पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 211–220
पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 211–220
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सूत्र १ ९ ] भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् * * [ समाधिपाद * हे भारत! जब - जब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है, तब - तब मैं अपनेको प्रकट ( अपने शुद्ध स्वरूपसे शबल स्वरूपमें अवतरण करता हूँ अर्थात् भौतिक जगत्में अवतार लेता हूँ ) । सज्जनोंकी करता हूँ रक्षा करनेके लिये और दूषित कार्य करनेवालोंका नाश करनेके लिये मैं युग - युगमें प्रकट होता आदिविद्वान् निर्माणचित्तमधिष्ठाय कारुण्याद् भगवान् परमर्षिरासुरये जिज्ञासमानाय हूँ । तथा— तन्त्रं प्रोवाच । आदिविद्वान् भगवान् परम ऋषि ( कपिलमुनि ) ने निर्माणचित्त ( सांसारिक वासनाओंके संस्कारोंसे शून्य ) के अधिष्ठाता होकर जिज्ञासा करते हुए आसुरिमुनिको दयाभावसे सांख्य - तत्त्वसमासका उपदेश दिया । तथा— ऋषिप्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे ज्ञानैर्बिभर्ति । ( श्वेता ० ) पहिले उत्पन्न हुए कपिलमुनिको ज्ञानसे भर देना है सङ्गति — सूत्र १८ में असम्प्रज्ञात - समाधिका स्वरूप दिखलाकर अब अगले सूत्रमें यह बतलाते हैं कि जिन योगियोंने पिछले जन्ममें विचारानुगतसे ऊँची आनन्दानुगत अथवा अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात-समाधिकी भूमिको प्राप्त कर लिया है, उनको असम्प्रज्ञात - समाधिकी प्राप्तिके लिये अन्य साधारण मनुष्यों - जैसी पुरुषार्थकी अपेक्षा नहीं होती । वे जन्महीसे पिछले योगबलके कारण इसके प्राप्त करनेकी योग्यता रखते हैं-भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् ॥ १ ९ ॥ शब्दार्थ – भवप्रत्ययः = जन्मसे ही प्रतीति; विदेह - प्रकृति - लयानाम् = विदेह और प्रकृतिलयोंको होती है । अन्वयार्थ — विदेह और प्रकृतिलयोंको जन्मसे ही असम्प्रज्ञात - समाधिकी प्रतीति होती है । व्याख्या — सत्रहवें सूत्रमें बतला आये हैं कि विदेह वे योगी हैं, जो वितर्कानुगत तथा विचारानुगत समाधिको सिद्ध करके शरीरसे आत्माध्यास छोड़ चुके हैं और आनन्दानुगत भूमिमें प्रविष्ट होकर उसका अभ्यास कर रहे हैं । उनका देहमें आत्माभिमान निवृत्त हो गया है । इसलिये विदेह कहलाते हैं । प्रकृतिलय वे योगी हैं, जिन्होंने आनन्दानुगतको सिद्ध कर लिया है और सातों प्रकृतियोंका साक्षात् करते हुए अस्मितानुगत समाधिका अभ्यास कर रहे हैं । कोई - कोई योगी इन दोनों समाधियोंकी मनोरञ्जक, आनन्दमय और शान्त अवस्थाओंको ही आत्मावस्थिति समझकर इन्हींमें मग्न रह जाते हैं और उनमें सन्तुष्ट होकर आगे बढ़नेका यत्न नहीं करते । शरीरान्त होनेपर ये विदेह योगी अपने संस्कार - मात्रके उपयोगवाले चित्तसे कैवल्य - पदके समान एक लम्बे समयतक आनन्द और ऐश्वर्यको भोगते हैं । इसी प्रकार प्रकृतिलय अपने अधिकारके सहित चित्तके साथ शरीर - त्यागके पश्चात् विदेहोंसे भी अधिक लम्बे समयतक अस्मिता प्रकृतिमें कैवल्य - पदके समान आनन्द अनुभव करते हैं । किंतु यह वास्तविक स्वरूपावस्थिति ( मुक्ति ) नहीं है, जैसा कि सांख्यदर्शनमें बतलाया गया है-नानन्दाभिव्यक्तिर्मुक्तिर्निर्धर्मत्वात् । ( सांख्य ५।७४ ) आनन्दका प्रकट हो जाना मुक्ति नहीं है, ( क्योंकि यह आत्माका ) धर्म नहीं है ( किन्तु अन्तःकरणका धर्म है ) । न कारणलयात् कृतकृत्यता मग्नवदुत्थानात् । ( सांख्य ३ । ५४ ) ( १८७ )
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समाधिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र १ ९ कारण ( अस्मिता - प्रकृति ) में लय होनेसे ( पुरुषको ) कृतकृत्यता ( स्वरूपावस्थिति ) नहीं हो सकती है, क्योंकि उसमें डुबकी लगानेवालेके समान ( पानीसे ऊपर ) उठना होता है अर्थात् जिस प्रकार डुबकी लगानेवालोंको एक निश्चित समयतक पानीमें रहनेके पश्चात् श्वास लेनेके लिये पानीसे ऊपर उठना होता है, इसी प्रकार विदेह और प्रकृतिलयोंको भी परम तत्त्वज्ञान अथवा आत्मस्थिति प्राप्त करनेके लिये फिर जन्म लेना पड़ता है । उनकी समाधि भवप्रत्यय कहलाती है । प्रत्यय नाम प्रतीति, प्रकट होने, ज्ञान होनेके हैं अर्थात् जन्मसे ही जिसकी प्रतीति होती है अथवा जो जन्मसे ही प्रकट होता है अर्थात् जन्मसे ही जिस असम्प्रज्ञात - समाधिके प्राप्त करनेकी योग्यता होती है, उसे ' भवप्रत्यय ' कहेंगे; अथवा ' भवात् प्रत्ययः भवप्रत्ययः ' भवात् ' नाम जन्मसे, ' प्रत्ययः ' नाम ज्ञान; जन्मसे ही है ज्ञान जिस असम्प्रज्ञात योगकी प्राप्तिका, उसका नाम ' भवप्रत्यय ' है । अथवा ‘ भव ' नाम जन्मका है और ' प्रत्यय ' कारणको कहते हैं । ' भव - प्रत्यय ' से यह अभिप्राय है कि इनका चित्त पूर्वजन्मकी योग - सिद्धिके प्रभावसे जन्मसे ही असम्प्रज्ञात योगमें प्रवृत्त होता है । इन विदेह और प्रकृतिलय योगियोंको असम्प्रज्ञात योगकी प्राप्तिविषयक ज्ञानका अधिकार प्राप्त होता है । वे श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि, प्रज्ञा आदि साधनोंका पूर्व जन्ममें अभ्यास कर चुके हैं इसलिये उनको इन साधनोंकी आवश्यकता ' उपाय प्रत्यय ' वाले योगियोंकी भाँति इस जन्ममें नहीं होती । पिछले जन्मके अभ्यासके संस्कारके बलसे उनको पर - वैराग्य उदय होकर ' विराम - प्रत्यय ' के अभ्यासपूर्वक असम्प्रज्ञात - समाधि सिद्ध हो जाती है । भगवान् श्रीकृष्णने श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय छः में ऐसे विचारानुगत, आनन्दानुगत और अस्मितानुगत भूमियोंके योगियोंकी संज्ञा जिन्होंने स्वरूपावस्थितिको शरीर - त्यागसे पूर्व लाभ नहीं कर पाया है, योगभ्रष्ट कह करके उनकी गति इस प्रकार बतलायी है- I पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति ॥ ४० ॥
हे अर्जुन! उसका न इस लोकमें, न परलोकमें कोई विनाश होता है । हे तात! कोई भी कल्याण करनेवाला दुर्गतिको प्राप्त नहीं होता । प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः । शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥ ४१ ॥
योगभ्रष्ट पुण्यात्माओंके लोकोंको प्राप्त होकर वहाँ बहुत कालतक निवास करके फिर उनके घरमें
जन्म लेता है, जो शुचि और श्रीमान् हैं ।
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् । एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥ ४२ ॥
अथवा बुद्धिमान् योगियोंके कुलमें ही जन्म लेता है । लोकमें इस प्रकारका जो जन्म है, वह बड़ा
दुर्लभ है ।
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥ ४३
वहाँ उसे पूर्व जन्मकी ( योगवाली ) बुद्धि मिल जाती है और हे कुरुनन्दन ( अर्जुन )! वह फिर ॥ सिद्धिके लिये यत्न करता है । पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः । जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते वह उसी पहले अभ्याससे अवश होकर ( सिद्धिमें ) खींच लिया ॥ ४४ ॥
जाता है । योगका जिज्ञासु भी शब्द ( १८८ )
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सूत्र १ ९ ] भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् * * [ समाधिपाद ब्रह्मसे आगे निकल जाता है 1 प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः । अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥ ४५ ॥
योगी लगातार प्रयत्न करता हुआ धीरे - धीरे सारे पापोंको धोकर अनेक जन्मोंकी सिद्धिके अनन्तर परम गतिको पा जाता विशेष वक्तव्य ( सूत्र १ ९ ) – कई भाष्यकारोंने इस सूत्रके भ्रान्तिजनक अर्थ किये हैं । इसका मूल -कारण वाचस्पति मिश्रके ' भवप्रत्यय ' के सम्बन्धमें अयुक्त और ' विदेह तथा प्रकृतिलय ' के प्रति संकीर्ण विचार हैं, जिनका उन्होंने न केवल अनुकरण ही किया है, किंतु उनको और अधिक विकृतरूपमें दिखलानेका यत्न किया है । विज्ञानभिक्षुने इन सब बातोंका समाधान तो कर दिया है, किंतु ' विदेह और प्रकृतिलय ' का जो स्वरूप उन्होंने यहाँ तथा सांख्य - प्रवचन - भाष्यमें दिखलाया है, वह स्वयं आपत्तिजनक है । इसलिये अपनी व्याख्याके समर्थनार्थ व्यासभाष्यका भाषानुवाद तथा अन्य सब संदेहों और भ्रान्तियोंके निवारणार्थ वाचस्पति मिश्रके ' तत्त्ववैशारदी ' और विज्ञानभिक्षुके ' योगवार्तिक ' का भाषानुवाद कर देना आवश्यक प्रतीत होता है । व्या ॰ भा ॰ का भाषानुवाद ( सूत्र १ ९ ) - विदेह देवोंकी असम्प्रज्ञात - समाधिका नाम ' भवप्रत्यय ' है । वे विदेह अपने संस्कारमात्रके उपयोगवाले चित्तसे कैवल्यपदके समान अनुभव करते हैं । वे अपने संस्कारके समान फल भोगकर लौटते हैं ( अर्थात् आनन्दानुगत भूमिमें आसक्त योगी शरीर त्यागनेके पश्चात् एक लम्बे समयतक विदेह - अवस्थामें कैवल्यपदके समान अनुभव करते हैं । फिर अपनी पिछली योगभूमिकी बुद्धिको लिये हुए इस लोकमें ऊँचे योगियोंके कुलमें जन्म लेते हैं । उनको जन्मसे ही असम्प्रज्ञात - समाधिकी योग्यता होती है । इसलिये उनकी समाधि भवप्रत्यय कहलाती है ) इसी प्रकार ' प्रकृतिलय ' भी अपने साधिकार चित्तके ( अस्मिता ) प्रकृतिमें लीन होनेपर कैवल्यपदके समान अनुभव करते हैं । जबतक कि चित्तके अधिकार - वशसे पुनः इस लोकमें नहीं लौटते ( अर्थात् इसी प्रकार अस्मितानुगत भूमिमें आसक्त योगी शरीर छोड़नेके पश्चात् एक लम्बे समयतक अस्मिता प्रकृतिलय - अवस्थामें कैवल्यपद - जैसी स्थितिको अनुभव करते हैं, फिर इस लोकमें ऊँचे योगियोंके कुलमें अपनी पिछली भूमिके योगकी बुद्धिको लिये हुए जन्म लेते हैं । इनको भी असम्प्रज्ञात - समाधिकी जन्मसे ही योग्यता होती है । इसलिये इनकी समाधि भी ' भवप्रत्यय ' कहलाती है ) । वाचस्पति मिश्रके तत्त्ववैशारदी ( सूत्र १ ९ ) का भाषानुवाद – निरोध- समाधिके अवान्तर भेदको— जो कि हान ( त्याग ) और उपादान ( ग्रहण ) में अङ्ग है, उसे दिखलाते हैं कि ' यह निरोध - समाधि दो प्रकारकी है— उपायप्रत्यय और भवप्रत्यय । ' उपायका अर्थ है, आगे कहे जानेवाले श्रद्धा आदि । वह श्रद्धा आदि है प्रत्यय अर्थात् कारण जिस निरोध- समाधिका, उस निरोध- समाधिको उपायप्रत्यय कहते हैं । होते हैं अर्थात् उत्पन्न होते हैं, जन्तु इसमें, इस अर्थमें भवका अर्थ है अविद्या । भूत और इन्द्रियरूपी विकारों, अथवा अव्यक्त, महत्, अहङ्कार, पञ्चतन्मात्रारूपी प्रकृतियोंमें— जो कि अनात्म हैं, आत्मख्याति होती है तौष्टिकोंको, जो कि वैराग्यसम्पन्न हैं । भव है प्रत्यय अर्थात् कारण जिस निरोध - समाधिका, उसे भवप्रत्यय कहते हैं । उन दोनोंमें उपायप्रत्यय ( समाधि ) योगियोंको होती है, जिनका कि वर्णन करेंगे । इस विशेष विधानद्वारा यह दर्शाया है कि शेषका मुमुक्षुके साथ सम्बन्ध नहीं है तो किनकी भवप्रत्यय ( समाधि ) ( १८ ९ )
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समाधिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र १ ९ होती है- -इस सम्बन्धमें सूत्रद्वारा उत्तर कहा है । ' भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतेिलयानाम् ' का अर्थ है विदेहोंकी और प्रकृतिलयोंकी । इसकी व्याख्या करते हैं - विदेहानाम् - देवानाम् भवप्रत्ययः ' भूत और इन्द्रिय इनमेंसे किसीको जो आत्मा मानते हैं और उसकी उपासनाद्वारा उसकी वासनासे जिनका अन्तःकरण वासित है, वे देहपातके बाद इन्द्रियों या भूतोंमें लीन हो जाते हैं, और उनके मनोंमें केवल संस्कार अवशिष्ट रह जाते हैं और वे छः कोशोंवाले शरीरसे रहित हो जाते हैं, इन्हें विदेह कहते हैं । वे अपने संस्कारमात्रके उपयोगवाले चित्तद्वारा कैवल्यपदकी सदृश अवस्थाका अनुभव करते हुए अर्थात् प्राप्त करते हुए विदेह हैं । कैवल्यके साथ इनका सादृश्य है, ' वृत्तिशून्य ' होना, इनके चित्तमें अधिकार-सहित — संस्कारका शेष रहना ( कैवल्यसे ) वैरूप्य है । कहीं मूल पाठ है ' संस्कारमात्रोपभोगेन ' इसका अर्थ यह है कि संस्कारमात्र ही जिसका उपभोग है, जिसमें कि चित्तवृत्ति नहीं है — ऐसे चित्तद्वारा । अवधिको प्राप्त हो जानेपर उस जातिवाले अपने संस्कार - विपाकको वे अतिक्रमण करते हैं और फिर भी संस्कारमें प्रवेश करते हैं । वायुपुराणमें कहा भी है-दश मन्वन्तराणीह तिष्ठन्तीन्द्रियचिन्तकाः । भौतिकास्तु शतं पूर्णम् इति ॥ ‘ दस मन्वन्तरोंतक इस अवस्थामें इन्द्रियचिन्तक रहते हैं और भूतचिन्तक तो पूरे सौ मन्वन्तरोंतक । ' तथा प्रकृतिलय जो कि अव्यक्त, महत्, अहंकार, पञ्चतन्मात्राओंमेंसे किसीको आत्मा मानते हैं, वे उसकी उपासनाद्वारा उसकी वासनासे वासित अन्तःकरणवाले, देहपातके पश्चात्, अव्यक्त आदिमेंसे किसीमें लीन हो जाते हैं । साधिकार चित्तका अर्थ है अचरितार्थ चित्त, इस प्रकार ही चित्त चरितार्थ होता यदि विवेकख्यातिको भी वह पैदा करता, नहीं पैदा हुई सत्त्व और पुरुषमें भेद - ख्याति जिसकी ऐसे चित्तकी — जो कि अचरितार्थ है ( अर्थात् जिसने अभीतक प्रयोजन पूरा नहीं किया ) साधिकारता तो बनी हुई है । प्रकृतिसाम्यको प्राप्त करके भी चित्त अवधि प्राप्तकर फिर भी प्रादुर्भूत होता है और उसके बाद विवेकको प्राप्त करता है, जैसे कि वर्षाकी समाप्तिपर मृद्भावको प्राप्त हुआ मण्डूकदेह फिर मेघ - जल - धाराके सिञ्चनसे मण्डूकदेह - सत्ताका अनुभव करता है । वायुपुराणमें कहा है— सहस्त्रं त्वाभिमानिकाः ॥
बौद्धा दश सहस्राणि तिष्ठन्ति विगतज्वराः ।
पूर्णं शतसहस्त्रं तु तिष्ठन्त्यव्यक्तचिन्तकाः ॥
पुरुषं निर्गुणं प्राप्य कालसंख्या न विद्यते । हजार मन्वन्तरोंतक आभिमानिक ( अहंकारचिन्तक ), दस हजार मन्वन्तरोंतक बौद्ध स्थित रहते बिना दुःख अनुभव किये अव्यक्तचिन्तक एक लाख मन्वन्तरोंतक स्थित रहते हैं और निर्गुण पुरुषको हैं, प्राप्तकर कालकी कोई संख्या नहीं रहती । चूँकि यह अर्थात् भवप्रत्यय पुनर्भव अर्थात् पुनर्जन्मकी प्राप्तिका हेतु है; अतःहेय है । समीक्षा — वाचस्पति मिश्रने उपासना शब्द चिन्तन, भावनाविशेष, समापत्ति प्रयोग किया है । अर्थात् समाधिके अर्थमें ( १ ९ ० )
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सूत्र १ ९ ] भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् * * [ समाधिपाद ( १ ) पाँचों स्थूलभूतों तथा उनके अन्तर्गत स्थूल शरीर और इन्द्रियोंकी भावनासे युक्त वितर्कानुगत सम्प्रज्ञात - समाधि कहलाती है । पाँचों तन्मात्राओंतक सूक्ष्म भूतों तथा उनके अन्तर्गत सारे सूक्ष्म विषयोंकी भावनाओंसे युक्त विचारानुगत सम्प्रज्ञात -समाधि कहलाती है । इन दोनोंसे परे ' अहमिति ' वृत्तिवाली अहंकारकी भावनासे युक्त आनन्दानुगत सम्प्रज्ञात -समाधि कहलाती है और ' अहमिति ' अहंकारसे परे अस्मितावृत्तिवाली अस्मिता - भावनासे युक्त अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात - समाधि कहलाती है । इसलिये आनन्दानुगत भूमिमें आसक्तिवाले योगी ही देहपातके पश्चात् विदेह देवपदको प्राप्त हो सकते हैं न कि स्थूल भूतों और इन्द्रियोंकी भावनासे युक्त वितर्कानुगत भूमिवाले । अस्मितानुगत भूमिमें आसक्तिवाले योगी ही ( अस्मिता ) प्रकृतिलय देवपदको प्राप्त हो सकते न कि तन्मात्राओं और अहंकारकी भावनासे युक्त विचारानुगत और आनन्दानुगत भूमिवाले योगी, जैसा कि हमने १८ वें सूत्रकी व्याख्या तथा उसके विशेष वक्तव्यमें दिखलाया है । ( २ ) भोज महाराजने भी अपनी १७ वें सूत्रकी वृत्तिमें ऐसा ही बतलाया है । यथा-यदा तु रजस्तमोलेशानुविद्धमन्तःकरणसत्त्वं भाव्यते, तदा गुणभावाच्चितिशक्तेः सुखप्रकाशमयस्य सत्त्वस्य भाव्यमानस्योद्रेकात्सानन्दः समाधिर्भवति अस्मिन्नेव समाधौ ये बद्धधृतयस्तत्त्वान्तरं प्रधानपुरुषरूपं न पश्यन्ति ते विगतदेहाहङ्कारत्वाद् विदेहशब्दवाच्याः । जब रज और तमके किंचित् लेशसे युक्त हुआ अन्तःकरण सत्त्वकी भावना करता है, तब चितिशक्तिके गुणरूप होनेसे सत्त्व ( चित्त ) ध्येयकी प्रबलताके कारण सत्त्व ( चित्त ) के सुखप्रकाशमय हो जानेके कारण सत्त्वचित्तमें आनन्द प्रतीत होता है । इसी समाधिमें जो आसक्त हो गये हैं और प्रधान पुरुष - भेदरूप विवेकख्यातिको नहीं प्राप्त करते हैं, वे योगी देहके अहङ्कार निवृत हो जानेसे ( देहमें आत्माध्यास हट जानेके कारण ) विदेह कहलाते हैं । यह ग्रहण अर्थात् अहङ्कारवृत्तिविशिष्ट अन्तःकरणविषयक समाधि है ततः परं रजस्तमोलेशानभिभूतं शुद्धसत्त्वमालम्बनीकृत्य या प्रवर्तते भावना तस्यां ग्राह्यस्य सत्त्वस्य न्यग्भावात्, चितिशक्तेरुद्रेकात् सत्तामात्रावशेषत्वेन समाधिः सास्मिता इत्युच्यते । न चाहङ्कारास्मितयोरभेदः शङ्कनीयः । यतो यत्रान्तःकरणमहमित्युल्लेखेन विषयान् वेदयते सोऽहङ्कारः । यत्रान्तर्मुखतया प्रतिलोमपरिणामे प्रकृतिलीने चेतसी सत्तामात्रमवभाति सास्मिता । अस्मिन्नेव समाधौ ये कृतपरितोषाः परमात्मानं पुरुषं न पश्यन्ति तेषां चेतसि स्वकारणे लयमुपागते प्रकृतिलया इत्युच्यन्ते । उस अहंकारसे आगे अन्तर्मुख होनेपर रजस्तमके लेशसे शून्य सत्त्वचित्तको विषय बनाकर जो भावना की जाती है तो उसमें ग्राह्यचित्तका अन्य रूप हो जाता है । वह चितिशक्तिकी प्रबलताके साथ सत्तामात्रसे शेष रह जाता है । इसलिये अस्मिता नामवाली समाधि कहलाती है । अहंकार और अस्मिता — इन दोनोंमें अभेदकी शंका न करनी चाहिये; क्योंकि जिस कालमें अन्तःकरणद्वारा ' अहमिति ' ‘ मैं हूँ ' इस भावसे चित्रित हुआ चित्त विषयको जानता है; वह अहङ्कार कहलाता है; और जहाँ ‘ अहमिति ’ इस प्रकारकी वृत्तिको छोड़कर चित्त उलटे परिणामसे प्रकृति ( अस्मिता ) में अन्तर्मुख होता है और केवल ( १ ९ १ )
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समाधिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र १ ९ सत्तामात्रसे रहता है तो वह अस्मिता कहलाता है । इसी समाधिमें जिन्होंने संतोष कर लिया है ऐसे योगी परमात्मा पुरुषको नहीं देखते हैं । उनका चित्त अपने कारण अस्मिता ( प्रकृति ) में लयको प्राप्त होनेके कारण उनको ‘ प्रकृतिलय ' कहते हैं । ( ३ ) विदेह और प्रकृतिलय देवोंकी अवस्था अन्य सब दिव्य लोक - लोकान्तरोंके देवोंकी अपेक्षा तो सबसे अधिक दिव्य, सूक्ष्म, सात्त्विक और उच्चतम है; किंतु साधिकारचित्त होनेके कारण कैवल्य नहीं है । इसीलिये व्यासभाष्यमें उनकी अवस्थाके लिये ' कैवल्यपद इव ' कैवल्यपद - जैसी लिखा गया है 1 तथा विभूतिपाद सूत्र २६ के व्यासभाष्यमें ऐसा ही बतलाया गया है । त एते सप्त लोकाः सर्व एव ब्रह्मलोकाः । विदेहप्रकृतिलयास्तु मोक्षपदे वर्तन्ते । न लोकमध्ये न्यस्ता इति । इन पूर्वोक्त सातों लोकोंको ही ब्रह्मलोक जानना चाहिये ( जिनमें वितर्कानुगत भूमिकी परिपक्व अवस्थामें विचारानुगत भूमि तथा आनन्दानुगत और अस्मितानुगत भूमिकी आरम्भिक अवस्थामें आसक्त योगी शरीर त्यागनेके पश्चात् अपनी - अपनी भूमियोंके क्रमानुसार सूक्ष्म शरीरके साथ निवास करते हैं ) । विदेह और प्रकृतिलय योगी कैवल्यपदके तुल्य स्थितिमें हैं, इसलिये वे किसी लोकमें निवास करनेवालोंके साथ नहीं उपन्यास किये गये । ( ४ ) विदेह और प्रकृतिलय देवोंकी कैवल्यपद - जैसी स्थितिको असम्प्रज्ञात - समाधि कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि असम्प्रज्ञात - समाधि तो मनुष्यलोकमें स्थूल देहसे सर्ववृत्तिनिरोधद्वारा लाभ की जाती है । इस बातकी भी उपेक्षा की जाय तो भी इस स्थितिको असम्प्रज्ञात - समाधि नहीं कह सकते; क्योंकि असम्प्रज्ञात समाधिमें तो सर्ववृत्तिनिरोध होता है । यह तो सम्प्रज्ञात -समाधिकी ही उच्चतर और उच्चतम भूमि है, जिनमें चित्त इन दोनों एकाग्रतारूप सात्त्विक वृत्तियोंमें परिणत हो रहा है । इसलिये श्रीव्यासजी महाराजने इस १ ९वें सूत्रके भाष्यमें ‘ अतिवाहयन्ति ' से यह दर्शाया है कि विदेह और प्रकृतिलय देव जब कैवल्यपद - तुल्य स्थितिसे इस लोकमें उच्च योगियोंके कुलमें जन्म लेते हैं, तब उनको अपने पिछले जन्मके योगाभ्यासके बलसे जन्मसे ही असम्प्रज्ञात - समाधि लाभ करनेकी योग्यता होती है । इनको योगाभ्यासके संस्कारोंसे शून्य चित्तवालोंके सदृश श्रद्धा, वीर्य, स्मृति आदिकी अपेक्षा नहीं होती । इसलिये इस प्रकार जो इन योगियोंको असम्प्रज्ञात - समाधिका लाभ होता है, उस असम्प्रज्ञात - समाधिको अपने निमित्तकारणकी अपेक्षासे भवप्रत्यय कहते हैं अर्थात् जन्म ही है कारण जिसका । भवके अर्थ यहाँ जन्म हैं । ( ५ ) भवके अर्थ यहाँ अविद्या लेना ठीक नहीं है, क्योंकि अविद्या कैवल्यपद - तुल्य स्थिति अथवा असम्प्रज्ञात - समाधि प्राप्त नहीं हो सकती अथवा मिथ्याज्ञानसे विवेकख्यातिद्वारा प्राप्त होती है, जिसमें अविद्या आदि सारे क्लेश दग्धबीज - तुल्य । असम्प्रज्ञात समाधि तो हो जाते हैं ( ६ ) विदेह और प्रकृतिलयोंकी कैवल्यपद - तुल्य स्थितिको उसकी वर्षाके पश्चात् मृद्भावको प्राप्त किये हुए मण्डूक - जैसी बतलाकर निकृष्टता दिखलानेके लिये क्योंकि यद्यपि ये दोनों चित्तकी स्थितियाँ विवेकख्यातिको प्राप्त उसका उपहास करना भी अनुचित है, किये हुए नहीं हैं, तथापि रज - तमसे शून्य ( १ ९ २ )
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सूत्र १ ९ ] * भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् * [ समाधिपाद हुआ चित्त इनमें अपने शुद्ध स्वच्छ सात्त्विक रूपमें चिति - शक्तिके प्रकाशसे भासता है । यदि इस अवस्थाको मण्डूकके मृद्भावको प्राप्त होनेके सदृश और पुनर्जन्मको जीवित भाव प्राप्त होनेके समान कहा जाय तो विवेकख्यातिके पश्चात् अपुनरावर्तिनी कैवल्य मण्डूकके ऐसे मृद्भाव प्राप्त होनेके सदृश मानी जायगी । जिसके कभी जीवित भावको प्राप्त होनेकी आशा नहीं रही हो । ऐसी कैवल्य तो बुद्धिमानोंके लिये हेयकोटिमें होगी न कि उपादेय । इसलिये ये दोनों उच्चतर और उच्चतम योगकी भूमियाँ स्वयं अपने स्वरूपसे हेय नहीं हैं । इनमें आसक्ति अर्थात् इनके आनन्दमें संतुष्ट होकर स्वरूप - अवस्थितिके लिये यत्न न करना ही अहितकर है और उनका फलस्वरूप विदेह और प्रकृतिलय - अवस्था यद्यपि कैवल्य नहीं है, किंतु शरीरसे आत्माभिमान निवृत्त हो जानेके कारण कैवल्य - जैसी है और ब्रह्मलोकतक सारी सूक्ष्म और आनन्दमय अवस्थाओंसे उच्चकोटिकी है । ( ७ ) ' उपायप्रत्ययो योगिनां भवति ' इस बीसवें सूत्रके व्यासभाष्यसे उपायप्रत्यय – असम्प्रज्ञातसमाधि योगियोंकी बतलाकर ' भव प्रत्यय ' असम्प्रज्ञात - समाधि अयोगियोंकी अथवा अज्ञानियोंकी सिद्ध करना भी ठीक नहीं है; क्योंकि १ ९ वें सूत्रके ' विदेहानां देवानां भवप्रत्ययः ' इस व्यासभाष्यमें भवप्रत्ययवाले विदेहोंके लिये देवका शब्द प्रयोग किया गया है । उपायप्रत्ययवालोंको तो श्रद्धा - वीर्य आदिका अनुष्ठान करके योगश्रेणीमें प्रवेश करना होता है, किंतु भवप्रत्ययवाले श्रद्धा - वीर्य आदिका अनुष्ठान पूर्व जन्ममें कर चुके हैं, क्योंकि बिना इसके आनन्दानुगत और अस्मितानुगतकी भूमियों और कैवल्यपदतुल्य स्थितिका प्राप्त होना असम्भव है । ( ८ ) वायुपुराणमें चिन्तनका शब्द भावना, समापत्ति अर्थात् सम्प्रज्ञात समाधिके अर्थमें ले सकते हैं । इसमें क्रमसे स्थूलभूतोंसे लेकर मूलप्रकृतिपर्यन्त सम्प्रज्ञात समाधिकी भूमियोंमें आसक्त योगियोंके शरीर त्यागनेके पश्चात् उनकी अवस्थाओंके सूक्ष्मता, सात्त्विकता और आनन्दके तारतम्यसे समयमें वृद्धि दिखलाते हुए इस बातको दर्शाया है कि एक लाख मन्वन्तरवाली स्थिति भी पुनरावर्तिनी ही है, केवल परमात्मप्राप्तिरूप कैवल्य अपुनरावर्तिनी है, जो असम्प्रज्ञात समाधिका अन्तिम ध्येय है । यह एक प्रकारसे गीताके इस श्लोककी व्याख्या है— आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन । मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥ ( ८ । १६ ) विज्ञानभिक्षुके योगवार्तिकका भाषानुवाद सूत्र १ ९ - असम्प्रज्ञात योगके भी निमित्तभेदसे दो प्रकार अगले दो सूत्रोंद्वारा सूत्रकार कहेंगे । उन्हीं दो भेदोंको युक्तिसिद्ध पूर्वाचार्योंके कहे क्रमके अनुसार दोनों सूत्रोंके अवतरणके लिये भाष्यकार दिखलाते हैं— ' स खल्वयं द्विविध इति ' वह असम्प्रज्ञातयोग दो प्रकारका है । वह असम्प्रज्ञातयोग अगले सूत्रमें प्रज्ञापूर्वक बतलाया है । अतः आगे कहे श्रद्धा आदि हैं कारण जिसके ऐसा उपायप्रत्यय असम्प्रज्ञातयोग योगियोंको इस लोकमें होता है तथा योगभ्रष्टींको इस लोकमें और देवताविशेषोंको देवलोकमें ' भवप्रत्यय ' जन्म है कारण जिसका वह असम्प्रज्ञातयोग होता है — यह क्रम है । सूत्रकारको उपायप्रत्यय सविस्तार कहना है, अतः सूचीकटाहन्यायसे पहले भवप्रत्ययको कहेंगे । इस कारण सूत्र और भाष्यमें क्रमभेदको दोष नहीं मानना चाहिये । उत्पत्ति - क्रमके अनुसार सूत्रके क्रमका उल्लंघन करके और सम्बन्धको पूरा करके सूत्रको उठाते हैं । - तत्रेति- -भवका अर्थ है जन्म, वह भव ही है प्रत्यय अर्थात् कारण जिसका ऐसा विग्रह ( भवप्रत्यय शब्दका ) है । ' विदेहप्रकृतिलयानाम् ' इसकी ( १ ९ ३ )
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समाधिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र १ ९ व्याख्या विभाग करके करते हैं कि ' विदेहानाम् ' इत्यादि । शरीरकी अपेक्षाके बिना जो बुद्धिवृत्तिवाले हैं उन्हें विदेह कहते हैं — यह विभूतिपादमें स्पष्ट हो जायगा । वे विदेह महदादिदेव हैं, साधना - अनुष्ठानके बिना ही इन्हें असम्प्रज्ञातयोग केवल जन्मके ही निमित्तसे होता है ( अर्थात् इस देहपातके अनन्तर उस - उस तत्त्वमें प्रादुर्भावरूप जन्मके कारणसे ही होता है । ) योनि अर्थात् उस - उस स्थानके अपने - अपने गुण या प्रभावद्वारा स्वाभाविक ज्ञानसे ही उन्हें असम्प्रज्ञात होता है । वे नित्यप्रति प्रलयमें और कभी - कभी सर्गकालमें भी स्वसंस्कारमात्रोपगतचित्तद्वारा अर्थात् संस्कार जिसमें शेष हैं ऐसे निरोधावस्थित चित्तद्वारा कैवल्यपदकी - सी अवस्थाको प्राप्त हुए - हुए और व्युत्थानकालमें स्वसंस्कारविपाक अर्थात् स्वभाव प्राप्त करानेवाले संस्कारके विपाक अर्थात् फलको अर्थात् ऐश्वर्यभोगको प्रारब्ध कर्मसे यन्त्रित हुए - हुए भोगते हैं । उसके पश्चात् मुक्त हो जाते हैं इसी प्रकार प्रकृतिलय भी ईश्वर उपासनाद्वारा या प्रकृतिदेवताकी उपासनाद्वारा जो आवरणसमेत ब्रह्माण्डको त्यागकर लिङ्गशरीरके साथ प्रकृतिके आवरणमें गये हैं, वे यहाँ प्रकृतिलीन कहे गये हैं और वे भी चित्तके कार्य समाप्त न होनेसे अपनी इच्छासे ही प्रकृतिमें लीन होनेपर, संस्कारके शेष रह जानेपर असम्प्रज्ञातयोगमें कैवल्यपदके सदृश अवस्थाको प्राप्त होते हैं, जबतक कि शेष अधिकारके वशसे चित्त फिर व्युत्थित नहीं होता । इस ( प्रकृतिलय ) का भी ( असम्प्रज्ञात ) भवप्रत्यय ही है । अधिकारकी समाप्तिपर वे भी मुक्त हो जाते हैं, यह आशा है । कोई ' भव ' का अर्थ करते हैं अविद्या । उनका कहना है कि ' यह सूत्र ' इन्द्रियोंसे लेकर प्रकृतितक के चिन्तकोंको अविद्यारूपी कारणद्वारा असम्प्रज्ञात होता है, यह कह रहा है । परंतु यह नहीं है, क्योंकि असम्प्रज्ञातका हेतु है परवैराग्य और वह परवैराग्य अविद्यामें सम्भव नहीं तथा जो वायुपुराणमें है कि ' दस मन्वन्तरोंतक इस अवस्थामें इन्द्रियचिन्तक रहते हैं और भौतिक पूरे एक सौ मन्वन्तरोंतक, आभिमानिक एक हजार मन्वन्तरोंतक, बौद्ध दस हजार मन्वन्तरोंतक बिना दुःखके रहते हैं और अव्यक्त चिन्तक पूरे एक लाख मन्वन्तरोंतक रहते हैं, निर्गुण पुरुषको प्राप्त करके कालकी कोई संख्या नहीं रहती ' यह वाक्य है । वह कर्मदेवोंके, जिन्हें कि ज्ञान उत्पन्न नहीं हुआ और जो कि इन्द्रियादिके उपासक हैं - उस - उस पदमें अवस्थितिके कालको ही नियत करता है उनके न तो असम्प्रज्ञात समाधिके कालोंको और न देहादिके अभावसे वृत्तिके अभावके कालोंको वह वाक्य निश्चित करता है; क्योंकि इन्द्रिय आदिके चिन्तनमात्रद्वारा असम्प्रज्ञात उत्पन्न नहीं हो सकती तथा कभी - कभी होनेवाला जो वृत्तिका अभाव वह प्रलय और मरणादि ( में उत्पन्न होनेवाले वृत्त्यभाव) के तुल्य होनेसे अपुरुषार्थ भी है एवं इन्द्रियादिके उपासकोंको इन्द्रियादिके अभिमानी सूर्य आदि पदकी प्राप्ति होती है, यह फल अन्यत्र सुनायी भी देता है । समीक्षा — यहाँ विदेह और प्रकृतिलयोंका जो स्वरूप दिखलाया है, उसके सम्बन्धमें षड्दर्शनसमन्वयके चौथे प्रकरणमें ' सांख्य और ईश्वरवाद ' में लिख चुके हैं । यहाँ हम भूमिकारूप आवश्यकता नहीं प्रतीत होती । ' भव ' के जो अर्थ जन्म लिये गये हैं, वे तो सूत्रकार पुनः विचार करनेकी अभिप्रायके अनुसार ठीक ही हैं; किंतु जो देवविशेषकी देवलोकमें और भाष्यकारके बतलाया गया है, सो देवलोककी समाधिकी मनुष्यलोककी समाधिके असम्प्रज्ञात - समाधिको भव - प्रत्यय साथ कोई संगति नहीं दीखती । ( १ ९ ४ )
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सूत्र २० ] श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम् * * [ समाधिपाद हाँ, इस लोकमें योगभ्रष्टकी असम्प्रज्ञात समाधि ही भवप्रत्यय हो सकती है । भगवान् श्रीकृष्णने गीतामें भी ऐसा ही कहा है, जैसा कि इस सूत्रकी व्याख्यामें बतलाया गया है । अन्य सब बातें वाचस्पति मिश्रकी समीक्षामें आ गयी हैं । सङ्गति – पिछले सूत्रमें विदेह और प्रकृतिलयोंकी असम्प्रज्ञात - समाधिकी जन्मसिद्ध योग्यता बतलाकर अब अगले सूत्रमें साधारण योगियोंके लिये उसका उपायसे प्राप्त करना बतलाते हैं— श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम् ॥ २० ॥
शब्दार्थ –श्रद्धा - वीर्य - स्मृति - समाधि - प्रज्ञापूर्वकः = श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञापूर्वक ( वह असम्प्रज्ञातसमाधि ); इतरेषाम् = दूसरोंकी अर्थात् जो विदेह और प्रकृतिलय नहीं हैं, उन साधारण योगियोंकी होती है । अन्वयार्थ – दूसरे योगी जो विदेह और प्रकृतिलय नहीं हैं, उनको श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञापूर्वक असम्प्रज्ञात - समाधि सिद्ध होती है । व्याख्या – विदेह और प्रकृतिलयोंसे भिन्न योगियोंकी असम्प्रज्ञात - समाधि श्रद्धा आदिपूर्वक होती है । श्रद्धा आदि क्रमसे उपाय हैं और असम्प्रज्ञात -समाधि उपेय । इसलिये इनका उपायोपेय सम्बन्ध है I योगके विषयमें चित्तकी प्रसन्नता श्रद्धा है; उत्साह वीर्य है; जाने हुए विषयका न भूलना स्मृति है; चित्तकी एकाग्रता समाधि है; ज्ञेयका ज्ञान प्रज्ञा है श्रद्धा — जो विदेह और प्रकृतिलयोंसे भिन्न हैं, उन्हें जन्म - जन्मान्तरोंसे योगमें नैसर्गिक रुचि नहीं होती है; किंतु उनको पहले शास्त्र और आचार्यके उपदेश सुनकर योगके विषयमें विश्वास उत्पन्न होता है । योगकी प्राप्तिके लिये अभिरुचि अथवा उत्कट इच्छाको उत्पन्न करनेवाले इस विश्वासका नाम ही श्रद्धा है । यह कल्याणकारिणी श्रद्धा योगीकी रुचि योगमें बढ़ाती है, उसके मनको प्रसन्न रखती है और माताके समान कुमार्गसे बचाती हुई उसकी रक्षा करती है । वीर्य — श्रद्धासे वीर्य उत्पन्न होता है । योग - साधनकी तत्परता उत्पन्न करनेवाले उत्साहका नाम वीर्य है । श्रद्धाके अनुसार उत्साह और उत्साहके अनुसार साधनमें तत्परता होती है । शम स्मृति – उत्साहवालेको पिछली अनुभव की हुई भूमियोंमें स्मृति उत्पन्न होती है । पिछले जन्मोंके अक्लिष्ट कर्मों और ज्ञानके संस्कारोंका जाग्रत् होना स्मृति है । समाधि – पूर्वके अक्लिष्ट कर्म और ज्ञानके संस्कारोंके जाग्रत् होनेसे चित्त एकाग्र और स्थिर होने है लगता प्रज्ञा- -समाधिस्थ एकाग्र चित्तमें ऋतम्भरा प्रज्ञा ( विवेक - ज्ञान ) उत्पन्न होती है, जिससे वस्तुका यथार्थ स्वरूप ज्ञात होता है । इसके अभ्याससे परवैराग्य और परवैराग्यसे असम्प्रज्ञात - समाधि होती है । विशेष विचार ( सूत्र २० ) - कर्माशय चित्त - भूमिमें दो प्रकारसे रहते हैं । एक प्रधानरूपसे, जिन्होंने जन्म, आयु और भोगका कार्य आरम्भ कर दिया है, जिन्हें नियत विपाक तथा प्रारब्ध भी कहते हैं । दूसरे उपसर्जनरूपसे रहते हैं, जो प्रधान कर्माशयोंके सम्मुख अपने कार्यको आरम्भ करनेकी सामर्थ्य न पाकर चित्तकी निचली भूमियोंमें छिपे हुए पड़े रहते हैं, जिनको अनियत विपाक तथा संचित कर्म भी कहते हैं । क्रियमाण कर्मोंसे जो कर्माशय बनते हैं, उनमेंसे कुछ तो प्रधान रूप धारण करके प्रारब्धके साथ ( १ ९ ५ )
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समाधिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप* * [ सूत्र २० मिल जाते हैं और कुछ उपसर्जनरूपसे चित्तकी निचली भूमियोंमें संचित कर्माशयोंके साथ मिल जाते हैं । यह संचित कर्माशय भी समय - समयपर अपने किसी अभिव्यञ्जकको पाकर निचली भूमियोंसे ऊपर आकर प्रधान रूप धारण करके प्रारब्ध बनते जाते हैं । जन्म - जन्मान्तरोंमें संचित किये हुए योगके संस्कार व्युत्थानके प्रधान संस्कारोंसे दबे हुए चित्तकी निचली भूमिमें सुप्तरूपसे पड़े हुए श्रद्धा - वीर्यद्वारा व्युत्थानके संस्कारोंके दबनेपर योगके संस्कारोंको अभिव्यञ्जक ( जगानेवाले ) पाकर वेगके साथ जाग्रत् होकर निचली भूमियोंसे ऊपर आकर प्रधान रूप धारण कर लेते हैं । यहाँ श्रद्धा - वीर्य तो केवल निमित्त कारण है । उपादान कारण तो निचली भूमियोंमें संचित योगके संस्कार ही प्रकृतिरूप हैं— जैसा कि कैवल्यपाद सूत्र २ में बतलाया है— ‘ जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात् । ' एक जातिसे दूसरी जातिमें बदल जाना प्रकृतियों ( उपादान कारणों ) के भरनेसे होता है । श्रद्धावीर्य केवल व्युत्थानके संस्कारोंकी रुकावटको हटानेमें निमित्त होते हैं । कहीं बाहरसे योगके संस्कारोंको नहीं भरते । जैसे किसान पानीको रोकनेवाली मेड़को केवल काट देता है तो मेड़से बाहर रुका हुआ पानी स्वयं कियारीमें आ जाता है । यथा - निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत् । ( कै ० पा ० सू ० ३ ) धर्मादि निमित्त प्रकृतियोंका प्रेरक नहीं होता है, किंतु उससे रुकावट दूर हो जाती है, जिस प्रकार जब किसान किसी खेतमें पानी भरना चाहता है तो केवल पानीको रोकनेवाली मेड़के कुछ अंशको काट देता है । पानी स्वयं उसमें होकर खेतमें भर जाता है । संगति — पूर्वोक्त श्रद्धा आदि उपाय पूर्वजन्मोंके संस्कारोंके बलसे मृदु, मध्य, अधिमात्र भेदसे तीन प्रकारके होते हैं अर्थात् किसीके मृदु ( मन्द ) उपाय होते हैं, किसीके मध्य ( सामान्य ) और किसीके अधिमात्र ( तीव्र ) उपाय होते हैं । इससे मृदु उपाय, मध्य उपाय और अधिमात्र उपाय, उपायभेदसे तीन प्रकारके योगी होते हैं । इन तीनों उपायभेदवाले योगियोंमें भी प्रत्येक संवेग अथवा वैराग्यके मृदु, मध्य, अधिमात्र ( तीव्र ) तीन प्रकारके भेद होनेसे तीन - तीन प्रकारका होता है अर्थात् मृदु उपायवाला योगी, कोई मृदु संवेगवाला, कोई मध्य संवेगवाला और कोई अधिमात्र ( तीव्र ) संवेगवाला होता है । ऐसे ही अधिमात्र उपायवाला, कोई मृदु संवेगवाला, कोई मध्य संवेगवाला और कोई अधिमात्र ( तीव्र ) संवेगवाला होता है । इस प्रकार श्रद्धा आदि उपायोंके तीन भेद तथा संवेगके तीन भेद होनेसे उपाय - प्रत्यय योगियोंके नौ भेद उत्पन्न होते हैं— ( १ ) मृदु - उपाय मृदु संवेगवान्, ( २ ) मृदु - उपाय मध्य संवेगवान्, ( ३ ) मृदु - उपाय तीव्र संवेगवान्, ( ४ ) मध्य - उपाय मृदु संवेगवान्, ( ५ ) मध्य - उपाय मध्य संवेगवान्, ( ६ ) मध्य - उपाय तीव्र संवेगवान्, ( ७ ) अधिमात्र उपाय मृदु संवेगवान्, ( ८ ) अधिमात्र - उपाय मध्य संवेगवान्, ( ९ ) अधिमात्र - उपाय तीव्र संवेगवान् । इन नौ प्रकारके उपाय - प्रत्यय योगियोंमेंसे उपायकी न्यूनाधिकता और वैराग्यकी न्यूनाधिकताकी ( १ ९ ६ )