पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 241–250

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 241–250

पृष्ठ 241

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समाधिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र २ ९ तमोगुण रजोगुणको इतना दबा लेता है कि सूक्ष्म शरीर स्वप्नमें भी कार्य करनेमें असमर्थ हो जाता है तब सुषुप्ति - अवस्था आती है; इस अवस्थामें केवल कारण शरीरमें ही कार्य होता है । कारण - शरीरके तमसे आच्छादित हो जानेके कारण केवल अभावकी प्रतीति होती है । इसके अतिरिक्त तमोगुणके अन्धकारमें न कुछ बाहरका ज्ञान होता है और न भीतरका । इसी प्रकार जब समाधिकी एकाग्रता बढ़नेपर सत्त्व रजस्को इतना दबा देता है कि सूक्ष्म शरीर एकाग्रतावाली वृत्ति दिखानेमें भी असमर्थ हो जाता है, तब सत्त्वके अत्यन्त प्रकाशमें विवेकख्याति उत्पन्न होती है; विवेकख्यातिका कार्य कारण शरीरमें होता है । इसमें आत्माकी चित्तसे भिन्नता प्रतीत होती है अर्थात् चित्तद्वारा आत्माका साक्षात् होता है, किंतु यह आत्माका शुद्ध स्वरूप नहीं है, इसलिये यह स्वरूपावस्थिति नहीं है । विवेकख्याति भी एक वृत्ति ही है; क्योंकि इसमें भी रजोगुण कुछ अंशमें बना रहता है, जो इस वृत्तिके उदय होनेका कारण है । जब इसका भी निरोध हो जाता है, तब इस कारण - शरीरसे भी भिन्न जो आत्माका अपना निजी शुद्ध परमात्मस्वरूप है, उसमें अवस्थिति होती है । ओंकारका भावनामय चित्र ( १ ) विराम = शुद्ध, निर्गुण, उपाधिरहित, चेतन अर्थात् परमात्मतत्त्व ( चेतन तत्त्वका शुद्ध स्वरूप ) । ( २ ) मकार = चेतनतत्त्व + समष्टि कारण - जगत् तथा व्यष्टि कारण - शरीर । समष्टि कारण जगत्का अधिष्ठाता ' ईश्वर ' उपास्य; व्यष्टि कारण- शरीरका अभिमानी ' प्राज्ञ ' उपासक ( चेतन - तत्त्वका शबल - स्वरूप ) । ( ३ ) उकार = चेतनतत्त्व + समष्टि सूक्ष्म जगत् तथा व्यष्टि सूक्ष्म शरीर । समष्टि सूक्ष्म जगत्का अभिमानी ‘ हिरण्यगर्भ ' उपास्य तथा व्यष्टि सूक्ष्म शरीरका अभिमानी ' तैजस ' उपासक ( चेतन- -तत्त्वका शबल - स्वरूप ) । ( ४ ) अकार = चेतनतत्त्व + समष्टि स्थूलजगत् तथा व्यष्टि स्थूलशरीर । समष्टि स्थूल जगत्का अभिमानी ‘ विराट् ’ उपास्य तथा व्यष्टि स्थूल शरीरका अभिमानी ' विश्व ' उपासक ( चेतन - तत्त्वका शबल - स्वरूप ) । सङ्गति — सूत्र २३ में असम्प्रज्ञात -समाधिका साधन ईश्वर - प्रणिधान और सूत्र २८ में ईश्वर - प्रणिधानका स्वरूप तथा उससे प्राप्त असम्प्रज्ञात - समाधिको बतलाकर उस विषयको समाप्त कर दिया । अब यहाँ अगले सूत्रमें असम्प्रज्ञात -समाधिसे पूर्व ईश्वर - प्रणिधानका विशेष फल दिखाते हैं-ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च ॥ २ ९ ॥ = शब्दार्थ — ततः - उस ईश्वर - प्रणिधानसे; प्रत्यक्चेतना = प्रत्यक्चेतना ( जीवात्मा ) का; अधिगमः होता है । प्राप्ति ( साक्षात्कार ); अपि = भी होता है; अन्तरायाभावः च = और अन्तरायोंका अभाव ) का अन्वयार्थ — उस ईश्वर - प्रणिधानसे प्रत्यक्चेतनाका ज्ञान भी होता है और अन्तरायों ( विघ्नों अभाव होता है । - प्रत्यक्चेतना = प्राज्ञ । व्याख्या-( २१६ )

पृष्ठ 242

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सूत्र ३० ] व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानः * * [ समाधिपाद विषयप्रातिकूल्येन स्वान्तःकरणाभिमुखमञ्चति या चेतनादृक्शक्तिः सा प्रत्येक्चेतना । ( भोजवृत्ति ) जो दृक्शक्ति विषयोंको छोड़कर अपने अन्तःकरणमें सम्मुख प्रवृत्त होती है, वह प्रत्यक्चेतना है । ईश्वर - प्रणिधानसे केवल शीघ्रतम समाधिका ही लाभ नहीं होता है, किंतु अन्तराय ( विघ्न ) जिनका वर्णन अगले सूत्रमें किया जायगा, उनकी निवृत्तिपूर्वक प्रत्यक्चेतनाके स्वरूपका भी साथ - ही - साथ साक्षात्कार हो जाता है । इसीके बोधनार्थ सूत्रमें ' अपि ' पद दिया है । भाव यह है कि उपास्यके जिन गुणोंकी भावना करके उपासक ध्यान करता है, उन्हीं गुणोंका उपासकमें समावेश होता है । जैसे ईश्वर चेतन, कूटस्थ नित्य है और क्लेशादिकोंसे रहित है, वैसे ही वास्तवमें जीवात्मा भी चेतन, कूटस्थ नित्य और क्लेशादिकोंसे रहित है । इस सादृश्यतासे ईश्वरके ध्यानरूप प्रणिधानसे प्रणिधान - कर्ताको अपने शुद्ध निर्विकार स्वरूपका भी प्रत्यक्ष ज्ञान होता है । तात्पर्य यह है कि अत्यन्त विरुद्ध धर्मवाले पदार्थोंमें एकके ध्यानसे दूसरे विरुद्ध धर्मवाले पदार्थका साक्षात्कार नहीं हो सकता, किंतु सदृश पदार्थोंमें एकके ध्यानसे दूसरे सदृश पदार्थका भी साक्षात्कार हो सकता है । जैसे एक शास्त्रके अभ्याससे सदृश अर्थवाले दूसरे शास्त्रका भी ज्ञान हो जाता है । इससे यह अभिप्राय है कि व्यवधानका अभाव होनेसे ईश्वर - प्रणिधानसे प्रथम ईश्वरका साक्षात्कार न होकर प्रणिधान - कर्त्ताको अपने कूटस्थ नित्य शुद्ध स्वरूपका ही साक्षात्कार हो जाता है और योग - विघ्नोंका अभाव हो जाता है । वाचस्पति मिश्र लिखते हैं कि-प्रतीपं विपरीतम् अञ्चति, विजानातीति प्रत्यक् स चासौ चेतनश्च । जो विपरीत जानता और चेतन है, उसको प्रत्यक्चेतन कहते हैं, अर्थात् अविद्याविशिष्ट जीव । ईश्वर - चिन्तनसे जीवका यथार्थ स्वरूप जाना जाता है । यद्यपि अन्यके चिन्तनसे अन्यका ज्ञान नहीं होता; किंतु जीव ईश्वरसे चेतनता धर्ममें सदृश है, इससे सदृश वस्तुका ज्ञान हो सकता है । वस्तुतः ' प्रति - प्रतिवस्तु अञ्चति गच्छति सर्वानुगती भवति ' प्रत्येक वस्तुके प्रति जाता है अथवा सबमें अनुगत ( व्याप्त ) होता है ( वह प्रत्यक् है ) – इस व्युत्पत्तिसे ' प्रत्यक् ' शब्दसे ईश्वरको भी ले सकते हैं, तब ईश्वरोपासनासे जीव - ईश्वर दोनोंका ज्ञान होता है । विशेष वक्तव्य सूत्र २ ९ – प्रत्यक्- चेतना प्राज्ञका बोधक है और प्राज्ञ पुरुषसे प्रतिबिम्बित ( प्रकाशित ) चित्त, अर्थात् कारण - शरीरके सम्बन्धसे आत्माका नाम है । इसलिये तीन मात्रावाले पूरे ओम्की उपासनाकी अस्मिता - भूमिमें प्रत्यक्चेतनाका साक्षात्कार होता है । चित्तके उच्चतम एकाग्रताकी अवस्थामें रजस् - तमस्का आवरण हट जानेसे सत्त्वकी स्वच्छता और निर्मलतामें योगके अन्तरायोंका भी अभाव हो जाता है । असम्प्रज्ञात - समाधिसे पूर्व ईश्वर - प्रणिधानका यह विशेष फल है सङ्गति – ईश्वर - प्रणिधानसे जिन अन्तरायोंका अभाव बतलाया है, उन चित्तको एकाग्रताको हटानेवाले योगके विघ्नोंका स्वरूप अगले सूत्रमें निर्देश करते हैं— विक्षिप्त करके व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमि-कत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः ॥ ३० ॥

शब्दार्थ – व्याधित्वानि = व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन, ( २१७ )

पृष्ठ 243

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समाधिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र ३१ अलब्ध - भूमिकत्व और अनवस्थितत्व; चित्तविक्षेपाः चित्तके विक्षेप; ते - वे; अन्तरायाः = =: - विघ्न हैं 1 अन्वयार्थ – व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन, अलब्ध - भूमिकत्व, अनवस्थितत्व — ये चित्तके नौ विक्षेप ( योगके ) विघ्न हैं । व्याख्या – व्याधि - धातु, रस और करणको विषमतासे उत्पन्न हुए ज्वरादिक व्याधि कहलाते हैं 1 वात, पित्त, कफ इन तीनोंका नाम दोष है । रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र- ये सात धातु हैं । इनकी इयत्ता ( अंदाज ) को त्यागकर न्यूनाधिक हो जाना धातुकी विषमता अथवा दोष - प्रकोप कहा जाता है । भुक्त - पीत ( खाये - पीये ) अन्न - जलके परिपाक दशाको प्राप्त हुए सारका नाम रस है । खाये - पीये अन्न - जलका सम्यक् - रूपसे ( ठीक - ठीक ) न पचना रसकी विषमता है । करण नेत्रादि इन्द्रियोंका नाम है । कम देखना, कम सुनना आदि करणकी विषमता है । स्त्यान — चित्तकी अकर्मण्यता अर्थात् इच्छा होनेपर भी किसी कार्यको करनेकी ( योगसाधनके अनुष्ठानकी ) सामर्थ्य न होना । संशय – ‘ मैं योगसाधन कर सकूँगा कि नहीं कर सकूँगा, करनेपर भी योग सिद्ध होगा या नहीं ' इन दो कोटियोंका विषय करनेवाला ज्ञान संशय है । प्रमाद - समाधिके साधनोंका अनुष्ठान न करना । आलस्य - चित्त अथवा शरीरके भारी होनेके कारण ध्यान न लगना । शरीरका भारीपन कफ आदिके प्रकोपसे और चित्तका भारीपन तमोगुणकी अधिकतासे होता है । अविरति - विषयोंमें तृष्णा बनी रहना अर्थात् विषयेन्द्रिय - संयोगसे चित्तकी विषयोंमें होनेसे तृष्णा वैराग्यका अभाव । भ्रान्तिदर्शन – मिथ्या - ज्ञान ( योगके साधनों तथा उनके फलको मिथ्या जानना ) । अलब्ध - भूमिकत्व — किसी प्रतिबन्धक - वश समाधि - भूमिको न पाना अर्थात् समाधिमें न पहुँचना । अनवस्थितत्व — समाधि - भूमिको पाकर भी उसमें चित्तका न ठहरना अर्थात् ध्येयका साक्षात् करनेसे पूर्व ही समाधिका छूट जाना । उपर्युक्त नौ विघ्न एकाग्रतासे हटानेवाले हैं और चित्तकी वृत्तियोंके साथ होते हैं, उनके अभावमें नहीं होते । इस कारण चित्तके विक्षेप योगके मल, योगके अन्तराय और योगके प्रतिपक्षी कहलाते हैं । सङ्गति — केवल पूर्वोक्त नौ ही योगके प्रतिबन्धक नहीं हैं, किंतु उनके वर्तमान होनेपर अन्य प्रतिबन्धक भी उपस्थित हो जाते हैं, जिनके स्वरूपका अगले सूत्रमें निर्देश करते हैं-दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः ॥ ३१ ॥

शब्दार्थ – दुःख - दुःख; दौर्मनस्य = दौर्मनस्य; अङ्गमेजयत्व - अङ्गमेजयत्व; श्वासप्रश्वासाः - पाँच श्वास अन्य और प्रश्वास; विक्षेपसहभुवः - विक्षेपोंके साथ होनेवाले हैं अर्थात् पूर्वोक्त अन्तरायोंके होनेसे यह प्रतिबन्धक भी उपस्थित हो जाते हैं । -ये विक्षेपोंके साथ होनेवाले हैं अर्थात् उनके अन्वयार्थ – दुःख, दौर्मनस्य, अङ्गमेजयत्व, श्वासप्रश्वास — होनेसे ये पाँच प्रतिबन्धक भी उपस्थित हो जाते हैं । , व्याख्या – दुःख – पीड़ा जिसकी चोट खाकर उसके नाश करनेका यत्न करते हैं, वह आध्यात्मिक ( २१८ )

पृष्ठ 244

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सूत्र ३२ ] * तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः * [ समाधिपाद आधिभौतिक और आधिदैविक भेदसे तीन प्रकारका है । उनमेंसे ( क ) काम, क्रोध आदिजन्यमानस परिताप और व्याधि आदिजन्य शारीरिक परिताप आध्यात्मिक दुःख कहलाते हैं । आत्मा यहाँ मन तथा शरीरके अर्थमें प्रयोग हुआ है । ( ख ) सिंह, सर्प आदि भूतोंसे जन्य दुःख आधिभौतिक हैं । भूत यहाँ प्राणियोंके अर्थमें प्रयोग हुआ है । ( ग ) विद्युत्पात, अति - वर्षण, अग्नि, अति - वायु आदि दैविक शक्तियोंसे जन्य दुःख आधिदैविक हैं । दौर्मनस्य – इच्छाकी पूर्ति न होनेपर मनमें क्षोभ होना । अङ्गमेजयत्व — शरीरके अङ्गोंका काँपना । श्वास — बिना इच्छाके बाहरके वायुका नासिकाद्वारा अंदर आना । प्रश्वास — बिना इच्छाके भीतरके वायुका नासिका छिद्रोंद्वारा बाहर निकलना । ये विक्षेपोंके साथ होनेवाले उपविक्षेप अथवा उपविघ्न हैं । सङ्गति – उपर्युक्त विक्षेप और उपविक्षेप विक्षिप्त चित्तवालोंको ही होते हैं, एकाग्र चित्तवालोंको नहीं होते । इन समाधिके शत्रुओंको अभ्यास - वैराग्यद्वारा निरोध करना चाहिये । उन दोनोंमेंसे अभ्यासके विषयको उपसंहार करनेके लिये अगला सूत्र है— तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः ॥ ३२ ॥

शब्दार्थ - तत् - उन पूर्वोक्त विक्षेप तथा उपविक्षेपोंके; प्रतिषेधार्थम् = दूर करनेके लिये; एकतत्त्व - अभ्यासः = एकतत्त्वका अभ्यास करना चाहिये अर्थात् किसी अभिमत एक तत्त्वद्वारा चित्तकी स्थितिके लिये यत्न करना चाहिये । अन्वयार्थ — उन पूर्वोक्त विक्षेप तथा उपविक्षेपोंको दूर करनेके लिये एकतत्त्वका अभ्यास करना चाहिये अर्थात् किसी अभिमत एक तत्त्वद्वारा चित्तकी स्थितिके लिये यत्न करना चाहिये । व्याख्या – विक्षेप तथा उपविक्षेपोंको दूर करनेके लिये किसी एक अभिमत ( इष्ट ) तत्त्वमें चित्तको बार - बार लगाना चाहिये अर्थात् किसी अभिमत एक तत्त्वद्वारा चित्तकी स्थितिके लिये यत्न करना चाहिये । इस प्रकार एकाग्रताके उदय होनेपर सब विक्षेपोंका नाश हो जाता है । यह एक साधारण उपाय है । सबसे उत्तम उपाय तो ईश्वर - प्रणिधान है, जिसको सूत्र २ ९ में बतला दिया गया है 1 योगवार्त्तिककार विज्ञानभिक्षु तथा भोजवृत्तिकारने इस सूत्रमें एकतत्त्वाभ्याससे किसी एकतत्त्वके अभ्यासका अर्थ ग्रहण किया है और वाचस्पति मिश्रने एकतत्त्वका अर्थ प्रधान इष्ट अभिमत प्रधान तत्त्वको ईश्वर मानकर ईश्वर - प्रणिधानका अर्थ ग्रहण किया है । असम्प्रज्ञात तत्त्व और ईश्वर - प्रणिधानका फल विक्षेपोंकी निवृत्ति सूत्र २ ९ में बतला दिया है, पुनः उसी बातका - समाधिसे पूर्व लिये एक नये सूत्रकी रचना अनावश्यक है । इसलिये एकतत्त्वसे किसी निर्देश करनेके ही ठीक हो सकता है और सूत्र ३४ से ३ ९ तक जो चित्तकी स्थितिके इष्ट उपाय अभिमत बतलाये तत्त्वका अर्थ लेना हैं, इनका इसी सूत्रसे सम्बन्ध है । टिप्पणी ॥ ३२ ॥ — -इस सूत्रमें व्यास - भाष्यके आधारपर वाचस्पति

कई भाष्यकारोंने क्षणिकवाद मतको हटाकर ' सोऽहम् ' ' मैं वही मिश्र आदि बौद्धधर्मके पश्चात्के की है, अर्थात् एक ही चित्त अनेक विषयोंका ग्रहण करनेवाला हूँ ' है, इत्यादि नहीं तो प्रत्यभिज्ञासे ' जिसको चित्तकी स्थिरता सिद्ध मैंने देखा था उसीको ( २१ ९ )

पृष्ठ 245

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समाधिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र ३२ स्पर्श करता हूँ ' यह ज्ञान न हो, इत्यादि निरूपण किया है । सूत्रकी व्याख्यामें इसका प्रसङ्ग न देखकर तथा विस्तारके भयसे वहाँ न देकर पाठकोंकी जानकारीके लिये उसको यहाँ लिख देते हैं— बुद्ध भगवान्‌के शिष्य क्षणिक - विज्ञानवादी योगाचारके मतानुयायी जो वैनाशिक लोग हैं, उनके मतमें सब पदार्थ क्षणिक हैं । जो वस्तु एक क्षणमें होकर दूसरे क्षणमें नष्ट हो जाय, उसे क्षणिक कहते हैं । उन वैनाशिकोंके मतमें चित्त भी क्षणिक है, प्रत्ययमात्र है अर्थात् निराधार विज्ञानमात्र है और प्रत्यर्थनियत है अर्थात् क्षणिक होनेसे एक विषयको ग्रहण करके चित्त नष्ट हो जाता है और अन्य विषयमें गमन नहीं कर सकता । फिर दूसरा चित्त दूसरेको ग्रहण करके नष्ट हो जाता है । इसी प्रकार एक - एक विषयका विज्ञानरूप क्षणिक चित्त भिन्न - भिन्न होता है । इस प्रकार एक ही विषयको ग्रहण करनेवाले चित्तको प्रत्यर्थनियत कहते हैं । ऐसा क्षणिक प्रत्ययमात्र प्रत्यर्थ - नियत जो चित्त है, वही आत्मा है । उनके मतमें उस क्षणिकचित्तसे भिन्न और कोई आत्मा नहीं है और सब पदार्थ एक क्षणमें उत्पन्न होकर दूसरे क्षणमें नष्ट हो जाते हैं । इस प्रकार सब पदार्थोंका नाश माननेसे उनको वैनाशिक कहते हैं । बाह्य सर्व पदार्थोंको स्वप्नके पदार्थोंकि सदृश मिथ्या मानकर क्षणिक विज्ञानमात्रको ही ये ‘ तत्त्व ’ ' अमिथ्या ' कहते हैं । इससे इनको क्षणिक - विज्ञानवादी कहते हैं । इनके मतमें प्रत्ययमात्र क्षणिक - चित्त प्रत्यर्थनियत है । इससे चित्तमें अनेक पदार्थविषयक गमन - रूप चञ्चलता होती ही नहीं । इस प्रकार चित्तको क्षणिक माननेसे चित्तका एकाग्र होना भी सम्भव नहीं हो सकेगा । इस कारण एकाग्रताके लिये उपदेश करना तथा एकाग्रताके लिये प्रयत्न करना भी व्यर्थ होगा । इन वैनाशिकोंसे यह प्रश्न किया जाय कि तुम्हारे गुरु भगवान् बुद्धदेवजीने जो चञ्चलतानिवृत्तिद्वारा चित्तकी एकाग्रताके लिये योगके साधनका उपदेश दिया है, वह व्यर्थ ही है? यदि वैनाशिक लोग इसका उत्तर यह दें कि ' यद्यपि एक विषयको ग्रहण करके दूसरेमें गमन करना, दूसरेको त्यागकर तीसरेमें गमन करना, उसको त्यागकर अन्यमें गमन करना इत्यादि इस प्रकारकी चञ्चलता और चित्तकी एक ही विषयमें निरन्तर स्थितिरूप एकाग्रताका होना हमारे मतमें सम्भव नहीं है, क्योंकि चित्त क्षणिक है और उसका विषय भी क्षणिक है तथापि हमारे मतमें चित्तका प्रवाह क्षणिक नहीं है किंतु अनादि है । उस अनादि ' प्रत्यय - प्रवाह ' में अर्थात् चित्तके प्रवाह में विलक्षण - विलक्षण विषयाकारतारूप चञ्चलताका अभाव करके सदृश - सदृश विषयाकारतारूप एकाग्रताका होना सम्भव है । अर्थात् प्रथम क्षणमें चित्त जैसा विषयाकार होकर नष्ट हुआ, फिर दूसरे क्षणमें दूसरा चित्त वैसा ही अन्य विषयाकार उत्पन्न होकर समाप्त होना, पुनः तीसरे चित्तका भी वैसा ही अन्य विषयाकार उत्पन्न । ' होकर नष्ट हो जाना; इस प्रकार चित्त - प्रवाहमें सदृश - सदृश विषयाकाररूप एकाग्रता हो सकती है ऐसा उत्तर देनेपर उनसे फिर पूछा जाय कि यह एकाग्रता - प्रवाह चित्तका धर्म है अथवा प्रवाहके अंश चित्तका धर्म है? यदि वे कहें कि एकाग्रता - प्रवाह चित्तका धर्म है तो यह सम्भव न हो सकेगा; क्योंकि क्षणिक - क्षणिक चित्तोंसे भिन्न प्रवाह तो कोई पदार्थ ही नहीं है अर्थात् सदृश प्रत्यय - प्रवाहका आश्रय नहीं कोई एक चित्त तुम्हारे मतमें है ही नहीं, जिसका धर्म एकाग्रता माना जाय । इससे अयुक्त प्रथम है पक्ष ; क्योंकि ठीक चाहे है । और यदि वे कहें कि प्रवाहके अंश चित्तका धर्म है तो यह दूसरा पक्ष भी ( २२० )

पृष्ठ 246

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सूत्र ३२ ] * तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः * [ समाधिपाद प्रवाहका अंश चित्त सदृश प्रत्यय - प्रवाहमें हो अथवा विलक्षण प्रत्यय - प्रवाहमें हो, तुम्हारे मतमें क्षणिक होनेसे प्रत्यर्थ - नियत है अर्थात् एक ही पदार्थको विषय करनेवाला होता है । इससे क्षणिक - चित्तमें अनेकाकारतारूप चञ्चलता और एकाग्रता सम्भव नहीं है । इससे चित्तमें चञ्चलताके और एकाग्रता असम्भव होनेसे चञ्चलताके निवृत्तिपूर्वक एकाग्रताके लिये तुम्हारे गुरु भगवान् बुद्धदेवजीका उपदेश फिर भी व्यर्थ ही सिद्ध होता है । इसलिये प्रत्यय - प्रवाहका आश्रय एक स्थायी चित्त मानना ही योग्य है, जिस स्थायी चित्तका धर्म एकाग्रता सम्भव हो सके । और यदि प्रत्यय - प्रवाहका आश्रय एकचित्त न मानकर भिन्न - भिन्न क्षणिक - प्रत्ययरूप ही चित्त उत्पन्न होना मानें तो पहिले अन्य चित्तके किये हुए कर्मका पिछले अन्य चित्तको फल किस प्रकार हो सकेगा? जैसे भङ्ग पीनेवाला चित्त तो पहिले ही नष्ट हो गया और जिसने भङ्ग नहीं पिया उस दूसरे चित्तको नशा कैसे होगा? और यदि यह कहें कि जैसे पुत्रके किये श्राद्धका माता - पिताको फल होता है और जैसे पुत्रमें तेजस्विता, वीरता आदि गुणोंके लिये पुत्रके जन्मादिमें पिताके किये वैश्वानरयज्ञका फल पुत्रको होता है, वैसे ही पहिले अन्य चित्तके किये हुए कर्मका, पश्चात् अन्य चित्तको फल प्राप्त होगा तो यह भी सम्भव नहीं है; क्योंकि पुत्र - पिता आदिका परस्पर जैसा जन्य - जनक - भाव सम्बन्ध है, वैसा पूर्व -- उत्तर चित्तोंका जन्य - जनक - भाव सम्बन्ध होता तो ऐसा कह सकते थे । परंतु तुम्हारे मतमें तो पूर्व - उत्तर चित्तोंका जन्य - जनक - भाव सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि पूर्व चित्तके नष्ट होनेपर उत्तरवाला चित्त उत्पन्न होता है और क्षणिक चित्तसे अपनी उत्पत्ति - विनाशके अतिरिक्त और कोई व्यापार हो भी नहीं सकता । जैसे पिताके निमित्त पुत्र श्राद्ध करता है तो पुत्रके किये श्राद्धका फल पिताको प्राप्त होता है वैसे ' मैं भङ्ग पीता हूँ, मेरे नशा होनेके पश्चात् इसका नशा उत्तरवाले चित्तको हो ' इस प्रकार पूर्व - चित्त उत्तर - चित्तके निमित्त कर्म नहीं करता है तो उत्तरवाले चित्तको फल कैसे प्राप्त होगा? इसलिये ये आपकी युक्तियाँ ‘ गोमयपायसीयन्याय ' से भी अधिक अयुक्त हैं; क्योंकि गोबर और पायसकी तुल्यतामें तो गौसे उत्पन्न होना हेतु है, परंतु अन्य चित्तके किये कर्मका अन्य चित्त फल भोगता है, इसमें तो कोई हेतु नहीं है । ‘ गोमयपायसीयन्याय ’ यह है कि जैसे कोई कहे ' गोमय ' ( गोबर ) और ' पायस ' ( रबड़ी ), ये दोनों तुल्य ही हैं, क्योंकि ये दोनों गौसे पैदा होते हैं । यदि क्षणिक - प्रत्ययोंके प्रवाहका आश्रय एकचित्त न मानें, किंतु क्षणिक - प्रत्ययमात्र ही चित्त मानें तो पहिले एक चित्तसे देखे पदार्थका अन्य दूसरा चित्त स्मर्ता कैसे होगा? क्योंकि जो जिस पदार्थका द्रष्टा होता है, कालान्तरमें वही उस पदार्थका स्मर्ता होता है । तुम्हारे मतमें द्रष्टा चित्त तो हो गया, पश्चात् अन्य चित्त कैसे स्मरण करेगा? अर्थात् आपके मतमें कोई स्मृति नहीं पहिले होनी चाहिये ही नष्ट और यदि प्रत्यय - प्रवाहका आश्रय एक स्थायी चित्त न मानकर क्षणिक - प्रत्यय । मानोगे तो स्वात्माके अनुभवका भी खण्डन प्राप्त होगा । यह स्वात्माके - मात्र चित्तको ही आत्मा अत्यन्त अयुक्त है, क्योंकि ‘ जो मैं दूरसे गङ्गाको देखता था वह अनुभव अर्थात् प्रतीतिका खण्डन ‘ जो ’ मैं स्पर्श करता था वह मैं अब स्नान करके गङ्गाको मैं अब गङ्गाजलको स्पर्श करता हूँ '; नाना प्रकारकी क्रीड़ा करता था, यौवनावस्थामें मदसे मत्त हुआ नमस्कार काल करता हूँ ', ' जो मैं बाल - अवस्थामें व्यतीत करके अब जरारूप राक्षससे ( २२१ )

पृष्ठ 247

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समाधिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ३३ गृहीत हुआ काँप रहा हूँ ' इत्यादि प्रत्यभिज्ञा ज्ञानोंमें अनेक क्रियाओंका एक ही कर्ता और उन सब प्रत्ययोंका एक ही आश्रय अहम् पदका अर्थ जीवात्मा प्रतीत होता है । वह सब प्रत्ययका आश्रय अहम् पदके अर्थ स्वात्माकी प्रतीति क्षणिक - प्रत्यय - रूप आत्मा माननेसे सम्भव नहीं हो सकती, क्योंकि क्षणिक - प्रत्यय - रूप आत्मा बाल्य, यौवनादि अवस्थाओंमें अनेक क्रियाओंका कर्त्ता नहीं हो सकता और उन सर्वप्रत्ययोंका एक आश्रय अहम् पदके अर्थको विषय करनेवाले ' अहम् अहम् ' इस प्रत्यय - ज्ञानके सामर्थ्यको कोई प्रमाणान्तर तिरोभूत नहीं कर सकता, क्योंकि प्रत्यक्ष - प्रमाणके ही बलसे अन्य प्रमाण प्रवृत्त होते हैं । इस प्रत्यक्ष - प्रमाणका अन्य कोई प्रमाण तिरस्कार नहीं कर सकता । इस प्रकार क्षणिक - प्रत्यय - मात्र प्रत्यय नियत चित्त नहीं, किंतु अनेक पदार्थोंको विषय करनेवाला सर्वप्रत्ययोंका आश्रय एक स्थायी चित्त है । यह बात ध्यानमें रखना आवश्यक है कि भगवान् व्यासजीने तो केवल चित्तका प्रत्ययमात्र और क्षणिक होना अयुक्त बतलाकर उसकी स्थिरता सिद्ध की है, किंतु बौद्ध धर्मके पश्चात्के भाष्यकारोंने इसको भगवान् बुद्धके वैनाशिक शिष्योंके क्षणिकवादके साथ मिलाकर विस्तार दे दिया है । विशेष वक्तव्य सूत्र ३२ – बुद्ध भगवान् उच्चतम कोटिके अनुभवी योगी हुए हैं । उन्होंने जो असम्प्रज्ञात-समाधिका स्वरूप दिखलाया है, वह सांख्ययोगके ही सदृश है, किंतु शब्दोंके यथार्थ अभिप्रायको समझनेमें बहुत धोका खाया गया है । सारे सृष्टिके व्यवहारमें सत्त्व, रजस् और तमस् — ये तीन गुण ही ग्राह्यग्रहणरूपसे बर्त रहे हैं । व्यष्टिरूपमें सत्त्व चित्त ही इनके कार्यक्षेत्र हैं । असम्प्रज्ञात - समाधिमें चित्तके निरुद्ध हो जानेपर गुणोंका सारा व्यवहार उसके प्रति शून्य हो जाता है, किंतु उस शून्य अवस्थामें आत्मतत्त्व शेष रहकर अपने स्वरूपमें अवस्थित होता है । इसलिये इस शून्यवादमें भी आत्मसत्ताका अस्तित्व वास्तविक रूपमें सिद्ध होता है । शब्दोंके बाह्य अर्थोंमें ही खींचातानी की गयी है । ग्राह्य, ग्रहण और ग्रहीतृ सारे विषयोंमें चित्त ही वृत्तिरूपसे परिणत होकर उनका बोध करा रहा है अर्थात् प्रत्येक व्यक्तिका सारा संसार विज्ञानरूप चित्तहीमें चल रहा है । आत्मा केवल उसका द्रष्टा है । इस अंशमें भगवान् बुद्धका बतलाया हुआ विज्ञानवाद सार्थक ही है, किंतु इसको दार्शनिक रूप देनेमें उनके विज्ञानवादी शिष्य इस आशयसे बहुत दूर चले गये हैं । इसी प्रकार गुण परिणामशील हैं ।'चलं हि गुण-वृत्ति ', गुण परिणाम - स्वभाववाले हैं । क्षण - क्षणमें परिणाम हो रहा है । गुणोंसे बनी हुई सारी वस्तुएँ तथा चित्तमें भी प्रतिक्षण परिणाम हो रहा है, इसलिये सारी वस्तुएँ तथा विज्ञानरूप चित्त भी क्षणिक ही है 1 इसको श्रीव्यासजी महाराजने भी ३ । ५२ सूत्रकी व्याख्यामें भली प्रकार दर्शाया है । भगवान् बुद्धके इस क्षणिक परिणामको लेकर उनके क्षणिकवादी वैनाशिक शिष्योंने महात्मा बुद्धके अभिप्रायके विरुद्ध उसको अपने ढंगपर दार्शनिक रूप दे दिया है । सङ्गति — जब चित्तमें असूया आदि कलुष ( मल ) होते हैं, तब वह स्थितिको नहीं लाभ कर सकता । उनके दूर करनेका अगले सूत्रमें उपाय बतलाते हैं— मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम् ॥ ३३ ॥

- - I मुदितोपेक्षाणाम् - मित्रता, दया, हर्ष और उदासीनता — इन धर्मोकी शब्दार्थ — मैत्री - करुणा ( २२२ )

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सूत्र ३३ ] मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां ॰ * * [ समाधिपाद सुखदुःखपुण्यापुण्य - विषयाणाम् - सुखी, दुःखी, पुण्यात्मा और पापियोंके विषयमें ( यथाक्रम ), भावनातः = भावनाके अनुष्ठानसे; चित्तप्रसादनम् - चित्तकी निर्मलता और प्रसन्नता होती है । अन्वयार्थ – सुखी, दुःखी, पुण्यात्मा और पापियोंके विषयमें यथाक्रम मित्रता, दया, हर्ष और उपेक्षाकी भावनाके अनुष्ठानसे चित्त प्रसन्न और निर्मल होता है । व्याख्या – राग, ईर्ष्या, परापकार - चिकीर्षा, असूया, द्वेष और अमर्ष - संज्ञक राजस - तामसरूप — ये छः धर्म चित्तको विक्षिप्त करके कलुषित ( मलिन ) कर देते हैं । अतः ये छः चित्तके मल कहे जाते हैं । इन छः प्रकारके मलोंके होनेसे चित्तमें छः प्रकारका कालुष्य ( मल ) उत्पन्न होता है । जो क्रमसे राग - कालुष्य, ईर्ष्या - कालुष्य, परापकार - चिकीर्षा - कालुष्य, असूया - कालुष्य, द्वेष- कालुष्य और अमर्ष-कालुष्य कहलाते हैं । राग - कालुष्य – स्नेहपूर्वक अनुभव किये हुए सुखके अनन्तर जो. ' यह सुख मुझको सर्वदा ही प्राप्त हो ' इत्याकारक ( ऐसा आकारवाली ) जो राजस वृत्ति - विशेष है, वह राग - कालुष्य है; क्योंकि यह राग व - साधन विषयोंकी प्राप्तिके न होनेसे चित्तको विक्षिप्त करके कलुषित ( मलिन ) कर देता है । सर्व-- सुख-ईर्ष्या - कालुष्य – दूसरोंकी गुणादि या सम्पत्ति आदिकी अधिकता देखकर जो चित्तमें क्षोभ ( एक प्रकारकी जलन अर्थात् दाह ) उत्पन्न होना है, वह ईर्ष्या - कालुष्य कहलाता है; क्योंकि यह भी चित्तको विक्षिप्त करके कलुषित कर देता है । परापकार - चिकीर्षा - कालुष्य - किसीके अपकार ( बुराई करने, दुःख पहुँचाने ) करनेकी इच्छा चित्तको विह्वल करके कलुषित कर देती है । असूयां - कालुष्य — दूसरोंके गुणोंमें दोष आरोप करना असूया पदका अर्थ है । जैसे किसी व्रतशीलको दम्भी जानना और आचारवालेको पाखण्डी जानना अर्थात् सदाचारीपर झूठे कलङ्क लगाना असूया - कालुष्य है । द्वेष- कालुष्य - क्षमाका विरोधी कोप-प - कालुष्य ( द्वेष - कालुष्य ) भी चित्तको विक्षिप्त करके कलुषित कर देता है । अमर्ष - कालुष्य - किसीसे कठोर वचन सुनकर या अन्य किसी प्रकारसे अपमानित होकर जो उसको न सहन करके बदला लेनेकी चेष्टा है, वह अमर्ष - कालुष्य कहलाता है । इन उपर्युक्त कालुष्यों ( मलों ) से चित्त मलिन होकर विक्षिप्त हो जाता है और स्थितिके साधनमें प्रवृत्त होनेपर भी एकाग्र नहीं हो सकता । अतः इन मलोंको निवृत्त करके चित्तको प्रसन्न और एकाग्र करनेका सूत्रमें निम्न प्रकार उपाय बतलाया गया है-( १ ) सुखी मनुष्योंको देखकर उनपर मित्रताकी भावना करनेसे राग तथा ईर्ष्या - कालुष्य ( मल की निवृत्ति होती है अर्थात् ऐसा समझनेसे ) कि ' यह सब सुख मेरे मित्रको हैं तो मुझे भी हैं तब जैसे अपने राज्यके न होनेपर भी अपने पुत्रके राज्यलाभको अपना जानकर उस राज्यमें ईर्ष्या ', निवृत्ति हो जाती है । वैसे ही मित्रके सुखको भी अपना सुख मानकर उसमें राग - निवृत्ति तथा रागकी जब उसके सुखको अपना ही सुख समझेगा तो उसके ऐश्वर्यको देखकर चित्तमें जलन हो न जायगी होनेसे । एवं ईर्ष्या भी निवृत्त हो जायगी । ( २२३ )

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समाधिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र ३३ ( २ ) दुःखी जनोंपर करुणा अर्थात् दयाकी भावना करनेसे घृणा अर्थात् परापकार - चिकीर्षारूप ( दूसेरका अपकार अर्थात् बुराई करनेकी इच्छा ) मलका अभाव होता है । अर्थात् जब किसी दुःखी पुरुषको देखें तो इस वाक्यके अनुसार-प्राणा यथात्मनोऽभीष्टा भूतानामपि ते तथा । आत्मौपम्येन सर्वत्र दयां कुर्वन्ति साधवः ॥ जैसे हमें अपने प्राण परम प्रिय हैं, वैसे ही अन्य प्राणियोंको भी अपने प्राण प्रिय हैं; इस विचारसे साधुजन अपने प्राणोंके समान सबके ऊपर दया करते हैं । अपने मनमें यह विचार करे कि ' इस दुःखियाको बड़ा कष्ट होता होगा; क्योंकि जब हमारे ऊपर कोई संकट आ जाता है, तब हमको कितना दुःख भोगना पड़ता है ' उसके दुःख दूर करनेकी चेष्टा करे । ऐसा न समझे कि हमें सुख - दुःखसे कोई प्रयोजन नहीं है । जब इस प्रकार करुणामयी भावना चित्तमें उत्पन्न हो जायगी, तब अपने समान सबके सुखकी चाहसे घृणा और परापकार - चिकीर्षा ( बुराई करनेकी इच्छा ) की निवृत्ति हो जायगी । ( ३ ) पुण्यात्मा अर्थात् धर्म - मार्गमें जो पुरुष प्रवृत्त हैं, उन पुण्यशील पुरुषोंके प्रति हर्षकी भावना करनेसे असूया मलकी निवृत्ति होती है । अर्थात् जब पुण्यजनोंको देखे तो चित्तमें ' अहोभाग्य इसके माता - पिताके; जिन्होंने ऐसा पुण्यात्मा पुत्र उत्पन्न किया और धन्य है इसको जो तन - मन - धनसे धर्म - मार्गमें प्रवृत्त हो रहा है ' इस प्रकार आनन्दको प्राप्त हो । जब इस प्रकार मुदिता - भावना चित्तमें उत्पन्न होगी, तब असूया - रूप चित्तका मल निवृत्त हो जायगा । ( ४ ) पाप - मार्गमें प्रवृत्त जो पापशील मनुष्य हैं, उनमें उपेक्षा ( उदासीनता ) की भावना करनेसे द्वेष तथा आमर्षक ( बदला लेनेकी चेष्टा ) या घृणारूप मलकी निवृत्ति होती है । अर्थात् जब पापी पुरुष कठोर वचन बोले अथवा किसी अन्य प्रकारसे अपमान करे तो चित्तमें ऐसा विचारे कि ' यह पुरुष स्वयं अपनी हानि कर रहा है, इसके ऐसे व्यवहारसे कोई प्रयोजन नहीं, मैं इसके प्रति द्वेष या घृणा करके अपनेको क्यों दूषित करूँ, इसको तो स्वयं अपने पापोंका दुःख भोगना है इत्यादि '; इस प्रकार उनपर उपेक्षाकी . भावना करे । इस उपेक्षाकी भावनासे द्वेष तथा अमर्षरूप चित्त - मलकी निवृत्ति हो जाती है । इस प्रकार जब इन चारों भावनाओंके अनुष्ठानसे चित्तके मल धुल जाते हैं, तब निर्मल चित्त प्रसन्नताको प्राप्त होता है और प्रसन्न होता हुआ चित्त एकाग्रताका लाभ करता है । * भोज महाराजने इस सूत्रकी व्याख्या निम्न प्रकार की है-मैत्री - मित्रता ( प्रेम ); करुणा = दया ( पराये दुःखोंको निवृत्त करनेकी इच्छा ); मुदिता = हर्ष; उपेक्षा = उदासीनता; इन चारोंको क्रमसे सुखियोंमें, दुःखियोंमें, पुण्यवालोंमें और पापियोंमें व्यवहार करना चाहिये । जैसे सुखी जनोंमें ' ये सुखी हैं ' ऐसा समझकर उनके साथ प्रेम करे, न कि ईर्ष्या अर्थात् उनकी बड़ाईका सहन न करना । दुःखियोंको देखकर ' इनके दुःखकी कैसे निवृत्ति हो, इस प्रकार दया ही करे, * मैत्रीसे द्वेषभावका ही ग्रहण करना चाहिये, स्नेहका नहीं; क्योंकि स्नेहका भी एक प्रकारका राग होनेके कारण बन्धन ही है । मुदितासे भी शोककी निवृत्ति ही समझना चाहिये, हर्ष नहीं; क्योंकि हर्ष भी एक प्रकारसे रागका हेतु होनेसे त्याज्य ही है । मेधातिथि भट्ट ) — - ( मनु भाष्यकार ( २२४ )

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सूत्र ३४ ] * प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य * [ समाधिपाद घृणा और तिरस्कार । पुण्यात्माओंमें उनके पुण्यकी बड़ाई करके अपनी प्रसन्नता ही प्रकट करे, न कि न कि ' यह पुण्यात्मा क्यों है? ' ऐसा विरोध करना । पापियोंमें उदासीनताको धारण करे अर्थात् न उनके पापमें सम्मति प्रकट करे न उनसे द्वेष करे । सूत्रमें सुखादि शब्दोंसे सुख - दुःखवालेका प्रतिपादन किया है । जब इस प्रकार मैत्री आदि करनेसे चित्त प्रसन्न होता है, तब सुखसे समाधि प्रकट होती है । यह परिकर्म ऊपरका कर्म है, जैसे मिश्रकादि व्यवहार, गणित - सिद्धिके लिये; और संकलित आदि ( जोड़ आदि ) कर्म उपकारकरूपसे प्रधान क्रियाकी सिद्धिके लिये होता है । ऐसे ही राग, द्वेष आदिके विरोधी मैत्री आदि करनेसे प्रसन्नताको प्राप्त हुआ चित्त, सम्प्रज्ञात - समाधिके योग्य हो जाता है । प्रधानतासे राग ( विषयोंमें इच्छा ), द्वेष ( वैर, अनिष्टोंमें रोष ) – ये दो ही चित्तके विक्षेपक हैं । यदि ये दोनों ही जड़से उखाड़ दिये जायँ तो चित्तकी प्रसन्नता -होनेसे एकाग्रता होती है । सङ्गति – मैत्री आदि भावनाओंसे निर्मल और प्रसन्न हुआ चित्त जिन उपायोंद्वारा स्थितिको प्राप्त होता है, उनका वर्णन अगले सूत्रमें करते हैं । यहाँ यह बात स्मरण रहे कि अगले सब उपाय केवल समाहित चित्तवाले उत्तम अधिकारियोंके लिये हैं । विक्षिप्त चित्तवाले मध्यम अधिकारियोंको तो साधनपादमें बताये अष्टाङ्गयोगका ही आश्रय लेना होगा-प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य ॥ ३४ ॥

शब्दार्थ — प्रच्छर्दनविधारणाभ्याम् = नासिकाद्वारा बाहर फेंकने और रोकने – दोनोंसे; वा = अथवा; प्राणस्य - कोष्ठस्थित ( कोठामें रहनेवाली ) वायुके ( मनकी स्थितिको सम्पादन करे ) । अन्वयार्थ – अथवा कोष्ठस्थित ( कोठामें रहनेवाली ) वायुको नासिकापुटद्वारा ( प्रयत्नविशेषसे ) बाहर फेंकने और बाहर रोकने – दोनोंसे मनकी स्थितिको सम्पादन करे । व्याख्या- - कौष्ट्यस्य वायोर्नासिकापुटाभ्यां प्रयत्नविशेषाद्वमनं प्रच्छर्दनम्, विधारणं प्राणायामस्ताभ्यां वा मनसः स्थितिं सम्पादयेत् ॥ ( व्यासभाष्य ) कोष्ठस्थित ( कोठामें रहनेवाली ) वायुको विशेष प्रयत्नसे बाहर वमन करने ( एकदम नासिकाके दोनों छिद्रोंद्वारा बाहर फेंकने ) को प्रच्छर्दन कहते हैं । उस बाहर वमन की हुई वायुको वहीं रोक देनेको विधारण कहते हैं । प्रच्छर्दन और विधारण दोनों प्राणायामोंसे मनकी स्थितिको सम्पादन करे । प्राणायामके तीन भेद — रेचक, श्वासको नासिका छिद्रोंद्वारा बाहर निकालना; पूरक, नासिका - छिद्रोंद्वारा श्वासको अंदर ले जाना और कुम्भक, श्वासको बाहर अथवा अंदर रोक देना ( २ । ५० ) में विस्तारपूर्वक बतलाये जायँगे । इस सूत्रमें केवल दो भेद रेचक और कुम्भक बतलाये हैं । रेचकके लिये यहाँ प्रच्छर्दन शब्द प्रयोग हुआ है और उसकी विधि कोषस्थित वायुको एकदम नासिका - पुटद्वारा बाहर फेंकना बतलायी है । यहाँ केवल बाह्य - कुम्भक बतलाया प्रयत्नविशेषसे उसके लिये विधारण शब्द प्रयोग हुआ है । यह प्राणायाम कपाल - भातिसे मिलता गया है और सारी विधियाँ २ । ३२ के वि ० व ० में षट्कर्मके अन्तर्गत बतलायी जायँगी । यहाँ - जुलता भी है, जिसकी दो प्रक्रियाएँ लिखी जाती हैं । प्रसंगसे उसकी प्रक्रिया नं ॰ १ – केवल प्रच्छर्दन – किसी सुखासनसे बैठकर मूलबन्ध और किंचित् उड्डीयान बन्ध ( २२५ )