पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 221–230

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 221–230

पृष्ठ 221

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सूत्र २१-२२ ] मृदुमध्याधिमात्रत्वात् ततोऽपि विशेषः * * [ समाधिपाद अपेक्षासे किसीको विलम्बतम ( अत्यन्त विलम्बसे ), किसीको शीघ्रतम समाधिका लाभ प्राप्त होता है । उपर्युक्त सबमें अन्तिम योगियोंको सर्वापेक्षया शीघ्रतम समाधि - लाभ प्राप्त होता है, उन्हींका अगले सूत्रमें वर्णन करते हैं-तीव्रसंवेगानामासन्नः ॥ २१ ॥

शब्दार्थ– तीव्रसंवेगानाम् = तीव्र संवेगवान् ( अधिमात्र उपायवाले योगियोंको ) समाधि - लाभ; आसन्नः- शीघ्रतम - निकटतम होता है । अन्वयार्थ — तीव्र संवेग ' और अधिमात्र उपायवाले योगियोंको समाधि - लाभ शीघ्रतम होता है । व्याख्या — इस सूत्रके आदिमें भाष्यकारोंने ' अधिमात्रोपायानाम् ' ' अधिमात्र उपायवालोंको ' इतना पाठ और सम्बद्ध किया है तथा ' समाधिलाभः समाधिफलं च भवति इति । ' समाधिका लाभ और उसके फलका लाभ होता है; यह शब्द सूत्रके शेष हैं । वे सूत्रके अन्तमें लगाने चाहिये । इसलिये यह अर्थ हुआ कि जिनका उपाय अधिमात्र है और जिनका संवेग तीव्र है, उन उपाय - प्रत्यय योगियोंको समाधिका लाभ तथा उसके फलका लाभ शीघ्रतम प्राप्त होता है । अर्थात् उपायके अधिमात्र और संवेगके तीव्र होनेके कारण उपर्युक्त नौ प्रकारके उपाय - प्रत्यय योगियोंमेंसे उनको शीघ्रतम अर्थात् सबसे अधिक शीघ्रतासे समाधि तथा उसका फल कैवल्यका लाभ प्राप्त होता है I इनकी अपेक्षा अधिमात्र उपाय मध्य संवेगवालोंको कुछ विलम्बसे; और इनकी अपेक्षा अधिमात्र उपाय मृदु संवेगवालोंको उनसे अधिक विलम्बसे होगा । इसी प्रकार जितनी - जितनी उपायोंकी और संवेगकी न्यूनता होती है उतना - उतना विलम्बसे समाधिलाभ होता है और जितनी - जितनी उपायोंकी और संवेगकी अधिकता होती है उतना - उतना शीघ्र समाधिलाभ होता है । सङ्गति — तीव्र संवेग भी मृदु, मध्य, अधिमात्र — विशेषान्तर भेदसे तीन प्रकारका होता है । उनमेंसे अधिमात्र तीव्र वैराग्यवाले योगियोंको शीघ्र समाधिका लाभ होता है । यह अगले सूत्रमें बतलाते हैं-मृदुमध्याधिमात्रत्वात् ततोऽपि विशेषः ॥ २२ ॥

शब्दार्थ — मृदु - मध्य - अधिमात्रत्वात् = ( तीव्र संवेगके भी ) मृदु, मध्य, अधिमात्र — ये तीन भेद होनेसे; ततः - उस ( मृदु तीव्र संवेगवालोंके और मध्य तीव्र संवेगवालोंके समाधि - लाभ ) से; अपि = भी; विशेषः- ( अधिमात्र तीव्र संवेगवालोंको समाधि - लाभमें ) विशेषता होती है । अन्वयार्थ — मृदु, मध्य, अधिमात्र – ये तीन भेद होनेसे मृदु तीव्र संवेगवालों और मध्य तीव्र संवेगवालोंके समाधि - लाभसे भी अधिमात्र तीव्र संवेगवालोंको समाधिलाभमें विशेषता है । व्याख्या – पूर्व सूत्रमें जो तीव्र संवेग बतलाया है, उस तीव्र संवेगके भी मृदु, मध्य, अधिमात्र — ये तीन भेद हैं अर्थात् मृदु तीव्र संवेग, मध्य तीव्र संवेग और अधिमात्र तीव्र संवेग । १ – वाचस्पति मिश्रने संवेगके अर्थ वैराग्य किये हैं, किंतु विज्ञानभिक्षुके योगवार्तिक तथा भोजवृत्तिमें क्रम - अनुसार इस प्रकार अर्थ है — ' संवेगः उपायानुष्ठाने शैघ्रयम् ' संवेग उपायके अनुष्ठानमें शीघ्रताको कहते हैं । ' संवेगः क्रियाहेतुर्दृढतरः संस्कारः ' क्रियाके करनेमें जो कारणरूप दृढ़तर संस्कार है, वह संवेग कहलाता है I ( १ ९ ७ )

पृष्ठ 222

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समाधिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र २३-२४ इस प्रकार यह तीव्र संवेग तीन प्रकारका हुआ । इससे अधिमात्र - उपाय मध्य संवेगवाले आठवें श्रेणीके योगियोंकी अपेक्षासे अधिमात्र उपाय मृदु - तीव्र संवेगवाले योगियोंको शीघ्र समाधि - लाभ होता है और अधिमात्र - उपाय मध्य - तीव्र संवेगवाले योगियोंको शीघ्रतर और अधिमात्र - उपाय अधिमात्र - तीव्र संवेगवाले योगियोंको शीघ्रतम समाधिलाभ प्राप्त होता है । इन अधिमात्रोपाय अधिमात्र तीव्र संवेगवाले योगियोंमें पूर्वके दोनों योगियोंसे यह अत्यन्त शीघ्रतारूप समाधि - लाभमें विशेषता है । सङ्गति – पूर्वोक्त अधिमात्र उपाय अधिमात्र तीव्र संवेगसे ही शीघ्रतम समाधिका लाभ होता है, अथवा कोई और सुगम उपाय भी है— इस आशङ्काके निवारणार्थ सूत्रकार शीघ्रतम समाधिका उपायान्तर बतलाते हैं— ईश्वरप्रणिधानाद्वा ॥ २३ ॥

शब्दार्थ –ईश्वर - प्रणिधानात् = ईश्वर - प्रणिधानसे; वा = अथवा ( शीघ्रतम समाधि - लाभ होता है ) । अन्वयार्थ — अथवा ईश्वर - प्रणिधानसे शीघ्रतम समाधि - लाभ होता है । व्याख्या– इस सूत्रमें ' विशेष ' इस पदका पूर्वसूत्रसे अनुवर्तन करनेसे आसन्नतम ( शीघ्रतम ) समाधि - लाभ होता है, यह अर्थ निकलते हैं । पूर्वोक्त अधिमात्र उपाय अधिमात्र तीव्र संवेगसे शीघ्रतम समाधि - लाभ होता है, अथवा सत्य - सङ्कल्प ईश्वरमें भक्तिविशेष अर्थात् कायिक, वाचिक, मानसिक क्रियाओंको उसके अधीन तथा कर्मों और उनके फलोंको उसके समर्पण करने और उसके गुणों तथा स्वरूपका चिन्तन करनेसे, उसके अनुग्रहसे शीघ्रतम समाधि - लाभ होता है । साधनपाद सूत्र १ एवं ३२ में ईश्वर - प्रणिधानका सामान्य अर्थ ईश्वरकी भक्तिविशेष और शरीर, इन्द्रिय, मन, प्राण, अन्तःकरण आदि सब करणों, उनसे होनेवाले सारे कर्मों और उनके फलों अर्थात् सारे बाह्य और आभ्यन्तर जीवनको ईश्वरको समर्पण कर देना है, किंतु विशेषरूपसे यहाँ ईश्वर - प्रणिधानसे जो सूत्रकारका अभिप्राय है, वह अट्ठाईसवें सूत्रमें कहेंगे सङ्गति — जिसके प्रणिधानसे शीघ्रतम समाधि - लाभ होता है, उस ईश्वरका स्वरूप निरूपण करते हैं-क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ॥ २४ ॥

शब्दार्थ – क्लेश - कर्म - विपाक - आशयैः - क्लेश, कर्म, उनके फल और वासनाओंसे; अपरामृष्टः = न स्पर्श किया हुआ = सम्बन्ध - रहित = असम्बद्ध; पुरुषविशेषः = अन्य पुरुषोंसे विशेष ( विभिन्न, उत्कृष्ट ) चेतन; ईश्वरः = ईश्वर है । अन्वयार्थ – क्लेश, कर्म, कर्मोंके फल और वासनाओंसे असम्बद्ध, अन्य पुरुषोंसे विशेष ( विभिन्न उत्कृष्ट ) चेतन ईश्वर है । व्याख्या – क्लेश – ‘ क्लिश्नन्तीति क्लेशाः ' जो दुःख देते हैं, वे क्लेश कहलाते हैं । वे अविद्या, अस्मिता राग, द्वेष, अभिनिवेश - संज्ञक पाँच प्रकारके हैं, जिनका स्वरूप सूत्र ( २।३, कर्म — इन क्लेशोंसे धर्म - अधर्म अर्थात् शुभ - अशुभ और इनसे मिश्रित ) – में ये बतलाया तीन प्रकारके जायगा । ( ४।७ ) उत्पन्न होते हैं । वेदोंमें विधान किये हुए सब प्राणियोंके कल्याणकी कर्म ( सकाम ) कर्म धर्म और वेदोंमें निषेध किये हुए हिंसात्मक कर्म अधर्म हैं । भावनासे किये हुए ( १ ९ ८ )

पृष्ठ 223

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सूत्र २४ ] क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः * * [ समाधिपाद विपाकः — ‘ विपच्यन्त इति विपाकाः ' जो परिपक्व हो जाते हैं, वे विपाक कहलाते हैं अर्थात् उन सकाम कर्मोंके फल सुख - दुःखरूप जाति, आयु और भोग जिनका सूत्र ( २।१३ ) में वर्णन किया जायगा, विपाक कहलाते हैं । आशयः —— आफलविपाकाच्चित्तभूमौ शेरत इत्याशयाः ' फल पकनेतक जो चित्तभूमिमें पड़ी हुई सोती हैं, वे वासना ‘ आशय ' कहलाती हैं, अर्थात् जो कर्म अभीतक पककर जाति, आयु और भोगरूप फल नहीं दे पाये हैं, उन कर्मफलोंके वासनारूप जो संस्कार चित्तभूमिमें पड़े हुए हैं, वे आशय कहलाते हैं । ( ४।८ ) उपर्युक्त क्लेश - कर्म आदि चारोंसे जो तीन कालमें लेशमात्र भी सम्बद्ध नहीं है, वह अन्य पुरुषोंसे विशेष ( विभिन्न उत्कृष्ट ) चेतन ईश्वर कहलाता है । ईश्वरके अर्थ हैं— ' ईशनशील इच्छामात्रेण सकलजगदुद्धरणक्षमः ' ईशनशील अर्थात् इच्छामात्रसे सम्पूर्ण जगत् के उद्धार करनेमें समर्थ । शङ्का – ' जन्माद् यस्य यतः, इस ब्रह्मसूत्रमें ईश्वरको जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका करनेवालाबतलाया है । इस प्रकारके लक्षण नहीं किये हैं । समाधान — वहाँ प्रकरणानुसार ईश्वरका सामान्य लक्षण बतलाया है । उपासनामें उपास्यके जिस स्वरूपको लेकर उपासना की जाती है, उसके उसी स्वरूपमें अवस्थिति होती है । असम्प्रज्ञात समाधि अर्थात् ब्रह्मके शुद्धस्वरूपमें अवस्थितिके इच्छुक उपासकको संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयसे कोई प्रयोजन नहीं है । उसको क्लेश, सकामकर्म, कर्मों के फल और वासनाओंसे, जो बन्धनके कारण हैं, छुटकारा पाना है । इसलिये ईश्वरके ऐसे विशेष स्वरूपमें उपासना करना उसको बतलाया गया है । शङ्का – क्लेश, कर्म, विपाकादि तो चित्तके धर्म हैं, पुरुष तो ईश्वरके समान सदा असङ्ग और निर्लेप है, इसलिये ईश्वरमें अन्य पुरुषोंसे क्लेशादि धर्मसे रहित होनेकी विशेषता अयुक्त है । समाधान — यद्यपि सभी पुरुषोंमें वास्तविक क्लेशादि नहीं हैं तथापि चित्तमें रहनेवाले क्लेशादिका पुरुषके साथ औपाधिक सम्बन्ध है अर्थात् चित्तमें रहनेवाले क्लेशादि पुरुषमें अविवेकसे आरोपित कर लिये जाते हैं । जैसे योद्धाओंमें ( लड़नेवालोंमें ) जीत - हार होती है, पर वह स्वामीकी कही जाती है अर्थात् जैसे राजा और सेनाका परस्पर स्व - स्वामिभाव - सम्बन्ध होनेसे सेनाकर्तृक ( सेनासे की हुई ) जय - पराजयका स्वामिभूत राजामें व्यवहार होता है; क्योंकि वह उसके फलका भोक्ता है । इसी प्रकार चित्त पुरुषका भी परस्पर स्व - स्वामिभाव - सम्बन्ध होनेसे चित्तमें वर्तमान क्लेशादिका ही पुरुषमें व्यवहार होता और है, क्योंकि वह उसके फलका भोक्ता है । जैसा कठोपनिषद् ( २ । ३ ) में कहा है-आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः । ज्ञानीलोग इन्द्रिय, मनसे युक्त आत्माको भोक्ता कहते हैं ( इन्द्रियादिसे जो युक्त नहीं है वह भोक्ता नहीं है ) । किंतु यह अविवेक - प्रयुक्त औपाधिक क्लेशोंका सम्बन्ध विवेकशील ईश्वरमें सम्भावित नहीं है । यह औपाधिक भोगके सम्बन्धका न होना ही ईश्वरमें अन्य पुरुषोंसे विशेषता है अर्थात् पुरुषके चित्तके साथ एकरूपतापन - सम्बन्धसे जो चित्तके पुरुषमें औपाधिक धर्म आरोपित किये जाते हैं, उन धर्मोंसे असम्बद्ध ( १ ९९ )

पृष्ठ 224

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समाधिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र २४ जो विशुद्ध सत्त्वगुण - प्रधान चित्तोपाधिक नित्य ज्ञान ऐश्वर्यादि धर्मविशिष्ट सत्यकाम, सत्य - सङ्कल्प चेतन है वह ईश्वर - पदका वाच्य है । वह अन्य पुरुषोंसे विशेष है । शङ्का – यदि क्लेशादिसे असम्बद्ध होना ही ईश्वरमें विशेषता है तो मुक्त पुरुष तथा प्रकृतिलय आदि भी ईश्वर - पदका वाच्य हो सकते हैं, क्योंकि क्लेशसे तो उनका भी सम्पर्क नहीं होता है । समाधान — प्रकृतिलय और विदेह योगियोंको प्राकृत - बन्ध होता है तथा अपनी अवधिके अनन्तर संसारमें आनेसे भावी क्लेशोंसे सम्बन्ध होता है । विदेह और प्रकृतिलयोंसे भिन्न दिव्य - अदिव्य विषयोंके भोक्ता, देव, मनुष्यादिकोंको क्रमशः दाक्षिणिक और वैकारिक बन्ध होता है । यद्यपि इन तीनों बन्धोंको काटकर कैवल्यको प्राप्त हुए पुरुष भी मुक्त ही कहलाते ( वास्तवमें तो मुक्ति और बन्धन दोनों अन्तःकरणके ही धर्म हैं, पुरुष उसका द्रष्टा है इसलिये उसमें आरोपित कर लिये जाते ) हैं तथापि वे सदा मुक्त नहीं हैं; क्योंकि क्लेशयुक्त होकर ही योग - साधनके अनुष्ठानद्वारा ही क्लेशोंके बन्धनसे मुक्त हुए हैं, किंतु ईश्वर सर्वदा क्लेशोंसे अपरामृष्ट होनेसे सदा ही मुक्त है । यह सदा मुक्तस्वरूपता ईश्वरमें मुक्त पुरुषों तथा प्रकृतिलयोंसे विशेषता है । शङ्का – ज्ञानस्वरूप ऐश्वर्य तथा पुरुषोंके उद्धारके सत्यसङ्कल्परूप ऐश्वर्यका परिणाम अपरिणामी पुरुषमें होना असम्भव है और यदि यह धर्म चित्तका माना जाय तो सदा मुक्त ईश्वरका चित्तके साथ स्व - स्वामिभाव - सम्बन्ध सम्भव नहीं हो सकता; क्योंकि स्व - स्वामिभाव - सम्बन्ध अविद्यासे होता है । इस प्रकार सदा मुक्त पुरुषविशेषमें स्वाभाविक ऐश्वर्यके अभावसे और चित्तमें स्व - स्वामिभाव - सम्बन्धके असम्भव होनेसे ईश्वरको सदा मुक्त पुरुषविशेष नहीं कहा जा सकता । समाधान — यद्यपि अपरिणामी चेतनभूत ईश्वरमें इन ऐश्वर्योंका परिणाम होना असम्भव है; क्योंकि वह रजस् - तमस्रहित विशुद्ध चित्तका धर्म है और चित्तके साथ नित्यमुक्त ईश्वरका स्व - स्वामिभाव - सम्बन्ध असम्भव है तथापि जैसे अन्य पुरुषोंका अविद्याप्रयुक्त चित्तके साथ स्व - स्वामिभाव - सम्बन्ध है वैसे ईश्वरके साथ अविद्या - प्रयुक्त नहीं है । किंतु वह चित्तके स्वभावको जानता हुआ तीनों तापोंसे दुःखित संसार - सागरमें पड़े हुए जीवोंका ज्ञान एवं धर्मके उपदेशद्वारा उद्धार करनेके लिये विशुद्ध सत्त्वरूप, न कि अज्ञान - प्रयुक्त, चित्तको धारण किये हुए है । इसी प्रकार अज्ञानपूर्वक सङ्गवाले चित्तमें परिणाम होता है । नित्य विशुद्धसत्त्वरूपचित्तमें नित्य - ज्ञान वा प्रेरणाका होना परिणामरूप नहीं है । अविद्याके सम्बन्धसे रहित ईश्वर चित्तके स्वरूपको जानता हुआ पुरुषके भोग, अपवर्ग और धर्म - ज्ञानके उपदेशके लिये विशुद्ध सत्त्वगुणमय चित्तके धारण करनेसे भ्रान्त नहीं कहा जा सकता । ईश्वर विशुद्ध सत्त्वरूप चित्तद्वारा जीवोंके कल्याणार्थ संसारकी रचना करनेमें भ्रान्त नहीं किंतु ज्ञानमय ही है । ईश्वरकी इच्छामात्रसे सब जगत्का उद्धार - रूप ऐश्वर्य अनादि विशुद्ध सत्त्वगुणमय चित्तके योगसे है और विशुद्ध सत्त्वगुणमय, चित्तका योग उत्कृष्ट ज्ञानसे है । विशुद्ध सत्त्वगुणमय चित्त हो तो उत्कृष्ट ज्ञान हो और उत्कृष्ट ज्ञान हो तो विशुद्ध सत्त्वगुणमय चित्त हो । ऐसे अन्योन्याश्रय ( एक - दूसरेका सहारा लेना ) रूप दोष यहाँ नहीं है; क्योंकि ये दोनों ही ईश्वरमें अनादि हैं । इन दोनोंमें कोई किसीकी है । जहाँ अपेक्षा होती है वहीं यह दोष होता है । ईश्वरका उस विशुद्ध सत्त्वगुणमय अपेक्षा नहीं रखता सम्बन्ध है; क्योंकि प्रकृति और पुरुषका संयोग - विभाग अर्थात् पुरुषके भोग - अपवर्गार्थ चित्तके - साथ अनादि सृष्टि, उत्पत्ति ( २०० )

पृष्ठ 225

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सूत्र २४ ] क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः * ** [ समाधिपाद और प्रलय बिना ईश्वर - इच्छा ( सत्य - सङ्कल्प ) के नहीं हो सकती । भाव यह है कि यद्यपि धर्म एवं ज्ञानके उपदेशद्वारा पुरुषोंके उद्धार करनेकी इच्छा होनेसे ईश्वर विशुद्ध सत्त्वस्वरूप चित्तरूप उपाधिको धारण किये हुए हैं और इस उपाधिके धारणसे पूर्वोक्त इच्छा ( सत्य - सङ्कल्प ) होती है । अर्थात् उद्धारकी इच्छा होनेसे ईश्वरको चित्तका ग्रहण करना और चित्तके ग्रहण होनेसे इच्छाका होना; इस प्रकार परस्परकी अपेक्षा होनेसे अन्योन्याश्रित दोष आता है तथापि बीज - अङ्कुरके समान संसारके अनादि होनेसे इस दोषकी निवृत्ति हो जाती है 1 जिस प्रकार अन्य पुरुषोंका चित्त पुरूषसे प्रतिबिम्बित हुआ सुख, दुःख, मोह ( अविद्या ) रूपसे परिणत होता है और योगियोंका चित्त पुरुषसे प्रतिबिम्बित हुआ निर्मल सात्त्विक ज्ञानसे परिणामको प्राप्त होता है; और उनकी ही उपाधिसे पुरुषमें सुख, दुःख और मोहग्रस्त होना तथा निर्मल सात्त्विक ज्ञानसे युक्त होना आरोप किया जाता है वैसा ईश्वरका विशुद्ध सत्त्वगुणमय चित्त नहीं है । वह केवल सात्त्विक परिणाम, उत्कर्ष ( ऐश्वर्यावधि ) वाला है - यह उसमें अन्य पुरुषोंसे विलक्षणता है । उस विशुद्ध सत्त्वगुणमय चित्तमें निरतिशय ऐश्वर्यरूप उत्कृष्टता और वेद विद्यमान रहते हैं । उस विद्यमान उत्कृष्टता और वेदोंका वाच्य वाचकभाव अनादि सम्बन्ध है । अर्थात् ईश्वरके चित्तमें अनादि उत्कृष्टता विद्यमान है और उसी चित्तमें उत्कृष्टताके वाचक वेद भी रहते हैं । इससे यह सिद्ध होता है कि ईश्वर सदा ही ऐश्वर्यवाला और सदा ही मुक्त है । शङ्का – यह जो ईश्वरमें विशुद्ध सत्त्वमय चित्तके ग्रहणद्वारा सर्वोत्कृष्टता बतलायी है, क्या वह उत्कृष्टता सनिमित्त ( किसी शास्त्रके प्रमाणसे सिद्ध ) है वा निष्प्रमाणक है? यदि श्रुति - स्मृतिको उसमें प्रमाण माना जाय तो श्रुति स्मृतिमें क्या प्रमाण है? समाधान — सर्वज्ञ ईश्वरके स्वाभाविक ज्ञानरूप वेद ईश्वरकी सर्वोत्कृष्टतामें प्रमाण हैं; और अन्य प्रमाणद्वारा ईश्वरके निर्भ्रान्त और सर्वज्ञ सिद्ध होनेसे ईश्वरीय ज्ञान वेदकी प्रामाणिकता स्वतःसिद्ध है । यह सर्वज्ञतादिरूप धर्म तथा वेदरूप शास्त्र ईश्वरके विशुद्ध सत्त्वगुणमय चित्तमें विद्यमान हैं और इन दोनोंका परस्पर अनादि निर्मित नैमित्तकभावसम्बन्ध है अर्थात् ईश्वरके चित्तमें वर्तमान विशुद्ध सत्त्वका प्रकर्ष निमित्तकारण है और वेद उसका आविर्भूत है । इस उत्कृष्टतासे ही ईश्वर नित्य - मुक्त और नित्य - ऐश्वर्यशाली कहा जाता है । शङ्का – यदि ईश्वरको न मानकर केवल प्रधान ( मूल - प्रकृति ) को ही पुरुषके भोग अपवर्ग-प्रयोजनके सम्पादनार्थ संसार - रचनामें प्रवृत्त मान लें तो क्या दोष होगा? समाधान – ईश्वररूप प्रेरक न मानकर केवल जड - प्रधानको संसारकी रचनामें प्रवृत्त माननेमें यह दोष होगा कि जड - पदार्थ बिना चेतनकी प्रेरणाके अपने कार्य उत्पन्न नहीं कर सकता है, जैसे कि सारथिके बिना रथ नहीं चल सकता । इसलिये विशुद्ध सत्त्वोपाधिक नित्य - ज्ञान - क्रियैश्वर्यशाली चेतनभूत ईश्वरको मानना ही पड़ेगा । ऐसा ही उपनिषदोंमें बतलाया है— मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् । ( श्वेताश्वतर - उपनिषद् ) माया प्रपञ्च ( संसार ) का उपादानकारण है और मायाका स्वामी प्रेरक परमेश्वर निमित्त - कारण है । अन्य कल्पनाओंका निम्न प्रकार समाधान समझ लेना चाहिये-( २०१ )

पृष्ठ 226

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समाधिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र २५ ईश्वर अनेक नहीं हो सकते । यदि एक - जैसे अनेक हों और उनके अभिप्राय भिन्न - भिन्न हों तो कोई कार्य नहीं चल सकेगा अर्थात् एक चाहे सृष्टि हो और दूसरा चाहे सृष्टि न हो; ऐसी दशामें कुछ भी न हो सकेगा । यदि ईश्वरोंको अनेक मानकर छोटा - बड़ा मानें तो जो बड़ा है वही ईश्वर है, क्योंकि वही ऐश्वर्यकी पराकाष्ठा ( अवधि ) को प्राप्त हो जाता है । इसलिये जिसमें ज्ञान और ऐश्वर्यकी पराकाष्ठा है और जो क्लेश, कर्म आदिसे सदा रहित है, वह सदा मुक्त, नित्य, निरतिशय, अनादि, अनन्त, सर्वज्ञ पुरुष - विशेष ईश्वर है । विशेष विचार ( सूत्र २४ ) – सूत्र चौबीसका सारांश – ईश्वरमें अन्य पुरुषोंसे यह विशेषता है कि वह तीनों कालमें क्लेशादिके सम्बन्धसे रहित है । यद्यपि क्लेशादि चित्तके धर्म हैं न कि असङ्ग, निर्लेप पुरुषके, तथापि चित्तमें रहनेवाले इन क्लेशोंका पुरुषमें औपाधिक सम्बन्ध है अर्थात् पुरुषमें अविवेकसे आरोपित कर लिये जाते हैं; क्योंकि पुरुष ही इनका भोक्ता है, किंतु ईश्वरमें इन औपाधिक क्लेशोंका भी सम्बन्ध नहीं है । ईश्वरमें मुक्त पुरुषोंसे यह विशेषता है कि वे क्लेश - युक्त होकर साधनके अनुष्ठानद्वारा मुक्त हुए हैं; ईश्वर तीनों कालमें मुक्त है । ईश्वरके अर्थ हैं — ईशनशील अर्थात् इच्छामात्र ( संकल्पमात्र ) से सम्पूर्ण जगत् के उद्धार करने में समर्थ । यह जगत्के उद्धारका ऐश्वर्य अनादि है और अनादि विशुद्ध सत्त्वगुणमय चित्तके अनादि योगसे है; और अनादि विशुद्ध सत्त्वगुणमय चित्तका अनादि उत्कृष्ट ज्ञानसे अनादि योग है I इस प्रकार विशुद्ध सत्त्वचित्तके साथ जगत्के उद्धारका ऐश्वर्य तथा उत्कृष्ट ज्ञानके ऐश्वर्यका अनादि योग होनेसे ये दोनों ऐश्वर्य इसमें परिणामरूप नहीं हैं । अन्य चित्तोंसे इस विशुद्ध सत्त्वचित्तमें यह विलक्षणता है कि यह चित्त अन्य चित्तों- जैसा न तो गुणोंका विषम परिणाम है और न इसमें कोई विसदृश परिणाम होता है । यह चित्त विशुद्ध अर्थात् रजस् - तमस् - शून्य सत्त्व । इसी सत्त्वके सम्बन्धसे ईश्वरमें नित्य ज्ञान, नित्य इच्छा, नित्य क्रिया रहती है । ' तीनों तापोंसे दुःखित संसार - सागरमें पड़े हुए जीवोंका उद्धार ज्ञान और धर्मके उपदेशसे करूँ ' इस प्रकारकी इच्छा ( सत्यसंकल्प ) ईश्वरमें सर्वदा रहती है । उपनिषदोंमें भी ऐसा ही कहा गया है—

न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते ।

परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥

न उसका ( मनुष्य - जैसा ) कोई देह है, न इन्द्रियाँ हैं, न उसके कोई बराबर है, न उससे कोई बड़ा है । उसकी उत्कृष्ट शक्ति अनेक प्रकारकी अनादिसे सुनी जाती है; और उसके ज्ञान, बल और क्रिया — ये तीनों स्वाभाविक और नित्य हैं । सङ्गति — अब अगले सूत्रमें ईश्वरकी सर्वज्ञता अनुमान – प्रमाणद्वारा सिद्ध करते हैं— तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम् ॥ २५ ॥

शब्दार्थ – तत्र - उस पूर्वोक्त ईश्वरमें; निरतिशयम् = अतिशयरहित; सर्वज्ञबीजम् अन्वयार्थ – उस पूर्वोक्त ईश्वरमें सर्वज्ञताका बीज अतिशय ( बढ़ती ) - सर्वज्ञताका बीज है । रहित है । व्याख्या – अतीत, अनागत और वर्तमान जो अतीन्द्रिय पदार्थ हैं, उनमें किसीएक या बहुत - से ( २०२ )

पृष्ठ 227

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 227 का मूल पृष्ठ
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सूत्र २५ ] * तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम्* [ समाधिपाद पदार्थोंका जो संयमजयसे ( सत्त्वगुणके न्यूनाधिक होनेसे ) अल्प या अधिक प्रत्यक्ष ज्ञान होता है । वह प्रत्यक्ष ज्ञान सर्वज्ञताका बीज है । संयमजय अर्थात् सत्त्वगुणकी न्यूनाधिकताकी अपेक्षासे कोई योगी किंचित् ही अतीन्द्रिय वस्तुको प्रत्यक्ष कर सकता है । कोई बहुत अतीन्द्रिय वस्तुको प्रत्यक्ष कर सकता है । इस प्रकार ज्ञेय वस्तुओंकी अपेक्षासे प्रत्यक्ष ज्ञान अल्प या बहुत कहा जाता है । प्रथम संयमके जयसे योगीका जो एक या बहुत अतीन्द्रिय पदार्थोंका प्रत्यक्ष ज्ञान होता है, वह सातिशय ज्ञान है । वह सर्वज्ञताका बीजरूप सातिशय ज्ञान वृद्धिको प्राप्त होते - होते जहाँ निरतिशय हो जाय वह सर्वज्ञ है 1 जो वस्तु किसीकी अपेक्षासे न्यून या अधिक हो, वह सातिशय कही जाती है, और जो काष्ठा ( सीमा ) को प्राप्त हुई कहीं विश्रान्त हो जाय, वह निरतिशय कही जाती है जिस ज्ञानके बराबर अथवा अधिक ज्ञान हो, उसको सातिशय ज्ञान; और जिसके बराबर अथवा अधिक ज्ञान न हो अर्थात् जो काष्ठाको प्राप्त हो जाय, उसको निरतिशय ज्ञान कहते हैं । यह प्रथम संयमजयसे उत्पन्न हुआ जो योगियोंमें सर्वज्ञताका बीजरूप सातिशय ज्ञान है, वह सातिशय होनेसे वृद्धिको प्राप्त होते - होते काष्ठाको प्राप्त होकर एक सीमापर पहुँचकर निरतिशय हो जायगा; क्योंकि जो पदार्थ न्यूनाधिक रूप ( कम - ज्यादापन ) धर्मविशिष्ट होनेसे सातिशय होता है, वह अवश्य ही कहीं काष्ठाको प्राप्त होकर निरतिशय हो जाता है । जैसा कि अणु ( छोटा ) परिमाण परमाणुओं में और महत् ( बृहत् अर्थात् बड़ा ) परिमाण आकाशमें काष्ठा ( अन्तिम सीमा ) को प्राप्त हो जाता है अर्थात् अणु परिमाणकी विश्रान्ति परमाणुमें और महत् परिमाणकी विश्रान्ति आकाशमें है; क्योंकि परमाणुसे अधिक कोई छोटा नहीं है और आकाशसे अधिक कोई बृहत् ( बड़ा ) नहीं है । ऐसे ही सर्वज्ञताका बीजरूप अतीन्द्रिय वस्तुविषयक योगीका ज्ञान सातिशय है, क्योंकि उस योगीके ज्ञानसे किसी दूसरे योगीका ज्ञान अधिक होता है । इस प्रकार बढ़ते - बढ़ते जहाँ परम काष्ठाको प्राप्त होकर यह निरतिशय ज्ञान हो जाय, वही सर्वज्ञ, सदा मुक्त ईश्वर है । जिस प्रकार ज्ञानकी काष्ठाका आधार ईश्वर बतलाया है, इसी प्रकार धर्म, वैराग्य, ऐश्वर्य, श्री, यश, प्रभूति और सम्पत्तिकी काष्ठाका भी आधार ईश्वरको जानना चाहिये । भाष्यकार लिखते हैं कि यह सामान्य दृष्टिसे अनुमानद्वारा ईश्वरके सर्वज्ञ होनेका समाधान है । यह विशेष - प्राप्तिमें समर्थ नहीं है । उसके नाम, महिमा, प्रभाव आदिकी विशेष - प्राप्ति वेदोंमें खोजनी चाहिये । संसारकी रचनामें ईश्वरका कोई अपना अनुग्रह नहीं है । इसमें जीवोंका भोग -अपवर्गरूप अनुग्रह करना ही प्रयोजन है । इस दयालुताहीके कारण ' ज्ञान और धर्मोपदेशद्वारा सांसारिक पुरुषोंका मैं उद्धार करूँगा ' इस भावसे कल्प प्रलय और महाप्रलयके पीछे सृष्टिके आरम्भमें वेदोंका उपदेश करता है जैसे कपिलमुनिने योगबलसे निर्माण किये हुए चित्तको ( अपने संकल्पसे रचे हुए न कि कर्मोंसे विवश मिले हुएको ) आश्रयण कर बिना किसी अपने प्रयोजनके केवल सृष्टिके अनुग्रहके लिये उनके कल्याणार्थ करुणा करके जिज्ञासु आसुरी ब्राह्मणको समाधिद्वारा अनुभव कराके पच्चीस तत्त्ववाले तत्त्व - समासरूपी सांख्य दर्शनका उपदेश दिया । * 1 – उस ईश्वरमें सर्वज्ञताका बीज ( सर्वज्ञताका कारण होनेसे बीजके * भोजवृत्तिका भाषानुवाद ( सूत्र २५ ) - सदृश बीज अर्थात् कारण ) भूत, भविष्यत्, वर्तमान पदार्थोंके ज्ञानका अल्पत्व- महत्त्व निरतिशय है अर्थात् अवधिको ( २०३ )

पृष्ठ 228

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समाधिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप* * [ सूत्र २६ सङ्गति – पूर्वसूत्रोक्त अनुमानद्वारा ब्रह्मा आदि ही निरतिशय ज्ञानका आधार क्यों नहीं होते? इस आशङ्काके निवारणार्थ अगले सूत्रमें ब्रह्मादिकोंसे भी ईश्वरमें विशेषता बतलाते हैं— पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् ॥ २६ ॥

शब्दार्थ – पूर्वेषाम् = पूर्व उत्पन्न ब्रह्मादिकोंका; अपि = भी; गुरुः = ( वह ईश्वर ) उपदेष्टा है; कालेन - अनवच्छेदात्- क्योंकि वह कालसे अवच्छिन्न ( परिमित ) नहीं है । अन्वयार्थ — वह ईश्वर पूर्व उत्पन्न हुए ब्रह्मादिकोंका भी गुरु है; क्योंकि वह कालसे परिच्छिन्न ( परिमित ) नहीं है । व्याख्या – गुरु उपदेष्टाका और पूज्यका नाम है । कालेन - अवच्छिन्न - कालसे परिच्छिन्न अर्थात् जो किसी कालमें हो और किसी कालमें न हो । अतः कालेन - अनवच्छिन्न ( कालसे अपरिच्छिन्न ) के अर्थ सर्वकालमें विद्यमानके हैं । जैसे ब्रह्मादि सृष्टिसे पूर्व और महाप्रलयके अनन्तर उत्पत्ति - विनाशशील होनेसे काल - परिच्छिन्न हैं, वैसे ईश्वर नहीं है; क्योंकि वह सर्वदा विद्यमान होनेसे कालकी परिच्छिन्नतासे रहित है । इसलिये ब्रह्मादिकोंको ज्ञान प्रदान करनेसे ईश्वर उन सबका गुरु और उपदेष्टा है । जैसा वर्तमान सर्गके आदिमें ईश्वर ज्ञान - ऐश्वर्य - युक्त सिद्ध है, वैसे ही पूर्व सर्गोंके आदिमें भी इस प्रकार विद्यमान होनेसे ईश्वर ही अनादि, सर्वज्ञ, निरतिशय, ज्ञानका आधार है, ब्रह्मादि नहीं हैं । जैसा यजुर्वेदीय श्वेताश्वतरोपनिषद् में बतलाया गया है-यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥ ( ६ । १८ ) जिस ईश्वरने सृष्टिके आदिमें ब्रह्माको उत्पन्न किया और जिसने ब्रह्माके हृदयमें स्वर, पाठ, रहस्य और अर्थसहित वेद - ज्ञानका प्रकाश किया, उस आत्मदेवकी मैं मुमुक्षु शरण लेता हूँ । विशेष वक्तव्य — इस सूत्रमें ईश्वरको कालकी सीमासे परे गुरुओंका गुरु बतलाया गया है । राजा, प्रजा, स्वामी, सेवक आदि भावनाओंमें भेदभाव तथा स्वार्थसिद्धिकी सम्भावना रहती है । माता - पिताका भी पुत्रके प्रति मोह हो सकता है; किंतु गुरु - शिष्यका सम्बन्ध केवल आध्यात्मिक है, जिसमें केवल ज्ञान - प्राप्ति और आत्मोन्नति ही उद्देश्य होता है; इसलिये सूत्रमें ईश्वरको गुरुओंके गुरुकी भावनासे उपासना बतलायी गयी है । प्राप्त हो गया है । जो सातिशय अल्पत्व, महत्त्व आदि धर्म हैं, उनकी अवधि देखी गयी है, जैसे परमाणुओंमें और आकाशमें महत्त्वकी, ऐसे ही उच्च, नीच भावमें देखे हुए ज्ञान आदि चित्तके धर्म कहीं निरतिशय अल्पत्वकी वे निरतिशय हैं, वह ईश्वर है । यद्यपि इससे यह बोध नहीं होता कि जिसमें वे निरतिशय होते हैं । जिसमें अन्य क्यों नहीं; तथापि ‘ यः सर्वज्ञः स सर्ववित् ' इत्यादि उपनिषद् - वाक्य आदिके हैं वह ईश्वर ही क्यों है, कोई जानने चाहिये । ईश्वरका कोई प्रयोजन नहीं, तो वह जीव और प्रकृतिका प्रमाणसे ईश्वरके ही सर्वज्ञत्वादि धर्म करनी चाहिये, क्योंकि दयालु होनेसे प्राणियोंके ऊपर दया करना ही क्यों संयोग - वियोग करता है? यह शङ्का नहीं ( इच्छा - विशेष ) है कि ‘ कल्पोंके प्रलय और महाप्रलयोंमें सब प्राणियोंका उसका उद्धार प्रयोजन करूँ है । यह ईश्वरका अध्यवसाय प्रयोजन है ॥ ' जो जिसको इष्ट है वही उसका ( २०४ )

पृष्ठ 229

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सूत्र २६ ] पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात्: ** * [ समाधिपाद योग - मार्गमें गुरुओंको शिष्योंसे अपनी शकल या अपनी मूर्तिका ध्यान करवाना श्रेष्ठ नहीं है । वास्तविक गुरु होनेका अधिकारी वही हो सकता है, जो गुरुओंके गुरु ईश्वरतक पहुँचावे और उसका ही प्रणिधान अर्थात् उसके ही सब कुछ समर्पण करना सिखलावे । साधकोंको अपने इस आध्यात्मिक मार्गमें सच्चे पथदर्शककी खोज करनेमें पूरा सचेत रहना चाहिये । योग - मार्गमें पथदर्शक़का अनुभवी होना तो आवश्यक है ही, किंतु निम्न विशेषताओंपर भी पूरा ध्यान रखना चाहिये । पथदर्शक किसी विशेष शक्ति अथवा किसी विशेष देवी - देवताके संकीर्ण उपासनाभावसे परे होकर केवल एक सर्वज्ञ सर्वव्यापक सर्वशक्तिमान् परमगुरु परमेश्वरका उपासक हो । जन्मसे जात - पात, मत - मतान्तरोंकी संकीर्णता तथा साम्प्रदायिक पक्षपातसे परे होकर प्राणिमात्रमें एक ही शुद्ध चेतन परमात्मतत्त्वको देखता हुआ सभीका शुभचिन्तक हो । जो साधकोंके केवल गुण, कर्म, स्वभाव और सात्त्विक संस्कारोंपर दृष्टि डालता हुआ उनको उनके अन्तिम लक्ष्यपर पहुँचानेमें प्रयत्नशील हो । साधकोंसे धन, सम्पत्ति, मान, प्रतिष्ठा आदिका इच्छुक न हो अथवा जो केवल अपने सम्प्रदायके फैलाने तथा शिष्य - मण्डलीके बढ़ानेका इच्छुक न हो, अपितु निःस्वार्थ भावसे बिना किसी वैयक्तिक लगावके समदृष्टिसे सभीको आत्मोन्नतिमें सहायता देनेमें तत्पर हो । जो दुनियाके राग - द्वेष आदि सारे प्रपञ्चों तथा पाखण्डों और बनावटसे परे होकर निरभिमान — निरहंकारताके साथ आत्मचिन्तनमें रत हो । पथप्रदर्शकपर इस प्रकार दृष्टि डालनेसे पूर्व साधकोंको स्वयं अपने अंदर देखना चाहिये । क्या हमारी जिज्ञासा सच्ची और वैराग्य तीव्र है? क्या हम सांसारिक कामनाओं, धन - सम्पत्ति, मान - प्रतिष्ठा अथवा अन्य किसी प्रकारकी स्वार्थ- दृष्टिसे इस मार्गमें प्रवेश नहीं कर रहे हैं? क्या हमारा प्राणिमात्रके प्रति स्वात्मा - जैसा प्रेम - भाव है? क्या हम जन्मसे जात - पात, मत - मतान्तर और साम्प्रदायिक संकीर्णताके कूप - मण्डूक तो नहीं हैं? क्या हम अपने पथदर्शकको धोका तो नहीं दे रहे हैं? क्या हम तपस्वी जीवन बिताने और पथदर्शककी सच्ची एवं हितकारी शिक्षाको ग्रहण करने और पालन करनेके लिये तैयार हैं? इत्यादि । ( श्रीगुरु - महिमा )

गुरु गोविन्द दोनों खड़े काके लागूँ पाय ।

बलिहारी गुरुदेव की जिन गोविन्द दियो बताय ॥

गुर बिनुभव निधि तरइ न कोई । जौं बिरंचि संकर सम होई ॥

( तुलसीकृत रामायण ) गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो

महेश्वरः ।

गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

अर्थ- गुरु ब्रह्माके समान है, गुरु विष्णुके समान है एवं गुरु भगवान् शङ्करके समान है । गुरु तो साक्षात् ब्रह्म है, इसलिये उस गुरुको नमस्कार है ।

हौं शिव शाक्त बनूँ न भजूँ चतुरानन विष्णु न इन्द्र मनाऊँ ।

तीर्थ बसूँ नहिं ताप तयूँ गिरि कन्दर अन्तर ध्यान लगाऊँ ॥

( २०५ )

पृष्ठ 230

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समाधिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप [ सूत्र २७

फेरूँ नहीं मठ मन्दिर में करमाल मणी, निज जोति जगाऊँ ।

पूज्य सिरी गुरु के चरणों पर " ब्रह्म " सदैव ही सीस नवाऊँ ॥

हों सब कष्ट विषाद विनष्ट वितान समुन्नति के तन जावें ।

वाञ्छित हो फल प्राप्त सदा दिन सौख्य सुधारस में सन जावें ॥

जीव सहाय अजा अनुकूल रहे मल अन्तर के हन जावें ।

जो गुरु " ब्रह्म " दया कर दें तब देव दयालु सभी बन जावें ॥

( बाबूराम " ब्रह्म " कवि ) सङ्गति — इस प्रकार ईश्वरका निरूपण करके अब उसका प्रणिधान किस प्रकार करना चाहिये; यह बतलानेके लिये उसका वाचक ( नाम ) अगले सूत्रमें बतलाते हैं— तस्य वाचकः प्रणवः ॥ २७ ॥

शब्दार्थ – तस्य - उस ईश्वरका; वाचकः - बोधक शब्द ( नाम ); प्रणवः = ओ ३ म् है । अन्वयार्थ — उस ईश्वरका बोधक शब्द ओ ३ म् है । व्याख्या – जिस अर्थका बोधक जो शब्द होता है, वह शब्द उस अर्थका वाचक कहलाता है और जिस वाचक शब्दसे जो बोध्य अर्थ होता है, वह अर्थ उस शब्दका वाच्य कहलाता है । जैसे गौ ( गाय ) शब्द वाचक है और सास्ना ( गौओंके गलेमें कम्बल - सा लटका हुआ मांस ) – पुच्छ आदिवाला पशुविशेष -वाच्य है । वाचक, बोधक, अभिधायक, संज्ञा, नाम एकार्थक हैं । इसी प्रकार वाच्य, बोध्य, अभिधेय, संज्ञी, नामी भी समानार्थक हैं । प्रकर्षेण नूयते स्तूयतेऽनेनेति नौति, स्तौतीति वा प्रणव ओंकारः । ( भोजवृत्ति ) नम्रतासे स्तुति की जाय जिसके द्वारा अथवा भक्त जिसकी उत्तमतासे स्तुति करता है, वह ' प्रणव ' कहलाता है । वह ‘ ओ ३ म् ' ही है । इस ओ ३ म्का और ईश्वरका वाच्य - वाचक - भाव सम्बन्ध है अर्थात् निरतिशय ज्ञान - क्रियाकी शक्तिरूप ऐश्वर्यवाला व्यापक ईश्वर वाच्य है, अभिधेय है और ओ ३ म् वाचक, बोधक और अभिधायक है । भाष्यकार इस सम्बन्धको प्रश्नोत्तरद्वारा नित्य सिद्ध करते हैं । यथा— प्रश्न — क्या वह ईश्वर और प्रणवका वाच्य - वाचक - भाव सम्बन्ध संकेत - कृत ( संकेत - जन्य ) है? या दीपक - प्रकाशवत् संकेतद्योत्य अर्थात् दीपकके प्रकाशके सदृश विद्यमान ही संकेतसे ज्ञात कराया हुआ है? यदि संकेतसे वाच्य - वाचक - भाव सम्बन्धकी उत्पत्ति मानी जायगी तो जन्य ( उत्पत्तिवाला ) होनेसे सम्बन्ध अनित्य कहा जायगा; और यदि संकेतसे उत्पन्न नहीं होता, किंतु ज्ञात कराया जाता संकेतको द्योतक ( ज्ञान करानेवाला ) माना जाय तो सम्बन्ध नित्य कहा जायगा । इन दोनोंमेंसे है, इस कौन प्रकार - सा सम्मत है? प्रष्टाका यह भाव है । उत्तर — यह ईश्वर और ओ ३ म्का वाच्य - वाचक - भाव सम्बन्ध नित्य है । प्रकाशितमात्र होता है, नया उत्पन्न नहीं होता है । जैसे पिता और पुत्रका सम्बन्ध केवल वर्णोंके संकेतसे नया कल्पित नहीं करता, किंतु केवल बतलाया जाता है कि ' यह विद्यमान ही होता है, उसे कोई इसका पिता है, यह इसका पुत्र है । ' ( २०६ )