पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 291–300
पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 291–300
पृष्ठ 291
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
समाधिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप* सूत्र ४ ९ -५० ] श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात् ॥ ४ ९ ॥ शब्दार्थ –श्रुत - अनुमान- प्रज्ञाभ्याम् = आगम और अनुमानकी प्रज्ञासे; अन्य - विषया - इस ऋतम्भरा प्रज्ञाका विषय अलग है; विशेष- अर्थत्वात् = विशेषरूपसे अर्थका साक्षात्कार करनेसे । अन्वयार्थ — आगम और अनुमानकी प्रज्ञासे ऋतम्भरा प्रज्ञाका विषय अलग है, विशेषरूपसे अर्थका साक्षात्कार करनेसे । व्याख्या — पदार्थके दो रूप होते हैं - एक सामान्य, दूसरा विशेष । सामान्य वह है, जो उस प्रकारके सब पदार्थोंमें पाया जाता है और विशेष वह है, जो प्रत्येक व्यक्तिका अपना - अपना रूप है, जिससे एक ही प्रकारके पदार्थोंमें भी एक - दूसरेसे भेद हो सकता है । आगम - जन्य ज्ञान वस्तुके सामान्य रूपको ही विषय करता है, विशेष रूपको नहीं; क्योंकि विशेषके साथ शब्दका वाच्य वाचक - भाव सम्बन्ध नहीं होता है । शास्त्रने जिस वस्तुके साथ शब्दका संकेत किया है, उस वस्तुको वह शब्द सामान्यरूपसे ही बोधन करता है, न कि विशेषरूपसे । गो, वृक्षादि शब्दोंके सुननेसे गो, वृक्षादिका सामान्य ज्ञान होता है, व्यक्तिविशेष गो, वृक्षादिका विशेष ज्ञान नहीं होता । इसी प्रकार अनुमान भी सामान्यरूपसे वस्तुका ज्ञान उत्पन्न कराता है, विशेषरूपसे नहीं; क्योंकि अनुमानमें लिङ्गसे लिङ्गीका ज्ञान होता है, जहाँ लिङ्गकी प्राप्ति नहीं वहाँ अनुमान नहीं हो सकता, जैसे ' जहाँ धूम है वहाँ अग्नि है, जहाँ प्राप्ति है वहाँ गति है; जहाँ गतिका अभाव है, वहाँ प्राप्तिका अभाव है । ' केवल प्रत्यक्ष - प्रमाण ही वस्तुके विशेष रूपको दिखलानेमें समर्थ होता है; किंतु इन्द्रिय - जन्य प्रत्यक्ष - ज्ञान भी स्थूल वस्तुओंके ही प्रत्यक्ष रूपको दिखला सकता है, न कि सूक्ष्म, व्यवहित और विप्रकृष्ट अतीन्द्रिय पदार्थोंको । पञ्चतन्मात्राएँ, अहंकार, महत्तत्त्व, प्रकृति, पुरुष आदि सूक्ष्म पदार्थोंमें प्रत्यक्षकी भी पहुँच नहीं है । आगम और अनुमानसे इनके सामान्य रूपका ही पता लग सकता है, इनके विशेष रूपको नहीं बतला सकते । निर्विचार समाधिकी विशारदतामें होनेवाली ऋतम्भराप्रज्ञासे ही इन सूक्ष्म पदार्थोंके विशेष रूपका साक्षात्कार हो सकता है, अन्य किसी प्रमाणसे नहीं । अतएव यह प्रज्ञा विशेषविषयक होनेसे श्रुत - अनुमान प्रज्ञासे अन्य और उत्कृष्ट है । यही परम प्रत्यक्ष है । यह श्रुत और अनुमानका बीज है, अर्थात् श्रुत और अनुमान इसके आश्रय हैं, न कि यह उनके । वस्तुके इस यथार्थ स्वरूपको ही आगम बतलाता है और इसीका अनुमान किया जाता है । यहाँ ऋतम्भरा प्रज्ञाको प्रसंख्यान अर्थात् विवेक - ख्यातिके तुल्य समझना चाहिये । संगति — इस प्रज्ञाका फल अगले सूत्रमें बतलाते हैं— तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी ॥ ५० ॥
शब्दार्थ — तत् - जः = उस ऋतम्भरा प्रज्ञासे उत्पन्न होनेवाला; संस्कारः = संस्कार; अन्य-संस्कार- प्रतिबन्धी = दूसरे ( सब व्युत्थानके ) संस्कारोंका प्रतिबन्धक ( रोकनेवाला ) होता है । अन्वयार्थ — उस ऋतम्भरा प्रज्ञासे उत्पन्न होनेवाला संस्कार अन्य सब व्युत्थानके संस्कारोंका बाधक ( रोकनेवाला ) होता है व्याख्या - समाधिसे पूर्व चित्त केवल व्युत्थानके संस्कारोंसे ही संस्कृत होता है । फिर जब समाधि ( २६६ )
पृष्ठ 292
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सूत्र ५१ ] * तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः * [ समाधिपाद अवस्थामें जो उसको अनुभव होता है उसके भी संस्कार पड़ते हैं । ये संस्कार व्युत्थानके संस्कारोंसे बलवान् होते हैं; क्योंकि समाधि - प्रज्ञा व्युत्थानकी प्रज्ञासे अधिक निर्मल होती है । उसकी निर्मलतामें पदार्थका तत्त्व अनुभव होता है । जितना तत्त्वका अनुभव होता है उतने ही उसके संस्कार प्रबल होते हैं । इन संस्कारोंकी प्रबलतासे फिर समाधि - प्रज्ञा होती है । इस समाधि- प्रज्ञासे उत्पन्न हुए संस्कार व्युत्थानके संस्कारों और वासनाओंको हटाते हैं । व्युत्थानके संस्कारोंके दबनेसे उनसे उत्पन्न होनेवाली वृत्तियाँ भी दब जाती हैं । उन वृत्तियोंके निरोध होनेपर समाधि उत्पन्न होती है । इससे समाधि- प्रज्ञा, समाधि- प्रज्ञासे फिर समाधिके संस्कार — इस प्रकार यह चक्र लगातार चलता रहता है । यहाँतक कि निर्विचार - समाधि उपस्थित हो जाती है । फिर निर्विचार - समाधिसे ऋतम्भरा प्रज्ञाका लाभ होता है । उस प्रज्ञासे निरोध - संस्कार होता है, निरोध - संस्कारसे फिर ऋतम्भरा प्रज्ञाका प्रकर्ष, उस प्रज्ञासे फिर निरोध - संस्कारका प्रकर्ष – इस प्रकार लगातार चक्रसे निरोधके संस्कार पुष्ट हो - होकर व्युत्थानके संस्कारोंको सर्वथा रोक देते हैं । शङ्का — जब समाधि - प्रज्ञा - जन्य संस्कार विद्यमान ही रहते हैं, तब वे संस्कार चित्तको अधिकार - विशिष्ट क्यों नहीं करते; क्योंकि जो चित्त वासना - जनित संस्कारोंसे युक्त होता है, वह जन्मादि दुःख देनेकी योग्यतावाला होनेसे अधिकार - विशिष्ट कहा जाता है 1 समाधान- – यद्यपि संस्कार विद्यमान रहते हैं तथापि वे संस्कार क्लेशक्षयके हेतु होनेसे चित्तको अधिकार - विशिष्ट नहीं करते; प्रत्युत चित्तको अधिकारसे रहित करते हैं; क्योंकि जो संस्कार क्लेशादि वासनासे उत्पन्न होते हैं, वे ही संस्कार चित्तको अधिकार - विशिष्ट करते हैं, न कि ऋतम्भरा - प्रज्ञा - जन्य । भाव यह है कि चित्तका दो कार्योंमें अधिकार है; एक शब्द - रूप- रसादि विषयोंका पुरुषको भोग देना, दूसरा विवेक- ख्याति उत्पन्न करना । उनमें भोग - हेतु क्लेशादि वासना - जनित संस्कार - विशिष्ट चित्त भोगादि अधिकारवाला होता है और समाधि - जन्य संस्कारसे क्लेश - संस्काररहित हुआ चित्त विवेक- ख्याति अधिकारवाला कहा जाता है । इन दोनोंमेंसे पहिला ही अधिकार योगका हेतु है, न कि दूसरा । विवेक - ख्यातिके उदय होनेसे भोगाधिकारकी समाप्ति हो जाती है; क्योंकि विवेक - ख्यातिके उत्पादन- पर्यन्त ही चित्तकी चेष्टा रहती है, इसके पश्चात् नहीं रहती । सङ्गति — सबीज - समाधिका सबसे ऊँची चोटीतक वर्णन करके अब निर्बीज - समाधिको बतलाते हैं-तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः ॥ ५१ ॥
शब्दार्थ — तस्य = ( पर - वैराग्यद्वारा ) उस ऋतम्भरा प्रज्ञा - जन्य संस्कारके; अपि = भी; निरोधे = निरोध जानेपर; सर्वनिरोधात् = ( पुरातन - नूतन ) सब संस्कारोंके निरोध होनेसे; निर्बीजः समाधिः - निर्बीज - समाधि होती है । अन्वयार्थ - पर - वैराग्यद्वारा उस ऋतम्भरा प्रज्ञा - जन्य संस्कारके भी निरोध हो जानेपर पुरातन - नूतन सब संस्कारोंके निरोध हो जानेसे निर्बीज - समाधि होती है । व्याख्या – पर - वैराग्यद्वारा जो निखिल - वृत्ति प्रवाह तथा संस्कार - प्रवाह निरोध है, वह निर्बीज - समाधि है । सम्प्रज्ञात - समाधि किसी ध्येयको आलम्बन ( आश्रय ) बनाकर की जाती है । यह आलम्बन ही बीज है । इसलिये उसको सबीज, सालम्ब्य तथा सम्प्रज्ञात कहते हैं; किंतु असम्प्रज्ञात - समाधिमें ( २६७ )
पृष्ठ 293
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
समाधिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * * [ सूत्र ५१ आलम्बनका अभाव होता है । आलम्बनका अभाव करते - करते अभाव करनेवाली वृत्तियोंका भी अभाव होनेपर जो समाधि होती है, वह असम्प्रज्ञात है । आलम्बन न रहनेसे इसको निर्बीज, निरालम्ब्य तथा असम्प्रज्ञात - समाधि कहते हैं यह निरोध केवल समाधि - जन्य ऋतम्भरा प्रज्ञाका ही विरोधी नहीं है; किंतु प्रज्ञाजन्य संस्कारोंका भी विरोधी है । इसीके बोधनार्थ सूत्रमें ( तस्यापि ) यह ' अपि ' शब्द दिया गया है । अर्थात् इस निरोधसे जो संस्कार उत्पन्न होता है, वह सब सम्प्रज्ञात -समाधि - जन्य संस्कारोंको रोककर ही उदय होता है । यद्यपि इस सर्ववृत्ति - निरोधमें तथा पर - वैराग्य - जन्य संस्कारोंमें प्रत्यक्ष - प्रमाणकी योग्यता नहीं है; क्योंकि सर्ववृत्ति - निरोधका योगीको प्रत्यक्ष होना असम्भव है । इसी प्रकार स्मृतिरूप कार्यसे भी निरोध - संस्कारका अनुमान नहीं हो सकता; क्योंकि वृत्तिमात्रका निरोध होनेके कारण ये संस्कार स्मृति उत्पन्न नहीं कर सकते हैं, तथापि चित्तकी निरुद्धावस्थाका जो मुहूर्त, प्रहर, दिन - रात्रिरूपादि कालक्रम है, उससे निरोध - संस्कारोंका अनुमान होता है । अर्थात् योगीकी जो वृत्तियोंका निरोध होता है, वह एक कालमें नहीं होता है; किंतु पहिले एक घटी, फिर दो घटी, फिर एक प्रहर इत्यादि क्रमसे होता है । इसीसे निरोध - वृद्धिका सद्भाव सिद्ध होता है । भाव यह है, जैसे - जैसे स्वरूपस्थितिके अभ्याससे व्युत्थान तथा समाधिके संस्कारोंकी न्यूनता होती है, वैसे - वैसे निरोधके संस्कारोंकी सत्ताका अनुमान कर लेना चाहिये; क्योंकि बिना निरोध - संस्कारकी सत्ताके समाधि - प्रज्ञा - जन्य संस्कारोंकी न्यूनता होनी असम्भव है । इस निरोधावस्थामें क्लेश - जनक व्युत्थान- संस्कार तथा कैवल्योपयोगी सम्प्रज्ञात -समाधि - जन्य संस्कारोंके सहित ही चित्त अपनी प्रकृतिमें प्रविलय होकर अवस्थित हो जाता है यद्यपि निरोध - संस्कारोंके सद्भावसे यह चित्त किंचित् अधिकार - विशिष्ट ही प्रतीत होता है तथापि ये संस्कार अधिकारके विरोधी ही हैं, न कि भोगके हेतुः क्योंकि उस दशामें शब्द - रूप - रसाद्युपभोग तथा विवेकख्याति — ये दोनों ही अधिकार निवृत्त हो जाते हैं । इसलिये यह चित्त निरोधावस्थामें समाप्त अधिकारवाला होकर संस्कारोंके सहित निवृत्त हो जाता है । इस समाप्त अधिकारवाले चित्तके निवृत्त होनेसे पुरुष शुद्ध परमात्मस्वरूपमें प्रतिष्ठित हुआ केवल शुद्ध तथा मुक्त कहा जाता है । इस असम्प्रज्ञात -समाधिके लाभसे ही योगी जीवन्मुक्त - पदको प्राप्त होता है । यह असम्प्रज्ञात - योग ही सब कर्तव्योंकी सीमा है । विशेष विचार ( सूत्र ५१ ) - गुण एक क्षण भी बिना परिणामके नहीं रहते । चित्तमें दो प्रकारका परिणाम होता है । एक आन्तरिक परिणाम — जो स्वाभाविक, वास्तविक स्वरूप " सत्त्वचित्त " में होता है; दूसरा बाह्य — जो नाना प्रकारकी वृत्तियोंमें होता है । असम्प्रज्ञात अर्थात् निर्बीज - समाधिकी अवस्थामें चित्तमें कोई वृत्ति नहीं रहती । वृत्तियोंको रोकनेवाले संस्कार रहते हैं, जिनको ( १ । १८ ) में संस्कार - शेषके नामसे वर्णन किया गया है । इन संस्कारोंके कारण चित्तमें बाहरसे निरोध अर्थात् वृत्तियोंके रोकनेका परिणाम होता रहता है ( ३ । ९ ) । चित्तमें इस निरोध - परिणामके कारण पुरुष किसी बाह्य दृश्यका द्रष्टा नहीं रहता; किंतु शुद्ध परमात्मस्वरूपमें अवस्थित रहता है और चित्त पुरुषको दृश्य दिखलानेके कार्यको बंद करके अपने ( २६८ )
पृष्ठ 294
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सूत्र ५१ ] * तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः ** [ समाधिपाद स्वरूपमें अवस्थित होता है । ये चित्तको बनानेवाले गुण कैवल्यकी अवस्थामें तो अपने कारणमें लीन हो जाते हैं; परंतु इस निरोध - परिणामकी अवस्थामें अपने “ सत्त्वचित्त " स्वरूपमें अवस्थित रहते हैं । इनमें अब केवल आन्तरिक परिणाम होता रहता है, जो शान्त प्रवाहवाला और स्वाभाविक है, जिसका वर्णन ( ३। १० ) में किया जायगा । निरोधसे भिन्न व्युत्थान- अवस्थामें पुरुष वृत्ति - सारूप्य प्रतीत होता है और असम्प्रज्ञात - समाधिमें चित्त पुरुष- सारूप्य वृत्तिरहित चेतन प्रतीत होता है । असम्प्रज्ञात - समाधि भङ्ग होनेपर निरोध - संस्कार दबते जाते हैं और व्युत्थानके संस्कार प्रबल होते जाते हैं । यहाँपर व्याख्याताके गुरु - भाई श्रीमान् हरिभजनजीने ( अपने काष्ठमौन- -व्रत धारण करनेसे कुछ पूर्व मौनावस्थामें ) इस सम्बन्धमें जो अपने अनुभवद्वारा प्राप्त किये हुए विचारोंको लिखकर दिया था, उनको उन्हींके शब्दोंमें लिख देना जिज्ञासुओंके लिये उपयोगी होगा । श्रीमान् हरिभजनजीका संक्षिप्त परिचय ये महात्मा पूर्व - जन्मके वैराग्यके संस्कारोंके उदय होनेपर अपने बाल्यकालहीमें पूज्यपाद श्रीस्वामी सोमतीर्थजी महाराजकी सेवामें रहकर कई वर्षतक योग - साधन करते रहे । तत्पश्चात् कई वर्षतक पुराने गुरुकुल काँगड़ीके एक स्थानमें मौन साधकर अपनी अवस्थाको परिपक्व करते रहे । गत हरिद्वार कुम्भके पश्चात् मास मई सन् १ ९ ३८ ई ० में काष्ठमौन धारण कर लिया । मास जून १ ९ ३ ९ ई ० से उनके कोई समाचार किसी प्रकारके नहीं मिले । उनके पिता, भाई, कुटुम्बियों तथा भक्त और प्रेमी मित्रोंने उनके खोजनेमें पूर्ण प्रयत्न किया, परंतु अबतक कुछ पता नहीं लगा है । उनके अनुभव “ अब स्वरूप - स्थितिको समझें । प्रयत्नसे जब विक्षिप्त चित्तको एकाग्र किया जाता है और फिर उसे निरुद्ध किया जाता है, तब सर्ववृत्ति - निरोध हो जानेपर जो पुरुषका अपने स्वरूपमें अवस्थिति हो जाना है, उसका नाम स्वरूपस्थिति नहीं है, उसका नाम पुरुषका अपने स्वरूपमें अवस्थित होना है । स्वरूपस्थिति उससे बहुत ऊँची स्थिति है । जैसे विक्षिप्त - भूमि चित्तको यदि हम किसी साधन - विशेषसे एकाग्र कर दें तो थोड़ी देर एकाग्र रह जानेपर भी हम उसको एकाग्र स्थिति नहीं कह सकते; यह उसकी एकाग्र अवस्था ही है । अथवा एकाग्र - भूमि चित्तको यदि हम प्रयत्नसे वृत्ति निरोधद्वारा निरुद्ध कर दें तो हम उसे निरुद्ध - भूमि - चित्त नहीं कह सकते; यह उसकी निरुद्धावस्था है, निरुद्ध - स्थिति नहीं है । इसी तरह जबतक हम चित्तको विक्षिप्त और एकाग्रस्थितिसे किसी साधनद्वारा निरुद्ध करते हैं, तबतक हम स्वरूप - स्थिति नहीं कह सकते; यह पुरुषका अपने स्वरूपमें केवल अवस्थित होनामात्र है । जब चित्तकी विक्षिप्त और एकाग्र - भूमि सर्वथा निरुद्ध - भूमिमें बदल दी जाय, जब यह बिना किसी साधनके निरुद्ध रहने लगे, तब ऐसी अवस्थामें जो पुरुषका अपने स्वरूपमें स्थित हो जाना है वही स्वरूप - स्थिति है । स्वरूप - स्थितिवालेकी पुनः इतर ( व्युत्थान ) स्थिति कहना पूरी - पूरी भूल है; क्योंकि स्वरूप - स्थिति स्वाभाविक स्थिति है, वह बदल नहीं सकती; और जबतक वह स्वाभाविक नहीं तबतक स्वरूप - स्थिति नहीं कहला सकती । अतः स्वरूप - स्थिति वह स्थिति है जब कि चित्तकी विक्षिप्त और एकाग्र - भूमि पूर्णरूपसे निरुद्धभूमिमें ( २६ ९ )
पृष्ठ 295
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
समाधिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप* * [ सूत्र ५१ बदल चुकी हो और ऐसी स्थितिमें चित्त - वृत्ति - निरुद्ध सहज ही, स्वाभाविक ही, अनायास ही रहने लगी हो; और इसीलिये उसे किसी प्रकारके भी प्रयत्नकी आवश्यकता नहीं रहती है । ऐसी स्थिति आनेपर पुरुषका सहज ही, स्वाभाविक ही, अनायास ही अपने स्वरूपमें स्थित हो जाना है; वही स्वरूप - स्थिति जो । स्वरूप - स्थिति तो उस स्थितिका नाम है जहाँ चित्त अनायास ही, सहज ही, स्वाभाविक ही है निरुद्ध - स्थितिमें रहता हो । पुरुषकी ' स्वरूपमें अवस्थिति ' और ' स्वरूपस्थिति ' में बड़ा भारी अन्तर है । पहली प्रयत्नकी अवस्था है, दूसरी सहज स्थिति है । इतना और याद रहे कि ऐसी स्थिति आनेपर जिस जिज्ञासुकी स्वरूप - स्थिति हो गयी हो, उसको भोगवश कोशमयी अवस्थामें भी प्रारब्धानुसार यद्यपि आना पड़ता है, परंतु उस समयसे पहले; क्योंकि वह स्वरूपमें स्थित था और भोग - समयके समाप्त हो जानेके बाद वह स्वरूप - स्थितिमें ही रहता है, इसलिये भोगकालकी स्थिति भी उसकी स्वरूपस्थिति ही कही जायगी । भोगसे पहले तथा भोगके पीछे जिसकी स्वरूपमें स्थिति है, वह भोग - कालमें भी स्वरूपमें स्थित कहा जायगा । यद्यपि यह भोग भोगते समय कोशमयी हालतमें है; परंतु वह उसकी कोशमयी अवस्था है, कोशमयी स्थिति नहीं । जैसे एकाग्रभूमि चित्तको जब हम प्रयत्नसे निरुद्ध कर देते हैं, तब वह उसकी निरुद्ध - स्थिति नहीं, वरं निरुद्धावस्था है । इसी तरह स्वरूपस्थितिवालेको जब - जब भी भोगवश कोशमयी हालतमें आना पड़ता है, तब - तब वह उसकी कोशमयी अवस्था ही कही जायगी, न कि कोशमयी- स्थिति । स्थिति तो उसकी स्वरूपस्थिति ही है और उस कोशमयी अवस्थामें भी वह तभीतक आता है, जबतक भोग समाप्त हो जानेपर वह सदाके लिये अपने स्वरूपमें सुप्रतिष्ठित नहीं हो जाता है । " अर्थात् जबतक व्युत्थान- चित्तकी दशामें वृत्तियोंका निरोध क्रिया - जन्य हो, प्रयत्नसे हो और स्थायी, दृढ़भूमि, स्वाभाविक, सहज और स्वयं होनेवाला न हो गया हो, तबतक वह ' निरोधकी अवस्था ' अथवा ‘ स्वरूपावस्था ' है, ‘ निरोधकी स्थिति ' अथवा ' स्वरूपस्थिति ' नहीं है; बल्कि उस समयतक व्युत्थानकी ही स्थिति है जो कि स्वाभाविक और दृढ़भूमि बनी हुई है । जब चित्तकी वृत्तियोंका निरोध स्थायी और दृढ़भूमि हो जाय और बिना किसी क्रिया और प्रयत्नके स्वाभाविक, सहज ही प्रतिक्षण ( हर समय ) बना रहे, तब वह ' निरोधकी स्थिति ' अथवा ' स्वरूपस्थिति ' कहलायेगी । प्रश्न — क्या स्वरूपस्थिति हो जानेपर योगीके सब कार्य बंद हो जाते हैं? क्योंकि कोई भी काम बिना व्युत्थानकी अवस्थाके नहीं हो सकता । उत्तर — नहीं; बिना कर्मके कोई शरीरधारी नहीं रह सकता । ( श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय ३।४ – ९ )
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽनुते ।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥ ४ ॥
मनुष्य न ( तो ) कर्मोंके न करनेसे ' निष्कर्मता ' को प्राप्त होता है ( क्योंकि कर्मोंका न करना भी एक प्रकारका सकाम कर्म है ) और न कर्मोंको त्यागनेमात्रसे ' स्वरूपस्थिति ' रूप सिद्धिको प्राप्त होता है ।
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ ५ ॥
( २७० ) पा ० यो ० प्र ० १०-
पृष्ठ 296
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सूत्र ५१ ] * तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः * [ समाधिपाद क्योंकि कोई भी ( पुरुष ) किसी काल क्षणमात्र भी बिना कर्म किये नहीं रहता, निःसंदेह सभी पुरुष प्रकृतिसे उत्पन्न हुए गुणोंद्वारा परवश हुए कर्म करते हैं ।
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान् विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥ ६ ॥
जो मूढ़बुद्धि पुरुष कर्मेन्द्रियोंको ( हठसे ) रोककर इन्द्रियोंके भोगोंका मनसे चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात् दम्भी, असंयमी कहा जाता है ( क्योंकि उसकी इन्द्रियाँ वास्तवमें संयमित नहीं होतीं ) ।
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
स विशिष्यते ॥ ७ ॥
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः और हे अर्जुन! जो ( पुरुष ) मनसे इन्द्रियोंको वशमें करके अनासक्त हुआ, कर्मेन्द्रियोंसे कर्मयोगका आचरण करता है, वह श्रेष्ठ है ।
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः ॥ ८ ॥
तू शास्त्रविधिसे नियत किये हुए स्वधर्मरूप ( कर्तव्यरूप ) कर्मको कर; क्योंकि कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करनेसे तेरी शरीर - यात्रा भी सिद्ध नहीं होगी ( कर्म करते रहना ही जीवित शरीरका स्वभाव है, हठसे कर्म छोड़ देना शरीरका दुरुपयोग और अज्ञान है ) । यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं
कर्मबन्धनः ।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥। ९ ॥
यज्ञ अर्थात् आसक्तिरहित निष्कामभावसे सब प्राणियोंके कल्याणार्थ अथवा अपनी भोग - निवृत्तिके लिये ईश्वर - निमित्त किये हुए कर्मके सिवा अन्य कर्ममें ( लगा हुआ ही ) यह मनुष्य कर्मोंद्वारा बँधता है, इसलिये हे अर्जुन! आसक्तिसे रहित हुआ उस परमेश्वरके निमित्त कर्मका भली प्रकार आचरण कर । ‘ निरोध - स्थिति ’ अथवा ‘ स्वरूप - स्थिति ' वाले योगीके कर्म भोग - निवृत्ति अथवा परमात्माकी आज्ञा पालन करते हुए प्राणिमात्रके कल्याणार्थ ईश्वर - निमित्त होते हैं । इन निष्काम और आसक्तिरहित कर्मोंके करनेमें उसकी ‘ व्युत्थान ' की स्थिति नहीं होती, स्थिति तो ' निरोध ' की ही रहती है । यह उसकी ' व्युत्थानकी अवस्था ' है, जो -जन्य है । ये कर्म निष्कामभावसे अस्वाभाविक, अस्थायी और अदृढ़ तथा क्रिया- और आसक्ति तथा वासना - रहित होते हैं, इसलिये आगेके लिये भोग और बन्धनके संस्कारोंके उत्पादक नहीं होते । इस ' स्वरूप - स्थिति ' को गीतामें ‘ समाधि - स्थिति ' और ऐसे योगीको ' स्थितप्रज्ञ ' के नामसे वर्णन किया है ।
( गीता अध्याय २ श्लोक ५४ से ६१ ) -स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥ ५४ ॥
हे केशव! ‘ समाधिस्थस्थितप्रज्ञ ' का क्या लक्षण है? ( और ) ' स्थितप्रज्ञ ' कैसे बोलता है? कैसे बैठता है? कैसे चलता है?
प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् ।
स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥ ५५ ॥
आत्मन्येवात्मना तुष्टः ( २७१ )
पृष्ठ 297
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
समाधिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ५१ हे अर्जुन! जिस समय ( यह पुरुष ) मनमें इच्छित सब इच्छाओंको त्याग देता है, उस आत्मासे ही आत्मामें संतुष्ट हुआ, ' स्वरूपस्थिति ' को प्राप्त हुआ, ' स्थितप्रज्ञ ' कहा जाता है । समय दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः । वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥ ५६ ॥
दुःखोंकी प्राप्तिमें उद्वेग - रहित है मन जिसका, ( और ) सुखोंकी प्राप्तिमें दूर हो गयी है स्पृहा जिसकी ( तथा ) नष्ट हो गये हैं राग, भय और क्रोध जिसके; ऐसे मुनिको ' स्थितप्रज्ञ ' कहा जाता है I ।
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ५७ ॥
जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ, उस - उस शुभ तथा अशुभ ( वस्तुओं ) को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है ( और ) न द्वेष करता है, उसकी प्रज्ञा स्थिर है ।
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ५८ ॥
और कछुआ ( अपने ) अङ्गोंको जैसे ( समेट लेता है, वैसे ही ) यह पुरुष जब सब ओरसे ( अपनी ) इन्द्रियोंको इन्द्रियोंके विषयोंसे समेट लेता है ( तब ) उसकी ' प्रज्ञा ' स्थिर होती है । विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः । रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥ ५ ९ ॥ ( इन्द्रियोंके द्वारा ) विषयोंको न ग्रहण करनेवाले पुरुषके ( भी केवल ) विषय ( तो ) निवृत्त हो जाते हैं ( परंतु ) राग नहीं ( निवृत्त होता ); और इस ( स्थितप्रज्ञ समाधिस्थ ) पुरुषका ( तो ) राग भी ‘ परम - तत्त्व ' को साक्षात् करके निवृत्त हो जाता है । यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः । इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥ ६० ॥
हे अर्जुन! जिससे ( कि ) यत्न करते हुए बुद्धिमान् पुरुषके भी मनको यह प्रमथन करनेवाली इन्द्रियाँ बलात् हर लेती हैं ।
तानि सर्वाणि सयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ६१ ॥
उससे उन सब इन्द्रियोंको वशमें करके समाहित - चित्त हुआ, मेरे ( परमात्म - तत्त्वके ) परायण ( स्थित ) होवे; क्योंकि जिस पुरुषके इन्द्रियाँ वशमें होती हैं, उसकी ही ' प्रज्ञा ' स्थिर होती है ।
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥
( गीता २ । ६ ९ ) सर्व प्राणियोंकी जो रात है, उसमें संयमीसमाधिस्थ ( स्थितप्रज्ञ योगी ) जागता है । जिसमें अन्य प्राणी जागते हैं, वह तत्त्वको जाननेवाले ( स्थितप्रज्ञ ) मुनिके लिये रात है । अर्थात् सुषुप्ति - अवस्थामें सब प्राणी तमोगुणके प्रभावसे अन्तर्मुखवृत्ति होकर हृदयाकाशमें आनन्दमय कोश ( कारण - शरीर ) में रहते हैं । तमोगुणके अन्धकारके कारण ब्रह्मानन्दमें रहते हुए भी वे उससे वञ्चित रहते हैं, जैसा कि उपनिषदोंमें कहा गया है-इमाः सर्वाः प्रजाः सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पद्यामह इति । ( छा ० ६।९ ।२ ) सुषुप्ति में ये सारी प्रजाएँ ( प्राणी ) सत् - ब्रह्ममें रहते हुए भी नहीं जानते कि हम ब्रह्ममें स्थित हैं । ( २७२ )
पृष्ठ 298
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सूत्र ५१ ] * तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः * [ समाधिपाद स्थितप्रज्ञ योगी सत्त्वगुणके प्रभावसे आनन्दमय कोश अर्थात् कारण - शरीरमें अन्तर्मुख होता है, इसलिये ज्ञानके प्रकाशसे ब्रह्मानन्दको प्राप्त करता है; यह उसका जागना है । जाग्रत् - अवस्थामें सब प्राणी व्युत्थान दशामें रहते हुए सांसारिक कार्य करते हैं, किंतु स्थितप्रज्ञ योगी सब कार्योंको अपने भोगनिवृत्ति अथवा ईश्वरकी ओरसे कर्तव्यमात्र समझता हुआ ममता और अहंतासे रहित, अनासक्ति और निष्काम - भावसे करता है । इससे उत्पन्न होनेवाली वासनाओं तथा ममता और अहंताके भावोंसे न स्पर्श किया हुआ अन्तर्मुख ( ही ) बना रहता है । इसलिये उसका जाग्रत् - दशामें कार्य - क्षेत्रमें रहना भी रात्रिकी सुषुप्ति - अवस्थाके सदृश है, क्योंकि उससे भोग दिलानेवाली वासनाएँ तथा संस्कार चित्तमें नहीं पड़ते । ये योगी जो स्वरूपस्थितिको प्राप्त कर चुके हैं, दो प्रकारके होते हैं; पहिले – जिनके कर्म केवल -भोग - निवृत्तिके लिये ही होते हैं; दूसरे वे योगी जिनके कर्म भोग - निवृत्ति तथा निष्काम आसक्तिरहित, परमात्माकी आज्ञा पालन करते हुए समस्त प्राणियोंके कल्याणार्थ ईश्वरार्पण होते हैं । दो प्रकारकी मुक्ति — इसीके अनुसार इन दोनों प्रकारके स्वरूप - स्थितिवाले योगियोंकी मुक्ति भी दो प्रकारकी होती है-प्रथम प्रकारके योगियोंकी मुक्तिमें चित्तको बनानेवाले गुण अपने कारणमें लीन हो जाते हैं, जो सांख्य और योगका कैवल्य है । दूसरे प्रकारवालोंकी मुक्तिमें ' चित्त- सत्त्व ' अपने स्वरूपसहित ईश्वरके विशुद्ध सत्त्वमय चित्तमें ( जिसका दूसरा नाम आदित्यलोक है ) लीन ( अवस्थित ) रहता है । ईश्वरीय नियमानुसार जब - जब उनकी आवश्यकता होती है, तब - तब वे सम्पूर्ण प्राणियोंके कल्याणार्थ तथा संसारमें धर्म - मर्यादा स्थापन करनेके लिये शुद्ध चैतन्य स्वरूपसे शबल - स्वरूपमें भौतिक जगत्में अवतरण करते हैं; जिस प्रकार स्वरूपस्थिति प्राप्त किया हुआ योगी असम्प्रज्ञात- -समाधिसे व्यवहार दशामें आता है । यथा—
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥
( गीता ४। ७-८ ) ' हे भारत! जब - जब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है, तब - तब मैं अपने - आपको प्रकट करता हूँ, अर्थात् शुद्ध - स्वरूपसे शबल - स्वरूपमें आता हूँ । सज्जनोंकी रक्षाके लिये और दूषित कर्म करनेवालोंका नाश करनेके लिये ( तथा ) धर्म - स्थापन करनेके लिये युग - युगमें प्रकट होता हूँ । ' यहाँ यह भी बतला देना आवश्यक है कि आना - जाना, बन्धन और मुक्ति आदि सब क्रियाएँ अन्तःकरणमें होती हैं, चेतन तत्त्व ( पुरुष अर्थात् आत्मा ) उनका केवल साक्षी, अप्रसवधर्मी, अपरिणामी, निष्क्रिय, नित्य, सदा एकरस रहता है । उसमें बन्धन तथा मुक्तिका होना विकल्पसे आरोप किया जाता है जैसा कि सांख्यसूत्रमें बतलाया गया है । “ वाङ्मात्रं न तु तत्त्वं चित्तस्थिति ” ' पुरुषमें बन्ध आदि कथनमात्र हैं; क्योंकि चित्तमें ही बन्ध आदिकी स्थिति है ', इन निर्मल, विशाल, ज्ञानवान्, शक्तिशाली, ऐश्वर्यवान्, वैराग्ययुक्त चित्तोंमें यद्यपि ( २७३ )
पृष्ठ 299
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
समाधिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ५१ अविद्या आदि क्लेशोंका बीज सर्वथा दग्ध हो गया है, किंतु संसारके कल्याणके संस्कार शेष रहते हैं, जिनके कारण ईश्वरीय नियमानुसार समय - समयपर उनका प्रादुर्भाव होता है । इन्हें इस संकल्पको हटाकर चित्त बनानेवाले गुणोंको अपने कारणमें लीन करके कैवल्यप्राप्तिका सर्वदा अधिकार रहता है । जिस प्रकार विदेहमुक्त और जीवन्मुक्त इन दो प्रकारके भेदोंमें उन जीवन्मुक्त योगियोंको भी मुक्त माना जाता है, जिनके चित्तके बनानेवाले गुण अपने कारणमें लीन नहीं हुए हैं; किंतु उनमें अविद्या आदि क्लेश सर्वथा दग्धबीज होकर पुनः बन्धनरूप अंकुरके उत्पन्न करनेमें सर्वथा असमर्थ हो गये हैं । इसी प्रकार यहाँ भी मुक्तिके इन दोनों भेदोंको समझ लेना चाहिये । उपसंहार पूर्व अधिकार किये हुए योगका लक्षण चित्तवृत्ति - निरोध इन पदोंका व्याख्यान, अभ्यास और वैराग्यरूप दोनों उपायोंका स्वरूप और भेद कहकर, सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात भेदसे योगके मुख्य और गौणभेदको कहकर, योगाभ्यासको दिखलाते हुए, विस्तारसे उसके उपायोंको बतलाकर; और सुगम उपाय होनेसे ईश्वरका स्वरूप, प्रमाण, प्रभाव और उसका वाचक नाम तथा उपासनाओंको बतलाकर और उनके फलोंका निर्णय कर, फिर चित्तके विक्षेप ( व्याधिस्त्यानादि तीसवें सूत्रोक्त ) और चित्त - विक्षेपके सहकारी दुःख आदि ( इकतीसवें सूत्रोक्त ) को कहकर और विस्तारसे चित्त - विक्षेपादिको हटानेवाले, एकतत्त्वके अभ्यास, मैत्री, करुणा आदि और प्राणायाम आदिको कहकर तथा सम्प्रज्ञात - असम्प्रज्ञात दोनों अङ्गरूप ‘ विषयवती वा प्रवृत्तिः ’ ( पैंतीसवें सूत्रसे लेकर ) इत्यादि विषयोंको कहकर; और उपसंहारद्वारा अपने - अपने विषयसहित अपने स्वरूप और फलसहित समापत्तिको कहकर, सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञातकी समाप्ति कर, सबीज - समाधिपूर्वक निर्बीज - समाधि कही गयी है । यह उपसंहार केवल सूत्रोंका है, इसमें व्याख्याताके अपने वि ० वि ०, वि ॰ व ०, टिप्पणी इत्यादि अर्थात् ( सूत्र एकमें ) अनुबन्ध - चतुष्टय जिसमें योगकी प्राचीन परम्परा, योग - दर्शनकी विशेषता, योगके भेद आदि विस्तारपूर्वक वर्णन हैं, ( सूत्र दोमें ) चित्त तथा सृष्टिक्रमका विस्तारके साथ वर्णन, ( सूत्र सत्रहमें ) कोशोंद्वारा अभ्यासकी प्रणाली तथा कोशोंकी विस्तृत व्याख्या, १८ में ) ( सूत्र सम्प्रज्ञात - समाधिकी भूमियों, असम्प्रज्ञात - समाधि और कैवल्यका विशेष वर्णन, ( सूत्र १ ९ में ) ‘ भव - प्रत्यय’के सम्बन्धमें अयुक्त और ' विदेह ' तथा ' प्रकृतिलय ' के प्रति संकीर्ण विचारोंके निराकरणार्थ तथा युक्त और यथार्थ अर्थके समर्थनार्थ ' व्यासभाष्य ', ' तत्त्व वैशारदी ' तथा ' योगवार्त्तिक’का भाषानुवाद, ( सूत्र २६ में ) गुरुका यथार्थ स्वरूप, ( सूत्र २७ में ) प्रणवका वर्णात्मक तथा ध्वन्यात्मक स्वरूप, ( सूत्र २८ में ) ओम्, स्थूल - सूक्ष्म तथा कारण - शरीरकी व्याख्या; जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति तथा समाधि - अवस्थाओंमें भेद, ( सूत्र ३४ में ) सूक्ष्म, प्राण, स्वर, स्वरसाधन, तत्त्व, तत्त्वसाधन, चक्र, चक्रभेदन, कुण्डलिनी - शक्ति, कुण्डलिनी जाग्रत् करनेके उपाय, साधकोंको आवश्यक चेतावनी; और ( सूत्र ५१ में ) स्थितप्रज्ञके लक्षण इत्यादिको भी उपसंहृत कर लेना चाहिये । इस प्रकार
पातञ्जलयोग - प्रदीपमें समाधि नामवाले पहले पादकी व्याख्या समाप्त हुई ।
इति पातञ्जलयोगप्रदीपे प्रथमः समाधिपादः समाप्तः ॥
( २७४ )
पृष्ठ 300
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
साधनपाद प्रथम पादमें समाहित चित्तवाले योगके उत्तम अधिकारियोंके लिये योगका स्वरूप, उसके भेद और उसका फल सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात - समाधिको विस्तारके साथ वर्णन किया गया है और योगके मुख्य उपाय अभ्यास तथा वैराग्य - साधनकी कई विधियाँ बतलायी हैं । पर विक्षिप्त चित्तवाले मध्यमाधिकारी जिनका चित्त सांसारिक वासनाओं तथा राग - द्वेष आदिसे कलुषित ( मलिन ) हैं, उनके लिये अभ्यास और वैराग्यका होना कठिन है उनका चित्त भी शुद्ध होकर अभ्यास और वैराग्यको सम्पादन कर सके इस अभिप्रायसे चित्तकी एकाग्रताके असंदिग्ध उपाय क्रियायोगपूर्वक यम - नियमादि योगके आठ अङ्गोंको बतलानेके लिये दूसरे साधनपादको आरम्भ करते हैं । योगके अङ्गोंमें प्रवृत्त करानेसे पूर्व सबसे प्रथम चित्तकी शुद्धिका एक सरल और उपयोगी उपाय क्रियायोग बतलाते हैं— तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः ॥ १ ॥
शब्दार्थ — तपःस्वाध्याय - ईश्वरप्रणिधानानि = तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान; क्रियायोगः = क्रियायोग हैं । अन्वयार्थ — तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान क्रियायोग है । व्याख्या — तपः — जिस प्रकार अश्व - विद्यामें कुशल सारथि चञ्चल घोड़ोंको साधता है इसी प्रकार शरीर, प्राण, इन्द्रियाँ और मनको उचित रीति और अभ्याससे वशीकार करनेको तप कहते हैं, जिससे सर्दी - गर्मी, भूख - प्यास, सुख - दुःख, हर्ष - शोक और मान - अपमान आदि सम्पूर्ण द्वन्द्वोंकी अवस्थामें बिना विक्षेपके स्वस्थ शरीर और निर्मल अन्तःकरणके साथ योगमार्गमें प्रवृत्त रह सके । शरीरमें व्याधि तथा पीड़ा, इन्द्रियोंमें विकार और चित्तमें अप्रसन्नता उत्पन्न करनेवाला तामसी तप योगमार्गमें निन्दित तथा वर्जित है । श्रीव्यासजी महाराज लिखते हैं " अनादि कर्म क्लेश वासनासे चित्रित हुआ जो विषयोंमें प्रवृत्ति करानेवाला अशुद्धिसंज्ञक रजस् - तमस्का प्रसार है, वह बिना तपके अनुष्ठानके नाशको प्राप्त होना असम्भव है । अतः सबसे पहले तपरूप साधनका उपदेश किया है । तच्च चित्तप्रसादनं - बाधमानमनेनाऽऽसेव्यमिति मन्यते ' जो तप चित्तकी प्रसन्नताका हेतु हो तथा शरीर - इन्द्रियादिका बाधाकारक ( पीड़ाकारक ) न हो । वही सेवनीय है अन्य नहीं, वही सूत्रकारादि महर्षियोंको अभिमत है; क्योंकि व्याधि, शरीरकी पीड़ा आदि और चित्तकी अप्रसन्नता योगके विघ्न हैं । ऐसा ही उपनिषदोंमें बतलाया है ' तपसाऽनाशकेन ' ' जो शरीरका नाशक न हो ' । तपकी विशेष व्याख्या इस सूत्रके विशेष वक्तव्यमें देखें । स्वाध्याय — वेद - उपनिषद् आदि तथा योग और सांख्यके अध्यात्मसम्बन्धी विवेक - ज्ञान उत्पन्न करनेवाले सत् - शास्त्रोंका नियमपूर्वक अध्ययन और ओंकारसहित गायत्री आदि मन्त्रोंका जाप । ईश्वर - प्रणिधानके सामान्य अर्थ - ( १ ) ईश्वरकी भक्ति - विशेष और शरीर, इन्द्रिय, मन, प्राण, अन्तःकरण आदि सब बाह्य और आभ्यन्तर करणों, उनसे होनेवाले सारे कर्मों और उनके फलोंको अर्थात् सारे बाह्य और आभ्यन्तर जीवनको ईश्वरके समर्पण कर देना है । और उसके विशेष अर्थ ( २ ) ओ ३ म्का उसके अर्थोंकी भावनासहित मानसिक जाप हैं । जैसा कि समाधिपाद सू ० २८ की व्याख्या तथा विशेष ( २७५ )