पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 181–190

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 181–190

पृष्ठ 181

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समाधिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र ७ विशेष वक्तव्य सूत्र ७ –— इस सूत्रकी व्याख्यामें विज्ञानभिक्षु अपने योगवार्तिकमें प्रत्यक्ष - प्रमाणके

सम्बन्धमें लिखते हैं-प्रमाता चेतनः शुद्धः प्रमाणं वृत्तिरेव च ।

प्रमार्थाकारवृत्तीनां चेतने प्रतिबिम्बनम् ॥

प्रतिबिम्बितवृत्तीनां विषयो मेय उच्यते वृत्तयः साक्षिभास्याः स्युः करणस्यानपेक्षणात् ॥

साक्षाद् दर्शनरूपं च साक्षित्वं सांख्यसूत्रितम् ।

अविकारेण द्रष्टृत्वं साक्षित्वं चापरे जगुः ॥

शुद्ध चेतनको प्रमाता, वृत्तिको प्रमाण और चेतनमें अर्थाकार वृत्तियोंका प्रतिबिम्ब प्रमा कहा जाता है । प्रतिबिम्बित वृत्तियोंके विषयको मेय अर्थात् प्रमेय कहते हैं । करण अर्थात् इन्द्रियोंकी अपेक्षासे रहित वृत्तियाँ साक्षिभास्य होती हैं । सांख्यसूत्रमें साक्षात् दर्शन रूपको साक्षी कहा गया है, किंतु कोई अधिकारी द्रष्टाको ही साक्षी रूप मानते हैं । समीक्षा— शुद्ध चेतनको प्रमाता मानना अयुक्त और श्रुतिविरुद्ध है; क्योंकि शुद्ध नाम सर्वधर्मरहितका है और प्रमाता नाम प्रमारूप धर्मविशिष्टका है । इसलिये चित्तमें प्रतिबिम्बित चेतन ( जीवात्मा ) ही प्रमाका आधार होनेसे प्रमाता है । प्रमारूप बोध शुद्ध चेतनका मुख्य धर्म नहीं है ।

यथा-ज्ञानं नैवात्मनो धर्मो न गुणो वा कथंचन ।

ज्ञानस्वरूप एवाऽऽत्मा नित्यः सर्वगतः शिवः ॥

ज्ञान आत्मा ( शुद्ध चेतन ) का धर्म या गुण नहीं है, किंतु यह नित्य सर्वव्यापक शिव आत्मा ज्ञानस्वरूप ही है । ‘ असङ्गो ह्ययं पुरुषः ' यह ( सबका आत्मभूत ) पुरुष असङ्ग है । ' साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ' चेतन पुरुष निर्गुण होनेसे केवल साक्षी ही है । एवं सांख्य - प्रवचनभाष्यमें विज्ञान- भिक्षुने भी ऐसा ही लिखा है ' पुरुषस्तु प्रमासाक्ष्येव न प्रमाता ' । ( सांख्यसूत्र ८७ ) पुरुष प्रमाका साक्षी ही है प्रमाता नहीं । तथा- - ' कल्पितं दर्शनकर्तृत्वं वस्तुतस्तु बुद्धेः साक्ष्येव पुरुषः । ' ( सा ० २।२० ) पुरुषमें दर्शनकर्तृत्व कल्पित है और साक्षित्व वास्तविक है । इसलिये इसकी व्यवस्था निम्नरूपसे समझनी चाहिये । प्रत्यक्ष - प्रमाण – प्रत्यक्ष - प्रमाणके सम्बन्धमें प्रमाण, प्रमेय, प्रमा, प्रमाता और साक्षी - भेदसे पाँच पदार्थ माने जाते हैं-१ जिस प्रकार तालाब आदिका जल प्रणालीद्वारा क्षेत्रमें जाकर क्षेत्राकार हो जाता है, उसी प्रकार चित्तका नेत्रादि इन्द्रियोंद्वारा बाह्य विषय घटादिसे सम्बद्ध होकर उस घट आदि आकाररूप परिणामको कही जाती प्राप्त है । होनेपर जो ‘ अयं घटः ' ‘ यह घट है ' इस घटादि आकारवाली चित्तवृत्ति होती है, वह बौद्धप्रमा इसको ' प्रमाण ' कहते हैं । इस प्रमाका विषय - सम्बन्ध नेत्रादि इन्द्रियोंद्वारा उत्पन्न होता है, इसलिये है । २ उपर्युक्त घटादि आकारवाली चित्तवृत्तिका विषय घटादि ' प्रमेय ' कहलाता ३ पुरुषनिष्ठ बोध फल होनेसे किसीका करण नहीं है, इसलिये वह केवल ' प्रमा ' कहलाता है । ( १५८ )

पृष्ठ 182

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सूत्र ७ ] * प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि* [ समाधिपाद ४ बुद्धि - प्रतिबिम्बित चेतन जो इस प्रमाका आश्रय है, वह प्रमाता कहा जाता है । ५ और बुद्धि - वृत्ति - उपहित जो शुद्ध चेतन है, वह साक्षी है । अनुमान - प्रमाण – लिङ्ग - लिङ्गी, साधन - साध्य अथवा कार्य - कारणके सम्बन्धसे जो यथार्थ ज्ञान उत्पन्न हो, उसे अनुमान कहते हैं । अनुमान तीन प्रकारका होता है— पूर्ववत्, शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट । १ पूर्ववत् – जहाँ कारणको देखकर कार्यका अनुमान हो, जैसे बादलोंको देखकर होनेवाली वर्षाका अनुमान । २ शेषवत् – कार्यसे कारणका अनुमान, जैसे नदीके मटीले पानीको देखकर प्रथम हुई वर्षाका अनुमान । ३ सामान्यतोदृष्ट — जो सामान्य रूपसे देखा गया हो; परंतु विशेष रूपसे न देखा गया हो, जैसे घट ( मिट्टीके बने हुए घड़े ) को देखकर उसके बनानेवाले कुम्हारका अनुमान; क्योंकि प्रत्येक बनी हुई वस्तुका कोई चेतन निमित्त - कारण सामान्यरूपसे देखा जाता है । अनुमानके सम्बन्धमें इतना जान लेना आवश्यक है कि लिङ्ग - लिङ्गी अर्थात् साधन - साध्यका जिस धर्म - विशेषके साथ सम्बन्ध होता है, वह व्याप्ति कहलाता है और ऐसे सम्बन्ध होनेके ज्ञानको व्याप्तिज्ञान कहते हैं । लिङ्गके प्रत्यक्ष होनेपर अप्रत्यक्ष लिङ्गीका इस व्याप्ति - ज्ञानसे अनुमान किया जाता है । जैसे धूम एवं अग्निके सम्बन्ध होनेके ज्ञानसे विशेषरूपसे धूमको देखकर यह निश्चय करना कि जहाँ ऐसा धूम होता है वह बिना अग्निके नहीं होता, इस व्याप्ति - ज्ञानसे धूमके प्रत्यक्ष होनेसे अप्रत्यक्ष अग्निका जानना अनुमान है । I अनुमानका मूल प्रत्यक्ष ही है, क्योंकि पूर्वप्रत्यक्षद्वारा अनुमान होता है । यदि प्रत्यक्ष विकार दोष - संयुक्त हो तो अनुमान भी मिथ्या हो जाता है । इन्द्रिय एवं अर्थके संनिकर्षसे उत्पन्न भ्रान्ति - दोषसे रहित ज्ञान प्रत्यक्ष कहलाता है । भ्रान्ति - दोषके निम्न कारण होते हैं- -१ विषय - दोष — पदार्थ इतनी दूर हो जिससे यथार्थ ज्ञानमें भ्रम उत्पन्न हो; पदार्थ ऐसी अवस्थामें रखा हो जिससे यथार्थ ज्ञानमें भ्रान्ति उत्पन्न हो । द्रष्टा और दृश्यके मध्यमें शीशा आदि कोई ऐसी वस्तु आ जाय जिससे दृश्य अपने वास्तविक रूपमें न दिखलायी दे सके । २ इन्द्रिय - दोष — जैसे काम्ल ( पीलिया ) रोगवालेको सब वस्तुएँ पीली दीखती हैं । ३ मनोदोष – मनके असावधान तथा अस्थिर होनेसे पदार्थका ठीक - ठीक ज्ञान नहीं होता है । शब्द - प्रमाण- - अलौकिक विषयमें वेद ही प्रमाण हो सकते हैं, इसीलिये इस प्रमाणका नाम आगम - प्रमाण है । वेदके आश्रित जो ऋषि, मुनि और आचार्योंके वचन हैं, वे भी इसी प्रमाणके अन्तर्गत हैं । लौकिक विषयमें भी आप्तपुरुष ही प्रमाण हो सकते हैं । आप्तपुरुष तत्त्ववेत्ता होते हैं, जिनके जानने " और कहनेमें ( ज्ञान और क्रियामें ) कोई दोष नहीं होता, अर्थात् जिनका ज्ञान भ्रान्ति - दोष ( जिसका अनुमान - प्रमाणके सम्बन्धमें वर्णन कर दिया है ) से युक्त न हो तथा जिनमें विप्रलिप्सा ( धोखेमें डालनेका ) दोष न हो । कई आचार्योंने उपमान, अर्थापत्ति, सम्भव, अभाव, ऐतिह्य और संकेतको अलग प्रमाण माना है, जिसे मीमांसाने प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम, उपमान, अनुपलब्धि ( अभाव ) और अर्थापत्ति — ये छः ( १५ ९ )

पृष्ठ 183

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समाधिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप ** [ सूत्र ८ प्रमाण माने हैं; न्यायने प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम और उपमान- -ये चार प्रमाण माने हैं; किंतु दर्शनकारोंमें प्रमाणके सम्बन्धमें यह कोई विशेष मतभेद नहीं है, केवल स्थूल बुद्धिवालोंको वर्णनशैलीकी बाह्य प्रणालीको देखकर अविवेकके कारण परस्पर विरोध होनेका भ्रम होता है; क्योंकि यह सब तीनों प्रमाणोंके अंदर ही आ जाते हैं । जैसे प्रसिद्ध पदार्थके सादृश्यसे साध्यके साधनेको ' उपमान ' कहते हैं; वह अनुमानके अंदर आ जाता है । जो बात अर्थसे निकल आवे उसे ‘ अर्थापत्ति ' कहते हैं; जैसे रामके घरपर यदि उसे पुकारें और उत्तर मिले कि ' वह घर नहीं है ', तो यहाँ ' अर्थात् बाहर है ', यह अपने - आप ज्ञात हो जाता है । यह भी अनुमानके अंदर आ जाता है । एक बातसे दूसरी बातका जहाँ सिद्ध होना सम्भव हो उसे ' सम्भव ' कहते हैं । जैसे ' राम करोड़पति ' है इससे लखपति होना सिद्ध है । यह भी अनुमानके अन्तर्गत है । ' मकानमें पुस्तक नहीं है ' यह ज्ञान अभाव - प्रमाणसे होता है । पर वस्तुतः यह प्रत्यक्ष ही है, क्योंकि जिस वस्तुका ज्ञान जिस इन्द्रियसे प्रत्यक्ष होता है उसका अभाव भी उसीसे प्रत्यक्ष हो जाता है । इसलिये ' अभाव ' प्रत्यक्ष प्रमाणके अन्तर्गत है ' ऐतिह्य ’ - जो परम्परासे कहते चले आते हों । इनमें कहनेवालेका निश्चय न होनेसे यह ज्ञान संशयवाला होता है, इसलिये यह प्रमाण नहीं और यदि कहनेवालेका आप्तपुरुष होना निश्चय हो जाय तो शब्द - प्रमाणके अंदर आ जाता है । नियत इशारोंसे अपने अभिप्रायोंको एक दूसरेपर प्रकट करनेको ' संकेत ' कहते हैं । यह भी अनुमानके अंदर आ जाता है, क्योंकि संकेत नियत किया हुआ चिह्न है । इस प्रकार तीन ही प्रमाण सिद्ध होते हैं, जो सांख्य तथा योगाचार्योंने माने हैं । अन्य सब इन्हींके अन्तर्गत हो जाते हैं । संगति – विपर्यय - वृत्तिका वर्णन करते हैं— विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् ॥ ८ ॥

शब्दार्थ —– विपर्ययः = विपर्यय; मिथ्याज्ञानम् = मिथ्या ज्ञान है; अतद्रूपप्रतिष्ठम् = जो उसके ( पदार्थके ) रूपमें प्रतिष्ठित नहीं है अर्थात् जो उस पदार्थके वास्तविक रूपको प्रकाशित नहीं करता है । अन्वयार्थ – विपर्यय मिथ्या ज्ञान है, जो उस पदार्थके रूपमें प्रतिष्ठित नहीं है व्याख्या – सूत्रमें ' विपर्यय ' लक्ष्य है, ' मिथ्या - ज्ञान ' लक्षण है और ' अतद्रूपप्रतिष्ठम् ' हेतु दोषके है । ‘ अतद्रूपप्रतिष्ठम् ’ विकल्पमें भी हेतु ( कारण ) है । इसलिये विकल्प - वृत्तिमें अतिव्याप्ति लक्षणमें निवारणार्थ अर्थात् विकल्पसे विपर्ययमें भिन्नता दिखलानेके लिये, विपर्यय - वृत्तिके ' मिथ्या - ज्ञानम् ' पद दिया गया है । विषयके समान आकारसे परिणत चित्तवृत्तिको प्रमाण; और विषयसे विलक्षण आकारसे परिणत चित्तवृत्तिको विपर्यय समझना चाहिये । सीपमें मिथ्याज्ञान अर्थात् जैसा अर्थ न हो वैसा उत्पन्न हुआ ज्ञान विपर्यय; कहलाता क्योंकि वह है । उसके जैसे रूपमें चाँदीका ज्ञान, रज्जु ( रस्सी ) में सर्पका अथवा एक चन्द्रमें द्विचन्द्रका ज्ञान नहीं करता । जो ज्ञान वस्तुके प्रतिष्ठित ( स्थित ) नहीं होता अर्थात् उसके असली रूपको प्रकाशित है वह ' तद्रूपप्रतिष्ठित ' वस्तुके यथार्थरूपसे कभी भी न हटकर वस्तुके यथार्थरूपको ही प्रकाशित करता कहलाता है । जहाँ वस्तु रूपमें प्रतिष्ठित ( स्थित ) होनेके कारण सत्य - ज्ञान, यथार्थज्ञान अर्थात् प्रमाण वस्तुके यथार्थ रूपमें प्रतिष्ठित अन्य हो और चित्तवृत्ति अन्य प्रकारकी हो, वहाँ चित्तकी वृत्ति उस ( १६० )

पृष्ठ 184

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सूत्र ८ ] * विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम्:* [ समाधिपाद ( स्थित ) नहीं होती है । इसलिये वह अतद्रूपप्रतिष्ठित होनेके कारण विपर्यय - ज्ञान कहलाता है । भाव यह है कि जिस प्रकार पिघली धातु किसी साँचेमें ढाल देनेसे वैसे ही आकारकी हो जाती है और वैसे ही आकारको धारण कर लेती है, तैसे ही चित्त भी बाह्य वस्तुसे सम्बद्ध हुआ संयुक्त वस्तुके समान आकारसे परिणत हो तदाकार हो जाता है । यह चित्तका विषयाकार परिणाम ही प्रमाण- ज्ञान या प्रमाण - वृत्ति कहलाता है । यदि ढाली हुई धातुकी वस्तु किसी दोषके कारण साँचेके आकारसे विलक्षण अथवा विपरीत हो जाय तो वह वस्तुका आकार दोषविशिष्ट होनेसे स्वरूपमें अप्रतिष्ठित हुआ दूषित कहलाता है । इसी प्रकार यदि वस्तुके आकारसे चित्तकी वृत्ति किसी दोषके कारण विलक्षण अथवा विपरीत अथवा भिन्न प्रकारकी हो जाय तो वह वृत्तिका आकार भी वस्तुके समानाकार न होनेसे स्वरूपमें प्रतिष्ठित न होनेके कारण दूषित, मिथ्या या भ्रान्त ज्ञान कहा जाता है, जैसा कि सीपमें चाँदीका ज्ञान, रस्सीमें सर्पका ज्ञान अथवा एक चन्द्रमें द्विचन्द्रका ज्ञान । किसी वस्तुसे विलक्षण अथवा विपरीत चित्तके आकारको ही विपर्यय - ज्ञान कहते हैं अर्थात् विषयके समानाकारसे परिणत चित्तवृत्तिको प्रमाण और विषयसे विलक्षण विपरीत अथवा भिन्न आकारसे परिणत चित्तवृत्तिको विपर्यय कहते हैं । अथवा जो ज्ञान निज - रूपमें प्रतिष्ठित नहीं है, वह अतद्रूप - प्रतिष्ठित कहा जाता है । अर्थात् सीपमें जो सीपका ज्ञान, रज्जुमें जो रज्जुका ज्ञान और चन्द्रमें जो एकचन्द्रज्ञान है, वह निज - रूपमें प्रतिष्ठित होनेसे प्रमाण ज्ञान है और जो सीपमें चाँदीका ज्ञान, रज्जुमें सर्पका ज्ञान या एकचन्द्रमें द्विचन्द्रका ज्ञान है, वह उत्तर ( अगले ) कालमें होनेवाले यथार्थ ज्ञानसे बाधित होनेके कारण निज रूपमें अप्रतिष्ठित है; क्योंकि उत्तर - कालिक ( आगे होनेवाला ) ज्ञानस्वरूपसे प्रच्युतकर उसकी प्रतिष्ठाको भङ्ग करनेवाला है । इसलिये रज्जु - विषयक रज्जु - ज्ञान किसी ज्ञानसे बाधित न होनेसे स्वरूप- प्रतिष्ठित होनेके कारण प्रमाण है और रज्जु - विषयक सर्प - ज्ञान उत्तरकालिक यथार्थ ज्ञानसे बाधित होनेसे स्वरूपमें अप्रतिष्ठित होनेके कारण विपर्यय - ज्ञान है । जिस प्रकार विपर्यय - ज्ञान रूपाप्रतिष्ठित है, वैसे ही संशय भी उत्तरकालिक ज्ञानसे बाधित होनेसे रूपाप्रतिष्ठित है । इसलिये संशय भी विपर्ययके अन्तर्गत है 1 यह विपर्यय - संज्ञक ( नामवाली ) चित्तकी वृत्ति ही अविद्या कही जाती है । इसलिये अविद्यासंज्ञक विपर्यय - ज्ञान अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश - भेदसे पाँच प्रकारका है, जिनका पञ्चक्लेशके नामसे ( २-३ ) में वर्णन किया जायगा । भेद केवल इतना है कि यह विपर्यय चित्तकी एक वृत्तिरूप है और क्लेश वृत्तियोंके संस्काररूप होते हैं । अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेशक्लेशोंके ही सांख्यपरिभाषामें क्रमसे तमस्, मोह, महामोह, तामिस्र, अन्धतामिस्र नामान्तर हैं । इनका विस्तारपूर्वक वर्णन साधनपादके तीसरे सूत्रकी टिप्पणीमें किया जायगा । विशेष वक्तव्य सूत्र ८ – विपर्यय - वृत्ति किस प्रकार अक्लिष्टरूप हो सकती है? इस शंकाको बहुधा जिज्ञासुओंसे सुना गया है । इसलिये उसके कुछ उदाहरणोंको यहाँ दे देना आवश्यक प्रतीत होता है । यह सारा त्रिगुणात्मक जगत् ' अविद्या है ', ' माया है ', ' स्वप्न है ', ' शून्य है ', ' विज्ञान है ' इत्यादि कल्पनाएँ ‘ अविद्यावादी ’, ‘ मायावादी ’, ‘ स्वप्नवादी ', ' शून्यवादी ', ' विज्ञानवादी ' इत्यादिकी भ्रममूलक, अयथार्थ और ( १६१ )

पृष्ठ 185

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समाधिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ९ विपर्ययरूप हैं; क्योंकि त्रिगुणात्मक जडतत्त्वको ' अविद्या ', ' माया ', अथवा ' शून्य ' माननेमें उसीके अन्तर्गत होनेके कारण सारे वेद - शास्त्र, साधन - सम्पत्ति, पुरुषार्थ, योग - अभ्यास और स्वयं ये सिद्धान्त और युक्तियाँ भी ‘ अविद्या ', ' माया ', ' स्वप्न ' अथवा ' शून्य ' रूप होकर विपर्यय सिद्ध होंगी और सारे सांसारिक तथा पारमार्थिक व्यवहार दूषित हो जायँगे । इसलिये त्रिगुणात्मक जडतत्त्वको ' अविद्या ’, ‘ माया ' ' स्वप्न ' अथवा ' शून्य ' मानना विपर्यय - वृत्ति है । वास्तवमें इस त्रिगुणात्मक जडतत्त्वको आत्मासे भिन्न अनात्मतत्त्व मानना ही प्रमाणवृत्ति है । इस अनात्मतत्त्वमें आत्माका भान होना अर्थात् उसमें आत्माध्यासरूप विपर्यय - वृत्ति सारे बन्धनोंका कारण होनेसे अत्यन्त क्लिष्टरूप है । इस अनात्मतत्त्वसे आत्माध्यासको हटाना ही मनुष्यका मुख्य प्रयोजन और परम पुरुषार्थ है । इसलिये उपर्युक्त ' अविद्यावादी ', ' मायावादी ' और ' शून्यवादियों ' की विपर्यय - वृत्ति बाह्य वाद - विवादको छोड़कर अन्तर्मुख होते समय जडतत्त्वसे आत्माध्यास हटानेमें साधनरूपसे जब सहायक हो तो अक्लिष्टरूप धारण कर लेती है । इसी प्रकार विज्ञान अर्थात् चित्त आत्माको बाह्य जगत् दिखलानेके लिये त्रिगुणात्मक करण अर्थात् साधनरूप ही है । इसलिये इससे अतिरिक्त बाह्य जगत्को न मानना भी विपर्यय है; किंतु अन्तर्मुख होते समय जब साधनरूपसे जडतत्त्वसे आत्माध्यास हटानेमें सहायक हो, तब यह विपर्यय - वृत्ति भी अक्लिष्टरूप धारण कर लेती है । सङ्गति – विकल्प - वृत्तिका लक्षण बतलाते हैं— शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः ॥ ९ ॥

शब्दार्थ — शब्द - ज्ञान- अनुपाती - शब्दसे उत्पन्न जो ज्ञान, उसका अनुगामी अर्थात् उसके पीछे चलनेका जिसका स्वभाव है ( और जो ); वस्तुशून्यः = वस्तुसे शून्य है, वस्तुकी सत्ताकी अपेक्षा नहीं रखता है ( इस प्रकारका ज्ञान ); विकल्प: - विकल्प कहलाता है । अन्वयार्थ – शब्दसे उत्पन्न जो ज्ञान, उसके पीछे चलनेका जिसका स्वभाव हो और जो वस्तुकी सत्ताकी अपेक्षा न रखता हो इस प्रकारका ज्ञान विकल्प कहलाता है 1 वह व्याख्या – शब्दके ज्ञानके अनन्तर उदय होनेवाला जो निर्विषयक चित्तका तदाकार परिणाम है, - वृत्ति विकल्पवृत्ति कहलाता है । यह वृत्ति निर्विषयक होनेके कारण प्रमाणवृत्तिसे भिन्न है और यह विपर्यय है ' ऐसे भी नहीं है; क्योंकि बोध होनेपर भी इसका व्यवहार चलता रहता है । जैसे ' पुरुषका चैतन्यरूप है; क्योंकि शब्द - ज्ञानके अनन्तर जो ' पुरुषका चैतन्यरूप है ', ऐसा चित्तका तदाकार परिणाम ' विकल्पवृत्ति अश्वका घोड़ा ’ कहनेसे इस वृत्तिमें पुरुष विशेषण - रूप और चैतन्य विशेष्यरूप भासता है । परन्तु पुरुषमें जैसे जो कि चैतन्य ही है एक ही पदार्थमें विशेषण- विशेष्य - भाव सम्भव नहीं है, वैसे ही ज्ञान निर्विषय होनेसे विशेषण - विशेष्य - भाव नहीं है । इसलिये ' पुरुषका चैतन्यरूप है ' यह है ' ऐसा व्यवहार होता विकल्पवृत्तिरूप है । ‘ चैतन्य ही पुरुष है ' ऐसा बोध होनेपर भी ' पुरुषका चैतन्यरूप पुरुष: ' इस शब्दज्ञानके अनन्तर है । इससे यह विपर्यय - वृत्तिरूप नहीं है । इसी प्रकार ' अनुत्पत्तिधर्मा है, वह भी विकल्प - वृत्ति है; क्योंकि ‘ उत्पत्तिरूप धर्मके अभाववाला पुरुष है ' ऐसा जो ज्ञान उदय होता उत्पत्तिरूप धर्मके अभावका ज्ञान भाव - पदार्थसे अन्य कोई अभाव- पदार्थ नहीं है । इसलिये पुरुषमें कोई अभाव - पदार्थ नहीं है, उक्त निर्विषयक है । ऐसा बोध होनेपर भी कि ' भाव - पदार्थसे अतिरिक्त ( १६२ )

पृष्ठ 186

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सूत्र १० ] * अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा [ समाधिपाद * ******** शब्द - ज्ञानके बलसे — अनुत्पत्तिधर्मा पुरुषः ' ऐसा व्यवहार होता ही रहता है । इसलिये ‘ अनुत्पत्तिधर्मा पुरुषः ’ ‘ उत्पत्ति - धर्मके अभाववाला पुरुष है ' यह विपर्ययरूप नहीं है, किन्तु विकल्पवृत्तिरूप है । इसी प्रकार ‘ राहुका सिर ’, ' काठकी पुतली ' यह ज्ञान भी विकल्पवृत्ति है, क्योंकि ' राहु और सिर ' ' काठ और पुतली ' का भेद नहीं है । यह ज्ञान भी निर्विषयक होनेसे विकल्प है । प्रमाण, विपर्यय और विकल्प - वृत्तिके भेदको सरल शब्दोंमें यों समझना चाहिये कि प्रमाण वस्तुके यथार्थ ज्ञानको कहते हैं, जैसे सीपमें सीपका ज्ञान । यह यथार्थ ज्ञान वस्तुके रूपमें प्रतिष्ठित होता है । जैसे सीपमें सीपका ज्ञान प्रतिष्ठित है अर्थात् स्थिर है, ठहरा हुआ है, बाध अर्थात् अस्थिर, हटनेवाला नहीं । चित्तमें ऐसे तदाकार परिणामको प्रमाणवृत्ति कहते हैं । विपर्यय वस्तुके मिथ्या - ज्ञानको कहते हैं । जैसे सीपमें चाँदीका ज्ञान प्रतिष्ठित नहीं है, अस्थिर है । सीपके यथार्थ ज्ञान हो जानेपर इसका बाध हो जाता है अर्थात् सीपमें चाँदीका मिथ्याज्ञान हट जाता है । चित्तमें ऐसे तदाकार परिणामको विपर्यय - वृत्ति कहते हैं । विकल्प इन दोनोंसे विलक्षण है । यह वस्तुका यथार्थ ज्ञान नहीं है, क्योंकि निर्विषय होता है, अर्थात् कोई वस्तु इस ज्ञानका विषय नहीं होती, किन्तु यह केवल शब्दज्ञानके अनन्तर उदय होता है । यह इसमें प्रमाणसे भिन्नता है । यह मिथ्या - ज्ञान भी नहीं है, क्योंकि जो लोग जानते हैं कि पुरुष और चैतन्य भिन्न - भिन्न नहीं हैं,. वे भी ऐसा ही व्यवहार करते हैं । यह इसमें विपर्ययसे भेद है । साधारण लोगोंको जिसमें बाधबुद्धि उदय हो, वह विपर्यय और निपुण विद्वानोंको विचारद्वारा जिसमें बाध - ज्ञान हो, वह विकल्प समझना चाहिये । यह विकल्पवृत्ति वहाँ होती है, जहाँ अभेदमें भेद या भेदमें अभेद - आरोप किया जाता है । जैसे पुरुष और चैतन्य, राहु और सिर, काठ और पुतली, दो - दो वस्तु नहीं हैं तथापि इस अभेदमें - भेद आरोप किया जाता है । लोह और आग, अथवा पानी और आग दो - दो वस्तु हैं, तथापि ‘ लोहेका गोला जलानेवाला है, ' अथवा ' पानीसे हाथ जल गया ' इस कथनसे भेदमें अभेद - आरोप किया जाता है । ' अहं वृत्ति ' भी एक विकल्प - वृत्ति ही है, क्योंकि इसमें चेतन और अहङ्कारके भेदमें अभेद - आरोप किया जाता है । पल, घड़ी, दिन, मास, आदिकी ज्ञानरूप वृत्तियाँ भी विकल्प - वृत्तियाँ हैं; क्योंकि क्षणोंके भेदमें अभेदका आरोप किया जाता है ( ३ । ५२ ) । गौ आदि शब्दोंमें शब्द, अर्थ और ज्ञानके भेदमें अभेदसे भासनेवाली वृत्ति भी विकल्प - वृत्ति ही है, जिसकी ( १।४२ ) में ' सवितर्क समापत्ति ' संज्ञा की है टिप्पणी – विज्ञानभिक्षुने इस सूत्रका अर्थ निम्न प्रकार किया है-शब्द - ज्ञान - अनुपाती = शब्द और ज्ञान जिसके पीछे आते हैं; वस्तुशून्यः = और वस्तुसे जो शून्य है; विकल्पः = वह विकल्प है । अर्थात् यह ज्ञान वस्तुसे शून्य है, ऐसा जाननेवाले विवेकी भी ऐसा ही कहते और समझते हैं । संगति - निद्रा - वृत्तिका स्वरूप बतलाते हैं— अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा ॥ १० ॥

शब्दार्थ – अभाव - प्रत्यय - आलम्बना = ( जाग्रत् तथा स्वप्नावस्थाकी वृत्तियोंके ) अभावकी प्रतीतिको आश्रय करनेवाली; वृत्तिः = वृत्ति; निद्रा - निद्रा है । ( १६३ )

पृष्ठ 187

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समाधिपाद ]. * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र १० अन्वयार्थ— ( जाग्रत् तथा स्वप्नावस्थाकी वृत्तियोंके ) अभावकी प्रतीतिको आश्रय करनेवाली वृत्ति निद्रा है । व्याख्या – निद्रा ‘ वृत्ति ' ही है; इसको सूचित करनेके लिये सूत्रमें वृत्ति ग्रहण है । कई आचार्य निद्राको वृत्ति नहीं मानते हैं, किन्तु योगके आचार्य आत्मस्थितिसे अतिरिक्त चित्तकी प्रत्येक अवस्थाको वृत्ति ही मानते हैं । ‘ अभाव ' शब्दसे जाग्रत् और स्वप्नावस्थाकी वृत्तियोंका अभाव, अथवा जाग्रत् और स्वप्नकी वृत्तियोंके अभावका हेतु तमोगुणको जानना चाहिये । रजोगुणका धर्म क्रिया और प्रवृत्ति है । जाग्रत् अवस्थामें चित्तमें रजोगुण प्रधान होता है । इसलिये वह सत्त्वगुणको गौणरूपसे अपना सहकारी बनाकर अस्थिर रूपसे क्रियामें अर्थात् विषयोंमें प्रवृत्त करनेमें लगा रहता है । तमोगुणका धर्म स्थिति, दबाना, रोकना अर्थात् प्रकाश और क्रियाको रोकना है । सुषुप्ति - अवस्थामें तमोगुण रजस् तथा सत्त्वको प्रधानरूपसे दबा देता है । इसलिये चित्तमें तमोगुणका ही परिणाम प्रधानरूपसे होता रहता है । उस समय चित्तमें अभावकी ही प्रतीति होती है । जिस प्रकार एक अँधेरे कमरेमें सब वस्तुएँ छिप जाती हैं, किंतु सब वस्तुओंको छिपानेवाला अन्धकार दिखलायी देता है, जो वस्तुओंके अभावकी प्रतीति कराता है, इसी प्रकार तमोगुण सुषुप्ति - अवस्थामें चित्तकी सब वृत्तियोंको दबाकर स्वयं स्थिररूपसे प्रधान रहता है, किंतु रजोगुणका नितान्त अभाव नहीं होता है, तनिक मात्रामें रहता हुआ वह इस अभावकी भी प्रतीति कराता रहता है । चित्तके ऐसे परिणामको निद्रा - वृत्ति कहते हैं । तब चित्तमें तमोगुणवाली, ' मैं सोता हूँ ' इस प्रकारकी वृत्ति होती है । इस वृत्तिके संस्कार चित्तमें उत्पन्न होते हैं, फिर उससे स्मृति होती है कि ' मैं सोया और मैंने कुछ नहीं जाना ' । यहाँपर इतना विशेष यह भी जान लेना कि जिस निद्रामें सत्त्वगुणके लेशसहित तमोगुणका प्रचार होता है, उस निद्रासे उठकर पुरुषको ‘ मैं सुखसे सोया, मेरा मन प्रसन्न है और मेरी प्रज्ञा स्वच्छ है ' इस प्रकारकी स्मृति होती है; और जिस निद्रामें रजोगुणके लेशसहित तमोगुणका संचार होता है उससे उठनेपर इस प्रकारकी स्मृति होती है— ' मैं दुःखपूर्वक सोया, मेरा मन अस्थिर और घूमता - सा है ' और जिस निद्रामें केवल तमोगुणका प्राबल्य होता है तो उससे उठनेपर ' मैं बेसुध सोया, मेरे शरीरके अङ्ग भारी हो रहे हैं, मेरा चित्त व्याकुल है ' इस प्रकारकी स्मृति होती है । यदि उस वृत्तिका प्रत्यक्ष न हो तो उसके संस्कार भी न हों; और संस्कारोंके न होनेसे स्मृति भी नहीं हो सकती । इसलिये निद्रा एक वृत्ति है, वृत्तिमात्रका अभाव नहीं है । श्रुति और स्मृतियोंने भी निद्राको वृत्ति ही माना है । जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तं च गुणतो बुद्धिवृत्तयः । होते हुए भी निद्रा जाग्रत्, स्वप्न और निद्रा — ये गुणोंसे बुद्धिकी वृत्तियाँ है, हैं इसलिये । एकाग्रताके रोकने तुल्य योग्य है । तमोमयी होनेसे सबीज तथा निर्बीज - समाधिकी विरोधिनी - वृत्तिके ही अन्तर्गत है । नशा तथा क्लोरोफार्म आदिसे उत्पन्न हुई मूर्च्छित अवस्था भी निद्रा अन्धकारमें चित्तका लय होता है; विशेष विचार सूत्र १० – सुषुप्ति तथा प्रलय - कालमें क्लेशोंसे तमोगुणप्रधान रहित पुरुषके निज- रूपमें चित्त अवस्थित और असम्प्रज्ञात - समाधिकी अवस्थामें अविद्या आदि ( १६४ )

पृष्ठ 188

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सूत्र ११ ] अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृतिः * भेड [ समाधिपाद **** रहता है और पुरुष स्वरूपमें अवस्थित होता है । सुषुप्ति व्यष्टि - चित्तोंकी अवस्था है और प्रलय समष्टि - चित्त अर्थात् महत्तत्त्वकी सुषुप्ति है । असम्प्रज्ञात - समाधिमें चित्तमें संस्कारशेष अर्थात् निरोधके संस्कार रहते हैं जिनके दुर्बल होनेपर व्युत्थान - अवस्थामें लौटना होता है । कैवल्य ( मुक्ति ) में संस्कारशेष भी निवृत्त हो जाते हैं, इसलिये पुनः आवृत्ति नहीं होती । टिप्पणी — ‘ प्रत्यय ' पदका अर्थ ज्ञान, प्रतीति, वृत्ति तथा कारण भी है । वाचस्पति मिश्रने प्रत्यय पदका ‘ कारण ’ रूप अर्थ मानकर सूत्रका निम्न प्रकार अर्थ किया है— जाग्रत् तथा स्वप्नकी वृत्तियोंके अभावका प्रत्यय ( कारण ) जो बुद्धिनिष्ठ सत्त्वगुणका आच्छादक तमोगुण या अज्ञान है आलम्बन ( विषय ) जिस चित्तवृत्तिका, वह निद्रा कहलाती है । संगति — क्रमसे प्राप्त स्मृतिका वर्णन करते हैं--अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृतिः ॥ ११ ॥

शब्दार्थ — अनुभूत = अनुभव किये हुए, जाने हुए; विषय = ( किसी ) विषयका; असम्प्रमोषः = जो चुराया हुआ न हो ( फिर चित्तमें ) उससे अधिकका नहीं, किंतु आरोहपूर्वक तन्मात्रविषयक ज्ञान होना; स्मृतिः = स्मृति है । अन्वयार्थ — अनुभव किये हुए विषयका फिर चित्तमें आरोहपूर्वक उससे अधिक नहीं, किंतु तन्मात्रविषयक ज्ञान होना स्मृति है * । व्याख्या — स्मृतिसे भिन्न ज्ञानका नाम अनुभव है । अनुभवसे ज्ञात ( जानी हुई ) वस्तुको अनुभूत कहते हैं । जब किसी दृष्ट अथवा श्रुत ( देखी या सुनी हुई ) आदि वस्तुका ज्ञान होता है, तब एक प्रकारका उस अनुभूत वस्तुका तदाकार संस्कार चित्तमें पड़ जाता है । फिर जब किसी समयमें उद्बोधक सामग्रीके उपस्थित होनेपर वह संस्कार - प्रफुल्लित हो जाता है, तब चित्त इस संस्कारविषयक परिणामको प्राप्त हो जाता है । यह अनुभूत पदार्थविषयक चित्तका तदाकार परिणाम स्मृति - वृत्ति कहलाता है । प्रमाण, विपर्यय और विकल्पद्वारा जाग्रत् - अवस्थामें जिस किसी वस्तुको अनुभव करते हैं तो उस अनुभवसे चित्तपर संस्कार पड़ते हैं । उन संस्कारोंसे स्मृति होती है । अनुभव - सदृश संस्कार होते हैं और संस्कार - सदृश स्मृति होती है । निद्रामें अभावका अनुभव होता है । उसके संस्कारसे भी उसके सदृश स्मृति पैदा होती है । इसी प्रकार स्मृतिके भी संस्कार पड़ते हैं और उनसे भी उसके सदृश स्मृति होती है । स्मृतिका विषय अनुभूतिसे कम अथवा उसके बराबर हो सकता है, उससे अधिक नहीं हो सकता है । स्वप्न भी जाग्रत् - अवस्थाके अनुभूत पदार्थोंकी स्मृति है । इसमें जाग्रत्के स्मर्तव्य विषय भी दिखलायी देते हैं, किंतु वे सब कल्पित होते हैं । यह स्मृतिकी स्मृति है । इसमें यह यथार्थ ज्ञान नहीं होता कि हम स्मरण कर रहे हैं । इसको भावित - स्मर्तव्य - स्मृति कहते हैं । जाग्रत् - अवस्थामें जो स्मृति होती है, उसमें स्मर्तव्य विषय नहीं दिखलायी देता; किंतु हमको ज्ञान होता है कि हम स्मरण कर रहे हैं; यह वास्तविक स्मृति है । इसको * यदि ‘ असम्प्रमोषः’के अर्थ ' न खोया जाना ' लगायें तब सूत्रके यह अर्थ होंगे ' अनुभव किये हुए खोया जाना अर्थात् किसी अभिव्यञ्जकको पाकर संस्कारप्रफुल्लित हो जाना स्मृति है । ' विषयका न ( १६५ )

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समाधिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र ११ अभावित - स्मर्तव्य - स्मृति कहते हैं । स्मृतिको सबसे अन्तमें लिखनेका कारण यह है कि विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृतिके अनुभव - जन्य संस्कारोंसे उत्पन्न होती है । यह वृत्ति प्रमाण, सम्प्रमोष नाम ' मुष स्तेये ' धातुसे तस्करता स्तेय अर्थात् चोरीका है । इसलिये असम्प्रमोषका अर्थ तस्करताका अभाव है । जिस प्रकार लोकमें पुत्रके लिये पितासे छोड़ी हुई वस्तुका ग्रहण करना असम्प्रमोष, अस्तेय अर्थात् चोरी नहीं है, किंतु दूसरोंकी छोड़ी हुई वस्तु ग्रहण करना ( चोरी ) है, इसी प्रकार अनुभव, स्मरण - ज्ञानका पिता है; क्योंकि स्मरण - ज्ञान अनुभवसे ही उत्पन्न होता है । अनुभूत विषय अनुभवद्वारा छोड़ी हुई सम्पत्तिके तुल्य है । इसलिये स्मरण - ज्ञानका अनुभूत विषयसे अधिक प्रकाश करना सम्प्रमोष ( चोरी ) अर्थात् स्मृति नहीं है । केवल अनुभूत विषयको ही उसके बराबर अथवा उससे न्यून ( कम ) प्रकाश करना ( अधिक नहीं ) असम्प्रमोष है अर्थात् स्मृति है I । इसलिये स्मृतिका विषय अनुभूत विषयसे कम हो सकता है, अधिक नहीं हो सकता । यहाँ यह शङ्का उत्पन्न होती है कि चित्त जो स्मरण करता है वह प्रत्यय - मात्र ( ज्ञानमात्र, ग्रहणमात्र ) का स्मरण करता है या ग्राह्यमात्र ( विषयमात्र ) या ग्राह्य ग्रहण ( विषय और ज्ञान ) -इन दोनोंका स्मरण करता है? इसका समाधान यह है कि यद्यपि ज्ञानविषयक अनुभवके अभावसे विषयका ही स्मरण होना सम्भव है तथापि पूर्व अनुभवको ग्राह्य - ग्रहण उभयाकारविशिष्ट होनेसे उनसे उत्पन्न हुआ संस्कार भी उन दोनों आकारोंसे संयुक्त होकर ग्राह्य - ग्रहण दोनों स्वरूपवाली स्मृतिको उत्पन्न करता है, एक - विषयकको नहीं । इसलिये ज्ञान - सम्बद्ध विषयका ही स्मरण होता है; न केवल ज्ञानका और न केवल विषयका अर्थात् अनुभव, आकार, स्मरण- - ये तीनों समान ही आकारसे भान होते हैं, विभिन्न आकारसे नहीं । ' अहं घटं जानामि ' मैं घट - विषयक ज्ञानवाला हूँ, इस अनुभवमें घट और ज्ञान दोनोंका ही भान होता है । इससे अनुभव - जन्य संस्कार भी दोनों विषयोंवाला मानना पड़ेगा । इसी प्रकार इस संस्कारसे उत्पन्न होनेवाली स्मृति भी दोनों विषयवाली होगी, एक विषयवाली नहीं । इससे यह सिद्ध हुआ कि ग्राह्य और ग्रहण – इन दोनोंका ही स्मृति प्रकाश करती है, एकका नहीं । यह स्मृति दो प्रकारकी है । एक भावित स्मर्तव्य अर्थात् मिथ्या - पदार्थ - विषयक जो कि स्वप्नमें होती है; और एक अभावित - स्मर्तव्य अर्थात् यथार्थ पदार्थको विषय करनेवाली जो कि जाग्रत् - कालमें होती है, जैसा ऊपर व्याख्यामें बतला आये हैं । यह प्रमाणादि पाँच भेदोंवाली उपर्युक्त सूत्रोंमें बतलायी हुई वृत्तियाँ सात्त्विक, राजस और तामस वृत्तियाँ सुख, दुःख और मोहस्वरूप हैं और सुख, दुःख और मोह क्लेशस्वरूप हैं । इसलिये ये वृत्तियाँ सब स्वयं होनेसे ही निरोध करनेयोग्य हैं । मोह स्वयं अविद्यारूप होनेसे सर्वदुःखोंका मूल है । दुःखकी हैं । ' सुखानुशयी दुःखरूप ही हैं । सुखकी वृत्तियाँ सुखके विषयों और उनके साधनोंमें राग राग उत्पन्न है ' । कराती उन सुखके विषयों और रागः ' ( २ । ७ ) ‘ सुख - भोगके पश्चात् जो उसकी वासनां रहती है, वह । ८ ) । इसलिये क्लेशजनक सुख, उनके साधनोंमें विघ्न होनेपर द्वेष उत्पन्न होता है ' दुःखानुशयी द्वेषः ' ( २ होनेपर सम्प्रज्ञात - योग सिद्ध होता दुःख, मोहस्वरूप होनेसे सब प्रकारकी वृत्तियाँ त्याज्य - योग हैं । सिद्ध इनके होता निरोध है है । तदनन्तर परवैराग्यके उदय होनेसे असम्प्रज्ञात ( १६६ )

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सूत्र १२ ] * अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः * [ समाधिपाद विशेष विचार सूत्र ११ – स्वप्न जागने और सोनेके बीचकी अवस्था है । सूत्रकी व्याख्यामें स्वप्नमें हमने भावित - स्मर्तव्य अर्थात् मिथ्या पदार्थविषयक स्मृतिका होना बतलाया है । स्वप्न भी अन्तःकरणके गुणभेदसे तीन प्रकारके होते हैं । तामसिक स्वप्न, राजसिक स्वप्न और सात्त्विक स्वप्न । जब स्वप्नमें तमोगुणकी प्रधानता होती है, तब कुछ से कुछ विचित्र स्वप्न दिखलायी देते हैं । अर्थात् सारी वस्तुएँ अस्थिर रूपसे दिखलायी देती हैं और जागनेपर उनकी कुछ भी ठीक - ठीक स्मृति नहीं रहती । यह स्वप्नी अधम अवस्था तामसिक है । जिस समय स्वप्न अवस्थामें रजोगुण अधिक होता है, उस समय जाग्रत् - दशामें देखे हुए पदार्थ ही कुछ रूपान्तरसे दृष्टिगोचर होते हैं और उनकी स्मृति जागनेपर रहती है । यह स्वप्नकी मध्यम अवस्था राजसिक है । ये दोनों प्रकारके स्वप्न भावित - स्मर्तव्य स्मृतिवाले होते हैं । जो स्वप्न सच्चे होते हैं अर्थात् जिनका फल सच्चा होता है, वे सात्त्विक कहलाते हैं और यह स्वप्नकी उत्तम अवस्था है । यह अधिकतर योगियोंको होती है और कभी - कभी साधारण लोगोंको भी सत्त्वके उदय होनेपर । तमके दबने और सत्त्वके प्रधान रूपसे उदय होनेके कारण यह स्वप्नकी अवस्था अकस्मात् ही एक प्रकारसे वितर्कानुगतकी भूमि बन जाती है और उस जैसा ही अनुभव होने लगता है । इसलिये इसको भावित - स्मर्तव्य स्मृतिकी कोटिमें नहीं रखना चाहिये । संगति — उपर्युक्त सात सूत्रोंमें पाँचों प्रकारकी वृत्तियोंका निरूपण करके अब अगले सूत्रमें उनके निरोधका उपाय बतलाते हैं-अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः ॥ १२ ॥

शब्दार्थ — अभ्यास - वैराग्याभ्याम् = अभ्यास और वैराग्यसे; तत् - निरोधः - उनका ( वृत्तियोंका ) निरोध होता है । अन्वयार्थ – अभ्यास और वैराग्यसे उन वृत्तियोंका निरोध होता है व्याख्या- — चित्तवृत्ति निरुद्ध करनेके दो उपाय हैं— अभ्यास और वैराग्य । चित्तका स्वाभाविक बहिर्मुख प्रवाह वैराग्यद्वारा निवृत्त होता है । अभ्यासद्वारा आत्मोन्मुख आन्तरिक प्रवाह स्थिर हो जाता है । भगवान् व्यासदेवजीने अभ्यास और वैराग्यको बड़े सुन्दर रूपकसे वर्णन किया है, जो इस प्रकार है-चित्त एक नदी है, जिसमें वृत्तियोंका प्रवाह बहता है! इसकी दो धाराएँ हैं । एक संसार - सागरकी ओर, दूसरी कल्याण - सागरकी ओर बहती है । जिसने पूर्व जन्ममें सांसारिक विषयोंके भोगार्थ कार्य किये हैं, उसकी वृत्तियोंकी धारा उन संस्कारोंके कारण विषय - मार्गसे बहती हुई संसार - सागरमें जा मिलती है और जिसने पूर्व - जन्ममें कैवल्यार्थ काम किये हैं, उसकी वृत्तियोंकी धारा उन संस्कारोंके कारण विवेक - मार्गमें बहती हुई कल्याण - सागरमें जा मिलती है । संसारी लोगोंकी प्रायः पहली धारा तो जन्मसे ही खुली होती है; किंतु दूसरी धाराको शास्त्र, गुरु, आचार्य तथा ईश्वरचिन्तन खोलते हैं । पहली धाराको बंद करनेके लिये विषयोंके स्रोतपर वैराग्यका बन्ध लगाया जाता है और अभ्यासके बेलचेसे दूसरी धाराका मार्ग गहरा खोदकर वृत्तियोंके समस्त प्रवाहको विवेक - स्रोतमें डाल दिया जाता है । तब प्रबल वेगसे वह सारा प्रवाह कल्याणरूपी सागरमें जाकर लीन हो जाता । इस कारण अभ्यास तथा वैराग्य दोनों ही इकट्ठे मिलकर चित्तकी वृत्तियोंके निरोधके साधन हैं । ( १६७ )