पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 231–240

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 231–240

पृष्ठ 231

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सूत्र २७ ] * तस्य वाचकः प्रणवः * [ समाधिपाद भाव यह है कि जैसे पिता - पुत्रका परस्पर जन्य - जनक - भाव सम्बन्ध विद्यमान हुआ हो ' यह इसका पिता है और यह इसका पुत्र है ' इस प्रकार संकेतसे प्रकाश किया जाता है— ऐसा नहीं है कि उस संकेतसे ही वह पिता और वह पुत्र हुआ हो - वैसे ही ईश्वरकृत संकेत भी विद्यमान शब्द द -३ - अर्थ - सम्बन्धको प्रकाश करता है, उत्पन्न नहीं करता । इसी प्रकार सर्वत्र ही संकेत विद्यमान सम्बन्धका प्रकाशक है, जनक नहीं है । यह संकेत जैसे इस सर्गमें है वैसे ही अन्य सर्गोंमें भी वाच्य - वाचक शक्तिकी अपेक्षासे विद्यमान ही रहता है । अतः पूर्व - पूर्व सम्बन्धके अनुसार उत्तर - उत्तर सर्गमें ईश्वर संकेत करता है I । विशेष वक्तव्य — सूत्र २७ – सूत्रकी व्याख्यामें वाच्य ईश्वर और वाचक प्रणवमें अनादि सम्बन्ध दिखलाया गया है । शास्त्रोंमें कहीं - कहीं ऐसा वर्णन आया है कि प्रणव- ध्वनि केवल ध्यानद्वारा अनुभव करने योग्य है । उसका यथार्थमें मुखसे उच्चारण होना असम्भव है, तथापि गौणरूपेण जो प्रणव - मन्त्र उच्चारण किया जाता है, वह त्र्यक्षरमय है अर्थात् अ, उ और म् ओंकाररूपी प्रणव होता है । जिसके तीनों अक्षरोंमें त्रिगुणमयी प्रकृति क्रमशः अपने तीनों गुणों तमस्, रजस् और सत्त्व, अथवा स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों जगत्सहित तथा सर्वशक्तिमान् परमेश्वर उनके अधिष्ठाता विराट्, हिरण्यगर्भ और ईश्वररूपसे अथवा सृष्टिकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयकी अपेक्षासे ब्रह्मा, विष्णु और महेशरूपसे विद्यमान हैं । और प्रणव ही ईश्वररूप है । वैज्ञानिक दृष्टिसे प्रणवका स्वरूप यह है कि जहाँ कोई कार्य है वहाँ अवश्य कम्पन होगा और जहाँ कम्पन होगा वहाँ अवश्य कोई शब्द होगा । सृष्टिके आदि कारणरूप कार्यकी ध्वनि ही ओंकार है । प्रणव- ध्वनि ही ओंकार है । प्रणव- ध्वनिरूप ध्वन्यात्मक शब्दका रूप वर्णात्मक प्रतिशब्द होनेके कारण शाब्दिक ओंकार अथवा शब्दातीत प्रणव दोनों ही पूर्वापर - सम्बन्धसे ईश्वरवाचकं होकर प्रणव कहलाते हैं । प्रणव ध्वन्यात्मक होनेके कारण उसका कोई भी अङ्ग मुखसे उच्चारण करने योग्य नहीं है । किंतु मानसिक जापसे परे केवल ध्यानकी अवस्थामें अन्तःकरणमें ही प्रणव - ध्वनि सुनायी दे सकती है । उसी ध्वन्यात्मक प्रकृतिके आदि शब्द ईश्वरवाचक प्रणवका वर्णात्मक प्रतिशब्द उपासना - काण्डकी सिद्धिके लिये बताया गया है । उसी वर्णात्मक प्रणव प्रतिशब्दको ओंकार कहते हैं । यह ओंकार अर्थात् वर्णात्मक प्रणव अ, उ, म् के सम्बन्धसे कहा गया है । इस वाचक प्रणव और वाच्य ईश्वरोंमें अनादि और अविमिश्र ( नित्य ) सम्बन्ध है । इस वाचक अर्थात् वर्णात्मक प्रणवके मानसिक जापकी परिपक्व अवस्थाके पश्चात् योगी केवल ध्यानरूप ध्वन्यात्मक प्रणवकी भूमिमें पहुँच जाता है । उसपर पूर्ण अधिकारकी प्राप्ति असम्प्रज्ञात -समाधिके प्राप्त करनेमें सहायक होती है । यह २८ वें सूत्रके वि ॰ व ॰ में बतलाया जायगा । योगमार्गपर चलनेवालोंको उचित है कि ' ओम् ' नामसे ही ईश्वरकी उपासना करें; क्योंकि यही उसका मुख्य अनादि और नित्य नाम व्यापक अर्थवाला है, अन्य सब गौण और संकीर्ण अर्थवाले हैं । सारी श्रुतियाँ और स्मृतियाँ उसी ' ओ ३ म् ' का मुख्य रूपसे वर्णन कर रही हैं । यथा-धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते । अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥ प्रणवो ( मु ० २।४ ) प्रणव ( ' ओ ३ म् ' ) धनुष है । आत्मा बाण है । ब्रह्म लक्ष्य कहा गया है । सावधानीसे उसे बींधना पा ० यो ० प्र ० ८- ( २०७ )

पृष्ठ 232

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समाधिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप* * [ सूत्र २७ चाहिये । बाणके सदृश ( अभ्यासी अपने लक्ष्य ब्रह्ममें ) तन्मय हो जाय ।

वह्नेर्यथा योनिगतस्य मूर्तिर्न दृश्यते नैव च लिङ्गनाशः ।

स भूय एवेन्धनयोनिगृह्यस्तद्वोभयं वै प्रणवेन देहे ॥ १३ ॥

स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम् । ध्याननिर्मथनाभ्यासाद् देवं पश्येन्निगूढवत् ॥ १४ ॥

( श्वे ० उप ० १ । १३-१४ ) जैसा कि अरणिमें स्थित भी अग्निकी मूर्ति नहीं दीखती है और न उसके सूक्ष्म रूप ( जो अरणिके अंदर उस समय भी है ) का नाश है, वह ( अरणिगत अग्नि ) फिर - फिर अधरारणि - उत्तरारणियोंमें और ( मन्थन - दण्डके रगड़नेसे ) ग्रहण की जाती है । इन दोनों बातोंके सदृश आत्मा ओंकारके देहमें ( ध्यानसे पहले छिपा हुआ ध्यानाभ्याससे ग्रहण किया जाता है ) ॥ १३ ॥ अपने देहको अधरारणि और ओ ३ म्‌को

उत्तरारणि बनाकर ध्यानरूपी मन्थन - दण्डकी रगड़ बार - बार करनेसे छिपी हुई आगके सदृश उस परम ज्योतिको देखे ॥ १४ ॥

यदा वा ऋचमाप्नोत्योमित्येवातिस्वरत्येव सामैवं यजुरेष उ स्वरो यदेतदक्षर-मेतदमृतमभयं तत्प्रविश्य देवा अमृता अभया अभवन् । ( छान्दो ० १।४।४ ) जब उपासक ऋग्वेदको पढ़ता है, ऊँचे स्वरसे ओम् बोलता है । इसी प्रकार साम और इसी प्रकार यजुको । यही ओम् शब्द स्वर है । यह अक्षर, यह अमृत और अभय है । जो उपासक ऐसा जानकर ओम्की स्तुति करता है, वह उस स्वरमें प्रवेश करता है जो अक्षर, अमृत और अभय है और जैसे देव उसमें प्रवेश होकर अमर हो गये वैसे ही अमर हो जाता है । ओमिति ब्रह्म । ओमिती सर्वम् । ओमित्येतदनुकृतिर्ह स्म वा. अयो श्रावयेत्याश्रावयन्ति । ओमिति सामानि गायन्ति । ओ शोमिति शस्त्राणि शँ सन्ति । ओमित्यध्वर्युः प्रतिगरं प्रतिगृणाति । ओमिति ब्रह्मा प्रसौति । ओमित्यग्निहोत्रमनुजानाति । ओमिति ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मोपाप्रवानीति । ब्रह्मैवोपाप्नोति । ( तै ० शी ० ८ ) ओम् यह ब्रह्म है । ओम् यह सब कुछ है । ओम् यह आज्ञा मानना है । ओम् अङ्गीकारका वाचक है । ओम् कहनेपर ( ऋत्विज् ) मन्त्र सुनाते हैं । ओम् शोम् कहकर शस्त्रों ( ऋग्वेदके प्रार्थना-मन्त्रविशेष ) को पढ़ते हैं । ओम् कहकर ( सोमयज्ञमें ) अध्वर्यु यजुर्वेदी प्रतिगर ( प्रोत्साहक मन्त्र-विशेष ) पढ़ता है । ओम् कहकर ब्रह्मा अनुज्ञा देता है । ओम् कहकर अग्निहोत्रकी अनुज्ञा देता है । वेद अध्ययन करनेवाला ब्राह्मण ओ ३ म् उच्चारण करता हुआ कहता है । मैं ब्रह्म ( वेद ) को प्राप्त होऊँ और इस प्रकार वह ब्रह्मको अवश्य पा लेता है । ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद् भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव । यच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव । ( मा ० १ ) यह सब कुछ ओम् अक्षर है; यह जो कुछ भूत, वर्तमान और भविष्यत् है सब उसकी व्याख्या है और जो कुछ तीनों कालोंसे ऊपर है, वह भी ओंकार ही है । सोऽयमात्माध्यक्षरमोङ्कारोऽधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार इति । ( मा०८ ) ( २०८ )

पृष्ठ 233

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सूत्र २८ ] तज्जपस्तदर्थभावनम् * * [ समाधिपाद वह यह आत्मा अक्षर - दृष्टिसे मात्राओंवाला ओंकार है । पाद ही मात्रा है, मात्रा ही पाद है । वे मात्राएँ अकार, उकार और मकार हैं । अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोङ्कार आत्मैव संविश-त्यात्मनाऽऽत्मानं य एवं वेद य एवं वेद । ( मा ० १२ ) चौथा पाद मात्रारहित है । उसमें कोई व्यवहार नहीं है, न कोई प्रपञ्च है, वह शिव और अद्वैत है । इस प्रकार ओंकार आत्मा ही है । जो उसे इस प्रकार जानता है, वह आत्मासे आत्मामें प्रवेश कर जाता है । ( माण्डूक्य मन्त्रोंकी व्याख्या सूत्र २८ के वि ॰ व ॰ में देखें ) ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् । यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥ ( गीता ८ । १३ ) जो पुरुष ॐ ऐसे इस एक अक्षररूप ब्रह्मको उच्चारण करता हुआ उसके अर्थस्वरूप परमात्माको चिन्तन करता हुआ शरीरको त्यागकर जाता है, वह पुरुष परम गतिको प्राप्त होता है । ओंकारको सारे मन्त्रोंका सेतु बतलाया गया है तथा मनोवाञ्छित फलकी प्राप्तिके लिये प्रत्येक मन्त्रको ओ ३ म्के साथ उच्चारण किया जाता है । यथा— ' मन्त्राणां प्रणवः सेतुः '

माङ्गल्यं पावनं धर्म्यं सर्वकामप्रसाधनम् ।

ओंकारः परमं ब्रह्म सर्वमन्त्रेषु नायकम् ॥

सङ्गति – ईश्वर अर्थ और उसका शब्द ओ ३ म् तथा इन दोनोंका वाच्य - वाचक नित्य सम्बन्ध बतलाकर अब तेईसवें सूत्रमें बतलाये हुए ' ईश्वर - प्रणिधान ' का लक्षण कहते हैं— तज्जपस्तदर्थभावनम् ॥ २८ ॥

शब्दार्थ – तत् जपः - उस प्रणव ( ओ ३ म् ) का जप; तदर्थ - उस प्रणवके अर्थभूत ईश्वरका; भावनम् = पुनः - पुनः चिन्तन करना ( ईश्वर - प्रणिधान है ) । अन्वयार्थ — उस ओ ३ म् शब्दका जप और उसके अर्थभूत ईश्वरका ध्यान करना ( पुनः - पुनः चिन्तन करना ) ईश्वर - प्रणिधान है । व्याख्या – ओ ३ म्का मानसिक जप करना और उसका वाच्य अर्थ जो ईश्वर है उसके सूत्र चौबीस, पचीस और छब्बीसमें बतलाये हुए गुणोंकी भावना अर्थात् पुनः - पुनः ध्यान करना ईश्वर - प्रणिधान है । चित्तको सब ओरसे निवृत्त करके केवल ईश्वरमें स्थिर कर देनेका नाम भावना है । इस भावनासे अविद्या आदि क्लेश, सकाम कर्म, कर्मफल और वासनाओंके संस्कार जो बन्धन अर्थात् जन्म और मृत्युके कारण हैं; चित्तसे धुल जाते हैं और सात्त्विक शुद्ध ज्ञानके संस्कार उदय होते हैं और केवल ईश्वर ही एक ध्येय रह जाता है? यह भावना बार - बारके अभ्याससे इतनी दृढ़ हो जानी चाहिये कि ओ ३ म् शब्दके साथ ही उसका अर्थ ( ईश्वरका स्वरूप भी ) स्मरण हो जाय । जैसे निरन्तर अभ्याससे गौ शब्दके साथ उसका सारा स्वरूप स्मरण हो जाता है । यद्यपि जप और ईश्वर - भावनारूप ध्यान दोनोंका एक कालमें होना नहीं हो सकता है, तथापि ( २० ९ )

पृष्ठ 234

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समाधिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र २८ भावनारूप ध्यानसे पूर्व और पश्चात् जप करनेका क्रम जानना चाहिये । जैसे श्रीव्यासजी महाराजने अपने भाष्यमें बतलाया है—

स्वाध्यायाद् योगमासीत योगात् स्वाध्यायमामनेत् ।

स्वाध्याययोगसम्पत्त्या परमात्मा प्रकाशते ॥

स्वाध्याय नाम प्रणव - जप और अध्यात्मशास्त्रके विचारका है । प्रणव - जपके पीछे योगाभ्यास करे और योगाभ्यासके पीछे प्रणवका जप करे । स्वाध्याय और योग- इन दोनों सम्पत्तियोंसे परमात्मा प्रकाशित होते हैं । इस प्रकार ईश्वर - प्रणिधानसे शीघ्रतम असम्प्रज्ञात -समाधि - लाभ होता है । अभिप्राय यह है कि ओ ३ म्का जाप उसके अर्थोंकी भावनाके साथ होना चाहिये । उसका क्रम इस प्रकार होगा कि पहले सूत्र २४, २५ और २६ में बतलाये हुए ईश्वरके गुणोंकी भावना की जावे फिर ओ ३ म्का मानसिक जाप एकाग्रवृत्तिके साथ किया जावे । यही सूत्र २३ में बतलाया हुआ ईश्वर - प्रणिधान है । इससे असम्प्रज्ञात - समाधिका शीघ्रतम लाभ किस प्रकार प्राप्त हो सकता है यह इस सूत्रके विशेष विचारमें भली प्रकार दर्शाया जावेगा । विशेष विचार - सूत्र २८ -( १ ) जाग्रत् अवस्थामें स्थूल - जगत्‌में जो स्थूल शरीरका व्यवहार चलता है, वह आत्माके संनिधिमात्रसे है, इस स्थूल शरीरके साथ आत्माके शबल - स्वरूपकी संज्ञा ' विश्व ' होती है । ( २ ) स्वप्नावस्था अथवा सम्प्रज्ञात - समाधिमें सूक्ष्म जगत्में जो सूक्ष्म - शरीरका व्यवहार चलता है, वह भी आत्माकी संनिधिसे है । सूक्ष्म - शरीरके सम्बन्धसे आत्माके शबल - स्वरूपकी संज्ञा ‘ तैजस ' होती है । ( ३ ) सुषुप्ति अवस्थामें जो कारण - शरीरमें अभावकी प्रतीति होती है अथवा अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात-समाधिमें जो अस्मिताका अनुभव होता है तथा विवेकख्यातिमें जब गुणोंके प्रथम विकृत परिणामरूप चित्तकी आत्मासे भिन्नता प्रतीत होती है, वह भी आत्माकेसंनिधिमात्रसे है । इस कारण - - शरीरके सम्बन्धसे आत्माके शबल - स्वरूपकी संज्ञा ' प्राज्ञ ' है । ये तीनों आत्माके अपने शुद्ध स्वरूप नहीं हैं, प्रकृतिके गुणोंसे मिश्रित हैं । इस कारण ये शबल, सगुण अथवा अपर - स्वरूप हैं । इनसे परे जो आत्माका अपना निखरा हुआ निज केवल शुद्ध स्वरूप है, वह पर अथवा निर्गुण शुद्ध है । वही स्वरूप - अवस्थिति अथवा आत्मस्थिति है । जिस प्रकार शरीरके सम्बन्धसे आत्माको समझा है, इसी प्रकार सम्पूर्ण जगत्‌के सम्बन्धसे परमात्माको समझ लेना चाहिये । समस्त संसारमें ज्ञान, नियम तथा व्यवस्थापूर्वक सम्पूर्ण कार्य परमात्माकी संनिधिमात्रसे होते हैं । स्थूल - जगत्के साथ परमात्माके शबल - स्वरूपकी संज्ञा ' विराट ' है । इसी प्रकार सूक्ष्म - जगत्के सम्बन्धसे उसके शबल - स्वरूपकी संज्ञा ' हिरण्यगर्भ ' है तथा कारण - जगत्के सम्बन्धसे उसके शबल - स्वरूपकी संज्ञा ' ईश्वर ' है । ये तीनों परमात्माके शबल, सगुण अर्थात् अपर स्वरूप यह सब महिमा उसके शबल - स्वरूपको ही दिखला रही है । प्रकृतिसे हैं; क्योंकि परे परमात्माका ये प्रकृतिके शुद्ध गुणोंमें मिश्रित हैं । निर्गुण अर्थात् ( २१० )

पृष्ठ 235

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सूत्र २८ ] तज्जपस्तदर्थभावनम्: * * [ समाधिपाद पर स्वरूप है । जैसे कि ऋग्वेदमें बतलाया गया है— एतावानस्य महिमाऽतो ज्यायांश्च पूरुषः । पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि । ( ऋक् ० १ । ९ ० । ३ ) यह इतनी बड़ी तो उसकी महिमा है; परमात्मा इससे कहीं बड़ा है । सारे भूत इसका एक पाद हैं । उसके तीन पाद अमृत स्वरूप अपने प्रकाशमें हैं ओ ३ म्की व्याख्या – ओ ३ म्की पहली मात्रा ' अकार ' परमात्माके विराट्रूपकी बोधक है, जो विश्वका उपास्य है । दूसरी मात्रा ' उकार ' हिरण्यगर्भकी बोधक है, जो तैजसका उपास्य है । तीसरी मात्रा ‘ मकार ' ईश्वरकी बोधक है, जो प्राज्ञका उपास्य है, जिसका प्रणिधान तेईसवें सूत्रमें बतलाया गया है । चौथे ‘ इति विराम ' में सब मात्राएँ समाप्त हो जाती हैं । वह गुणोंकी सर्व उपाधियोंसे रहित केवल शुद्ध निर्गुण परमात्मास्वरूप है, जहाँ उपास्य - उपासकके भेद - भाव समाप्त हो जाते हैं, जिसका निषेधात्मक वर्णन निम्न प्रकार किया गया है— अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः । वह अदृष्ट है, उसको व्यवहारमें नहीं ला सकते, उसको पकड़ नहीं सकते, उसका कोई चिह्न नहीं, वह विचारमें नहीं आ सकता, उसको बतला नहीं सकते । वह आत्मा है; केवल यही प्रतीति उसमें सार है, वहाँ प्रपञ्चका झगड़ा नहीं, वह शान्त है, शिव है और अद्वैत ( संख्याकी सीमासे परे ) है, उसको चौथा पाद मानते हैं । वह आत्मा है, उसीको जानना चाहिये । ओम्के पाद और मात्राएँ — माण्डूक्योपनिषमें ओ ३ म्के चार पाद बतलाये गये हैं । पहले पादमें पहली मात्रा अकार, दूसरे पादमें दूसरी मात्रा उकार, तीसरे पादमें तीसरी मात्रा मकार और चौथे पादमें मात्रारहित विराम है । १ – पहले पादवाली अकार मात्रामें विराट् ( स्थूल जगत्के सम्बन्धसे परमात्माका शबलस्वरूप ) विश्व ( स्थूल शरीरके सम्बन्धसे आत्माका शबलस्वरूप ) और अग्नि ( स्थूल शरीर और स्थूल जगत्की मुख्य प्रकृति अग्नि ही है, क्योंकि अग्निसे ही स्थूल शरीर और स्थूल लोक जीवित रहते हैं ) । २ — दूसरे पादवाली उकार मात्रामें हिरण्यगर्भ ( सूक्ष्म जगत्‌के सम्बन्धसे परमात्माका शबलस्वरूप ), तैजस ( सूक्ष्मशरीरके सम्बन्धसे आत्माका शबलस्वरूप ) और वायु ( सूक्ष्मशरीर तथा सूक्ष्म जगत्की मुख्य प्रकृति वायु ही है; क्योंकि सूक्ष्म शरीर तथा सूक्ष्म जगत्‌को वायु ही सूत्रात्मारूपसे जीवित रख रहा है ) । ३ — तीसरे पादवाली मकार मात्रामें ईश्वर ( कारण जगत्के सम्बन्धसे परमात्माका शबलस्वरूप ), प्राज्ञ ( कारण - शरीरके सम्बन्धसे आत्माका शबलस्वरूप ) और आदित्य ( कारण जगत् और कारण - शरीरकी मुख्य प्रकृति - अव्यक्त मूल प्रकृति गुणोंकी साम्य अवस्था तो केवल अनुमान और आगमगम्य है, इसलिये वास्तवमें कारण - जगत् विशुद्ध सत्त्वमय चित्त ही है और कारण - शरीर सत्त्वचित्त है । आदित्य महत्तत्त्व अर्थात् विशुद्ध सत्त्वमय चित्तका ही दूसरा नाम है, इसलिये वही कारण जगत् और कारण - शरीरकी मुख्य प्रकृति है ) । ( २११ )

पृष्ठ 236

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समाधिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र २८ ४ — चौथे पाद मात्रारहित विराममें कारण जगत् और कारण - शरीरसे परे केवल शुद्ध परमात्मतत्त्व है मात्राओंसे ओम्की उपासना १ – पहिले पाद एक मात्रावाले ओम्की उपासना — ओम्का वाचक जाप— -अर्थोंकी भावनासहित ओम्का वाणीसे जाप करना पहिले पाद एक मात्रावाले अकार ओम्की उपासना है । इसमें स्थूलशरीरका अभिमान रहता है, इसलिये स्थूलशरीरके सम्बन्धसे जो आत्माकी संज्ञा विश्व है, वह उपासक होता है और स्थूल जगत्के सम्बन्धसे जो परमात्माकी संज्ञा विराट् है, वह उपास्य होता है । बाहरसे बिलकुल बेसुध होकर पूरे तन्मय हो जानेकी अवस्थामें इसको वितर्कानुगत सम्प्रज्ञात - समाधिकी भूमि समझना चाहिये, जिसमें ध्यानकी सूक्ष्मताके तारतम्यसे विश्वकी विराट्के स्वरूपमें अवस्थिति होती है, जिसके फलस्वरूप पाँचों स्थूल भूत आत्मोन्नतिमें प्रतिबन्धक न रहकर सहायक बन जाते हैं । ( शेष सूत्र १७ की व्याख्या तथा सूत्र १८ के विशेष वक्तव्यमें देखें ) । २ – दूसरे पाद दो मात्रावाले अकार उकार ओम्की उपासना – ओम्का मानसिक जाप- -अर्थोंकी भावनासहित ओम्का मनसे जप करना दूसरे पाद दो मात्रावाले अकार उकार ओम्की उपासना है । इसमें सूक्ष्मशरीरका अभिमान रहता है, इसलिये सूक्ष्मशरीरके सम्बन्धसे जो आत्माकी संज्ञा तैजस है, वह उपासक होता है और सूक्ष्म जगत्के सम्बन्धसे जो परमात्माकी संज्ञा हिरण्यगर्भ है, वह उपास्य होता है । स्थूलशरीरसे बिलकुल बेसुध होकर पूर्णतया तन्मय हो जानेकी अवस्थामें इसको विचारानुगत और आनन्दानुगत सम्प्रज्ञात - समाधिकी भूमि समझना चाहिये, जिसमें ध्यानकी सूक्ष्मताके तारतम्यसे तैजसकी हिरण्यगर्भके स्वरूपमें अवस्थिति होती है । जिसके फलस्वरूप सूक्ष्मभूत आत्मोन्नतिमें प्रतिबन्धक न रहकर सहायक बन जाते हैं ( शेष सू ० १७ की व्याख्या तथा सूत्र १८ के वि ० व ० में देखें ) । साधकको इसी दो मात्रावाले ओम् अर्थात् ओम्के मानसिक जापसे ही साधना आरम्भ करनी चाहिये । ३ – तीसरे पाद अकार, उकार और मकार तीन मात्रावाले पूरे ओम्की उपासना – ओम्का केवल ध्यान ( ध्वनि ) - -जब मानसिक जाप अपनी परिपक्व अवस्थामें सूक्ष्म होते - होते केवल ध्यान ( ध्वनि ) रह जाय तब यह तीसरे पाद तीन मात्रावाले पूरे ओम्की उपासना है । इसमें कारण- शरीरका अभिमान रहता है, इसलिये कारण - शरीरके सम्बन्धसे जो आत्माकी संज्ञा प्राज्ञ है, वह उपासक होता है और कारण जगत्के सम्बन्धसे जो परमात्माकी संज्ञा ईश्वर है, वह उपास्य होता है । ध्यान ( ध्वनि ) की सूक्ष्मताके तारतम्यसे इसको अस्मितानुगत और विवेकख्यातिकी भूमि समझना चाहिये । जिसमें इस ध्यानकी सूक्ष्मताके तारतम्यसे प्राज्ञकी ईश्वरके स्वरूपमें अवस्थिति होती है । वास्तवमें यही ईश्वरप्रणिधान है जो सूत्र २३ में असम्प्रज्ञात - समाधिका साधन बताया गया है । अस्मिता अर्थात् आत्मासे प्रकाशित चित्त कोई इन्द्रियगम्य सांसारिक पदार्थ - जैसी वस्तु नहीं है । न उसका इन - जैसा साक्षात्कार होता है । वह एक विलक्षण अवस्था है, जिसका शब्दोंके द्वारा वर्णन नहीं किया जा सकता और विवेकख्याति जिसमें आत्मा और चित्तका भेद - ज्ञान होना बतलाया गया है । वह चित्त, आत्मा और उनका भेद - ज्ञान भी सांसारिक पदार्थों - जैसा नहीं है । वह अति विलक्षण चित्तकी सबसे ऊँची अत्यन्त सात्त्विक अवस्था है, जो शब्दोंद्वारा नहीं बतलायी जा सकती । उसको चित्तद्वारा स्वरूप ( २१२ )

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सूत्र २८ ] तज्जपस्तदर्थभावनम् ’ * * [ समाधिपाद अवस्थितिका अनुभव कह सकते हैं । किंतु इस अवस्थाकी प्राप्ति साधारण बात कठिन और दुर्गम्य है । ओ ३ म्के मानसिक जापके निरन्तर अभ्याससे जब पूर्ण वैराग्य नहीं उदय है । हो यह जाय अत्यन्त और अन्तःकरण पूर्णरूपसे शुद्ध हो जाय तब सत्त्व अत्यन्त वृद्धिको प्राप्त होकर सूक्ष्मशरीरमें रजकी मानसिक जापकी क्रियाको करनेमें असमर्थ कर देता है । तब रज सत्त्वसे दबा हुआ कारण - शरीरमें विवेक - ख्यातिकी वृत्तिरूप क्रियाको करना आरम्भ कर देता है । इस सत्त्वकी विशुद्धतामें तम, जिसमें इस अविद्या क्लेश वर्तमान है, इतना निर्मल हो जाता है अविद्या तथा अन्य सब क्लेश दग्धबीज- तुल्य हो जाते हैं । इस अवस्थामें तमका काम केवल इस अत्यन्त सात्त्विक वृत्तिको रोकनेमात्र रह जाता है । यह विवेकख्यातिकी अवस्था जब निरन्तर बनी रहे तब उसको धर्ममेघ समाधि तथा अविप्लव विवेकख्याति कहते हैं । वही जीवनमुक्तिकी अवस्था है 1 ४ — चौथा पाद ओम्का मात्रारहित विराम शुद्ध परमात्मस्वरूपमें अवस्थिति- —जब उपर्युक्त ओम्का ध्यान ( ध्वनि ) भी अपनी अन्तिम परिपक्व अवस्थामें सूक्ष्म होता हुआ समाप्त हो जाय, तब कारण - शरीरसे परे शुद्ध आत्माकी कारण जगत्से परे शुद्ध परमात्माके स्वरूपमें अवस्थिति होती है । यह असम्प्रज्ञात - समाधि है, जिसकी प्राप्तिका साधन सूत्र २३ में ईश्वरप्रणिधान बतलाया था । यहाँ पहुँचकर समस्त व्यवधान उपाधियाँ तथा उपास्य - उपासकभाव समाप्त हो जाता है । यही स्वरूपावस्थिति, आत्मस्थिति, परमात्मप्राप्ति अर्थात् प्राणिमात्रका अन्तिम ध्येय है । अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोंकार आत्मैव स विशत्यात्मनाऽऽत्मानं य एवं वेद । ( माण्डूक्योपनिषद् १२ ) अमात्र ( जिसकी कोई मात्रा नहीं वह ओंकार ) चौथे पादवाला है, जो व्यवहारमें नहीं आता, जहाँ प्रपञ्चका झगड़ा नहीं, जो शिव अद्वैत है, इस प्रकार ओ ३ म् आत्मा ही है । वह जो इसको जानता है, वह आत्मासे आत्मामें प्रवेश करता है । भलो भयो हर बीसरो, सर से टली बलाय । जैसे थे तैसे भये, अब कुछ कहो न जाय । ( कबीर )

जब मैं था तब तू न था, तू पायो मैं नाय ।

प्रेम - गली अति साँकरी, ता में द्वै न समाय ॥

यदग्ने स्यामहं त्वं त्वं वाघास्या अहम् ।

स्युष्टे सत्या इहाशिषः ॥

( ऋग्वेद मण्डल ८ सूक्त ४४ मन्त्र २३ ) हे प्रकाशमय परमात्मन्! यदि मैं तू हो जाऊँ और तू मैं हो जाय तो तेरा आशीर्वाद ( सब प्राणियोंके कल्याणका संकल्प ) संसारमें सत् हो जाय ।

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।

तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥

( ईशोप ॰ मन्त्र १५ ) सुनहरी पात्र ( अत्यन्त लुभानेवाले और आकर्षक त्रिगुणात्मक तीनों शरीर और त्रिगुणात्मक तीनों जगत् ) ( २१३ )

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समाधिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र २८ से सत्यका मुख ( शुद्ध परमात्म - तत्त्व ) ढका हुआ है । उसे हे पूषन्! ( आदित्य अर्थात् कारणजगत्के अधिष्ठाता ईश्वर ) हटा दे, सत्य धर्म ( शुद्ध परमात्मतत्त्व ) को देखनेके लिये । स्थूल, सूक्ष्म और कारण - शरीरका वर्णन ओ ३ म्की व्याख्यामें तीनों शरीरोंका संकेतमात्र ही वर्णन किया गया था । यहाँ उनका स्पष्टीकरण किये देते हैं— स्थूल शरीर — रज - वीर्यसे उत्पन्न होनेवाला, अन्नसे बढ़नेवाला, पाँचों भूतों – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाशसे बना हुआ स्थूल शरीर है । जाग्रत् — जब तमोगुण रजोगुणसे दबा हुआ होता है, तब जाग्रत् - अवस्थामें सारे कार्य स्थूल जगत्में इसी स्थूल शरीरद्वारा किये जाते हैं । इसी शरीरका जन्म - मरण और इसीमें जरा ( बुढ़ापा ), रोगादि व्याधियाँ होती हैं । सूक्ष्म शरीर – पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, शक्तिमात्र नासिका, रसना, चक्षु, श्रोत्र और त्वचा; और पाँच कर्मेन्द्रियाँ, शक्तिमात्र हस्त, पाद, वाणी, गुदा, उपस्थ; ग्यारहवाँ मन जिसके द्वारा ये शक्तियाँ काम करती हैं तथा जिसमें संकल्प - विकल्प होते हैं । पाँच सूक्ष्मभूत अथवा प्राण और अहंकार, अहंता पैदा करनेवाली शक्ति, बुद्धि चित्तसहित निर्णय करनेवाली तथा भावों और संस्कारोंको रखनेवाली शक्ति । यह अठारह शक्तियोंका समूह सूक्ष्म शरीर कहलाता है । स्वप्न — जब बाहरके कार्योंसे स्थूल शरीर थक जाता है, तब तमोगुण रजोगुणको दबाकर स्थूल शरीरको स्थूल जगत्में कार्य करनेमें असमर्थ कर देता है; किंतु तमोगुणसे दबा हुआ सूक्ष्म शरीर जाग्रत् - अवस्थाकी स्मृतिके कल्पित विषयोंमें कार्य करना आरम्भ करता है, वह स्वप्न कहलाता है । सम्प्रज्ञात - समाधि — इसी प्रकार जब समाधि - अवस्थामें सत्त्वगुण रजोगुणको दबा लेता है, तब स्थूल शरीर स्थूल दशामें व्युत्थानके कार्य बंद कर देता है, किंतु सूक्ष्म शरीर सत्त्वगुणका प्रकाश पाकर सूक्ष्म जगत्में कार्य करता रहता है । जहाँ स्वप्नमें तमोगुणके अन्धकारमें सब दृश्य कल्पित होते हैं, वहाँ समाधि - अवस्थामें सत्त्वगुणकी प्रधानतासे उसके प्रकाशमें ध्येय वस्तुके वास्तविक स्वरूपका ज्ञान होता है । सूक्ष्म शरीरको एक पैरमें डोरी बँधे हुए पक्षी अथवा एक पतंगके सदृश समझना चाहिये, जिसमें डोरी बँधी हुई है और वह डोरी चर्खीपर चढ़ी हुई है । यह डोरी प्राणकी है और चर्खी हृदय - स्थानकी है, जहाँ प्राणोंकी ग्रन्थि ( केन्द्र ) है । उदान इस सूक्ष्म - शरीरको बाहरके समष्टि - प्राणसे जोड़े हुए हैं । स यथा शकुनिः सूत्रेण प्रबद्धो दिशं दिशं पतित्वान्यत्रायतनमलब्ध्वा बन्धनमेवोपश्रयते, एवमेव खलु सोम्यैतन्मनो दिशं दिशंशं पतित्वान्यत्रायतनमलब्ध्वा प्राणमेवोपश्रयते, प्राणबन्धन हि सोम्य मन इति ॥ ( छान्दो ० ६।८।२ ) जिस प्रकार पक्षी डोरीमें बँधा हुआ अनेक दिशाओंमें घूमकर दूसरे स्थानपर आश्रय न पाकर बन्धनके स्थानपर ही आ जाता है इसी प्रकार निश्चयसे, हे सोम्य! यह मन अनेक दिशाओंमें अपने घूम - घामकर ( २१४ )

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सूत्र २८ ] तज्जपस्तदर्थभावनम् * * [ समाधिपाद किसी दूसरे स्थानपर आश्रय न मिलनेके कारण प्राणका ही सहारा लेता है; क्योंकि हे सोम्य! मन प्राणके साथ बँधा हुआ है । ऊँची अवस्थावाले योगीजन समाधि - अवस्थामें इस प्रकार सूक्ष्म जगत्‌में इस सूक्ष्म शरीरसे भ्रमण करते हैं, जिस प्रकार चर्खीपर चढ़ी हुई डोरी ढीली करनेसे पतंग आकाशमें उड़ा चला जाता है और जिस प्रकार डोरी चर्खीपर लपेटनेसे पतंग फिर अपने स्थानपर आ जाता है, इसी प्रकार सूक्ष्म शरीर फिर अपने स्थानपर लौट आता है । ' महाविदेहा - बहिरकल्पिता ' वृत्तिवाले ( ३ । ४३ ) सिद्ध योगी समाधिसे भिन्न अवस्थामें भी स्वेच्छानुसार सूक्ष्म जगत् में सूक्ष्म शरीरसे भ्रमण कर सकते हैं । इस सूक्ष्म शरीरद्वारा ही चित्तमें जन्म, आयु और भोग देनेवाले वासनाओंके संस्कार ( कर्माशय ) एकत्रित रहते हैं । जिस प्रकार चर्खीका डोरा टूटनेपर पतंग जब दूसरी चखींके डोरेमें जोड़ दी जाती है तो उसका सम्बन्ध फिर उसी चर्खीसे हो जाता है, इसी प्रकार मृत्युके समय हृदयरूपी चर्खीसे प्राणरूपी डोरी टूटनेपर सूक्ष्म शरीररूपी पतंग उड़ता हुआ ऐसे गर्भके पास पहुँच जाता है जहाँ उसकी वासनाओं ( प्रधान - कर्म - विपाक ) की पूर्ति करनेवाले उसके समान संस्कार होते हैं, ( व्याख्या २ । १२-१३ ) । वहाँ उसके हृदयग्रन्थिरूपी चर्खीमें इसके प्राणोंकी गाँठ लग जाती है और इस शरीरके साथ पूर्ववत् कार्य होने लगते हैं I कई योगाचार्योंका मत है कि सूक्ष्म शरीरका सूक्ष्म - जगत्‌में भ्रमण नहीं होता है । सूक्ष्म जगत्में काल और दिशाका ऐसा भेद नहीं रहता जैसा स्थूल जगत् और स्थूल शरीरके व्यवहारमें होता है; केवल वृत्तियाँ जाती हैं अर्थात् चित्तमें इन्हीं वृत्तियोंद्वारा ऐसा परिणाम होता है और सूक्ष्म शरीर जाता हुआ प्रतीत होता है । अनन्तं वै मनः । ( बृहदारण्यकोपनिषद् ) चित्त अनन्त अर्थात् विभु है । वृत्तिरेवास्य विभुनश्चित्तस्य संकोचविकासिनीत्याचार्यः । ( योगदर्शन ४ । १० व्यासभाष्य ) इस विभु चित्तकी वृत्ति ही संकोच - विकास धर्मवाली है; ऐसा आचार्य ( पतञ्जलि मुनि ) मानते हैं । कई सज्जनोंका ऐसा विचार है कि समाधि - अवस्थामें जो सूक्ष्म जगत्का अनुभव होता है, वह स्वप्न जगत्के समान कल्पित ही होता है । उस समय जैसी वृत्ति उदय होती है वैसे ही दृश्य सामने आकर दिखलायी देने लगते हैं । इस सम्बन्धमें इतना कह देना पर्याप्त है कि स्वप्न रजोगुणपर तमोगुणकी अधिकता ( प्रभाव ) से होता है और समाधि रजोगुणपर सत्त्वगुणकी अधिकता ( प्रभाव ) से होती है जैसा उतने ऊपर बतला आये हैं । समाधिमें जितनी मात्रामें सत्त्व तम और रजसे दबकर प्रधानरूपसे रहता है ही अंशमें ये दृश्य कल्पित होते हैं । एकाग्रताके बढ़नेके साथ - साथ जितना - जितना सत्त्वका प्रकाश बढ़ता जाता है, उतनी - उतनी इन दृश्योंकी वास्तविकता बढ़ती जाती है । कारण - शरीर — चेतनसे प्रतिबिम्बित सत्त्व - चित्त जिसमें अहंकार बीजरूपसे छिपा हुआ अपने है उसको कारण- ग - शरीर समझना चाहिये । जब कार्यको बंद किये हुए रहता है, जिसकी संज्ञा अस्मिता ( २१५ )

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पातञ्जलयोगप्रदीप--2 विश्व 2 तेजस १ विराट महक हिरण्यगर्म2 प्राज्ञ १ ईश्वर ३ अग्नि ३. ? आदित्य ॐ II मकारविराम उकार अकार तनतत्व शुद्ध ॐकारका भावनामय चित्र - शुद्ध निर्गुण, उपाधिरहित चेतन अर्थात् परमात्म - तत्त्व ( चेतन तत्त्वका शुद्ध स्वरूप ) । ( १ ) विराम = ( २ ) मकार = चेतन तत्त्व + समष्टि कारण - जगत् तथा व्यष्टि कारण - शरीर । समष्टि कारण - जगत्का अधिष्ठाता ‘ ईश्वर ’, उपास्य; व्यष्टि कारण- शरीरका अभिमानी ' प्राज्ञ ' उपासक ( चेतन तत्त्वका शबल - स्वरूप ) । ( ३ ) उकार = चेतन तत्त्व + समष्टि सूक्ष्म जगत् तथा व्यष्टि सूक्ष्म शरीर । समष्टि अधिष्ठाता ‘ हिरण्यगर्भ ’ तथा व्यष्टि सूक्ष्म शरीरका अभिमानी ' तैजस ' सूक्ष्म जगत्का उपासक ( चेतन तत्त्वका शबल - स्वरूप ) । ( ४ ) अकार = चेतन तत्त्व + समष्टि स्थूल जगत् तथा व्यष्टि स्थूल शरीर ‘ विराट् ’ उपास्य; तथा व्यष्टि स्थूल शरीरका अभिमानी ' विश्व । समष्टि स्थूल जगत्का अधिष्ठाता ' उपासक ( चेतन तत्त्वका शबल - स्वरूप ) ।