ञानवाला हूँ ' इस आकारवाला जो विषयसहित चित्त - वृत्तिविषयक पुरुषनिष्ठ ज्ञान है अर्थात् जो चिदात्मा ( चितिशक्ति ) का प्रतिबिम्ब उस प्रत्यक्ष - प्रमाण--वृत्तिद्वारा उस वृत्ति - जैसा विषयाकार होना है, वह प्रत्यक्ष - प्रमा कहलाता है । प्रमाण वृत्तिका फल होनेसे उसको फलप्रमा भी कहते हैं । वही पौरुषेय - बोध अथवा पौरुषेय - ज्ञान है । इस प्रकार व्यक्तिरूप विशेष अर्थको विषय करनेवाली वृत्ति प्रत्यक्ष - प्रमाण है और उस वृत्तिके अनुसार जो प्रतिबिम्ब - रूप पौरुषेय ज्ञान है, वह प्रत्यक्ष - प्रमा है तथा चित्तमें प्रतिबिम्बित जो चेतनात्मा ( चितिशक्ति ) है, वह प्रमाता है । अनुमान - प्रमाण एवं अनुमान प्रमा अर्थात् अनुमिति - लिङ्गसे लिङ्गका सम्बन्ध सामान्यरूपसे निश्चय करके जो यथार्थ ज्ञान प्राप्त हो उसको अनुमान कहते हैं । उदाहरण – जहाँ - जहाँ धूम होता है वहाँ - वहाँ अग्नि होती है जैसे रसोईघरमें; और जहाँ - जहाँ अग्नि नहीं होती वहाँ - वहाँ धूम नहीं होता, जैसे तालाब में । इस प्रकार धूमसे अग्निका सम्बन्ध सामान्यरूपसे निश्चित करके पर्वतमें धूमको देखकर अग्निके होनेका जो यथार्थ ज्ञान प्राप्त हो, उसको अनुमान प्रमाण कहते हैं । इस अनुमान प्रमाणसे जो चित्तमें परिणाम होता है, उसको अनुमानवृत्ति कहते हैं । उस अनुमान - वृत्तिद्वारा जो चिदात्मा ( चितिशक्ति ) का प्रतिबिम्ब - रूप पौरुषेय ज्ञान ( पौरुषेय बोध ) है, वह अनुमिति - प्र -प्रमा कहलाता है । आगम - प्रमाण एवं आगम - प्रमा - वेद, सत् - शास्त्र तथा आप्त - पुरुष, जो भ्रम, विप्रलिप्सा आदि दोषोंसे रहित यथार्थवक्ता हों, उनके वचनोंको आगम - प्रमाण कहते हैं । वेदों एवं सत् - शास्त्रोंको पढ़कर या सुनकर तथा आप्त - पुरुषोंके वचनोंको सुनकर श्रोताके चित्तमें जो परिणाम होता है, उसे आगम अथवा शब्दप्रमाण - वृत्ति कहते हैं । उस वृत्तिद्वारा जो चिदात्मा ( चितिशक्ति ) का प्रतिबिम्ब - रूप पौरुषेय ज्ञान ( पौरुषेय बोध ) होता है, वह फल - प्रमा, शब्द - प्रमा कहलाता है । ( १५७ )